Archive for: November 2017

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)

गिरगिट : अन्तोन चेखव

अन्तोन चेखव

पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़बेरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।…चौक में एक भी आदमी नहीं। ….भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
“अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!” ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, “पकड़ तो लो, छोकरो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ…आह!”
कुत्ते की कि‍कि‍याने की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकड़ने की कोशिश में गिरते-गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते के कि‍कि‍याने और वहीं चीख- ‘जाने न पाये!’ दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
“हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!” सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो, “अरे बदमाश!” और उसकी उँगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचोंबीच अगली टांगें फैलाये अपराधी, सफेद ग्रेहाउँड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू-भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
“यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?” आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। “यह उॅँगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?”
“हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,” खूकिन ने अपने मुँह पर हाथ रखकर, खाँसते हुए कहना शुरू किया, “मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मरी उँगली में काट लिया।..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा,… और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचीदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उँगुली काम के लायक न हो पायेगी। कुछ  मुझे हर्जाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें।..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।”

“हुंह..अच्छा..” ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “ठीक है।…अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूँगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाऊँगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूँगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूँगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डंगर को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अक्‍ल दुरुस्त कर दूँगा, येल्दीरिन!”

सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, “पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा।…मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?”
“शायद जनरल जिगालोव का हो!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“जनरल जिगालोव का? हुँह…येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है।…मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नही आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?” ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, “यह तुम्हारी उँगली तक पहुंचा कैसे? यह ठहरा छोटा-सा जानवर और तुम हो पूरे लम्बे-चौड़े। किसी कील-वील से उँगली छील ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!”
“इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!”
“अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। और अगर मैं झूठा हूँ तो अदालत में फैसला करा लो। कानून में लि‍खा है… अब हम सब बराबर हैं। खुद मेरा भाई पुलिस में है..बताये देता हूं….हाँ…।”
“बंद करो यह बकवास!”
“नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है।” सिपाही ने गंभीरतापूर्वक कहा, “उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।”
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“जी सरकार।”
“मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं। एक-से-एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह तो बिल्कुल ऐसा-वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्‍को या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या हो? कानून की परवाह  किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो।…इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।”
“लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो।” सिपाही बड़बड़ाया, “इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।”
“हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!” भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
“हुँह।…येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सर्दी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैने इस सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हॉँ, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुँह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उँगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।”
“यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये।…ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?”
“वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!”
“इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है,” ओचुमेनलोव ने कहा, “आवारा कुत्ता है। यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?’’
“हमारा तो नहीं है।” प्रोखोर ने फिर आगे कहा, “यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्रेहाउँड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।”
“क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?” अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। “जर सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?”
“हां।”
“वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा-सा मुन्ना-सा कुत्ता है। इसकी उँगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपों मत। गुर्र…गुर्र…शैतान गुस्से में है… कितना बढ़िया पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
“मैं तुझे ठीक कर दूंगा।” ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबदा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

वीरेनियत-2 : एक बहुविध कविता गोष्ठी

वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजि‍त सालाना काव्य-जलसे का संचालन करते आशुतोष कुमार।

नई दि‍ल्‍ली : हरदिलअजीज कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले जन संस्कृति मंच के सालाना काव्य-जलसे का यह दूसरा आयोजन था। 29 नवम्बर की शाम 6 बजे से ही श्रोता और कवि हैबिटेट सेंटर, दिल्ली के गुलमोहर सभागार पर जुटाने लगे थे। मनमोहन, शुभा, उज्जवल भट्टाचार्य और दिगंबर जैसे वरिष्ठों के साथ अनुपम, निखिल, सुनीता, कुंदन, आशीष जैसे युवा भी कविता-पूर्व की गहमागहमी भरी बहस में सभागार के बाहर घास के मैदान पर बतकही में मशगूल थे। ठीक 6:30 पर वीरेन डंगवाल पर बने दस्तावेजी सिनेमा का एक अंश दिखाया जाना शुरू हुआ। वीरेन डंगवाल की कवितायें उनकी जुबान से सुनना रससिक्त कर देनेवाला अनुभव तो था ही, इस वीडियो-पाठ ने होने वाले कवि सम्मलेन का एक गहरा पर्यावरण रच दिया।

वीरेन डंगवाल की कविता  के बहुतेरे रंग हैं, उनमें से कई रंग कवि-सम्मलेन में उभरे, चमके, दिपे। उनके समकालीन कवियों की काव्य-भूमि तो उनकी साझे की थी ही, युवा कवियों ने भी अपनी कविताओं की मार्फ़त इस काव्य-भूमि को आपेक्षिक विस्तार दिया।

