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आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !

प्रोफेसर यशपाल- विज्ञान और समाज के सेतु: प्रेमपाल शर्मा

 

प्रोफेसर यशपाल

प्रोफेसर यशपाल (26.11.1926-25.07.2017) को सच्‍चे मायने में जन वैज्ञानिक कहा जा सकता है यानी आम आदमी की भाषा में विज्ञान को समझने, समझाने के लिए जीवन पर्यन्‍त प्रयत्‍नशील। उनका मानना था कि जिस बात को आप आम आदमी को नहीं समझा सकते, वह विज्ञान अधूरा है। इतना ही नहीं, उन्‍हें आम आदमी की समझ–बूझ पर भी बहुत भरोसा था। इसीलिए शिक्षा में वे उस ज्ञान के प्रबल पक्षधर थे, जो सदियों से समाज ने अपने अनुभव से अर्जित किया है, लेकिन उसकी कूपमंडूकता के उतने ही विरोधी। उनके एक-एक शब्‍द में अंधविश्‍वासों, तंत्र-मंत्र के खिलाफ जंग झलकती है। दूरदर्शन पर वर्षों तक चलने वाला प्रोग्राम ‘टर्निंग प्‍वांइट’ इसलिए इतना लोकप्रिय और ज्ञानवर्धक बना। देश के कोने-कोने से आए किसी भी प्रश्‍न को वे बच्‍चों की सी  सहजता से उठाते थे और मानते थे कि स्कूल यदि बच्चों के इस सहज ज्ञान को विज्ञान की नयी रोशनी में संवर्धित कर पाये तो शिक्षा का कायाकल्‍प हो सकता है।

हर मंच पर स्कूल, विश्‍वविद्यालय, मंत्रालय तक उन्होंने  बार-बार दोहराया कि बच्चे केवल ज्ञान के ग्राहक ही नहीं हैं। वे उसे समृद्ध भी करते हैं। बराबर के भागीदार। किसान, आदिवासी समाज के शब्द, बोली और परंपरागत जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना शहरी किताबी ज्ञान। पाठ्यक्रम में दोनों का सामंजस्य, संतुलन चाहिए। स्कूल की दीवारों के भीतर और और उसके बाहर के परिवेश में जितना कम फासला होगा, शिक्षा उतनी ही बेहतर, सहज, रुचिकर होगी। माध्यम भाषा की कसौटी पर यशपाल की अवधारणा को परखा जाए तो हमारे शहरी स्कूल उस विदेशी भाषाओं में पढ़ाते हैं, जो अपने आसपास के परिवेश से बहुत दूर है।

एक साथ उन्‍हें कास्मिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विज्ञान संपादक, प्रशासक की श्रेणी में रखा जा सकता है। अपने अग्रज समकालीन भौतिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद डॉ. दौलत सिंह कोठारी की तरह। अपनी भाषाओं के प्रति दोनों का प्‍यार बेमिसाल रहा। मुझे याद आ रही है, दिल्‍ली की एक गोष्‍ठी। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में शायद नेहरूजी के ही किसी वैज्ञानिक अवदान के प्रसंग में थी। प्रोफेसर यशपाल मुख्‍य वक्‍ता थे। बोलने के लिए खड़े हुए। मंच की तरफ देखते हुए पूछने लगे कि‍ क्‍या हिन्‍दी में बोल सकता हूं? जाहिर है, दिल्‍ली के ऐसे मंच बहुत स्‍पष्‍टता और उत्‍साह से हिन्‍दी के लिए हामी नहीं भरते। कुछ मिनट तो वे अंग्रेजी में बोले फिर तुरंत हिन्‍दी की सहजता में उतर आए। प्रसंग भी इतने आत्‍मीय थे कि उन्‍हें केवल अपनी भाषा में ही कहा जा सकता था। यादगार भाषण था, वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए। और यह भी कि जो व्‍यक्ति समाज को समझता है, उसके बीच से एक लंबे संघर्ष से गुजरा है, उसे जनभाषा की ताकत और उसकी संवाद शक्ति का एहसास है। यही कारण है कि प्रोफेसर यशपाल के किसी भी भाषण के बाद प्रश्‍नों की बौछार लग जाती थी। कभी-कभी घंटों तक। क्‍योंकि न वे विज्ञान का आतंक चाहते थे, न अंग्रेजी का। ऐसे ही सामान्‍य प्रश्‍नों को संकलित कर एनसीईआरटी ने एक किताब प्रकाशित की है, हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में- खोजी प्रश्‍न Discovered Questions। एक नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने भी Random Curiosities। स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बहुत जरूरी।

यशपाल का जन्म मौजूदा पाकिस्तान के झुंग में हुआ था। विभाजन की त्रासदी के दौर से गुजरते हुए परिवार ने हरि‍याणा के कैथल में डेरा डाला। पंजाब यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातकोत्तर के बाद आगे की पढा़ई के लिए  एमआईटी अमेरिका गए। यहाँ दाखिले का प्रसंग भी शिक्षा –विमर्श के लिए बहुत प्रासंगिक है। प्रवेश परीक्षा में वे असफल रहे, तो उन्हें फिर से परीक्षा देने को कहा गया और इस बार उन्होंने बहुत अच्छा किया। सबक यह कि व्यक्ति की क्षमताओं को मापने के लिए परीक्षा पद्धति‍यों  को लचीला बनाने की जरूरत है– दुनियाभर के वि‍श्‍ववि‍द्यायलों की तर्ज़ पर।

विज्ञान के साथ-साथ शिक्षा में उनका मौलिक योगदान रहा है। 1992 में ‘बस्‍ते का बोझ’ शीर्षक से उनकी रिपोर्ट पर्याप्‍त चर्चा में रही है। वे कोचिंग और ट्यूशन के घोर विरोधी थे। कोचिंग के बूते आईआईटी में चुने जाने के भी वे पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि यह बनावटी सफलता है। जो सफल हो जाते हैं, उन्‍हें दूसरे विषयों का शायद ही कोई ज्ञान होता है और जो असफल रहते हैं, वे पूरी उम्र एक निराशा के भाव में रहते हैं। पाठ्यक्रम, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, नर्सरी के दाखिले में टेस्ट, माँ- बाप के इंटरव्यू को बंद करना जैसी बातों को उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाया और समझाने की कोशिश की। उनकी अध्‍क्षता में बना राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्चा कार्यक्रम-2005 एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है। हालांकि इसके पक्ष–विपक्ष में कम विवाद नहीं हुआ। पारंपरिक विज्ञान के धुर विरोधी इतिहासकारों ने यह कहकर चुनौती दी कि इसकी प्रमाणिकता पर संदेह है, लेकिन यशपाल अपनी मान्यता पर अडिग रहे। उनका कहना सही था कि उसे सिरे से नकारने की बजाय नयी वैज्ञानिक कसौटियो पर कसा जाए क्योंकि हर ज्ञान, समझ समाज सापेक्ष होता है। ग्रेड प्रणाली, परीक्षा को तनाव मुक्‍त करने की उनकी सिफारिशों का दूरगामी महत्व है। समान स्कूल व्यवस्था की बात कोठारी आयोग ने 1966 में की थी, यशपाल भी उसके पूरे समर्थन में थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूल इतने अच्छे और ज्यादा हो जाएँ कि बच्चे निजी स्कूल की तरफ झांके भी नहीं। घर की सारी आमदनी इन प्राइवेट स्कूल में बर्बाद हो रही है।  2008 में उच्‍च शिक्षा के कायान्‍तरण के लिए भी उन्‍होंने एक रिपोर्ट बनायी। दुर्भाग्‍य से इन दोनों ही रपटों को न सही रूप में समझा गया, न लागू किया गया।

जीवनभर अटूट जिजीविषा और उत्‍साह से काम करने वाले यशपाल जी को अंतिम दिनों में इसका अहसास था। वर्ष 2009 में आकाशावाणी के एक कार्यक्रम में मैंने जब समान शिक्षा, अपनी भाषा में पढ़ाई का माध्‍यम, बढ़ती कोचिंग के प्रश्‍नों पर सरकार की असफलता के बारे में पूछा तो उनके स्‍वर में उतनी ही निराशा थी। यों उन्‍हें पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्‍च पुरस्‍कारों से नवाजा गया, उनकी शिक्षा संबंधी सिफारिशों की चर्चा भी देशभर में होती है, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्‍य न कहें तो क्‍या कहें कि‍ जहां ऐसे वैज्ञानिक के होते हुए भी वैज्ञानिक सोच के पैमाने पर इतना बड़ा देश दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में है। प्रोफेसर यशपाल को सच्‍ची श्रद्धांजलि उनके विचारों, शिक्षा को फिर से जीवित करने, जन-जन तक फैलाने में है।

ऐसे भी बढ़ता है बस्‍ते का बोझ

निजी स्‍कूलों के बोझ को सरकारी स्‍कूल के बच्‍चों की तुलना में अक्‍सर दोगुने से भी ज्‍यादा वज़न का बस्‍ता लादना पड़ता है। इसमें जरूरी किताबों की बजाय गैरजरूरी किताबों की संख्‍या ही अधिक होती है। मिसाल के लिए, आठवीं कक्षा तक चले वाली सुलेख की किताबें। इन गैरजरूरी किताबों की कीमतें भी जरूरी किताबों की तुलना में बहुत ज्‍़यादा होती हैं। लेकिन हर विद्यार्थी को ये सभी किताबें खरीदनी पढ़ती हैं।

होता यह है कि प्राइवेट स्‍कूलों में चलने वाली अधि‍कांश किताबें निजी प्रकाशक छापते हैं। मान लो किसी किताब की लागत 3 रुपये है तो प्रकाशक उसे पुस्‍तक विक्रेता को 6 रूपये में देगा।     पुस्‍तक विक्रेता, निजी स्‍कूलों के पाठ्यक्रम में उस किताब को शामिल करवा लेगा और इसके बदले स्‍कूल के विद्यार्थियों की कुल संख्‍या के हिसाब से स्‍कूल एक प्रति पर 3 रुपये कमीशन लेगा। यानी यह किताब पुस्‍तक विक्रेता को कुल 9 रूपये में पड़ी। लेकिन विद्यार्थी को यही किताब 15 से 20 रूपये तक में मिलेगी। अब पाठ्यक्रम में जितनी ज्‍़यादा किताबें होंगी प्रकाशक, पुस्‍तक विक्रेता और स्‍कूल चलाने वालों को उतना ही ज्‍़यादा मुनाफा होगा। ज़ाहिर है, इन तीनों में से कोई भी बच्‍चे के बस्‍ते के वज़न की परवाह करेगा तो उसका अपना धंधा चौपट हो जाएगा।

(यशपाल रिपोर्ट- बस्‍ते का वोझ(1992) से/साभार: चकमक, सितम्‍बर, 1994)

प्रेमचंद के बहाने समय-समाज को समझने की कोशि‍श  

रा.इ.का. टोटनौला में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया।

पि‍थौरागढ़ : प्रेमचंद जयंती तथा उसकी पूर्व संध्या पार उनको याद करते हुए जगह-जगह विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य प्रेमचंद के बहाने अपने समय और समाज को जानना-समझना और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाना रहा। इस बार पिथौरागढ़ में आरम्भ स्टडी सर्किल, रचनात्मक शिक्षक मंडल और लोकतान्त्रिक साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा प्रेमचंद जयंती को एक अलग अंदाज में मनाया गया। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर एक ‘कथा चौपाल’ का आयोजन किया गया। इसके न किसी को औपचारिक आमंत्रण पत्र दिए गए, न किसी को अध्यक्षता के लिए कहा गया और न ही कोई मुख्य वक्ता तय किया गया। कथा पाठ हुआ। उसके बाद उपस्थित लोगों ने बिना किसी औपचारिकता के कहानी को लेकर अपनी-अपनी बात रखी। गिर्दा के जनगीतों से कार्यक्रम की शुरुआत और समापन हुए। लोग उसके बात भी चर्चा-परिचर्चा करते हुए देखे गए।

कार्यक्रम का एक विहंगम शब्द-चित्र ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चन्द्र पाण्डेय ने अपने फेसबुक वाल पर कुछ यूँ खींचा है- बरसात का दिन, राम लीला फिल्ड,और मुंशी प्रेमचंद जयंती का पूर्व दिन शाम के साढ़े चार बजे के आसपास बरसात का रुक जाना और आरम्भ स्टडी सर्कल के कुछ युवा साथी अपने पोस्टरों और किताबों से भरे झोलों के साथ बाहर निकलते हैं। साथ में विनोद उप्रेती, राजीव जोशी, कमलेश उप्रेती, चिंतामणि जोशी, किशोर पाटनी, दिनेश भट्ट आदि का ओपन थियेटर की ओर आना पिथौरागढ़ के माहौल में आ रहे परिवर्तन की ओर इंगित कर रहा था। बस कुछ ही पलों में पोस्टर लहराने लगे और एक मेज पर सज गई थीं कुछ स्थूल और कुछ कृसकाय किताबें। अब तक कुछ भी तो नहीं था, दो-चार लोगों के सि‍वाय।लग रहा था कि‍ बस इतने ही लोग क्या बोलेंगे। क्या सुनेंगे। क्या विचार-विमर्श होगा। कुछ ही देर में महेश पुनेठा आदि का आना और सीढ़ियों पर बैठ जाना । एक-एक कर संख्या का बढ़ते जाना। और बिना औपचारिकता के आरम्भ के साथियों के संचालन में गिर्दा के जनगीत के साथ प्रेमचंद की दो बैलों की कथा का अभिनयात्मक वाचन । थोड़ी ही देर में शिक्षकों और छात्रों के समूह से सामने की सीढ़ियां भर गईं। थोड़ी दूर पर बैठे कुछ बच्चे पहले कुछ मजाकिया मूड में थे, कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ खुद को जोड़ने से रोक नहीं पाए। चुपचाप आए और पीछे बैठ गए और कहानी में लीन हो गए। तहसील परिसर की दीवार पर कुछ लोग जो ऐसे ही खड़े थे, दीवार के सहारे खड़े होकर हीरा और मोती की बातें ऐसे सुन रहे थे मानो अपने गांव की सैर में चले गए हों। बीच-बीच में बज रहीं मोबाइल की घण्टियों से ऐसा लग रहा था मानो थियेटर में पार्श्व संगीत चल रहा हो। करीब पौन घण्टे चली कहानी अब पूर्णता की ओर थी । आखिर कहानी पूरी हुई । युवा संचालक का बातचीत को आगे बढ़ाना । खुले मंच को अपने विचारों को साझा करने को कहना । किसी कहानी को कौन किस तरह किन कोणों से पढ़ता और समझता है, कितना अपने से और समाज से जोड़ पाता है, तत्कालीन समाज और समय और आज के परिपेक्ष्‍य में कहानी उपादेयता, पात्रों का गठन और उनकी उपयोगिता पर खुल कर चर्चा परिचर्चा हुई । खास बात यह थी की बोलने वालों में सबसे मुखर युवा और बच्चे थे । सभी ने यह माना कि यह खुली चर्चा शहर में पढ़ने और पढ़ाने की संस्कृति को विकसित करने के लिए एक सार्थक पहल है। यह लगातार होनी चाहिए। रचनात्मक शिक्षक मंडल का योगदान भी सराहनीय रहा। युवाओं को अगर सही मर्गदर्शन मिले तो शहर की फिजा बदल सकती है। युवाओं का यह जोश भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। अंत में फिर जनगीत के साथ एक खूबसूरत खुले मंच का विसर्जन। और उसके बाद किशोर पाटनी, राजीव जोशी, चिंतामणि जोशी की औपचारिक बातें। कुल मिलाकर एक खूबसूरत शाम ।अब बारिश शुरू हो चुकी थी ।

कार्यक्रम में पोस्‍टर रहे आकर्षण का केंद्र।

इस कार्यक्रम के बारे में डीडीहाट से शामिल होने आए शिक्षक साथी कमलेश उप्रेती ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि कुछ बेहतर करने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। लगन हो और नीयत साफ तो खुले आसमान के नीचे भी शानदार आयोजन हो सकता है। इसका उदाहरण है पिथौरागढ़ में कालेज में पढ़ने वाले युवाओं का एक रचनात्मक समूह ‘आरंभ स्टडी सर्कल’। कल महान भारतीय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर कथा चौपाल का अनौपचारिक आयोजन इन जोशीले युवाओं द्वारा किया गया। साथ में एक बुक स्टॉल भी, जहां पर प्रेमचंद साहित्य के साथ वैज्ञानिक विषयों पर किताबें खरीदने के लिए उपलब्ध, कितना सुखद है यह सब हमारे पिथौरागढ़ में हो रहा है।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का वाचन नाटकीय संवाद शैली में किया गया तो आभास हुआ कि इस तरह सामूहिक वाचन से कथ्य के कितने सारे आयाम खुलते हैं!  दोस्तो, इस दौर में जब युवा राह चलते भी अपने स्मार्टफोन में घुसा रहता है, आपके किताब उठाकर सरेआम पचास लोगों को पढ़कर सुनाने के जज्बे को सलाम बनता है।

