Archive for: July 2017

चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें?

अजित कुमार

‘चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे/क्यों दिखें? / हम लिखेंगे:/ चांदनी उस रुपये-सी है/ कि जिसमें/चमक है, पर खनक ग़ायब है।’

नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। आज (18 जुलाई 2017) सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया। देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था। तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं। इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं। अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है।

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे। कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था।

श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

सोबन ब्वौडा! असली आज़ादी तो तूने दिलाई : कमल जोशी

कमल जोशी

कमल जोशी जी से 20 जून को कोटद्वार में उनके घर पर मुलाकात हुई थी। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने ‘लेखक मंच’ के लि‍ए छह रचनाएं दे दी थीं। अन्‍य रचनाएं देने का वादा कि‍या था। उनमें में से एक ‘रंगीली की खि‍चड़ी’ 26 जून को प्रकाशि‍त कर दी थी। अब पढ़ि‍ए उनकी एक और रचना-

हिमालय खूबसूरत दिख रहा था।

उखड़ती साँसों के बावजूद मैंने ट्राय-पोड लगाया, कैमरा सेट किया और फोटो खींचने लगा। हिमालय मनमोहक अदाएं दिखा रहा था। एक सुन्दर फोटो भी ट्रैकिंग की सारी थकान मिटा देती है। इन्हीं दृश्यों के लिए भी तो मैं यात्राएं करता हूँ।

मैं खतलिंग ग्लेशियर के इलाके में था। कल सुबह ही अपनी बाइक पर आया था। अपनी आदत और जिद के अनुरूप रेहा पिछली सीट पर कब्जा जमाये थी। चंबा से बूढ़ा केदार का रास्ता इतना खूबसूरत था कि जो रास्ता चार घंटे में कट जाना चाहिए था, उस पर ही हमने सारा दिन लगा दिया था। ज्यादा समय तो टिहरी डैम के नीचे दबे हुए टिहरी के यादों के बारे में बात करने में ही कट गया। कितनी बार टिहरी आया था और जिन सड़कों पर चला था, फटफटिया दौड़ाई थी, आज वो सब पानी के नीचे दबी थीं, जाने कैसी होंगी वे सड़कें अब? पानी के साथ आई गाद में दब गयी होंगी! …पर यादें हैं, जो हमेशा तैरती ही रहती हैं!

घनसाली के बाद घुमावदार रास्ता। दोनों तरफ कभी चीड़ की तो कभी मिलीजुली प्रजाति के पेड़। हवा में ठंडी खुनक और साथ में करेले के साथ नीम वाली तर्ज पर कवि हृदया रेहा। हर पचास कदम पर बाइक रोकने को कहती। रास्ते को महसूस करती, पेड़ों से बतियाती रेहा। किसी शहर में पले-बढ़े को इस रूप में देखना मुझ जैसे पहाड़ी को भला ही लगता है, और असमंजस भी होता है कि‍ हम पहाड़ी ही क्यों पहाड़ का इतना असम्मान करते है। शायद पहाड़ में रहने के दुःख और कठिनाइयां हमें इसकी सुन्दरता को अनदेखा करने को मजबूर कर देती हैं।

रेहा के साथ एक पंगा और है। वह जहां कहीं भी सड़क के किनारे के ढाबे में किसी औरत को काम करता देखती है, तो बिना रुके नहीं रहती। चाय पीनी तो लाजिमी है ही (मैं अपने प्रिय फैन-बिस्कुट का भक्षण भी करता हूँ), उस महिला से बात कर उसकी जिन्दगी और परिस्थितियों में झांकने की भी कोशिश करती है। कई बार मुझे दुभाषिये का काम भी करना होता है। ऐसे ही चमियाला से पहले एक ढाबे पर एक महिला चाय बना रही थी। रेहा ने मेरा कन्धा दबाया। मैने इशारा समझा और ढाबे पर बाइक रोक दी। चाय की जरूरत तो मुझे भी थी। उतरते ही चाय का ‘आर्डर’दे दिया गया। मेरी कमजोरी को देखते हुए रेहा ने महिला से पूछा, ‘‘क्‍या फैन भी हैं?’’ महिला ने ‘हाँ’ कहा तो रेहा ने फैन लेकर मुझे पकड़ाए और ताकीद दी, ‘‘तुम अपना मुंह फैन खाने में व्यस्त रखना, मैं जरा बात भी करती हूँ।’’ मैं निरीह बकरे की तरह फैन चबाने में व्यस्त हो गया। रेहा महिला के साथ बातें करने लगी। पता चला कि ढाबा मालकिन महिला का नाम सावित्री है और यह ढाबा उसके पति ने खोला था। पर ढाबा खोलते ही पति के यार दोस्तों ने यहां कब्जा जमा लिया।

