Archive for: October 2017

कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

बुद्धिमत्ता आखि‍र है क्‍या : आइजैक एसिमोव

आइजैक एसिमोव ( 2 जनवरी 1920- 6 अप्रैल 1992)

जब मैं फौज में था, मैंने एक एप्टीट्यूड टेस्ट में हिस्सा लिया था। अमूमन सभी सैनिक इस टेस्ट को देते हैं। आम तौर पर मिलने वाले 100 अंकों की जगह मुझे 160 अंक मिले। उस छावनी के इतिहास में किसी ने भी अब तक यह कारनामा अंजाम नहीं दिया था। पूर दो घंटे तक मेरी इस उपलब्धि पर तमाशा होता रहा।

(इस बात का कोई ख़ास मतलब तो था नहीं। अगले दिन मैं फिर से उसी पुरानी और शानदार फौजी ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया- यानी लंगर की चौकीदारी!)

जीवन भर मैं इसी तरह शानदार अंक लाता रहा हूं। और एक तरह से खुद को तसल्ली देता रहा हूं कि बड़ा बुद्धिमान हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे लोग भी मेरे बारे में यही राय रखें।

वास्तव में ऐसे अंकों का लब्बो-लुआब यही है कि मैं इस तरह के अकादमिक प्रश्नों का जवाब देने में खासा अच्छा हूं, जो इस तरह की बुद्धिमत्ता परीक्षाएं लेने वाले लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। यानी मेरी ही तरह के बौद्धिक रुझान के लोग।

उदाहरण के लिए, मैं एक मोटर मैकेनिक को जानता था जो इन बुद्धिमत्ता परीक्षाओं में किसी भी हाल मेरे हिसाब से 80 से ज्यादा स्कोर नहीं कर सकता था। मैं मानकर चलता था कि मैं मैकेनिक से ज्यादा बुद्धिमान हूं।

लेकिन जब भी मेरी कार में कोई गड़बड़ी होती तो मैं भागकर उसके पास पहुंच जाता। बेचैनी से उसे गाड़ी की जांच करते हुए देखता और उसके निर्देशों को ऐसे सुनता जैसे कोई देववाणी हो और वह हमेशा मेरी गाड़ी दुरुस्त कर देता।

सोचिए अगर मोटर मैकेनिक को बुद्धिमत्ता परीक्षा का प्रश्नपत्र तैयार करने को कहा जाता।

या किसी अकादमिक को छोड़कर कोई बढ़ई, या कोई किसान इस प्रश्नपत्र को तैयार करते। ऐसी किसी भी परीक्षा में मैं पक्के तौर पर खुद को बेवकूफ साबित करता और मैं बेवकूफ होता भी।

एक ऐसी दुनिया में, जहां मुझे अपनी अकादमिक ट्रेनिंग और मेरी जुबानी प्रतिभा का इस्तेमाल करने की छूट न हो, बल्कि उसकी जगह कुछ जटिल-श्रमसाध्य करना हो और वह भी अपने हाथों से, मैं फिसड्डी साबित होऊंगा।  

इस तरह मेरी बुद्धिमत्ता, निरपेक्ष नहीं, बल्कि उस समाज का एक फलन है जिसमें मैं रहता हूं। और यह उस सच्चाई का भी नतीजा है जिसे समाज के एक छोटे से हिस्से ने खुद को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ बनाकर थोप दिया है।

आइए, एक बार फिर अपने मोटर मैकेनिक की चर्चा करें।

उसकी एक आदत थी- जब भी वह मुझसे मिलता तो मुझे चुटकुले सुनाता।

एक बार उसने गाड़ी के नीचे से अपना सर बाहर निकाल कर कहा: “डॉक्टर! एक बार एक गूंगा-बहरा आदमी कुछ कीलें खरीदने को हार्डवेयर की दुकान में गया। उसने काउंटर पर दो अंगुलियां खड़ी कीं और दूसरे हाथ से उन पर हथौड़ा चलाने का अभिनय किया।

“दुकानदार भीतर से हथौड़ा ले आया। उसने अपना सर हिलाया और उन दो अंगुलियों की ओर इशारा किया जिस पर वह हथौड़ा चलाने का उपक्रम कर रहा था। दुकानदार ने उसे कीलें लाकर दीं। उसने अपनी ज़रूरत की कीलें चुनीं और चला आया। इसी तरह डॉक्टर, अगला बंदा जो दुकान में आया, वह अंधा था। उसे कैंची की ज़रूरत थी। तुम्हारे हिसाब से उसने दुकानदार को कैसे समझाया होगा?”

उसकी बातों में खोए-खोए मैंने अपना दायां हाथ उठाया और अपनी पहली दो अंगुलियों से कैंची की मुद्रा बनाकर दिखाई।

इस पर मोटर मैकेनिक जोर-जोर से हंसते हुए बोला, “हे महामूर्ख, उसने अपनी आवाज़ इस्तेमाल की और बताया कि उसे कैंची चाहिए।”

फिर उसने बड़ी आत्मतुष्टि से कहा, “आज मैंने दिनभर अपने ग्राहकों से यही सवाल पूछा।”

“क्या तुमने काफी लोगों को इसी तरह बेवकूफ साबित किया?” मैंने पूछा।

“बहुत थोड़े”, वह बोला, “लेकिन तुम्हें तो मैंने बेवकूफ साबित कर ही दिया।”

“ऐसा क्यों हुआ?” मैंने पूछा.

“क्योंकि तुम बुड़बक पढ़े-लिखे हो डॉक्टर. मैं जानता हूं कि तुम ज्यादा स्मार्ट हो भी नहीं सकते।”

 मुझे कुछ बेचैनी महसूस हुई कि वह मेरे बारे में थोड़ा-बहुत जानता है। 

(रूस में जन्‍में प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक की आत्‍मकथा का एक अंश। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है।)

खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है  : महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

सोशल मीडि‍या का कैसे सार्थक प्रयोग कि‍या जा सकता है, इसकी बानगी कवि-शि‍क्षक महेश चंद्र पुनेठा का ‘बाखली’ के सपांदक गि‍रीश चंद्र पाण्‍डेय द्वारा लि‍या यह साक्षात्‍कार है। फेसबुक के माध्‍यम से हुई इस बातचीत में लेखन के लि‍ए समीक्षा अथवा आलोचना की भूमि‍का, दक्षि‍णपंथ व वामपंथ, साहित्य में ‘लोक’, छंदबद्ध और छंदमुक्त कवि‍ता, शि‍क्षण में दीवार पत्रि‍का की भूमि‍का आदि‍ वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर लंबी बातचीत हुई है-

मुख्यतया किसी पुस्तक की समीक्षा के पैरामीटर्स क्या होते हैं ?

बहुत कठिन सवाल है।

आपके लिए कठिन नहीं है।

इस पर तो आमने-सामने बैठकर ही चर्चा हो सकती है। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि किसी किताब में क्या खास है और उसकी क्या सीमाएं हैं? इन दोनों पक्षों को लेकर समीक्षा में बात होनी चाहिए।

खास किसके लिए?

खास का मतलब नया या मौलिक, समाज को आगे ले जाने के लिए। मानवता के पक्ष में भी कहा जा सकता है।समीक्षा ऐसे प्रश्न भी खड़े करती है जो नई बहस को जन्म देते हैं। समीक्षा किसी भी पहलू को देखने का समीक्षक का अपना पक्ष भी होती है।

समीक्षक सीमाएं किस मायने में तय करता है?

सीमाओं का मतलब उसकी नजर में कथ्य-विचार -शिल्प और भाषाई की दृष्टि से उसमें क्या कमी रह गयी हैं? क्या वह रचना कहीं मानवीय मूल्यों के विरोध में तो नहीं खड़ी है?उसकी पक्षधरता किसी ताकतवर के साथ तो नहीं है? वह यथार्थ को भ्रमित तो नहीं करती हैं? आदि।

बहुत सारे समीक्षक लेखक का चेहरा देखकर समीक्षा करते हैं या फिर ये कहूँ समीक्षा करते ही नहीं। ऐसा क्यों होता है?क्या ये उस लेखक और पुस्तक के साथ अन्याय नहीं?

बिलकुल यह समीक्षा का बहुत बड़ा संकट है। आज समीक्षा किसी को स्थापित या किसी को खारिज करने के लिए ही अधिक हो रही है।निश्चित रूप यह लेखक और पुस्तक के साथ ही नहीं, साहित्य और समाज के प्रति भी अन्याय है।खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है।

समीक्षा और छिद्रान्वेषण में अंतर को किस तरह समझा जा सकता है?

समीक्षा में समीक्षक पुस्तक की ताकत और कमजोरी दोनों बताता है और छिद्रान्वेषण में खोज-खोजकर कमियों को सामने रखता है। उसका उद्देश्य केवल रचना या रचनाकार की कमजोरियों को उजागर करना और उसे खारिज करना होता है।

क्या वाकई कोई समीक्षा या टिप्पणी पुस्तक को या लेखक को ऊंचा या नीचा स्तर दे सकती है। इसमें आपको कुछ घालमेल नहीं दि‍खता?

बिल्कुल देती ही है। लेखक को उठाती भी हैं और गिरा भी देती हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, जहाँ समीक्षा ने लेखक को सामने लाने का काम किया। और बहुत सारे उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां समीक्षा ने किसी रचनाकार के प्रति भ्रम फैलाकर पाठक के मन में उसकी गलत छवि प्रस्तुत करने का काम किया। क्योंकि सामान्य पाठक तो समीक्षक की कही बात को महत्वपूर्ण मानकर उसी अनुसार अपनी राय बनाता है।

क्या ये माना जाए कि‍ पुस्तक लिखने के बाद उसकी समीक्षा होना जरूरी है?

जरूरी जैसा तो कुछ नहीं है। लेकिन समीक्षा होने से नये पाठकों तक किताब की जानकारी पहुंचती है। वह अधिक पढ़ी जाती है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद रचनाकार को भी अपने लेखन की सीमाओं का पता चल पाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता है। विमर्श भी आगे बढ़ता है।

पुस्तक के शीर्षक और उसके अंतर्निहित तत्वों का तादात्म्य कैसे होना चाहिए। बहुत सारे शीर्षक रोचक होते हैं, पर तत्व उतना रोचक नहीं। इस पर आपका मन्तव्य?

केवल शीर्षक के रोचक होने से काम नहीं चलेगा। मुख्य बात तो किताब की विषयवस्तु ही है। उसे ताकतवर होना चाहिए। यदि उसमें दम नहीं है तो लिखना बेकार।

वर्तमान में हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे नाम जो समीक्षाकर्म वाकई निष्पक्ष होकर कर रहे हैं?

नाम बहुत सारे हैं, किस-किस के नाम लिये जाएं ? विशेषकर कुछ युवा बहुत उम्मीद जगाते हैं।

जितने नाम भी अभी सूझ रहे हों, बताएं।

दरअसल, नाम लेने में नाम छूटने का खतरा अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की पढ़ने और देखने की अपनी सीमा होती है। हम केवल उन्हीं का नाम ले सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि जो हमने पढ़ा हो वह सब महत्वपूर्ण ही हों और जिन्हें नहीं पढ़ पाए हैं, वे महत्वपूर्ण न हों। फिर एक व्यक्ति ने जितना पढ़ा होता है, उससे कई गुना उससे अपढ़ा छूट जाता है।

यानी आप उस खतरे से बचना चाहते हैं?

माना जा सकता है। अनावश्यक विवाद मुझे पसंद नहीं है।

आप भी समीक्षा कर्म और आलोचना से जुड़े रहे हैं।किन पुस्तकों की समीक्षा करते-करते आपने खुद के लेखन में परिवर्तन पाया है?

सीखना तो हर नई किताब पढ़ने के बाद होता ही है। हर नई किताब ने मेरे लेखन में कुछ न कुछ परिवर्तन किया,  भले ही वह एक कमजोर किताब ही क्यों न रही हो। उसने मुझे बताया कि अपने लेखन में किन बातों से बचना चाहिए। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, भगवत रावत, विजेंद्र, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि कवि-आलोचकों पर लिखते हुए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विशेषरूप से यह कि जनपक्षधरता, जीवन में ईमानदारी-सादगी, जन और प्रकृति से निकटता, जमीन व समाज से लगाव किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को कितना ऊंचा उठा देता है? इससे लेखन में कितनी गहराई और व्यापकता आ जाती है? मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी रचनाकार पर लिखने से पहले उनके लिखे को गहराई और विस्तार से जानूं-समझूं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ नया जानने-समझने को मिला।

आपने बड़ा सधा हुआ जबाब दिया है। इस सूची में कोई युवा तो नहीं दिख रहा।

युवाओं की एक लम्बी सूची है, जिन पर मैं निरंतर लिखता रहा हूँ। उतने नाम गिनाने यहाँ संभव नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर मित्रों के बार-बार आग्रह पर लिखा। इसको आप मेरी बेमानी भी कह सकते हैं। लेकिन यह मेरी कमजोरी रही है कि मैं मित्रों के आग्रह को नजरंदाज नहीं कर पाता हूँ। समीक्षा लिखने के चलते कुछ मित्रों के साथ संबंधों में खटास भी आई।

क्या उन युवाओं के साथ अन्याय नहीं होगा, नाम न लेकर?

अन्याय जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि‍ मेरे नाम लेने या न लेने से किसी के कद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है।

एक थोड़ा-सा अटपटा सा प्रश्‍न जिसे पूछ ही लेता हूँ। कोई ऐसा उदाहरण किसी युवा के लेखन में आपकी समीक्षा के बाद बदलाव देखा गया हो?

मैं एक अदना सा पाठक और पाठक की प्रतिक्रिया से किसी के लेखन में भला क्या परिवर्तन आएगा मित्रवर।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आपके लिखने या न लिखने से फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी समीक्षा परिवर्तन लाती है। इसे आपने खुद माना है।

वह समीक्षा लिखने वाले के व्यापक अनुभव और गहरी दृष्टि पर निर्भर करता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, न मेरे पास ऐसा कोई व्यापक अनुभव है और न ही कोई गहरी दृष्टि। मैं तो अभी खुद सीख रहा हूँ। साहित्य और समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

जब हम साहित्य में समीक्षा की बात करते हैं तो वाम और दक्षिण दो पक्ष प्रमुख रूप से मिलते हैं। दोनों पक्षों की समीक्षा में मूलभूत अंतर क्या दिखता है?

