पहले राष्ट्र, फिर विश्व : प्रेमपाल शर्मा

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विश्व हिन्दी दिवस, विश्व हिन्दी सम्मेलन, विश्व गुरु जैसे शब्द बार-बार सुनते हुए मन में बेचैनी भी पैदा करने लगे हैं कि आखिर कब तक हम दुनिया को ऐसे प्रमाण पत्र दिखाने और उनसे शाबासी लेने के लिए समारोह, सेमिनार आयोजित करते रहेंगे? किसी वक्त 1975 में जब विश्व हिन्दी सम्मेलन का भाव पहली बार जगा था तो हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे खुलने की दस्तक हो रही थी। संविधान, संसद की आवाज सुनते हुए और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाड़ु आदि राज्‍यों के डर और हिन्‍दी लादने के खिलाफ आक्रोश को भांप कर कुछ-कुछ बीच का रास्ता अख्तियार किया गया था। जैसे पहले इन पन्द्रह-बीस वर्षों में हिन्दी में अनुदित साहित्य उपलब्ध कराया जाएगा, प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण के कदम उठाये जाएंगे जिससे कि हिन्दी अंग्रेजी का स्थन राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे ले सके। शब्दावली आयोग, अनुवाद ब्यूरो, राज्यों में हिन्दी ग्रंथ अकादमियां, संसदीय समिति सभी अपने-अपने स्‍तर पर सक्रिय थे। महत्‍वपूर्ण बात यह भी आजादी दिलाने वाली और उन आदर्शों में डूबी, दबी पीढ़ी राममनोहर लोहिया, टंडन, जयप्रकाश नारायण, आयंगर, सेठ गोविन्द दास जैसों की राष्ट्रीय स्वीकृति और हिन्दी के प्रति एक संतुलित दृष्टि भी धीरे-धीरे सरकार और जनमानस को हिन्दी की तरफ मोड़ रही थी। इसका प्रमाण है कि‍ पहले शिक्षा आयोग (1964-66) की सिफारिशों में और फिर संघ लोक सेवा आयोग की सर्वोच्‍च परीक्षा में वर्ष 1970 से निबंध में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्‍दी में भी लिखने की छूट देना। संसद की बहसों में भी अपनी भाषा के प्रति उत्‍साह और समन्‍वय देखा जा सकता है। स्‍वाभाविक ही था कि इस उत्‍साह को विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन के रूप में विश्‍व पटल तक ले जाया जाए।

लेकिन हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की कहानी का विश्‍लेषण कई किन्‍तु-परन्‍तु के साथ रुक-रुक कर चलता है। विश्व सम्मेलन तो धडा़धड़ नियत अंतराल पर धूमधाम से हो रहे हैं, लेकिन क्या हिन्दी देश के प्रशासन, शासन, शिक्षा, न्यायालय में भी उसी गति से बढ़ रही है? या बिल्कुल उल्टा हो रहा है कि विश्व भाषा बनाने, संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा की मांग और दुहाई तो बार-बार भाड़े के नारों की तरह दी जाती है, लेकिन अपने देश की न्याय व्यवस्था से लेकर शिक्षा, प्रशासन में हिन्‍दी प्रयोग की बातें सिर्फ हिन्‍दी अधिकारियों के हवाले छोड़कर हम मुक्ति पा लेते हैं। पहली बार जनता सरकार में विदेश मंत्री बने अटल बिहारी बाजपेयी का संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में हिन्‍दी में दिया ओजपूर्ण भाषण कुछ वर्षों तक तो लोगों को अनुप्रमाणित करता रहा, लेकिन अपनी संस्‍थाओं में ‘हिन्‍दी के प्राण’ स्थाई तौर वह भाषण भी भर नहीं पाया। हकीकत तो यह है कि 1990 आते-आते सत्‍ता अंग्रेजी की देहरी पर घुटने टेकने के लिए पहुंच चुकी थी। उसके बाद आये उदारीकरण और वैश्‍वीकरण के सपने ने तो हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं पर ऐसा पाटा मारा कि हिन्‍दी विश्‍व में तो तथाकथित दावे करती घूम रही है, सम्‍मेलनों में भी हिन्‍दी के नाम पर खाने-पकाने वाले सपूत गर्व से फूले फिरते हैं, लेकिन अपने देश के साहित्‍य, मानविकी, शिक्षा, चिंतन पुस्‍तकालय में एकदम सूखा पड़ चुका है। सन् 1980 तक विद्वानों की मूल हिन्‍दी में लिखी दर्जनों मशहूर किताबें- इतिहास, राजनीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान की मिल जाएंगी, उसके बाद श्‍यामाचरण दुबे, कृष्‍ण कुमार जैसे एकाध विद्वान को छोड़कर शायद ही मिले। वर्ष 1979 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में अपनी भाषाओं के माध्‍यम की छूट देना भी भारतीय भाषाओं के स्‍वर्ण काल की तरफ बढ़ता पहला कदम था, लेकिन पता नहीं फिर क्या दुरभि संधियां हुई कि केवल अंग्रजी सबको पीछे छोड़ती हुई आगे आ रही है।

