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बाजारोन्‍मुख हुई स्‍वातंत्र्योतर हिंदी कहानी : नरेंद्र अनि‍केत

नरेंद्र अनि‍केत

हिंदी कहानी पर जब भी विचार किया जाता है तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हुआ तीव्र विकास विवेचना के केंद्र में रहता है। बीसवीं सदी के आठवें दशक तक हिंदी कहानी पांच आंदोलनों से गुजर चुकी थी। सबसे ध्‍यान देने योग्‍य बात यही है कि सभी कहानी आंदोलन स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए। 19वीं सदी के आखिर से हिंदी कहानी शुरू होती है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के समय तक हिंदी कहानी आदर्श के दायरे में बंधी रही। सदी के मध्‍य में देश आजाद हुआ और तीस साल बीतते-बीतते कथा लेखन में जिस तेजी से बदलाव आए, उस पर गौर करने की जरूरत है। छठे दशक के मध्‍य तक आते-आते कहानी में बदलाव आ जाता है। इसी बदलाव को ‘नई कहानी’ नाम दिया गया। नई कहानी को सबसे पहला कहानी आंदोलन कहा जाता है। आजादी मिले दस साल भी नहीं बीते थे और हिंदी कहानी के केंद्र में आदर्श के साथ जीने, संघर्ष करने वाला नायक गायब हो गया। उसकी जगह परिस्थिति की मार झेल समझौता करने वाला हताश नायक आ जाता है। यह हताश नायक तत्‍कालीन भारतीय समाज का यथार्थवादी चेहरा है।

कहानी में आए इस तरह के बदलाव का कारक आजादी के बाद देश में उत्‍पन्‍न परिस्थितियों को माना जाता है। देश में तैयार की जा रही बाजारोन्‍मुख व्‍यवस्‍था ने ही वैसी परिस्थितियां तैयार की थीं। स्‍वतंत्रता से पहले जो समाज अंग्रेजी राज की बाजार हितैषी व्‍यवस्‍था से उत्‍पीडि़त था, उसे सामंती व्‍यवस्‍था की मार झेलने वाला समाज माना गया। अंग्रेजों ने जो सामंती व्‍यवस्‍था तैयार की थी, वह केवल उनकी बाजार नीति को सहारा दे रही थी। सभी कर्णधारों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि अंग्रेज भारत क्‍यों आए थे। उन्‍हें अपने औद्योगिक उत्‍पादों के लिए बाजार चाहिए था। दुनिया के जिन हिस्‍सों में मनुष्‍य श्रम और कृषि पर आश्रित था, उससे बेहतर क्रेता और कोई नहीं हो सकता था। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को खरीदार बनाने के लिए अंग्रेजों ने वहां के पारंपरिक मूल्‍यों, मान्‍यताओं और जीवन शैली को पोंगापंथ कहा और उसे दरकिनार कराया। भारतीय इतिहास में अंग्रेजी राज की स्‍थापना से ही आधुनिककाल की शुरुआत माना गया है। मतलब औद्योगिक उत्‍पादों के विक्रय की परिस्थिति बनने के बाद के समय को ही आधुनिक काल कहा जाता है।

अंग्रेजी राज की स्‍थापना के बाद भारत में सुधार आंदोलन हुए। उसे अंग्रेजी संपर्क का प्रभाव माना गया। यह सच है कि कई कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन हुए और सफलता भी मिली। लेकिन हमें अंग्रेजी राज की स्‍थापना के मूल में क्‍या था, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी व्‍यापार करने आई थी और उसे यहां शासन स्‍थापित करने का अनुकूल माहौल मिल गया था। अपने हितों के लिए आज के छोटे-बड़े कारोबारी भी गार्ड रखते हैं। ये गार्ड हथियार बंद भी होते हैं और खाली हाथ भी। 18वीं सदी में कंपनी को तत्‍कालीन सत्‍ता को कर देने के अलावा और किन्‍हीं बंदिशों का सामना नहीं करना पड़ा था। कंपनी के पहरेदार चौकीदार हथियार बंद हो गए थे और इन्‍हीं गार्डों ने लॉर्ड क्‍लाइब को बिहार, बंगाल जीतकर दिया था। शासन स्‍थापित होने के बाद अंग्रेजों ने यहां के पारंपरिक उद्योगों को बंद कराया था। ढाका के मलमल से प्रतिस्‍पर्द्धा खत्‍म करने के लिए उन्‍होंने एक लाख बुनकरों का अंगूठा कटवा दिया था। घरेलू स्‍तर पर खांड, शक्‍कर और रवा बनाया जाता था। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए अंग्रेजी राज में चीनी मिलों के हित में गन्‍ना रिजर्व एरिया एक्‍ट बनाया गया था। इस कानून को आजाद भारत की विधायिका भी अपनी स्‍वीकृति दे चुकी है और इसके प्रावधानों को और कड़ा कर चुकी है। इन दोनों बातों पर नजर डालने के बाद सबकुछ साफ हो जाता है। यह कहना कहीं से भी अनुचित नहीं होगा कि शासन व्‍यवस्‍था केवल और केवल अपने उद्योगों के लिए बाजार बनने का साधन थी। अपना मकसद साधने के लिए अंग्रेजी राज ने वहां की समाज व्‍यवस्‍था के प्रति हेय दृष्टि अपनाई और उन्‍हें अपनी परिभाषा के अनुसार ढालने के लिए अपने मतलब के उपकरण तैयार किए। उन्‍होंने इस‍के लिए पारंपरिक चीजों और मान्‍यताओं के विरुद्ध एक विचार स्‍थापित किया जिसे उन्‍होंने आधुनिकता कहा। आजादी के बाद अंग्रेजी राज के समय की आधुनिकता का बोलबाला बनता चला गया। असल में भारतीय समाज बाजार के अनुसार ढलता चला गया।

जब देश आजाद हुआ तो अंग्रेजी राज की व्‍यवस्‍था लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ने लगी। जिस व्‍यवस्‍था की उम्‍मीद थी, वह स्‍थापित नहीं हो पाई। इसका असर व्‍यक्ति और समाज पर पड़ा। इन्‍हीं परिस्थितियों ने आम आदमी को निराश किया और उसमें असुरक्षा की भावना भी पैदा की। निराशा ने पहले उसे एकाकी बनाया तो बाद में असुरक्षा ने आक्रामक बनाया। सातवें दशक तक का हिंदुस्‍तानी समाज इसी निराशा, एकाकीपन और आक्रोश के बीच झूलता दिखता है। सातवें दशक के अंतिम समय तक यही समाज आक्रामक होने लगता है और आठवें दशक के आखिर में वह तनाशाही से लोहा लेता है। देश में इस तरह की सामाजिक परिस्थिति निर्मित करने के लिए स्‍वतंत्र भारत के नेतृत्‍व को जवाबदेह माना जा सकता है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले नेताओं ने आजाद भारत के जिस स्‍वरूप की कल्‍पना की थी, सत्‍ता मिलने के बाद वास्‍तविकता भिन्‍न थी। संघर्ष के दिनों में की गई कल्‍पना साकार नहीं होने पर व्‍यापक जनसमुदाय निराश हो गया था। स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारतीय समाज सपने और वास्‍तविकता के बीच के द्वंद्व में फंस गया था। हिंदी कहानी इसी द्वंद्व में उलझे आदमी के सामूहिक मनोभावों को हमारे सामने रखती है।

असल में यह द्वंद्व महात्‍मा गांधी की कल्‍पना के भारत और नेहरू के सपनों के भारत के बीच का है। कहानी को यदि स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के समय में विभाजित करें हमें सबकुछ साफ नजर आएगा।

भारतीय समाज अवतारवाद की कल्‍पना में जीता चला आया समाज है। मजेदार है कि भगवान बुद्ध जिन्‍होंने अपने तात्‍कालिक समाज को पदार्थवादी बनाया था। जिनका मुक्ति संबंधी विचार पारंपरिक विचार से भिन्‍न था। उनके पदार्थवादी चिंतन और मुक्ति या निर्वाण संबंधी विचार के कारण पारंपरिक वैदिक विचारकों ने उन्‍हें वाममार्गी घोषित किया था। इसके बाद भी भारतीय समाज ने उन्‍हें भगवान का दर्जा दिया और बाद में वैष्‍णव विचारकों ने उन्‍हें विष्‍णु के नौवें अवतार के रूप में मान्‍यता दी थी। भगवान बुद्ध ने तात्‍कालिक जीवन और शासन व्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। उपदेश देने से पहले उन्‍होंने स्‍वयं पालन किया और खुद पर ही प्रयोग भी किया था। उसे ग्राह्य और सुगम साबित किया था। यही कारण है कि समाज ने उसे सामूहिक रूप से स्‍वीकार किया था।

ठीक इसी तरह भगवान राम वनवास के लिए भेजे जाते हैं। राजमहल के ऐश्‍वर्य में जीने वाले राम वनवासियों की जीवनशैली अपनाते हैं। कंदमूल फल खाते हैं। राम की यही सादगी, यही त्‍याग भारतीय समाज को भाता है। एक तर्क दिया जाता है कि राम गरीबों के बीच गरीबों की तरह जीने के लिए मजबूर किए गए इसीलिए मजबूर भारतीय समाज ने उन्‍हें दयावश स्‍वीकार किया। भारतीय समाज पारंपरिक रूप से सहज और प्रकृति के साथ साम्‍य रखने वाला समाज है। सहजता ही वह मूल बिंदु है जो भारतीय समाज को राम और बुद्ध की तरफ ले जाता है। गौर करें तो भगवान बुद्ध और राम दोनों जीवन की कसौटी पर एक जगह ही खड़े नजर आते हैं। दोनों अवतारों के व्‍यापक आधार से स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय गांधी को मिले जनसमर्थन का कारण भी साफ हो जाता है। गांधी भी अपनी निजी जीवनशैली और हर बुराई के खात्‍मे के प्रति अडिग रहने की अपनी प्रवृत्ति के कारण व्‍यापक रूप से स्‍वीकृत हुए थे। उन्‍हें उसी भारतीय समाज का आधार मिला था जिसे अवतारवाद का समर्थक माना जाता है। उस समाज ने गांधी के रामराज के नारे पर भरोसा किया था। उसे उम्‍मीद थी कि देश जब आजाद होगा तो उसके सभी दुखों का अंत हो जाएगा। भारतीय समाज के लिए गांधी एक अवतार की तरह थे इसलिए उनके हर आह्वान पर लोग गोलबंद हो रहे थे। आजादी के बाद गांधी की कल्‍पना का भारत खो गया। उसकी जगह एक ऐसी व्‍यवस्‍था आकार ले रही थी जिसमें आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था। यही वह परिस्थिति थी, जिसमें नई कहानी उठ खड़ी हुई थी।

जिन सामाजिक परिस्थितियों को नई कहानी आंदोलन की कहानियां हमारे सामने रखती हैं, उसके लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन मजेदार है कि नई कहानी के कथाकार त्रयी में से एक राजेंद्र यादव ने करीब ढाई दशक पहले एक विचार गोष्‍ठी में कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद देश में कोई विजनरी नेता नहीं हुआ। राजेंद्र यादव के मुताबिक, नेहरू के विजन ने देश की समाजव्‍यवस्‍था, अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। राजेंद्र यादव ने नेहरू के सपने के भारत को सत्‍य मानते हुए उनके विजन के संबंध में यह विचार व्‍यक्‍त किया था। जीवन में बदलाव आया, उद्योगों की आधारशिला रखी गई, विकास के काम शुरू हुए और शहरों का विकास होने लगा। इन सभी बदलावों के मूल में नेहरू के विजन को मुख्‍य कारक माना जाता है। यह निर्विवाद सत्‍य है कि आजादी के बाद हुए विकास का लोगों के जीवन पर कई रूपों में असर पड़ा। लेकिन भारतीय समाज पर विकास का नकारात्‍मक असर भी पड़ा। लोगों में निराशा बढ़ी और जीवन की शर्तें आसान होने की जगह और दुरूह होती चली गईं। बेहतर जीवन की उम्‍मीद में लोग शहर की ओर बढ़ने लगे थे, लेकिन वहां उनके लायक रोजगार नहीं थे। अकेले आ रहे लोग अकेले हो रहे थे और जीवन का, पीछे छूटे परिवार की उम्‍मीदों का बोझ उठाए चल रहे थे। ऐसे में भारतीय जनमानस में निराशा का पनपना स्‍वाभाविक था। निराशा के उसी वातावरण से जूझ रहे शहरी समाज का चेहरा छठे दशक के मध्‍य में आई कहानियों में दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जो सामाजिक परिस्थिति विकसित हुई थी, वह नेहरू के विजन की ही देन थी।

नेहरू के सपनों के भारत में पश्चिम का ऐश्‍वर्य था। वह भारत को ब्रिटेन और दिल्‍ली को लंदन बनाना चाहते थे। यही गांधी और नेहरू के बीच का अंतर था। जब आजादी आसन्‍न हो गई थी, तब भावी भारत के स्‍वरूप को लेकर गांधी और नेहरू दो भिन्‍न सिरों पर खड़े हो चुके थे। नेहरू के सपनों का भारत जिस भ्रष्‍टाचार में डूबने वाला था, उसकी झलक मिलने लगी थी और कांग्रेस में जो लोग खादी पहन अपने लिए जगह बना रहे थे, वे आने वाले दिनों का संकेत दे रहे थे। इस स्थिति को फणीश्‍वरनाथ रेणु ने अपने उपन्‍यास ‘मैला आंचल’ में रखा है।

‘मैला आंचल’ का बामन दास गांधीवादी विचारधारा पर अडिग रहने वाला वह मनुष्‍य है, जिसे आजाद भारत या यह कहिए कि नेहरूबियन मॉडल का भारत बेकार या आउट डेटेड मान रहा है। ‘मैला आंचल’ में आजादी के आसपास के समय में गलत लोगों को कांग्रेस का नेता बनते दिखाया गया है। इस उपन्‍यास के अंतिम पड़ाव में भारत और पूर्वी पाकिस्‍तान के बीच चल रही तस्‍करी और उससे जुड़े लोगों को दर्शाया है। बैलगाडि़यों पर तस्‍करी का सामान ले जाया जा रहा है। नागर नदी को दोनों देशों की सीमा मान ली गई है। इसी नदी के चोर घाट से बैलगाडि़यां पार कराई जाती हैं। इस तस्‍करी में सप्‍लाई इंस्‍पेक्‍टर, हवलदार, सिपाही सभी मिले हुए हैं। इसका लीडर दुलारचंद कापरा है, जो अफसरों को मोरंगिया शराब (बिहार के सीमावर्ती इलाके में नेपाल को मोरंग कहा जाता है) परोसता है। कटहा का दुलारचंद जुआ घर चलाता है और मोरंगिया ल‍ड़कियों, गांजा शराब का कारोबार करता रहा है। वह कपड़ा, चीनी, सीमेंट पूर्वी पाकिस्‍तान भेजता है। यही दुलारचंद कापरा कटहा थाना कांग्रेस कमेटी का अध्‍यक्ष भी बन गया है। यहां दुलारचंद आजाद भारत में निचले स्‍तर पर शासकों के चरित्र की झलक देता है। इसके माध्‍यम से रेणु ने यह बताया है कि देश तो बस अंग्रेजी चंगुल से आजाद हुआ, लेकिन उसकी व्‍यवस्‍था से उसे मुक्ति नहीं मिल सकी।

नेहरू यूरोप के जिस वैभव से बंधे थे, गांधी पश्चिम के उसी ऐश्‍वर्य के विरुद्ध खड़े थे। गांधी भारतीय समाज के अनुरूप साबित हो रहे थे इसलिए उन्‍हें हर वर्ग का समर्थन प्राप्‍त हुआ था। प्रेमचंद ने अपने उपन्‍यास ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्‍यम से गांधी के इसी रूप को सामने रखा है। आलोचकों की दृष्टि में यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के बीच के टकराव को सामने रखता है। लेकिन यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के वैचारिक टकराव तक ही सीमित नहीं है। यह बाजार में गांधीवाद के गुम हो जाने की दास्‍तां को भी सामने रखता है।

भारत में अंग्रेजी सामान या भारत को अपना बाजार बनाने के क्रम में अंग्रेजों ने आधुनिकता के बारे में जो दृष्टि फैलाई थी, इस उपन्‍यास में सूरदास उसी दृष्टि के खिलाफ भारतीय विचारधारा के प्रतीक के रूप में खड़े हैं। गौर किया जाए तो सूरदास उसी आधुनिक भोगवादी लालसा से लिप्‍त आधुनिक समाज के विरुद्ध दिखाई देते हैं। इस उपन्‍यास का नायक सूरदास उस भारतीय समाज का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं, जो दूसरों के लिए त्‍याग करना धर्म समझता है। वह अपनी जमीन की कीमत नहीं देखते, अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए वह जमीन की ऊंची कीमत की लालसा नहीं पालते। जमीन पर मि. जान सेवक की नजर पड़ जाती है और वह उन्‍हें पांच रुपये देने लगता है। बग्‍गी के साथ मीलों दौड़ता चले आए सूरदास यह कहते हुए रुपये लेने से इन्‍कार कर देते हैं, ‘धर्म में आपका स्‍वार्थ मिल गया, अब यह धर्म नहीं रहा।’

इन दोनों उपन्‍यासों और उसके गांधीवादी नायकों का जिक्र इसलिए किया है कि दोनों के गांधीवादी नायक उसी शहरी प्रपंच के शिकार हो जाते हैं, जिसमें आजाद भारत का आम आदमी फंस गया है। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो गांधी और गांधीवाद जिस बाजार के खिलाफ खड़े थे, आजाद भारत में उसी गांधीवाद को औद्योगिक साम्राज्‍य का बाजार निगल जाता है और बदलती सत्‍ता उन्‍हें समय-समय पर अप्रासंगिक करार देती रहती है। दोनों उपन्‍यासों में दोनों कहानीकारों ने प्रतीकात्‍मक ढंग से गांधीवाद की इसी स्थिति को दर्शाया है।