वाम और दक्षिणपंथ की समीक्षा में वही अंतर है, जो इन दोनों विचारधाराओं के जीवन दृष्टि और साहित्य में है। दरअसल, हम किसी भी रचना का मूल्यांकन अपनी जीवन दृष्टि के आधार पर ही करते हैं। दुनिया को हम कैसे देखते हैं और उसे कैसा बनाना चाहते हैं? इसी आधार पर हम हर क्षेत्र का अन्वेषण-विश्लेषण करते हैं। कोई रचना या समीक्षा कर्म भी इसका अपवाद नहीं है। दक्षिणपंथ यथास्थितिवादी और परम्परावादी होता है। वह परम्परा में ऊपरी सुधार कर उसे मूलरूप में ही बनाए रखना और आगे ले जाना चाहता है। अतीत के प्रति अति मोहग्रस्त रहता है। अतीत में उसे अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आती हैं। उसे पुरानी समाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और नियम-कानूनों से भी कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। पुराने जीवन मूल्यों को ही स्थापित और संरक्षित करना चाहता है। सामाजिक असमानता को भी जस्टीफाई करता है। इसके विपरीत वामपंथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करता है और परम्परा के उन्हीं मूल्यों को आगे ले जाने का समर्थन करता है, जो प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस होते हैं। साथ ही एक समतावादी समाज के निर्माण में सहायक होते हैं। जीवन के प्रति यही दृष्टि उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होता है। दोनों पक्ष समीक्षा के दौरान रचना में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुकूल मूल्यों की पड़ताल और उसका खंडन-मंडन करते हैं।

वैसे क्या एक प्रश्न नहीं उठता कि समीक्षा पक्ष की प्रतिपक्ष को करनी चाहिए। वो ज्यादा लोकतान्त्रिक होती?

तब तो प्रत्येक रचना खारिज ही होगी। कोई भी रचना कसौटी में फिट नहीं बैठेगी, क्योंकि हर विचारधारा की अपनी-अपनी कसौटी होती है।

क्या यह भी सामन्तवाद की श्रेणी में नहीं आएगा कि आप अपने पक्ष को श्रेष्ठ मानते हैं। जरूरी नहीं कि‍ आपका पक्ष ही सही हो। दूसरा पक्ष भी हमेशा गलत तो हो नहीं सकता। इस पर क्या कहेंगे?

तब विचारधाराओं पर ही बात करनी पड़ेगी कि कौन सी विचारधारा अधिक जनपक्षीय, प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक है?  इतिहास को खंगालना पड़ेगा। पुराने अनुभवों को देखना होगा। लेकिन यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि हर विचारधारा की कसौटी तो अलग-अलग होती ही है। आप ही बताइये क्या किसी राजतन्त्र का मूल्यांकन, लोकतान्त्रिक कसौटी के आधार पर किया जा सकता है?

क्या यह माना जाए कि प्रतिपक्ष हमेशा गलत होता है

बिलकुल नहीं। पक्ष भी गलत हो सकता है। पर उसका निर्धारण किसी भी मूल्य, मान्यता तथा विचार को इतिहास के विकास क्रम में द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने पर ही हो सकता है। भले ही अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है, लेकिन हर देश-काल-परिस्थिति का अपना सत्य तो होता ही है। हमें उस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

साहित्य में ‘लोक’ एक ऐसा शब्द है, जिसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार या कहूँ लेखक, समीक्षक, आलोचक सब अपने को लोक के नजदीक दिखाना चाहते हैं। इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है? लोक के प्रति दया भाव या लोक के प्रति आस्था ?

लोक से नजदीकी दिखाने के सबके अलग-अलग कारण रहे हैं। कुछ के लिए यह लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम है तो कुछ के लिए प्रतिबद्धता का। जो लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोक के कितने नजदीक हैं,  वे लोक के मीठे-मीठे या उत्सवधर्मी रूप को अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं और लोकधर्मी होने का भ्रम पैदा करते हैं। बिलकुल उसी तरह से जैसे आज बहुत सारे लोग महोत्सवों में लोकगीत-नृत्य की प्रस्तुति कर या फिल्मों में लोक धुनों और लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर खुद को लोक संस्कृति का सच्चा समर्थक और संरक्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। जो लोक के प्रति प्रतिबद्ध होते हैंख्‍ वे लोक के संघर्षधर्मी, सामूहिक, सहकारी और प्रतिरोधीस्वरूप को अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। लोक को द्वंद्वात्मक रूप से देखते और दिखाते हैं। लोक की ताकत के साथ-साथ उसकी कमजोरियों को भी रेखांकित करते हैं। वे लोक को महिमामंडित नहीं, बल्कि जागरूक या चेतना संपन्न करते हैं। वे न दया दिखाते हैं और न ही आस्था। दरअसल, लोक को इन दोनों की ही आवश्यकता नहीं है। उसे तो अभिजात्य वर्ग द्वारा उसके खिलाफ की जा रही दुरभिसंधियों के प्रति सचेत कर उठ खड़े होने को ताकत देने वालों की जरूरत है। लोक की सामूहिक ताकत का अहसास कराने की आवश्यकता है।

एक मुकम्मल कविता जैसी कोई चीज भी होती है क्या?

दुनिया में मुकम्मल तो कुछ भी नहीं है। हो भी नहीं सकती है। ऐसा होगा तो फिर ठहराव आ जाएगा। जीवन का सौन्दर्य उसकी गतिशीलता में और परिवर्तनशीलता में ही है। हमेशा आगे बढ़ने में। क्या आप किसी नदी को देखकर कह सकते हैं कि‍ यह मुकम्मल नदी है या किसी पेड़ को देखकर कि यह मुकम्मल पेड़ है यानी कविता एक नदी की तरह है, प्रवाहमान होना ही उसका जीवंत होना है। कविता का काम हमें अधिक मानुष बनाना है, अर्थात अधिक संवेदनशील बनाना। हमारी संवेदनाओं का अधिकाधिक विस्तार करना। जीवन के सारतत्व तक पहुंचाना। सामान्यतः जिसे लोग नहीं देख पा रहे हैं, उसे दिखाना। यह तभी हो सकता है, जब वह नदी के सामान हमेशा प्रवाहमान हो ताकि उसमें नित नया जल प्रवाहित हो सके। वह छोटी-बड़ी धाराओं-सरिताओं को अपने में समाते हुए चले। वह गंदे नालों को भी अपने में मिलाकर उन्हें भी शुद्ध कर दे। अपने किनारे बसे जनों को अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन में नया जीवन और नई स्फूर्ति का संचार कर दे। खुरदुरे पत्थरों को चिकना कर दे और कठोर चट्टानों पर सुन्दर आकृतियाँ गढ़ दे। यह सब करते हुए किसी तरह का कोई भेदभाव न करे। अंत में सबको एक समुद्र का नागरिक बना दे।

लोग मानते हैं कि छंद मुक्त कविता जब से प्रचलन में आयी तब से कविता ने अपनी जमीन खोई है। छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई को किस रूप में देखते हैं, आप?

मुझे नहीं लगता है कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई जैसी कोई बात है। यह खाई हमारे पाठ्यपुस्तकीय संस्कारों ने पैदा की है। पाठ्यपुस्तकों में हमेशा से छंदबद्ध कविता पढ़ने के कारण कविता को लेकर एक संस्कार बन गया है कि कविता का मतलब एक छंदबद्ध रचना। जबकि छंदबद्ध हो जाने मात्र से कोई रचना कविता नहीं हो जाती है। कविता अपने मितकथन, नवीनता, रूपकात्मकता, लय और सरसता से बनती है। अपनी लाक्षणिकता और व्यंजना से बनती है। उसमें विचारबोध, भावबोध और इन्द्रियबोध का सही तालमेल होना जरूरी है। यदि छंदबद्धता में ही कविता की लोकप्रियता होती तो आज भी वह कविता जो छंदों में लिखी जा रही है, उसी तरह लोकप्रिय होती। जैसे सूर-तुलसी-कबीर की कविता। हाँ, यह जरूर स्वीकार करना पड़ेगा कि कविता के नाम पर आज जो लयहीन लद्धड़ गद्य लिखा जा रहा है, जिसमें शब्दस्फीति बहुत अधिक है और बिम्बों, प्रतीकों और रूपकों की घोर उपेक्षा करते हुए शुष्क विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, जिसमें इन्द्रियबोध और भावबोध सिरे से नदारत है। उसने कविता से पाठकों को दूर किया है। कविता के नाम पर जो अमूर्त और दुरूह गद्य लिखा जा रहा है, उससे बचने की आवश्यकता है।

कविता पढ़ी सबसे ज्यादा जाती है। पर कविता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो एक कहानी को मिलता है और चर्चा भी कम ही होती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं?

मुझे नहीं लगता है कि कविता का सम्मान कम है या कम चर्चा होती है । अच्छी रचना किसी भी विधा में हो, उसको सम्मान भी मिलता है और चर्चा भी होती है। दरअसल, खराब या नकली कविता इतनी अधिक लिखी जा रही है कि उसके ढेर में अच्छी कविता कुछ दब सी गयी है। फिर हर पाठक की अपनी-अपनी रुचि होती है। मैं तो आज भी सबसे अधिक कविता ही पढ़ता हूँ। सबसे अधिक मन कविताओं में ही रमता है। किसी भी पत्रिका में सबसे पहले कविता ही पढ़ता हूँ। हाँ, यह जरूर है कि कविताओं को कुछ ठहरकर पढ़ने की जरूरत पड़ती है। बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि कविता के प्रति नैराश्य भाव बढ़ा है। कवि भी तो कहानी की तरफ पलायन कर रहे हैं?

किसी कवि द्वारा कहानी लिखना न नैराश्य भाव है और न ही पलायन। हर विधा की अपनी सीमा होती है और हर जीवनानुभव की अपनी मांग। कभी-कभी रचनाकार को लगता है कि वह अपनी बात को किसी विधा विशेष में अच्छी तरह नहीं कह पाया है। कुछ ऐसा है, जो उस विधा विशेष की सीमाओं में बंध नहीं पा रहा है तो वह किसी अन्य विधा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। विषयवस्तु और जीवनानुभवों की प्रकृति के अनुसार विधाओं के बीच आवजाही चलती रहती है। यह सामान्य प्रवृत्ति है। हमेशा रही है। बहुत सारे समर्थ कवि हैं, जिन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी या अन्य विधाओं में भी रचना की है। कभी-कभी यह भी होता है जो बात हम छोटी से कविता में कह जाते हैं, वह एक बड़े उपन्यास में भी नहीं कह पाते हैं। हर विधा की अपनी-अपनी ताकत और प्रभाव है। किसी को कमतर नहीं माना जा सकता है। जहाँ सुई की जरूरत है वहां सुई का ही इस्तेमाल करना होगा। जहाँ संबल की जरूरत है, वहां सुई का मोह छोड़ना ही पड़ेगा।  क्या इसे हम पलायन कह सकते हैं?

बिल्कुल नहीं।

पर ऐसा देखने में आता है कि पहले कविता लिखने वाला कवि कहानी की और रुख करता है। उसके पीछे शायद जीवनानुभवों का दबाव रहता हो।

कहीं इसके पीछे महत्वाकांक्षा तो नहीं?

महत्वाकांक्षा कैसी?

यश भी हो सकता है?

यश तो अच्छी कविता लिखने पर भी मिलता ही है। यश का संबंध विधा से नहीं, बल्कि लेखन के स्तर से होता है।

आप अपने को समीक्षा कर्म में कविता में सहज पाते हैं या कहानी या अन्य किसी विधा में?

मैं कविता में ही खुद को सहज पाता हूँ।

सबसे पहली कविता या संकलन जिस पर आपने कलम चलायी?

विजेंद्र जी के एक कविता संग्रह पर मैंने पहली समीक्षा लिखी जो वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई।

उस पर विजेंद्र जी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने खुद अपना संग्रह भिजवाया था। कौन नहीं चाहता है कि उसके लिखे पर कोई बात करे।

अधिकतर देखा जाता है कि लोग समीक्षा करवाना तो चाहते हैं, परंतु सच्ची और खरी समीक्षा को पचा नहीं पाते।

आपने बिल्कुल सही कहा। सच कहो तो यह समीक्षा के सामने बहुत बड़ा संकट है। हर रचनाकार चाहता तो है कि उसकी रचना की समीक्षा हो, उस पर लिखा जाए। इस चाह में कोई बुराई भी नहीं है। आखिर कोई भी रचनाकार लिखता ही इसलिए है कि उसका लिखा हुआ पढ़ा जाए। उस पर बात हो ताकि उसकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। लिखे की सार्थकता भी यही है। लेकिन अधिकांश रचनाकारों की अपेक्षा रहती है कि उनके लिखे पर अच्छा-अच्छा ही कहा या लिखा जाए। उसकी खूब प्रशंसा हो। यदि आप दो-चार पंक्तियों में भी उनकी सीमा बता दो या उस ओर संकेत भी कर दो तो वे नाराज हो जाते हैं। इस सबके चलते मैं इधर अब समीक्षा करने से ही बचता हूँ। बहुत सारे मित्रों ने बोलचाल कम कर दी, जबकि पहले उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। वैसे तो मैं किसी भी किताब के मजबूत पक्ष पर ही अधिक लिखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि कमजोर ढूंढ़ने चलो तो बड़े से बड़े रचनाकार के यहां बहुत सारा कमजोर मिल जाएगा। कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं हो सकता है( जिसका लिखा हुआ सब कुछ श्रेष्ठ ही हो। इसलिए जब कभी बहुत जरूरी लगता है तो सीमाओं की ओर भी संकेत कर देता हूँ, लेकिन मेरा अनुभव है कि अधिकतर रचनाकार ऐसा पसंद नहीं करते हैं। एक और अनुभव रहा है मेरा- कुछ रचनाकार अपनी किताब भेजने के बाद तब तक समय-समय पर फोन करते रहते हैं, जब तक उनकी किताब की समीक्षा न लिख दी जाए और जब लिख दी जाती है तो यह सिलसिला बंद हो जाता है।

यह प्रवृति अधिकांश किस वयवर्ग के लेखकों में पायी जाती है?

