Archive for: September 2017

चरित्रहीन परिवेश की कहानियां: स्वयं प्रकाश

नई दिल्ली: हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में ऐसे ही चरित्रहीन परिवेश की कहानियां हैं, जहाँ कथाकार वास्तविक पात्रों की काल्पनिक कहानियां दिखा रहा है। सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश ने साहित्य अकादेमी सभागार में 16 सि‍तंबर को युवा कथाकार प्रवीण कुमार के पहले कहानी संग्रह ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का लोकार्पण करते हुए कहा कि आजकल कहानीकारों की उम्र कम होने लगी है। ऐसे में नए कहानीकार के लिए सबसे जरूरी शुभकामना यही होगी कि हम उनसे लम्बी सक्रियता की अपेक्षा करें।

युवा आलोचक संजीव कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ को यथार्थ के गढ़े जाने का पूरा कारोबार बताने वाला संग्रह बताया। उन्होंने कहा कि खबरों के निर्माण की कार्यशाला का हिस्सा हो जाने की इन कहानियों को पढ़ना विचलित करने वाला अनुभव है, जहाँ नए ढंग से कहन की वापसी हो रही है। संजीव कुमार ने कहा कि संयोग से वे इन कहानियों की रचना प्रक्रिया के भी साक्षी रहे हैं। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का एक वाक्य ‘हर जगह यही हो रहा है’ वस्तुत: आरा शहर ही नहीं, हमारे समूचे परिदृश्य की बात कहता है।

विख्यात पत्रकार और ‘जनसत्ता’ के पूर्व सम्पादक ओम थानवी ने प्रवीण कुमार की कहानियों की रचना शैली में नाटकीय तत्वों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये ऐसी कहानियां हैं, जहाँ चीज़ें मजे-मजे में बताई जा रही हैं, लेकिन कहने का ढंग अलहदा है। कहानी का यह नया ढांचा है, जहाँ यथार्थ वास्तव में ‘उघाड़ा’ हो रहा है।

प्रसिद्ध आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व सम कुलपति प्रोफेसर सुधीश पचौरी ने कहा कि प्रवीण कुमार की कहानियाँ विकास की आड़ में हो रही लूटखोरी को दिखाती हैं और विराट लुम्पेनाइजेशन का नया पाठ प्रस्तुत करती हैं। उन्‍होंने लुम्पेनाइजेशन को कहानी का विषय बनाकर बिल्कुल नए ढंग से लिखने के लिए प्रवीण कुमार को बधाई देते हुए कहा कि जिस प्रसन्न गद्य में वे लिखते हैं, वह सचमुच ‘रीडरली टेक्स्ट’ कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में कथाकार विडम्बनामूलकता को नष्ट करते चले हैं और यही बात उन्हें सिविल सोसायटी का पक्षधर बनाती है।

इससे पहले संयोजन कर रही डॉ उमा राग ने अतिथियों का परिचय दिया और कथाकार प्रवीण कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ संग्रह के कुछ अंशों का पाठ कि‍या। संग्रह के प्रकाशक राजपाल एण्ड सन्ज़ की तरफ से मीरा जौहरी ने आभार प्रदर्शन करते हुए कहा कि नयी रचनाशीलता के लिए हिंदी का सबसे पुराना  प्रतिष्ठित प्रकाशन सदैव स्वागत करता है।

आयोजन में विचारक प्रो अपूर्वानंद, कवि अनामिका, कथाकार प्रियदर्शन, पाखी सम्पादक प्रेम भारद्वाज, बनास जन के सम्पादक पल्लव, हिन्दू कालेज के आचार्य डॉ रामेश्वर राय, डॉ रचना सिंह, डॉ मुन्ना कुमार पांडेय, डॉ अमितेश कुमार, डॉ नीरज कुमार सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और युवा पाठक उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति‍: प्रणव जौहरी

दिल और सोच को छूने वाली हैं गौहर रज़ा की कवितायें : अनामिका

‘खामोशी’ का लोकार्पण करतीं शर्मिला टैगोर और अन्‍य अति‍थि‍गण।

नई दिल्ली : कवि और सुपरिचित फिल्मकार गौहर रज़ा की सद्य प्रकाशित नज़्म पुस्तक ‘खामोशी’ का लोकार्पण 9 सि‍तंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इसका लोकार्पण जानी-मानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया। इस अवसर पर हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता एक तरह की ज़िद है उम्मीद के लिए और हमें कृतज्ञ होना चाहिए की ऐसी कविता हमारे बीच और साथ में है। उन्होंने कहा कि कविता और राजनीति की कुंडली नहीं मिलती, लेकिन गौहर रज़ा अपनी कविता में जीवन के छोटे-बड़े सभी पहलुओं को जगह देते हैं। कवयि‍त्री  अनामिका ने कहा की गौहर रज़ा की कवितायेँ दिल और सोच को छूने वाली है। सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में होने वाली घटनाओं पर भी उनकी कड़ी नज़र है।

शर्मीला टैगोर ने पुस्तक का विमोचन करते वक़्त कहा की गौहर बेबाकी के साथ और बिना डरे नज़्में लिखते हैं और अपना सख़्त से सख़्त वि‍रोध भी हमेशा खूबसूरत ज़बान में लिखते हैं। उन्होंने कहा की गौहर की नज़्में हमारे उस ख़्वाब का हिस्सा हैं, जो हमने आज़ादी के वक़्त देखा था। एक ऐसा समाज बनाने का ख़्वाब जहाँ ख्यालों की विविधता हो, जहाँ बोलने की आज़ादी हो, जहां अपनी तरह से जीने का अधिकार हो। ऐसे वक़्त में जब उम्मीद का दामन तंग लगने लगे, तब गौहर की नज्में हम सब की आवाज़ बन कर हमेशा सामने आयी हैं। शायर गौहर रज़ा ने समारोह में अपनी पुस्तक से कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और नज़्में सुनाईं।

