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फिर क्या हुआ: अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि फिर सनूबर का क्या हुआ…

आपने उपन्यास लिखा और उसमें यूनुस को तो भरपूर जीवन दिया। यूनुस के अलावा सारे पात्रों के साथ भी कमोबेश न्याय किया। उनके जीवन संघर्ष को बखूबी दिखाया, लेकिन उस खूबसूरत प्यारी सी किशोरी सनूबर के किस्से को अधबीच ही छोड़ दिया।

क्या समाज में स्त्री पात्रों का बस इतना ही योगदान है कि कहानी को ट्विस्ट देने के लिए उन्हें प्रकाश में लाया गया और फिर जब नायक को आधार मिल गया तो भाग गए नायक के किस्से के साथ। जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है कि अभिनेत्रियों को सजावटी रोल दिया जाता है।

अन्य लोगों की जिज्ञासा का तो जवाब मैं दे ही देता, लेकिन मेरे एक पचहत्तर वर्षीय प्रशंसक पाठक का जब मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला कि बरखुरदार, उपन्यास में आपने जो परोसना चाहा बखूबी जतन से परोसा…लेकिन नायक की उस खिलंदड़ी सी किशोरी प्रेमिका ‘सनूबर’ को आपने आधे उपन्यास के बाद बिसरा ही दिया। क्या सनूबर फिर नायक के जीवन में नहीं आई  और यदि नहीं आई तो फिर इस भरे-पूरे संसार में कहाँ गुम हो गई सनूबर….
मेरी कालेज की मित्र सुरेखा ने भी एक दिन फोन पर याद किया और बताया कि कालेज की लाइब्रेरी में तुम्हारा उपन्यास भी है। मैंने उसे पढ़ा है और क्या खूब लिखा है तुमने। लेकिन यार, उस लड़की ‘सनूबर’ के बारे में और जानने की जिज्ञासा है।
वह मासूम सी लड़की ‘सनूबर’…तुम तो कथाकार हो, उसके बारे में भी क्यों नहीं लिखते। तुम्हारे अल्पसंख्यक-विमर्श वाले कथानक तो खूब नाम कमाते हैं,  लेकिन क्या तुम उस लड़की के जीवन को सजावटी बनाकर रखे हुए थे या उसका इस ब्रह्माण्ड में और भी कोई रोल था…क्या नायिकाएं नायकों की सहायक भूमिका ही निभाती रहेंगी..?
मैं इन तमाम सवालों से तंग आ गया हूँ और अब प्रण करता हूँ कि सनूबर की कथा को ज़रूर लिखूंगा…वाकई कथानक में सनूबर की इसके अतिरिक्त कोई भूमिका मैंने क्यों नहीं सोची थी कि वो हाड-मांस की संरचना है…मैंने उसे एक डमी पात्र ही तो बना छोड़ा था। क्या मैं भी हिंदी मसाला फिल्मों वाली पुरुष मानसिकता से ग्रसित नहीं हूँ, जिसने बड़ी खूबसूरती से एक अल्हड पात्र को आकार दिया और फिर अचानक उसे छोड़ कर पुरुष पात्र को गढने, संवारने के श्रम लगा दिया।
मुझे उस सनूबर को खोजना होगा…वो अब कहाँ है, किस हाल में है…क्या अब भी वो एक पूरक इकाई ही है या उसने कोई स्वतंत्र इमेज बनाई है ?

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तब पंद्रह वर्षीय सनूबर कहाँ जानती थी कि उसके माँ-बाप उसे जमाल साहब के सामने एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। हाँ, उत्पाद ही तो थी सनूबर…विवाह-बाज़ार की एक आवश्यक उत्पाद…एक ऐसा उत्पाद जिसका मूल्य कमसिनी में ही अधिकतम रहता है…जैसे-जैसे लडकी की उम्र बढ़ती जाती है, उसकी कीमत घटती जाती है। सनूबर की अम्मी के सामने अपने कई बच्चों की ज़िन्दगी का सवाल था। सनूबर उनकी बड़ी संतान है…गरीबी में पढा़ई-लिखाई कराना भी एक जोखिम का काम है। कौन रिस्क लेगा। जमाना ख़राब है कितना..ज्यादा पढ़ लेने के बाद बिरादरी में वैसे पढ़े-लिखे लड़के भी तो नहीं मिलेंगे?

चील-गिद्धों के संसार में नन्ही सी मासूम सनूबर को कहीं कुछ हो-हुआ गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर उसके बाद और भी तो बच्चे हैं। एक-एक करके पीछा छुडा़ना चाह रही थीं सनूबर की अम्मी।

सनूबर की अम्मी अक्सर कहा करतीं–“ जैसे भिन्डी-तुरई..चरेर होने के बाद किसी काम की नहीं होती, दुकानदार के लिए या किसी ग्राहक के लिए..कोई मुफ्त में भी न ले..ऐसे ही लड़कियों को चरेर होने से पहले बियाह देना चाहिए…कम उमिर में ही नमक रहता है उसके बाद कितना स्नो-पाउडर लगाओ, हकीकत नहीं छुपती…!”