प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल रामनगर द्वारा एमपी इंटर कालेज में कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम के बारे में कार्यक्रम के संयोजक नवेंदु मठपाल अपनी फेसबुक पोस्ट पर बताते हैं कि 38 विद्यालयों के 700 से अधिक बच्चे, मौका था प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा एमपी इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम का। ये बच्चे विगत एक महीने में 10 हजार बच्चों से विभिन्न तरीकों से कि‍ए गए सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए। बोर्ड सचिव श्री वीपी सिमल्टी जी ने बतौर मुख्य अतिथि अपने स्कूली दिनों को प्रेमचन्द की कहानियों के बहाने याद किया, तो बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल जी ने भी वक्तव्य रखा। ललिता बिनवाल स्मारक समिति के अध्यक्ष बिनवाल जी, वरिष्ठ चित्रकार सुरेश लाल जी, रंगकर्मी रामपाल जी, कवि असगर जी, संजय रिखडी जी के नेतृत्व में भोर संस्था की नौजवान टीम के साथियों, अनेक प्रधानाचार्यों एसपी मिश्रा जी, राय जी, दिग्विजय सिंह जी, पुष्पा बुधानि जी, नलनी श्रीवास्तव जी, नीना सन्धु जी, जीतपाल जी के नेतृत्व में रोवर्स, रेंजर्स की टीम समेत 50 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं का रहा सक्रिय सहयोग। देघाट के शिक्षक साथी पाठक जी का विशेष धन्यवाद। बच्चों की एक टीम लेकर पहुंच गए।

अनौपचारि‍क कार्यक्रम में लोगों ने दि‍खाई खासी रुचि‍।

कार्यक्रम की शुरुआत भोर की टीम ने 1857 विद्रोह के प्रयाण गीत ‘हि‍म हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ एवं रामप्रसाद बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्‍ना’ से हुई। प्रत्येक प्रतिभागी बच्चे को दिया गया- प्रेमचन्द साहित्य। आयोजक मण्डल द्वारा निकाली गई पुस्तिका ‘हमारी विरासत’ का भी विमोचन हुआ। कौन कहता है कि‍ बच्चे पढ़ना नही चाहते, शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन और छुट्टी ही चाहिए। रचनात्मक मण्डल की टीम ने फिर गइस धारणा को गलत साबित किया।

गतवर्ष की भांति ही डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला बेरीनाग में प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर भव्य आयोजन किया गया। साथी कमलेश जोशी अपनी फेसबुक वॉल में बताते हैं कि  इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर पोस्टर बनाए, कहानियों का वाचन किया और नाटक किए। फ़िल्म ‘ईदगाह’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यहाँ एक बालिका द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का कुमाउंनी भाषा में किया अनुवाद काफी चर्चित रहा था।

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में भी कार्यक्रम आयोजि‍त हुए। इसके बारे में युवा लेखक बिपिन जोशी अपनी  फेसबुक वॉल पर कुछ इस तरह बताते हैं-  मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में कहानी वाचन एवम काव्य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन किया गया । कहानी पर सारगर्भित चर्चा की गई । उक्त कार्यक्रम में शिक्षक साथियों सहित उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट, मोहन चन्द्र जोशी, चन्द्र शेखर बडशीला, ओम प्रकाश फुलारा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद बिष्ट तथा जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षक नीरज पन्त ने मुंशी जी के साहित्य पर उनके जीवन पर प्रकाश डाला। मुंशी जी के बहाने दलित साहित्य और नारी साहित्य पर भी बातचीत की गई । कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन शिक्षक उमेश जोशी ने कि‍या।
कथा चर्चा के बाद कुमाउंनी लोक साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर मोहन जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल दत्‍त भट्ट, ओमप्रकाश फुलारा ने अपनी रचनाओं का पाठ कि‍या।
साहित्य गोष्‍ठी को एक महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यक्रम बताते हुए डीईओ आकाश सारस्‍वत ने प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं की प्रसंगिकता पर विचार रखे।

कुमाउं  मंडल  के विभिन्न स्कूलों में भी प्रेमचंद जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई गई।  रा.इ.का. देवलथल में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। दीवार पत्रिका ‘मनोभाव’ के प्रेमचंद विशेषांक का प्रधानाचार्य अनुज कुमार श्रीवास्तव ने लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि‍ प्रेमचंद का साहित्य हमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बच्चों द्वारा सम्पादित दीवार पत्रिका के इस विशेष अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अधिकाधिक होने चाहिए क्योंकि इससे बच्चों की रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को नए आयाम मिलते हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का संचालन करते हुए दीवार पत्रिका के संपादक राहुल चन्द्र बड़ ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। शिक्षक रमेश चन्द्र भट्ट ने एक दि‍न पूर्व ‘प्रतिभा दिवस’ पर जूनियर कक्षाओं द्वारा तैयार की गई  दीवार पत्रिकाओं का बच्चों द्वारा समूहवार प्रस्तुतीकरण भी  किया गया।

इससे पूर्व प्रेमचंद जयंती पर कक्षावार निबंधों का पाठ किया गया। कक्षा-12 में उनके निबंध ‘प्राचीन और नवीन’ तथा कक्षा-10 में ‘आजादी की लडाई’ का वाचन किया गया। इन पर बच्चों ने लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी। कक्षा-9 के बच्चों के साथ प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों की चर्चा करते हुए उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। बच्चों को बताया गया कि कहानियां हमें केवल आनंद ही नहीं प्रदान करती हैं, बल्कि वे जिस कालखंड में रची गयी होती हैं, उस समय और समाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।जैसे- प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हुए वे आजादी की लडाई के बारे में तथा उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं। इससे हमारी भाषा भी मजबूत होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ी जानी चाहिए। न केवल खुद, बल्कि दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय खोलने के अभियान से जुड़ने की बच्चों से अपील की गई।  बच्चों ने लिखित रूप से संकल्प व्यक्त किया कि वे अपने-अपने गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित करने की कोशिश करेंगे। साथ ही वे प्रेमचंद की अगली जयंती तक उनकी अधिक से अधिक रचनाएँ पढ़ेंगे।

रा.इ.का. टोटनौला में शिक्षक-साहित्यकार चिंतामणि जोशी के मार्गदर्शन में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया। उन्‍होंने अपनी फेसबुक वाल लि‍खा है कि‍ आज मास का अंत था और चौथे वादन के बाद दीवार पत्रिका समूह द्वारा ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद विशेषांक के लोकार्पण व प्रेमचंद जयंती मानाने की योजना भी थी। सुबह विद्यालय पहुंचे तो रात भर के बाद भी बरसात जारी थी। बच्चे पिछले लगभग 15 दिनों से अपने ढंग से प्रेमचंद को जानने-समझने में लगे थे। इस माह दीवार पत्रिका के भी दो अंक तैयार कर चुके थे। विद्यालय में बृहद कक्ष है नहीं। तीसरे वादन तक भी मौसम नहीं खुला तो कक्षा 11अ के बच्चों ने अपनी कक्षा का फर्नीचर बगल के कक्ष में शिफ्ट कर कक्षा में दरिया बिछा दीं और शिक्षकों के लिए कुर्सियां डालकर प्रधानाचार्य जी को सूचित कर दिया कि कार्यक्रम होगा और कक्षा कक्ष में ही होगा। वाह! जहाँ चाह वहां राह।

दीवार पत्रिका संपादक मंडल ने मध्यांतर के बाद विद्यार्थियों को बिना बैग के छोटे से कक्ष में बिठा दिया। मुख्य संपादक कविता कापड़ी ने आवश्यक निर्देशों के बाद प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की कि नवांकुर का लोकार्पण, आलेख-कविताओं-कहानियों का वाचन, समीक्षा, प्रेमचंद के बहाने पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर संवाद होगा और गणित अध्यापिका नीता अन्ना को बच्चों की ओर से विदाई भी दी जाएगी। कविता 100 बच्चों के भीतर स्व-अनुशासन रोपित कर चुकी थी।

प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा जी के साथ श्रीमती अन्ना, पूनम, स्वाति व दीवार पत्रिका टीम ने नवांकुर का लोकार्पण किया। प्रधानाचार्य ने दीवार पत्रिका के महत्व को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चों की खूब प्रशंसा की। छात्रा बबीता पाण्डेय ने स्वरचित कुमाउंनी कविता में प्रेमचंद की जीवनी और रचना संसार को व्यक्त किया। कमलेश पाण्डेय ने स्वरचित ‘प्रेमचंद जिन्होंने साहित्य में यथार्थ को निरूपित किया’ तथा आकांक्षा ने ‘प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री पक्ष’ आलेख का वाचन किया। तनुजा कापड़ी ने स्वरचित कहानी ‘शेरा की वापसी’ का पाठ कर सभी की संवेदना को झकझोरा। हिंदी शिक्षक राजेन्द्र बिष्ट, प्रकाश राम व विज्ञानं शिक्षक संतोष पन्त ने बच्चों को प्रेमचंद के विस्तृत रचना संसार की सैर कराई। मैंने प्रेमचंद के सम्बन्ध में बच्चों के प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के समाधान का प्रयास किया। उन्हें प्रेरित किया कि अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत विकसित कर कैसे वे बेहतर इन्सान बन सकते हैं।

बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड में स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल रौल्याना में नवाचारी शिक्षक साथी नीरज पन्त के निर्देशन में  प्रेमचंद की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ का वाचन किया एवं कहानी के तत्वों पर चर्चा की।  ग्राम प्रधान मदन गिरी की अध्यक्षता में विविध कार्यक्रम हुए।

क्रि‍एटि‍व उत्‍तराखंड द्वारा रुद्रपुर में संचालित सृजन पुस्‍तकालय में भी प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍या गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की जीवन पर प्रकाश डाला गया और ईदगाह और दो बैलों की कहानी का वाचन कि‍या गया। इसके साथ कवि‍ता पाठ भी हुआ।

राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा पालगेट टि‍हरी गढ़वाल में आयोजि‍त कार्यक्रम में दो बैलों की कहानी और कई अन्‍य कहानि‍यों का वाचन और चर्चा हुई। साथ ही प्रेमचंद की भाषा, जीवन दर्शन और सामाजि‍क सरोकारों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन मोहन चौहान ने कि‍या।

राजकीय प्राथमि‍क वि‍द्यालय नवीन चौरसौ बागेश्‍वर में प्रेमचंद जयंती पर बच्चों ने दीवार पत्रिका ‘मन की बात’ तैयार की। मुख्य का आकर्षण प्रेमचंद की कहानियों का वाचन, जीवन परिचय, स्वरचित कहानी पाठ और चित्रांकन रहा। कार्यक्रम प्रधानाध्‍यापि‍का रीता जोशी की देखरेख में संपन्‍न हुआ।

प्रेमचंद जयंती पर आयोजि‍त कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में बच्‍चों की भागेदारी बहुत कुछ कहती है।

प्रस्‍तुति‍ : महेश चन्द्र पुनेठा

सोबन ब्वौडा! असली आज़ादी तो तूने दिलाई : कमल जोशी

कमल जोशी

कमल जोशी जी से 20 जून को कोटद्वार में उनके घर पर मुलाकात हुई थी। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने ‘लेखक मंच’ के लि‍ए छह रचनाएं दे दी थीं। अन्‍य रचनाएं देने का वादा कि‍या था। उनमें में से एक ‘रंगीली की खि‍चड़ी’ 26 जून को प्रकाशि‍त कर दी थी। अब पढ़ि‍ए उनकी एक और रचना-

हिमालय खूबसूरत दिख रहा था।

उखड़ती साँसों के बावजूद मैंने ट्राय-पोड लगाया, कैमरा सेट किया और फोटो खींचने लगा। हिमालय मनमोहक अदाएं दिखा रहा था। एक सुन्दर फोटो भी ट्रैकिंग की सारी थकान मिटा देती है। इन्हीं दृश्यों के लिए भी तो मैं यात्राएं करता हूँ।

मैं खतलिंग ग्लेशियर के इलाके में था। कल सुबह ही अपनी बाइक पर आया था। अपनी आदत और जिद के अनुरूप रेहा पिछली सीट पर कब्जा जमाये थी। चंबा से बूढ़ा केदार का रास्ता इतना खूबसूरत था कि जो रास्ता चार घंटे में कट जाना चाहिए था, उस पर ही हमने सारा दिन लगा दिया था। ज्यादा समय तो टिहरी डैम के नीचे दबे हुए टिहरी के यादों के बारे में बात करने में ही कट गया। कितनी बार टिहरी आया था और जिन सड़कों पर चला था, फटफटिया दौड़ाई थी, आज वो सब पानी के नीचे दबी थीं, जाने कैसी होंगी वे सड़कें अब? पानी के साथ आई गाद में दब गयी होंगी! …पर यादें हैं, जो हमेशा तैरती ही रहती हैं!

घनसाली के बाद घुमावदार रास्ता। दोनों तरफ कभी चीड़ की तो कभी मिलीजुली प्रजाति के पेड़। हवा में ठंडी खुनक और साथ में करेले के साथ नीम वाली तर्ज पर कवि हृदया रेहा। हर पचास कदम पर बाइक रोकने को कहती। रास्ते को महसूस करती, पेड़ों से बतियाती रेहा। किसी शहर में पले-बढ़े को इस रूप में देखना मुझ जैसे पहाड़ी को भला ही लगता है, और असमंजस भी होता है कि‍ हम पहाड़ी ही क्यों पहाड़ का इतना असम्मान करते है। शायद पहाड़ में रहने के दुःख और कठिनाइयां हमें इसकी सुन्दरता को अनदेखा करने को मजबूर कर देती हैं।

रेहा के साथ एक पंगा और है। वह जहां कहीं भी सड़क के किनारे के ढाबे में किसी औरत को काम करता देखती है, तो बिना रुके नहीं रहती। चाय पीनी तो लाजिमी है ही (मैं अपने प्रिय फैन-बिस्कुट का भक्षण भी करता हूँ), उस महिला से बात कर उसकी जिन्दगी और परिस्थितियों में झांकने की भी कोशिश करती है। कई बार मुझे दुभाषिये का काम भी करना होता है। ऐसे ही चमियाला से पहले एक ढाबे पर एक महिला चाय बना रही थी। रेहा ने मेरा कन्धा दबाया। मैने इशारा समझा और ढाबे पर बाइक रोक दी। चाय की जरूरत तो मुझे भी थी। उतरते ही चाय का ‘आर्डर’दे दिया गया। मेरी कमजोरी को देखते हुए रेहा ने महिला से पूछा, ‘‘क्‍या फैन भी हैं?’’ महिला ने ‘हाँ’ कहा तो रेहा ने फैन लेकर मुझे पकड़ाए और ताकीद दी, ‘‘तुम अपना मुंह फैन खाने में व्यस्त रखना, मैं जरा बात भी करती हूँ।’’ मैं निरीह बकरे की तरह फैन चबाने में व्यस्त हो गया। रेहा महिला के साथ बातें करने लगी। पता चला कि ढाबा मालकिन महिला का नाम सावित्री है और यह ढाबा उसके पति ने खोला था। पर ढाबा खोलते ही पति के यार दोस्तों ने यहां कब्जा जमा लिया।

‘‘ग्राहक कम आते थे और साथ के लुंड ज्यादा…मवासी तो घाम लगनी ही थी।’’ दुखी सावित्री ने बताया, ‘‘दारूड़ी भी गया था।’’

सावित्री ने पति को समझाया, दोनों बच्चों की जिम्मेदारी के बारे में बताया, ‘‘पर दारूड़ी किसी की सुनता है क्या?’’ ये सवाल उसने रेहा से ही कर डाला।

‘‘क्‍यों, अब कहाँ है पति।’’ रेहा ने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘अरे कहाँ,  हमें नरक में छोड़ कर खुद भाग्याँन हो गया।’’ बिना भाव बदले सावित्री बोली, ‘‘ कर्जा ऊपर से छोड़ गया। मैं तो घर पर ही रहती थी।’’ उसने जोड़ा। फिर बताया कि जब कर्जा के तकाजे वाले आये और उन्हें लगता कि‍ अब कर्जा वापस नहीं मिलेगा, तो वे उसके पति को ही गाली देने लगते। पति तो पति ही था, सावित्री की नजर में। उसके लिए गाली कैसे सहती। इसलिए उसने तय किया कि‍ वह खुद ढाबा चला कर कर्जा उतार देगी। और उसने ऐसा किया भी। उसकी कर्मठता से विभोर रेहा ने उसे गले लगा लिया। मैं सिर्फ ‘शाबास भुली’का ही गंग्याट कर पाया।

रात को हम बूढ़ाकेदार ही रुके। यहाँ मेरे परिचित बिहारी भाई का आश्रम भी है, पर रात को उनको परेशान करना उचित नहीं समझा, तो एक छोटे से होटल में रहे।