आयोजन में आलोचक अपूर्वानंद, कथाकार प्रियदर्शन, पत्रकार कुलदीप कुमार, कथाकार प्रेमपाल शर्मा, क़व्वाल ध्रुव संगारी, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, हिन्दू कॉलेज की डॉ रचना सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, अध्यापक और लेखक उपस्थित थे।

विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

विवेक भटनागर

लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी ग़ज़ल के प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। उनकी ग़ज़लें मुख्य तौर पर आम आदमी की पीड़ा से सरोकार रखती हैं, वहीं उनके शे’रों में आध्यात्मिक स्वर भी प्रमुखता से सुनाई पड़ता है। हिंदी अकादमी दिल्ली समेत कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित इस ग़ज़लकार की प्रस्तुत हैं तीन ग़ज़लें

1

आजकल हालात कुछ अच्छे नहीं हैं
सच के पैरोकार ही सच्चे नहीं हैं

आंकड़ों के झुनझुनों का क्या करेंगे
मत हमें बहलाओ, हम बच्चे नहीं हैं

इस नई संवेदना का रूप देखें
नाक ऊंची है मगर कंधे नहीं हैं

हम रियाया हैं मेरे जिल्लेइलाही
हम तुम्हारे ताश के पत्ते नहीं हैं

उन पे है अल्लाह की नज़रे इनायत
जो किसी अल्लाह के बंदे नहीं हैं

हैं हमारी सिरफिरी ख़्वाहिश का बोझा
फूल से बच्चों के ये बस्ते नहीं हैं

वो सफ़र भी क्या सफ़र है, जिस सफ़र में
मंज़िलें तो हैं मगर रस्ते नहीं हैं

2

कोई आए तो रोशनी लेकर
बुझती आंखों की ज़िंदगी लेकर

आसमानों पे आंकड़े मत लिख
आ ज़मीनों पे बेहतरी लेकर

अब ख़ुलूसो-वफ़ा की क्या क़ीमत
क्या करेगा ये आदमी लेकर

एक ही दिल था मेरे सीने में
जा रहा है वो अजनबी लेकर

मैं समंदर हूं, पानियों का हुजूम
फिर भी जीता हूं तिश्नगी लेकर

वस्ल के वक़्त अपनी आंखों में
बैठ जाती हो इक नदी लेकर

जी रहा है विवेक भटनागर
शे’र दर शे’र त्रासदी लेकर

3

सुख़न में हाज़िरी है और क्या
मुहब्बत आपकी है और क्या

मगर से मछलियों की दुश्मनी
सरासर ख़ुदक़ुशी है और क्या

इसी पर टांग दे नेकी-बदी
समय की अलगनी है और क्या

धुएं के साथ गहरी दोस्ती!
हवा भी बावली है और क्या

झुकी नज़रों से सबकुछ देखना
अदा-ए-दिलबरी है और क्या

अभी रफ़्तार की बातें न कर
सड़क यह अधबनी है और क्या

ज़ुबां पर बंदिशें रख दो मगर
नज़र भी बोलती है और क्या

सहाफ़त के बदलते दौर में
ख़बर अब सनसनी है और क्या

तवे पर रक़्स है इक बूंद का
हमारी ज़िंदगी है और क्या

उतरकर ख़ुद में ख़ुद को देख लूं
ये ख़्वाहिश आख़िरी है और क्या

जहाँ मिलता है सुनहरे सपनों को अथाह ज्ञान :डॉ. दीनानाथ मौर्य

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों के साझा मंच द्वारा प्रकाशित ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका का दसवां अंक (जुलाई 2017) स्कूलों की अवधारणा को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए ‘परम्परागत स्कूलों’ से हटकर कुछ कुछ ऐसे स्कूलों की प्रक्रियाओं को सामने लाता है, जो न सिर्फ नवाचारी स्कूल हैं, बल्कि जहाँ पर यह विश्वास भी व्यवहार में लाया जाता है कि ‘‘स्वतंत्रता, विश्वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शिक्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्र, संवाद और विश्वास चाहता है, तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में…।”

सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को देखें तो यह साफ़ होता है कि सीखने की सामाजिकता और सामाजिकता को सीखने की प्रक्रिया दरअसल सामाजिक विकास की द्वंदात्मक स्थितियों के आपसी सम्वाद से ही आगे बढ़ी है। इसके लिए ही स्कूल जैसी अवधारणा भी विकसित हुई। किसी भी समाज में स्कूलों की जरूरत क्यों होती है ? स्कूल आखिरकार करते क्या हैं? समाज के बीच स्कूल जैसी अवधारणा क्यों आती है ? इन्हीं सवालों का दूसरा किनारा वह है, जहाँ से यह बात की जाती है कि स्कूल समाज के निर्माण में क्या योगदान देते हैं? जिसे हम शिक्षण कहते हैं, वह सभ्यता के विकास क्रम की वह अवस्था होती है, जहाँ से हम अपने ज्ञान के विस्तार को नया आयाम दे रहे होते हैं- न सिर्फ व्यापकता में, बल्कि उसकी गहरायी के तौर पर भी।