ऐसे रचनाकारों में जो पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद अपनी एक पहचान बना चुके होते हैं। जिनकी एक-दो किताबें भी आ चुकी होती हैं।

वही कहना चाह रहा था- समीक्षा से जुड़ा कोई अप्रिय वाकया।

इतना बड़ा तो कुछ नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। छुटपुट प्रवृत्तियों के बारे में जिक्र कर ही चुका हूं।

आप समीक्षा के अलावा शिक्षा से भी जुड़े हुए है- एक संपादक के रूप में और एक शिक्षक के रूप में। क्या समीक्षा और संपादन दोनों एक-दूसरे के सहायक होते हैं या कठिनाई महसूस होती है?

जिस तरह से शिक्षा और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसी तरह लेखन और संपादन भी। इसलिए इनको करते हुए मुझे कभी कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई, बल्कि यह कहना चाहिए कि मदद ही अधिक मिली। साहित्य ने शिक्षा की और शिक्षा ने साहित्य की समझदारी बढ़ाने का ही काम किया। मुझे लिखने का शौक नहीं होता तो शायद मैं बहुत सारी शिक्षा की वे किताबें नहीं पढ़ पाता, जो मैंने पढ़ीं। साहित्य में अभिरुचि ने शिक्षण में भी मेरी बहुत सहायता की। साहित्य ने मुझे बच्चों और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। मेरा तो मानना है कि हर शिक्षक को रचनाकार और साहित्य का गहरा पाठक होना चाहिए। साहित्य हमारी कल्पनाशीलता, दृष्टि और संवेदना का विस्तार करता है। एक शिक्षक के लिए ये तीनों जरूरी होते हैं। एक रचनाकार-शिक्षक बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल और भाषाई दक्षताओं का अधिक अच्छी तरह विकास कर सकता है। उनके भीतर पढ़ने की आदत डाल सकता है। बालमन को अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकता है। साहित्य और शिक्षा मुझे जुड़वा भाई-बहन की तरह लगते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि विज्ञान-गणित के शिक्षकों को भी साहित्य का पाठक होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वे इन विषयों को और अधिक रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं।

एक सामान्य पाठक अगर कविता को पढ़ने और समझने का तरीका पूछ बैठे तो उसे किस तरह समझाया जा सकता है?

सूत्र जैसा तो कुछ नहीं है। दरअसल, यह संस्कार जैसा कुछ है, जिसे धीरे-धीरे ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर, न केवल कविता बल्कि जीवन को भी पढ़ने की जरूरत होती है। उस जीवनानुभव से गुजरने की भी जरूरत पड़ती है, जिस पर कविता लिखी गयी गई अर्थात उन स्रोतों तक जाना पड़ता है, जहाँ से कविता का उद्गम हुआ है। कविता को चलते-फिरते नहीं समझा जा सकता है। उसके पास ठहरना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है। कविता शब्दों में नहीं होती है। शब्दों में खोजोगे तो भटक जाओगे। कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। वह तो शब्दों के ओट में या दो शब्दों या फिर वाक्यों के अंतराल में भी हो सकती है। कभी-कभी तो कविता जहाँ शब्दों और पक्तियों में खत्म हो जाती है, वहां से शुरू होती है। इसलिए कविता को समझने के लिए धैर्य जरूरी है और साथ में अभ्यास भी। यही विशेषता है जो कविता को अन्य विधाओं से अलगाती है। अस्तु न कविता लिखना आसान है और न उसे समझना। कभी-कभी कविता जब शब्दों और पंक्तियों में खत्म हो जाती है, तब वहां से शुरू होती है। इसको सामान्य पाठक किस रूप में समझे। कविता को समझने को लेकर प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की कविता की ये पंक्तियाँ मुझे सटीक लगती हैं- जरा सम्हल कर/धीरज से पढ़/बार-बार पढ़/ठहर-ठहर कर/आँख मूंदकर आँख खोलकर/गल्प नहीं है/कविता है यह।

अलेक्सेई तोल्स्तोय ने कहीं कहा है कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्खन को काटना है। इसे आप किस रूप में मानते है? कविता जहां खत्म होती है, वहां से शुरू होती है, से आपका क्या आशय है?

बहुत सारी कवितायें जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से शुरू होती हैं हमारे मन मस्तिष्क में। पाठक उन्हें रचता है। कविता उसके मन में बहुत सारे प्रश्न पैदा करती है, जिनका उत्तर खुद पाठक तलाशता है और खुद ही देता है। इस तरह अपने भीतर एक कविता बुनता जाता है और उस कविता की उलझनों को सुलझाता जाता है, बिलकुल इसी तरह जैसे अलेक्सेई तोल्स्तोय का यह कथन कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्‍खन को काटना है। इस कथन का हर पाठक अलग-अलग अर्थ लेगा। हरेक अपनी-अपनी तरह से देखेगा। कोई जरूरी नहीं है कि वह आशय वही हो जो कवि व्यक्त करना चाहता हो। यही है शब्दों और पंक्तियों के बाद कविता शुरू होने से मेरा आशय।

कविता और एक्टिविज्म।

कविता और एक्टिविज्म, दोनों बहुत जरूरी हैं। एक्टिविज्म के बिना कविता का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। मैं इस बात का कट्टर समर्थक हूँ कि कविता लिखे जाने से पहले उसे जिया जाना जरूरी है। एक्टिविज्म कविता को जीने का एक तरीका है। हमारे आसपास कविता लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जीने वाले बहुत कम इसलिए उसका प्रभाव बहुत दूर तक नहीं जाता है। फिर ऐसी कविता लिखने का क्या मतलब जो खुद को ही न बदले। कम ज्यादा जितना भी हो, हमें इस दिशा में प्रयासरत रहना चाहिए। एक्टिविज्म हमें नये-नये जीवनानुभव भी देता है, जो लिखने के लिए बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि कविता कविता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए होनी चाहिए। यश प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

आपकी सबसे प्रिय कविता जिसे आप खुद का प्रतिबिम्ब कह सकते है। उसकी चार पंक्तिया अगर संभव हो?

बहुत सारी कविताएं प्रिय हैं। किसी एक का उल्लेख करें मैं दूसरों को कम नहीं करना चाहता हूँ। फिर प्रिय होना और खुद का प्रतिबिम्ब होना, दो अलग-अलग बातें हैं। एक साथ नहीं मिलाई जा सकती हैं। कोई जरूरी नहीं कि जो मुझे प्रिय हो, वह मेरे जीवन का प्रतिबिम्ब भी हो। बहुत सारी कवितायें हमें एक साथ अलग-अलग कारणों से प्रिय होती हैं बिल्कुल लोगों की तरह, क्या हम एक समय में एक से अधिक लोगों से प्रेम नहीं करते हैं? इसलिए यह बहुत कठिन प्रश्न है।

कविता अपने किस रूप में असरदार होती है?

कोई अपने कहन में असरदार होती है तो कोई कथन में। इसी तरह एक भावबोध में तो दूसरी विचारबोध और तीसरी इन्द्रियबोध में। फिर यह पाठक की रुचि और दृष्टि पर भी निर्भर करता है।

वही जानना चाह रहा हूँ कि‍ इन सब में किस रूप में सबसे ज्यादा असरदार होती है?

सबसे असरदार तो वही होगी जिसमें भावबोध, विचारबोध और इन्द्रियबोध तीनों का सही संतुलन हो।

आप ‘दीवार पत्रिका’ पर सालों से काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आए- एक साहित्यकार एक शिक्षक, और एक आम आदमी के रूप में।

परिवर्तन जैसा तो कुछ नहीं आया। हाँ, एक जिम्मेदारी का अहसास हुआ, लगा बच्चों के बीच उनकी रचनात्मकता के विकास के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है। यह पूरा क्षेत्र एक तरह से खाली पड़ा है। यह बहुत बुनियादी काम भी है। यदि हम एक विवेकशील, लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो नीवं से ही शुरुआत करनी होगी। बच्चों को रचनात्मक लेखन-अध्ययन का चस्का लगा देना होगा। ‘दीवार पत्रिका’ इस दिशा में मुझे सबसे कारगर माध्यम नजर आती है। इसमें बहुत अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। ‘दीवार पत्रिका’ अपने-आप में एक स्कूल है। एक ऐसा स्कूल, जिसमें बच्चों ‘हेड-हार्ट और हैण्ड’के संतुलित विकास का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही इसे पुस्तकालय के साथ जोड़कर पढ़ने की संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। बच्चों के साथ ‘दीवार पत्रिका’ पर काम करते हुए मेरी यह धारणा और पुख्ता हुई कि बच्चों के भीतर अपार क्षमता होती है, बस उन्हें अवसर देने और विश्वास करने मात्र की जरूरत होती है। वे ऐसा करके दिखा देंगे जैसा आप सोच भी नहीं सकते हैं। ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’में काम करते हुए बच्चों को जानने-समझने का और अधिक मौका मिला। यह समझ में आया कि बच्चों के भीतर अपार है। बस, हमेशा उन्हें अपने अनुसार चलाने की कोशिश की जाती है। सब उन्हें अपना जैसा बना देना चाहते हैं। वे जैसा बनना चाहते हैं, वैसा कोई उनको बनने ही नहीं देता है। बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार है।

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आया कहां से?

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आने का किस्सा बहुत लम्बा है। इस बारे में मैंने अपनी किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’में विस्तार से लिखा है। हाँ, यहाँ यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह मेरा कोई मौलिक विचार नहीं है। ‘दीवार पत्रिका’ का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अपनी बात कहने के लिए कुछ लोगों ने इस तरह के माध्यम का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के समूह ‘दीवार पत्रिका’ प्रकाशन करते रहे हैं। मैंने कुछ शिक्षक मित्रों के साथ मिलकर इसे एक अभियान का रूप देने तथा पाठ्यक्रम से जोड़कर शिक्षण का माध्यम बनाने का प्रयास अवश्य किया, जो आगे भी जारी रहेगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। साथी शिक्षकों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के भीतर जिज्ञासा पैदा की। शिक्षकों और बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निर्माण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज प्राथमिक स्कूलों तक में भी यह व्यापक पैमाने पर निकाली जाने लगी है। शिक्षण का एक सशक्त और सस्ता माध्यम बनकर सामने आया है। अच्छे परिणाम आ सामने आ रहे हैं। बच्चों को अपनी बात कहने का एक मंच मिला है। उनकी भाषायी दक्षता और अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हो रहा है। यह पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आशा करते हैं कि‍ आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी सामने दिखेगी, जिसकी रचनात्मकता को उभारने में ‘दीवार पत्रिका’ की अहम भूमिका रही होगी।

फिर मैं कविता की ओर लौटता हूँ। अधिकतर देखा जाता है कि‍ विद्रोह कविता का मूल कारण होता है। कविता का विद्रोही होना या कवि का विद्रोही होना इस पर आप क्या कहेंगे?

प्रतिरोध एक जरूरी जीवन मूल्य है। उसे जीवन में भी होना चाहिए और कविता में भी। यदि प्रतिरोध जीवन में नहीं होगा तो कविता में भी नहीं आ पाएगा। केवल दिखाने के लिए लाने की कोशिश की जाएगी तो वह भौंथरा प्रतीत होगा। पाठक जल्दी ही समझ जाएगा कि वह केवल कविता में कहने भर  के लिए प्रतिरोध है। ऐसी कविता पाठक के मन में प्रतिरोध के मूल्य को पैदा भी नहीं कर पाएगी। पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत,  सारोवीवा से लेकर नागार्जुन, पाश,  गिर्दा, वीरेन डंगवाल, वरवर राव सरीखे तमाम कवियों की कविताओं में हम जो प्रतिरोध देखते हैं, वह उनके जीवन में भी दिखाई देता है। मेरा मानना है कि कवि के विद्रोही हुए बिना कविता विद्रोही हो ही नहीं सकती है। ऊपर जिन कवियों का मैंने जिक्र किया उनके जीवन में पहले विद्रोह था, तब उनकी कविताओं में उतरा। एक बात और सच्चा होगा जो कवि उसके जीवन में विद्रोह होगा ही होगा। बिना विद्रोह के एक बड़ी कविता जन्म ले ही नहीं सकती है। वह कवि खाक कविता लिखेगा, जो संतोषी होगा। कविता तो असंतोष की ही उपज होती है। जब कवि अपने चारों-ओर से असंतुष्ट होता है और उसे बदलना चाहता है, तब उस बदलाव की पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में ही होती है। आदि कवि बाल्मीकि की कविता भी विद्रोह स्वरूप ही निकली, चाहे वो करुणा के रूप में हो। एक कवि जिस तरह का समाज बनाना या देखना चाहता है, उसी तरह की अभिव्यक्ति अपनी कविता में करता है। वह शिकारी के प्रति कवि का विद्रोह ही तो था, जिसके चलते उसके मुंह से वह श्राप फूटा।

जी जी…वो श्राप किसी भी संवेदनशील के मुँह से निकलता। हाँ, वह अलग बात है कि‍ उसे छंद का रूप दे दिया गया।

वह छंद में नहीं भी होता, तब भी कविता होती। हाँ, छंद ने उसे अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसलिए मुझे बार-बार लगता है कि कविता रूप में नहीं, बल्कि कथ्य में होती है। बहुत सारे लोग कविता नहीं लिखते हैं, लेकिन कवि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति किसी कविता से कम नहीं होती है। हमारे लोकगायक इसी तरह के तो थे। वे कवि कहलाने के लिए कविता नहीं करते थे। अपने आसपास के हर्ष-विषाद, दुःख-सुख, दर्द-आनंद को महसूस कर उनके भीतर से शब्द फूट पड़ते थे।

ऐसा क्या कारण है कि गेय पद ही सामान्य पाठक को अपनी ओर ज्यादा आकर्षित करते हैं?

स्वर जब संगीत के साथ मिल जाते हैं, अपना अधिक प्रभाव तो पैदा करते ही है। इसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि आदमी का स्वर से पहले सुर-संगीत से परिचय होता है। संगीत से आदमी का पहला लगाव होता है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति भी है- शिशु लोरी के शब्द नहीं/संगीत समझता है।

मैंने आज तक एक सरल और सहज महेश पुनेठा को देखा है, क्या कभी महेश पुनेठा को भी क्रोध आता है? अगर आता है तो घर, शिक्षण और साहित्य के माहौल में उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं?