सुबह चिड़ियों की चहचाहट से नीद खुली। बाइक को बुढा़केदार में ही छोड़ दिया गया। हम अगुंडा होते हुए  महासर ताल के रास्ते लगे। हमारा कोई निश्चित जगह जाने का कार्यक्रम नहीं था। उत्तराखंड, अरे नहीं तब उत्तराँचल, बने एक साल हुआ था यानी ये वृतांत 2001 का है।

मैं उत्तराखंड के बारे में लोगों की राय जानने को उत्सुक था इसलिए घूम रहा था। जब मैं नयी टिहरी में था तो रेहा का पता चला कि‍ मैं नयी टिहरी में हूँ, तो वह बिना बताये चंबा आ गई- इस फरियाद कम धमकी ज्यादा के साथ कि वह घूमना चाहती है। फिर क्या था, हम सतत आवाराओं की तरह निकल पड़े थे।

हम महासर के ऊपर एक धार में पहुंचे थे कि‍ मुझे हिमालय दिखाई दिया। मैंने ट्राइ-पौड तान दिया- फोटो के लिए। पिट्ठू लिए हुए रेहा भी पीछे से आकर पसर गई। फोटो खींचने की जल्दी इसलिए थी कि कहीं कोहरा खूबसूरत हिमालय को ढक न दे।

मैंने फोटो लीं, लाजिमी था कि रेहा के कुछ पोज उस ब्रेक ग्राउंड में भी लूं क्योंकि‍ खाने का सामान उसी के पिट्ठू में था। अगर यह न करता तो ये भी हो सकता था कि रेहा खुंदक में मुझे खाने के लिए कुछ ना दे या कम दे।

पेट में कुछ जाने के बाद आसपास देखा। लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर एक व्यक्ति बैठा था। आसपास गायें थीं। वह यहाँ इस छोटे से मैदान में पशु चराने ही आया था। वह भी हमें देख रहा था। हमारा रात को यहीं रहने का इरादा था क्योंकि‍ पास ही छोटा पानी का नाला भी था और कुछ दूरी पर छाने भी। रात काटने के लिए सुरक्षित जगह थी। उस व्यक्ति के अलावा और कोई आसपास नहीं था। मैं उससे ही जगह की जानकारी लेने गया। नजदीक पहुँच कर जैसे ही मैं उसको अभिवादन करता, उसने कहा, ‘‘गुड मोर्निंग।’’  मैं अचकचा गया। इस तरह के अंग्रेजी अभिवादन की आशा मुझे नहीं थी। वह एक बुजुर्ग थे और छोटी सी छड़ी लेकर एक पत्थर पर बैठे थे। वह लगभग बहत्तर-पिछत्‍तर साल के थे। मैंने भी ‘गुड मार्निंग’ कह कर उनको जवाब दिया और बिस्कुट का पैकेट खोल कर उनकी और बढा़या। पहले तो उन्होंने मना किया, पर रेहा न जाने कब पीछ-पीछे आ गई थी।  उसने कहा कि‍ ले लीजिये ना ताऊ जी। तो उन्होंने एक बिस्कुट ले लिया। उन्होंने हमें बैठने को कहा तो हम पास के ही पत्थर में बैठ गये। मैंने देखा कि‍ वहां पर एक पुरानी ब्रिटिश टाइम की गरम डांगरी रखी है। संयोग से उस पर जो मोनोग्राम था, उस पर रॉयल आर्मी जैसा कुछ लिखा था, जो बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही पता चल रहा था। मैंने पूछा कि‍ यह डांगरी आपके पास कहाँ से आई तो वह मुस्कराए और बोले कि‍ यह मेरी ही है। मैंने उनसे पूछा कि‍ वह ब्रिटिश फौज में थे, क्या। उन्होंने हामी भरी और कहा, ‘‘मैंने  वर्ल्ड वार भी लड़ा है। यह तब की ही है।’’

मैंने उनसे उनके फौजी जीवन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि‍ वह आजाद हिन्द फौज में भी थे। अब दिलचस्पी बढ़नी स्वाभाविक थी। वह तो जिंदा इतिहास थे। रेहा ने स्वाभावानुसार डायरी निकाली और वृद्ध जी से नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम सोबन सिंह बताया। उनसे बातें शुरू हुईं। कहानी दिलचस्प थी। उन्हीं के शब्दों में…

‘‘मैं जब चौदह साल का था, तो देश (मैदान) के बारे में बहुत सुना था। पौड़ी जिले के एक फौजी थे। वह जब छुट्टियों में आये तो अपनी बहन के घर हमारे गाँव आये। उनकी चमक-दमक देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। तय कर लिया कि‍ फौज में भर्ती होंगे। पर टिहरी में तो भरती होती नहीं थी। हमें पता चला कि‍ लैंसडाउन में फौज की भरती हो रही है। मैं और मेरे दो दोस्त घर से बिना बताये लैंसडाउन के लिए भाग गए। रात को जिस गाँव में जाते और कहते कि‍ फौज में भर्ती होने जा रहे हैं तो लोग खाना खिला देते। सोने-ओढ़ने को दे देते। तब जमाना दूसरा था, पराया बच्चा भी अपना होता था। तीन दिन में लैंसडाउन पहुंचे। डर तो रहे थे।’’ सोबन सिंह जी ने बताया। लैंसडाउन पहुँचने पर वे लोग सीधे फौज के एक संतरी के पास पहुंचे और उसे सीधे सल्यूट किया। जब उसने पूछा तो उन्होंने बताया कि‍ हम फौज में भर्ती होने टिहरी से आए हैं। उसने कहा कि‍ परसों सुबह बटालियन ग्राउंड में आना। मैं सबसे छोटा था तो उसने मुझ से मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया कि‍ चौदह साल है। वह संतरी बोला, ‘‘तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम भर्ती नहीं हो सकते।’’ मैं बहुत दुखी हो गया। मेरी आँखों में आंसू आ गए कि अब घर किस मुंह से जाऊँगा। डर भी रहा था। मेरी हालत देखकर संतरी को दया आ गई।

शायद संतरी को पहले किसी ने इतनी इज्जत से सेल्यूट किसी ने नही किया था इसलिए वह प्रभावित हो गया था। वह बोला, ‘‘ तू पहाड़ी हिसाब से थोड़ा लंबा है। जब तेरी उम्र पूंछे तो अपनी उम्र सोलह साल बताना।’’

गुरुमंत्र पाकर सोबन सिंह खुश हो गए। उनको बीच का एक दिन काटना मुश्किल हो गया। पैसे नही थे, खाना कहाँ से खाएं और फौज की भर्ती की परीक्षा देनी थी। वह उदास बैठे थे। तभी एक काला कोट पहने व्यक्ति उधर से गुजरा। ‘‘हमें पता नहीं था कि‍ काला कोट वकील पहनते हैं और हम कचहरी के रास्ते पर हैं। उसने हमें देखा। शायद हमारे चेहरे पर भूख साफ दिखाई दे रही थी। उसने पूछा कि‍ कौन हो, क्यों बैठे हो। पहले तो हम घबराए कि‍ यह क्यों पूछ रहा है, पर बाद में उन्हें बताया कि‍ फौज में भरती होने आए है।’’

‘‘ भाग कर आए हो।’’ जब उन्होंने पूछा तो हमें काटो तो खून नहीं। हमारे साथ का एक रोने लगा। वह डर से रो रहा था या भूख से पता नहीं। यह मैंने सोबन सिंह जी से नही पूछा।

उन्होंने उसे रोते हुए देखकर पूछा कि‍ पैसे-वैसे हैं तुम्हारे पास! तो इन लोगों ने मना कर दिया।

‘‘जब उन्होंने पूछा कि‍ रात को खाना खाया कि‍ नहीं, तो हम चुप रहे।’’

काले कोट वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘‘क्या भूखे पेट फौज में भर्ती होओगे?’’ फिर उन्होंने जेब से एक रुपिया निकाला और उन्हें दिया और ‘सि‍र्फ खाना खाना’ कहकर चला गए। काले कोट वाला वह वकील इन लोगों को देवदूत सा लगा!

‘‘हम तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाए।’’ उस वक्त एक रुपया बहुत होता था। आज के 100 रुपयों से ज्यादा। हमने दो दिन उसी में काटे और तीसरे दिन भर्ती के लिये पहुंचे। उन दिनों आज की तरह कठिन नहीं था, भर्ती होना। अंग्रेजों को तो लड़ने के लिए भेड़-बकरी चाहिए थी। हमारी उम्र, लंबाई-चौड़ाई लि‍खी। मैदान में दौडा़या और वजन उठवाया। फिर एक डॉक्टर ने आला लगाकर कुछ देखा। बस उस समय ही डर लगा। और हम भर्ती हो गए।’’सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘लैंसडाउन में हमारी ट्रेनिंग हुई, नौ महीने के लिए और फिर हमें बरेली भेजा गया। दो महीने बाद ही हमें मलाया (मलेशिया) जापानियों से लड़ने भेज दिया। बम-गोले गिरते थे। पैंट में ही हग-मूत देते थे। बच्चे ही तो थे हम। बाद में हमें जापानियों ने पकड़ लिया। कैदी हो गया। ये सन (उन्नीस सौ) चवालीस  की बात होगी। कैद में हम दिन भर ड्रिल करते थे। जापानी हमसे ज्यादती भी करते थे।

‘‘एक दिन एक हिन्दुस्तानी हवालदार हमारे पास आया कि‍ क्या हम कैद से छूटना चाहते हैं? हमने कहा कि‍ क्या उसके पास भागने का कोई प्लान है। उसने कहा कि‍ भागना नहीं है। अपने देश के लिए लड़ना है। हमने कहा कि‍ वह तो हम कर ही रहे थे। तब उसने कहा कि‍ तुम देश के लिए नहीं, अंग्रेजों के लिए लड़ रहे थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’’ सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘एक दिन हमारी बड़ी परेड यानी सब कैदी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को एक साथ मैदान में लाया गया। पता चला कि‍ कोई सुभाष बोस भाषण देंगे। हमने सोचा कि‍ जापानी अफसरों के होते हुए कोई हिन्दुस्तानी भाषण देगा- इसका मतलब है कि‍ वह कोई बड़ा आदमी होगा। भाषण में सुभाष बोस ने कहा कि‍ भारतवासी गुलाम हैं।  हमें गुलामी की जंजीर तोड़नी होगी। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ गुलाम क्या होता है?. उन्होंने कहा कि‍ हमें देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लड़ना होगा। आजाद हिन्द फौज में भर्ती होना होगा।’’

‘‘बाद में पंजाबी हवालदार ने हमें गुलामी का मतलब समझाया। हमारी आंखें खुली कि‍ हम अब तक विदेशियों के लिए अपनी जान देने पर उतारू थे। हम आजाद हिन्द फौज में आ गए। रंगून, बर्मा में हमने अंग्रेजी फौज के खिलाफ लड़ा। हार गए और हमारे ऑफिसर ढिल्लों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जंगलों में भटकते रहे। इस डर से कि‍ पकडे़ जायेंगे, तो सजा होगी। हम गांवों में आ गये और सारे कागज फाड़ डाले कि‍ कहीं पकडे़ न जाएँ। देश जब आजाद हुआ, तो हमने समझा कि‍ हमें फौज वापस ले लेगी, पर पता चला की फौजी नियमों से हम बागी थे। कोई पेंशन नहीं। ‘‘हमने और हमारे साथियों ने कई बार सरकार को लिखा कि‍ हम अंग्रेजों के हिसाब से तो बागी थे, पर अपने हिन्दुस्तान के लिए ही तो लडे़ ही थे। हमारी सुध लो। पर कहीं से कोई जवाब नहीं।’’  इसके बाद सोबन सिंह चुप हो गए।

मैंने सोबन सिंह को ध्यान से देखा। यह भी एक स्वतन्त्रता सेनानी था। देश के लिए लड़ा। गोलियों का सामना किया था। यह यहाँ अपनी भेड-बकरियों के साथ जिंदगी बिताने के लिए अभिशप्त है। कुछ स्वतन्त्रता सेनानियों को ताम्र पत्र मिले, पेंशन मिली, उनके बच्चों को और बच्चों के बच्चों को भी रियायत मिली, नौकरी मिली! इस सेनानी का, जीवन के आखिरी मुकाम पर खडे़ सोबन सिंह का सहारा सिर्फ एक बांस की डंडी है….! यह भी तो स्वतन्त्रता सेनानी ही है। मैंने ध्यान दिया कि‍ बातों-बातों में रेहा ने कब सोबन सिंह का हाथ पकड़ लिया है और उसे सहला कर सांत्वना दे रही है। मुझे पता ही नहीं चला। सोबन सिंह उसे प्यार से देख रहे थे।

सोबन सिंह ने मेरी और देखा और कहा, ‘‘उत्‍तरांचल बन गया है। क्या हमारी भी कुछ पूछ होगी!’’ तब मैं कोई जवाब नहीं दे पाया था! सोबन सिंह जी से मिलने के सोलह साल बाद आज यह कह सकने कि‍ स्थिति में हूँ कि उत्तराखंड तो सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों के लिए बना है ताऊ जी, आपको पूछने की फुर्सत किसी को नहीं.!

मुझे भी चुप देख कर सोबन सिंह जी ने हिमालय के तरफ देख कर कहा, ‘‘कोहरा साफ हो गया है।हिमालय की फोटो खींचो।’’

मैंने हिमालय की तरफ देखा- मुझे वो बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। सोबन ब्वौडा की बात सुनने के बाद मैं खुद को कोहरे से निकाल नहीं पा रहा था।

स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)

बीसवीं शताब्दी के तानसेन- उस्ताद बड़े गुलाम अली खान :  संजीव ठाकुर

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान

आज से करीब ढाई-तीन सौ साल पहले फजल दाद खान नाम के एक पठान शख्स लाहौर के पास स्थित कसूर नाम के स्थान में ‘सुर की देवी’ की तलाश में निकले। उन्होंने सुन रखा था कि ‘सुर की देवी’ को पहाड़ों, जंगलों और नदियों में पाया जा सकता है तो वे सालों साल ‘सुर की देवी’ की तलाश में भटकते रहे। एक दिन वे एक पत्थर से सिर टेककर बैठे हुए थे कि सामने के जंगल से आवाज़ आई—”फजल दाद! मैं यहाँ हूँ।’’

फजल दाद उस आवाज़ की दिशा में गए तो देखा कि संपूर्ण जंगल स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा रहा था। अंदर जाने पर उन्हें एक लंबी स्त्री दिखाई पड़ीं जो ऊपर आकाश की ओर उड़ रही थीं। उन्होंने फजल दाद को संगीत का वरदान दिया और वापस लौटकर अपने लोगों को संगीत सिखाने को कहा। ‘सुर की देवी’ ने यह भी कहा कि ‘संगीत तुम्हारे परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगा।’ फजल दाद कसूर लौट आए। वरदान पाकर लौटने के कारण लोग उन्हें पीर फजल दाद खान कहने लगे। वे अपने लोगों को संगीत सिखाने लगे।

फजल दाद के वरदान पाने की यह कहानी सच हो या न हो, यह तो सच है कि संगीत इस परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला—खल्क अली खान, इरशाद अली खान, इदा खान, अली बख्श खान से होते हुए बड़े गुलाम अली खान तक पहुँच गया। पीर फजल दाद खान से चला आया संगीत का यह घराना ‘कसूर का घराना’ कहलाया! इस घराने में यों तो बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श खान और चाचा काले खान की गिनती देश के चोटी के गायकों में की जाती थी, लेकिन बड़े गुलाम अली खान ने जो ख्याति अर्जित की वह इस घराने के किसी भी गायक के लिए संभव नहीं हो सकी थी। बड़े गुलाम अली खान की प्रतिभा को पहचानकर उनके पिता अली बख्श खान ने कहा था—‘‘हमारी सात पीढिय़ों में भी तुम्हारे जैसा कोई न हो सका, न ही आगे किसी के होने की संभावना है।’’ अली बख्श खान की बात सही साबित हुई!