‘मैला आंचल’ के बामन दास नेहरूबियन मॉडल के भारत के विरोध में खड़े हो जाते हैं और नेहरूबियन मॉडल का भारत उन्‍हें कुचलकर मार डालता है। उनकी लाश नागर नदी के पार पूर्वी पाकिस्‍तान में फेंक दी जाती है। दूसरी तरफ के सिपाही बामन दास की लाश को नदी में प्रवाहित कर देते हैं और उनका झोला भारतीय सीमा में एक पीपल के पेड़ पर टांग देते हैं। समय के थपेड़े में झोला चीथड़ा हो जाता है और लोग पीपल को चे‍थरिया पीर समझने लगते हैं। फिर वहां पेड़ में कई चीथड़े लटक जाते हैं। ‘रंगभूमि’ में उद्योग से गांव का समाज बदल जाता है। लोगों का आपसी व्‍यवहार बदल जाता है और नायक सूरदास का अंत होता है, लेकिन उनके हठ और जनोन्‍मुखी स्‍वभाव के कारण उनकी मूर्ति लगाई जाती है। एक दिन उनकी प्रतिमा को उद्योग समर्थक राजा क्षतिग्रस्‍त कर देता है।

रेणु ने तो आजादी के बाद ‘मैला आंचल’ लिखा था, लेकिन प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ आजादी से बहुत पहले लिखा था। तत्‍कालीन परिस्थितियों को देख प्रेमचंद भावी भारत के स्‍वरूप के बारे में सटीक अनुमान लगा बैठे थे। जिस समय ‘रंगभूमि’ की रचना हुई थी, उस समय आजादी के लिए संघर्ष ही चल रहा था। आजादी आसन्‍न भी नहीं थी, लेकिन प्रेमचंद ने यही कल्‍पना की थी कि यह देश गांधी को प्रतिमाओं में समेट देगा और उसी बाजार के व्‍यामोह में जा फंसेगा, जिसके खिलाफ गांधी खड़े हैं।

आजाद भारत में आधुनिक कौन इसकी परिभाषा बदल जाती है। शिक्षा और ज्ञान आधुनिक होने की पहचान के सबसे निचले पायदान पर आते हैं, लेकिन पहनावा आदमी को समाज में प्रतिष्‍ठा दिलाता है। नई पीढ़ी की नजर में खादी पहनना पिछड़ेपन की निशानी बन चुका है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपने से अलग मानती है। मूल्‍यों और मान्‍यताओं में आए इस बदलाव को दीप्ति खंडेलवाल ने अपनी कहानी ‘मूल्‍य’ में बेहतर तरीके से चित्रित किया है – ‘ओ माई गॉड ! पिताजी, क्‍या हुलिया बनाए रहते हैं आप भी ? ढंग के कपड़े तो पहना कीजिए। कितनी बार आपको बताया कि टेरीकॉट का एक सूट बनवा लीजिए, तो झंझट मिटे। लेकिन आप तो खादी की लादी लादे रहेंगे और उन पर मां प्रेस करेगी, लोटे में कोयला डालकर। क्‍या आप लोगों के लिए ढंग से रहने की कोई वैल्‍यू नहीं ?’

वैल्‍यू ?
मूल्‍य ?

पंडित जी भरपूर नजर से बेटे को देखते हैं। टेरीकॉट की तंग पैंट और ब्‍लाउजनुमा चुस्‍त बुशर्ट में कलमें बढ़ाए यह उनका अपना खून कितने निर्द्वंद्व भाव से उन्‍हें मूल्‍यों का अर्थ समझा रहा है।1

इस तरह के बदलाव का शहरी जीवन और परंपरागत पेशा पर बुरा असर पड़ा था। बदीउज्‍जमा ने ‘चौथा ब्राह्मण’ कहानी संग्रह में ‘मिटते साए’ कहानी में इसी स्थिति को दर्शाया है। ये दोनों कहानियां आठवें दशक की हैं। इस दशक तक आते-आते हर दो-तीन साल बाद मानदंडों में तेजी से बदलाव आता है। इन बदलावों का कारण वैज्ञानिक उन्‍नति, औद्योगिक प्रगति, महानगरीय सभ्‍यता का तेजी से विकास, शिक्षा और कला आदि में परिवर्तन था। इन सबके मूल में पश्चिम का भौतिकवादी चिंतन था। जिस तरह की सोच और जिस तरह के चिंतन से महानगरीय संस्‍कृति लैस थी, उसमें पुराने मूल्‍यों और संस्‍कारों के लिए कोई जगह नहीं थी। महानगरों में रहने वाले और रहने आए लोगों ने अपने अनेक संस्‍कारों के विपरीत नई जीवन पद्धति अपनाई। इस बदलाव ने समाज को दिखावे के अध्‍यात्‍म से बांधा। यह अध्‍यात्‍म भी भौतिकता के रंग में डूबा और उसने भी बाजार बनाया। उस बाजार में आज के कई साधु-संत दिखते हैं।

शहरीकरण ने संयुक्‍त परिवार को तोड़ा, परिवार में भी तनाव, फूट और संबंधों में बिखराव पैदा हुआ। इसी स्थिति ने अकेलापन, सूनापन, बेगानापन और जटिलताओं को न केलव जन्‍म दिया, बल्कि उसे पाला भी। गोविंद मिश्र की ‘कचकौंध’ कहानी में पंडित जी जैसे पात्र इस व्‍यथा से पीडि़त हैं कि शहर आकर उनके बेटे-पोते उन सब प्रतिमानों को ध्‍वस्‍त कर रहे हैं, जिसका उन्‍होंने जीवनभर निष्‍ठापूर्वक पालन किया है। उन्‍हें लगता है कि शहर में आ गई उनकी अगली पीढ़ी ‘हर चीज को मटियामेट कर रही है।’2

इस नए पनप रहे समाज ने आठवें दशक में ही वैवाहिक संबंधों को लेकर भी भिन्‍न विचार को जगह दे दी थी। रमेश बक्षी ने ‘पिता दर पिता’ कहानी में इसे बखूबी दर्शाया है। कहानी की नायिका एनी विवाह को स्‍त्री के स्‍वतंत्र अस्तित्‍व के लिए हानिकारक मानती हुई कहती है, ‘विवाह का अर्थ खुद को समाप्‍त करना है।’3

बाजार के प्रभाव में सबसे पहले नगर ही आए। नगर से ही नई सोच का प्रसार शुरू हुआ। नौवें दशक के पहले तक टेलीविजन सिर्फ महानगर तक ही सीमित था। प्रचार का सबसे बड़ा माध्‍यम रेडियो था और दृश्‍य श्रव्‍य के रूप में सिनेमा। ऐसे में दबे पांव नई धारणाएं और विचार कस्‍बों तक पहुंचे। नगरों में नए-नए बोधों का जन्‍म हुआ। भैरू लाल गर्ग ने इस संबंध में लिखा है- ‘आधुनिकता, परंपरा से मुक्ति के लिए प्रयत्‍न, कृत्रिम जीवन प्रणाली, कालाबाजारी, अनैतिकता, काम की उग्रभूख, जीवन मूल्‍यों और जीवन दृष्टि में तीव्र परिवर्तन, संबंधों में परिवर्तन, प्राचीनता और नवीनता के मध्‍य संघर्ष, अपरिचय ऊब, अकेलापन, अविश्‍वास, फिट न होने की स्थिति, क्षण बोध, स्‍त्री-पुरुष का जूझना और अंत में टूटना, दिग्‍भ्रम आदि स्थितियों का प्रादुर्भाव हुआ है।’4

हिंमाशु जोशी की कहानी ‘कोई एक मसीहा’ में आजाद भारतीय राजनीतिक का चेहरा सामने रखा गया है। जनता के प्रतिनिधि सुरेश भाई आश्रम का निरीक्षण करने पहुंचे हैं। उनका ध्‍यान वहां की सुंदर कन्‍याओं पर है। आश्रम की संचालिका उनकी सेवा में सावित्री नाम की लड़की को भेज देती है। सुरेश भाई सावित्री को भी शराब पिलाते हैं और रात भर उसकी सेवा लेते हैं। सुबह जब जाने लगते हैं तो उसे खादी की धोती पुरस्‍कार में देने के लिए कह जाते हैं।5

गिरिराज किशोर की कहानी ‘मंत्रीपद’ में नेताओं के स्‍वार्थ को उजागर किया गया है। कहानी के पंडित भूतपूर्ण मंत्री और मौजूदा सांसद हैं। यह नेता बातें तो आदर्श की करते हैं, लेकिन व्‍यवहार में अत्‍यंत कुटिल हैं। पंडित जी कहते हैं, ‘बड़ा दुख होता है। मंत्री लोग शाहों में नौकरशाह हैं। जनतंत्र में नौकरशाह ही सबसे बड़ा शाह होता है। बाकी तो सब गुलाम हैं। वे लोग जनता चुने गए प्रतिनिधियों जैसा व्‍यवहार नहीं करते। उनका जनता से कोई संपर्क नहीं है। इनका तामझाम राजकुमारों वाला है। गांधी जी की आत्‍मा क्‍या कहती होगी। क्‍या मैंने इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पटेल की आत्‍मा रोती होगी। जब राजकुमारों को रहना ही था तो बेकार ही मैंने उन कदमी राजवाड़ों का खात्‍मा किया। धत्‍त तेरी की।’

गिरधर गोपाल की कहानी ‘मुझे बचाओ’ में स्‍वतंत्रता के बाद के भ्रष्‍टाचार का चित्रण किया गया है। सोमेश एक ईमानदार नागरिक है और आजादी की लड़ाई लड़ता है। देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को देखकर सोमेश कहता है, ‘यहां आदमी इतना गिर चुका है कि थोड़े से लाभ के लिए देश का बड़े से बड़ा अहित करने में उसे शर्म नहीं आती। ईमान बेच सकता है और ईमान खरीद सकता है।’ स्थिति को देख सोमेश कहता है, ‘खादी और गांधी टोपी भ्रष्‍टाचार की ध्‍वजा बन गई है।’

इन कहानियों में जिस समाज और जिस राजनीतिक, प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की तस्‍वीर को कहानीकारों ने समाज के सामने पेश किया है, वह उसका यथार्थवादी चेहरा है। यह पूरी व्‍यवस्‍था बाजार में खड़े सक्षम खरीदार और अक्षम खरीदार के बीच के भेद को स्‍पष्‍ट करता है। सच तो यही है कि आजादी के बाद बाजार में हेराए गांधीवाद को हिंदी कहानी ने परखा और पेश किया है।

संदर्भ संकेत

1 संपादक योगेंद्र कुमार (लल्‍ला) : श्रीकृष्‍ण, हिंदी लेखिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां (कहानी संग्रह), राष्‍ट्रभाषा प्रकाशन 1991, पृष्‍ठ 38
2 गोविंद मिश्र, कचकौंध, सारिका 1972
3 रमेश बक्षी, पिता दर पिता, रूपांबरा प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971, पृष्‍ठ 24
4 भैरू लाल गर्ग, स्‍वातंत्र्योत्‍तर हिंदी कहानी में सामाजिक परिवर्तन, चित्रलेखा प्रकाशन, 1979
5 हिंमाशु जोशी, चर्चित कहानिया, कोई एक मसीहा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली

साभार : अभि‍मत

शिक्षा किसलिए है? : डेविड ओर

आधुनिक शिक्षा की नींव के छह भ्रम, और उन्हें बदलने के लिए छह नए सिद्धांत

डेविड ओर

हम सीखने को अपने-आप में अच्छा मानने के आदी हैं। मगर जैसा पर्यावरण शिक्षक डेविड ओर बताते हैं, हमारी अब तक की शिक्षा ने एक तरह से एक दानव को पैदा किया है. यह निबंध उनके 1990 में अरकांसस कॉलेज के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को दिए गए वक्तव्य में से लिया गया है। इसे पढ़कर हमारे ऑफिस में कई लोगों को लगा कि ऐसे भाषण कॉलेज जीवन की शुरूआत के बजाय आखिर में क्यों कराए जाते हैं।

डेविड ओर मीडोक्रीक प्रोजेक्टके संस्थापक हैं, जो फॉक्स, एरिज़ोना, में एक पर्यावरण शिक्षा केंद्र है, और वे ओहायो के ओबर्लिन कॉलेज में शिक्षक भी हैं। आर्क इंटरनेशनल के त्रैमासिक पत्र ऐनल्स ऑफ़ अर्थ, वॉल्यूम VIII, नं. 2 से पुनर्प्रकाशित-

अगर आज पृथ्वी का कोई औसत दिन है, तो आज हम 116 वर्ग मील वर्षावन खो देंगे, यानी लगभग एक एकड़ प्रति सेकंड। इंसानों के कुप्रबंधन और अत्यधिक जनसंख्या के कारण बढ़ते हुए रेगिस्तानों के सामने हम 72 वर्ग मील वन और खो देंगे। आज हम 40 से 100 प्रजातियां खो देंगे, और कोई नहीं जानता है कि यह संख्या 40 है या 100। आज इंसानों की आबादी में 2,50,000 लोग और जुड़ जाएंगे। और आज हम 2,700 टन क्लोरोफ्लोरोकार्बन और डेढ़ करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में डाल देंगे। आज रात पृथ्वी थोड़ी और गर्म हो जाएगी, इसका पानी थोड़ा और अम्लीय हो जाएगा, और जीवन का ताना-बाना थोड़ा और उधड़ जाएगा।

सच तो यह है कि ऐसी अधिकांश चीजें गंभीर खतरे में हैं, जिन पर आपके भविष्य का स्वास्थ्य और सम्पन्नता टिके हैं- पर्यावरणीय स्थिरता, प्राकृतिक तंत्रों की सहनशीलता और उत्पादकता, प्राकृतिक जगत की सुन्दरता, और जैव विविधता।

ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कुछ अनपढ़ अज्ञानी लोगों का करा-धरा नहीं है। यह अधिकांशतः BA, BS, LLB, MBA जैसी ऊंची डिग्रियों वाले लोगों की करतूतों का परिणाम है। पिछले साल मोस्को के ग्लोबल फोरम में एली वीसल ने ऐसा ही कुछ कहा था, जब उन्होंने कहा कि नाज़ी होलोकॉस्ट की क्रूरता के योजनाकार और कर्ता, इमैनुएल कांट और योहान गेटे जैसे लोगों की धरोहर के उत्तराधिकारी थे। कई मामलों में जर्मन लोग दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षित लोगों में से थे, मगर उनकी शिक्षा उनकी बर्बरता को रोकने में नाकाम रही। उनकी शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? वीसल के शब्दों में, उनकी शिक्षा में “मूल्यों के बजाय थ्योरी की ज्यादा अहमियत थी, मनुष्यों के बजाय अवधारणाओं की, प्रश्नों के बजाय उत्तरों की, और विवेक के बजाय विचारधारा और कार्यक्षमता की।”

हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक जगत के बारे में हमारी शिक्षा ने हमें भी ऐसा ही सोचने का आदी बनाया है। यह कोई मामूली बात नहीं है कि इस ग्रह पर लम्बे समय तक सामंजस्य और स्थिरता से रहने वाले लोग पढ़ नहीं सकते थे, या कम-से-कम पढ़ने की हवस नहीं रखते थे। मेरा कहने का तात्पर्य इतना है कि शिक्षा अपने आप में सभ्यता, बुद्धिमता या विवेक नहीं देती है। इसी तरह की शिक्षा जारी रखने से हमारी समस्याएं बढ़ने वाली ही हैं। मैं अज्ञानता की वकालत नहीं कर रहा हूं, बल्कि यह कह रहा हूं कि अब हमें शिक्षा का मोल सभ्य समाज के निर्माण और मनुष्यों के बचे रहने के पैमानों पर नापना होगा- 1990 और इसके बाद के दशकों में हमारे सामने मौजूद ये दो सबसे बड़े मुद्दे हैं।

सही साधन, वहशी उद्देश्य

आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? साहित्य में कुछ उत्तर मिलता है-  क्रिस्टफर मार्लो का फॉस्ट, जो ज्ञान और शक्ति पाने के लिए अपनी आत्मा बेच देता है; मैरी शेली का डॉक्टर फ्रेंकेंस्टाइन, जो अपने सृजन की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देता है; हर्मन मेलविल का कैप्टेन अहाब जो कहता है- “मेरे सारे साधन सही हैं, मेरी मंशा और उद्देश्य वहशी हैं।” इन पात्रों में हम आधुनिक समाज की प्रकृति को जीत लेने की उन्मादी हवस दिखती है।

ऐतिहासिक रूप से, फ्रांसिस बेकन ने ज्ञान और शक्ति का जो समागम सुझाया था, वह आज की सरकारों, उद्योगों और ज्ञान की मिलीभगत का पूर्व-सूचक था जिसकी वजह से इतना विनाश हुआ है। गैलिलीयो का बुद्धिमता को ऊंचा स्थान दिलाना विश्लेषक दिमाग का रचनात्मकता, हास्य और आतंरिक पूर्णता पर हावी होने का पूर्व-सूचक था। और देकार्ते की ज्ञानमीमांसा में स्वयं और वस्तु के जबरदस्त अलगाव की जड़ें दिखती हैं। इन तीनों ने मिलकर आधुनिक शिक्षा की नींव रखी, ऐसी नींव जो उन भ्रमों का हिस्सा बन चुकी है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वीकार कर चुके हैं। मैं ऐसे छह भ्रम बताऊंगा।