कुछ उदाहरण पर्याप्‍त होंगे। हाल ही में घर पर एक कामगार का अनुभव। शाम को उसने कुछ जल्‍दी जाना चाहा। क्‍यों? मुझे लौटने पर अपने बच्‍चे को लेना है, दिल्‍ली के एक टयूशन केन्‍द्र से। उसने खुश होकर बताया कि पूर्वी दिल्‍ली के एक नामी स्‍कूल में उसके बच्‍चे का आर्थिक कमजोर बच्‍चे (EWS) के आरक्षण में दाखिला हो गया है। लेकिन उसकी शिक्षिका कहती है कि इसकी अंग्रेजी कमजोर है। अत: इसको अंग्रेजी का टयूशन दिलाओ। पहली कक्षा से ही अंग्रेजी का यह आतंक धीरे-धीरे पूरे देश को ही अपनी गिरफ्त में ले रहा है। दिल्‍ली का मुखर्जीनगर इलाका गवाह है कि कर्मचारी चयन आयोग, संघ लोक सेवा आयोग से लेकर बैंक, लॉ, यूनिवर्सिटी में सफलता के लिए अंग्रेजी कितनी महत्‍वपूर्ण है। अपनी भाषा आये या न आये यदि अंग्रेजी आती है तो नौकरी पक्‍की। फिर हिन्‍दी की किताब क्‍यों पढ़ें?

भला हो मोदी सरकार का कि पुरानी कांग्रेस सरकार के निर्णय को उलटते हुए सिविल सेवा परीक्षा के जिस प्रथम चरण (सीसैट) में वर्ष 2011 में अंग्रेजी घुसा दी गई थी, उसे निकाल दिया गया है। यहां यह उल्‍लेख करना जरूरी है कि जनता सरकार के दौरान वर्ष 1979 से लेकर 2010 तक कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुपालन में सीसैट की प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी नहीं थी, लेकिन यूपीए की अंग्रेजीदां सरकार ने बिना संसद को विश्‍वास में लिए बिना किसी महत्‍वपूर्ण विमर्श के अंग्रेजी को सीसैट की आड़ में लाद दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि हिन्‍दी भाषी राज्‍यों समेत समस्‍त भारतीय भाषाओं के जिन सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या 15 से 20 प्रतिशत होती थी, घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। प्रधानमंत्री के हस्‍तक्षेप, न्‍यायालय की सक्रियता और बिहार, उत्‍तर प्रदेश के उम्‍मीदवारों के आंदोलन से भारतीय भाषाओं की जीत हुई और फिर से सफल उम्‍मीदवारों का प्रतिशत बढ़ रहा है।

लेकिन विश्‍व दिवस को सामने रखते हुए क्‍या इसे जीत माना जा सकता है? हरगिज नहीं। इतनी चौकियां तो हमारे पास सत्‍तर के दशक यानी 1979 तक ही आ गयी थीं। कोठारी समिति ने तो यह भी कहा था कि सभी सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं को माध्‍यम बनाया जाए। फिर क्‍या हुआ? क्‍या भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, आर्थिक सेवा, सम्मिलित चिकित्‍सा सेवा आदि दर्जनों केन्‍द्रीय सेवाओं में हिन्‍दी आज तक प्रवेश कर पायी? क्‍यों हमारे हिन्‍दी के दिग्‍गज, लेखक, प्राध्‍यापक, पत्रकार, राजनेता केवल विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन की ही वाट जोहते हैं? वक्‍त आ गया है कि हम नौकरि‍यों और शिक्षा में स्‍कूलों से लेकर विश्‍वविद्यालय तक अपनी भाषा के प्रवेश के लिए पूरे जोर से संघर्ष छेड़ दें। उम्‍मीद भरा आकाश मौजूदा सरकार है, जिसका प्रधानमंत्री केरल से कश्‍मीर तक केवल हिन्‍दी में ही अपनी बात सहजता से कहता है- बिल्‍कुल गांधी, लोहिया कि परंपरा में कि भाषा के बिना लोकतंत्र गूंगा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी का मानस हिन्‍दी या अपनी भारतीय भाषाओं से बहुत दूर था। इसका प्रमाण हाल ही में शिक्षाविद कृष्‍ण कुमार के आलोचना में छपे उस लेख से भी मिलता है, जब नेहरूजी निराला, महादेवी वर्मा के लेखन साहित्‍य को जानने से भी इंकार करते हैं। यहां विस्‍तार में जाने की आवश्‍यकता नहीं है न छिद्रान्वेशन और अतीत राग  की, लेकिन भारतीय भाषाओं के डूबने की पीठिका देश पर हावी उस सत्‍ता और उसके परजीवी लेखकों, बुद्धिजीवियों के उस दौर में मौजूद है, जिसके चलते हिन्‍दी पट्टी का अंतिम जन खस्‍ता हाल जिंदगी जीने को मजबूर है। न उसकी लिखी किताबें कोई पढ़ता, खरीदता न उसे समाज में उसकी कोई हैसियत। विचारणीय प्रश्‍न है कि पहले हिन्‍दी को राष्‍ट्र में स्‍थापित करें, फिर विश्‍व में। पुराना जुमला याद आता है- लोकल इज़ ग्‍लोबल यानी जो स्‍थानीय है वही वैश्विक है। विश्‍व से पहली देश में हिंदी को लाना होगा।

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