कसूर घराने के होने के बावजूद अपनी गायकी को और अधिक समृद्ध करने के लिए बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श और चाचा काले खान ने पटियाला घराने के उस्ताद फतेह अली खान साहब से तालीम ली थी। इस तरह उनकी गायकी में कसूर और पटियाला दोनों घराने का रंग आ गया था। उनका घराना भी आगे ‘कसूर-पटियाला का घराना’ कहा जाने लगा। बड़े गुलाम अली खान, जिन्होंने अपने पिता और चाचा दोनों से तालीम ली थी, दोनों की गायकी की विशेषताओं से लैस हो गए थे। पिता से सरगम और चाचा से तानों की अदायगी के गुर उन्होंने सीखे थे।

बड़े गुलाम अली खान का जन्म कसूर में 2 अप्रैल, 1902 को हुआ था—पिता अली बख्श और माता माई बुड्ढी की पहली संतान के रूप में। घर में संगीत का वातावरण होने के कारण गुलाम अली ने तीन-चार साल की उम्र में ही स्वरों को थोड़ा-बहुत समझ लिया था। मातृभाषा की तरह उन्होंने सरगम सीखा था। छुटपन में ही गुलाम अली ने गड़ेरियों, किसानों, फकीरों और जोगियों से सुनकर ढेर सारे गीत सीख लिये थे। कसूर के लोग उनको रोककर ये गीत सुना करते थे। कभी वे बाजार मिठाई या दही लेने जाते तो हलवाई उन्हें गाना सुनाने को कहता। गाना सुनकर हलवाई उन्हें दही-मिठाई दे देता और पैसे भी नहीं लेता। माँ इस बात पर गुस्सा करतीं।

संगीत के प्रति गुलाम अली के लगाव को देखकर उनके पिता ने छ: साल की उम्र में उन्हें अपने छोटे भाई के हवाले कर दिया था। काले खान ही उन्हें संगीत सिखाते थे। पुत्र नहीं होने की वजह से काले खान उन्हें पुत्र की तरह ही मानते थे। गुस्सा आने पर पिटाई भी करते थे। गुलाम अली अपने चाचा की सेवा में लगे रहते थे और संगीत सीखते रहते थे। तीन ही साल में उन्होंने इतना सीख लिया कि अपने चाचा के साथ संगत करने लगे। नौ साल की उम्र में उन्होंने दिल्ली-दरबार में काले खान का संगत किया था। जार्ज पंचम के दिल्ली आगमन के अवसर पर दिल्ली-दरबार में होने वाले संगीत के कार्यक्रम में उस्ताद काले खान को भी बुलाया गया था। काले खान के संगत कलाकार के रूप में गुलाम अली दिल्ली गए थे। राजा-महाराजा और नवाबों के सामने गाने की चुनौती का सामना करने का उनका यह पहला अनुभव था।

उस्ताद काले खान की तरह ही गुलाम अली की आवाज़ में ताकत थी। उसको उन्होंने रियाज के द्वारा और अधिक ताकतवर बना दिया था। पहले लाहौर के निकट सुनसान इमारत चार बुर्जी में पूरे गले से किया गया रियाज और बाद में रावी के किनारे रात भर किया गया रियाज उनके गले को तैयार करने में काफी मददगार रहा था। 1918 में चाचा काले खान की असामयिक मृत्यु के बाद तो गुलाम अली रियाज पर और अधिक ध्यान देने लगे थे। असल में उस्ताद काले खान की मृत्यु के बाद कसूर और लाहौर के लोग कहने लगे थे—”संगीत तो काले खान के साथ ही कसूर से चला गया। इस परिवार में अब वैसा कौन हो सकता है?’’….यह बात गुलाम अली को चुभ गई और उन्होंने अपने चाचा की तरह का गायक बनने की ठान ली। अब वे दिन-रात रियाज करने लगे। रियाज के साथ-साथ वे सारंगी बजाना भी सीखते थे। सारंगी के इस अभ्यास ने भी उनके गले को तैयार करने में काफी मदद पहुँचाई थी।

काले खान की मृत्यु के बाद गुलाम अली की माँ ने गुलाम अली को पिता के पास जम्मू जाने को कहा। गुलाम अली के पिता जम्मू में रहा करते थे। जम्मू में उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली थी। जम्मू में गुलाम अली को देखकर पिता बहुत खुश हुए, लेकिन बेटे को सौतेली माँ के साथ रखने में उन्हें परेशानी थी। इस वजह से उन्होंने अपनी एक शिष्या के घर गुलाम अली को रखवा दिया। कुछ दिनों बाद पिता ने बेटे को एक पल्टा सिखा दिया और लाहौर लौटकर पूरे साल उसका रियाज करने को कहा। गुलाम अली ने उन्हें गाकर सुनाया तो वे भावुक हो गए और आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे जैसा गायक हमारे खानदान में पैदा नहीं हुआ था!

गुलाम अली अठारह-उन्नीस साल के थे, जब वे अपने पिता के साथ लखनऊ की एक महफिल में गाने गए थे। अवध के ताल्लुकेदारों की महफिल में उन्होंने पिता के साथ गाया था। एक दिन लखनऊ के एक हम्माम में नहाते हुए उनकी मुलाकात लखनऊ के प्रसिद्ध गायक उस्ताद नज़ीर खान से हुई। नज़ीर खान उन्हें लखनऊ की जानी-मानी तवायफ नब्बन बाई के यहाँ ले गए। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली से कहा—”मैं जानता हूँ कि तुम्हारे चाचा और पिता ने तुम्हें अच्छी तालीम दी है और तुम एक अच्छे गायक हो, लेकिन तुम अपने स्केल से ऊपर के स्केल में गा सकते हो?’’ गुलाम अली ने विनम्रता से जवाब दिया—”खुदा की मेहरबानी और आपके आशीर्वाद से, आप जिस स्केल में कहें, मैं गा सकता हूँ।’’….नज़ीर खान खुद हारमोनियम लेकर बैठे, तबला और तानपूरा मिलाया गया। और जब गुलाम अली ने मंद्र स्वर में गायन किया तो उनकी आवाज़ हारमोनियम के मंद्र स्वर से भी नीची थी। इसी तरह उन्होंने तार सप्तक में तान लेकर उस्ताद को अचंभित कर दिया। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली के सम्मान में अपने कान छू लिये। नब्बन बाई उनके गाने से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें कुछ दिन अपने घर रहने का आग्रह करने लगीं। शाम में जब नब्बन बाई को सुनने लखनऊ के बड़े लोग आए, नब्बन बाई ने गुलाम अली को गाने को कह दिया। लखनऊ के संगीत प्रेमी लोगों पर गुलाम अली के गायन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। जब गुलाम अली लौटकर पिता के पास आए तो पिता ने गुस्सा दिखाते हुए कहा—”बहुत हो गया। कल सुबह नाई आकर तुम्हारी घुँघराली लटें काट जाएगा। सारे फसाद की जड़ यही है। औरतें तुमसे इसी वजह से आकर्षित होती हैं।’’

अगले दिन गुलाम अली के बाल मूँड़ दिए गए और अविलम्ब पिता उन्हें लेकर लाहौर वापस आ गए!

लाहौर लौटकर गुलाम अली फिर से रावी तट पर रात भर रियाज करने लगे। चाँदनी रात हो या अँधेरी रात, वे रियाज करना नहीं छोड़ते। धीरे-धीरे लोगों को पता चल गया कि गुलाम अली रात में रियाज करते हैं। उनका गायन सुनने लोग रात में रावी तट पर पहुँच जाते। इससे गुलाम अली को श्रोताओं के समक्ष गाने का अनुभव भी मिल जाता। 1921 में पिता के फालिज के शिकार हो जाने पर रावी तट पर उनके रियाज का क्रम टूट गया। अब घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ अपनी सौतेली माँ और सौतेले भाई-बहनों की जिम्मेदारी भी उठा ली। इसके लिए वे जगह-जगह कार्यक्रम देने लगे। शीघ्र ही श्रेष्ठ युवा गायकों में उनकी गिनती होने लगी। उन्हीं दिनों उनका नामकरण बड़े गुलाम अली के रूप में हुआ। दरअसल गुलाम अली नाम के एक और गायक थे। लोग उन्हें छोटे गुलाम अली कहते थे। बड़े गुलाम अली को लोग बड़े गुलाम अली कहने लगे।

1927 ई. में बड़े गुलाम अली की शादी अल्लाह जिवाई से हो गई। अपनी पत्नी के साथ गुलाम अली ने लाहौर के कूचा कश्मीरियां में अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बाद अल्लाह जिवाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम करामत अली रखा गया। इसके डेढ़ साल बाद दूसरा बेटा आया, जिसका नाम मुनव्वर रखा गया। लेकिन बड़े गुलाम अली का यह सुखद वैवाहिक जीवन अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। पाँच साल होते-होते इस पर ग्रहण लग गया। 1932 में अचानक बीमार होकर अल्लाह जिवाई अल्लाह को प्यारी हो गईं। दो छोटे-छोटे बच्चों को उनके परिवार वालों ने सँभाला और बड़े गुलाम अली को संगीत ने। उन्हीं दिनों अपने सुरमंडल के तार छेड़कर उन्होंने गाया—”याद पिया की आए, यह दु:ख सहा न जाए, हाय राम!”….अचानक आ गई इन पंक्तियों में से बड़े गुलाम अली खान का दु:ख फूट रहा था। हृदय से निकली इन पंक्तियों और स्वरों से उस दिन एक ऐसी ठुमरी सृजित हुई थी जो बड़े गुलाम अली की सबसे लोकप्रिय ठुमरियों में तो शुमार की ही जाती है, विरह की अभिव्यक्ति के खयाल से आज भी इसका कोई सानी नहीं है। इसी तरह बड़े गुलाम अली की एक और बहुचर्चित ठुमरी उन्हीं दिनों पहली बार गाई गई थी—”का करूँ सजनी, आए न बालम।….रोवत-रोवत कल ना पड़त हैं, याद आवत जब उन की बतियाँ!”

बड़े गुलाम अली अपने तैयार गले और सुमधुर आवाज़ के साथ पूरे देश में कार्यक्रम देते घूम रहे थे। उनके घूमते रहने और लौटकर लाहौर आने में एक कनस्तर घी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। घर से निकलते हुए वे अपने और अपने साजिंदों के उपयोग के लिए एक कनस्तर घी रखवा लेते थे। घी का वह कनस्तर जहाँ खाली हो जाता, वहीं से वे घर को लौट जाते। लौटकर घर आते तो बच्चों के लिए तरह-तरह के उपहार लाते। पास-पड़ोस के लोग उम्मीदें लेकर उनके पास आने लगते। किसी की बेटी का ब्याह बड़े गुलाम अली के आने तक रुका होता तो किसी की बीमारी का इलाज। खान साहब किसी को निराश नहीं करते। उनका विश्वास था कि जब उनकी जेब खाली हो जाएगी, अल्ला मियाँ फिर से उसे भर देंगे।

लाहौर के हीरामंडी में उन दिनों गुलजार बाई नाम की एक तवायफ रहा करती थीं। वह युवा थीं, अच्छा गाती थीं। उनका नाम था। जब उन्होंने बड़े गुलाम अली के बारे में सुना तो उनसे मिलने की इच्छा जताई। बड़े गुलाम अली उनसे मिलने गए। अब वह गुलजार बाई की शाम की महफिल में रोज जाने लगे। गुलजार बाई के गाने में संगत देने के लिए सारंगी भी बजाने लगे। संगीत से जुड़ा उनका नाता धीरे-धीरे प्यार के नाते में बँध गया। लेकिन एक दिन क्या हुआ कि महफिल में गुलजार बाई ने एक नए श्रोता की ओर कुछ ज्यादा ध्यान दे दिया। गुलाम अली को गुस्सा आ गया। वे महफिल छोड़कर घर चले आए और बैग में अपना सामान भरकर स्टेशन को चल पड़े। टिकट खिड़की पर जाकर उन्होंने एक टिकट माँगा। खिड़की पर बैठे क्लर्क ने पूछा—”कहाँ का टिकट चाहिए?” तो बड़े गुलाम अली बोले—”पहली गाड़ी जहाँ जाती हो, वहीं का टिकट दे दीजिए!” क्लर्क ने बताया—”अगली गाड़ी बम्बई जा रही है।“’’ बड़े गुलाम अली ने बम्बई का टिकट लिया और गाड़ी के आने पर उस पर बैठ गए। यह 1940 का कोई दिन था।

बम्बई पहुँचकर बड़े गुलाम अली ने भेंडी बाजार का पता पूछा। अपने चाचा काले खान से उन्होंने भेंडी बाजार में रहने वाली गायिका गंगा बाई का नाम सुन रखा था। बस वे पूछते-पाछते गंगा बाई के घर पहुँच गए। गंगा बाई ने उन्हें अपने घर पर ठहराया। थोड़े दिनों बाद अपने दु:ख से निकलकर बड़े गुलाम अली ने रियाज करना शुरू कर दिया। गंगा बाई उनके गायन से बहुत प्रभावित हुईं। गंगा बाई के घर आने-जाने वाले लोग भी उनके गायन से प्रभावित होते। धीरे-धीरे बम्बई के संगीत प्रेमियों के बीच गुलाम अली की चर्चा होने लगी। एक दिन बम्बई की प्रसिद्ध गायिका जद्दन बाई (अभिनेत्री नरगिस की माँ) के घर संगीत का कार्यक्रम रखा गया। वहाँ फिल्म से जुड़ी कई हस्तियाँ भी मौजूद थीं। बड़े गुलाम अली के गायन ने सबका मन मोह लिया। उन्हें नजराना दिया गया और अलग-अलग जगहों पर गाने का आमंत्रण भी।

कई महीने बाद एक दिन पता लगाकर बड़े गुलाम अली की प्रेमिका गुलजार बाई बम्बई पहुँच गईं। वह गुलाम अली को लाहौर लौट चलने को मनाने लगीं। वह गुलाम अली का साथ पाने के लिए अपना धन, अपनी संपत्ति, यहाँ तक कि गायन छोड़ देने को तैयार थीं। लेकिन बड़े गुलाम अली का दिल नहीं पिघला तो नहीं ही पिघला। गुलजार बाई को अकेले लाहौर लौटना पड़ा।

गंगा बाई के घर में रहते हुए ही बड़े गुलाम अली को निजामुद्दीन खान जैसे तबला वादक मिले और मिले ‘हरि ओम तत् सत’ भजन के बोल। ‘हरि ओम तत् सत’ के बोल लेकर एक गायक बड़े गुलाम अली के पास आए थे। आकर उन्होंने यह भजन बड़े गुलाम अली को सुनाया था। बड़े गुलाम अली इससे इतने प्रभावित हुए कि ‘पहाड़ी’ में इसकी धुन बना दी। यह बड़े गुलाम अली का बहुचर्चित भजन है। महात्मा गाँधी ने एक बार इसे बड़े गुलाम अली के मुँह से सुना था और प्रशंसा में उनको पोस्टकार्ड लिखा था।

बम्बई में रहते हुए बड़े गुलाम अली को साल-डेढ़ साल हो गए थे। एक दिन उनके बेटे मुनव्वर का पत्र आया जिसमें उन्होंने पिता को याद करते हुए लिखा था—”अगर मैं चिडिय़ा होता तो उड़कर आपके पास चला आता और आपके साथ ही रहता।’’ बेटे की इस बात का ऐसा प्रभाव पड़ा कि बड़े गुलाम अली तुरंत लाहौर लौट गए। लाहौर में उनके बेटों की अच्छी देखभाल हो रही थी, यह देखकर उन्हें अच्छा लगा। अब उन्होंने छोटे बेटे मुनव्वर को संगीत सिखाना भी शुरू कर दिया।

1943 का वर्ष अवसान पर था। घर के अंदर बैठे बड़े गुलाम अली कुछ नया सृजन करने की तैयारी में थे कि डाकिए की आवाज़ ने बाधित कर दिया। उठकर गए तो डाकिया उन्हें एक पत्र दे गया। पत्र बम्बई से आया था। वह ‘विक्रमादित्य संगीत उत्सव’ का निमंत्रण-पत्र था। इस संगीत उत्सव में, जहाँ हिन्दुस्तान के कई दिग्गज शास्त्रीय गायक हिस्सा लेने वाले थे, बड़े गुलाम अली को बुलाया जाना बड़े सम्मान की बात थी। कार्यक्रम अगले वर्ष यानी 1944 में होना था। बड़े गुलाम अली दुबारा बम्बई गए। कार्यक्रम में उन्होंने ‘मारवा’ और ‘पूरिया’ जैसे दो बहुत मिलते-जुलते रागों पर अपना अधिकार दिखलाकर अपनी धाक जमा दी। कार्यक्रम में उस्ताद फैयाज खाँ, अल्लादिया खान, केसर बाई जैसे प्रतिष्ठित गायक-गायिकाओं का भी गायन हुआ था। उनके बीच बड़े गुलाम अली खान ने अपना सिक्का मनवा लिया था।

कार्यक्रम के बाद सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ प्रो. बी.आर. देवधर बड़े गुलाम अली के पास गए और उनके शक्तिशाली गायन का राज़ पूछा। बड़े गुलाम अली खान ने कहा—”पंडित जी! मैं यहाँ आपको वह नहीं बता सकता हूँ। आप मुझे अपने स्कूल में बुलाइए, वहाँ बताऊँगा।’’

प्रो. देवधर ने ससम्मान उन्हें अपने स्कूल में बुलाया। अगले दिन प्रो. देवधर के विद्यार्थियों और संगीतकारों के बीच बड़े गुलाम अली ने अपने गाने की ताकत का प्रदर्शन किया। उनके गले से ऐसी आवाज़ निकल रही थी जैसे दस तानपूरों को मिलाकर आवाज़ निकल सकती है। इसके बाद उन्होंने रियाज करने के तरीके के बारे में बतलाया था। फिर कणयुक्त स्वरों के प्रयोग का तरीका भी बतलाया था।