पहला भ्रम यह है कि अज्ञानता की समस्या सुलझाई जा सकती है। अज्ञानता की समस्या सुलझाई नहीं जा सकती है, बल्कि यह मानवीय अस्तित्व का अभिन्न अंग है। ज्ञान की बढ़ोतरी अपने साथ हमेशा किसी दूसरे तरह की अज्ञानता भी बढ़ाती है। 1930 में जब टॉमस मिज्ले जूनियर ने CFC खोजे, तो अभी तक जो सिर्फ एक मामूली अज्ञानता थी, अब वह मनुष्य की जीवमंडल (biosphere) के बारे में समझ की एक बेहद गंभीर और घातक कमी के रूप में उभरी। 1970 की शुरूआत तक किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि “यह पदार्थ किस चीज को कैसे प्रभावित करता है?” और 1990 तक CFC से वैश्विक स्तर पर ओजोन परत पतली हो चुकी थी। CFC की खोज की वजह से हमारा ज्ञान बढ़ा; मगर एक फैलते हुए वृत्त की परिधि की तरह हमारी अज्ञानता भी बढ़ी।

दूसरा भ्रम यह है कि पर्याप्त ज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ हम पृथ्वी का प्रबंधन कर सकते हैं। “पृथ्वी का प्रबंधन करना” सुनने में बहुत अच्छा लगता है। यह हमारे कंप्यूटर, बटनों और गैजेटों के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है। मगर पृथ्वी और इसके जैविक तंत्रों की जटिलता का कभी भी सुरक्षित प्रबंधन नहीं किया जा सकता है। हमें तो अभी ऊपरी मिट्टी के सबसे ऊपरी इंच की पारिस्थिकी (ecology) के बारे में ही ज्यादा कुछ नहीं पता है, और ना ही इसका जीवमंडल के विशाल तंत्रों के साथ सम्बन्ध के बारे में।

अगर किसी चीज का प्रबंधन किया जा सकता है तो वह हम  हैं: मानवीय इच्छाएं, आर्थिकी, राजनीति, और समुदाय। मगर राजनीति, नैतिकता और व्यावहारिक बुद्धि जो कठिन विकल्प सुझाते हैं, हम उनसे आंखें चुराते रहते हैं। यह कहीं ज्यादा बुद्धिमता भरा है कि हम खुद को एक सीमित ग्रह के अनुरूप ढाल लें। बजाय कि इस ग्रह को अपनी असीमित इच्छाओं के अनुरूप बदलें।

तीसरा भ्रम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है और इसके साथ मानवीय अच्छाई भी बढ़ रही है। अभी एक सूचना क्रान्ति हो रही है, जिससे मेरा तात्पर्य है डाटा, शब्द, कागज़ से। मगर इस सूचना क्रान्ति को ज्ञान या विवेक की क्रान्ति मानना बेवकूफी होगा, जिसे इतनी आसानी से नापा नहीं जा सकता है। सच तो यह है कि कुछ प्रकार का ज्ञान बढ़ रहा है और दूसरे प्रकार का ज्ञान खो रहा है। डेविड एहरन्फील्ड ने बताया है कि जीव विज्ञान विभाग अब वर्गीकरण-विज्ञान (taxonomy) और पक्षी-विज्ञान में नए लोगों को नहीं ले रहा है। यानी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग, जो आकर्षक हैं मगर ज्यादा जरूरी नहीं, उन पर अत्यधिक जोर के कारण दूसरे तरह का महत्वपूर्ण ज्ञान खो रहा है। हमारे पास अभी भी भूमि स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरी विज्ञान नहीं है, जिसका आह्वान अल्डो लियोपोल्ड ने आधी सदी पहले किया था।

हम केवल कुछ ही क्षेत्रों में ज्ञान नहीं खो रहे हैं, बल्कि समुदायों का पारंपरिक ज्ञान भी खो रहे हैं। बैरी लोपेज़ के शब्दों में:-

“मैं यह निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हो रहा हूं कि अगर खतरनाक नहीं तो कुछ अजीब जरूर हो रहा है। साल-दर-साल जमीनी अनुभव रखने वाले लोगों की संख्या घट रही है। ग्रामीण लोग शहर पलायन कर रहे हैं… यह व्यक्त कर पाना मुश्किल है, पर व्यक्तिगत और स्थानीय ज्ञान के पतन के इस दौर में, वह ज्ञान जिस पर वास्तविक समुदाय टिका होता है और जिस पर आखिरकार एक देश को खड़ा होना होता है, बहुत खतरनाक और असहज होता जा रहा है।”

सूचना और ज्ञान की इस भ्रान्ति में एक गहरी भूल छुपी हुई है, जो यह है कि ज्यादा सीखने से हम बेहतर इंसान बन जाएंगे। मगर सीखना, जैसा लोरेन ईज़्ली ने एक बार कहा था, अंतहीन है और “यह अपने-आप हमें ज्यादा नैतिक इंसान नहीं बना पाएगा1” आखिर में, बाकी सभी क्षेत्रों में हमारे विकास के कारण सबसे ज्यादा खतरा अच्छाई की हमारी समझ को है। सभी चीजों को मद्देनजर रखते हुए यह संभव है कि हम लोग ऐसी चीजों के बारे में अज्ञानी होते जा रहे हैं जो पृथ्वी पर सामंजस्य और स्थिरता से जीने के लिए जरूरी हैं।

उच्च शिक्षा का चौथा भ्रम है कि हम जो कुछ भी बिगाड़ चुके हैं, उसे फिर से पर्याप्त रूप से बहाल किया जा सकता है। आधुनिक पाठ्यक्रम में हमने प्रकृति को अलग-अलग अकादमिक विशेषज्ञताओं के टुकड़ों में बांट दिया है। इसलिए 12, 16 या 20 साल की शिक्षा के बाद अधिकतर छात्र सभी चीजों की परस्पर एकता की मोटी-मोटी समझ बनाए बिना ही स्नातक हो जाते हैं। उनके व्यक्तित्व और इस ग्रह के लिए इसके बहुत भीषण परिणाम होते हैं। उदहारण के लिए, हम लगातार ऐसे अर्थशास्त्री पैदा करते हैं जिन्हें पारिस्थिकी की बुनियादी जानकारी भी नहीं होती है। इससे पता चलता है कि क्यों हमारे राष्ट्रीय आर्थिक लेखा-जोखा तंत्र में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (gross national product- GNP) से जैविक क्षति, भू-क्षरण, वायु-जल प्रदूषण, और संसाधनों का दोहन घटाया नहीं जाता है। हम 25 किलोग्राम गेहूं की कीमत तो GNP में जोड़ते हैं, लेकिन उसको उगाने में जो 75 किलोग्राम मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हुई है, उसे घटाना भूल जाते हैं। ऐसी अपूर्ण शिक्षा के कारण हमें लगता है कि हम दिन-ब-दिन संपन्न होते जा रहे हैं।

पांचवा भ्रम यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आपको समाज में अपनी हैसियत ऊपर उठाना और सफल होने के औजार देना है। टॉमस मर्टन ने कहा था कि यह “ऐसे लोगों का व्यापक उत्पादन है जो कुछ भी करने लायक नहीं है, सिवाय एक विस्तृत और पूर्ण रूप से कृत्रिम ढोंग में भाग लेने के।” जब मर्टन से उनकी सफलता के बारे में लिखने को कहा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “अगर मैंने कभी कोई सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी तो यह एक दुर्घटना मात्र थी, मेरी लापरवाही और अबोधता के कारण, और मैं बहुत ध्यान रखूंगा कि ऐसी गलती दोबारा न हो।” छात्रों को उनकी सलाह थी, “तुम जो बनना चाहते हो बनो, पागल, शराबी, हर किस्म का लफंगा, मगर एक चीज से हर कीमत पर दूर रहना: सफलता।”

सीधी सी बात यह है कि इस ग्रह को ज्यादा ‘सफल’ लोग नहीं चाहिए. मगर इसे शांतिदूतों, जख्म भरने वालों, पुनर्वास करने वालों, कहानियां सुनाने वालों, और हर किस्म के आशिकों की जरूरत है। इसे जरूरत है ऐसे लोगों कि जो जहां भी रहते हैं, अच्छे से रहना जानते हैं। इसे नैतिक साहस वाले ऐसे लोगों की जरूरत है जो इस दुनिया को मानवीय और रहने लायक बनाने की लड़ाई में हिस्सा लेने को राजी हैं। और ये सारी चीजें उस सब से कोसों दूर हैं, जिसे हमारी संस्कृति ‘सफलता’ मानती है।

आखिर में, हमें भ्रम है कि हमारी संस्कृति मानवीय उपलब्धि का चरम बिंदु है:- केवल हम ही आधुनिक, तकनीक-विज्ञ, और विकसित हैं। जाहिर है कि यह सांस्कृतिक घमंड का सबसे घटिया स्वरूप है, और साथ ही इतिहास और मानव-शास्त्र की गलत समझ भी। हाल ही में इस घमंड ने नया रूप ले लिया है- ‘हमने शीत युद्ध जीत लिया है और पूंजीवाद ने साम्यवाद को पूर्ण रूप से हरा दिया है।’ साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि वह बहुत अधिक कीमत पर बहुत कम उत्पादन करता था। मगर पूंजीवाद भी असफल ही है, क्योंकि यह यह बहुत ज्यादा उत्पादन करता है, बहुत कम बांटता है, और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों की पीढ़ियों से बहुत बड़ी कीमत वसूलता है। साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसमें अभाव की नैतिकता थी। पूंजीवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि यह नैतिकता को ही समाप्त कर देता है। यह वह हसीन दुनिया नहीं है जो गैर-जिम्मेदार विज्ञापन निर्माता या राजनेता हमें दिखाते हैं। हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति है और बढ़ती हुई गरीब आबादी के पास भीषण विपन्नता है1 अपने सबसे वीभत्स रूप में यह दुनिया गलियों में पसरे नशे, अतृप्त हिंसा, अनैतिकता और सबसे विकराल तरह की गरीबी से भरी हुई है। सच तो यह है कि हम एक बिखरती हुई संस्कृति में जी रहे हैं. ‘होलिस्टिक रिव्यु’ के संपादक रॉन मिलर के शब्दों में:-

“हमारी संस्कृति मनुष्यों की अच्छाई और उत्कृष्टता का पोषण नहीं करती है। यह दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता, सौन्दर्यबोध या आध्यात्मिक संवेदना विकसित नहीं करती है। यह कोमलता, उदारता, दूसरों का ख्याल रखना और करुणा प्रोत्साहित नहीं करती है। बीसवीं सदी का अंत आते-आते आर्थिक-तकनीकी-सांख्यिकीवादी नजरिया बड़ी क्रूरता से इंसानों में वह सब कुछ नष्ट कर रहा है जो प्रेमपूर्ण और जीवनदायी है।”

शिक्षा किसलिए होनी चाहिए

इंसानी जीवन संजोए रखने के उद्देश्य से, हम शिक्षा पर पुनर्विचार कैसे कर सकते हैं? मैं छह सिद्धांत सुझा रहा हूं-

पहला, सारी शिक्षा पार्यावरण शिक्षा है। हम शिक्षा में क्या शामिल करते हैं और क्या नहीं, इससे हम छात्रों को यह सिखाते हैं कि वे प्राकृतिक जगत हिस्सा हैं या उससे अलग. उदहारण के लिए, ऊष्मागतिकी (thermodynamics) या पारिस्थिकी के नियमों को सिखाए बिना अर्थशास्त्र पढ़ाने से छात्रों को एक महत्वपूर्ण बुनियादी सीख मिलती है:- कि भौतिकी और पारिस्थिकी का अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। यह साफ़ तौर पर गलत है।1 यही बात पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर भी लागू होती है। दूसरा सिद्धांत ग्रीक अवधारणा पाइडेआ (paideia) से आता है। शिक्षा का उद्देश्य विषय-वस्तु पर नहीं, बल्कि स्वयं पर महारथ पाना है। विषय-सामग्री तो साधन मात्र है। जिस तरह हथौड़ी और छेनी से कोई व्यक्ति पत्थर या लकड़ी को आकार देता है, उसी तरह विचारों और ज्ञान को हम अपना चरित्र ढालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर समय हम साधन और साध्य में भ्रमित रहते हैं, और यह सोचते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ छात्र के मस्तिष्क में हर तरह के तथ्य, सूचना, पद्धतियां, तरीके ठूंसना है, भले ही इनका इस्तेमाल किसी भी उद्देश्य के लिए किया जाए। ग्रीक इस बारे में बेहतर समझ रखते थे।

तीसरा, ज्ञान अपने साथ यह जिम्मेदारी भी लेकर चलता है कि संसार में उसका उपयोग भले उद्देश्यों के लिए किया जाएा आज किए जाने वाले अधिकांश शोध मैरी शेली के उपन्यास जैसे हैं: तकनीक-जनित दानव जिनके लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है और न किसी से जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है। लव कैनाल किसकी जिम्मेदारी है? चर्नोबिल? ओजोन का क्षरण? वैल्डेज़ तेल रिसाव? इनमें से हर त्रासदी इसलिए संभव हुई क्योंकि ऐसे ज्ञान का सृजन किया गया था जिसके लिए आखिरकार कोई भी जिम्मेदार नहीं था। अंततः इन्हें ‘बड़े पैमाने के उत्पादन से उपजी स्वाभाविक समस्या’ की नज़रों से देखा जाएगा। बेहद विशाल और जोखिम भरी परियोजनाओं को करने का ज्ञान हमारा उन्हें जिम्मेदारी से क्रियान्वित करने की क्षमता को पछाड़ चुका है। इसमें कुछ ज्ञान तो ऐसा है जो जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता है, यानी उसे सुरक्षित तरीके से और निरंतर भले उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

चौथा, हम तब तक यह नहीं कह सकते हैं कि हम कुछ समझते हैंजब तक हम उसका वास्तविक इंसानों और और उनके समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को नहीं समझते हैं। मैं ओहायो के यंग्सटाउन शहर के नज़दीक बड़ा हुआ, जिसे मुख्य रूप से उद्योगों द्वारा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में निवेश न करने के निर्णय ने तबाह कर दिया। खरीद-बिक्री, कर छूट, पूंजी संचलन के दांव-पेंच में पारंगत MBA पढ़े लोगों ने वह कर दिखाया जो कोई आक्रमणकारी सेना भी नहीं कर सकती थी:- उन्होंने अपने मुनाफे की ‘बॉटम लाइन’ के खातिर एक अमरीकी शहर को पूरी कानूनी छूट के साथ तबाह कर दिया। मगर एक समुदाय को इस बॉटम लाइन की दूसरी कीमतें चुकानी पड़ती हैं, बेरोज़गारी, अपराध, बढ़ते तलाक, नशाखोरी, बाल उत्पीड़न, गवांई हुई बचत, और बर्बाद जिंदगियां। इस वाकिये में हम देख सकते हैं कि प्रबंधन कॉलेजों और अर्थशास्त्र विभागों ने इन छात्रों को जो सिखाया, उसमें अच्छे मानव समुदायों का मूल्य पहचानना शामिल नहीं था, और न ही कार्यक्षमता और अमूर्त आर्थिक अवधारणाओं को इंसानों और समुदायों से ज्यादा अहमियत देने वाली संकीर्ण आर्थिक नीति से उपजने वाली मानवीय त्रासदी की कीमत पहचानना।

मेरा पांचवा सिद्धांत विलियम ब्लेक से प्रेरित है। यह है बारीकियों पर ध्यान देना और शब्दों के बजाय कर्म से उदहारण पेश करना। छात्रों को वैश्विक जिम्मेदारी के पाठ पढ़ाए जाते हैं, जबकि उनके संस्थान खुद बहुत गैर जिम्मेदाराना चीजों में निवेश करते हैं। जाहिर है कि वास्तविकता में इससे छात्रों को पाखण्ड और अंततः निराशा का पाठ पढ़ाया जाता है। बिना किसी के बताए छात्र यह जान जाते हैं कि वे आदर्शों और यथार्थ के बीच की गहरी खाई पाट पाने में असहाय हैं। ऐसे शिक्षकों और प्रबंधकों की बेहद जरूरत है जो सत्यनिष्ठा, विवेक व संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करें और ऐसी संस्थानों की भी जो अपने हर कार्य में इन आदर्शों को जीएं।

आखिर में, सीखने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विषय-वस्तु. सीखने की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है। व्याख्यान की शैली में पढ़ाए गए विषयों से निष्क्रियता पैदा होती है। बंद कमरों में पढ़ते रहने से यह भ्रम पैदा होता है कि सीखना केवल चहारदीवारी के अन्दर होता है, उस संसार से कटकर जिसे हास्यास्पद तरीके से छात्र “वास्तविक दुनिया” कहते हैं। मेंढक का डाइसेक्शन करने से छात्र वह सीखता है जो कितने भी शब्द कहकर नहीं सिखाया जा सकता है। संस्थानों की बनावट भी अक्सर निष्क्रियता, संवाद-शून्यता, दमन और कृत्रिमता का भाव उपजती है। मेरा तात्पर्य है कि छात्र विषय-वस्तु के अलावा भी कई सारी चीजों से सीखते हैं।

आपके संस्थान के लिए एक असाइनमेंट

अगर शिक्षा को सामंजस्य और स्थिरता के पैमानों पर नापा जाए, तो क्या किया जा सकता है? सबसे पहले मैं यह प्रस्ताव रखना चाहूंगा कि आप परिसर-स्तर पर एक संवाद शुरू करें कि आप शिक्षक के रूप में अपना काम किस तरह से कर रहे हैं। क्या आपके संस्थान में चार साल बिताने के बाद आपके छात्र बेहतर वैश्विक नागरिक बन रहे हैं या वे, वेन्डेल बेरी के शब्दों में, “पेशेवर घुमंतू गुंडे” बन रहे हैं? क्या यह कॉलेज एक स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान दे रहा है, या कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर विनाश के चक्र बढ़ा रहा है?

मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि आप इस परिसर में संसाधनों के प्रवाह का निरीक्षण कीजिए:- भोजन, ऊर्जा, पानी, सामान, और कचरा। शिक्षक और छात्र साथ-साथ उन कुंओं, खदानों, खेतों, गोदामों, पशुबाड़ों, और जंगलों का अध्ययन करें जहां से परिसर में सामान आता है और उन जगहों का भी जहां यहां से कचरा भेजा जाता है। सामूहिक रूप से प्रयास कीजिए कि इस संस्थान की खरीद कैसे उन विकल्पों से की जाए जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करते हैं, जहरीले पदार्थों का कम उपयोग करते हैं, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करते हैं व सौर ऊर्जा उपयोग में लाते हैं, स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान देते हैं, दीर्घकालीन लागत कम करते हैं, और दूसरे संस्थानों के लिए उदाहरण पेश करते हैं। फिर इन अध्ययनों की खोजों को पाठ्यक्रम में अलग-अलग विषयों, सेमिनारों, व्याख्यानों, और शोधों में शामिल करें। कोई भी छात्र यहां से न निकले जिसे संसाधनों के प्रवाह का विश्लेषण करना न आता हो और जिसने वास्तविक समस्याओं के वास्तविक समाधान खोजने में हिस्सा न लिया हो।

तीसरा, पुनर्विश्लेषण करें कि आपका संस्थान अपना पैसा कहां लगा रहा है। क्या आपका निवेश वैल्डेज़ के सिद्धांतों के अनुसार हो रहा है? क्या यह उन कंपनियों में लग रहा है जो ऐसे काम कर रही हैं जिनकी दुनिया को वाकई जरूरत है? क्या इसका कुछ हिस्सा स्थानीय तौर पर निवेश किया जा सकता है ताकि इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और स्थिर अर्थव्यवस्था विकसित हो सके?

आखिर में, मैं सलाह दूंगा कि आप अपने सभी छात्रों के लिए पर्यावरण साक्षरता के लक्ष्य निर्धारित करें। इस या किसी भी अन्य संस्थान से एक भी छात्र ऐसा नहीं निकलना चाहिए जिसे इन चीजों की बुनियादी समझ न हो-

  • ऊष्मागतिकी के नियम
  • पारिस्थिकी के बुनियादी नियम
  • किसी तंत्र की वहनक्षमता (carrying capacity)
  • भौतिक, रासायनिक और जैविक तंत्रों के ऊर्जा सम्बन्ध और परिवर्तन (energetics)
  • न्यूनतम लागत और अंतिम-उपयोग (end–use) विश्लेषण
  • किसी स्थान में अच्छे से रहना
  • टेक्नोलॉजी की सीमाएं
  • उचित स्तर पर उत्पादन और विस्तार (appropriate scale)
  • सामंजस्यपूर्ण कृषि और वानिकी
  • स्थिर-स्तर अर्थशास्त्र (steady-state economics), जिसमें उत्पादन के हर कदम पर ऊर्जा और सामान के न्यूनतम उपयोग के जरिए संसाधनों और जनसख्या को एक स्थिर स्तर पर सीमित रखा जाता है
  • पर्यावरण सम्बन्धी नैतिकता

क्या इस संस्थान के स्नातक यह समझते हैं, जैसा अल्डो लियोपोल्ड ने कहा था, कि “वे एक विशाल पारिस्थिकी तंत्र का छोटा सा हिस्सा भर हैं; अगर वे इस तंत्र के साथ काम करेंगे तो वे अपनी मानसिक और भौतिक सम्पदा में असीमित बढ़ोतरी कर पाएंगे, और अगर वे इसके खिलाफ जाएंगे तो यह तंत्र उन्हें कुचल डालेगा”?

लियोपोल्ड ने पूछा था, “अगर शिक्षा हमें ये चीजें नहीं सिखाती, तो फिर शिक्षा किसलिए है?”

अनुवाद- आशुतोष भाकुनी

स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

गिरगिट : अन्तोन चेखव

अन्तोन चेखव

पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़बेरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।…चौक में एक भी आदमी नहीं। ….भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
“अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!” ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, “पकड़ तो लो, छोकरो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ…आह!”
कुत्ते की कि‍कि‍याने की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकड़ने की कोशिश में गिरते-गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते के कि‍कि‍याने और वहीं चीख- ‘जाने न पाये!’ दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
“हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!” सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो, “अरे बदमाश!” और उसकी उँगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचोंबीच अगली टांगें फैलाये अपराधी, सफेद ग्रेहाउँड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू-भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
“यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?” आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। “यह उॅँगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?”
“हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,” खूकिन ने अपने मुँह पर हाथ रखकर, खाँसते हुए कहना शुरू किया, “मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मरी उँगली में काट लिया।..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा,… और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचीदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उँगुली काम के लायक न हो पायेगी। कुछ  मुझे हर्जाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें।..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।”

“हुंह..अच्छा..” ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “ठीक है।…अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूँगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाऊँगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूँगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूँगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डंगर को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अक्‍ल दुरुस्त कर दूँगा, येल्दीरिन!”

सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, “पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा।…मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?”
“शायद जनरल जिगालोव का हो!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“जनरल जिगालोव का? हुँह…येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है।…मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नही आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?” ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, “यह तुम्हारी उँगली तक पहुंचा कैसे? यह ठहरा छोटा-सा जानवर और तुम हो पूरे लम्बे-चौड़े। किसी कील-वील से उँगली छील ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!”
“इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!”
“अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। और अगर मैं झूठा हूँ तो अदालत में फैसला करा लो। कानून में लि‍खा है… अब हम सब बराबर हैं। खुद मेरा भाई पुलिस में है..बताये देता हूं….हाँ…।”
“बंद करो यह बकवास!”
“नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है।” सिपाही ने गंभीरतापूर्वक कहा, “उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।”
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“जी सरकार।”
“मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं। एक-से-एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह तो बिल्कुल ऐसा-वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्‍को या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या हो? कानून की परवाह  किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो।…इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।”
“लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो।” सिपाही बड़बड़ाया, “इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।”
“हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!” भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
“हुँह।…येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सर्दी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैने इस सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हॉँ, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुँह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उँगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।”
“यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये।…ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?”
“वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!”
“इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है,” ओचुमेनलोव ने कहा, “आवारा कुत्ता है। यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?’’
“हमारा तो नहीं है।” प्रोखोर ने फिर आगे कहा, “यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्रेहाउँड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।”
“क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?” अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। “जर सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?”
“हां।”
“वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा-सा मुन्ना-सा कुत्ता है। इसकी उँगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपों मत। गुर्र…गुर्र…शैतान गुस्से में है… कितना बढ़िया पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
“मैं तुझे ठीक कर दूंगा।” ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबदा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

बुद्धिमत्ता आखि‍र है क्‍या : आइजैक एसिमोव

आइजैक एसिमोव ( 2 जनवरी 1920- 6 अप्रैल 1992)

जब मैं फौज में था, मैंने एक एप्टीट्यूड टेस्ट में हिस्सा लिया था। अमूमन सभी सैनिक इस टेस्ट को देते हैं। आम तौर पर मिलने वाले 100 अंकों की जगह मुझे 160 अंक मिले। उस छावनी के इतिहास में किसी ने भी अब तक यह कारनामा अंजाम नहीं दिया था। पूर दो घंटे तक मेरी इस उपलब्धि पर तमाशा होता रहा।

(इस बात का कोई ख़ास मतलब तो था नहीं। अगले दिन मैं फिर से उसी पुरानी और शानदार फौजी ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया- यानी लंगर की चौकीदारी!)

जीवन भर मैं इसी तरह शानदार अंक लाता रहा हूं। और एक तरह से खुद को तसल्ली देता रहा हूं कि बड़ा बुद्धिमान हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे लोग भी मेरे बारे में यही राय रखें।

वास्तव में ऐसे अंकों का लब्बो-लुआब यही है कि मैं इस तरह के अकादमिक प्रश्नों का जवाब देने में खासा अच्छा हूं, जो इस तरह की बुद्धिमत्ता परीक्षाएं लेने वाले लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। यानी मेरी ही तरह के बौद्धिक रुझान के लोग।

उदाहरण के लिए, मैं एक मोटर मैकेनिक को जानता था जो इन बुद्धिमत्ता परीक्षाओं में किसी भी हाल मेरे हिसाब से 80 से ज्यादा स्कोर नहीं कर सकता था। मैं मानकर चलता था कि मैं मैकेनिक से ज्यादा बुद्धिमान हूं।

लेकिन जब भी मेरी कार में कोई गड़बड़ी होती तो मैं भागकर उसके पास पहुंच जाता। बेचैनी से उसे गाड़ी की जांच करते हुए देखता और उसके निर्देशों को ऐसे सुनता जैसे कोई देववाणी हो और वह हमेशा मेरी गाड़ी दुरुस्त कर देता।

सोचिए अगर मोटर मैकेनिक को बुद्धिमत्ता परीक्षा का प्रश्नपत्र तैयार करने को कहा जाता।

या किसी अकादमिक को छोड़कर कोई बढ़ई, या कोई किसान इस प्रश्नपत्र को तैयार करते। ऐसी किसी भी परीक्षा में मैं पक्के तौर पर खुद को बेवकूफ साबित करता और मैं बेवकूफ होता भी।

एक ऐसी दुनिया में, जहां मुझे अपनी अकादमिक ट्रेनिंग और मेरी जुबानी प्रतिभा का इस्तेमाल करने की छूट न हो, बल्कि उसकी जगह कुछ जटिल-श्रमसाध्य करना हो और वह भी अपने हाथों से, मैं फिसड्डी साबित होऊंगा।  

इस तरह मेरी बुद्धिमत्ता, निरपेक्ष नहीं, बल्कि उस समाज का एक फलन है जिसमें मैं रहता हूं। और यह उस सच्चाई का भी नतीजा है जिसे समाज के एक छोटे से हिस्से ने खुद को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ बनाकर थोप दिया है।

आइए, एक बार फिर अपने मोटर मैकेनिक की चर्चा करें।

उसकी एक आदत थी- जब भी वह मुझसे मिलता तो मुझे चुटकुले सुनाता।

एक बार उसने गाड़ी के नीचे से अपना सर बाहर निकाल कर कहा: “डॉक्टर! एक बार एक गूंगा-बहरा आदमी कुछ कीलें खरीदने को हार्डवेयर की दुकान में गया। उसने काउंटर पर दो अंगुलियां खड़ी कीं और दूसरे हाथ से उन पर हथौड़ा चलाने का अभिनय किया।

“दुकानदार भीतर से हथौड़ा ले आया। उसने अपना सर हिलाया और उन दो अंगुलियों की ओर इशारा किया जिस पर वह हथौड़ा चलाने का उपक्रम कर रहा था। दुकानदार ने उसे कीलें लाकर दीं। उसने अपनी ज़रूरत की कीलें चुनीं और चला आया। इसी तरह डॉक्टर, अगला बंदा जो दुकान में आया, वह अंधा था। उसे कैंची की ज़रूरत थी। तुम्हारे हिसाब से उसने दुकानदार को कैसे समझाया होगा?”

उसकी बातों में खोए-खोए मैंने अपना दायां हाथ उठाया और अपनी पहली दो अंगुलियों से कैंची की मुद्रा बनाकर दिखाई।

इस पर मोटर मैकेनिक जोर-जोर से हंसते हुए बोला, “हे महामूर्ख, उसने अपनी आवाज़ इस्तेमाल की और बताया कि उसे कैंची चाहिए।”

फिर उसने बड़ी आत्मतुष्टि से कहा, “आज मैंने दिनभर अपने ग्राहकों से यही सवाल पूछा।”

“क्या तुमने काफी लोगों को इसी तरह बेवकूफ साबित किया?” मैंने पूछा।

“बहुत थोड़े”, वह बोला, “लेकिन तुम्हें तो मैंने बेवकूफ साबित कर ही दिया।”

“ऐसा क्यों हुआ?” मैंने पूछा.

“क्योंकि तुम बुड़बक पढ़े-लिखे हो डॉक्टर. मैं जानता हूं कि तुम ज्यादा स्मार्ट हो भी नहीं सकते।”

 मुझे कुछ बेचैनी महसूस हुई कि वह मेरे बारे में थोड़ा-बहुत जानता है। 

(रूस में जन्‍में प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक की आत्‍मकथा का एक अंश। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है।)

खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है  : महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

सोशल मीडि‍या का कैसे सार्थक प्रयोग कि‍या जा सकता है, इसकी बानगी कवि-शि‍क्षक महेश चंद्र पुनेठा का ‘बाखली’ के सपांदक गि‍रीश चंद्र पाण्‍डेय द्वारा लि‍या यह साक्षात्‍कार है। फेसबुक के माध्‍यम से हुई इस बातचीत में लेखन के लि‍ए समीक्षा अथवा आलोचना की भूमि‍का, दक्षि‍णपंथ व वामपंथ, साहित्य में ‘लोक’, छंदबद्ध और छंदमुक्त कवि‍ता, शि‍क्षण में दीवार पत्रि‍का की भूमि‍का आदि‍ वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर लंबी बातचीत हुई है-

मुख्यतया किसी पुस्तक की समीक्षा के पैरामीटर्स क्या होते हैं ?

बहुत कठिन सवाल है।

आपके लिए कठिन नहीं है।

इस पर तो आमने-सामने बैठकर ही चर्चा हो सकती है। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि किसी किताब में क्या खास है और उसकी क्या सीमाएं हैं? इन दोनों पक्षों को लेकर समीक्षा में बात होनी चाहिए।

खास किसके लिए?

खास का मतलब नया या मौलिक, समाज को आगे ले जाने के लिए। मानवता के पक्ष में भी कहा जा सकता है।समीक्षा ऐसे प्रश्न भी खड़े करती है जो नई बहस को जन्म देते हैं। समीक्षा किसी भी पहलू को देखने का समीक्षक का अपना पक्ष भी होती है।

समीक्षक सीमाएं किस मायने में तय करता है?

सीमाओं का मतलब उसकी नजर में कथ्य-विचार -शिल्प और भाषाई की दृष्टि से उसमें क्या कमी रह गयी हैं? क्या वह रचना कहीं मानवीय मूल्यों के विरोध में तो नहीं खड़ी है?उसकी पक्षधरता किसी ताकतवर के साथ तो नहीं है? वह यथार्थ को भ्रमित तो नहीं करती हैं? आदि।

बहुत सारे समीक्षक लेखक का चेहरा देखकर समीक्षा करते हैं या फिर ये कहूँ समीक्षा करते ही नहीं। ऐसा क्यों होता है?क्या ये उस लेखक और पुस्तक के साथ अन्याय नहीं?

बिलकुल यह समीक्षा का बहुत बड़ा संकट है। आज समीक्षा किसी को स्थापित या किसी को खारिज करने के लिए ही अधिक हो रही है।निश्चित रूप यह लेखक और पुस्तक के साथ ही नहीं, साहित्य और समाज के प्रति भी अन्याय है।खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है।

समीक्षा और छिद्रान्वेषण में अंतर को किस तरह समझा जा सकता है?

समीक्षा में समीक्षक पुस्तक की ताकत और कमजोरी दोनों बताता है और छिद्रान्वेषण में खोज-खोजकर कमियों को सामने रखता है। उसका उद्देश्य केवल रचना या रचनाकार की कमजोरियों को उजागर करना और उसे खारिज करना होता है।

क्या वाकई कोई समीक्षा या टिप्पणी पुस्तक को या लेखक को ऊंचा या नीचा स्तर दे सकती है। इसमें आपको कुछ घालमेल नहीं दि‍खता?

बिल्कुल देती ही है। लेखक को उठाती भी हैं और गिरा भी देती हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, जहाँ समीक्षा ने लेखक को सामने लाने का काम किया। और बहुत सारे उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां समीक्षा ने किसी रचनाकार के प्रति भ्रम फैलाकर पाठक के मन में उसकी गलत छवि प्रस्तुत करने का काम किया। क्योंकि सामान्य पाठक तो समीक्षक की कही बात को महत्वपूर्ण मानकर उसी अनुसार अपनी राय बनाता है।

क्या ये माना जाए कि‍ पुस्तक लिखने के बाद उसकी समीक्षा होना जरूरी है?

जरूरी जैसा तो कुछ नहीं है। लेकिन समीक्षा होने से नये पाठकों तक किताब की जानकारी पहुंचती है। वह अधिक पढ़ी जाती है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद रचनाकार को भी अपने लेखन की सीमाओं का पता चल पाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता है। विमर्श भी आगे बढ़ता है।

पुस्तक के शीर्षक और उसके अंतर्निहित तत्वों का तादात्म्य कैसे होना चाहिए। बहुत सारे शीर्षक रोचक होते हैं, पर तत्व उतना रोचक नहीं। इस पर आपका मन्तव्य?

केवल शीर्षक के रोचक होने से काम नहीं चलेगा। मुख्य बात तो किताब की विषयवस्तु ही है। उसे ताकतवर होना चाहिए। यदि उसमें दम नहीं है तो लिखना बेकार।

वर्तमान में हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे नाम जो समीक्षाकर्म वाकई निष्पक्ष होकर कर रहे हैं?