आपने आधे महेश पुनेठा को ही देखा है। बाहर कोई भी पूरा दि‍खता कहाँ है? घर में ही किसी को पूरा देखा जा सकता है। क्रोध प्राणी मात्र का मूल संवेग है, तब महेश पुनेठा भला उसका अपवाद कैसे हो सकता है? हाँ, उसे नियंत्रित करने की जरूरत पड़ती है। बादल बनेंगे तो बरसेंगे जरूर और बरस जाना ही ठीक भी होता है, फटना नहीं चाहिए। ‘बादल फटने’का क्या हश्र होता है? इसे हम पहाड़ियों से अधिक अच्छी तरह कौन समझ सकता है? क्रोध आता है तो व्यक्त कर देता हूँ। लेकिन हमेशा खुद को चैक भी करता रहता हूँ कि क्या मेरे व्यक्त करने का तरीका सही था और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था? दूसरे को ही दोषी न मान खुद के दोष को स्वीकार करता हूँ इसलिए दूसरी बार क्रोध करने से बच जाता हूँ। मेरा मानना है कि दूसरे को भी क्रोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि हम यह मान लें कि क्रोध करने का अधिकार छोटों और कमजोरों का भी उतना ही है, जितना बड़ों और ताकतवरों का, तो हम अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण कर सकते हैं।

कविता और प्रेम इसको आज लिखे जा रही कविताओं में किस स्तर पर पाते हैं?

प्रेम जीवन का सनातन भाव है और कविता का सनातन विषय भी। जब तक जीवन रहेगा, प्रेम भी रहेगा और कविता में व्यक्त भी होगा और खूब हो रहा है।

क्या आपने कविता में प्रेम को जिया है?

क्या प्रेम को जिए बिना कविता रच पाना संभव है? मेरा छोटा अनुभव तो यही कहता है, असम्भव है। तब मैं बिना प्रेम का कविता कैसे लिख सकता हूँ, मित्रवर। वह तो केवल रोबोट के लिए ही संभव है।

आप पतली गली से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी अपनी कोई प्रेम पगी पंक्तियां?

सारी ही कवितायेँ प्रेम में पगी हैं। कहा न, प्रेम के बिना तो कविता लिखना ही असंभव है। आप मानवीय मूल्यों से प्रेम करते हैं,  कमजोर,  दमित, शोषित, पीड़ित से प्रेम करते हैं,  इसीलिए कविता लिखते हैं और लिख पाते हैं। यदि आप इनके प्रेम में पगे न हों तो इनके पक्ष में एक पंक्ति भी नहीं लिख पायेंगे और जो लिखेंगे भी तो भले वह कुछ भी हो, लेकिन कविता नहीं होगी।

आजकल लिखी जा रही प्रेम कविताओं की गहराई और उनका फैंटेसी पर कुछ बोलना चाहेंगे?

गहराई किसी काल की मुहताज नहीं होती हैं। उथली प्रेम कवितायेँ हर काल में लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। उसमें से मोती चुनने का काम तो सहृदय का है। फैंटेसी का इस्तेमाल कविताओं में खूब होता रहा है, पर इसके साथ खतरा यह है कि यह अक्सर यथार्थ से पलायन का बहाना बन जाती हैं। फैंटेसी की सर्थाकता तो तभी है, जब वह यथार्थ से साक्षात्कार का माध्यम बने। जैसा कि हम मुक्तिबोध के यहाँ पाते हैं।

बात मुक्तिबोध की आ ही गयी। मुक्तिबोध की कविता सामान्य पाठक के लिए तो समझना बहुत मुश्किल होता ही है। मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं, उनकी कविता के भंवर में। इसे मुक्तिबोध की कमजोरी कहेंगे या विद्वता?

बिलकुल आप ठीक कह रहे हैं, मुक्तिबोध की कविता में सामान्य पाठक ही नहीं, मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, विजेंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार भी उनकी कविता में जटिलता और दुर्बोधता की शिकायत करते हैं। इसलिए उन्हें ‘कवियों का कवि’भी कहा जाता है। लगभग सभी साहित्यिक मानते हैं कि उनकी कविता को समझना बहुत आसान नहीं है। उनका भावबोध और रचना प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। फंतासी का इस्तेमाल भी उनकी कविता को दुरूह बना देता है। संस्कृत, तत्सम और अप्रचलित शब्दों की प्रधानता भी उनकी भाषा को कठिन बना देती है। मैं इसे मुक्तिबोध की कविता की एक सीमा मानता हूँ। लेकिन जब हम उनकी आलोचनात्मक लेखों, डायरी के पन्नों और पत्रों को पढ़ते हैं, तो उनकी कवितायें खुलने लगती हैं। एक ताना हाथ आने की देर होती है, बस। दरअसल, मुक्तिबोध की कविता की जटिलता जानबूझकर पैदा की गई, जटिलता नहीं है। जैसा कि बहुत सारे कवि करते हुए पाए जाते हैं। अपनी बात को जलेबी की तरह घुमाकर एक प्रभाव पैदा रकने की कोशिश करते हैं, जबकि कथ्य के स्तर में उसमें कुछ खास होता नहीं है। केवल वाग्जाल फैलाते हैं। लेकिन मुक्तिबोध की जटिलता जीवनानुभवों और नवीनता से पैदा जटिलता है। जिनका मंथन करने पर मक्खन निकलता है। वह हमें मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चल रहे संघर्षों की अनुभूति से परिचित कराते हैं। चेतन और अवचेतन की बात करते हैं। कभी-कभी इतनी गहराई में चले जाते हैं कि उनको पकड़ना कठिन हो जाता है, लेकिन जब धैर्य रखते हुए उनके साथ उतरते हैं, तो नायाब मोती भी हाथ लगते हैं। मुक्तिबोध के दुरूह लगने का एक कारण उनका मराठी भाषा से हिंदी में आना भी रहा। हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं थी, बल्कि अर्जित भाषा थी। मुक्तिबोध ने जिंदगी के जिन सवालों को उठाया और जिस विचार व भावभूमि का निर्माण किया,  वैसा हिंदी के बहुत कम कवि कर पाए।

कहीं किसी का लिखा हुआ पढ़ रहा था,कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, अगर उसे पाठक से जुड़ना है तो ।’ क्या आप इससे सहमत हैं?

सवाल छंद का नहीं है। यह कहना कि छंद में न होने के कारण आज कविता से पाठक दूर हो रहे हैं, यह स्थिति का सामान्यीकरण है। कारण बहुत सारे हैं। यदि छंद जुड़ाव का एकमात्र कारण होता, तो वे सारी कवितायें जो आज भी छंद में लिखी जा रही हैं, उनके बहुत सारे पाठक होने चाहिए थे या वे बहुत पढ़ी जानी चाहिए थीं,  क्या ऐसा है ? आज कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त उसके पाठक कम ही हैं, बल्कि हमेशा ही गम्भीर साहित्य के पाठक कम ही रहे हैं। मेरे राय में कविता के छंदबद्ध होने से अधिक जरूरी है- कविता का जीवन से जुडा होना। जीवन के ज्वलंत सवालों को उठाना,  उनसे जूझना, पाठकों को नए जीवनानुभवों से परिचित कराना, जो कविता इस रूप में हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है और उससे जुडती है,  उन कविताओं से पाठक अवश्य जुड़ता है। उन्हें पढ़ता है। बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें इस बात का प्रमाण हैं। ऐसी बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें हैं, जो बहुत सारे पाठकों द्वारा पसंद की जाती हैं। इस सबको थोड़ी देर के लिए अलग भी कर दें तो फिर भी पीछे नहीं लौटा जा सकता। कविता छंद से बहुत आगे आ चुकी है,  यह केवल हिंदी में ही नहीं, दुनियाभर के साहित्य में हो रहा है। मुक्तछंद में कविता लिखी जा रही हैं। इसका कारण छंद की अपनी कुछ सीमायें रही हैं। आज जीवन की जटिलता को छंदों में बांधकर पूरी तरह से कहना संभव नहीं लगता है। छंद बहुत बार भाव और विचार का गला घोंट देते हैं। हाँ, यह जरूरी है कि कवि को छंद की परम्परा का ज्ञान होना चाहिए। उससे ताकत ग्रहण करनी चाहिए। यदि छंद में आज का यथार्थ व्यक्त हो पाता है, तो व्यक्त भी किया जाना चाहिए। छंद से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन केवल छंदबद्ध रूप में ही कविता मान्य होगी, यह अब नहीं चलने वाला है। मुक्तछंद अब बहुत आगे निकल आया है।

आपने कविता और समीक्षा के साथ-साथ क्या कभी किसी कहानी पर भी काम किया?

एक दौर में लघुकथाएं लिखी थीं। उससे अधिक नहीं।

पहली लघुकथा कौन सी थी?

अपराधिनी।

लघुकथा कथा में परिवर्तित क्यों नहीं हो पायी?

कोई कोशिश नहीं की।

कहानी और कविता के सृजन में मूलभूत अंतर आप क्या पाते हैं?

कहानी विस्तार की अधिक आजादी देती है, जबकि कविता में कम शब्दों में अधिक कहने की जरूरत पड़ती है। कविता में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों आदि का प्रयोग एक तरह से विधागत आवश्यकता होती है। कविता किसी अन्न को पोटली में रखना है, तो कहानी उसे बिछा देना। कहानी सृजन अधिक समय की मांग भी करती है। फिर विषयवस्तु की अपनी मांग का भी सवाल होता है। मुक्तिबोध ने तो एक ही विषय पर कविता भी लिखी है और कहानी भी।

जी, वही अंतर जानना चाह रहा था ।

उन्हें लगा होगा कि‍ शायद कविता में वह अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाए इसलिए उन्होंने कहानी द्वारा कहने की कोशिश की होगी।

कहानी और नाटक की भारतीय परंपरा में सुखान्त को तरजीह देते आए हैं। लेखक पर वेस्टर्न लेखक इस का अनुपालन नहीं करते ऐसा क्यों?

यह जीवन दृष्टि का अंतर है। भारतीय जीवन दृष्टि संतोषम परम सुखम पर विश्वास करती है। जो है, अच्छा ही है। जो होगा, अच्छा ही होगा। जो तय है, वही होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता है। हमारा अधिकांश साहित्य इसी दृष्टि को ही स्थापित करता है। इसको अंत भले का भला वाली दृष्टि भी कह सकते हैं। जबकि ऐसा हो, कोई जरूरी नहीं। अक्सर देखा गया है कि‍ भला तो ताकतवर का ही होता है। ताकत की भला-बुरा तय करती है। इतना ही नहीं, भारतीय दृष्टि यह भी है कि यदि कहीं कोई बुरा है तो उसमें कोई बदलाव भी करेगा तो वह कोई अवतारी पुरुष ही करेगा। जनशक्ति की उसमें कोई भूमिका नहीं। यह दृष्टि यथास्थितिवादी दृष्टि है।

क्या आपने कभी किसी कहानी को भी एक समीक्षक की दृष्टि से देखा?

बहुत अधिक तो नहीं। कुछ कहानी संग्रहों और उपन्यासों की भी समीक्षा लिखी है, मैंने।

कहानी की समीक्षा के वो तथ्य और कथ्य जिन्हें आप मानते हैं कि कहानी उनके बिना कहानी नहीं होती है?

कहानी में सबसे पहली बात है- उसमें कहानीपन का होना, वह निबंध की तरह न हो। शेष किसी भी रचना की समीक्षा करते हुए चाहे वह कविता हो या कहानी, सबसे पहले यही देखता हूँ कि उस रचना के माध्यम से रचनाकार ने जीवन की किस बुनियादी बात को उठाया है, जिसे अब तक किसी और ने न उठाया हो? क्या रचना में वही दिखाया गया है, जो सब देख रहे हैं या उसे दिखाया गया है,जिसे सामान्यतः लोग देख नहीं पाते हैं? उस रचनाकार की अपने जन, समाज और प्रकृति को देखने की दृष्टि क्या है? वह अपनी रचना में किसके पक्ष में खड़ा है? रचना में जिस समाधान की ओर संकेत किया गया है, वह कितना तर्कसंगत और मानवीय है? रचना पाठक की संवेदनाओं का विस्तार करने में कितनी सक्षम है?  क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वही रह जाता है, जो उसे पढ़ने से पहले था या कुछ परिवर्तन आता है? आदि-आदि।

हम कहानी की बात कर रहे थे, बहुत सारे लोग कहानी लिख रहे हैं। कहानी गढ़ने में काल्पनाशीलता की कितनी आवश्यक्ता होती है?

कल्पना तो सृजन का एक आवश्यक तत्व है। इसके बिना कोई भी रचना अनुभववाद की शिकार होकर रह जाती है। कल्पनाशीलता के बिना कोई भी रचना बड़ी नहीं हो सकती है। इसके अभाव में कोई भी रचनाकार केवल एक दर्पण बनकर रह जाता है। उसके सामने जो घट रहा है, उतना ही वह अपनी रचना में दिखायेगा, उससे अधिक कुछ नहीं। जबकि रचनाकार का काम वह दिखाना भी होता है, जो उसके सामने नहीं घट रहा है। दूसरे शब्दों में जिसे एक सामान्य आदमी नहीं देख पाता है। वह जिस नये समाज को अपनी रचना में दिखाता है, वह कल्पनाशीलता से ही संभव होता है। लेखन ही नहीं, बल्कि कोई भी सृजन हो वह कल्पनाशीलता के बिना संभव नहीं होता है। शिक्षण को भी में इसी रूप में देखता हूँ।

क्या आपने किसी पाश्चात्य कहानीकार को भी पढ़ा है?

थोडा़ बहुत मैक्सिम गोर्की और ताल्स्तॉय को।

पाश्चात्य लेखन और भारतीय लेखन शैली में क्या अंतर पाते हैं?

ज्यादा पढ़ा ही नहीं है, क्या अंतर बताऊंगा भला।

अपने लेखन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

कुछ नही।

क्यों?

अपने लेखन पर भला खुद क्या कहा जा सकता है? जो लिख दिया, लिख दिया। अब वह मेरा कहाँ रहा।

आपके लेखन को मजबूती देने में आपकी धर्मपत्नी शीला जी के योगदान को आप किस रूप में रेखांेकित करना चाहेंगे?