बम्बई में ही उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञ जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने मद्रास आने का निमंत्रण दिया। बड़े गुलाम अली ने मद्रास जाकर अपना गायन प्रस्तुत किया। वहाँ भी उन्होंने श्रोताओं का मन मोह लिया। श्रोताओं में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसी गायिका भी मौजूद थीं। कार्यक्रम के बाद शाल ओढ़ा कर सम्मानित करते हुए जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने बड़े गुलाम अली को ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया था। इस कार्यक्रम के बाद दक्षिण के कुछ और स्थानों पर भी उन्हें गाने को बुलाया गया। अपने कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर वे लाहौर लौट गए।

1947 में बड़े गुलाम अली अफगानिस्तान के राजा ज़हीर शाह के निमंत्रण पर अफगानिस्तान गए। ज़हीर शाह बड़े गुलाम अली के इतने बड़े प्रशंसक थे कि उन्होंने उस्ताद को काबुल में बस जाने और दरबारी गायक का पद सँभालने का आग्रह कर डाला। लेकिन उस्ताद ने उनके आग्रह को नहीं माना और वे लाहौर को चल पड़े। लाहौर लौटने में उन्हें बड़ी कठिनाई हुई। उस्ताद अफगानिस्तान में ही थे कि इधर हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता की आग भड़क उठी थी। हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे को लूट-मार रहे थे। किसी तरह बड़े गुलाम अली अपने घर पहुँचे थे। उसी वर्ष देश का विभाजन हुआ था और बड़े गुलाम अली ने फिर से अपनी गृहस्थी बसाने की बात सोची। उनके तबलावादक मित्र ने अल्ला राखी नाम की एक विधवा स्त्री का पता बताया और पैंतालीस वर्ष के विधुर गुलाम अली ने तीस वर्ष की उस विधवा स्त्री से विवाह कर लिया। बड़े गुलाम अली अपनी दूसरी पत्नी से भी उतना ही प्रेम करने लगे। यही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी को बुरके से बाहर निकाला और आधुनिक स्त्री के रूप में रहने की आजादी दी। किसी कार्यक्रम में जाते हुए वे पत्नी को भी साथ रखते। धीरे-धीरे पत्नी नई तहजीब सीखती गईं। उनका घर अब संगीतकारों और संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा खुला रहने लगा। अल्ला राखी दिल से सबका स्वागत करतीं। हाँ, उन्हें पति का बेफिक्र होकर खर्च करना अच्छा नहीं लगता था। वे भविष्य के लिए भी कुछ-कुछ बचाना चाहती थीं, लेकिन बड़े गुलाम अली उनकी यह बात नहीं सुनते। कोई जरूरतमंद चाहे वह सगा-संबंधी हो, पास-पड़ोसी हो या संगीतकार, उनके घर से खाली हाथ नहीं जा सकता था।

विभाजन के बाद बड़े गुलाम अली लाहौर में ही रह रहे थे। वहीं 1951 में उन्हें बम्बई से मोरारजी देसाई का निमंत्रण आया। मोरारजी देसाई उन दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। बड़े गुलाम अली उनका निमंत्रण पाकर बम्बई गए। वहाँ उनका जैसा स्वागत किया गया, उसे देखकर उस्ताद भाव-विभोर हो गए। और जब मोरारजी देसाई ने उनसे कहा—”खान साहब! हिन्दुस्तान में आपके इतने प्रशंसक हैं, आप यहीं वापस क्यों नहीं आ जाते?” तो खान साहब ने कहा—”अगर मैं हिन्दुस्तान की नागरिकता पा लेता हूँ तो यह बहुत अच्छा होगा। मैं लाहौर में रहता था, विभाजन होने पर खुद-ब-खुद पाकिस्तानी हो गया।”

मोरारजी देसाई ने बड़े गुलाम अली को भारतीय नागरिकता दिलाने की कोशिश शुरू कर दी। दो-तीन साल की कागजी कार्यवाही के बाद 1954 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें भारतीय नागरिकता दे दी। पाकिस्तानी अधिकारी बड़े गुलाम अली को भारत आने से रोक रहे थे। उस्ताद को धन-सम्पत्ति, मकान का प्रलोभन दे रहे थे, लेकिन उस्ताद ने कहा, ‘‘उन्हें सब कुछ तो दिया जा सकता है, मगर हिन्दुस्तान में रहने वाले उनके हजारों प्रशंसकों को पाकिस्तान कैसे लाया जा सकता है?” उस्ताद अपना परिवार लेकर बम्बई आ गए। बम्बई में उन दिनों ओंकार नाथ ठाकुर, केसर बाई, अल्लादिया खान, हीरा बाई बरोडकर, काले नजीर खान, अमान अली खान, विष्णु दिगंबर पलुस्कर जैसे गायक-गायिका रहते थे। बड़े गुलाम अली इन संगीतकारों की दुनिया के अभिन्न अंग बन गए। धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया के लोगों से भी उनका परिचय हुआ। लेकिन फिल्मों में गाने से वे परहेज ही करते रहे। लेकिन के. आसिफ ने उन्हें घेर ही लिया। के. आसिफ जब ‘मुग़ले आज़म’ बना रहे थे, तब उन्होंने तानसेन के रूप में बड़े गुलाम अली का गायन रखने की बात सोची। वे उस्ताद के पास गए और उनसे निवेदन किया—”मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि यह फिल्म अच्छी बने। लेकिन यह फिल्म तभी यादगार बन सकती है जब तानसेन के रूप में आप गाएँ।’’

फिल्मी दुनिया की जानकारी रखने वाले पत्रकार हरीश तिवारी ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखा है कि के. आसिफ को टालने की गर्ज से बड़े गुलाम अली खान साहब ने उन दिनों के हिसाब से काफी बड़ी रकम (पाँच हजार रुपये) माँगी। के. आसिफ बोले—”मैं आपको पन्द्रह हजार दूँगा।’’ अब उस्ताद अपनी बात से कैसे मुकर सकते थे? उनको ‘मुग़ले आज़म’ में गाना ही पड़ा। उन्होंने राग रागेश्री में ‘शुभ दिन आए’ बंदिश गाई। युद्ध में विजय पाकर लौट रहे सलीम के स्वागत में यह गीत बज रहा था। इसी फिल्म में सलीम और अनारकली के बाग में मिलन की पृष्ठभूमि में रियाज करते तानसेन सुने जा सकते हैं। बड़े गुलाम अली की आवाज़ में तानसेन एक ठुमरी गा रहे थे—’प्रेम जोगन बन आई।’

उस्ताद बड़े गुलाम अली का पारिवारिक और पेशेवर जीवन बड़ा अच्छा बीत रहा था कि नियति ने अपने क्रूर बाण उन पर चला दिए। महाराष्ट्र के अकोला में वे कार्यक्रम दे रहे थे। यह 1961 की बात है। मंच पर ही उनकी तबीयत खराब होने लगी। उन्होंने अपने संगतकारों से कहा—”मैं अपने हाथ नहीं हिला पा रहा हूँï!” उसी हालत में उन्होंने कार्यक्रम पूरा किया और शीघ्र ही बम्बई चले गए। वहाँ ‘बॉम्बे हास्पीटल’ में उन्हें भरती कराया गया। उन पर फालिज का असर हो गया था। उनका पूरा बायाँ अंग फालिज का शिकार हो गया था। वे हिल-डुल नहीं पा रहे थे। मुँह से बोली भी नहीं निकल पा रही थी। यह उनके लिए एक गहरा आघात था। रोज गाने वाले गुलाम अली के लिए बिना गाए रहना बहुत मुश्किल था। उन्होंने एक दिन डॉक्टर से कहा भी—”अगर मैं गा नहीं सकता तो मैं जीना भी नहीं चाहता।’’

अस्पताल से जब वे घर आए तब उन्होंने फिर से रियाज करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी खोई हुई आवाज़ पा ली। एक बार फिर वे कार्यक्रम देने की स्थिति में आ गए। भले ही उनका पुत्र मुनव्वर और संगतकार उन्हें पकड़कर मंच तक ले जाते हों लेकिन मंच पर जाते ही वे वही गुलाम अली हो जाते थे।

1963 में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान कलकत्ता की यात्रा पर गए। कलकत्ता उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला कर लिया। वे बम्बई से कलकत्ता आ गए। पार्क सर्कस के बेग बगान में एक फ्लैट किराए पर ले लिया। कलकत्ता के संगीत-प्रेमी लोगों और उस्ताद विलायत खान, अली अकबर खान, करामत खान, शौकत अली खान और रहिमुद्दीन डागर जैसे संगीतकारों ने उनका तहे दिल से स्वागत किया। अब कलकत्ता के लोगों के सामने उनकी सांगीतिक प्रतिभा का प्रदर्शन अक्सर होने लगा। उनकी ख्यति कुछ इस कदर फैली कि रामकृष्ण मिशन आश्रम की ओर से उन्हें गाने का न्योता भिजवाया गया। बड़े गुलाम अली ने खुशी-खुशी यह न्योता स्वीकारा और कार्यक्रम के दिन अपने दल-बल के साथ वहाँ पहुँच गए। उन्होंने वहाँ राग पीलू में ‘राधे कृष्ण बोल, तेरा क्या लगेगा मोल’ भजन गाकर सुनाया। कार्यक्रम के बाद आश्रम के प्रमुख स्वामी ने बड़े गुलाम अली के पैर छुए और उन्हें सोने की चेन उपहार में दी।

बड़े गुलाम अली खान साहब की खासियत यह थी कि वे जिस भाव से स्वामी जी के आश्रम में या पीर की मजार पर या किसी आत्मीय के घर में गा सकते थे, उसी भाव से किसी जेल में भी। यही वजह थी कि जब उन्हें कलकत्ता के अलीपुर जेल में गाने का न्योता मिला तो उन्होंने बिना किसी हील-हुज्जत के उसे स्वीकार कर लिया। और हिंसक कैदियों के सामने ‘मालकौंस’ गाकर उन्होंने उन्हें नफरत से दूर प्यार की दुनिया में पहुँचा दिया। उनके गायन का ऐसा प्रभाव कैदियों पर पड़ा कि वे उन्हें उठने नहीं दे रहे थे। तब खान साहब ने ‘पहाड़ी’ में एक ठुमरी सुनाई—’अब तो आवो साजना, पूरी हो मन की आशा!’ इसके बाद उन्होंने कैदियों से कहा—‘‘अब मैं थक गया हूँ। अल्लाह ने चाहा तो फिर हाजिर हूँगा।’’ इसके बाद उनका कार्यक्रम खत्म हुआ।

ढेर सारे संगीत प्रेमी नवाबों, राजाओं, जमींदारों की तरह हैदराबाद के नवाब जहीर यार जंग भी बड़े गुलाम अली खान के प्रशंसक थे। उनके आग्रह पर उस्ताद 1965 में कार्यक्रम देने हैदराबाद गए। वहाँ से लौटकर आने के बाद विशाखापत्तनम में उनका स्मरणीय कार्यक्रम हुआ। 1967 के दिसम्बर में वे अपने परिवार और संगतकारों के साथ फिर हैदराबाद गए। हैदराबाद की यह यात्रा इहलोक की उनकी अंतिम यात्रा थी। जनवरी 1968 में उन्हें दमा का तेज दौरा पड़ा। डॉक्टर के इलाज से दमा तो ठीक हुआ, लेकिन साँस की तकलीफ बनी रही। उस्ताद के बेटे मुनव्वर को अनहोनी की आशंका होने लगी तो उन्होंने पाकिस्तान से अपने सगे-संबंधियों को बुलवा लिया। 22 अप्रैल, 1968 को उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”अब केवल चौबीस घंटे बचे हैं, जब मैं तुम्हें तकलीफ दूँगा।’’ मुनव्वर ने कहा—”अब्बा! ऐसे मत बोलिए, अब तो आप ठीक हो रहे हैं!’’

23 अप्रैल, 1968 की सुबह मुर्गे ने बाँग दी तो उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”तुमने सुना? मुर्गा राग तोड़ी में बाँग दे रहा था!” फिर उन्होंने मुनव्वर की माँ को याद किया। इसके बाद उनकी साँस की डोर टूट गई। चार मीनार इलाके के ‘दायरा मीर मोमिन’ कब्रगाह में उन्हें दफना दिया गया।

बड़े गुलाम अली खान कई मामलों में बड़े थे। गायकी में तो बड़े थे ही, व्यक्ति के रूप में भी बहुत बड़े थे। अपने आस-पास के लोगों की मदद करते चलना उन्हें खूब आता था। जाति-धर्म से वे बहुत ऊपर उठे हुए थे। उन्हें कई बार पूछा जाता, टोका जाता कि ‘आप मुसलमान होकर भी हिन्दुओं के देवी-देवता के भजन क्यों गाते हैं?’ तो वे साफ-साफ कहते—’ईश्वर एक है।’’ उनके बहुचर्चित भजन ‘हरि ओम् तत् सत’ गाने के बारे में संगीत के किसी विद्वान ने उनसे पूछा—”खान साहब, आप इतने भावपूर्ण ढंग से हिन्दू भजन कैसे गा लेते हैं?” खान साहब ने आश्चर्य से पूछने वाले की ओर देखा और कहा—”ईश्वर, सत्य और हक़ एक ही हैं। मैं जिस समय ‘हरि ओम् तत् सत’ गाता हूँ, उस समय मेरे मन में अल्ला रहते हैं। भाषाएँ अलग-अलग हैं लेकिन अल्ला, खुदा, हरि सभी एक ही उस परम सत्ता के नाम हैं। अंग्रेज उनके लिए ‘गॉड’ शब्द का प्रयोग करते हैं, हिन्दू ‘परमात्मा’। सीधी सी बात है, पता नहीं लोग इसे क्यों नहीं समझते हैं?”

इसी तरह की एक घटना पाकिस्तान में घटी थी। खान साहब रेडियो-पाकिस्तान पर गाने को गए थे। देश विभाजन के बाद पाकिस्तान के आला अधिकारी संगीत और कला को भी विभाजित करने की कोशिश में लगे थे। वैसे ही एक अधिकारी ने उन रागों, ठुमरियों और दादरा को रेडियो पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया था, जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं के नाम थे। बड़े गुलाम अली खान साहब उस दिन जब ‘मियां की तोड़ी’ में ‘अब मोरी राम, राम री दइया’ गाकर निकले, उस अधिकारी ने कहा—”खान साहब! ये राम-राम क्या है? अब रहीम-करीम के बारे में सोचिए!”

अधिकारी की बात से बड़े गुलाम अली दु:खी हो गए। उन्होंने कहा—”आप परंपरा से चली आ रही रचना में हेर-फेर नहीं कर सकते। वे उसी तरह गाई जाएँगी, जैसी वे रची गई हैं। खैर, उसे भूल जाइए। अब मैं आपके रेडियो स्टेशन के लिए नही गाऊँगा। रेडियो-पाकिस्तान के पैनल से मेरा नाम निकाल दीजिए।’’

बड़े गुलाम अली जैसे सच्चे संगीत साधक के लिए ईश्वर और संगीत में कोई भेद नहीं था। वे कहा करते थे—”संगीत ही मेरा खुदा और संगीत ही मेरी नमाज है।“ जो आदमी संगीत को ही खुदा मानता हो उसके लिए राम-रहीम और कृष्ण-करीम में अंतर हो भी कैसे सकता था?