रानीबाग़, नैनीताल उत्तराखंड से निकलने वाली इस पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक है। पत्रिका का यह अंक अपने 20 विचारपरक लेखों को समेटे हुए है। इनमें शिक्षा जगत के नामी-गिरामी हस्तियों, शिक्षाविदों और शिक्षक साथियों के अपने अनुभव भी जगह पा सके हैं। ‘स्कूल कुछ हटकर’ यह पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा गया एक वाक्य है, जिसमें इस अंक की मूल भावना भी समाहित है। यह अंक कुछ नवाचारी स्कूलों की शैक्षिक प्रक्रियों को केंद्र में रखकर सिखाने और सीखने की पूरी प्रणाली को हमारे सामने लाता है। ये नवाचारी स्‍कूल परम्परागत स्कूलों से सही मायने में कुछ हटकर हैं। ‘बच्चे’ शीर्षक से डॉ. माया गोला वर्मा की कविता है, जो पत्रिका के अन्दर के कवर पर बड़े इत्मीनान से पाठक के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को झकझोरती है… ‘बच्चे को करनी है शरारतें/बच्चे को देखनी हैं चिड़ियाएँ/उड़ानी हैं पतंगें/फूलने हैं गुब्बारे/गाना है गीत/चीखना है/चिल्लाना है/हँसना है जी भरकर… परन्तु/बस्ते के भीतर भरे अथाह ज्ञान में/बच्चा डूब गया है/खुश हैं सब/डूबते बच्चे को देखकर/खुश हैं सब/उसके सुनहरे सपने को मरते देखकर….।’ पत्रिका की मूल भावना क्या है ? ‘अनुरोध’ में संपादक लिखते हैं- ‘बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करना एक लोकतान्त्रिक राज्य का पहला दायित्व है। सार्वजानिक शिक्षा का विशाल ढांचा सुविचारित प्रक्रिया के तहत ढहने के कगार पर खड़ा है। इस गफलत के दौर में यह आवश्‍यक हो जाता है कि हम सब शिक्षा से जुड़े हुए तथा शिक्षा को समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व मानने वाले लोग शिक्षा के लोकतान्त्रिक, उदार, बहुलतावादी, वैज्ञानिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए आगे आएं। यह पत्रिका इसी दिशा में एक प्रयास है…।’

‘स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास’ शीर्षक सम्पादकीय में महेश पुनेठा का जोर इस बात पर है कि ‘शिक्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो।’ संपादक इस बात से बाखबर भी है कि स्‍कूली शिक्षा में इस शब्द के मायनों को बहुत ही सरलीकृत करके उसकी मूल भावना से अलग करने का प्रयास भी क्या जा सकता है। इसीलिए वह यह भी लिखते है कि ‘स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है…संवादहीन स्वतंत्रता को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शिक्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ स्वत्रंत्रता, संवाद और विश्वास को जैसे मूल्यों को विद्यालय की मूल भावना से जोड़ते हुए पत्रिका का यह अंक कुछ ऐसे स्कूलों की बानगी हमारे सामने पेश करता है, जहाँ नवाचार पूरे विद्यालयी परिवेश में फलता-फूलता है- किसी सैधांतिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, व्यावहारिक प्रतिफलन में भी।

फेसबुक आज के समय में वर्चुअल दुनिया का एक ऐसा समाज बन गया है, जहाँ हम अपने विचारों के साथ दूसरे से मिलते-जुलते हैं, बतियाते हैं और समय के सवालों से दो–चार होते हैं। पत्रिका का एक पूरा लेख ही ‘फेसबुक परिचर्चा’ का है। इसमें शिक्षा से जुड़े हुए तमाम बिन्दुओं पर संपादक के साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से की गई बातचीत को संकलित किया गया है। सोशल मीडिया का यह सकारात्मक उपयोग तात्कालिक तौर पर सराहनीय और दीर्घकालिक तौर पर अनुकरणीय है। इसे संवाद की संस्कृति को प्रसारित करने में अहम् भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देख सकते हैं। संपादक ने इस तरह के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘विचारों का कभी अंत नहीं होता’ जरूरत उसकी अनन्तता की पहचान की है। कक्षा में अनुशासन को केंद्र में रखकर की गई बातचीत को इस लेख के माध्यम से कई आयामों में समझा जा सकता है। इस विषय पर हेमा तिवारी, अनिल अविश्रांत, मुकेश वशिष्ठ, रणजीत कुमार, जगमोहन कठैत, कमलेश जोशी तथा भाष्कर चौधरी के विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

कवियित्री और शिक्षिका रेखा चमोली का आलेख ‘जहाँ बच्चे मनपसंद विषय से अपना दिन शुरू करते हैं’ विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘तोतोचान’ को आधार बनाकर जापान के तोमोए गाकुएन स्कूल की शिक्षण पद्धति को बयाँ करता है। अपने अनुभव को स्कूल की प्रक्रिया से जोडती हुई लेखिका का यह निष्कर्ष है कि- “तोमोए की एक प्रमुख विशेषता थी स्वाभाविकता़। स्कूल चाहता था कि बच्चों के व्यक्तित्व यथासंभव स्वाभाविकता के साथ निखरें।” स्कूल का माहौल और समाज के साथ आपसी रिश्ते की ख़ूबसूरत सहजता ऊपर से शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ साहचर्य का सम्बन्ध ये सब कुछ मिलकर बच्चों को सीखने के जीवंत अनुभव देते थे। यहाँ विशिष्टता का सम्मान भी था और वि‍भिन्नता की कद्र भी थी। तोतोचान स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए यह आलेख भी अनिवार्यतः पढ़ना चाहिए।