नाम बहुत सारे हैं, किस-किस के नाम लिये जाएं ? विशेषकर कुछ युवा बहुत उम्मीद जगाते हैं।

जितने नाम भी अभी सूझ रहे हों, बताएं।

दरअसल, नाम लेने में नाम छूटने का खतरा अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की पढ़ने और देखने की अपनी सीमा होती है। हम केवल उन्हीं का नाम ले सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि जो हमने पढ़ा हो वह सब महत्वपूर्ण ही हों और जिन्हें नहीं पढ़ पाए हैं, वे महत्वपूर्ण न हों। फिर एक व्यक्ति ने जितना पढ़ा होता है, उससे कई गुना उससे अपढ़ा छूट जाता है।

यानी आप उस खतरे से बचना चाहते हैं?

माना जा सकता है। अनावश्यक विवाद मुझे पसंद नहीं है।

आप भी समीक्षा कर्म और आलोचना से जुड़े रहे हैं।किन पुस्तकों की समीक्षा करते-करते आपने खुद के लेखन में परिवर्तन पाया है?

सीखना तो हर नई किताब पढ़ने के बाद होता ही है। हर नई किताब ने मेरे लेखन में कुछ न कुछ परिवर्तन किया,  भले ही वह एक कमजोर किताब ही क्यों न रही हो। उसने मुझे बताया कि अपने लेखन में किन बातों से बचना चाहिए। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, भगवत रावत, विजेंद्र, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि कवि-आलोचकों पर लिखते हुए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विशेषरूप से यह कि जनपक्षधरता, जीवन में ईमानदारी-सादगी, जन और प्रकृति से निकटता, जमीन व समाज से लगाव किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को कितना ऊंचा उठा देता है? इससे लेखन में कितनी गहराई और व्यापकता आ जाती है? मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी रचनाकार पर लिखने से पहले उनके लिखे को गहराई और विस्तार से जानूं-समझूं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ नया जानने-समझने को मिला।

आपने बड़ा सधा हुआ जबाब दिया है। इस सूची में कोई युवा तो नहीं दिख रहा।

युवाओं की एक लम्बी सूची है, जिन पर मैं निरंतर लिखता रहा हूँ। उतने नाम गिनाने यहाँ संभव नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर मित्रों के बार-बार आग्रह पर लिखा। इसको आप मेरी बेमानी भी कह सकते हैं। लेकिन यह मेरी कमजोरी रही है कि मैं मित्रों के आग्रह को नजरंदाज नहीं कर पाता हूँ। समीक्षा लिखने के चलते कुछ मित्रों के साथ संबंधों में खटास भी आई।

क्या उन युवाओं के साथ अन्याय नहीं होगा, नाम न लेकर?

अन्याय जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि‍ मेरे नाम लेने या न लेने से किसी के कद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है।

एक थोड़ा-सा अटपटा सा प्रश्‍न जिसे पूछ ही लेता हूँ। कोई ऐसा उदाहरण किसी युवा के लेखन में आपकी समीक्षा के बाद बदलाव देखा गया हो?

मैं एक अदना सा पाठक और पाठक की प्रतिक्रिया से किसी के लेखन में भला क्या परिवर्तन आएगा मित्रवर।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आपके लिखने या न लिखने से फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी समीक्षा परिवर्तन लाती है। इसे आपने खुद माना है।

वह समीक्षा लिखने वाले के व्यापक अनुभव और गहरी दृष्टि पर निर्भर करता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, न मेरे पास ऐसा कोई व्यापक अनुभव है और न ही कोई गहरी दृष्टि। मैं तो अभी खुद सीख रहा हूँ। साहित्य और समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

जब हम साहित्य में समीक्षा की बात करते हैं तो वाम और दक्षिण दो पक्ष प्रमुख रूप से मिलते हैं। दोनों पक्षों की समीक्षा में मूलभूत अंतर क्या दिखता है?

वाम और दक्षिणपंथ की समीक्षा में वही अंतर है, जो इन दोनों विचारधाराओं के जीवन दृष्टि और साहित्य में है। दरअसल, हम किसी भी रचना का मूल्यांकन अपनी जीवन दृष्टि के आधार पर ही करते हैं। दुनिया को हम कैसे देखते हैं और उसे कैसा बनाना चाहते हैं? इसी आधार पर हम हर क्षेत्र का अन्वेषण-विश्लेषण करते हैं। कोई रचना या समीक्षा कर्म भी इसका अपवाद नहीं है। दक्षिणपंथ यथास्थितिवादी और परम्परावादी होता है। वह परम्परा में ऊपरी सुधार कर उसे मूलरूप में ही बनाए रखना और आगे ले जाना चाहता है। अतीत के प्रति अति मोहग्रस्त रहता है। अतीत में उसे अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आती हैं। उसे पुरानी समाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और नियम-कानूनों से भी कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। पुराने जीवन मूल्यों को ही स्थापित और संरक्षित करना चाहता है। सामाजिक असमानता को भी जस्टीफाई करता है। इसके विपरीत वामपंथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करता है और परम्परा के उन्हीं मूल्यों को आगे ले जाने का समर्थन करता है, जो प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस होते हैं। साथ ही एक समतावादी समाज के निर्माण में सहायक होते हैं। जीवन के प्रति यही दृष्टि उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होता है। दोनों पक्ष समीक्षा के दौरान रचना में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुकूल मूल्यों की पड़ताल और उसका खंडन-मंडन करते हैं।

वैसे क्या एक प्रश्न नहीं उठता कि समीक्षा पक्ष की प्रतिपक्ष को करनी चाहिए। वो ज्यादा लोकतान्त्रिक होती?

तब तो प्रत्येक रचना खारिज ही होगी। कोई भी रचना कसौटी में फिट नहीं बैठेगी, क्योंकि हर विचारधारा की अपनी-अपनी कसौटी होती है।

क्या यह भी सामन्तवाद की श्रेणी में नहीं आएगा कि आप अपने पक्ष को श्रेष्ठ मानते हैं। जरूरी नहीं कि‍ आपका पक्ष ही सही हो। दूसरा पक्ष भी हमेशा गलत तो हो नहीं सकता। इस पर क्या कहेंगे?

तब विचारधाराओं पर ही बात करनी पड़ेगी कि कौन सी विचारधारा अधिक जनपक्षीय, प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक है?  इतिहास को खंगालना पड़ेगा। पुराने अनुभवों को देखना होगा। लेकिन यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि हर विचारधारा की कसौटी तो अलग-अलग होती ही है। आप ही बताइये क्या किसी राजतन्त्र का मूल्यांकन, लोकतान्त्रिक कसौटी के आधार पर किया जा सकता है?

क्या यह माना जाए कि प्रतिपक्ष हमेशा गलत होता है

बिलकुल नहीं। पक्ष भी गलत हो सकता है। पर उसका निर्धारण किसी भी मूल्य, मान्यता तथा विचार को इतिहास के विकास क्रम में द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने पर ही हो सकता है। भले ही अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है, लेकिन हर देश-काल-परिस्थिति का अपना सत्य तो होता ही है। हमें उस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

साहित्य में ‘लोक’ एक ऐसा शब्द है, जिसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार या कहूँ लेखक, समीक्षक, आलोचक सब अपने को लोक के नजदीक दिखाना चाहते हैं। इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है? लोक के प्रति दया भाव या लोक के प्रति आस्था ?

लोक से नजदीकी दिखाने के सबके अलग-अलग कारण रहे हैं। कुछ के लिए यह लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम है तो कुछ के लिए प्रतिबद्धता का। जो लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोक के कितने नजदीक हैं,  वे लोक के मीठे-मीठे या उत्सवधर्मी रूप को अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं और लोकधर्मी होने का भ्रम पैदा करते हैं। बिलकुल उसी तरह से जैसे आज बहुत सारे लोग महोत्सवों में लोकगीत-नृत्य की प्रस्तुति कर या फिल्मों में लोक धुनों और लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर खुद को लोक संस्कृति का सच्चा समर्थक और संरक्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। जो लोक के प्रति प्रतिबद्ध होते हैंख्‍ वे लोक के संघर्षधर्मी, सामूहिक, सहकारी और प्रतिरोधीस्वरूप को अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। लोक को द्वंद्वात्मक रूप से देखते और दिखाते हैं। लोक की ताकत के साथ-साथ उसकी कमजोरियों को भी रेखांकित करते हैं। वे लोक को महिमामंडित नहीं, बल्कि जागरूक या चेतना संपन्न करते हैं। वे न दया दिखाते हैं और न ही आस्था। दरअसल, लोक को इन दोनों की ही आवश्यकता नहीं है। उसे तो अभिजात्य वर्ग द्वारा उसके खिलाफ की जा रही दुरभिसंधियों के प्रति सचेत कर उठ खड़े होने को ताकत देने वालों की जरूरत है। लोक की सामूहिक ताकत का अहसास कराने की आवश्यकता है।

एक मुकम्मल कविता जैसी कोई चीज भी होती है क्या?

दुनिया में मुकम्मल तो कुछ भी नहीं है। हो भी नहीं सकती है। ऐसा होगा तो फिर ठहराव आ जाएगा। जीवन का सौन्दर्य उसकी गतिशीलता में और परिवर्तनशीलता में ही है। हमेशा आगे बढ़ने में। क्या आप किसी नदी को देखकर कह सकते हैं कि‍ यह मुकम्मल नदी है या किसी पेड़ को देखकर कि यह मुकम्मल पेड़ है यानी कविता एक नदी की तरह है, प्रवाहमान होना ही उसका जीवंत होना है। कविता का काम हमें अधिक मानुष बनाना है, अर्थात अधिक संवेदनशील बनाना। हमारी संवेदनाओं का अधिकाधिक विस्तार करना। जीवन के सारतत्व तक पहुंचाना। सामान्यतः जिसे लोग नहीं देख पा रहे हैं, उसे दिखाना। यह तभी हो सकता है, जब वह नदी के सामान हमेशा प्रवाहमान हो ताकि उसमें नित नया जल प्रवाहित हो सके। वह छोटी-बड़ी धाराओं-सरिताओं को अपने में समाते हुए चले। वह गंदे नालों को भी अपने में मिलाकर उन्हें भी शुद्ध कर दे। अपने किनारे बसे जनों को अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन में नया जीवन और नई स्फूर्ति का संचार कर दे। खुरदुरे पत्थरों को चिकना कर दे और कठोर चट्टानों पर सुन्दर आकृतियाँ गढ़ दे। यह सब करते हुए किसी तरह का कोई भेदभाव न करे। अंत में सबको एक समुद्र का नागरिक बना दे।

लोग मानते हैं कि छंद मुक्त कविता जब से प्रचलन में आयी तब से कविता ने अपनी जमीन खोई है। छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई को किस रूप में देखते हैं, आप?

मुझे नहीं लगता है कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई जैसी कोई बात है। यह खाई हमारे पाठ्यपुस्तकीय संस्कारों ने पैदा की है। पाठ्यपुस्तकों में हमेशा से छंदबद्ध कविता पढ़ने के कारण कविता को लेकर एक संस्कार बन गया है कि कविता का मतलब एक छंदबद्ध रचना। जबकि छंदबद्ध हो जाने मात्र से कोई रचना कविता नहीं हो जाती है। कविता अपने मितकथन, नवीनता, रूपकात्मकता, लय और सरसता से बनती है। अपनी लाक्षणिकता और व्यंजना से बनती है। उसमें विचारबोध, भावबोध और इन्द्रियबोध का सही तालमेल होना जरूरी है। यदि छंदबद्धता में ही कविता की लोकप्रियता होती तो आज भी वह कविता जो छंदों में लिखी जा रही है, उसी तरह लोकप्रिय होती। जैसे सूर-तुलसी-कबीर की कविता। हाँ, यह जरूर स्वीकार करना पड़ेगा कि कविता के नाम पर आज जो लयहीन लद्धड़ गद्य लिखा जा रहा है, जिसमें शब्दस्फीति बहुत अधिक है और बिम्बों, प्रतीकों और रूपकों की घोर उपेक्षा करते हुए शुष्क विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, जिसमें इन्द्रियबोध और भावबोध सिरे से नदारत है। उसने कविता से पाठकों को दूर किया है। कविता के नाम पर जो अमूर्त और दुरूह गद्य लिखा जा रहा है, उससे बचने की आवश्यकता है।

कविता पढ़ी सबसे ज्यादा जाती है। पर कविता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो एक कहानी को मिलता है और चर्चा भी कम ही होती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं?

मुझे नहीं लगता है कि कविता का सम्मान कम है या कम चर्चा होती है । अच्छी रचना किसी भी विधा में हो, उसको सम्मान भी मिलता है और चर्चा भी होती है। दरअसल, खराब या नकली कविता इतनी अधिक लिखी जा रही है कि उसके ढेर में अच्छी कविता कुछ दब सी गयी है। फिर हर पाठक की अपनी-अपनी रुचि होती है। मैं तो आज भी सबसे अधिक कविता ही पढ़ता हूँ। सबसे अधिक मन कविताओं में ही रमता है। किसी भी पत्रिका में सबसे पहले कविता ही पढ़ता हूँ। हाँ, यह जरूर है कि कविताओं को कुछ ठहरकर पढ़ने की जरूरत पड़ती है। बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि कविता के प्रति नैराश्य भाव बढ़ा है। कवि भी तो कहानी की तरफ पलायन कर रहे हैं?

किसी कवि द्वारा कहानी लिखना न नैराश्य भाव है और न ही पलायन। हर विधा की अपनी सीमा होती है और हर जीवनानुभव की अपनी मांग। कभी-कभी रचनाकार को लगता है कि वह अपनी बात को किसी विधा विशेष में अच्छी तरह नहीं कह पाया है। कुछ ऐसा है, जो उस विधा विशेष की सीमाओं में बंध नहीं पा रहा है तो वह किसी अन्य विधा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। विषयवस्तु और जीवनानुभवों की प्रकृति के अनुसार विधाओं के बीच आवजाही चलती रहती है। यह सामान्य प्रवृत्ति है। हमेशा रही है। बहुत सारे समर्थ कवि हैं, जिन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी या अन्य विधाओं में भी रचना की है। कभी-कभी यह भी होता है जो बात हम छोटी से कविता में कह जाते हैं, वह एक बड़े उपन्यास में भी नहीं कह पाते हैं। हर विधा की अपनी-अपनी ताकत और प्रभाव है। किसी को कमतर नहीं माना जा सकता है। जहाँ सुई की जरूरत है वहां सुई का ही इस्तेमाल करना होगा। जहाँ संबल की जरूरत है, वहां सुई का मोह छोड़ना ही पड़ेगा।  क्या इसे हम पलायन कह सकते हैं?

बिल्कुल नहीं।

पर ऐसा देखने में आता है कि पहले कविता लिखने वाला कवि कहानी की और रुख करता है। उसके पीछे शायद जीवनानुभवों का दबाव रहता हो।

कहीं इसके पीछे महत्वाकांक्षा तो नहीं?

महत्वाकांक्षा कैसी?

यश भी हो सकता है?

यश तो अच्छी कविता लिखने पर भी मिलता ही है। यश का संबंध विधा से नहीं, बल्कि लेखन के स्तर से होता है।

आप अपने को समीक्षा कर्म में कविता में सहज पाते हैं या कहानी या अन्य किसी विधा में?

मैं कविता में ही खुद को सहज पाता हूँ।

सबसे पहली कविता या संकलन जिस पर आपने कलम चलायी?

विजेंद्र जी के एक कविता संग्रह पर मैंने पहली समीक्षा लिखी जो वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई।

उस पर विजेंद्र जी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने खुद अपना संग्रह भिजवाया था। कौन नहीं चाहता है कि उसके लिखे पर कोई बात करे।

अधिकतर देखा जाता है कि लोग समीक्षा करवाना तो चाहते हैं, परंतु सच्ची और खरी समीक्षा को पचा नहीं पाते।

आपने बिल्कुल सही कहा। सच कहो तो यह समीक्षा के सामने बहुत बड़ा संकट है। हर रचनाकार चाहता तो है कि उसकी रचना की समीक्षा हो, उस पर लिखा जाए। इस चाह में कोई बुराई भी नहीं है। आखिर कोई भी रचनाकार लिखता ही इसलिए है कि उसका लिखा हुआ पढ़ा जाए। उस पर बात हो ताकि उसकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। लिखे की सार्थकता भी यही है। लेकिन अधिकांश रचनाकारों की अपेक्षा रहती है कि उनके लिखे पर अच्छा-अच्छा ही कहा या लिखा जाए। उसकी खूब प्रशंसा हो। यदि आप दो-चार पंक्तियों में भी उनकी सीमा बता दो या उस ओर संकेत भी कर दो तो वे नाराज हो जाते हैं। इस सबके चलते मैं इधर अब समीक्षा करने से ही बचता हूँ। बहुत सारे मित्रों ने बोलचाल कम कर दी, जबकि पहले उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। वैसे तो मैं किसी भी किताब के मजबूत पक्ष पर ही अधिक लिखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि कमजोर ढूंढ़ने चलो तो बड़े से बड़े रचनाकार के यहां बहुत सारा कमजोर मिल जाएगा। कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं हो सकता है( जिसका लिखा हुआ सब कुछ श्रेष्ठ ही हो। इसलिए जब कभी बहुत जरूरी लगता है तो सीमाओं की ओर भी संकेत कर देता हूँ, लेकिन मेरा अनुभव है कि अधिकतर रचनाकार ऐसा पसंद नहीं करते हैं। एक और अनुभव रहा है मेरा- कुछ रचनाकार अपनी किताब भेजने के बाद तब तक समय-समय पर फोन करते रहते हैं, जब तक उनकी किताब की समीक्षा न लिख दी जाए और जब लिख दी जाती है तो यह सिलसिला बंद हो जाता है।

यह प्रवृति अधिकांश किस वयवर्ग के लेखकों में पायी जाती है?