मैं तो पूरा उनका ही योगदान मानता हूँ। वह यदि सहयोग नहीं करतीं तो शायद में न पढ़ पाता और न लिख। कभी भी उन्होंने मेरे पढ़ने-लिखने को लेकर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। उसे कभी भी फालतू या बैठे-ठाले का काम नहीं कहा। जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है। मेरे लिखे की पहली पाठक वह ही रहीं हैं। मैं सुनाता हूँ और वह सुनती रहती हैं। बहुत बार तो पहला प्रूफ वह ही देखती हैं। व्याकरण और वर्तनी की गलतियों को पकड़ती हैं।घर की पूरी जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेकर मुझे पढ़ने-लिखने के लिए छोड़ा है। मेरे बैंक-पोस्ट ऑफिस वाले काम भी वह निपटा देती हैं। पहले जब हाथ से लिखना होता था, तो मेरी कविताओं को फेयर करने का काम भी बहुत बार वहीं करती थीं। शुरू-शुरू में वापस आई रचनाओं के लिफाफों को छुपाने का काम भी। जब मैं नाश्‍ता-पानी कर लेता था, तब वह उन लिफाफों को मुझे दिखाती थीं। उन्हें इस बात का अहसास रहता था कि मुझे रचनाओं के लौटने पर कितना दुःख होता है। मेरा मानना है कि पत्नी के सहयोग के बिना कोई भी लेखक लम्बा लेखन नहीं कर सकता है।आपको तो पता है कि मैं जितने समय भी घर में रहता हूँ, लिखने या पढ़ने का काम ही करता रहता हूँ, लेकिन शीला ने कभी इस पर कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि जब उनको घरेलू कामों से फुर्सत हो जाती है तो अपनी बुनाई लेकर या किताब लेकर मेरे बगल में आकर बैठ जाती हैं। बीच-बीच में घर-गृहस्थी और आसपडो़स की बातें मुझे बताती रहती हैं। कभी-कभी पढ़ने-लिखने में डूबे रहने के कारण सुन नहीं पाता हूँ, तो हल्की नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके पास मेरी बात सुनने के लिए समय कहाँ ? लेकिन यह नाराजगी क्षणिक ही होती है। फिर थोड़ी देर में अदरक का पानी बनाकर ले आती है। वह खुद भी बहुत अच्छी पाठक हैं। घर में आनेवाली साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियां तो शायद ही कोई उनसे अपठित रही हो। घर में आने वाली कोई भी कहानी संग्रह या उपन्यास सबसे पहले वही पढ़ती हैं। अच्छा हुआ तो मुझे भी पढ़ने का सुझाव देती हैं।

मनाने का समय ही नहीं होता होगा, कभी यह वाक्‍य नहीं निकला- ये किताबें मेरी सौतन हैं?

यह वाक्‍य तो सुनने को नहीं मिला अब तक।

अच्छी बात है।

इतना ही नहीं, हमारे घर में पढ़ने-लिखने वाले लोगों का हमेशा आना-जाना लगा रहा है। घंटों तक बैठा रहना और बहस सामान्य बात रही है। हमारी बहस चलती रहती है और शीला बहुत प्रेम से चाय-पानी पिलाती रही हैं। खाना खिलाती रही हैं। खुद भी हमारे बातचीत में शामिल होती रही हैं। बाहर से आये साहित्यकारों का रुकना भी होता रहा है।उनकी सेवा-सुश्रुषा में भी कभी कोई कमी नहीं आने दी होगी। गंगोलीहाट में हमने अपने आवास में एक पुस्तकालय स्थापित किया था, उसकी साफ-सफाई और देख-रेख का काम भी शीला ही देखती थीं। यहाँ भी मेरे द्वारा अपने पुस्तकालय को सार्वजनिक करने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। पुस्तकालय से पाठकों को किताब देने के साथ-साथ चाय भी पिला देती हैं। ‘शैक्षिक दखल’ शुरू की उसके प्रकाशक की भूमिका में भी उन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। पंजीकरण का पूरा काम उन्होंने अपने हाथ में लिया। बैंक में खाता खोलना और लेन-देन करना सभी काम वही देखती थीं।

आपकी कविताओं को जब पढ़ता हूँ तो आंचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत कम ही होता है, फिर भी आपकी कविताएं आंचलिकता को पूर्णतया उभार पाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

आंचलिक शब्दों के प्रयोग के बारे में मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि इन शब्दों का इस्तेमाल जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। ये शब्द सहज रूप से कथ्य की जरूरत के मुताबिक ही आने चाहिए। वहीं आने चाहिए, जहाँ भाव-विचार या प्रसंग की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हों। जब उनका कोई और विकल्प न हो। किसी दूसरे शब्द के माध्यम से वह गहराती, तीव्रता और व्यापकता नहीं आ पा रही हो। देश-काल-परिस्थिति और पात्र की प्रमाणिकता के लिए अति आवश्यक हो। किसी रचना को आंचलिक रंग देने मात्र के लिए मैंने कभी बोली के शब्दों का प्रयोग नहीं किया। आंचलिक शब्दों के अतिशय प्रयोग से रचना के बोझिल और दुरूह होने का उसी तरह खतरा पैदा हो जाता है, जैसे तत्सम और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से। केवल बोली के शब्दों से ही कोई रचना आंचलिक नहीं हो जाती है। जीवन की घटनाएँ, प्रकृति, समाज और उसमें आये चरित्र भी रचना को आंचलिक बनाते हैं।

यह कह सकते हैं लेखकों को आंचलिक शब्दों के प्रयोग सतर्कता बरतनी चाहिए।

बिलकुल। बोली के शब्दों के प्रयोग में यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि वे सहज रूप से आयें, कहीं भी जबरदस्ती ठूंसे नहीं लगने चाहिए। पाठक को उन्हें समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़नी चाहिए, सन्दर्भ से ही उनके आशय खुल जाने चाहिए। बेहद सतर्कता की जरूरत है।

साहित्य के केंद्रीकरण पर आप क्या कहना चाहेंगे?

केन्द्रीकरण से आपका क्या आशय है ? प्रश्न को थोडा और खोलें।

साहित्य का कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द होना।

पाठकों के या साहित्यकारों के?

साहित्यकारों के।

मुझे लगता है कि‍ आज ऐसा नहीं है। छोटी-छोटी जगह से निकलने वाली ‘बाखली’जैसी सैकड़ों लघु पत्रिकाओं और सोशल मीडि‍या ने इसे तोडा़ है।

यानी ये आज केवल भ्रम रह गया है।

वस्तुस्थिति में काफी बदलाव आया है और आता जा रहा है। गढ़ और मठ टूट रहे हैं। अब दूर-दराज से लिखने वाले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। कुछ महानगरों या साहित्य के केन्दों की बपोती नहीं रहा। सोशल मीडिया साहित्य को आम पाठक तक ले जाने और साहित्यकारों के आपसे संवाद का एक प्रभावशाली और सशक्त माध्यम है। इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के प्रचलन बढ़ने से साहित्यकार और पाठक के बीच से संपादक और आलोचक की भूमिका कम हो गयी है। अब साहित्यकार इनका मुहताज नहीं रह गया है।

वेदप्रकाश जी के जाने पर लुग्दी साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। आप लुग्दी साहित्य को किस स्तर पर देखते हैं?

लुगदी साहित्य को मैं साहित्य के क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल के रूप में देखता हूँ। पढ़ने की लत लगाने में इसकी भूमिका हमेशा से असंदिग्ध रही है। उससे अधिक मैं इसके कोई सार्थकता नहीं देख पाता हूँ।

जो शास्त्रीय साहित्य अलमारियों और पुस्तकालयों में डम्प है, उसको किस श्रेणी में रखेंगे?

उच्च शिक्षा।

थोड़ा विस्तार से।

शास्त्रीय साहित्य हमें जीवन की गहराई और व्यापकता में ले जाता है। जीवन के विविध रूप-रंग-गंधों का दर्शन कराता है। अधिक मानवीय बनाता है। संवेदना का विस्तार करता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो अंतरात्मा के आयतन का विस्तार करता है। जीवन के ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। और एक बदलाव की दिशा बताता है। उसके लिए एक बेचैनी पैदा करता है। उसे पढ़ने के बाद पाठक वैसा नहीं रह जाता है, जैसा उससे पहले था। वह अपने को अधिक समृद्ध पाता है। केवल वस्तुस्थिति का चित्रण ही नहीं करता है, बल्कि उसके कारणों की पड़ताल भी करता है। कार्य और कारणों के संबंधों की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करता है। कुल मिलकर विवेकशीलता, संवेदनशीलता,  भाषाई संस्कार और वैज्ञानिक सोच पैदा करतस है।

सामन्तवाद और उदारवाद दोनों के साहित्य पर पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

समाज में मौजूद हर विचारधारा का प्रभाव साहित्य में दिखाई देना स्वाभाविक है। साहित्य के मूल में तो विचार ही होता है। हर विचारधारा साहित्य के माध्यम से ही प्रचार-प्रसार और मान्यता प्राप्त करती है। समाज में जितनी तरह की विचारधाराएँ होंगी, उतने तरह का साहित्य मिलेगा।

दोनों के कुप्रभावों को इंगित करने की भी तो आवश्यकता है?

वह तो हर नयी विचारधारा करती ही है।

मेरे कहने का आशय नयी पीढ़ी को उसके कुप्रभावों से आगाह किन शब्दों किया जाए,  हतोत्साहित भी न हों और कार्य में मौलिकता और प्रगतिशीलता भी आए?

उदारवाद एक तरह से सामन्तवाद के कुप्रभावों की उपज है। उसके लिए तो नई पीढ़ी को अपने समय और समाज को गहराई से समझना होगा। आर्थिक-सामजिक तथा राजनीतिक हर पहलू पर विचार करना होगा। मानव समाज के पूरे विकासक्रम को जानना होगा। उसका अन्वेषण-विश्‍लेषण करना होगा।यह एक लम्बी प्रक्रिया है। एक या दो दिन में किसी के दृष्टिकोण को नहीं बदला जा सकता है। या किसी विचारधारा की सीमाओं को नहीं बताया जा सकता है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई बदलने के लिए तैयार न हो तो आप उसे नहीं बदल सकते हो।

मैं फिर समीक्षा में लौटता हूँ।आजकल समीक्षा और आलोचना में हो रहे घालमेल पर आपका मन्तव्य क्या है?

किस तरह की घालमेल ?

मेरा आशय गिराने-उठाने से है।

उठाने-गिराने का यह खेल हमेशा ही रहा है। इधर सोशल मीडिया के आने से कुछ बढ़ गया है। यह साहित्य और साहित्यकार दोनों के हित में नहीं है और अंतत समाज के हित में भी नहीं है।

आपको नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में जो तथाकथित बड़े आलोचक, लेखक,  समीक्षक हैं,  वही उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते?

ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा।

क्या कारण है कि हिंदी साहित्य आज भी अंग्रेजी साहित्य से पीछे दिखता है?

किस रूप में पीछे मानते हैं, आप?

पाठक तक पहुँच और उसकी विषयवस्तु, उसकी लोकप्रियता, उसकी व्यवसायिकता।

यदि आप केवल भारत के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या हिंदी साहित्य पढ़ने वालों से अधिक है। अंग्रेजी अन्तरराष्‍ट्रीय भाषा है, उसकी लोकप्रियता और व्यवसायिकता का अधिक होना स्वाभाविक है। इसके पीछे बाजार की शक्तियों का भी हाथ है। विषयवस्तु में मुझे हिंदी का साहित्य कहीं से भी कम नहीं लगता।

आपकी मातृभाषा कुमाउंनी ही है। क्या आपने कुमाउंनी में भी कभी कुछ लिखने की कोशिश की?

नहीं।

नहीं लिखने के क्या कारण रहे?

लम्बी कहानी है, कुमांउनी में न लिख पाने की।

बचपन में पढने के लिए पिताजी के साथ लोहाघाट जाना हुआ। मैं अपनी सोर्याली में बोलता था, वहां भी उसी में बोलने लगा जिसमें काली कुमांउनी से कुछ अंतर है। इन दोनों बोलियों के शब्दों में अंतर है। वहां साथी बच्चों के द्वारा मेरी बोली के शब्दों की मजाक बनाया जाने लगी। मैंने हिंदी में बोलना शुरू किया फिर वहां से घर लौटने के बाद हिंदी में ही बोलने लगा। गांव में, लोगों के बीच हिंदी में बोलने के चलते तारीफ होने लगी। बस फिर वही सिलसिला चल पड़ा। कुमाउंनी का अभ्यास छूटता ही गया। जब बोलने का ही अभ्यास छूट गया तो लिखना तो दूर की बात रही। हिंदी में ही मौखिक-लिखित अभियव्यक्ति का अभ्यास अधिक रहा। उस समय अपनी बोली-बानी के प्रति कोई अतिरिक्त चेतना भी नहीं थी। शहर के नजदीकी गांव में रहने के चलते कुछ ऐसा माहौल भी था कि कुमाउंनी में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाता था। हर माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए ही प्रोत्साहित करते थे, बल्कि कुमांउनी में बोलने पर टोकते थे। इस तरह छूटती ही चली गयी, अपनी दुधबोली। जब तक अपनी बोली-बानी के महत्व को समझने लगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हिंदी में लिखना और छपना अधिक हो गया। उसी में सहज भी लगने लगा। हिंदी में लिखकर अधिक पाठकों तक पहुंचना संभव था। कभी यह भी नहीं लगा कि जो बात हिंदी में कह रहा हूँ, उसे कुमाउंनी में बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। जहाँ लोक की संवेदना को अधिक गहराई से व्यक्त करने हेतु इसकी जरूरत लगी, हिंदी में ही लोक बोली के शब्दों का इस्तेमाल कर लिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोक बोली को लेकर किसी तरह का कोई हीनताबोध हो मन में। कुमांउनी से मुझे उतना ही लगाव है, जितना हिंदी से। कभी फुर्सत मिलेगी तो जरूर कुमांउनी में भी लिखना चाहूँगा। कुछ कवितायें और समीक्षाएं लिखी भी हैं।

बुद्धिजीवियों, दलितों, पिछड़ों पर हो रहे हमलों के पीछे क्या कारण पाते हैं, आप?