संयोजक-संचालक आशुतोष कुमार के बुलावे पर सबसे पहले अनुज लुगुन कविता पढने आये। अनुज की कविताओं की अलहदा दुनिया हम श्रोताओं को उन इलाकों तक ले गयी जहां सचमुच रवि की पहुँच नहीं है। एक अलग आँख से दुनिया को भांपती अनुज की कविता हमारे पारंपरिक आस्वाद-बोध को चुनौती देती है।अनुज द्वारा पढी गयी ‘हमारा दुःख, उनका दुःख’ कविता एक रूपक बनकर उभरी, जो दो दुनियाओं के बीच की जगह को ठीक-ठीक पहचानती है।

रुचि भल्ला हिन्दी कविता की दुनिया में अपेक्षाकृत नया नाम हैं, वे गोष्ठी की दूसरी कवि थीं। लगभग बतकही के शिल्प में रची रुचि की कविताओं ने दिखाया कि  रोजमर्रा की जिन्दगी की नगण्य चीजें-बातें कैसे कविता बन जाती हैं। एक कविता में स्वर्णाबाई की नज़र से देखी गयी दिल्ली का रंग यों उभरा- ‘दिल्ली वही है जहां शिंदे साहब टूर पर जाता है’। शरीफे पर लिखी उनकी कविता ने वीरेन डंगवाल की ‘पपीता’ जैसी कविताओं की याद ताजा कर दी। चर्च हिन्दी कविता में कम ही आया है, रुचि ने इलाहाबाद और गोवा के चर्चों की। चर्चा के जरिये श्रोताओं को ‘चर्च के पीछे के उस पेड़’ की याद दिलाई जो कभी किसी चर्च के पीछे था ही नहीं।

तीसरे कवि थे संजीव कौशल जिनकी कविताओं में राजनीतिक रंग साफ़ दिखे। ‘सत्ता की सोहबत बिजूकों को भी नरभक्षी बना देती है’ जैसी पंक्ति इस कठिन-कठोर समय में सत्ता के चरित्र और असर का जायजा लेती है। ‘चूल्हे’ और ‘कठपुतलियाँ’ जैसी कविताओं के सहारे संजीव हमारे वक्त का विद्रूप चेहरा दिखाते हैं, पर तरीका उनका बेहद संवेदनशील था।

अगले कवि महेश वर्मा अपने गहरे संवेदना बिंबों और अपनी अनूठी दार्शनिक नज़र के कारण  सराहे गए। डिस्टोपिक यथार्थ की बारीक समझ वाले संवेदन-बिम्ब मसलन ‘तालाब में उतराती अपनी ही लाश’ श्रोताओं को गहरे परेशान कर गए।

बिहार से आए वरिष्ठ कवि अमिताभ बच्चन की कवितायें जीवन प्रसंगों से कविता बुनने की विलक्षणता से भरी हुई थीं। व्यंग्य, जिसे आचार्यों ने कविता की जान कहा है, से भरी-पूरी अमिताभ जी की कवितायें आख़िर में एक गहरी उदासी छोड़ गयीं। हमारे वक़्त की शिनाख्त करती ये कवितायें एक हल्का कथा ढाँचा रखती हैं जिससे  तादात्मीकरण में बेहद आसानी हुई।

वीरेन डंगवाल के चिर-सखा और हिंदी के अप्रतिम कवि मंगलेश डबराल की कवितायें एक दूसरी, ज़्यादा इंसानी दुनिया की तलाश की कवितायें हैं, ऐसा उन्हें सुनते हुए फिर महसूस हुआ। ‘हमारे देवता’ जैसी कविता देव-लोक को मानुष-लोक में बदलकर समाज के सांस्कृतिक द्वंद्वों को रेखांकित कर गयी। मंगलेश जी के कलम में ही वह ख़ूबी है जो ‘बेटी पलटकर पूछती है/पापा आपने कुछ कहा’ जैसी पंक्ति पूरे काव्य-वैभव के साथ श्रोताओं के  दिलों में चुभ गयी।  अपनी एक गद्य कविता के माध्यम से उन्होंने राज की मुश्किलों व उसके भविष्य की ओर  इशारा किया।

गोष्ठी के आख़िरी कवि बल्ली सिंह चीमा की गजलें हिंदी कविता के छांदस रंग को उकेरने वाली थीं। उर्दू से हिंदी में आकर गजल का  न सिर्फ़ स्वर, बल्कि सँवार भी बदल जाता है,यह महसूस किया गया। जनता से संवाद करने की भाषा और लबों-लहजा इन गजलों की ख़ासियत थी। जैसे –

“कुछ तो किरदार नए मंच पर लाए जाएं
और नाटक को सलीके से निभाया जाए।”

एक और शेर था-” मेन दुश्मन को हारने के लिए लाज़िम है/हर विरोधी को ही दुश्मन न बनाया जाए।”

तीन घंटों तक चली इस बहुविध कविता गोष्ठी में ठसाठस भरे सभागार में मौजूद श्रोताओं की सक्रिय भीगीदारी इसे और समृद्ध बना गयी।

प्रस्‍तुति‍ : मृत्युंजय
संयोजक, कविता समूह, जन संस्कृति मंच