ऐसे रचनाकारों में जो पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद अपनी एक पहचान बना चुके होते हैं। जिनकी एक-दो किताबें भी आ चुकी होती हैं।

वही कहना चाह रहा था- समीक्षा से जुड़ा कोई अप्रिय वाकया।

इतना बड़ा तो कुछ नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। छुटपुट प्रवृत्तियों के बारे में जिक्र कर ही चुका हूं।

आप समीक्षा के अलावा शिक्षा से भी जुड़े हुए है- एक संपादक के रूप में और एक शिक्षक के रूप में। क्या समीक्षा और संपादन दोनों एक-दूसरे के सहायक होते हैं या कठिनाई महसूस होती है?

जिस तरह से शिक्षा और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसी तरह लेखन और संपादन भी। इसलिए इनको करते हुए मुझे कभी कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई, बल्कि यह कहना चाहिए कि मदद ही अधिक मिली। साहित्य ने शिक्षा की और शिक्षा ने साहित्य की समझदारी बढ़ाने का ही काम किया। मुझे लिखने का शौक नहीं होता तो शायद मैं बहुत सारी शिक्षा की वे किताबें नहीं पढ़ पाता, जो मैंने पढ़ीं। साहित्य में अभिरुचि ने शिक्षण में भी मेरी बहुत सहायता की। साहित्य ने मुझे बच्चों और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। मेरा तो मानना है कि हर शिक्षक को रचनाकार और साहित्य का गहरा पाठक होना चाहिए। साहित्य हमारी कल्पनाशीलता, दृष्टि और संवेदना का विस्तार करता है। एक शिक्षक के लिए ये तीनों जरूरी होते हैं। एक रचनाकार-शिक्षक बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल और भाषाई दक्षताओं का अधिक अच्छी तरह विकास कर सकता है। उनके भीतर पढ़ने की आदत डाल सकता है। बालमन को अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकता है। साहित्य और शिक्षा मुझे जुड़वा भाई-बहन की तरह लगते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि विज्ञान-गणित के शिक्षकों को भी साहित्य का पाठक होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वे इन विषयों को और अधिक रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं।

एक सामान्य पाठक अगर कविता को पढ़ने और समझने का तरीका पूछ बैठे तो उसे किस तरह समझाया जा सकता है?

सूत्र जैसा तो कुछ नहीं है। दरअसल, यह संस्कार जैसा कुछ है, जिसे धीरे-धीरे ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर, न केवल कविता बल्कि जीवन को भी पढ़ने की जरूरत होती है। उस जीवनानुभव से गुजरने की भी जरूरत पड़ती है, जिस पर कविता लिखी गयी गई अर्थात उन स्रोतों तक जाना पड़ता है, जहाँ से कविता का उद्गम हुआ है। कविता को चलते-फिरते नहीं समझा जा सकता है। उसके पास ठहरना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है। कविता शब्दों में नहीं होती है। शब्दों में खोजोगे तो भटक जाओगे। कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। वह तो शब्दों के ओट में या दो शब्दों या फिर वाक्यों के अंतराल में भी हो सकती है। कभी-कभी तो कविता जहाँ शब्दों और पक्तियों में खत्म हो जाती है, वहां से शुरू होती है। इसलिए कविता को समझने के लिए धैर्य जरूरी है और साथ में अभ्यास भी। यही विशेषता है जो कविता को अन्य विधाओं से अलगाती है। अस्तु न कविता लिखना आसान है और न उसे समझना। कभी-कभी कविता जब शब्दों और पंक्तियों में खत्म हो जाती है, तब वहां से शुरू होती है। इसको सामान्य पाठक किस रूप में समझे। कविता को समझने को लेकर प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की कविता की ये पंक्तियाँ मुझे सटीक लगती हैं- जरा सम्हल कर/धीरज से पढ़/बार-बार पढ़/ठहर-ठहर कर/आँख मूंदकर आँख खोलकर/गल्प नहीं है/कविता है यह।

अलेक्सेई तोल्स्तोय ने कहीं कहा है कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्खन को काटना है। इसे आप किस रूप में मानते है? कविता जहां खत्म होती है, वहां से शुरू होती है, से आपका क्या आशय है?

बहुत सारी कवितायें जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से शुरू होती हैं हमारे मन मस्तिष्क में। पाठक उन्हें रचता है। कविता उसके मन में बहुत सारे प्रश्न पैदा करती है, जिनका उत्तर खुद पाठक तलाशता है और खुद ही देता है। इस तरह अपने भीतर एक कविता बुनता जाता है और उस कविता की उलझनों को सुलझाता जाता है, बिलकुल इसी तरह जैसे अलेक्सेई तोल्स्तोय का यह कथन कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्‍खन को काटना है। इस कथन का हर पाठक अलग-अलग अर्थ लेगा। हरेक अपनी-अपनी तरह से देखेगा। कोई जरूरी नहीं है कि वह आशय वही हो जो कवि व्यक्त करना चाहता हो। यही है शब्दों और पंक्तियों के बाद कविता शुरू होने से मेरा आशय।

कविता और एक्टिविज्म।

कविता और एक्टिविज्म, दोनों बहुत जरूरी हैं। एक्टिविज्म के बिना कविता का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। मैं इस बात का कट्टर समर्थक हूँ कि कविता लिखे जाने से पहले उसे जिया जाना जरूरी है। एक्टिविज्म कविता को जीने का एक तरीका है। हमारे आसपास कविता लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जीने वाले बहुत कम इसलिए उसका प्रभाव बहुत दूर तक नहीं जाता है। फिर ऐसी कविता लिखने का क्या मतलब जो खुद को ही न बदले। कम ज्यादा जितना भी हो, हमें इस दिशा में प्रयासरत रहना चाहिए। एक्टिविज्म हमें नये-नये जीवनानुभव भी देता है, जो लिखने के लिए बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि कविता कविता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए होनी चाहिए। यश प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

आपकी सबसे प्रिय कविता जिसे आप खुद का प्रतिबिम्ब कह सकते है। उसकी चार पंक्तिया अगर संभव हो?

बहुत सारी कविताएं प्रिय हैं। किसी एक का उल्लेख करें मैं दूसरों को कम नहीं करना चाहता हूँ। फिर प्रिय होना और खुद का प्रतिबिम्ब होना, दो अलग-अलग बातें हैं। एक साथ नहीं मिलाई जा सकती हैं। कोई जरूरी नहीं कि जो मुझे प्रिय हो, वह मेरे जीवन का प्रतिबिम्ब भी हो। बहुत सारी कवितायें हमें एक साथ अलग-अलग कारणों से प्रिय होती हैं बिल्कुल लोगों की तरह, क्या हम एक समय में एक से अधिक लोगों से प्रेम नहीं करते हैं? इसलिए यह बहुत कठिन प्रश्न है।

कविता अपने किस रूप में असरदार होती है?

कोई अपने कहन में असरदार होती है तो कोई कथन में। इसी तरह एक भावबोध में तो दूसरी विचारबोध और तीसरी इन्द्रियबोध में। फिर यह पाठक की रुचि और दृष्टि पर भी निर्भर करता है।

वही जानना चाह रहा हूँ कि‍ इन सब में किस रूप में सबसे ज्यादा असरदार होती है?

सबसे असरदार तो वही होगी जिसमें भावबोध, विचारबोध और इन्द्रियबोध तीनों का सही संतुलन हो।

आप ‘दीवार पत्रिका’ पर सालों से काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आए- एक साहित्यकार एक शिक्षक, और एक आम आदमी के रूप में।

परिवर्तन जैसा तो कुछ नहीं आया। हाँ, एक जिम्मेदारी का अहसास हुआ, लगा बच्चों के बीच उनकी रचनात्मकता के विकास के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है। यह पूरा क्षेत्र एक तरह से खाली पड़ा है। यह बहुत बुनियादी काम भी है। यदि हम एक विवेकशील, लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो नीवं से ही शुरुआत करनी होगी। बच्चों को रचनात्मक लेखन-अध्ययन का चस्का लगा देना होगा। ‘दीवार पत्रिका’ इस दिशा में मुझे सबसे कारगर माध्यम नजर आती है। इसमें बहुत अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। ‘दीवार पत्रिका’ अपने-आप में एक स्कूल है। एक ऐसा स्कूल, जिसमें बच्चों ‘हेड-हार्ट और हैण्ड’के संतुलित विकास का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही इसे पुस्तकालय के साथ जोड़कर पढ़ने की संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। बच्चों के साथ ‘दीवार पत्रिका’ पर काम करते हुए मेरी यह धारणा और पुख्ता हुई कि बच्चों के भीतर अपार क्षमता होती है, बस उन्हें अवसर देने और विश्वास करने मात्र की जरूरत होती है। वे ऐसा करके दिखा देंगे जैसा आप सोच भी नहीं सकते हैं। ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’में काम करते हुए बच्चों को जानने-समझने का और अधिक मौका मिला। यह समझ में आया कि बच्चों के भीतर अपार है। बस, हमेशा उन्हें अपने अनुसार चलाने की कोशिश की जाती है। सब उन्हें अपना जैसा बना देना चाहते हैं। वे जैसा बनना चाहते हैं, वैसा कोई उनको बनने ही नहीं देता है। बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार है।

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आया कहां से?

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आने का किस्सा बहुत लम्बा है। इस बारे में मैंने अपनी किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’में विस्तार से लिखा है। हाँ, यहाँ यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह मेरा कोई मौलिक विचार नहीं है। ‘दीवार पत्रिका’ का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अपनी बात कहने के लिए कुछ लोगों ने इस तरह के माध्यम का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के समूह ‘दीवार पत्रिका’ प्रकाशन करते रहे हैं। मैंने कुछ शिक्षक मित्रों के साथ मिलकर इसे एक अभियान का रूप देने तथा पाठ्यक्रम से जोड़कर शिक्षण का माध्यम बनाने का प्रयास अवश्य किया, जो आगे भी जारी रहेगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। साथी शिक्षकों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के भीतर जिज्ञासा पैदा की। शिक्षकों और बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निर्माण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज प्राथमिक स्कूलों तक में भी यह व्यापक पैमाने पर निकाली जाने लगी है। शिक्षण का एक सशक्त और सस्ता माध्यम बनकर सामने आया है। अच्छे परिणाम आ सामने आ रहे हैं। बच्चों को अपनी बात कहने का एक मंच मिला है। उनकी भाषायी दक्षता और अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हो रहा है। यह पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आशा करते हैं कि‍ आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी सामने दिखेगी, जिसकी रचनात्मकता को उभारने में ‘दीवार पत्रिका’ की अहम भूमिका रही होगी।

फिर मैं कविता की ओर लौटता हूँ। अधिकतर देखा जाता है कि‍ विद्रोह कविता का मूल कारण होता है। कविता का विद्रोही होना या कवि का विद्रोही होना इस पर आप क्या कहेंगे?

प्रतिरोध एक जरूरी जीवन मूल्य है। उसे जीवन में भी होना चाहिए और कविता में भी। यदि प्रतिरोध जीवन में नहीं होगा तो कविता में भी नहीं आ पाएगा। केवल दिखाने के लिए लाने की कोशिश की जाएगी तो वह भौंथरा प्रतीत होगा। पाठक जल्दी ही समझ जाएगा कि वह केवल कविता में कहने भर  के लिए प्रतिरोध है। ऐसी कविता पाठक के मन में प्रतिरोध के मूल्य को पैदा भी नहीं कर पाएगी। पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत,  सारोवीवा से लेकर नागार्जुन, पाश,  गिर्दा, वीरेन डंगवाल, वरवर राव सरीखे तमाम कवियों की कविताओं में हम जो प्रतिरोध देखते हैं, वह उनके जीवन में भी दिखाई देता है। मेरा मानना है कि कवि के विद्रोही हुए बिना कविता विद्रोही हो ही नहीं सकती है। ऊपर जिन कवियों का मैंने जिक्र किया उनके जीवन में पहले विद्रोह था, तब उनकी कविताओं में उतरा। एक बात और सच्चा होगा जो कवि उसके जीवन में विद्रोह होगा ही होगा। बिना विद्रोह के एक बड़ी कविता जन्म ले ही नहीं सकती है। वह कवि खाक कविता लिखेगा, जो संतोषी होगा। कविता तो असंतोष की ही उपज होती है। जब कवि अपने चारों-ओर से असंतुष्ट होता है और उसे बदलना चाहता है, तब उस बदलाव की पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में ही होती है। आदि कवि बाल्मीकि की कविता भी विद्रोह स्वरूप ही निकली, चाहे वो करुणा के रूप में हो। एक कवि जिस तरह का समाज बनाना या देखना चाहता है, उसी तरह की अभिव्यक्ति अपनी कविता में करता है। वह शिकारी के प्रति कवि का विद्रोह ही तो था, जिसके चलते उसके मुंह से वह श्राप फूटा।

जी जी…वो श्राप किसी भी संवेदनशील के मुँह से निकलता। हाँ, वह अलग बात है कि‍ उसे छंद का रूप दे दिया गया।

वह छंद में नहीं भी होता, तब भी कविता होती। हाँ, छंद ने उसे अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसलिए मुझे बार-बार लगता है कि कविता रूप में नहीं, बल्कि कथ्य में होती है। बहुत सारे लोग कविता नहीं लिखते हैं, लेकिन कवि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति किसी कविता से कम नहीं होती है। हमारे लोकगायक इसी तरह के तो थे। वे कवि कहलाने के लिए कविता नहीं करते थे। अपने आसपास के हर्ष-विषाद, दुःख-सुख, दर्द-आनंद को महसूस कर उनके भीतर से शब्द फूट पड़ते थे।

ऐसा क्या कारण है कि गेय पद ही सामान्य पाठक को अपनी ओर ज्यादा आकर्षित करते हैं?

स्वर जब संगीत के साथ मिल जाते हैं, अपना अधिक प्रभाव तो पैदा करते ही है। इसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि आदमी का स्वर से पहले सुर-संगीत से परिचय होता है। संगीत से आदमी का पहला लगाव होता है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति भी है- शिशु लोरी के शब्द नहीं/संगीत समझता है।

मैंने आज तक एक सरल और सहज महेश पुनेठा को देखा है, क्या कभी महेश पुनेठा को भी क्रोध आता है? अगर आता है तो घर, शिक्षण और साहित्य के माहौल में उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं?

आपने आधे महेश पुनेठा को ही देखा है। बाहर कोई भी पूरा दि‍खता कहाँ है? घर में ही किसी को पूरा देखा जा सकता है। क्रोध प्राणी मात्र का मूल संवेग है, तब महेश पुनेठा भला उसका अपवाद कैसे हो सकता है? हाँ, उसे नियंत्रित करने की जरूरत पड़ती है। बादल बनेंगे तो बरसेंगे जरूर और बरस जाना ही ठीक भी होता है, फटना नहीं चाहिए। ‘बादल फटने’का क्या हश्र होता है? इसे हम पहाड़ियों से अधिक अच्छी तरह कौन समझ सकता है? क्रोध आता है तो व्यक्त कर देता हूँ। लेकिन हमेशा खुद को चैक भी करता रहता हूँ कि क्या मेरे व्यक्त करने का तरीका सही था और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था? दूसरे को ही दोषी न मान खुद के दोष को स्वीकार करता हूँ इसलिए दूसरी बार क्रोध करने से बच जाता हूँ। मेरा मानना है कि दूसरे को भी क्रोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि हम यह मान लें कि क्रोध करने का अधिकार छोटों और कमजोरों का भी उतना ही है, जितना बड़ों और ताकतवरों का, तो हम अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण कर सकते हैं।

कविता और प्रेम इसको आज लिखे जा रही कविताओं में किस स्तर पर पाते हैं?

प्रेम जीवन का सनातन भाव है और कविता का सनातन विषय भी। जब तक जीवन रहेगा, प्रेम भी रहेगा और कविता में व्यक्त भी होगा और खूब हो रहा है।

क्या आपने कविता में प्रेम को जिया है?

क्या प्रेम को जिए बिना कविता रच पाना संभव है? मेरा छोटा अनुभव तो यही कहता है, असम्भव है। तब मैं बिना प्रेम का कविता कैसे लिख सकता हूँ, मित्रवर। वह तो केवल रोबोट के लिए ही संभव है।

आप पतली गली से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी अपनी कोई प्रेम पगी पंक्तियां?

सारी ही कवितायेँ प्रेम में पगी हैं। कहा न, प्रेम के बिना तो कविता लिखना ही असंभव है। आप मानवीय मूल्यों से प्रेम करते हैं,  कमजोर,  दमित, शोषित, पीड़ित से प्रेम करते हैं,  इसीलिए कविता लिखते हैं और लिख पाते हैं। यदि आप इनके प्रेम में पगे न हों तो इनके पक्ष में एक पंक्ति भी नहीं लिख पायेंगे और जो लिखेंगे भी तो भले वह कुछ भी हो, लेकिन कविता नहीं होगी।

आजकल लिखी जा रही प्रेम कविताओं की गहराई और उनका फैंटेसी पर कुछ बोलना चाहेंगे?

गहराई किसी काल की मुहताज नहीं होती हैं। उथली प्रेम कवितायेँ हर काल में लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। उसमें से मोती चुनने का काम तो सहृदय का है। फैंटेसी का इस्तेमाल कविताओं में खूब होता रहा है, पर इसके साथ खतरा यह है कि यह अक्सर यथार्थ से पलायन का बहाना बन जाती हैं। फैंटेसी की सर्थाकता तो तभी है, जब वह यथार्थ से साक्षात्कार का माध्यम बने। जैसा कि हम मुक्तिबोध के यहाँ पाते हैं।

बात मुक्तिबोध की आ ही गयी। मुक्तिबोध की कविता सामान्य पाठक के लिए तो समझना बहुत मुश्किल होता ही है। मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं, उनकी कविता के भंवर में। इसे मुक्तिबोध की कमजोरी कहेंगे या विद्वता?