यह अपनी सत्ताओं को संरक्षित रखने का कुप्रयास है। एक वर्ग विभाजित समाज में सत्ताएं किसी तरह के प्रतिरोध को बर्दास्त नहीं कर पाती है। उनको किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं। वे हमेशा अपना एकाधिकार चाहती हैं। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शासित वर्ग किसी रूप में भी सर उठाये। उसकी बराबरी में खड़ा हो। वह समाज में लगातार विभाजन को बनाये रखना चाहता है ताकि उसका वर्चस्व बना रहे और वह ऐशो आराम की जिंदगी जी सके। इसलिए दलितों और पिछड़ों पर हमलों का इतिहास बहुत पुराना है। उनको कमजोर बनाये रखने और भयग्रस्त करने के लिए शारीरिक और मानसिक हमले हमेशा से होते रहे हैं और जब तक वर्ग विभाजित समाज रहेगा, इनका खत्म होना संभव भी नहीं दिखाई देता है। सत्ता में जितनी अधिक सामन्ती और पूंजीवादी ताकतें हावी होंगी, उतना अधिक यह दमन तेज होगा। इन ताकतों द्वारा कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए शारीरिक बल और मानसिक गुलाम बनाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हमेशा कोशिश रहती है कि शासित वर्ग की चेतना को कुंद कर दिया जाय। उसे धर्म, जाति, लिंग, रंग, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं में जकड़ दिया जाय। इसके लिए पूरा शिक्षाशास्त्र तैयार किया जाता है। लेकिन बुद्धिजीवी इस सबके खिलाफ चेतना के प्रसार का काम करते हैं, शासक वर्ग के कुचक्रों को उघाड़ते हैं, जनता को उनकी काली करतूतों से सचेत करते हैं। इस तरह प्रतिरोध को संगठित और धारदार करने का काम करते हैं। ऐसे में भला सत्ताएं उन्हें कैसे सहन कर सकती हैं? उनकी पहली कोशिश होती है कि वे बुद्धिजीवियों को लालच देकर अपने साथ मिला लें, न मानें तो उन्हें किसी भी तरह बदनाम किया जाय। उनकी छवि को संदिग्ध कर दिया जाय। इसके बावजूद न मानें तो उनको किसी तरह से कानूनी पचड़े में फांस लिया जाय या फिर उनका काम तमाम कर दिया जाय। दाभोलकर, पानसारे, कुलबुर्गी आदि इसके ताजे उदहारण हैं।

उभरते साहित्यकारों और कवियों के लिए उनके लेखन के विकास और भविष्य के लिए भी कुछ कहना तो बनता ही है?

अभी ऐसी न उम्र हुई और न अनुभव। मैं तो अभी खुद समाज और साहित्य को समझने की कोशिश में लगा हूँ। अपने भीतर के इंसान को बचाने की जद्दोजहद कर रहा हूँ। आज के दौर में कितना कठिन है- अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखना। बस उसी दिशा में संघर्षरत हूँ। संवेदनशीलता को खत्म करने के लिए चारों ओर से सुनियोजित हमले हो रहे हैं। एक इंसान का इंसान बने रहना कठिन हो गया है। उसके ऊपर शारीरिक और मानसिक हमले किए जा रहे हैं। उससे कहा जा रहा है कि तुम कुछ भी बन जाओ, लेकिन तुम्हारा इंसान बने रहना हमें मंजूर नहीं है। सांप बन जाओ, केंचुए बन जाओ, सियार बन जाओ, गिद्द या चील बन जाओ, मकड़ी या जोंक बन जाओ, सब चलेगा लेकिन अपनी रीढ़ पर सीधा खड़ा इंसान उन्हें पसंद नहीं।

 

संजीव ठाकुर की कवि‍ताएं        

संजीव ठाकुर

पीढ़ियाँ

हम पीते थे चाय एक साथ
फुटपाथ पर बैठते थे
अपने गम बिछाकर
बतियाते थे दुनिया की, जहान की
गलियाते थे
साहित्यिक चूतियापे को
मठों को, मठाधीशों को
पत्रिकाओं के संपादकों को
प्रकाशकों के कारनामों को
आलोचकों की क्षुद्रताओं को
पिछले दरवाजे से पुरस्कार झटकता कोई शख़्स
हमें नागवार गुजरता था
पुस्तक विमोचन समारोहों को हम
कहा करते थे
भांड -मिरसियों का काम !

समय बदलता गया धीरे–धीरे
हममें से कुछ लोग
आलोचक बन गए
झटक लिया किसी ने कोई पुरस्कार
सुशोभित कर रहा कोई
किसी पत्रिका के संपादक का पद
अकादमी की गतिविधियाँ
किसी की जेब में हैं !
डोलते हैं दस–बीस प्रकाशक
कंधे पर रखे झोले की तरह
विमोचन समारोहों में
झलक जाता है
किसी का विहंसता चेहरा ।

गलिया रहे हैं चार लोग
सफदर हाशमी मार्ग के फुटपाथ पर
चाय पीते हुए–
संपादकों को,
प्रकाशकों को,
आलोचकों को,
मठाधीशों को…!

लगाम दो

अब भी लगाम दो
चाह को
इतना भी चाहता है कोई
मृग मारीचिका को ?

हल

हल हो सकता है सवाल
सुख के एक टुकड़े का
तुम
मेरे बारे में सोचना
शुरू तो करो !

वस्तुस्थिति

कुछ भी तो नहीं है
अपने लिए
आँसू के सिवा

किसे बताऊँ ?

किसे बताऊँ
उसने
मेरे हृदय पर मूत दिया है ?
कचरे की टोकरी
रख दी है
नाक पर !मेरी कमजोरी तुम जानते हो
कृपा कर किसी को नहीं बताना –
मैं अव्वल दर्जे का पाजी हूँ
मेरे पास वह सब नहीं
जो जरूरी है जीने के लिए
आज की परिभाषा में !

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल में विज्ञान  सिखाने की अद्भुत तकनीक इस्तेमाल की जाती है।

यहाँ पर सातवीं क्लास के बच्चे अपना खुद का पानी का राकेट बनाते हैं और उसे उड़ाते हैं। एक पुरानी  पानी  की बोतल और साइकिल  के  पंप का इस्तेमाल करके बनाये हुए राकेट को उड़ाते हुए इन बच्चों को देखना एक अलग ही अनुभव था| यहाँ के दो बच्चों ने अपने स्कूल के कंप्यूटर लैब में एक नवोन्मेष प्रयोगशाला नामक केंद्र की स्थापना की है, जहाँ बच्चे रोज़मर्रा की चीज़ों का इस्तेमाल करके विज्ञान के नए-नए मॉडल बनाते हैं। जैसे एक विद्यार्थी ने कॉफ़ी कप, पुराने पेन और जूते के डब्बे का इस्तेमाल करके एक कप एनीमोमीटर बनाया जिससे वायु का वेग नाप सकते हैं। यह सभी प्रारूप इन बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इसकी शुरुआत करने वाले यहाँ पर काम कर रहे नौजवान समीर कुमार मिश्रा एसबीआई फेलो हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर इस तरह की प्रयोगशालाएं हर स्कूल में हों तो वह दिन दूर नहीं, जब आप अखबारों में भारतीय आविष्कारों के बारे में पढ़ेंगे।

समीर ने यहाँ पर एक और प्रयोग किया। उन्होंने यहाँ के स्कूली प्रोजेक्ट वर्क में परिकल्प की नीव रखी। परिकल्प एक नए प्रकार का प्रोजेक्ट करने का तरीका है, जिसके अंदर आप बच्चों से फाइलें न बनवाकर असल ज़िन्दगी की दिक्कतों का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चों के कई ग्रुप बनाए जाते हैं। फिर अलग-अलग ग्रुप को वि‍भि‍न्‍न कार्य दिए जातें हैं। एक ग्रुप को स्कूल में होने वाली बीमारियों की लिस्ट बनानी थी और उसका इलाज कैसे होगा, इस पर एक पोस्टर बनाना था। दूसरे ग्रुप को इसी पर काम करते हुए उन दवाओं के लिए एक प्राथमिक उपचार पेटी बनानी थी, जिसमें उन बीमारि‍यों की दवायें रखी जाएंगी। एक ग्रुप को मंगल यान का प्रतिरूप बनाना था। इस तरह बच्चे सीखतें भी हैं और स्कूल का भी स्तर बढ़ता है।

Jpeg

यह स्कूल ऐसी जगह है जहाँ बिजली और नेटवर्क की काफी दिक्कत है। हमें पता चला कि‍ इसी स्कूल के एक बच्चा है सुभकांत जानी जिसने ने जवाहर नवोदय विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की है। गौरतलब है कि‍ उसके गाँव में बिजली है ही नहीं। वहां सूर्यास्त के बाद लालटेन और कैंडल पर ही ज़िन्दगी निर्भर है। अगर ऐसी जगह से एक बच्चा नवोदय जैसा परीक्षा में सफल होने का माद्दा रखता है और दीपक और सीताराम जैसे बच्चे अपने सीमित संसांधनों से कभी न डरते हुए विज्ञान के नए-नए प्रारूप बना सकते हैं तो हम अगर ठान लें तो जल्दी ही भारत को शिक्षा के पायदान में पानी के राकेट की तरह ही सबसे ऊपर ले जा सकते हैं|

वाटर राकेट बनाने  की विधि

आवश्यक सामग्री

1: पानी की पुरानी बोतल (1 लीटर )
2: कॉर्क
3: साइकिल पंप
4: फुटबॉल आदि में हवा भरने वाली पिन

विधि

1: पुरानी  बोतल का ढक्कन खोलें और उसमें आधे लीटर से थोड़ा कम पानी भरें |
4: बोतल का मुँह कॉर्क से इस प्रकार बंद करें जिससे बोतल पर दबाव देने पर ही वह निकले।
3: कॉर्क के बाहरी सिरे से हवा वाली पिन इस प्रकार अंदर डालें जिससे वह आधी अंदर और आधी बहार रहे | कोशिश करें कि‍ पिन कॉर्क के मध्य से होती हुई अंदर जाए।
4: बाहर वाले पिन के सिरे से साइकिल पंप की  नली  जोड़ दें।
5: पानी की बोतल को ज़मीन पर उल्टा रख दें जिससे कॉर्क वाला सिरा नीचे रहे। कॉर्क पानी को बाहर निकलने से रोके रखेगा।
6: बोतल को सहारा देने के लिए ईंट का उपयोग करें। ईंटों को बोतल के साइड में लगा दें, लेकि‍न ध्यान रहे वे बोतल को सिर्फ सहारा दें और पकड़े नहीं।
7: साइकिल पंप से बोतल के अंदर हवा पंप करना शुरू करें |
8: कुछ देर पंप करने के बाद आपको आपका हाथों से बना राकेट हवा से बातें करता नज़र आएगा |

 वैज्ञानिक सिद्धांत

यह उड़ान न्यूटन के तीसरे गति नियम पर आधारित है जो कहता है कि‍-
‘प्रत्येक क्रिया की उसके बराबर तथा उसके विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है।‘जितनी जोर से हम जमीन पर अपना पैर पटकते हैं, उतनी ही अधिक हमें चोट लगती है अर्थात् जितनी जोर से हम जमीन को नीचे की ओर दबाते हैं उतनी ही जोर से पृथ्वी हमें ऊपर की और धकेलती है. जितनी जोर से हम गेंद को पटकते हैं उतना ही ऊपर वह उछलती है।
इसी प्रकार बोतल से हवा के दबाव से बहार आता पानी ज़मीन से टकराता है। प्रतिक्रिया में वह बोतल को ऊपर की और धक्का देता है । इस प्रकार बोतल से जब तक पानी निकलता है बोतल ऊपर की ओर उड़ती चली जाती है।

प्रक्षेपण के दौरान ध्यान रखने लायक बातें-

1: इसे खुली जगह में ही किया जाए।
2: प्रक्षेपण के दौरान उसकी सीध में ना देखें और थोड़ा दूर खड़े रहें।
3: बोतल में आप पानी में रंग भी मिला सकते हैं। इससे नज़ारा बहुत अद्भुत लगेगा।
4:कॉर्क की जगह आप रबर का भी इस्तेमाल कर सकते है।  बैडमिंटन के शटलकाक के पीछे लगे हुए हिस्से का भी उपयोग कर सकते हैं।
5: आप इसे राकेट की तरह रूप देकर सुप्रवाही बना सकते हैं। लेकिन राकेट का वज़न कम रखें
6: 1 लीटर की बोतल से सफल प्रक्षेपण के बाद आप 2 लीटर की बोतल से भी यह प्रयोग कर सकते हैं।

 

साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब: मैनेजर पांडेय

चूरू में आयोजि‍त कार्यक्रम में वि‍चार व्‍यक्‍त करते मैनेजर पांडेय।

चूरू : प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं’ पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका आदि‍ साहि‍त्‍य प्रेमी मौजूद थे।

प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करते उत्‍सव : रजनी गुसाईं

रजनी गुसाईं

भारतवर्ष को एक देश नहीं, बल्‍कि‍ महादेश कहकर सम्बोधित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा, जाति-धर्म की जितनी विविधताएं भारत में देखने को मिलती हैं, उतनी विश्‍व में किसी भी देश में ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगी। भारत की संस्कृति में विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों का समावेश है। यही कारण है कि भारत में पूरे वर्ष पर्व, त्योहारों का मेला लगा रहता हैं। भारत की गौरवशाली समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत में प्रकृति, कृषि, ऋतुओं, नदियों से जुड़े व्रत, त्योहार मनाने की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही हैं! भारत में लोक उत्सव और प्रकृति का चोली-दामन का साथ हैं। कई प्रमुख त्योहार प्रकृति, ऋतुओं तथा कृषि से सीधे जुड़े हुए हैं। खेती किसानी से जुड़े भारत में जो प्रमुख त्योहार हैं, वे लोहिड़ी, मकर सक्रांति, पोंगल, बैसाखी, बिहु हैं, जोकि भारत के विभिन्न प्रांतो में अपने-अपने रीतिरिवाजों के साथ हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। फसल बुवाई, कटाई के समय इन लोकोत्सव को मनाने का ध्येय एक ही हैं- प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करना जिसकी गोद से अन्न उपजता है। जिससे धरती के सभी प्राणियों का पेट भरता है। इन अवसरों पर नदियों में स्नान करने तथा सूर्य को अर्ध्य देने की परम्परा भी है। नदी जिसके जल से खेतों का सींचा जाता है। सूर्य जिसके कारण पृथ्वी का ऋतु चक्र बदलता है। धूप, गर्मी, वर्षा सूर्य से ही प्राप्त होती है, जिसके कारण खेतों में फसलें लहलहाती हैं। भारतीय समाज में कृषि से जुड़े इन उत्सवों का विशेष महत्व हैं।