‘‘ग्राहक कम आते थे और साथ के लुंड ज्यादा…मवासी तो घाम लगनी ही थी।’’ दुखी सावित्री ने बताया, ‘‘दारूड़ी भी गया था।’’

सावित्री ने पति को समझाया, दोनों बच्चों की जिम्मेदारी के बारे में बताया, ‘‘पर दारूड़ी किसी की सुनता है क्या?’’ ये सवाल उसने रेहा से ही कर डाला।

‘‘क्‍यों, अब कहाँ है पति।’’ रेहा ने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘अरे कहाँ,  हमें नरक में छोड़ कर खुद भाग्याँन हो गया।’’ बिना भाव बदले सावित्री बोली, ‘‘ कर्जा ऊपर से छोड़ गया। मैं तो घर पर ही रहती थी।’’ उसने जोड़ा। फिर बताया कि जब कर्जा के तकाजे वाले आये और उन्हें लगता कि‍ अब कर्जा वापस नहीं मिलेगा, तो वे उसके पति को ही गाली देने लगते। पति तो पति ही था, सावित्री की नजर में। उसके लिए गाली कैसे सहती। इसलिए उसने तय किया कि‍ वह खुद ढाबा चला कर कर्जा उतार देगी। और उसने ऐसा किया भी। उसकी कर्मठता से विभोर रेहा ने उसे गले लगा लिया। मैं सिर्फ ‘शाबास भुली’का ही गंग्याट कर पाया।

रात को हम बूढ़ाकेदार ही रुके। यहाँ मेरे परिचित बिहारी भाई का आश्रम भी है, पर रात को उनको परेशान करना उचित नहीं समझा, तो एक छोटे से होटल में रहे।

सुबह चिड़ियों की चहचाहट से नीद खुली। बाइक को बुढा़केदार में ही छोड़ दिया गया। हम अगुंडा होते हुए  महासर ताल के रास्ते लगे। हमारा कोई निश्चित जगह जाने का कार्यक्रम नहीं था। उत्तराखंड, अरे नहीं तब उत्तराँचल, बने एक साल हुआ था यानी ये वृतांत 2001 का है।

मैं उत्तराखंड के बारे में लोगों की राय जानने को उत्सुक था इसलिए घूम रहा था। जब मैं नयी टिहरी में था तो रेहा का पता चला कि‍ मैं नयी टिहरी में हूँ, तो वह बिना बताये चंबा आ गई- इस फरियाद कम धमकी ज्यादा के साथ कि वह घूमना चाहती है। फिर क्या था, हम सतत आवाराओं की तरह निकल पड़े थे।

हम महासर के ऊपर एक धार में पहुंचे थे कि‍ मुझे हिमालय दिखाई दिया। मैंने ट्राइ-पौड तान दिया- फोटो के लिए। पिट्ठू लिए हुए रेहा भी पीछे से आकर पसर गई। फोटो खींचने की जल्दी इसलिए थी कि कहीं कोहरा खूबसूरत हिमालय को ढक न दे।

मैंने फोटो लीं, लाजिमी था कि रेहा के कुछ पोज उस ब्रेक ग्राउंड में भी लूं क्योंकि‍ खाने का सामान उसी के पिट्ठू में था। अगर यह न करता तो ये भी हो सकता था कि रेहा खुंदक में मुझे खाने के लिए कुछ ना दे या कम दे।