बिलकुल आप ठीक कह रहे हैं, मुक्तिबोध की कविता में सामान्य पाठक ही नहीं, मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, विजेंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार भी उनकी कविता में जटिलता और दुर्बोधता की शिकायत करते हैं। इसलिए उन्हें ‘कवियों का कवि’भी कहा जाता है। लगभग सभी साहित्यिक मानते हैं कि उनकी कविता को समझना बहुत आसान नहीं है। उनका भावबोध और रचना प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। फंतासी का इस्तेमाल भी उनकी कविता को दुरूह बना देता है। संस्कृत, तत्सम और अप्रचलित शब्दों की प्रधानता भी उनकी भाषा को कठिन बना देती है। मैं इसे मुक्तिबोध की कविता की एक सीमा मानता हूँ। लेकिन जब हम उनकी आलोचनात्मक लेखों, डायरी के पन्नों और पत्रों को पढ़ते हैं, तो उनकी कवितायें खुलने लगती हैं। एक ताना हाथ आने की देर होती है, बस। दरअसल, मुक्तिबोध की कविता की जटिलता जानबूझकर पैदा की गई, जटिलता नहीं है। जैसा कि बहुत सारे कवि करते हुए पाए जाते हैं। अपनी बात को जलेबी की तरह घुमाकर एक प्रभाव पैदा रकने की कोशिश करते हैं, जबकि कथ्य के स्तर में उसमें कुछ खास होता नहीं है। केवल वाग्जाल फैलाते हैं। लेकिन मुक्तिबोध की जटिलता जीवनानुभवों और नवीनता से पैदा जटिलता है। जिनका मंथन करने पर मक्खन निकलता है। वह हमें मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चल रहे संघर्षों की अनुभूति से परिचित कराते हैं। चेतन और अवचेतन की बात करते हैं। कभी-कभी इतनी गहराई में चले जाते हैं कि उनको पकड़ना कठिन हो जाता है, लेकिन जब धैर्य रखते हुए उनके साथ उतरते हैं, तो नायाब मोती भी हाथ लगते हैं। मुक्तिबोध के दुरूह लगने का एक कारण उनका मराठी भाषा से हिंदी में आना भी रहा। हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं थी, बल्कि अर्जित भाषा थी। मुक्तिबोध ने जिंदगी के जिन सवालों को उठाया और जिस विचार व भावभूमि का निर्माण किया,  वैसा हिंदी के बहुत कम कवि कर पाए।

कहीं किसी का लिखा हुआ पढ़ रहा था,कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, अगर उसे पाठक से जुड़ना है तो ।’ क्या आप इससे सहमत हैं?

सवाल छंद का नहीं है। यह कहना कि छंद में न होने के कारण आज कविता से पाठक दूर हो रहे हैं, यह स्थिति का सामान्यीकरण है। कारण बहुत सारे हैं। यदि छंद जुड़ाव का एकमात्र कारण होता, तो वे सारी कवितायें जो आज भी छंद में लिखी जा रही हैं, उनके बहुत सारे पाठक होने चाहिए थे या वे बहुत पढ़ी जानी चाहिए थीं,  क्या ऐसा है ? आज कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त उसके पाठक कम ही हैं, बल्कि हमेशा ही गम्भीर साहित्य के पाठक कम ही रहे हैं। मेरे राय में कविता के छंदबद्ध होने से अधिक जरूरी है- कविता का जीवन से जुडा होना। जीवन के ज्वलंत सवालों को उठाना,  उनसे जूझना, पाठकों को नए जीवनानुभवों से परिचित कराना, जो कविता इस रूप में हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है और उससे जुडती है,  उन कविताओं से पाठक अवश्य जुड़ता है। उन्हें पढ़ता है। बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें इस बात का प्रमाण हैं। ऐसी बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें हैं, जो बहुत सारे पाठकों द्वारा पसंद की जाती हैं। इस सबको थोड़ी देर के लिए अलग भी कर दें तो फिर भी पीछे नहीं लौटा जा सकता। कविता छंद से बहुत आगे आ चुकी है,  यह केवल हिंदी में ही नहीं, दुनियाभर के साहित्य में हो रहा है। मुक्तछंद में कविता लिखी जा रही हैं। इसका कारण छंद की अपनी कुछ सीमायें रही हैं। आज जीवन की जटिलता को छंदों में बांधकर पूरी तरह से कहना संभव नहीं लगता है। छंद बहुत बार भाव और विचार का गला घोंट देते हैं। हाँ, यह जरूरी है कि कवि को छंद की परम्परा का ज्ञान होना चाहिए। उससे ताकत ग्रहण करनी चाहिए। यदि छंद में आज का यथार्थ व्यक्त हो पाता है, तो व्यक्त भी किया जाना चाहिए। छंद से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन केवल छंदबद्ध रूप में ही कविता मान्य होगी, यह अब नहीं चलने वाला है। मुक्तछंद अब बहुत आगे निकल आया है।

आपने कविता और समीक्षा के साथ-साथ क्या कभी किसी कहानी पर भी काम किया?

एक दौर में लघुकथाएं लिखी थीं। उससे अधिक नहीं।

पहली लघुकथा कौन सी थी?

अपराधिनी।

लघुकथा कथा में परिवर्तित क्यों नहीं हो पायी?

कोई कोशिश नहीं की।

कहानी और कविता के सृजन में मूलभूत अंतर आप क्या पाते हैं?

कहानी विस्तार की अधिक आजादी देती है, जबकि कविता में कम शब्दों में अधिक कहने की जरूरत पड़ती है। कविता में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों आदि का प्रयोग एक तरह से विधागत आवश्यकता होती है। कविता किसी अन्न को पोटली में रखना है, तो कहानी उसे बिछा देना। कहानी सृजन अधिक समय की मांग भी करती है। फिर विषयवस्तु की अपनी मांग का भी सवाल होता है। मुक्तिबोध ने तो एक ही विषय पर कविता भी लिखी है और कहानी भी।

जी, वही अंतर जानना चाह रहा था ।

उन्हें लगा होगा कि‍ शायद कविता में वह अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाए इसलिए उन्होंने कहानी द्वारा कहने की कोशिश की होगी।

कहानी और नाटक की भारतीय परंपरा में सुखान्त को तरजीह देते आए हैं। लेखक पर वेस्टर्न लेखक इस का अनुपालन नहीं करते ऐसा क्यों?

यह जीवन दृष्टि का अंतर है। भारतीय जीवन दृष्टि संतोषम परम सुखम पर विश्वास करती है। जो है, अच्छा ही है। जो होगा, अच्छा ही होगा। जो तय है, वही होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता है। हमारा अधिकांश साहित्य इसी दृष्टि को ही स्थापित करता है। इसको अंत भले का भला वाली दृष्टि भी कह सकते हैं। जबकि ऐसा हो, कोई जरूरी नहीं। अक्सर देखा गया है कि‍ भला तो ताकतवर का ही होता है। ताकत की भला-बुरा तय करती है। इतना ही नहीं, भारतीय दृष्टि यह भी है कि यदि कहीं कोई बुरा है तो उसमें कोई बदलाव भी करेगा तो वह कोई अवतारी पुरुष ही करेगा। जनशक्ति की उसमें कोई भूमिका नहीं। यह दृष्टि यथास्थितिवादी दृष्टि है।

क्या आपने कभी किसी कहानी को भी एक समीक्षक की दृष्टि से देखा?

बहुत अधिक तो नहीं। कुछ कहानी संग्रहों और उपन्यासों की भी समीक्षा लिखी है, मैंने।

कहानी की समीक्षा के वो तथ्य और कथ्य जिन्हें आप मानते हैं कि कहानी उनके बिना कहानी नहीं होती है?

कहानी में सबसे पहली बात है- उसमें कहानीपन का होना, वह निबंध की तरह न हो। शेष किसी भी रचना की समीक्षा करते हुए चाहे वह कविता हो या कहानी, सबसे पहले यही देखता हूँ कि उस रचना के माध्यम से रचनाकार ने जीवन की किस बुनियादी बात को उठाया है, जिसे अब तक किसी और ने न उठाया हो? क्या रचना में वही दिखाया गया है, जो सब देख रहे हैं या उसे दिखाया गया है,जिसे सामान्यतः लोग देख नहीं पाते हैं? उस रचनाकार की अपने जन, समाज और प्रकृति को देखने की दृष्टि क्या है? वह अपनी रचना में किसके पक्ष में खड़ा है? रचना में जिस समाधान की ओर संकेत किया गया है, वह कितना तर्कसंगत और मानवीय है? रचना पाठक की संवेदनाओं का विस्तार करने में कितनी सक्षम है?  क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वही रह जाता है, जो उसे पढ़ने से पहले था या कुछ परिवर्तन आता है? आदि-आदि।

हम कहानी की बात कर रहे थे, बहुत सारे लोग कहानी लिख रहे हैं। कहानी गढ़ने में काल्पनाशीलता की कितनी आवश्यक्ता होती है?

कल्पना तो सृजन का एक आवश्यक तत्व है। इसके बिना कोई भी रचना अनुभववाद की शिकार होकर रह जाती है। कल्पनाशीलता के बिना कोई भी रचना बड़ी नहीं हो सकती है। इसके अभाव में कोई भी रचनाकार केवल एक दर्पण बनकर रह जाता है। उसके सामने जो घट रहा है, उतना ही वह अपनी रचना में दिखायेगा, उससे अधिक कुछ नहीं। जबकि रचनाकार का काम वह दिखाना भी होता है, जो उसके सामने नहीं घट रहा है। दूसरे शब्दों में जिसे एक सामान्य आदमी नहीं देख पाता है। वह जिस नये समाज को अपनी रचना में दिखाता है, वह कल्पनाशीलता से ही संभव होता है। लेखन ही नहीं, बल्कि कोई भी सृजन हो वह कल्पनाशीलता के बिना संभव नहीं होता है। शिक्षण को भी में इसी रूप में देखता हूँ।

क्या आपने किसी पाश्चात्य कहानीकार को भी पढ़ा है?

थोडा़ बहुत मैक्सिम गोर्की और ताल्स्तॉय को।

पाश्चात्य लेखन और भारतीय लेखन शैली में क्या अंतर पाते हैं?

ज्यादा पढ़ा ही नहीं है, क्या अंतर बताऊंगा भला।

अपने लेखन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

कुछ नही।

क्यों?

अपने लेखन पर भला खुद क्या कहा जा सकता है? जो लिख दिया, लिख दिया। अब वह मेरा कहाँ रहा।

आपके लेखन को मजबूती देने में आपकी धर्मपत्नी शीला जी के योगदान को आप किस रूप में रेखांेकित करना चाहेंगे?

मैं तो पूरा उनका ही योगदान मानता हूँ। वह यदि सहयोग नहीं करतीं तो शायद में न पढ़ पाता और न लिख। कभी भी उन्होंने मेरे पढ़ने-लिखने को लेकर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। उसे कभी भी फालतू या बैठे-ठाले का काम नहीं कहा। जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है। मेरे लिखे की पहली पाठक वह ही रहीं हैं। मैं सुनाता हूँ और वह सुनती रहती हैं। बहुत बार तो पहला प्रूफ वह ही देखती हैं। व्याकरण और वर्तनी की गलतियों को पकड़ती हैं।घर की पूरी जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेकर मुझे पढ़ने-लिखने के लिए छोड़ा है। मेरे बैंक-पोस्ट ऑफिस वाले काम भी वह निपटा देती हैं। पहले जब हाथ से लिखना होता था, तो मेरी कविताओं को फेयर करने का काम भी बहुत बार वहीं करती थीं। शुरू-शुरू में वापस आई रचनाओं के लिफाफों को छुपाने का काम भी। जब मैं नाश्‍ता-पानी कर लेता था, तब वह उन लिफाफों को मुझे दिखाती थीं। उन्हें इस बात का अहसास रहता था कि मुझे रचनाओं के लौटने पर कितना दुःख होता है। मेरा मानना है कि पत्नी के सहयोग के बिना कोई भी लेखक लम्बा लेखन नहीं कर सकता है।आपको तो पता है कि मैं जितने समय भी घर में रहता हूँ, लिखने या पढ़ने का काम ही करता रहता हूँ, लेकिन शीला ने कभी इस पर कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि जब उनको घरेलू कामों से फुर्सत हो जाती है तो अपनी बुनाई लेकर या किताब लेकर मेरे बगल में आकर बैठ जाती हैं। बीच-बीच में घर-गृहस्थी और आसपडो़स की बातें मुझे बताती रहती हैं। कभी-कभी पढ़ने-लिखने में डूबे रहने के कारण सुन नहीं पाता हूँ, तो हल्की नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके पास मेरी बात सुनने के लिए समय कहाँ ? लेकिन यह नाराजगी क्षणिक ही होती है। फिर थोड़ी देर में अदरक का पानी बनाकर ले आती है। वह खुद भी बहुत अच्छी पाठक हैं। घर में आनेवाली साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियां तो शायद ही कोई उनसे अपठित रही हो। घर में आने वाली कोई भी कहानी संग्रह या उपन्यास सबसे पहले वही पढ़ती हैं। अच्छा हुआ तो मुझे भी पढ़ने का सुझाव देती हैं।

मनाने का समय ही नहीं होता होगा, कभी यह वाक्‍य नहीं निकला- ये किताबें मेरी सौतन हैं?

यह वाक्‍य तो सुनने को नहीं मिला अब तक।

अच्छी बात है।

इतना ही नहीं, हमारे घर में पढ़ने-लिखने वाले लोगों का हमेशा आना-जाना लगा रहा है। घंटों तक बैठा रहना और बहस सामान्य बात रही है। हमारी बहस चलती रहती है और शीला बहुत प्रेम से चाय-पानी पिलाती रही हैं। खाना खिलाती रही हैं। खुद भी हमारे बातचीत में शामिल होती रही हैं। बाहर से आये साहित्यकारों का रुकना भी होता रहा है।उनकी सेवा-सुश्रुषा में भी कभी कोई कमी नहीं आने दी होगी। गंगोलीहाट में हमने अपने आवास में एक पुस्तकालय स्थापित किया था, उसकी साफ-सफाई और देख-रेख का काम भी शीला ही देखती थीं। यहाँ भी मेरे द्वारा अपने पुस्तकालय को सार्वजनिक करने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। पुस्तकालय से पाठकों को किताब देने के साथ-साथ चाय भी पिला देती हैं। ‘शैक्षिक दखल’ शुरू की उसके प्रकाशक की भूमिका में भी उन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। पंजीकरण का पूरा काम उन्होंने अपने हाथ में लिया। बैंक में खाता खोलना और लेन-देन करना सभी काम वही देखती थीं।

आपकी कविताओं को जब पढ़ता हूँ तो आंचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत कम ही होता है, फिर भी आपकी कविताएं आंचलिकता को पूर्णतया उभार पाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

आंचलिक शब्दों के प्रयोग के बारे में मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि इन शब्दों का इस्तेमाल जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। ये शब्द सहज रूप से कथ्य की जरूरत के मुताबिक ही आने चाहिए। वहीं आने चाहिए, जहाँ भाव-विचार या प्रसंग की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हों। जब उनका कोई और विकल्प न हो। किसी दूसरे शब्द के माध्यम से वह गहराती, तीव्रता और व्यापकता नहीं आ पा रही हो। देश-काल-परिस्थिति और पात्र की प्रमाणिकता के लिए अति आवश्यक हो। किसी रचना को आंचलिक रंग देने मात्र के लिए मैंने कभी बोली के शब्दों का प्रयोग नहीं किया। आंचलिक शब्दों के अतिशय प्रयोग से रचना के बोझिल और दुरूह होने का उसी तरह खतरा पैदा हो जाता है, जैसे तत्सम और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से। केवल बोली के शब्दों से ही कोई रचना आंचलिक नहीं हो जाती है। जीवन की घटनाएँ, प्रकृति, समाज और उसमें आये चरित्र भी रचना को आंचलिक बनाते हैं।

यह कह सकते हैं लेखकों को आंचलिक शब्दों के प्रयोग सतर्कता बरतनी चाहिए।

बिलकुल। बोली के शब्दों के प्रयोग में यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि वे सहज रूप से आयें, कहीं भी जबरदस्ती ठूंसे नहीं लगने चाहिए। पाठक को उन्हें समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़नी चाहिए, सन्दर्भ से ही उनके आशय खुल जाने चाहिए। बेहद सतर्कता की जरूरत है।

साहित्य के केंद्रीकरण पर आप क्या कहना चाहेंगे?

केन्द्रीकरण से आपका क्या आशय है ? प्रश्न को थोडा और खोलें।

साहित्य का कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द होना।

पाठकों के या साहित्यकारों के?

साहित्यकारों के।

मुझे लगता है कि‍ आज ऐसा नहीं है। छोटी-छोटी जगह से निकलने वाली ‘बाखली’जैसी सैकड़ों लघु पत्रिकाओं और सोशल मीडि‍या ने इसे तोडा़ है।

यानी ये आज केवल भ्रम रह गया है।

वस्तुस्थिति में काफी बदलाव आया है और आता जा रहा है। गढ़ और मठ टूट रहे हैं। अब दूर-दराज से लिखने वाले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। कुछ महानगरों या साहित्य के केन्दों की बपोती नहीं रहा। सोशल मीडिया साहित्य को आम पाठक तक ले जाने और साहित्यकारों के आपसे संवाद का एक प्रभावशाली और सशक्त माध्यम है। इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के प्रचलन बढ़ने से साहित्यकार और पाठक के बीच से संपादक और आलोचक की भूमिका कम हो गयी है। अब साहित्यकार इनका मुहताज नहीं रह गया है।

वेदप्रकाश जी के जाने पर लुग्दी साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। आप लुग्दी साहित्य को किस स्तर पर देखते हैं?