बात लोक से जुड़े उत्सवों, प्रकृति, जल की हो और भारत के आदिवासी समाज के उत्सवों का उल्लेख नहीं हो इसकी कल्पना भी असम्भव है। क्योंकि आज भी भारत में आदिवासी समाज का अस्तित्व विद्यमान है, जो प्रकृति के निकट रहकर अपनी लोक संस्कृति को सहेजे हुए है। यह समाज जंगल  को ही अपना घर मानता है। और जंगल ही इन का ईश्वर होता है। झारखण्ड के आदिवासी लोक उत्सव में प्रकृति से जुड़ा एक ऐसा ही त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता हैं- ‘सरहुल’। सरहुल वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है। जब पेड़-पौधों में नए अंकुर फूटने लगते हैं। साल के पेड़ की शाखों पर नए फूल खिलने लगते हैं। यह गाँव के देवता की पूजा है, जिन्हे इन जनजातियों का रक्षक माना जाता है। देवता की पूजा साल के फूलों से ही की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद ग्रामीणों में प्रसाद वितरित किया जाता हैं जिसे ‘हड़िया’ कहा जाता है, जोकि चावल का बना होता है। पूरा गाँव गायन और नृत्य के साथ सरहुल का त्योहार मनाता है। झारखण्ड के अन्य त्योहार जैसे करम, जावा, तुशु हैं। प्रकृति प्रेमी तथा जल जंगल जमीन को ही अपनी अमूल्य सम्पत्ति मानने वाली आदिवासी जनजाति के ये त्योहार कृषि, उर्वरता से ही जुड़े हैं।

आश्विन और कार्तिक माह को पर्वों का माह भी कहते हैं, क्योंकि इस दौरान कई बड़े पर्व आते हैं जो समूचे भारतवर्ष में प्रमुखता से मनाए जाते हैं। उमस भरी गर्मी, वर्षा ऋतु विदा लेती है। शरद ऋतु का आगमन होता है। जिसका आरम्भ शारदीय नवरात्र के साथ होता है! नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में उत्तर भारत में जहां जगह जगह हिन्दू पौराणिक कथा पर आधारित रामलीला का मंचन होता ह, जिसमे भगवान श्री राम के जीवन से जुडी़ घटनाओं का मंचन किया जाता है। वहीं बंगाल तथा असम में इसे दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है। जगह-जगह माँ दुर्गा का भव्य पंडाल बनाकर शक्ति की प्रतीक, महिसासुर नामक असुर का वध करने वाली देवी दुर्गा की आराधना की जाती है। लोग नए वस्त्र धारण कर पंडाल में देवी दुर्गा की आराधना के लिए पहुंचते हैं। पंडाल में मेले जैसा दृश्य होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है।

रामलीला का समापन रावण का पुतला जलाकर विजयदशमी के दिन जिसे दशहरा भी कहते हैं, होता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम ने इसी दिन लंका नरेश रावण नाम के असुर का वध किया था। शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे विजयादशमी कहते हैं। भारतीय लोक समाज में ये त्योहार बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माने जाते हैं।

भारत का सबसे बड़ा पर्व दीपावली भी कार्तिक माह में मनाया जाता है। इस त्योहार को घर की साफ़-सफाई, रंग-रोगन से भी जोड़ा जाता है। क्योंकि देवी लक्ष्मी की पूजा दीपावली पर की जाती है। देवी लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती है। वह साफ़ सुथरे घर में ही अपना आशीर्वाद बरसाती हैं तथा गंदगी से दूर रहती हैं! यही कारण हैं कि दीपावली पर लोग घर की साफ-सफाई प्रमुखता से करते हैं। वैसा इसका वैज्ञानिक या तकनीकी कारण यह भी है कि‍ दीपावली वर्षा ऋतु के बाद आती है, जब शरद ऋतु का आगमन होता है। वर्षा के कारण घर में आई सीलन, काई, सीलन की महक दूर भगाने कि लिए भी यह समय घर की अंदरुनी सफाई के लिए उपयुक्‍त होता है। दीपावली मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। हजारों वर्ष पहले अयोध्या के राजा राम चौदह वर्ष का वनवास काट कर अपनी नगरी अयोध्या लौटे थे। अपने राजा राम के आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को दीप प्रज्‍जलि‍त कर सजाया था कार्तिक अमावस्या की। अँधेरी रात में अयोध्या नगरी दीपों के प्रकाश से झिलमिला उठी थी। आज भी लोग दीपावली के दिन अपने घरों को फूलों की साज सज्जा के साथ साथ बिजली के रंगीन बल्बों, दीयों से सजाते हैं। इसलिए दीपावली को प्रकाश का उत्सव भी कहते हैं।

सूर्य की उपासना से ही जुड़ा बिहार का मुख्य पर्व छठ पूजा कार्तिक माह में ही मनाया जाता है। चार दिन तक चलने वाला यह उत्सव कठोर व्रत नियम के साथ आरम्भ होता है, जोकि व्रत के चौथे दिन नदी के घाट पर उगते सूर्य को अर्ध्य देकर समाप्त होता है। इन चार दिनों तक घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। घर की महिलायें सूर्य उपासना, छठ मैया से जुड़े लोकगीत गाती हैं। इस पर्व को मनाने का भी मूल ध्येय सूर्य भगवान का आभार प्रकट करना है, जिसके कारण हमें अन्न जल प्राप्त होता है।

भारत में उत्सव मनाने की इस बहुरंगी छटा में सभी संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। ये उत्सव जीवन में आनंद और उल्लास लाते हैं। साथ ही देश को एक धागे में भी पिरोते हैं और भारत भूमि के सदियों पुराने संदेश ‘वसुदेव कुटुम्बकमद्ध’ यानी सारा विश्‍व एक परिवार है, की धारणा को और मजबूत करते है।

गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं: देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

7 मार्च 1944 को नैनीताल जिले के एक दूरस्थ पर्वतीय गांव-कालाआगर में जन्‍में वरिष्ठ विज्ञान लेखक श्री देवेंद्र मेवाड़ी के पर्यावरण, कृषि, जीव-जंतु, खगोल विज्ञान और विज्ञान कथा पसंदीदा विषय हैं, जिन पर वे पिछले पांच दशकों से निरंतर लेखनी चला रहे हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके वैज्ञानिक विषयों पर 1500 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वे अब तक 25 मौलिक पुस्तकें लिख चुके हैं जिनमें प्रमुख है- ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी यादों का पहाड़’ (आत्मकथात्मक संस्मरण), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-1), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-2), ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘भविष्य’ तथा ‘कोख’ (विज्ञान कथा संग्रह), ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’, ‘विज्ञान की दुनिया’, ‘विज्ञान और हम’, ‘सौरमंडल की सैर’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान प्रसंग’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’ (भाग-1 तथा भाग-2), ‘अनोखा सौरमंडल’, ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’, ‘हॉर्मोन और हम’। प्रस्तुत है मेवाड़ी जी के साथ हुई मनीष मोहन गोरे की बातचीत के अंश-    

उत्तराखंड के दूर-दराज के गांव में जन्मे एक बालक से प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी बनने का सफर किस तरह तय किया?

आज पीछे पलट कर देखता हूं मनीष जी, तो मुझे अपनी इस पचास वर्ष लंबी यात्रा की राह साफ दिखाई देती है जो मुझे फिर से पहाड़ के मेरे गांव और मेरे बचपन के दिनों में पहुंचा देती है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ के जिस गांव कालाआगर में मेरा जन्म हुआ, वह तब खेतों की हरियाली और घने जगलों से घिरा हुआ था। उन घने जंगलों में असंख्य वन्य जीव होते थे। गांव में चिड़ियां चहचहाती रहती थीं। कितनी तरह की रंग-बिरंगी तितलियां और कीट-पतंगे होते थे। हमारे गांव के सिरमौर जंगल में वसंत आते ही बुरांश के सुंदर लाल फूल खिल जाते थे तो खेतों के आसपास पीले रंग की प्यूली के फूल मन को लुभाने लगते थे। हम नीचे घाटियों से उठता हुआ कोहरा देख सकते थे जो पेड़-पौधों और खेतों से होकर हमसे मिलने के लिए भागता हुआ ऊपर चला आता था। वहां प्रकृति थी और हमारी तमाम जिज्ञासाओं के जवाब प्रकृति ही देती थी। हम बीजों को उगते, फूलों को खिलते, बादलों को उमड़-घुमड़ कर बरसते हुए देख सकते थे। रात में लाखों-लाख तारों भरा आसमान हमारा मन मोह लेता था। आज याद आता है कि कितना कुछ जानना चाहता था मैं तब अपने आसपास की दुनिया के बारे में। मेरे भीतर बैठा वही बालक आज अपने विज्ञान लेखन के जरिए प्रकृति की किताब के बारे में आमजन को बताने की विनम्र कोशिश कर रहा है।

वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी., हिंदी साहित्य में एम.ए. और जनसंचार में उपाधि हासिल करने के बाद आप विज्ञान लेखन की ओर कैसे उन्मुख हुए?

आपको मैं यहां बताना चाहता हूं कि इस तरह प्रकृति की किताब पढ़ते-पढ़ते मैं अपने गांव के सामने के दूसरे पहाड़ पर गोविंद बल्लभ पंत इंटर कालेज मैं पहुंच गया और वहां भी प्रकृति के बीच रह कर विज्ञान के विषयों के साथ इंटर की परीक्षा पास की। पेड़-पौधों और वन्य जीवों से बहुत प्यार था, इसलिए नैनीताल में उच्च शिक्षा के दौरान वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषय चुने। फिर वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी की। उन्हीं दिनों की बात है-  मैं कहानियां लिखने लगा था। मेरी कहानियां कहानी, माध्यम, उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। विज्ञान मुझे बहुत रोचक लगता था और मेरा मन करता था कि मैं विज्ञान की वे तमाम बातें अपने साथियों और अन्य लोगों को बताऊं। इसलिए मैंने विज्ञान पर लिखना शुरू किया। मेरा पहला लेख सन् 1965 में ‘कुमाऊं और शंकुधारी’ इलाहाबाद की ‘विज्ञान’ पत्रिका में और दो लेख- ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ तथा ‘शीत निष्क्रियता’ ‘विज्ञान जगत’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुए। ‘विज्ञान जगत’ के संपादक प्रो. आर.डी. विद्यार्थी ने मेरे पत्र के उत्तर में लिखा था, “लिखते रहना, कौन जाने किसी दिन तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” उनके इस वाक्य ने मुझमें विज्ञान लेखन की लौ जगा दी और मैं विज्ञान लेखक बन गया।

50 वर्ष लंबी अबाध विज्ञान लेखन यात्रा के दौरान आपके जीवन में अनेक पड़ाव आये होंगे और आपने संघर्ष किया होगा। कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि जीवन के तमाम झंझावातों और नौकरी-चाकरी के बीच विज्ञान लेखन नहीं हो पा रहा है और इसे छोड़ ही देते हैं।

मैंने तय कर लिया था कि मुझे जीवन में विज्ञान लेखक बनना है, परिवार के भरण-पोषण के लिए मुझे भले ही किसी भी तरह की नौकरी करनी पड़े। विज्ञान लेखक बनने के मेरे संकल्प ने मुझे निरंतर विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। मुझे पहली नौकरी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली) में मिली। वहां मैंने तीन वर्ष तक मक्का की फसल पर शोध कार्य किया। उस बीच मैंने मक्का पर कई लेख लिखे। उसके बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर मैं पूसा इंस्टीट्यूट छोड़ कर पंतनगर चला गया। वहां मैंने तेरह वर्षों तक कृषि की मासिक पत्रिका ‘किसान भारती’ का संपादन किया। इसके अलावा पाठ्य-पुस्तकों के अनुवाद और पत्रकारिता शिक्षण से भी जुड़ा रहा। वहां से मैं देश के सबसे बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक पंजाब नैशनल बैंक में जनसंपर्क तथा प्रचार की जिम्मेदारी संभालने के लिए चला गया। वहां 22 वर्ष रहा, चीफ (जनसंपर्क) के रूप में अवकाश प्राप्त करने के बाद एक वर्ष तक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) की संस्था विज्ञान प्रसार में फैलो रहा। यह सब इसलिए बता रहा हूं कि नौकरी चाहे कोई भी रही हो, मैं निरंतर विज्ञान लेखन करता रहा क्योंकि यही मेरे जीवन का लक्ष्य था। इन तमाम वर्षों में देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखता रहा। प्रिंट के अलावा, रेडियो, टेलीविजन तथा फिल्म जैसे माध्यमों के लिए भी लिखा। मैंने हर नौकरी पूरी ईमानदारी और मेहनत से की तथा नौकरी के काम को निर्धारित समय से भी अधिक समय दिया। लेकिन नौकरी के बाद का समय तथा छुट्टियों के दिन मेरे अपने होते थे जिनका मैंने पूरा उपयोग विज्ञान लेखन के लिए किया। एक बात और, विज्ञान लेखन मुझे सदा नौकरी के तनावों से मुक्त होने का सुअवसर देता रहा। बल्कि यों कहूं कि दवा का काम करके मुझे तनाव से मुक्त करता रहा।

आपके लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्या मायने हैं? विज्ञान लेखन करते हुए आपके मन में क्या लक्ष्य रहते हैं?

मेरे लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन का अर्थ यह है कि तकनीकी भाषा में लिखा गया विज्ञान का ज्ञान ‘खग ही जाने खग की भाषा’ न बना रहे। वह वैज्ञानिकों और विज्ञान के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम जन तक पहुंच सके। यह तभी हो सकता है जब विज्ञान के ज्ञान को सरल-सहज भाषा, रोचक शैली और विविध विधाओं में लिखा जाए। अपनी  लेखन यात्रा में मेरा यही लक्ष्य रहा है।

आपके विज्ञान लेखन की एक अलग पहचान है। इस मुकाम को कैसे हासिल किया आपने?