चिंतामणि जोशी का लेख ‘बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना शिक्षा का सार’ उक्रेन, अविभाजित सोवियत संघ के ‘खुशियों का स्कूल’ की कहानी कहता है। स्कूल के संस्थापक वसीली सुखोम्लिंस्खी के विजन को उद्धरित करते हुए लेखक का कहना है कि- ‘स्कूल में चरित्र निर्माण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता था कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में हर बच्चा मानव गरिमा का, गर्व का अनुभव करे। बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना वसीली की शिक्षण विधि का सार था।’ शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की व्यावहारिकता के लिए इस आलेख को देखा जाना चाहिए।

तारा चन्द्र त्रिपाठी जिनका शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है, का साक्षात्कार भी इस अंक की ख़ूबसूरती है। एक शिक्षाकर्मी की हैसियत से वे विभिन्न मुद्दों पर दर्शक की भांति अपनी राय नहीं देते होते हैं, बल्‍कि‍ भागीदार होकर चीजों को जानने और समझने का अनुभव उनके साक्षात्कार में दिखायी पड़ता है। ‘शैक्षिक दखल’ के साथ की गई लंबी बातचीत में वे अपने व्यावहारिक अनुभवों से बाल मनोविज्ञान को सामने रखने का प्रयास भी करते है।
समरहिल स्कूल, लन्दन को आधार बनाकर लिखा गया अंशुल शर्मा का आलेख शिक्षा सिद्धांतों और प्रयोग की जाने वाली विधियों को लेकर हमारे मन में बनी कुछ शंकाओं का समाधान करता है। लेखक ने अपने लेख का शीर्षक ‘मनमर्जी का स्कूल’ देते हुए लिखा है कि- ‘एक स्कूल है जिसमें बालकों को कक्षा में न जाने की आज़ादी है, बालकों को गाली निकालने की आज़ादी है, अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, बालकों को शिक्षकों के नाम लेकर संबोधित करने की आज़ादी है।’

नीलबाग स्कूल की शिक्षण प्रणाली पर राजाराम भादू का साक्षात्कार कई मायनों में अहम् है। डेविड आसबरा के शैक्षिक दर्शन को आधार बनाकर उन्होंने इस विद्यालय की सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को डिटेल में बताया है।

इसी तरह से ऋषि वैली स्कूल चित्तूर, आंध्रप्रदेश पर राजीव जोशी, आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल भोपाल और इमली महुआ, कोंदागावं (बस्तर), छतीसगढ़ पर प्रमोद दीक्षित मलय, साल सबील ग्रीन स्कूल त्रिशूर, केरल पर सुनील, उमंग पाठशाला, गन्नूर(सोनीपत), हरियाणा पर मिनाक्षी गाँधी, रा.आ.प्रा.वि. कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखंड पर डॉ. केवलानंद कांडपाल, रा.प्रा.वि. मेतली, पिथौरागढ़ पर दिनेश सिंह रावत, रा.उ.प्रा.वि.पौड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड पर नरेश पुनेठा, प्रा.वि.स्यूणी मल्ली, चमोली पर देवेश जोशी, रा.प्रा.वि. गणेशपुर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड पर सुनीता के लेख इन स्कूलों की पूरी प्रक्रिया को हमारे सामने रखते है। शिक्षा जहाँ सीखने का दूसरा नाम ही नहीं है, बल्कि आनंद लेने और देने का जरिया भी है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की डायरी का वह अंश भी पत्रिका को इस मायने में वैचारिक गहरायी प्रदान करता है, जिसमें वे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देहरा, देहरादून की शिक्षण प्रक्रिया का आँखों देखा और खुद का अनुभव किया हुआ सच बयाँ करते हैं। इस स्कूल में उन्हें सेवा, समर्पण और शिक्षा का अनूठा संगम दिखाई दिया।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान ‘एक अजीब स्कूल’ गुमनाम स्कूल लापोड़िया जयपुर की कहानी कहता है, जहाँ परिवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया सहजता के साथ अपना रूप ग्रहण करती है। वहां कोई बंधन नही है- सीखने में भी और जीने में भी। समाज और स्कूल का कोई बंटवारा नहीं, स्कूल समाज के साथ कुछ इस तरह घुला-मिला है कि‍ कौन किससे सीख रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है अर्थात सब एक दूसरे के सानिध्य में आगे बढ़ रहे हैं। पसंद और नापसंद के साथ विषयों की दीवारें बनतीं और बिगड़ती रहती थीं और बच्चे इस गुमनाम स्कूल से शिक्षा की एक नई इबारत लिख रहे थे। सीखने की स्वाभाविकता और जीने की सहजता के आपसी संबध को समझने के लिए यह आलेख महत्त्वपूर्ण है।

‘और अंत में’ तीन स्कूलों 1. ग्राम भारती विद्या मंदिर, रानिचौरी, टेहरी गढ़वाल. 2. दून घाटी शिक्षण संस्थान, बापू ग्राम,ऋषिकेश. 3.जीवन जागृति निकेतन, ऋषिकेश के हवाले से दिनेश कर्नाटक ने गाँधीवादी शिक्षा के मूल्यों की व्यावहारिकता को दिखाया है। इन तीनों स्कूलों की स्थापना गाँधीवादी विचारक योगेश चन्द्र बहुगुणा ने की थी। उनके लिए शिक्षा का पेशा रोजगार का नहीं, सेवा का पेशा था। यह आलेख किसी शिक्षण संस्था के निर्माण के साथ उसमें विकसित होने वाली मूल्य-चिंता की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए पठनीय है।