बड़े गुलाम अली स्वाभिमानी व्यक्ति थे। इसी वजह से उन्होंने किसी राजा के दरबार में नौकरी करने की बात नहीं सोची। जिन राजाओं और नवाबों से वे मिलते थे, बराबरी के स्तर पर मिलते थे। वे खुद को किसी जागीरदार से कम नहीं समझते थे। संगीत के इस जागीरदार का कहना था—”नवाबों की जागीरें हो सकती हैं, मेरी जागीर मेरा संगीत है। वे अपने साम्राज्य के मालिक हो सकते हैं, मैं अपनी सल्तनत का सुल्तान हूँ।’’

शास्त्रीय संगीत में लोग अक्सर किसी न किसी चमत्कार की चर्चा किया करते हैं। मियां तानसेन के ‘मल्हार’ गाने पर वर्षा होने और ‘दीपक’ गाने पर शरीर के जल उठने की बात लोग करते आ रहे हैं। ‘अपने युग के तानसेन’ बड़े गुलाम अली खान के बारे में भी इस तरह की कई बातें कही जाती हैं। एक बार लाहौर के निकट के किसी गाँव के चौधरी उन्हें मनाकर कार्यक्रम देने ले गए। जुलाई का महीना था। उन्होंने गाने के लिए ‘मियां मल्हार’ राग का चयन किया। उनके अंतरा गाते-गाते आकाश में काले-काले बादल घुमड़ आए और ठंडी-ठंडी फुहारें पडऩे लगीं। विलंबित के बाद वे द्रुत की बंदिश गाने लगे—”बिजली चमके, बरसे मेहर, आई लो बदरवा!” उस समय दो मोर पास के जंगल से आ गए और चबूतरे पर चढ़कर पंख फैलाकर नाचने लगे। बड़े गुलाम अली ने अपना गायन ज़ारी रखा और उनका तबलची मोर के नृत्य से मिलता-जुलता ताल बजाने लगा।

इसी तरह काबुल में कार्यक्रम देते हुए एक चमत्कार देखा गया था। जब खान साहब ज़हीर शाह के महल में गा रहे थे, एक सफेद कबूतर उड़कर आ गया और वह ध्यान लगाकर खान साहब का गाना सुनने लगा। फिर वह पंख फैलाकर धीरे-धीरे नाचने लगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब को प्रकृति से बहुत प्रेम था। प्रकृति की चीजों को वे बड़े ध्यान से देखते थे और उनको अपने गायन में उतारते थे। जैसे कि किसी पार्क में या झील के किनारे या नदी के किनारे बैठकर सूर्यास्त देखकर या पक्षियों को उड़ते, चहकते, नाचते या कूदते देखकर उन्हें तानों की बुनावट सूझती थी। संगीत के कुछ गंभीर विद्वानों ने भी उनके इस गुण को लक्षित किया है। श्री एस.के. सक्सेना ने ऐसी दो घटनाओं का वर्णन किया है, जब प्रकृति में देखी-सुनी चीजों को खान साहब ने अपने तान में लाकर दिखलाया था। एक बार दिल्ली घराने के प्रसिद्ध गायक उस्ताद चाँद खान के घर बड़े गुलाम अली का कार्यक्रम चल रहा था। अचानक एक बिल्ली लोगों के बीच आ गई और थोड़ी देर में खुद वहाँ से चली गई। खान साहब ने भी बिल्ली का जाना देखा और अगले ही गायन में उन्होंने बिल्ली के जाने को तान के जरिए दिखला दिया।

दूसरी घटना भी दिल्ली की ही है। सुबह के एक कार्यक्रम में वे ‘भैरवी’ गा रहे थे। अचानक पास से गाड़ी का इंजन गुजरा, जिसकी तेज आवाज़ ने श्रोताओं को परेशान कर दिया। लेकिन तुरंत ही बड़े गुलाम अली साहब ने ठीक उसी आवाज़ को दिखलाते हुए जो तान लिया, उससे श्रोता दंग रह गए।

बड़े गुलाम अली खान साहब की शिष्या मालती गिलानी ने भी अपनी किताब में खान साहब की इस विशेषता को रेखांकित किया है। मालती गिलानी ने लिखा है कि खान साहब प्रकृति के मिजाज और अपने आस-पास की आवाज़ों से बहुत प्रभावित होते थे। बिजली का चमकना, बादलों का गरजना, वर्षा का होना आदि उनके अंदर जज्ब होता रहता था और गाते हुए तानों में वे बिजली की चमक ले आते थे तो गमक में बादलों की गडग़ड़ाहट!

बड़े गुलाम अली खान के बारे में एक सवाल बार-बार किया जाता है कि वे ठुमरी गायक के रूप में अच्छे थे या खयाल-गायक के रूप में? और जवाब यह है कि वे दोनों में अच्छे थे। यह अलग बात है कि बड़े गुलाम अली एक ही राग को घंटों गाते जाने में पुनरावृत्ति का खतरा देखते थे और छोटी-छोटी रचनाओं के द्वारा अपने गायन की चमक दिखला जाते थे ।  लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे खयाल के मामले में कमजोर थे। वे वास्तव में ‘चौमुखया गवैया’ थे। खयाल और ठुमरी तो वे गाते ही थे, दादरा और टप्पा भी गाते थे। ग़ज़ल और भजन गाते थे। तराना गाते थे, सबद गाते थे। सूफियाना कलाम गाते थे, पंजाबी लोकगीत गाते थे। गायन की किसी एक विधा के निकष पर उनको परखना किसी अन्याय से कम नहीं होगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब के प्रिय राग थे—मालकौंस, विहाग, देश, भूपाली, जौनपुरी, भैरवी, दरबारी कान्हड़ा, यमन, बागेश्वरी आदि। उनकी गाई खूबसूरत ठुमरियों में से ‘बाजूबंद खुल-खुल जाए, (भैरवी) ‘का करूँ सजनी आए न बालम’ (जंगला भैरवी,) ‘प्रेम की मारे कटार’ (सोहनी,) ‘कंकर मार जगा गयो रे’ (पीलू,) ‘कटे न बिरहा की रात’ (पीलू,) ‘ना जा पी परदेस सजनवा’ (शिवरंजनी), तोरे नैनां जादू भरे’ (तिलंग), ‘रस के भरे तोरे नैन’ (भैरवी), ‘अब तो आवो साजना’ (पहाड़ी), ‘याद पिया की आए’ (मिश्र कौशिक ध्वनि) आदि ठुमरियाँ कालातीत की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। ‘हरि ओम तत् सत’ (पहाड़ी) जैसे भजन भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

‘सुगम संगीत के बादशाह’ कहे जाने वाले बड़े गुलाम अली, ‘मैलोडी के बादशाह’ भी कहे जाते हैं। ‘सबरंग’ नाम से सैकड़ों बंदिशें भी उन्होंने लिखी हैं। आज प्राय: सभी शास्त्रीय गायकों के हाथ में रहने वाले साज ‘सुरमंडल’ के हिन्दुस्तानी संगीत में प्रथम प्रयोग का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ (1962) और विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. (1964) अलंकरण से सम्मानित बड़े गुलाम अली खान के संगीत की विशेषता बतलाते हुए उनकी शिष्या मालती गिलानी ने कहा है कि ‘उनका संगीत इंद्रधनुष के समान था, जिसमें रोमांस, भाव और आध्यात्मिकता की छायाएँ लिपटी हुई थीं। संगीत की विदुषी सुशीला मिश्र ने तो बड़े गुलाम अली के बारे में यहाँ तक लिखा है कि ‘कौन जानता है, आगे आने वाली पीढ़ी उन्हें उसी तरह याद करे जिस तरह हम तानसेन को याद करते हैं!’

और संगीत विशेषज्ञ एस.के. सक्सेना सभी महत्त्वपूर्ण गायकों को ध्यान में रखकर कहते हैं, ”फैयाज खान के बाद हिन्दुस्तानी संगीत में कोई ऐसा गायक नहीं हुआ जिसे बड़े गुलाम अली से श्रेष्ठ कहा जा सके।’’ शायद एस.के. सक्सेना गलत नहीं कहते।

रंगीली के होटल की खिचड़ी : कमल जोशी

कर्मठ रंगीली।

हालत कुछ-कुछ डिप्रेशन जैसे थे। भारी उदासी घेरे थी। कुछ दिन पहले ही तबियत खराब हुई थी और उससे जल्दी उबर नहीं पा रहा था। पहले भी तबियत खराब होती थी, परन्तु हफ्ते भर में ही खुद को फिट समझने लगता था। इस बार डेढ़ महीना हो गया था। शरीर दुरुस्त नहीं लग रहा था। एक डर सा मन में बैठ गया था कि क्या अब बुढ़ापा आ ही गया। सफेद दाढ़ी और कुल जमा बासठ साल तो शीशा देखते ही चिल्लाने लगते कि‍ भाई तुम बुढ़ापे में कदम रख चुके,  लेकि‍न वह गाना है ना- ‘दिल है के मानता नहीं..,’ की तर्ज पर दिमाग भी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि‍ असलियत तो असलियत है…कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हुआ जा सकता है?

पर आवारागर्दी अजीब लत होती है। इसीलिए डिप्रेशन की सी अनुभूति हो रही थी की- सुख भरे दिन गए रे भैया !

पर जैसा मैंने ऊपर लिखा ही है- ‘दिल है के मानता नही’- मैंने जिंक्स तोड़ने का मन बनाया और तय कर लिया कि चमोली जिले की ओर निकला जाए, जहां इस चाचा का भतीजा मधु है, जो जरूरत पड़ने पर देखभाल कर सकता है- बिना मुंह बनाए।

महीना अक्‍टूबर का था। सुबह हवा में खुनक थी। बादलों के दो बच्चे आसमान में धमा चौकड़ी करने की तर्ज में डराने लगे, पर मैं डरा नहीं और लगभग 6:30 पर फटफटिया स्टार्ट कर चल पड़ा। मूड अभी भारी ही था और मन अन्यमयस्क।

दस बजे के आसपास बुवाखाल पहुंचा, हिमालय भी दिखा, पर मन खिला नहीं। एक होटल में थोड़ा नाश्ता किया और पौड़ी होते हुए श्रीनगर की उतार पार की। श्रीनगर पार करते हुए कई परिचित चेहरे भी दिखे, पर मैंने बाइक रोकी नहीं। और मेरे हेलमेट की वजह से वे मुझे पहचान भी नहीं पाए। सर्र से श्रीनगर भी पार हो गया।

मुझे खाना खाने के लिए घोलतीर पहुँचना था, जहां मधु से मुझे मिलना था। वह दो बजे तक पहुँचने वाला था। इसलिए मेरे पास काफी समय था। मैं अब आराम से धीरे-धीरे फटफटिया चलाने लगा। थोड़ा आगे बढ़ा था कि‍ मुझे दो बच्चे सड़क के किनारे दिखे। दोनों भाई की तरह लग रहे थे। एक की उम्र दस ग्यारह साल और दूसरे की छह-सात साल। मैं आराम से बाइक चला रहा था। बच्चे मुझे देखते रहे। बाइक के बहुत करीब पहुँचने पर अचानक छोटे वाले ने मुझे रुकने के लि‍ए हाथ दिया। मुझे एकदम ब्रेक लगाने पड़े। तब भी थोड़ा आगे निकल गया। मैंने पीछे मुड़ कर उनकी ओर देखा। बच्चों को शायद आशा नहीं थी कि‍ मैं फटफटिया रोक दूंगा। वे सकपका से गए। मैंने पूछा, ‘‘क्या है?’’  बड़े बच्चे ने छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसने हाथ दिया।’’

अब मैंने छोटे बच्चे की तरफ प्रश्‍नवाचक दृष्टि से देखा। वह चुप ही रहा। मैंने अपने चहरे के भाव दुरुस्त किए और हंसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हाथ दिया बताओ!’’ अब शायद बच्चों को लगा कि‍ बताने में कोई खतरा नहीं है, तो बड़े वाला बोला, ‘‘हमें आगे जाना है। रुद्रप्रयाग तक।’’ वे लिफ्ट मांग रहे थे। मेरे बैठो बोलने की देर थी कि‍ छोटा बच्चा इस गति से पिछली सीट पर चढ़ गया कि‍ एक बारगी तो मैं डिसबैलेंस ही हो गया था। दोनों बच्चे पिछली सीट पर जम गए। छोटे वाले बच्चे ने मुझे बन्दर के बच्चे की तरह कस कर पकड़ लिया। फटफटिया चलने से पहले मैंने उनसे पूछा, ‘‘ठीक से बैठे हो ना..गिरना मत।’’ तो उन्होंने ‘हाँ’ कहा और छोटे ने तो मेरी जैकेट इतनी कस कर पकड़ ली कि‍ उसकी अंगुलि‍यां मुझे चुभने लगीं।

मैं उनसे बात करते हुए बाइक चलना चाहता था, पर हेलमेट की वजह से उनके जवाब मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। मैंने बाइक रोकी,  हेलमेट उतारा कर हैंडल में लटका दिया। ऐसा करना नहीं चाहिए था, पर मैंने तय किया कि‍ हेलमेट उतार कर बाइक बहुत धीरे चलाऊंगा। तभी छोटे वाले ने मेरा हेलमेट माँगा और पहन लिया। हमारी गपशप शुरू हुई। पता चला कि‍ उनके नाम दीवान सिंह और हयात सिंह हैं। जहां वे खड़े थे, वहीं ऊपर उनका गाँव है। वे रुद्रप्रयाग अपने चाचा की लड़की के नामकरण पर जा रहे हैं और गाडी़ का इंतजार कर रहे थे।

‘‘तुम्हें अकेले कैसे भेज दिया माँ-बाप ने।’’ मैंने पूछा, तो दीवान,  जो बड़ा था,  ने मुझे बताया कि‍ माँ तो कई दिन से चाची के साथ ही है। पिता शाम को आएंगे। बच्चों ने पहले जाकर भूली को देखने की जिद की तो उन्हें किराया देकर सड़क पर भेज दिया। वे पहले भी इस तरह अकेले चाचा के घर जा चुके हैं। बच्चों को पारिवारिक ज्ञान भी था। बताया कि‍ उनकी बड़ी बहन अब काफी ‘बड़ी’  हो गई है। अब उसके लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा है। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ इन बच्चों की शादी लायक बड़ी बहन कैसे हो सकती है। मैंने पूछा कि‍ बहन काफी बड़ी है, क्या?  तो छोटा बोला, ‘‘भोत बड़ी है। हमको मारती भी है।’’ उसके चेहरे पर पिटने का बहुत रोष रहा होगा, जो मैं देख नहीं पाया। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा कि‍ कहीं कोई लड़का देखा है। बड़ा बड़े ही प्रौढ़ अंदाज में बोला, ‘‘हाँ, देख रहे हैं। बात चल रही है!’’ उसकी बात पूरी ही हुई थी कि‍ छोटा वाला बोला, ‘‘बस दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!’’  इतने छोटे बच्चे के मु्ंह से यह बात सुनकर मैं अचम्भित रह गया। मैंने उससे ही पूछा, ‘‘क्यों दारू पीने से क्या होता है।’’ तो वह बोला, ‘‘दारूडी लोग ठीक नहीं होते। हमारे स्कूल में मास्टर दारूडी है। पढाता नहीं….मारता है!’’ फिर कुछ देर रुककर बोला, ‘‘नाक में दम कर रखा है, माचेत ने।’’  मैंने बाइक रोक कर गर्दन घुमाकर उसकी नाक देखने की कोशिश की। हेलमेट के भीतर से नाक ही नहीं दिखाई दे रही थी, दम कहाँ से दिखता। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी नाक में तो दम दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह पहले चौंका। फिर मेरे व्यंग्‍य को समझकर दोनों भाई हंसने लगे। मैंने उनसे पूछा कि‍ क्या सभी मास्टर ऐसे होते हैं, तो बड़े वाला बोला कि‍ नहीं ज्यादातर मास्टर तो अच्छे हैं। बस वह ही खराब हैं- ‘‘कभी स्कूल आते हैं कभी नहीं, पढा़ते भी नहीं। कुछ पूछो तो चिढ़ जाते हैं, पीटता भौत है।’’ अब मैं समझा कि‍ छोटे ने क्यों तय किया कि वह जीजा के रूप में किसी दारू पीने वाले को स्वीकार नहीं कर सकता।

रुद्रप्रयाग से पहले कुछ दुकानों के पास दीवान बोला, ‘‘बस…बस… हमें यहीं उतार दो!’’ मैंने बाइक में ब्रेक लगाए। फटफटिया रुकते ही दोनों बच्चे उतर गए। मैं कुछ कहता उससे पहले ही छोटा वाला बोला, ‘‘हमसे किराये के पैसे लोगे तुम!’’  मैंने उसके भोलेपन पर फिदा होते हुए कहा, ‘‘वैसे तो लेता, पर तुम दोनों अब दोस्त हो गए हो इसलिए नहीं लूंगा।’’ फिर दोस्ती को मजबूत करने के लिए मैं भी बाइक से उतरा और पास की दुकान से तीन बिस्कुट लिए। दो उन दोनों को दिए और एक खुद खाने के लिए सड़क के किनारे के पैरापिट पर बैठ गया। वे दोनों बच्चे भी वहीं बैठकर बिस्कुट खाने लगे। बड़े वाले ने मेरा नाम पूछा तो मैंने अपना नाम बताया। दीवान बोला कि हमारे साथ चलो, आज घर में पूरी-पकौड़ी बनी होंगी, खाकर जाना। मैने मना किया तो छोटा बोला, ‘‘चलो, चाचा जी कुछ नहीं कहेंगे।’’ उन्‍हें लगा कि शायद मैं हिचकिचा रहा हूं। उसने फिर पूछा कि‍ कहाँ जा रहे हो। मैंने बताया कि‍ आवारागर्दी करने। छोटे को शायद अवारागर्दी का मतलब समझ नहीं आया, पर बड़ा बोला, ‘‘झूठ।’’  मैंने कहा, ‘‘हां, सच में।’’ तो वह बोला, ‘‘बुड्ढे़ भी कभी आवारागर्दी करते हैं।’’ मैं उन्हें क्या बताता कि‍ मैं तो बिगड़ा हुआ बुड्ढा़ हूँ!