लुगदी साहित्य को मैं साहित्य के क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल के रूप में देखता हूँ। पढ़ने की लत लगाने में इसकी भूमिका हमेशा से असंदिग्ध रही है। उससे अधिक मैं इसके कोई सार्थकता नहीं देख पाता हूँ।

जो शास्त्रीय साहित्य अलमारियों और पुस्तकालयों में डम्प है, उसको किस श्रेणी में रखेंगे?

उच्च शिक्षा।

थोड़ा विस्तार से।

शास्त्रीय साहित्य हमें जीवन की गहराई और व्यापकता में ले जाता है। जीवन के विविध रूप-रंग-गंधों का दर्शन कराता है। अधिक मानवीय बनाता है। संवेदना का विस्तार करता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो अंतरात्मा के आयतन का विस्तार करता है। जीवन के ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। और एक बदलाव की दिशा बताता है। उसके लिए एक बेचैनी पैदा करता है। उसे पढ़ने के बाद पाठक वैसा नहीं रह जाता है, जैसा उससे पहले था। वह अपने को अधिक समृद्ध पाता है। केवल वस्तुस्थिति का चित्रण ही नहीं करता है, बल्कि उसके कारणों की पड़ताल भी करता है। कार्य और कारणों के संबंधों की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करता है। कुल मिलकर विवेकशीलता, संवेदनशीलता,  भाषाई संस्कार और वैज्ञानिक सोच पैदा करतस है।

सामन्तवाद और उदारवाद दोनों के साहित्य पर पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

समाज में मौजूद हर विचारधारा का प्रभाव साहित्य में दिखाई देना स्वाभाविक है। साहित्य के मूल में तो विचार ही होता है। हर विचारधारा साहित्य के माध्यम से ही प्रचार-प्रसार और मान्यता प्राप्त करती है। समाज में जितनी तरह की विचारधाराएँ होंगी, उतने तरह का साहित्य मिलेगा।

दोनों के कुप्रभावों को इंगित करने की भी तो आवश्यकता है?

वह तो हर नयी विचारधारा करती ही है।

मेरे कहने का आशय नयी पीढ़ी को उसके कुप्रभावों से आगाह किन शब्दों किया जाए,  हतोत्साहित भी न हों और कार्य में मौलिकता और प्रगतिशीलता भी आए?

उदारवाद एक तरह से सामन्तवाद के कुप्रभावों की उपज है। उसके लिए तो नई पीढ़ी को अपने समय और समाज को गहराई से समझना होगा। आर्थिक-सामजिक तथा राजनीतिक हर पहलू पर विचार करना होगा। मानव समाज के पूरे विकासक्रम को जानना होगा। उसका अन्वेषण-विश्‍लेषण करना होगा।यह एक लम्बी प्रक्रिया है। एक या दो दिन में किसी के दृष्टिकोण को नहीं बदला जा सकता है। या किसी विचारधारा की सीमाओं को नहीं बताया जा सकता है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई बदलने के लिए तैयार न हो तो आप उसे नहीं बदल सकते हो।

मैं फिर समीक्षा में लौटता हूँ।आजकल समीक्षा और आलोचना में हो रहे घालमेल पर आपका मन्तव्य क्या है?

किस तरह की घालमेल ?

मेरा आशय गिराने-उठाने से है।

उठाने-गिराने का यह खेल हमेशा ही रहा है। इधर सोशल मीडिया के आने से कुछ बढ़ गया है। यह साहित्य और साहित्यकार दोनों के हित में नहीं है और अंतत समाज के हित में भी नहीं है।

आपको नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में जो तथाकथित बड़े आलोचक, लेखक,  समीक्षक हैं,  वही उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते?

ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा।

क्या कारण है कि हिंदी साहित्य आज भी अंग्रेजी साहित्य से पीछे दिखता है?

किस रूप में पीछे मानते हैं, आप?

पाठक तक पहुँच और उसकी विषयवस्तु, उसकी लोकप्रियता, उसकी व्यवसायिकता।

यदि आप केवल भारत के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या हिंदी साहित्य पढ़ने वालों से अधिक है। अंग्रेजी अन्तरराष्‍ट्रीय भाषा है, उसकी लोकप्रियता और व्यवसायिकता का अधिक होना स्वाभाविक है। इसके पीछे बाजार की शक्तियों का भी हाथ है। विषयवस्तु में मुझे हिंदी का साहित्य कहीं से भी कम नहीं लगता।

आपकी मातृभाषा कुमाउंनी ही है। क्या आपने कुमाउंनी में भी कभी कुछ लिखने की कोशिश की?

नहीं।

नहीं लिखने के क्या कारण रहे?

लम्बी कहानी है, कुमांउनी में न लिख पाने की।

बचपन में पढने के लिए पिताजी के साथ लोहाघाट जाना हुआ। मैं अपनी सोर्याली में बोलता था, वहां भी उसी में बोलने लगा जिसमें काली कुमांउनी से कुछ अंतर है। इन दोनों बोलियों के शब्दों में अंतर है। वहां साथी बच्चों के द्वारा मेरी बोली के शब्दों की मजाक बनाया जाने लगी। मैंने हिंदी में बोलना शुरू किया फिर वहां से घर लौटने के बाद हिंदी में ही बोलने लगा। गांव में, लोगों के बीच हिंदी में बोलने के चलते तारीफ होने लगी। बस फिर वही सिलसिला चल पड़ा। कुमाउंनी का अभ्यास छूटता ही गया। जब बोलने का ही अभ्यास छूट गया तो लिखना तो दूर की बात रही। हिंदी में ही मौखिक-लिखित अभियव्यक्ति का अभ्यास अधिक रहा। उस समय अपनी बोली-बानी के प्रति कोई अतिरिक्त चेतना भी नहीं थी। शहर के नजदीकी गांव में रहने के चलते कुछ ऐसा माहौल भी था कि कुमाउंनी में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाता था। हर माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए ही प्रोत्साहित करते थे, बल्कि कुमांउनी में बोलने पर टोकते थे। इस तरह छूटती ही चली गयी, अपनी दुधबोली। जब तक अपनी बोली-बानी के महत्व को समझने लगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हिंदी में लिखना और छपना अधिक हो गया। उसी में सहज भी लगने लगा। हिंदी में लिखकर अधिक पाठकों तक पहुंचना संभव था। कभी यह भी नहीं लगा कि जो बात हिंदी में कह रहा हूँ, उसे कुमाउंनी में बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। जहाँ लोक की संवेदना को अधिक गहराई से व्यक्त करने हेतु इसकी जरूरत लगी, हिंदी में ही लोक बोली के शब्दों का इस्तेमाल कर लिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोक बोली को लेकर किसी तरह का कोई हीनताबोध हो मन में। कुमांउनी से मुझे उतना ही लगाव है, जितना हिंदी से। कभी फुर्सत मिलेगी तो जरूर कुमांउनी में भी लिखना चाहूँगा। कुछ कवितायें और समीक्षाएं लिखी भी हैं।

बुद्धिजीवियों, दलितों, पिछड़ों पर हो रहे हमलों के पीछे क्या कारण पाते हैं, आप?

यह अपनी सत्ताओं को संरक्षित रखने का कुप्रयास है। एक वर्ग विभाजित समाज में सत्ताएं किसी तरह के प्रतिरोध को बर्दास्त नहीं कर पाती है। उनको किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं। वे हमेशा अपना एकाधिकार चाहती हैं। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शासित वर्ग किसी रूप में भी सर उठाये। उसकी बराबरी में खड़ा हो। वह समाज में लगातार विभाजन को बनाये रखना चाहता है ताकि उसका वर्चस्व बना रहे और वह ऐशो आराम की जिंदगी जी सके। इसलिए दलितों और पिछड़ों पर हमलों का इतिहास बहुत पुराना है। उनको कमजोर बनाये रखने और भयग्रस्त करने के लिए शारीरिक और मानसिक हमले हमेशा से होते रहे हैं और जब तक वर्ग विभाजित समाज रहेगा, इनका खत्म होना संभव भी नहीं दिखाई देता है। सत्ता में जितनी अधिक सामन्ती और पूंजीवादी ताकतें हावी होंगी, उतना अधिक यह दमन तेज होगा। इन ताकतों द्वारा कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए शारीरिक बल और मानसिक गुलाम बनाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हमेशा कोशिश रहती है कि शासित वर्ग की चेतना को कुंद कर दिया जाय। उसे धर्म, जाति, लिंग, रंग, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं में जकड़ दिया जाय। इसके लिए पूरा शिक्षाशास्त्र तैयार किया जाता है। लेकिन बुद्धिजीवी इस सबके खिलाफ चेतना के प्रसार का काम करते हैं, शासक वर्ग के कुचक्रों को उघाड़ते हैं, जनता को उनकी काली करतूतों से सचेत करते हैं। इस तरह प्रतिरोध को संगठित और धारदार करने का काम करते हैं। ऐसे में भला सत्ताएं उन्हें कैसे सहन कर सकती हैं? उनकी पहली कोशिश होती है कि वे बुद्धिजीवियों को लालच देकर अपने साथ मिला लें, न मानें तो उन्हें किसी भी तरह बदनाम किया जाय। उनकी छवि को संदिग्ध कर दिया जाय। इसके बावजूद न मानें तो उनको किसी तरह से कानूनी पचड़े में फांस लिया जाय या फिर उनका काम तमाम कर दिया जाय। दाभोलकर, पानसारे, कुलबुर्गी आदि इसके ताजे उदहारण हैं।

उभरते साहित्यकारों और कवियों के लिए उनके लेखन के विकास और भविष्य के लिए भी कुछ कहना तो बनता ही है?

अभी ऐसी न उम्र हुई और न अनुभव। मैं तो अभी खुद समाज और साहित्य को समझने की कोशिश में लगा हूँ। अपने भीतर के इंसान को बचाने की जद्दोजहद कर रहा हूँ। आज के दौर में कितना कठिन है- अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखना। बस उसी दिशा में संघर्षरत हूँ। संवेदनशीलता को खत्म करने के लिए चारों ओर से सुनियोजित हमले हो रहे हैं। एक इंसान का इंसान बने रहना कठिन हो गया है। उसके ऊपर शारीरिक और मानसिक हमले किए जा रहे हैं। उससे कहा जा रहा है कि तुम कुछ भी बन जाओ, लेकिन तुम्हारा इंसान बने रहना हमें मंजूर नहीं है। सांप बन जाओ, केंचुए बन जाओ, सियार बन जाओ, गिद्द या चील बन जाओ, मकड़ी या जोंक बन जाओ, सब चलेगा लेकिन अपनी रीढ़ पर सीधा खड़ा इंसान उन्हें पसंद नहीं।

 

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल में विज्ञान  सिखाने की अद्भुत तकनीक इस्तेमाल की जाती है।

यहाँ पर सातवीं क्लास के बच्चे अपना खुद का पानी का राकेट बनाते हैं और उसे उड़ाते हैं। एक पुरानी  पानी  की बोतल और साइकिल  के  पंप का इस्तेमाल करके बनाये हुए राकेट को उड़ाते हुए इन बच्चों को देखना एक अलग ही अनुभव था| यहाँ के दो बच्चों ने अपने स्कूल के कंप्यूटर लैब में एक नवोन्मेष प्रयोगशाला नामक केंद्र की स्थापना की है, जहाँ बच्चे रोज़मर्रा की चीज़ों का इस्तेमाल करके विज्ञान के नए-नए मॉडल बनाते हैं। जैसे एक विद्यार्थी ने कॉफ़ी कप, पुराने पेन और जूते के डब्बे का इस्तेमाल करके एक कप एनीमोमीटर बनाया जिससे वायु का वेग नाप सकते हैं। यह सभी प्रारूप इन बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इसकी शुरुआत करने वाले यहाँ पर काम कर रहे नौजवान समीर कुमार मिश्रा एसबीआई फेलो हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर इस तरह की प्रयोगशालाएं हर स्कूल में हों तो वह दिन दूर नहीं, जब आप अखबारों में भारतीय आविष्कारों के बारे में पढ़ेंगे।

समीर ने यहाँ पर एक और प्रयोग किया। उन्होंने यहाँ के स्कूली प्रोजेक्ट वर्क में परिकल्प की नीव रखी। परिकल्प एक नए प्रकार का प्रोजेक्ट करने का तरीका है, जिसके अंदर आप बच्चों से फाइलें न बनवाकर असल ज़िन्दगी की दिक्कतों का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चों के कई ग्रुप बनाए जाते हैं। फिर अलग-अलग ग्रुप को वि‍भि‍न्‍न कार्य दिए जातें हैं। एक ग्रुप को स्कूल में होने वाली बीमारियों की लिस्ट बनानी थी और उसका इलाज कैसे होगा, इस पर एक पोस्टर बनाना था। दूसरे ग्रुप को इसी पर काम करते हुए उन दवाओं के लिए एक प्राथमिक उपचार पेटी बनानी थी, जिसमें उन बीमारि‍यों की दवायें रखी जाएंगी। एक ग्रुप को मंगल यान का प्रतिरूप बनाना था। इस तरह बच्चे सीखतें भी हैं और स्कूल का भी स्तर बढ़ता है।

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यह स्कूल ऐसी जगह है जहाँ बिजली और नेटवर्क की काफी दिक्कत है। हमें पता चला कि‍ इसी स्कूल के एक बच्चा है सुभकांत जानी जिसने ने जवाहर नवोदय विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की है। गौरतलब है कि‍ उसके गाँव में बिजली है ही नहीं। वहां सूर्यास्त के बाद लालटेन और कैंडल पर ही ज़िन्दगी निर्भर है। अगर ऐसी जगह से एक बच्चा नवोदय जैसा परीक्षा में सफल होने का माद्दा रखता है और दीपक और सीताराम जैसे बच्चे अपने सीमित संसांधनों से कभी न डरते हुए विज्ञान के नए-नए प्रारूप बना सकते हैं तो हम अगर ठान लें तो जल्दी ही भारत को शिक्षा के पायदान में पानी के राकेट की तरह ही सबसे ऊपर ले जा सकते हैं|

वाटर राकेट बनाने  की विधि

आवश्यक सामग्री

1: पानी की पुरानी बोतल (1 लीटर )
2: कॉर्क
3: साइकिल पंप
4: फुटबॉल आदि में हवा भरने वाली पिन

विधि

1: पुरानी  बोतल का ढक्कन खोलें और उसमें आधे लीटर से थोड़ा कम पानी भरें |
4: बोतल का मुँह कॉर्क से इस प्रकार बंद करें जिससे बोतल पर दबाव देने पर ही वह निकले।
3: कॉर्क के बाहरी सिरे से हवा वाली पिन इस प्रकार अंदर डालें जिससे वह आधी अंदर और आधी बहार रहे | कोशिश करें कि‍ पिन कॉर्क के मध्य से होती हुई अंदर जाए।
4: बाहर वाले पिन के सिरे से साइकिल पंप की  नली  जोड़ दें।
5: पानी की बोतल को ज़मीन पर उल्टा रख दें जिससे कॉर्क वाला सिरा नीचे रहे। कॉर्क पानी को बाहर निकलने से रोके रखेगा।
6: बोतल को सहारा देने के लिए ईंट का उपयोग करें। ईंटों को बोतल के साइड में लगा दें, लेकि‍न ध्यान रहे वे बोतल को सिर्फ सहारा दें और पकड़े नहीं।
7: साइकिल पंप से बोतल के अंदर हवा पंप करना शुरू करें |
8: कुछ देर पंप करने के बाद आपको आपका हाथों से बना राकेट हवा से बातें करता नज़र आएगा |

 वैज्ञानिक सिद्धांत

यह उड़ान न्यूटन के तीसरे गति नियम पर आधारित है जो कहता है कि‍-
‘प्रत्येक क्रिया की उसके बराबर तथा उसके विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है।‘जितनी जोर से हम जमीन पर अपना पैर पटकते हैं, उतनी ही अधिक हमें चोट लगती है अर्थात् जितनी जोर से हम जमीन को नीचे की ओर दबाते हैं उतनी ही जोर से पृथ्वी हमें ऊपर की और धकेलती है. जितनी जोर से हम गेंद को पटकते हैं उतना ही ऊपर वह उछलती है।
इसी प्रकार बोतल से हवा के दबाव से बहार आता पानी ज़मीन से टकराता है। प्रतिक्रिया में वह बोतल को ऊपर की और धक्का देता है । इस प्रकार बोतल से जब तक पानी निकलता है बोतल ऊपर की ओर उड़ती चली जाती है।

प्रक्षेपण के दौरान ध्यान रखने लायक बातें-

1: इसे खुली जगह में ही किया जाए।
2: प्रक्षेपण के दौरान उसकी सीध में ना देखें और थोड़ा दूर खड़े रहें।
3: बोतल में आप पानी में रंग भी मिला सकते हैं। इससे नज़ारा बहुत अद्भुत लगेगा।
4:कॉर्क की जगह आप रबर का भी इस्तेमाल कर सकते है।  बैडमिंटन के शटलकाक के पीछे लगे हुए हिस्से का भी उपयोग कर सकते हैं।
5: आप इसे राकेट की तरह रूप देकर सुप्रवाही बना सकते हैं। लेकिन राकेट का वज़न कम रखें
6: 1 लीटर की बोतल से सफल प्रक्षेपण के बाद आप 2 लीटर की बोतल से भी यह प्रयोग कर सकते हैं।