‘आदमी बनने के क्रम में’ मिथिलेश कुमार राय की कविता शुरुआती कविता की तरह फिर एक बार हमारे परिपेक्ष्य को दुरुस्त करती जान पड़ती है- पिता मुझे रोज पीटते थे/गरियाते थे/कहते थे कि साले/राधेश्याम का बीटा दीपवा/पढ़-लिखकर बाबू बन गया/और चंद्नमा अफसर/और तू ढोर हांकने चल देता है/हँसियाँ लेकर गेहूं काटने बैठ जाता है/कान खोल कर सुन ले/आदमी बन जा/नहीं तो खाल खीचकर भूसा भर दूंगा/और बांस की फुनगी पर टांग दूंगा…/आदमियों की तरह सारी हरकतें करते पिता/क्या अपने आपको आदमी नहीं समझते थे/आदमी बनने के क्रम में/मैं यह सोचकर उलझ जाता हूँ…।’
कुल मिलाकर ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक काफी महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखे गये लेख रोचक, उपयोगी और संग्रहनीय हैं।

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शैक्षिक दख़ल (छमाही)
एक अंक- 40 रुपये
5+1 अंक- 200 रुपये
आजीवन-1500 रुपये
संस्थागत आजीवन सदस्यता-2000 रुपये
विशिष्ट सदस्यता-5000 रुपये
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, शि‍व कॉलोनी,
न्‍यू पि‍याना, पो. ऑ डि‍ग्री कॉलेज श्‍जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262502, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
ईमेल- punetha.mahesh@gmail.com

जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते और बात-बात पर छड़ी भाँजते जिन ‘दुखहरण मास्टर’ का वर्णन किया गया है, वे आमतौर पर भारतीय अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन अब स्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। गाँवों के स्कूलों में कहीं-कहीं दुखहरण मास्टर के वंशज भले दिख जाएँ, लेकिन शहरों ने उनकी प्रजाति को विलुप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पब्लिक स्कूलों में तो पुरुषों के अध्यापक बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए गए हैं। अब चुस्त, सुंदर, आकर्षक, ‘मैम’ पब्लिक स्कूलों की शोभा बढ़ाने लगी हैं। ऐसे में दुखहरण मास्टर की प्रजाति का विलुप्त होना अनिवार्य हो गया है। और यह अच्छी खबर है। लेकिन क्या पहनावे और बोलने के ढंग के बदलने से दुखहरण मास्टर की छड़ी भाँजने की मानसिकता बदल गई है? शायद नहीं! आज भी अध्यापकों और अध्यापिकाओं में शारीरिक दंड देने की प्रवृत्ति विद्यमान है। डाँट-डपट की तो बात ही क्या? ऐसे स्कूल या शिक्षक ढूँढ़ने पर ही मिल सकते हैं जो अपने विद्यार्थियों को डाँट-डपट, दंड वगैरह देने से परहेज करते हों। कभी-कभी तो बच्चों को भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने की खबरें अखबारों और टी.वी. में आती रहती हैं। ऐसी खबरों को देखने, पढ़ने के बाद दुःख होता है कि हमारे शिक्षक इस स्तर पर भी उतर सकते हैं?

दूसरी तरफ, यह सुखद बात है कि सरकार, स्कूल प्रशासन, माता-पिता बच्चों को शारीरिक दंड देने के सख्त खिलाफ हो गए हैं। शिक्षकों की प्रवृत्ति भले ही नहीं बदली हो, लेकिन वे बच्चों को दंडित करने से पहले सौ बार जरूर सोचने लगे हैं। हालाँकि बच्चों को डाँट-डपट और तरह-तरह से भयभीत करने से वे अब भी बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बच्चे अनुशासन में नहीं रहेंगे तो वे उन्हें पढ़ा कैसे पाएँगे? और उन्हें अनुशासन में रखने के लिए तो डाँट-डपट जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बड़ी तादात को सँभालना होता है। वे आखिर उन्हें सँभालें भी तो कैसे? प्राइमरी स्तर पर एक ही शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसे यह भी देखना होता है कि बच्चे आपस में मार-पीट न करें। यहाँ तक कि पानी पीते या पेशाब को जाते भी वे अगर मार-पीट करें और किसी को खरोंच भी आ जाए तो संबंधित कक्षा का शिक्षक ही दोषी माना जाता है। ऐसे में, एक सरकारी स्कूल के युवा शिक्षक हेमेन्द्र मोहन की कही बात गौर करने लायक है, ‘‘पहले वाली स्थिति ही अच्छी थी। विद्यार्थी शिक्षकों का लिहाज करते थे, कहा मानते थे। अब तो सीनियर क्लास के लड़के शिक्षकों को ही धमकाते हैं कि आप कुछ कहोगे तो मैं प्रिसिंपल से शिकायत कर दूँगा।’’