पेट में कुछ जाने के बाद आसपास देखा। लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर एक व्यक्ति बैठा था। आसपास गायें थीं। वह यहाँ इस छोटे से मैदान में पशु चराने ही आया था। वह भी हमें देख रहा था। हमारा रात को यहीं रहने का इरादा था क्योंकि‍ पास ही छोटा पानी का नाला भी था और कुछ दूरी पर छाने भी। रात काटने के लिए सुरक्षित जगह थी। उस व्यक्ति के अलावा और कोई आसपास नहीं था। मैं उससे ही जगह की जानकारी लेने गया। नजदीक पहुँच कर जैसे ही मैं उसको अभिवादन करता, उसने कहा, ‘‘गुड मोर्निंग।’’  मैं अचकचा गया। इस तरह के अंग्रेजी अभिवादन की आशा मुझे नहीं थी। वह एक बुजुर्ग थे और छोटी सी छड़ी लेकर एक पत्थर पर बैठे थे। वह लगभग बहत्तर-पिछत्‍तर साल के थे। मैंने भी ‘गुड मार्निंग’ कह कर उनको जवाब दिया और बिस्कुट का पैकेट खोल कर उनकी और बढा़या। पहले तो उन्होंने मना किया, पर रेहा न जाने कब पीछ-पीछे आ गई थी।  उसने कहा कि‍ ले लीजिये ना ताऊ जी। तो उन्होंने एक बिस्कुट ले लिया। उन्होंने हमें बैठने को कहा तो हम पास के ही पत्थर में बैठ गये। मैंने देखा कि‍ वहां पर एक पुरानी ब्रिटिश टाइम की गरम डांगरी रखी है। संयोग से उस पर जो मोनोग्राम था, उस पर रॉयल आर्मी जैसा कुछ लिखा था, जो बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही पता चल रहा था। मैंने पूछा कि‍ यह डांगरी आपके पास कहाँ से आई तो वह मुस्कराए और बोले कि‍ यह मेरी ही है। मैंने उनसे पूछा कि‍ वह ब्रिटिश फौज में थे, क्या। उन्होंने हामी भरी और कहा, ‘‘मैंने  वर्ल्ड वार भी लड़ा है। यह तब की ही है।’’

मैंने उनसे उनके फौजी जीवन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि‍ वह आजाद हिन्द फौज में भी थे। अब दिलचस्पी बढ़नी स्वाभाविक थी। वह तो जिंदा इतिहास थे। रेहा ने स्वाभावानुसार डायरी निकाली और वृद्ध जी से नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम सोबन सिंह बताया। उनसे बातें शुरू हुईं। कहानी दिलचस्प थी। उन्हीं के शब्दों में…

‘‘मैं जब चौदह साल का था, तो देश (मैदान) के बारे में बहुत सुना था। पौड़ी जिले के एक फौजी थे। वह जब छुट्टियों में आये तो अपनी बहन के घर हमारे गाँव आये। उनकी चमक-दमक देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। तय कर लिया कि‍ फौज में भर्ती होंगे। पर टिहरी में तो भरती होती नहीं थी। हमें पता चला कि‍ लैंसडाउन में फौज की भरती हो रही है। मैं और मेरे दो दोस्त घर से बिना बताये लैंसडाउन के लिए भाग गए। रात को जिस गाँव में जाते और कहते कि‍ फौज में भर्ती होने जा रहे हैं तो लोग खाना खिला देते। सोने-ओढ़ने को दे देते। तब जमाना दूसरा था, पराया बच्चा भी अपना होता था। तीन दिन में लैंसडाउन पहुंचे। डर तो रहे थे।’’ सोबन सिंह जी ने बताया। लैंसडाउन पहुँचने पर वे लोग सीधे फौज के एक संतरी के पास पहुंचे और उसे सीधे सल्यूट किया। जब उसने पूछा तो उन्होंने बताया कि‍ हम फौज में भर्ती होने टिहरी से आए हैं। उसने कहा कि‍ परसों सुबह बटालियन ग्राउंड में आना। मैं सबसे छोटा था तो उसने मुझ से मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया कि‍ चौदह साल है। वह संतरी बोला, ‘‘तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम भर्ती नहीं हो सकते।’’ मैं बहुत दुखी हो गया। मेरी आँखों में आंसू आ गए कि अब घर किस मुंह से जाऊँगा। डर भी रहा था। मेरी हालत देखकर संतरी को दया आ गई।