बिस्कुट हम लोगों ने निपटा लिए थे। विदा होने की बारी थी। मैंने कहा कि‍ मैं चलता हूँ और अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। एक झिझक के बाद छोटा वाला हयात सिंह आया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने लगा। मैंने भी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया। तभी बड़ा वाला भी दौड़कर आया और मुझसे हाथ मिलाने लगा। उनकी इस अदा से मुझे भरोसा हो गया कि‍ उन्होंने मुझे अपना पक्का दोस्त मान लिया है। जोर की ‘बाय’ के साथ मैं आगे बढ़ गया। अब मैं मोटरसाइकिल चलाते हुए मुस्करा रहा था और बेसुरे राग में गुनगुना भी रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूँ। डिप्रेशन गायब हो चुका था।

दो बजे के आसपास मैं घोलतीर पहुंचा। वहां भतीजा मधु और बहू इंतजार कर रहे थे। मेरी पसंद का पहाड़ी खाना और चटनी बनी थी। खाना खाकर, तृप्त होकर मैंने इजाजत ली और उखीमठ के लिए रवाना हो गया। रात उखीमठ से आगे उनियाना में गुजारी। दो सौ रुपये में खाने के साथ साफ-सुथरा कमरा मिल गया था। आज मैं मद्महेश्वर पहुँचना चाहता था। बाहर साफ धूप थी। बाइक से ही रांसी पहुंचा और एक होटल में नाश्ता किया। होटल क्या था दुकांन थी,  जहां सामान के साथ-साथ दुकानदार नाश्ता भी बना रहा था। नाश्ता करने के बाद मैंने उससे कहा की मैं मद्महेश्वर जा रहा हूँ। दो दिन तक मोटरसाइकिल खड़ी करनी है। कहाँ करूं? वह बोला कि‍ दुकान की साइड में चिपका कर खड़ी कर दो। कोई नहीं छेड़ेगा। उसके आश्वासन पर शत-प्रतिशत यकीन कर लिया, क्योंकि‍ वह किसी भी एंगल से नेता मार्का नहीं लग रहा था। मैंने मोटरसाइकिल उसके निदेशित स्थान पर खड़ी की, कवर लगाया और रांसी से गोंडार की ओर पैदल चल पडा़। कुछ दूर तक तो निर्माणाधीन मोटर रोड कटी हुई थी। उसके बाद खच्चर रास्ता था। जंगल धीरे-धीरे मदगंगा नदी की घाटी में उतरने लगा। पेड़ों से घिरा कैंचीदार रास्ता गोंडार की और जा रहा था। मैंने सोचा था कि‍ गोंडार तक का सात किलोमीटर का रास्ता मैं खाने के समय तक तय कर लूंगा। उसके बाद बचे हुए नौ किलोमीटर में से चौथे-पांचवे किलोमीटर पर किसी चट्टी पर रात काटूंगा और अगले दि‍न मद्महेश्वर चला जाऊंगा। गोंडार पहुंचने तक थक गया था। पहले ही ढाबे में पिट्ठू उतारा, अन्दर कोई नहीं था। मैं निराश बाहर निकल ही रहा था, तो देखा कि‍ एक औरत पीठ में लकड़ी लिए अन्दर आ रही है। उसने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘टूरिस्ट?’’ मैंने मुंडी हिला कर ‘हाँ’ कहा तो वह बोली, ‘‘चाय पीनी है क्या?’’ मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने तुरंत कमर पर धोती लपेटी और चूल्हे पर फूंक मार कर दबी आग को सुलगाया। उस पर पानी की केतली, जिस में पहले से ही पानी गुनगुना था, चढ़ा दी। मैंने पूछा कि‍ खाने के लि‍ए है कुछ तो वह बोली, ‘‘मैगी बना दूं क्या?’’ मैंने मना किया और बिस्कुट के बारे में पूछा। उसने ‘हाँ हैं’ कहा और एक बक्से से बिस्कुट निकाले। बिस्कुट लोकल बने थे और शायद कुछ पुराने ही थे। मैंने ध्यान से बिस्कुट देखे। कहीं भी फंगस नहीं लगी थी। मैंने उनको खाने का रिस्क ले ही लिया। महिला कुछ जल्दी में थी। मुझे चाय और दो अतिरिक्त बिस्कुट थमाते हुए बोली, ‘‘मुझे डंगरों के पास जाना है। चाय पीकर गिलास बाहर रख देना और पंद्रा रुपये चूल्हे के पास रख देना।’’ मैंने मजाक में कहा, ‘‘अगर बिना रखे चला गया तो?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘किस्मत थ्वोड़ी लिजाला तुम!’’(किस्मत थोडे़ ही ले जाओगे तुम)। वह जाने को हुई तो मैंने उसे रोका और पन्द्रह रुपये दे दिए। उसने पैसे कमर में खोंसे और तेजी से चली गई। आगे के दो-तीन ढाबों में देखा कि‍ महिलाएं अपने पतियों के साथ होटल चलाने में हाथ बंटा रही थीं।

मैं आगे बढ़ गया, पैदल रास्ते में। मेरे आगे दो तीर्थयात्री जो पहाड़ के ही थे, चल रहे थे। पति-पत्‍नी प्रेम से बात शुरू करते, वह बहस में बदल जाती,  फिर लड़ते और गुस्से से चुप हो जाते। थोड़ी देर में फिर बात शुरू करते, फिर-फिर लड़ते और फिर से चुप हो जाते। उनकी बातों में मेरा रास्ता कटने लगा। अचानक मुझे भूख महसूस हुई, तो याद आया कि‍ गोंडार में खाना तो खाया ही नहीं। बिस्कुटों ने मेरी भूख मार दी थी। अब चढा़ई में भूख लगने लगी थी।

कुछ लोग मद्महेश्वर से वापस आ रहे थे। उन लोगों से पूछा तो बताया कि आगे तीन किलोमीटर खाना मिल सकता है। इसी आस में आगे बढ़ा।

अचानक जाने कहाँ से बादल आ गए। मौसम एक दम घिर गया। बादल गरजने लगे थे। मैं तेजी से आगे बढ़ने लगा। तीर्थयात्री अनुभवी महिला बोली, ‘‘बरिस आती है अब!’’ बादलों को मानो उसके कहने का ही इंतजार था! तेज बारिश पड़ने लगी। भाग्य से हमें 50 मीटर की दूरी पर टिन का बना शेल्टर दिखाई दिया। मैं और वह दम्पति दौड़ कर उसमें शरण लेने चले गए। वहां और लोग भी शरण लिए थे। अचानक ओले भी पड़ने लगे। बड़े-बड़े ओले! इतने बड़े ओले मैंने कभी देखे नहीं थे। मैं यह सोच ही रहा था कि‍ अगर हमें यह शेल्टर ना मिला होता तो सर फूटना तय था, तभी दो लोग पहुंचे। वे दौड़ कर आए। एक ने सि‍र पकड़ा हुआ था। शेल्टर में पहुँच कर जैसे ही उसने सि‍र से हाथ हटाया, पानी के साथ सि‍र से खून चहरे पर पहुँच गया। उसे यह चोट ओले से ही लगी थी। मेरे पास बेंड-ऐड थी। मैंने उसे लगाने के लि‍ए बेंड-ऐड दी, पर वह ठीक से चिपकी नहीं। तब तौलिये से उसका से सि‍र बांधा गया।

चारों तरफ ओलों से सफेद हो गया था। बारिश-ओले जिस तेजी से आए, उसी तेजी से बंद भी हो गए। आसमान साफ होने लगा। हम आगे बढे़। थोड़ा चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे चट्टी में, जहां खाना मिल सकता था। वहां ताला लगा था। वहां एक लड़का था। उसने बताया कि‍ चट्टीवाला एक घंटे में आएगा। अभी वह बकरी चराने गया है। दम्पति वहीं सुस्ताने लगे। उनके पास कुछ चना चबेना था। उसे निकाल कर खाने लगे।

मेरी समझ में नहीं आया कि‍ मैं क्या करूं। मैंने लड़के से और जानकारी चाही, तो उसने बताया कि‍ आधा किलोमीटर आगे मोखम्बा जगह है। वहाँ खाने को मिल सकता है। अब घंटे भर यहां रुकना बेकार था। मैं मोखम्बा की ओर बढ़ चला।

मेरा लोअर कीचड से लथपथ हो गया था। जूते भी गीले हो गए थे। चलना दुश्‍वार हो रहा था। आधा घंटा चलने के बाद एक पत्थरों का बना छाना जैसा दिखा। मैं समझ गया कि‍ यह ही मोखम्बा है। खाना मिलने की संभावना ने चाल बढ़ा दी और मैं दस मिनट में ही उस छाने के दरवाजे पर था। दरवाजे से झांक कर देखा कि‍ एक लगभग तीस-पैंतीस साल की औरत बैठी कुछ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘‘खाना मिलेगा?’’ उसने आश्‍चर्य से कहा,  ‘‘इस वक्त?’’  मैंने कहा, ‘‘हाँ,  भूख लगी है।’’ उसने कहा कि‍ खिचड़ी बना सकती हूँ। मैंने जवाब दिया, ‘‘चलेगी, बनाओ।’’ फिर मैं बाहर बैठ गया। लगभग बीस- पच्चीस मिनट बाद उसने कहा, ‘‘अन्दर आ जाओ। खिचड़ी बन गयी है।’’

मैं अन्दर गया। थाली में गरम-गरम खिचड़ी थी। उसमें खूब सारा घी भी था। घी की खुशबू ने भूख और बढ़ा दी। मैं खिचड़ी पर टूट पड़ा। जब कुछ खिचड़ी पेट में पहुँच गई, तो उस महिला से बात करने का ख्याल आया। उसका नाम रंगीली था। पहाड़ के हिसाब से यह कुछ अटपटा,  कम प्रचलित नाम था।

रंगीली मोखम्‍बा चट्टी पर होटल चलाती है। गोंडार की रहने वाली है, जहां उसकी थोड़ी खेती है। पति का देहावसान चार-पांच साल पहले हो गया। रंगीली ने जमाने के हालत देखते हुए साथ रहने के लिए अपनी माँ को बुला लिया। माँ आज गोंडार वापस गई हुई थी। रंगीली की एक बेटी है। रंगीली तो अनपढ़ है और उसके वैधव्य ने उसे शिक्षा के महत्व को जता दिया है। इसलिए रंगीली को बेटी के भविष्य की चिंता है। 12वीं पढ़ने के बाद बेटी आगे पढ़ना चाहती थी। इसलिए उसे गुप्तकाशी कॉलेज में भेज दिया। बेटी के भविष्य की खतिर उसने बेटी को पढ़ने भेज तो दिया, पर अब साल का चालीस-पचास हजार का खर्चा भारी पड़ रहा है। इसीलिए उसने इस सुनसान जगह, जहां उसका पहले सिर्फ गाय पालने का ग्रीष्मकालीन छाना था, वहां यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था शुरू की। जब एकाध बार थके यात्रियों ने रात रुकने की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने तथाकथित ढाबे में अपनी मेहनत से एक और कमरा चिन दिया, दो बिस्तर भी रख दिए। अब अगर कोई रहना चाहे तो किराया देकर रात भी काट सकता है। जंगल में वह अकेली अपनी माँ के साथ रहती है इस छाने में, जो अब होटल भी कहलाता है।

रंगीली ने पांच-छह गाय और कुछ बकरियां पाली हैं। उसने जंगल में क्यारियां बनायी हैं, जिनमें वह आलू और अन्य उपज बोती है। दूध सिर्फ एक गाय देती है, बाकि जानवर उसकी क्यारियों के लिए खाद पैदा करते हैं। सर्दियों में अपने गाँव में रहती है, गोंडार के खेतों को जोतती है। बेटी की पढ़ाई के खर्चे को पूरा करने के लिए बकरियों को बेचती है। होटल अतिरिक्त आय है।

पेट भर चुका था। कपड़े गीले थे। इसलिए तय किया कि रात रंगीली के होटल में ही गुजारी जाए। रंगीली को रात के खाने के लिया कहा और यह भी बताया कि रात को उसके होटल में ही रहूंगा। मुझे रंगीली की हिम्मत और कर्मठता ने बहुत प्रेरणा दी थी।

गीले कपडे़ बदल कर मैं बाहर आया। ठण्ड बढ़ गई थी। सि‍र में मैंने गमछा बांध लिया। कल सुबह कोटद्वार से बहुत डिप्रेश चला था। मैं इस वक्‍त अन्दर से बहुत खुश था। कल दो दोस्त दीवान और हयात मिले थे और आज अब ये कर्मठ भुली रंगीली।

परीक्षा : प्रेमपाल शर्मा

मम्मी बंटी को संस्कृत पढ़ा रही हैं- ‘जगद्गुरु शंकराचार्य।’

‘जगद्गुरु कैसे हो सकते हैं? सातवीं सदी में क्या हम अमेरिका जा सकते थे? इंग्लैंड जा सकते थे? तब तो अमेरिका की खोज भी नहीं हुई थी।’ बंटी पढ़ाई शुरू होते ही अड़ जाते हैं।

मम्मी चुप। क्या जवाब दें?

‘अच्छा, तू इधर ध्यान दे। पांच बजने वाले हैं और अभी कुछ भी नहीं हुआ।’ वे अर्थ समझाने लगीं, ‘बत्तीस की उम्र में शंकराचार्य भगवान में लीन हो गए।’

‘लीन हो गए? मतलब?’

‘यानी विलीन हो गए? मर गए।’

‘मम्मी लीन में और विलीन में क्या अंतर है ?’

‘एक ही बात है । यानी ईश्वर में समा गए।’

‘मम्मी आप भी क्या कहती हो ? समा कैसे सकता है कोई ?’

‘तपस्या करते-करते ।’

‘लो, अच्छी तपस्या की । खाना नहीं खाया होगा। फैट्स खत्म हो गई होगी । मर गए बेचारे । पागल हैं ये लोग भी । बेकार मर गए । वरना सत्तर साल जीते ।’

‘मजाल कि आगे बढ़ने दे । गाल बजवा लो, बस । ये क्यों ? वो क्यों ? चुप भी तो नहीं रह सकता । कर इसे खुद । सब बच्चे खुद करते हैं । खुद करेगा तब पता चलेगा ।’ वह चली गईं ।

वार्षिक परीक्षा शुरू होने वाली है बंटी की । वैसे बंटी की कम, मम्मी की ज्यादा ।

‘पापा, ये एग्जाम होली के दिनों में ही क्यों होते हैं ? पिछले साल भी इन्हीं दिनों थे ?’ बंटी परीक्षा से ज्यादा होली की तैयारियों में डूबे हैं । ‘इस बार जिंसी को नहीं छोड़ूगा । कह रही थी कि‍ मैं बहुत सारा रंग लेकर आऊंगी । मम्मी, मैं डालता हूं तो भों-भों करके रोने लगती है ।’

बंटी आहिस्ता-आहिस्ता पैर रखते हुए आया । ‘पापा, एक मिनट आओ।’

‘क्यों ? बोलो ।’

उसने होंठ पर अंगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया । पापा पीछे-पीछे चल दिए । कोई रास्ता ही नहीं था । उसने खिड़की की तरफ अंगुली से इशारा किया, फुसफुसाते हुए, ‘उधर देखो ।’

पापा को कुछ दिखाई नहीं दिया । उसने खुद पापा की गर्दन ऊपर-नीचे उठाई-गिराई- ‘वो, वो !’

‘उधर है क्या ?’

‘धीरे । खिड़की के किनारों पर देखो न !’

‘क्या है, बताओ तो ?’

‘गिलहरी के बच्चे । तीन-तीन । देखों कैसे सो रहे हैं ? दिखे ?’

खिड़की के बीच अमरूद का पेड़ था । कई बार झांकने के बाद दिखाई दिए तो पापा की भी आंखें खिल गईं । ‘कैसे मजे से सो रहे हैं ! मैंने तो पहली बार देखे हैं ।’

‘गिलहरी के बच्चे ! हैं ना कितने मजेदार, पापा ! देखो उसकी पूंछ पीछे वाले के मुंह पर आ रही है ।’

तभी पापा को जोर की छींक आई ।

‘धीरे-धीरे, पापा ! लो एक तो जग भी गया । च्च-च्च ! अब ये तीनों भाग जाएंगे । आपको भी अभी आनी थी छींक, पापा !’

पापा चाहते हैं कि कहें कि कहां तक याद किया पाठ, लेकिन उसकी तन्मयता देखकर उनकी हिम्‍मत नहीं हुई ।

मम्मी इधर-उधर तलाश कर रही है बंटी को । देखो, अभी यहीं छोड़कर गई थी रसोई तक । यह लड़का तो जाने क्या चाहता है । इसका जरा भी दीदा लगता हो ? ‘बंटी ….ई….ई….’

उनकी आवाज को मील नहीं तो किलोमीटर तक तो सुना ही जा सकता है । लौट-फिरकर झल्‍लाहट फिर पापा पर, ‘अपनी किताबों में घुसे रहोगे। बताओ न कहां गया ? मुझे संस्कृत खत्म करानी है आज । इसे कुछ भी नहीं आता । तुमसे पूछकर गया था ?’

‘मुझसे पूछकर तो कोई भी नहीं जाता । तुम पूछती हो ?’