जाहिर है, शिक्षकों और विद्यार्थियों के रिश्ते में दरार पैदा हो गई है। यह दरार पब्लिक स्कूलों में थोड़ी कम दिखाई देती है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच माहौल अधिक दोस्ताना है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह दोस्ताना स्वाभाविक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दबाव की वजह से अधिक है। आज के माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे महँगे स्कूलों में जाएँ और वहाँ से मुर्गा बनकर या पीठ पर छड़ी के निशान लेकर घर वापस आएँ। वे अपने बच्चों पर एक उँगली तक पड़ते नहीं देखना चाहते। ऐसे में पब्लिक स्कूलों की यह मजबूरी हो जाती है कि वे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित न होने दें। स्कूल-प्रशासन का अंकुश शिक्षकों पर रहता है, छात्र या माता-पिता की शिकायत पर किसी शिक्षक को निष्कासित करते उन्हें देर भी नहीं लगती। यही वजह है कि पब्लिक स्कूलों के शिक्षक/शिक्षिका विद्यार्थियों से बहुत सहज और फ्रेंडली दिखाई देते हैं। शिक्षकों की तरफ से देखें तो निश्चय ही उनके लिए यह भूमिका बड़ी कठिन हो सकती है। उन्हें अपने तन-मन को रोके रखकर बच्चों को अनुशासित रखना है और पढ़ाना है। शिक्षकों की इस कशमकश के बारे में पब्लिक स्कूल की एक शिक्षिका श्रीमती लीना का कहना है- ‘‘हमें बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। मैं भी इस पक्ष में हूँ कि बच्चों को मारा-पीटा न जाए, डाँटा-डपटा न जाए, लेकिन बिना डाँटे-डपटे बच्चों को सँभालना आसान भी तो नहीं होता? आखिर कभी-कभार घर में हम अपने बच्चों को डाँटते-डपटते हैं या नही?’’

श्रीमती लीना भी अपनी जगह सही हैं, लेकिन बच्चों के कोण से देखें तो उन्हें न तो घर में डाँट-डपट पसंद है, न ही स्कूल में। न तो डाँटने-डपटने वाले माता-पिता उन्हें पसंद है, न ही शिक्षक। हाँ, वे डाँट-डपट के इतने आदी हो गए हैं कि वे थोड़ी बहुत डाँट सहन को भी तैयार रहते हैं। एक पब्लिक स्कूल की छठी कक्षा की छात्रा तृषा का कहना है, ‘‘मेरी कक्षा में सभी टीचर्स बहुत अच्छी हैं। हँसमुख और फ्रेंडली। पर कभी-कभी हमें डाँटती भी हैं। कभी-कभी जब उनका मूड ज्यादा खराब रहता है तो वे हमें ज्यादा डाँटती हैं। मेरे ख्याल से उन्हें डाँटना तो चाहिए, लेकिन कम!’’

सवाल है कि बच्चों को डाँटा-डपटा क्यों जाए? इसलिए कि वे बड़ों की बात नहीं मानते? शिक्षकों की नहीं सुनते?…बच्चों के जीवन और शिक्षण पर चिंतन और अपने चिंतन का क्रियान्वयन करने वाले दुनिया भर के शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात का विरोध किया है। बच्चों से अपनी बात मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती करते माता-पिता और शिक्षक उनकी आलोचना के विषय रहे हैं। टॉल्सटॉय, ए.एस.नील, जॉन होल्ट, मकारांको, रवीन्द्रनाथ, गिजुभाई जैसे शिक्षा शास्त्री बच्चों की आजादी के पक्षधर रहे हैं। बच्चों को भयमुक्त वातावरण में पालने और पढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। एस.एस. नील जैसे शिक्षक तो अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी देते थे कि विद्यार्थी उन्हें उनके नाम से पुकार सकते थे। गिजुभाई ने भी अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी दी थी कि ‘गिजुभाई पगला गए हैं’ कह सकते थे। विद्यार्थियों पर हर वक्त अंकुश रखने वाले शिक्षक इस आजादी की कल्पना तो नहीं ही कर सकते हैं। नील और गिजुभाई जैसे लोग उन्हें बेवकूफ भी लग सकते हैं। जबकि नील और गिजुभाई जैसे शिक्षक इसलिए बच्चों को आजादी देने के पक्ष में थे कि इससे वे आजाद और कुंठा रहित नागरिक के रूप में विकसित होंगे। नील और गिजुभाई के इस दर्शन को समझने और अपनाने वाले शिक्षकों की आज कितनी आवश्यकता है? शिक्षकों के द्वारा दी गई आजादी का उपभोग करते हुए भी शिक्षकों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

आज के हिसाब से देखें तो यह सच है कि हमारे यहाँ एकलव्य या आरुणि जैसे शिष्य नहीं रहे। सच तो यह भी है कि हमारे गुरु अब ब्रह्मा नहीं रहे? शिक्षा को व्यवसाय में बदल देने वाले गुरु राम और युधिष्ठिर जैसे शिष्य तैयार भी कैसे कर सकते हैं? इस मूल्यहीन समय में सद्गुरुओं की जितनी जरूरत है, उतनी ही उनकी कमी दिखाई देती है। सद्गुरु भाषण से नहीं, बल्कि अपने आचरण से अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे, दंड से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन से काम लिया करते थे। तभी उनकी दी हुई शिक्षा चिर स्थायी हुआ करती थी।

थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकगीत : अवैद्यनाथ दुबे

थारू समाज की महि‍लाओं से बात करते अवैद्यनाथ दुबे।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह उत्तर प्रदेश के तराई में बसा थारू आदिवासी समाज भी सांस्कृतिक-लोकपरम्पराओं के मामले में समृद्ध रहा है। आज भी यहाँ स्थानीय पर्व-त्योहारों के मौकों पर लोकधुनों पर थिरकते थारू स्त्री-पुरुषों का समूह दिख जाएगा। विडम्बना है कि दुधवा टाइगर रिज़र्व पहुँचने वाले देसी-विदेशी सैलानी, सत्ता में बैठे हुक्मरान और पैसेवाले थारू आदिवासियों के शोकगीतों में भी मनोरंजन खोजते हैं। यही वजह है कि‍ आज भी यह आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाएं हाशिये पर हैं। वरि‍ष्‍ठ पत्रकार अवैद्यनाथ दुबे की रि‍पोर्ट-