शायद संतरी को पहले किसी ने इतनी इज्जत से सेल्यूट किसी ने नही किया था इसलिए वह प्रभावित हो गया था। वह बोला, ‘‘ तू पहाड़ी हिसाब से थोड़ा लंबा है। जब तेरी उम्र पूंछे तो अपनी उम्र सोलह साल बताना।’’

गुरुमंत्र पाकर सोबन सिंह खुश हो गए। उनको बीच का एक दिन काटना मुश्किल हो गया। पैसे नही थे, खाना कहाँ से खाएं और फौज की भर्ती की परीक्षा देनी थी। वह उदास बैठे थे। तभी एक काला कोट पहने व्यक्ति उधर से गुजरा। ‘‘हमें पता नहीं था कि‍ काला कोट वकील पहनते हैं और हम कचहरी के रास्ते पर हैं। उसने हमें देखा। शायद हमारे चेहरे पर भूख साफ दिखाई दे रही थी। उसने पूछा कि‍ कौन हो, क्यों बैठे हो। पहले तो हम घबराए कि‍ यह क्यों पूछ रहा है, पर बाद में उन्हें बताया कि‍ फौज में भरती होने आए है।’’

‘‘ भाग कर आए हो।’’ जब उन्होंने पूछा तो हमें काटो तो खून नहीं। हमारे साथ का एक रोने लगा। वह डर से रो रहा था या भूख से पता नहीं। यह मैंने सोबन सिंह जी से नही पूछा।

उन्होंने उसे रोते हुए देखकर पूछा कि‍ पैसे-वैसे हैं तुम्हारे पास! तो इन लोगों ने मना कर दिया।

‘‘जब उन्होंने पूछा कि‍ रात को खाना खाया कि‍ नहीं, तो हम चुप रहे।’’

काले कोट वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘‘क्या भूखे पेट फौज में भर्ती होओगे?’’ फिर उन्होंने जेब से एक रुपिया निकाला और उन्हें दिया और ‘सि‍र्फ खाना खाना’ कहकर चला गए। काले कोट वाला वह वकील इन लोगों को देवदूत सा लगा!

‘‘हम तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाए।’’ उस वक्त एक रुपया बहुत होता था। आज के 100 रुपयों से ज्यादा। हमने दो दिन उसी में काटे और तीसरे दिन भर्ती के लिये पहुंचे। उन दिनों आज की तरह कठिन नहीं था, भर्ती होना। अंग्रेजों को तो लड़ने के लिए भेड़-बकरी चाहिए थी। हमारी उम्र, लंबाई-चौड़ाई लि‍खी। मैदान में दौडा़या और वजन उठवाया। फिर एक डॉक्टर ने आला लगाकर कुछ देखा। बस उस समय ही डर लगा। और हम भर्ती हो गए।’’सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘लैंसडाउन में हमारी ट्रेनिंग हुई, नौ महीने के लिए और फिर हमें बरेली भेजा गया। दो महीने बाद ही हमें मलाया (मलेशिया) जापानियों से लड़ने भेज दिया। बम-गोले गिरते थे। पैंट में ही हग-मूत देते थे। बच्चे ही तो थे हम। बाद में हमें जापानियों ने पकड़ लिया। कैदी हो गया। ये सन (उन्नीस सौ) चवालीस  की बात होगी। कैद में हम दिन भर ड्रिल करते थे। जापानी हमसे ज्यादती भी करते थे।