आपकी यह बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। असल में मैं यह सोचता रहता था कि मेरे लेखन की एक अलग पहचान बने। मेरी रचना का अगर कोई भी अंश किसी पाठक को मिल जाए तो वह पहचान ले कि यह तो लगता है देवेंद्र मेवाड़ी ने लिखा होगा। इसका सबूत मुझे कई वर्ष पहले मिला था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ इलाके से किसी सीता बहिन का पत्र मिला। उनके दो बच्चे एक पत्रिका के पन्ने से खेल रहे थे जिसे उनके हाथ से लेकर सीता ने पढ़ा। उसमें लेखक का नाम नहीं था। उसने पत्र में लिखा कि वह पन्ना पढ़ कर मैं समझ गई थी कि वह सब आपने ही लिखा होगा। वह मेरी रचनाएं पढ़ती रही थी इसलिए उसने मेरे लिखने का अंदाज बखूबी समझ लिया था। असल में अपने लेखन को एक अलग पहचान देने के लिए मैंने उसे विविध विधाओं में लिखा और उसमें साहित्य की सरसता भी भरी। इसीलिए मैं कहता हूं कि मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं। अपने इस प्रयास में मैं हरसंभव कोशिश करता हूं कि विज्ञान की जो बात मैं पाठकों को बताने जा रहा हूं, वह ऐसी भाषा और शैली में हो कि वे उसे अच्छी तरह समझ लें और उसका आनंद उठाएं।

 साहित्य की कलम से विज्ञान लेखन सचमुच प्रेरक पंक्ति है युवा विज्ञान लेखकों के लिए। आपने 13 वर्ष तक कृषि पत्रिका किसान भारतीका सम्पादन कार्य भी किया है। इस अनुभव ने आपमें किस प्रकार का संस्कार भरा?

वे तेरह वर्ष मेरे लिए लेखन और संपादन की परीक्षा के वर्ष थे। पत्रिका किसानों की थी, इसलिए मुझे विज्ञान की जानकारी ऐसी भाषा-शैली में उन तक पहुंचानी थी जिसे वे आसानी से समझ सकें। उस दौरान मुझे तरह-तरह की शैलियों में लिखने का मौका मिला। और, यह तो सच है कि किसान विज्ञान की जानकारी का लाभ तभी उठाते जब उन्हें वह जानकारी सरल-सहज भाषा में मिलती। मैंने वही किया।

आपको ऐसा नहीं लगता कि इतर क्षेत्र में रहने से मन में जो तड़प उठती है, वही व्यक्ति से उसके पसंदीदा क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करवाती है।

लगता है, बशर्ते यह हर क्षण याद रहे कि जीवन में मुझे क्या करना है, क्या बनना है। जो चाहा, वह सदा मिलता नहीं। इसलिए जो मिलता है, उसमें समर्पित रूप से काम करते हुए शेष समय में वह किया जा सकता है जो जीवन का लक्ष्य है। इतर क्षेत्र में काम करने पर मन में वह तड़प बार-बार उठती है। वह काम पिछड़ने पर हूक भी उठती है।

आपके लेखन के आरम्भिक दौर में बड़ी पत्रिकाएं थीं, मनीषी संपादक थे, आपने उन पत्रिकाओं में खूब लिखा भी। लेकिन, बाद में वे पत्रिकाएं कम हो गईं, अखबारों में विज्ञान कम हो गया। तब कैसे आपने अपना विज्ञान लेखन जारी रखा?

आप ठीक कह रहे हैं। मेरे लेखन के प्रारंभिक दौर में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबिनी और दिनमान जैसी बड़ी प्रसार संख्या वाली मासिक पत्रिकाएं तो थीं ही, सभी अखबार भी रविवासरीय पत्रिका प्रकाशित किया करते थे जिनमें कथा-कहानी, कविता के साथ-साथ विज्ञान भी छपता था। डा. धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, नारायण दत्त, अज्ञेय और रघुवीर सहाय जैसे मनीषी संपादक भी थे। मेरा सौभाग्य है कि उन मनीषी संपादकों ने मेरे विज्ञान लेखन को न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि उसे संवारा भी। वैसी पत्रिकाओं की कमी हुई तो मैं समाचारपत्रों के रविवारीय संस्करणों और संपादकीय पृष्ठ पर विज्ञान लिखता रहा। मैंने रेडियो के लिए भी विज्ञान खूब लिखा। बाद में टेलीविजन आ जाने पर उसके लिए भी कार्यक्रमों के आलेख लिखे और प्रस्तुत किए।

आपने रेडियो-टेलीविजन का जिक्र किया। इन इलैक्ट्रानिक माध्यमों के लिए आपने लेखन की शुरूआत कैसे की?

वैज्ञानिक विषयों पर रेडियो वार्ताओं से। आकाशवाणी के दिल्ली और लखनऊ केन्द्रों से विज्ञान के विविध विषयों पर मेरी बड़ी संख्या में वार्ताएं प्रसारित हुईं। मुझे याद है, उस दिन जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से सीधे अंतरिक्ष में बात करने वाली थीं तो उस वक्त मैं लखनऊ केन्द्र से ‘अंतरिक्ष में भारत का योगदान’ विषय पर अपनी वार्ता दे रहा था। वार्ता के अंत में मेरे पास एक पर्ची भेज कर श्रोताओं के लिए यह घोषणा करने के लिए कहा गया कि ‘अभी कुछ ही क्षणों के बाद प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से बातचीत करेंगी। कृपया प्रतीक्षा करें।’ मैंने यह घोषणा की। और, तभी लिंक जुड़ गया और प्रधानमंत्री की राकेश शर्मा से बातचीत शुरू हो गई। वे मेरे लिए रेडियो प्रसारण के यादगार क्षण थे। दिल्ली केन्द्र से मैंने लाइव प्रसारण में वर्ष 1995 के सूर्यग्रहण के विशेषज्ञ की हैसियत से आंखों देखा हाल और ग्रहण से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य बताए। ब्रिज-इन और फोन-इन कार्यक्रमों में भाग लिया। विज्ञान पत्रिका कार्यक्रम की प्रस्तुति की और ‘मानव का विकास’ सहित अनेक विज्ञान धारावाहिकों के लिए वर्षों तक पटकथाएं लिखीं। इसी तरह दूरदर्शन, लखनऊ के ‘चैपाल’ कार्यक्रम में नियमित ‘नई बातरू नया चलन’ की धारावाहिक प्रस्तुति दी। दिल्ली आकर ‘विज्ञान दर्पण’ के पचासों एपिसोड लिखे। प्रख्यात फिल्मकार अरुण कौल की संगत में ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र बनाया।

संचार के मुद्रण स्वरूपों की जगह डिजिटल मीडिया ने समाज के लगभग हर वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और अपना उपयोगकर्ता बनाया है। यह एक बड़ी घटना है। इसके चलते बच्चों और युवाओं में किताबी पठनीयता घटी है और फेसबुक, वाट्सएप जैसे डिजिटल मंचों पर उपस्थिति बढ़ी है। इन मंचों का सहारा लेकर इन्हें लोकप्रिय विज्ञान या ललित विज्ञान साहित्य से कैसे जोड़ा जा सकता है?

यह बात सही है कि विगत कुछ वर्षों में डिजिटल माध्यम की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन, मैं यह भी मानता हूं कि किताब का अपना अस्तित्व है और वह सदा बना रहेगा। जिन्हें किताब पढ़नी है, वे किताबें पढ़ रहे हैं। हां, हमें समय की जरूरत के अनुसार डिजिटल मीडिया का भी विज्ञान लेखन के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए। मैंने भी कुछ वर्ष पहले से फेसबुक और अपने ब्लाग पर विज्ञान की बातें लिखना शुरू किया। आभासी दुनिया के साथियों ने मेरे इस लेखन में रुचि ली और उनकी संख्या बढ़ती गई। यहां मैं आपको यह भी बता दूं कि अनेक साहित्यकार और साहित्य प्रेमी भी मेरे विज्ञान लेखन के नियमित पाठक हैं। इस तरह मैं विज्ञान और साहित्य के बीच एक सेतु बनने की भी हर संभव कोशिश कर रहा हूं। डिजिटल माध्यम के लाखों-लाख पाठक हैं। हमें इस माध्यम का भरपूर उपयोग करके उन पाठकों तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर विज्ञान लेखन का कितना प्रभाव है?

सोशल मीडिया विज्ञान की जागरूकता बढ़ाने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में काम आ सकता है। इस दिशा में कुछ विज्ञान लेखक समर्पित रूप से काम भी कर रहे हैं और उनके ब्लाग सामयिक वैज्ञानिक जानकारी पाठकों को दे रहे हैं। ‘विज्ञान विश्व’ और ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ काफी अच्छे ब्लाग हैं। लेकिन, विज्ञान लेखकों को इस विधा का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

विज्ञान डायरी, संस्मरण जैसी अनोखी साहित्यिक विधाओं को आपने विज्ञान लेखन से जोड़कर काम किया है। इस दिशा में काम करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

यह जानकर खुशी हुई कि आपका ध्यान इस ओर गया है। केवल लेखों के रूप में विज्ञान प्रस्तुत करने की एकरसता को तोड़ने के लिए मैंने डायरी के रूप में विज्ञान लिखना शुरू किया। इस विधा में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डायरी के रूप में विज्ञान लिखने पर उसमें एक व्यक्तिगत लगाव और अधिक विश्वसनीयता आ जाती है। पाठक उसे लेखक के निजी बयान के रूप में लेता है। इसी तरह मैंने संस्मरण की विधा में निकट से देखे विज्ञान लेखकों के बारे में लिखा है जिनमें उनका पूरा व्यक्तित्व और कृतित्व उजागर होता है। इसके अलावा मैंने नाट्य विधा में भी काफी विज्ञान लिखा है और शीघ्र ही मेरे रेडियो नाटकों की पुस्तक ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’ प्रकाशित होने जा रही है। विगत दो वर्षों से मैं स्कूल-कालेजों और विश्वविद्यालयों में जाकर विज्ञान की किस्सागोई यानी स्टोरी टेंलिंग भी कर रहा हूं। अब तक पांच हजार से अधिक बच्चों को मैं सौरमंडल की सैर कराने के साथ-साथ विज्ञान की कहानियां भी सुना चुका हूं। जहां तक प्रेरणा का सवाल है, वह तो अंतःप्रेरणा ही है। जब मन कुछ नया करने के लिए बेचैन होता है तो नई विधा के रूप में रास्ता सामने दिखाई देने लगता है।

अनुवाद एक महत्वपूर्ण काम है। इसमें दो भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन जब वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की बात आती है तो इसमें विज्ञान की जानकारी का तीसरा आयाम जुड़ जाता है। मेरी चिंता है कि विज्ञान साहित्य के अनुवादकों को कैसे तैयार किया जाना चाहिए?

बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया आपने। अनुवाद एक बेहद गंभीर कार्य है। वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय अनुवादक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भारत में हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यहां पर विज्ञान संचार की सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण जैसी मौजूदा सार्वभौमिक समस्याओं के लिहाज से विज्ञान लेखकों और विज्ञान संपादकों के दायित्व को आप किस तरह देखते हैं?

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसे खतरों से जन सामान्य को आगाह करने में विज्ञान लेखक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। विज्ञान संपादक ऐसे जानकारीपूर्ण विज्ञान लेखों को लिखवाने और उन्हें प्रकाशित करने में अहम योगदान दे सकते हैं।

वैज्ञानिक साहित्य सृजन में मानवीय पहलुओं और मूल्यों का संपोषण कितना अहम है? पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक शोध की दिशा में इनकी भूमिका को आप किस प्रकार महसूस करते हैं?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मनुष्य के जीवन तथा समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। ये हमारे जीवन और समाज से अभिन्न रूप से जुड़े हुए विषय हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट न आने पाए।

विज्ञान लेखन की कौन-कौन सी सशक्त विधाओं में काम करने की संभावना है?

लेख और फीचर लेखन के अलावा ललित विज्ञान भी लिखा जाना चाहिए ताकि लोग उस सरस विज्ञान को पढ़ने के लिए लालायित हों। इससे पाठकों की संख्या तो बढ़ेगी ही, वैज्ञानिक जागरूकता का भी प्रसार होगा। इधर मैं यात्रावृत्तांतों के रूप में विज्ञान लिख रहा हूं जिसे आभासी दुनिया के साथी काफी पसंद कर रहे हैं। इस तरह यात्रा के बहाने यात्रा के दौरान देखी गई तमाम चीजों से जुड़े विज्ञान की जानकारी भी पाठकों को मिल जाती है। विज्ञान नाटकों के क्षेत्र में भी लिखने की बहुत गुंजाइश है। हिंदी में मंचन के लिए स्तरीय विज्ञान नाटकों की बहुत कमी है, इस दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। विज्ञान कथाओं का बहुत अभाव है, इसलिए इस विधा में भी लिखने की बहुत संभावना है। लेकिन, विज्ञान कथा लिखते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वह विज्ञान कथा ही है और कहानी की परिभाषा के भीतर आती है।

अपनी भावी योजनाओं के बारे में बताएं।

मैं फिलहाल विज्ञान की विविध विधाओं में निरंतर विज्ञान लेखन कर रहा हूं और यह क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा। ‘मेरी विज्ञान डायरी भाग-3‘ को पुस्तक रूप में तैयार कर रहा हूं और अपने यात्रावृत्तातों पर आधारित किताब की पांडुलिपि को भी संजो रहा हूं। विज्ञान कथाएं और उपन्यास लिखने का भी मन है। सोचता हूं, विज्ञान पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे लोग कथा-कहानी की जैसी रोचकता के साथ पढ़ सकें। कुछ योजनाएं और भी हैं, जो पूरी हो जाने के बाद विश्वास है पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करेंगी।

युवा विज्ञान लेखकों के लिए आपके क्या सन्देश हैं?

विज्ञान लेखन की अपार संभावनाएं हैं और सच पूछिए तो भविष्य विज्ञान लेखन का है, क्योंकि दुनिया में विज्ञान का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नई पीढ़ी को स्वयं जागरूक होने के लिए और समाज में वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने के लिए, विज्ञान लेखन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए। इस तरह वे समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने का उत्तरदायित्व पूरा कर सकेंगे। आज जनसंचार माध्यमों में और विशेष रूप से अनेक निजी चैनलों में जिस तरह भूत-प्रेत, आत्माओं, इच्छाधारी नाग-नागिनों और आत्माओं का महिमामंडन किया जा रहा है, उससे आगे बढ़ते समाज को बहुत नुकसान हो रहा है। विकसित देशों में जहां युवा पीढ़ी समंदरों के गर्भ में झांकने, पृथ्वी के अनजाने रहस्यों को बूझने और अंतरिक्ष में सौरमंडल तथा उसके पार ब्रह्मांड की अबूझ पहेलियों को सुलझाने के सपने देख रही है, वहां हमारी युवा पीढ़ी को चैनलों पर यह सब दिखाया जा रहा है। इसका प्रतिगामी प्रभाव पड़ेगा। यह दुखद स्थिति है। इसलिए नई पीढ़ी को मशाले-राह बन कर सामने आना चाहिए। कल की दुनिया वह होगी जिसे आज की नई पीढ़ी बनाएगी।