एक तरफ उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय उद्यान दुधवा अपने प्राकृतिक सौंदर्य और वैविध्यपूर्ण वन्य जीवन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, तो वहीं नेपाल से सटे तराई के इन जंगलों के बीच इंसानों की वह दुनिया भी है, जिसे यह ‘सभ्य’ समाज थारू आदिवासियों के नाम से जानता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे नारों के बीच थारू आदिवासियों का यह समाज आज भी हाशिये पर है और इसी समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं तो हाशिये से भी गायब हैं।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह थारू आदिवासी समाज भी महिला प्रधान है, लेकिन हकीकत में यहाँ भी सत्ता पुरुषों के हाथों में रहती है। वैसे तो लोकतंत्र की पहली और सबसे अहम इकाई ग्राम पंचायतों में इनकी पैठ तो दूर, पहुंच भी नहीं है। खुदा न खास्ता कोई महिला ग्राम प्रधान बन भी जाती है तो हमारे तथाकथित सभ्य समाज की तरह यहाँ भी उसकी हैसियत रबर स्टाम्प तक ही सीमित रह जाती है। चलती ‘प्रधानपति’ की ही है।

खेती का काम हो या जंगल से जलावन की लकड़ी ढोकर लाना हो, ज्यादातर महिलाओं को ही हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। यहां तक कि मछली के शिकार के लिए जाल बुनने का काम भी महिलाओं को करना पड़ता है। फिर मर्द क्या करते है? नेपाल सीमा से लगे लखीमपुर जिले के रामनगर गाँव की अचम्भी देवी कहती हैं, ‘उन्हें शराब (कच्ची) बनाने और पीने से फुर्सत मिले तो न।’ कोई 50 साल की अचम्भी को सबसे ज्यादा शिकायत वन विभाग महकमे से है। वह कहती हैं, ‘जंगल से हम जिंदा हैं, लेकिन जलावन के लिए सूखी लकड़ियां लाने पर भी विभाग वाले परेशान करते हैं। कभी हमारी कुल्हाड़ियाँ छीन लेते हैं, कभी हमसे बदसलूकी करते हैं।’

40 साल की भज्जो दो-तीन साल पुराना वाकया बताती हैं, ‘बनकटी के जंगल में जलावन लकड़ी लेने गई महिलाओं पर पुलिस और वन विभाग के लोगों ने हमला कर दिया था, जिसमें सूडा गांव की एक औरत बुरी तरह से घायल हो गई। दोषियों पर कार्रवाई के बजाय पुलिस ने उलटा जख्मी महिला और उसके पति को लूट व जंगल काटने की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।’ यह बात और है कि थारू महिलाओं के बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद आरोपी दुधवा वार्डन और एक कोतवाल पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम हुआ।

एक तरफ थारू समाज के लोग वक़्त के साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो वहीं कई ऐसे मसले हैं, जहां ये चाहकर भी अपने पुराने तौर-तरीके आजमाने पर मजबूर हैं। इनके लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भी उन योजनाओं में शुमार है, जो इन तक पहुंचनी तो दूर, जिनका नाम तक इन्होंने नहीं सुना। थारू समाज के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाते हैं। ईंधन के रूप में ये लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जो थारू महिलाएं जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करती हैं। फिर उनके गट्ठर बनाकर अपने सिर पर लादकर घर लाती हैं। एक गट्ठर का वज़न 50 से 60 किलो होता है।

थारू जीवन को करीब से जानने और इस आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाओं की दुश्वारियों को समझने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने दर्जन से ज्यादा गाँवों का दौरा किया, जिनमें नेपाल से सटे चंदन चौकी, रामगढ़, मसानखंभ, पुरैना, चमरौली, सौनहा, सोनारीपुर, बनकटी आदि शामिल हैं। कुछ मायनों में यहाँ बदलाव की बयार का असर होता दिखा। मसलन, लगभग सभी गांवों में प्राथमिक विद्यालय देखने को मिले। कुछ उच्च प्राथमिक विद्यालय भी दिखे। इनमें से कई गांव बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सड़क से भी जुड़ चुके हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें, उन्हें उनका अधिकार मिल सके, इस दिशा में कारगर पहल होती नहीं दिखती। कायदे से वन्य सम्पदा पर वन्यजीवों के बाद इनका हक बनता है, जिसके लिए यह थारू समुदाय जब-तब आंदोलन करता आया है, लेकिन ताल-तलैयों में शिकार तो दूर, जंगल की सूखी लकड़ियां बीनने पर भी धर लिया जाता है।

रामगढ़ गांव के बिस्सू को आरक्षण के बारे में ज्यादा नहीं पता। हां, उन्हें बखूबी याद है कि करीब दो साल पहले उनके पड़ोसी गांव चमरौली में एक युवक के फ़ौज में बतौर सिपाही भर्ती होने पर आस-पास के गाँवों के लोगों को दावत मिली थी। यह पूछने पर कि उनकी जानकारी में यहाँ कितने लोग सरकारी नौकरी में होंगे, बिस्सू ने आसानी से दो नाम गिना दिए- एक फ़ौज में सिपाही और दूसरा जिला प्रशासन में चपरासी। लड़कियां तो बस जंगल से लकड़ियां बीनने के लिए है, शादी के बाद भी।