‘हां, अब पूछ रही हूं ? बताओ ? हाय राम, मैं क्या करूं ? कल क्या लिखेगा यह टेस्ट में ? इसे कुछ भी तो नहीं आता ।’

‘आ जाएगा । सुबह से तो पढ़ रहा है । दस मिनट तसल्ली नहीं रख सकतीं । बच्चा है । थोड़ी मोहलत भी दिया करो ।’

‘इसे आता होता तो मैं क्यों पीछे पड़ती । संस्कृत को भी कह रहा था कि इसे क्यों पढ़ाते हैं ? क्या होगा इससे ? बीजगणित भी क्यों ? भूगोल भी क्यों ? तो इसे घर में क्यों नहीं बिठा लेते ?’ वह रसोई में लौट गईं ।

‘मम्मी ।’ बंटी की आवाज सुनाई दी ।

‘आ गया न ।’ मम्मी रसोई से बाहर थीं । ‘आओ बेटा !’

लेकिन बंटी कहीं नजर नहीं आया । ‘आ जा, आ जा तू ! तेरी धुनाई न की तो मेरा नाम नहीं है ।’ वह फिर वापस लौट गईं ।

बंटी दीवान के नीचे जमीन पर चिपके थे । इतनी पतली जगह में जहां कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । ‘हमें कोई नहीं ढूंढ सकता और हमने आपकी सारी बातें सुन लीं । पापा से कैसी लड़ाई की आपने ।’

उसकी आंखें पुस्तक पर गड़ी हैं । कुछ लिख रहा है कॉपी में, एक विश्वास के साथ । ‘पापा, वो छोटा-सा कुत्ता था न, वह मर गया ।’ एक पल उसने सिर उठाया और अपने काम में लग गया ? ‘बेचारा गाय की मौत मरा ।’

अब पापा के चौंकने की बारी थी । कुत्ते की मौत तो सुना है, गाय की मौत क्या होती है ? ‘कैसे ?’

‘वैसे ही मरा जैसे गाय मरती है ।’ लंबी-लंबी सांसें ले लेकर । बंटी सांस खींच-खींचकर बताने लगा ।

‘तुमने कहां देखी गाय मरती ?’

‘बहुत सारी । हमारे स्कूल के पीछे जो मैदान है, उसमें उनके मुंह से बड़े झाग निकलते थे । मैं और नारायण रोज देखते थे । पता नहीं वहां कौन-सी चीजें खाकर वे मर जाती थीं । वैटरनरी डॉक्टर भी आते थे। तब भी । वहां तितली भी मरी मिलती थी । अच्‍छा यह बताओ, यह किस चीज का निशान है ?’ उसने कॉपी के अंतिम पन्ने पर छोटा-सा पंजा बना दिया ।

पापा समझे नहीं । पढ़ाई करते-करते अचानक यह कुत्ता, गाय, तितली, निशान कहां से आ गए ?

‘मोर का ! बारिश में मोर के निशान ऐसे ही होते हैं । बहुत मोर भी होते थे स्कूल के पीछे की तरफ ।’

‘बंटी, क्यों गप्पे हांक रहे हो ? कितना काम हुआ है ? मैं आज तुझे खेलने नहीं जाने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए । पापा भी गप्पा मारने को पहुंच गए ।’

पापा-बंटी दोनों धम्म से सीधे होकर बैठ गए ।

‘पापा, मुझे सब फोन पर बहनजी कहते हैं ।’ वह मुस्करा भी रहा था और खुदबदा भी रहा था । ‘बताओ न क्यों ?’

पापा समझे नहीं, ‘बताओ न, क्या हुआ ?’

‘मैंने अभी फोन उठाया तो उधर से आवाज आई- बहनजी नमस्कार । मिश्राजी हैं ? सब ऐसा ही कहते हैं।’

‘तो बहनजी बनने में क्या परेशानी है ?’

बिट्टू ने भी उसका प्रश्न सुन लिया था । ‘पहले मुझसे भी बहनजी कहते थे, फिर मैंने अपनी आवाज मोटी की । अब कोई नहीं कहता ।’

‘हूं ।’ बंटी ने अपनी चिरपरिचित बोली में आवाज निकाली, ‘कैसे ?’

बिट्टू ऐसे किसी उत्तर के लिए तैयार नहीं था । भाग लिया । ‘मैं भी अगले साल टीनेज हो जाऊंगा । तब मुझे कोई बहनजी नहीं कहेगा ।’

‘अब पढ़ेगा भी ! टीनेज हो जाएगा, पर पढ़ना-लिखना आए या न आए ।’ मम्मी की डांट थी ।

‘आपको और कुछ आता है डांटने के सिवाय । जब देखो तब हर समय डांटती रहती हैं ।’

अगली सुबह इतिहास-भूगोल की परीक्षा थी । मां इतिहास में कमजोर है, इसलिए मेरे पास छोड़ गई । हम दोनों को गरियाते हुए- ‘लो, लो इसका टेस्ट । बहुत बड़े इतिहासकार बनते हो ।’ गुस्से, खिसियाहट का लावा जब बहता है तो न तो वह हमारे उत्तर का इंतजार करता है और न हम उत्तर देने की हिम्‍मत करते हैं। बंटी को यह बात पता है । उसके चेहरे से साफ है कि उस पर इसका कोई असर नहीं है । उसे यकीन है कि पापा पर भी नहीं है ।

वह मेरे पास बैठा इतिहास के प्रश्नों के जवाब लिख रहा है । मेरी कई चेतावनियों के बावजूद वह पहले प्रश्न की दूसरी लाइन पर ही खड़ा है ।

‘पापा, टीकू ताऊजी हमारे घर क्यों नहीं आते ?’ उसकी आंखें मेरी आंखों में घुस रही हैं । ‘मैंने तो उन्हें कभी बोलते भी नहीं देखा । बताओ न  ? क्यों नहीं आते ? ’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम उर्फ गदर की विफलता के कारणों में से उसे यह प्रश्न उठा है उत्तर लिखते-लिखते ।

‘फिर बताऊंगा ।’

‘पहले बताओ । आप कभी भी नहीं बताते । ऐसे ही कहते रहते हो, फिर बताऊंगा ! फिर बताऊंगा !’

‘नहीं । इतिहास के पेपर के बाद पक्का ।’ पापा के पास आते ही उसे सबसे पहले मानो यह रटंत पढ़ाई भूलती है । बंटी की भूगोल की किताबें नहीं मिल रही हैं । ऐसा पहली बार नहीं हो रहा । मासिक टेस्ट हो या छमाही, किसी न किसी विषय की किताब तो गायब हो ही जाती है तब तक ।

काफी देर से कोई आवाज नहीं सुनी तो मम्मी भी बेचैन होने लगती हैं। बंटी और इतनी एकाग्रता से पढ़ रहे हों ?

बंटी का चेहरा उतरा हुआ है ।  ‘मम्मी किताब नहीं मिल रही ।’

‘अच्छा, तो तू उसी की खुसर-पुसर में लगा हुआ था ! मैं कहूं कि आज तो बड़े ध्यान से पढ़ रहा है । बंटी, हर बार तुम ऐसा ही करते हो । भइया की किताब तो कभी नहीं खोती । किताब नहीं मिली तो आज तेरी हत्या कर दूंगी ! ढूंढ़ ।’ मम्मी की आवाज में तैरते चाकू की समझ है बंटी में । तुरंत दौड़कर ढूंढ़ने लग गया। डबल बेड के नीचे, सोफे की गद्दियों के नीचे, पुरानी पत्रिकाओं के पीछे । यह सभी उसकी किताबों की जगहें हैं । चप्पे-चप्पे पर । जानकर भी रखता है, अनजाने में भी । उसे जब पता चलेगा कि पापा ने इतिहास के टेस्ट के लिए कहा था तो उस दिन इतिहास की किताब रहेगी, लेकिन अगले दिन नहीं । इतिहास के टेस्ट का मुहूर्त ढलते ही इतिहास की किताब मिल जाएगी, लेकिन भूगोल की गायब । नहीं खोता तो माचिस के ढक्कन, पुराने सेल, चाक, स्टिकर, डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूओ के कार्ड, चॉकलेट के रैपर्स, सचिन तेंदुलकर का चित्र, पिल्लों के गले में बांधी जाने वाली घंटियां ।

‘बंटी, तुम पानी की टंकी की तरफ से मत जाया करो । उधर एक कुत्ता रहता है कटखना । उसने रामचंद्रन की बेटी को काट लिया है ।’

‘कैसे रंग का है, मम्‍मी ?’ बंटी तुरंत दौड़कर आ गया ।

‘काले मुंह का । लाल-सा ।’

‘वो तो मेरा सिताबी है । एक ही आवाज में मेरे पास आ जाता है । उसे तो मैं और एडवर्ड सबसे ज्यादा ब्रेड खिलाते हैं ।’ मां-बेटे दोनों भूल चुके हैं किताब, टेस्ट, चेतावनी ।

‘मैं कहता हूं, तुम नहीं जाओगे उधर । काट लिया तो चौदह इंजेक्शन लगेंगे इतने बड़े-बड़े, पेट में, समझे!’

बंटी पर कोई असर नहीं । उसे अपने दोस्त पर यकीन है ।  ‘मम्मी, वो तो अभी ज्यादा बड़ा नहीं हुआ । कल ऐनी और उसकी फ्रेंड खेल रही थीं, मम्मी ! बड़ा मजा आया । मैंने बुलाया । टीलू टीलू टीलू ! और ऐनी की ओर इशारा कर दिया । बस ऐनी के पीछे पड़ गया । ऐनी भागते-भागते अपने घर में घुस गई ।’ बंटी का चेहरा सुबह के सूर्य-सा खिल उठता है ऐसी हरकतों के विवरण बताते वक्त ।

मम्मी को शादी में जाना है । मम्मी के तनाव मम्मी के किसिम के ही हैं । पहले इस पक्ष में सोचती रहीं कि साथ ही ले जाती हूं बंटी को । कुछ खा-पी भी लेगा । मस्‍ती कर लेगा तो कल पढ़ाई भी करा लूंगी ।  ‘लेकिन, लेकर तभी जाऊंगी, जब तुम ये, ये काम कर लोगे ।

बंटी चुप रहा । जैसे कोई वास्ता ही न हो इस बात से ।

‘सुना कि नहीं ? जब तक टेस्ट नहीं होंगे तब तक नहीं ले जाऊंगी । और लिखित में लूंगी ।’

उसने ऐन वक्‍त पर मना कर दिया ।  ‘मैं नहीं जाता । कौन जाए बोर होने के लिए ।’ पापा ने भी समझाया पर नहीं माना ।  ‘मैं पढ़ता रहूंगा ।’ यह और जोड़ दिया ।

अब आप क्या करेंगे ? मम्मी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं । वह जाने की तैयारी कर रही हैं । बालों को धो रही हैं, पोंछ रही हैं और बीच-बीच में बंटी को आकर देख जाती हैं– पढ़ रहा है या नहीं ? ऐसे छोड़ते वक्त उनकी चिंता और चार गुना ज्यादा हो जाती है । बंटी को जन्म-भर को काफी उपदेश, हिदायतें देंगी । बंटी पूरी तन्‍मयता से मेज पर बैठे हैं । उस्‍ताद की तरह । उसे पता है, इधर मम्मी बाहर, उधर वह । छह बज गए और मम्मी अभी तक नहीं गईं । बंटी उठे और मम्‍मी के सामने थे । ‘मम्मी, क्या कर रही हो ? कैसी बदबू आ रही है ?’

मम्‍मी क्‍या जवाब दें बच्‍चे की प्रतिक्रिया का ।

‘मम्मी, हमारी अंग्रेजी वाली मैम के पास आप चले जाओ तो बदबू के मारे नाक फट जाए । जाने कितने तरह का इत्र लगाकर आती हैं । एक दिन उन्‍होंने मुझे कहा कि मेरी मेज की ड्रार से किताब ले आओ । मम्मी, सुनो तो । उसमें इतनी चीजें थीं – फेयर एंड लवली, पाउडर, लिपस्टिक, जाने क्या-क्या । मम्मी, ये स्कूल में क्यों रखती हैं ये सारी चीजें ?’

गाल रगड़ती मम्मी का मानो दम सूखता जा रहा है ।  ‘अब तू मुझे तैयार भी होने देगा ? तूने काम कर लिया ?’

‘अभी करता हूं न । मैंने आपको बता दिया न । मम्मी ! क्यों लगाती हैं वे इतनी चीजें ?’

‘तुझे अच्‍छी नहीं लगतीं ?’

बंटी चुप । क्या जवाब दे ?

‘तेरी बहू लगाया करेगी, तो….’

‘मुझे सबसे अच्छी सविता सिंह मैडम लगती हैं । उनसे बिलकुल बास नहीं आती ।’

पढ़ने को छोड़कर उसे सारी बातें अच्छी लगती हैं ।

‘मम्‍मी, हमारी क्‍लास में एक लड़की है । वह भी 15 मार्च को पैदा हुई थी । मैं भी ।’

अगले दिन पूछ रहा था । ‘मैं 12 बजे पैदा हुआ था न ? वो साढ़े बारह बजे हुई  थी ।’

‘तू सवा बारह बजे हुआ था ।’

‘हूं ! तब भी मैं 15 मिनट बड़ा तो हुआ ही न ।’

इस हिसाब में उससे कोई गड़बड़ नहीं होती । गड़बड़ होती है तो स्कूल की किताबों के गणित से । ‘पापा, ये बीजगणित क्यों पढ़ते हैं ? क्या होता है इससे ?’ बंटी प्रसन्नचित्‍त मूड में था । शायद पापा भी ।

‘बेटा, हर चीज काम की होती है । कुछ आज, कुछ आगे कभी ।’

‘कैसे ?’

‘जैसे जो आप लाभ-हानि परसेंट के सवाल करते हो, उससे आपको बाजार में तुरंत समझ में आ जाता है कि कितना कमीशन मिलेगा ? कौन-सी चीज सस्ती है, महंगी है । बैंक में ब्याज-दर आदि । तुरंत फायदा हुआ न ? बीजगणित तब काम आएगा, जब बड़ी-बड़ी गणनाएं करोगे, जैसे पृथ्वी से चांद की दूरी, ध्वनि का वेग, आइंस्टाइन का फार्मूला…..’

बंटी की समझ में सिर्फ पहली बात ही आई है, दूसरी नहीं । चुपचाप काम में लग गया । इसलिए भी कि इससे ज्यादा प्रश्‍नों पर पापा-मम्मी चीखकर, डांटकर चुप करा देते हैं । थोड़ी देर बाद उसने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘और पापा, किसी को यह सब नहीं पता करना हो तो उसके क्या काम आएगा यह सब ?’

पापा के पास कोई जवाब नहीं है । ‘अब तुम पहले अपना होमवर्क पूरा करो ।’

बीजगणित में फेक्‍टर्स की एक्‍सरसाइज थी । पहले प्रश्‍न पर ही अटका पड़ा है ।

‘जब तुम्हें आता नहीं तो पूछते क्यों नहीं ? बोलो, हमारी परीक्षा है या तुम्‍हारी ?’ तड़ातड़ कई चांटे पड़ गए पापा के ।

बाल पकड़कर बंटी को झिंझोड़ डाला ।  ‘खबरदार ! जो यहां से हिला भी, जब तक ये सवाल पूरे नहीं हो जाते । चकर-चकर प्रश्न करने के लिए अक्‍ल कहां से आ जाती है ? जो सांस भी निकाली तो हड्डी तोड़ दूंगा ।’

पापा छत पर टहल रहे हैं- अपराधबोध में डूबे । क्यों मारा ? क्या मारने से पढ़ाई बेहतर होगी ? और इतनी दुष्टता से !  कहीं आंख पर चोट लग जाती तो ? वह जल्दी रोता नहीं है । लेकिन आज कितना बिलख-बिलखकर रोया था ।

‘मैथ्स, मैथ्स, मैथ्स ! क्या मैं मर जाऊं ? शाम को पांच बजे से आठ बजे तक मैं पढ़ता हूं कि नहीं ? बैडमिंटन नहीं जाना, नहीं गया । कंप्यूटर मत जाओ, वहां नहीं जाता । क्या दुनिया के सारे बच्चे एक जैसे होते हैं? आपको भी तो कुछ नहीं आता होगा ? मारो ! मारो ! मेरी गरदन क्यों नहीं काट लेते !’

बार-बार उसका चेहरा आंखों में उतर रहा है- आंसुओं से लथपथ । डरा हुआ-सा । जल्दी उठकर पढ़ने में लगा है । अलार्म लगाकर सोया था । सुबह के भुकभुके में बरामदे से बंटी की आवाज आई, ‘पापा ! देखो चांद।’

पापा अभी भी उसकी परीक्षा के बारे में सोच रहे थे उठकर उसके पास पहुंचे ।

‘इधर देखो, इधर पापा ! कितना बड़ा है । पेड़ों के बीच । सीनरी ऐसी ही होती है । मैं भी बनाऊंगा ऐसी । एग्जाम के बाद ।’

कोई नहीं कह सकता कि रात को बंटी की पिटाई हुई है और आज उसकी परीक्षा है ।