‘‘एक दिन एक हिन्दुस्तानी हवालदार हमारे पास आया कि‍ क्या हम कैद से छूटना चाहते हैं? हमने कहा कि‍ क्या उसके पास भागने का कोई प्लान है। उसने कहा कि‍ भागना नहीं है। अपने देश के लिए लड़ना है। हमने कहा कि‍ वह तो हम कर ही रहे थे। तब उसने कहा कि‍ तुम देश के लिए नहीं, अंग्रेजों के लिए लड़ रहे थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’’ सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘एक दिन हमारी बड़ी परेड यानी सब कैदी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को एक साथ मैदान में लाया गया। पता चला कि‍ कोई सुभाष बोस भाषण देंगे। हमने सोचा कि‍ जापानी अफसरों के होते हुए कोई हिन्दुस्तानी भाषण देगा- इसका मतलब है कि‍ वह कोई बड़ा आदमी होगा। भाषण में सुभाष बोस ने कहा कि‍ भारतवासी गुलाम हैं।  हमें गुलामी की जंजीर तोड़नी होगी। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ गुलाम क्या होता है?. उन्होंने कहा कि‍ हमें देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लड़ना होगा। आजाद हिन्द फौज में भर्ती होना होगा।’’

‘‘बाद में पंजाबी हवालदार ने हमें गुलामी का मतलब समझाया। हमारी आंखें खुली कि‍ हम अब तक विदेशियों के लिए अपनी जान देने पर उतारू थे। हम आजाद हिन्द फौज में आ गए। रंगून, बर्मा में हमने अंग्रेजी फौज के खिलाफ लड़ा। हार गए और हमारे ऑफिसर ढिल्लों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जंगलों में भटकते रहे। इस डर से कि‍ पकडे़ जायेंगे, तो सजा होगी। हम गांवों में आ गये और सारे कागज फाड़ डाले कि‍ कहीं पकडे़ न जाएँ। देश जब आजाद हुआ, तो हमने समझा कि‍ हमें फौज वापस ले लेगी, पर पता चला की फौजी नियमों से हम बागी थे। कोई पेंशन नहीं। ‘‘हमने और हमारे साथियों ने कई बार सरकार को लिखा कि‍ हम अंग्रेजों के हिसाब से तो बागी थे, पर अपने हिन्दुस्तान के लिए ही तो लडे़ ही थे। हमारी सुध लो। पर कहीं से कोई जवाब नहीं।’’  इसके बाद सोबन सिंह चुप हो गए।

मैंने सोबन सिंह को ध्यान से देखा। यह भी एक स्वतन्त्रता सेनानी था। देश के लिए लड़ा। गोलियों का सामना किया था। यह यहाँ अपनी भेड-बकरियों के साथ जिंदगी बिताने के लिए अभिशप्त है। कुछ स्वतन्त्रता सेनानियों को ताम्र पत्र मिले, पेंशन मिली, उनके बच्चों को और बच्चों के बच्चों को भी रियायत मिली, नौकरी मिली! इस सेनानी का, जीवन के आखिरी मुकाम पर खडे़ सोबन सिंह का सहारा सिर्फ एक बांस की डंडी है….! यह भी तो स्वतन्त्रता सेनानी ही है। मैंने ध्यान दिया कि‍ बातों-बातों में रेहा ने कब सोबन सिंह का हाथ पकड़ लिया है और उसे सहला कर सांत्वना दे रही है। मुझे पता ही नहीं चला। सोबन सिंह उसे प्यार से देख रहे थे।

सोबन सिंह ने मेरी और देखा और कहा, ‘‘उत्‍तरांचल बन गया है। क्या हमारी भी कुछ पूछ होगी!’’ तब मैं कोई जवाब नहीं दे पाया था! सोबन सिंह जी से मिलने के सोलह साल बाद आज यह कह सकने कि‍ स्थिति में हूँ कि उत्तराखंड तो सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों के लिए बना है ताऊ जी, आपको पूछने की फुर्सत किसी को नहीं.!

मुझे भी चुप देख कर सोबन सिंह जी ने हिमालय के तरफ देख कर कहा, ‘‘कोहरा साफ हो गया है।हिमालय की फोटो खींचो।’’

मैंने हिमालय की तरफ देखा- मुझे वो बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। सोबन ब्वौडा की बात सुनने के बाद मैं खुद को कोहरे से निकाल नहीं पा रहा था।

स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)