थारू आदिवासियों के लिए बाढ़ भी बड़ी समस्या है। इस इलाके में कुल तीन प्रमुख नदियाँ हैं- शारदा, सुहेली और मुहाना। बरसात में जब नेपाल से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। फसलें चौपट हो जाती हैं। इनकी मुश्किलें और तब बाद जाती हैं, जब शासन-प्रशासन से कोई मदद या रियायत नहीं मिलती। पुरैना के राजाराम कहते हैं, ‘बाढ़ आती है, धान और सब्जियों की फसलें चौपट हो जाती हैं। ये लगभग हर बरसात की बात है।’ सरकारें शायद इसे नियति मान चुकी हैं, तभी तो इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया जाता।

परंपरा की खातिर

एक तरफ थारू जनजाति के लोगों में समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की ललक बढ़ी है, वहीँ दूसरी तरफ इस समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही तमाम चीजें आज भी परंपरा के तौर पर जीवित हैं। थारू जनजाति की महिलाएं एक खास किस्म की घास से डलिया और चटाई जैसी कई चीजें तैयार करती हैं। डलिया का इस्तेमाल ये रोटियां या खाने-पीने की बाकी चीजें रखने में करते हैं। इनकी बनाई गई चीजें काफी खूबसूरत होती हैं, लेकिन यह इनके धंधे में शामिल नहीं हो पाया है। हाथ से बुनी गई ऐसी तमाम चीजों का इस्तेमाल ये अपनी दिनचर्या में करते हैं। इनके पास एक और अनोखी चीज होती है लौका। लौका का इस्तेमाल ये मछली पकड़ने में करते हैं। पकी हुई लौकी को अंदर से खोखला करके उसे सुखाया जाता है। थारू जनजाति की औरतें मछली पकड़ते वक्त लौका को अपनी कमर से बंधती हैं और मछली पकड़ कर उसमें रखती जाती हैं।

पुस्तकालय, जो बंद रहता है…

लखीमपुर खीरी की एक तत्कालीन जिलाधिकारी ने कोई दो-ढाई साल पहले थारू आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थारू महोत्सव, आदिवासी गांवों को गोद लेने जैसी कुछ पहल की थी। उन्होंने पलिया कलां से अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर चंदन चौकी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित पुरैना गांव में पुस्तकालय की नीव रखी थी। इसके लिए छोटी ही सही, बिल्डिंग खड़ी हो गई, लेकिन बनने के डेढ़ साल बाद भी कुछ उत्साही स्थानीय आदिवासी युवा इसके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। 12वीं पास पुष्पा कहती हैं, ‘आसपास ‘बड़ा’ स्कूल नहीं होने से हम आगे की पढाई तो नहीं कर सकते, लेकिन जब यहाँ लाइब्रेरी बनी तो लगा हमें यहाँ कुछ पढने को मिलेगा. लेकिन बनने के बाद से यह कभी खुली ही नहीं।’

 

थारू समाज का गौरवशाली अतीत

थारू जनजाति उत्तराखंड के खटीमा और सितारगंज, लखीमपुर समेत उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके और नेपाल के दक्षिणी हिस्से के तराई क्षेत्र में रहती है। थारू जनजाति के इतिहास पर इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि थारू मुस्लिम आक्रमणकारियों से जान बचाकर भागीं राजपूत महिलाओं और उनके सेवकों के वंशज हैं, जो उस दौरान पहाड़ के दुर्गम इलाकों में बस गए थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि इनके समाज में महिलाएं खुद को श्रेष्ठ मानती हैं और कुछ इतिहासकार यहां तक कहते हैं कि महिलाएं अपने पति के साथ भोजन तक नहीं करती थीं। हालांकि अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये राजस्थान के थार इलाके से आए हैं और महाराणा प्रताप के वंशज हैं। थारू अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं। समाज में पिछड़े वर्ग में आने की वजह से 1961 में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।

थारू आदिवासियों के ज्यादातर परिवार खेती पर निर्भर हैं। 60-70 के दशक तक इनके पास काफी जमीनें थीं, लेकिन अब ज्यादातर दूसरे के खेतों में काम करते हैं। इस समाज के ज्यादातर परिवारों ने कभी अपनी जरूरत तो कभी भूमाफियाओं के जाल में फंसकर अपनी जमीनें बेच दीं। कुछ लोग अभी भी अपनी जमीनों पर खेती करते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं। यही इनकी आजीविका का मुख्य जरिया है। पारंपरिक रूप से ये धान और चावल की खेती किया करते थे, लेकिन खेती में लागत के हिसाब से फायदा नहीं हो पाता। लिहाजा, इन्होंने सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी है। इसके अलावा ये पशुपालन, शिकार और मछली पकड़ने जैसे काम भी करते हैं।
थारू जनजाति के लोगों में अब अपनी ज़मीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में वे अब सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं। जनजातियों की जमीन पर कब्जे को रोकने संबंधी कानून के मुताबिक उनकी जमीन गैर जनजाति के लोग नहीं खरीद सकते, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर इनकी जमीनों पर गैर-आदिवासियों का कब्ज़ा है। अपनी ज़मीनों को गैर जनजातियों को बेच चुके थारू जनजाति के लोग अब चाहते हैं कि सरकार इस कानून का सख्ती से पालन कराए।