Archive for: December 2017

स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि
एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो,
लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रोपो;
लालसाओं और ज़रूरतों के बीच फासले पर सोचो.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर ज्यादा वक़्त नहीं है तुम्हारे पास
कितनी नदियां तैरनी हैंऔर कितने पहाड़ चढ़ने हैं;
संगीत में डूबना है और किताबों में खो जाना है;
दोस्तियां निभानी हैं और जीना भी है भरपूर.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
लेकिन बाहर धरती इंतज़ार कर रही है
सूरज तुम्हारी आँखों में उतरना चाहता है
और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है
बर्फ के फाहों की झुरझुरी और बारिश की फुहारें
तुम्हारे कानों में फुसफुसाना चाहते हैं,
यह दिन फिर लौटकर नहीं आएगा.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर एक दिन बेमुरव्वत बुढ़ापा घेर लेगा
और जब तुम विदा होगे (वो तो ज़रूर होगे)
तुम खुद धूल के बड़े ढेर में बदल जाओगे. 

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।