सनूबर की अम्मी जमाल साहब के सामने सनूबर को अकारण डांटती और जमाल साहब का चेहरा निहारती। इस डांटने-डपटने से जमाल साहब का चेहरा मुरझा जाता। जैसे- यह डांट सनूबर को न पड़ी हो, बल्कि जमाल साहब को पड़ी हो। यानी जमाल साहब उसे मन ही मन चाहने लगे हैं।
जमाल साहब का चेहरा पढ़ अम्मी खुश होतीं और सनूबर से चाय बनाने को कहती या शरबत लाने का हुक्म देतीं।
कुल मिलाकर जमाल साहब अम्मी की गिरफ्त में आ गये थे।
बस एक ही अड़चन थी कि उन दोनों की उम्र में आठ-दस बरस का अंतर था।
सनूबर की अम्मी तो आसपास के कई घरों का उदाहरण देतीं, जहां पति-पत्नी की उम्र में काफी अंतर है। फिर भी जो राजी-ख़ुशी जीवन गुज़ार रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सनूबर यूनुस की दीवानी है….या उसे शादी-बियाह नहीं करवाना है।
यूनुस जब तक था, तब तक था….वो गया और फिर लौट के न आया…
सुनने में आता कि कोरबा की खुली खदानों में वह काम करता है। बहुत पैसे कमाने लगा है और अपने घरवालों की मदद भी करने लगा है।
यूनुस ने अपने खाला-खालू को जैसे भुला ही दिया था। यह तो ठीक था, लेकिन सनूबर को भूल जाना उसे कैसे गवारा हुआ होगा। वही जाने…
सनूबर तो एक लड़की है…लडकी यानी पानी…जिस बर्तन में ढालो वैसा आकार ग्रहण कर लेगी।
सनूबर तो एक लड़की है। लड़की यानी पराया धन, जिसे अमानत के तौर पर मायके में रखा जाता है और एक दिन असली मालिक ढोल-बाजे-आतिशबाजी के साथ आकर उस अमानत को अपने साथ ले जाते हैं।
सनूबर इसीलिए ज्यादा मूंड नही खपाती- जो हो रहा है ठीक हो रहा है, जो होगा ठीक ही होगा।
आखिर अपनी माँ की तरह उसका भी कोई घर होगा, कोई पति होगा, कोई नया जीवन होगा।

हर लडकी के जीवन में दोराहे आते हैं। ऐसे ही किसी दोराहे पर ज्यादा दिन टिकना उसे भी पसंद नहीं था। क्या मतलब पढा़ई-लिखाई का, घर में माहौल नहीं है। स्कूल भी कोई ऐसा प्रतिस्पर्धा वाला नहीं कि जो बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े और आगे की राह दिखलाए। सरकारी स्कूल से ज्यादा उम्मीद क्या रखना। अम्मी-अब्बू वैसे भी लड़की जात को ज्यादा पढा़ने के पक्षधर नहीं हैं। लोक-लाज का डर और पुराने खयालात- लड़कियों को गुलाबी उम्र में सलटाने वाली नीति पर अमल करते हैं।बस जैसे ही कोई ठीक-ठाक रिश्ता जमा नहीं कि लड़की को विदा कर दो। काहे घर में टेंशन बना रहे। हाँ, लड़कों को अच्छे स्कूल में पढा़ओ और उन पर शिक्षा में जो भी खर्च करना हो करो।
अब वो जमाल साहब के रूप में हो तो क्या कहने। साहब-सुह्बा ठहरे।अफसर कालोनी में मकान है उनका। कितने सारे कमरे हैं ।दो लेट्रिन-बाथरूम हैं। बड़ा सा हाल और किचन कितना सुविधाजनक है।
सनूबर का क्वार्टर तो दो कमरे का दडबा है। उसी में सात-आठ लोग ठुंसे पड़े रहते हैं। आँगन में बाथरूम के नाम पर एक चार बाई तीन का डब्बा, जिसमे कायदे से हाथ-पैर भी डुलाना मुश्किल।
यदि ये शादी हो जाती है तो कम से कम उसे एक बड़ा सा घर मिल जाएगा।
घूमने-फिरने के लिए कार और इत्मीनान की ज़िन्दगी।
इसलिए सनूबर भी अपनी अम्मी के इस षड्यंत्र में शामिल हो गई कि उसकी शादी जमाल साहब से हो ही जाये।

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ये अलग बात है कि उसे यूनुस पसंद है।
सनूबर का कजिन यूनुस…
सनूबर अपनी अम्मी की इसीलिए कद्र नही करती कि उनकी सोच का हर कोण सनूबर की शादी की दिशा में जाता है। अम्मी हमेशा बच्चियों की शादी के लिए अब्बू को कोसती रहती हैं कि वे काहे नहीं इतना कमाते कि बच्चियों के लिए गहने-जेवर ख़रीदे जाएँ, जोड़े जाएँ…फिक्स्ड डिपोजिट में रकम जमा की जाए और नाते-रिश्तेदारों में उठे-बैठें ताकि बच्चियों के लिए अच्छे रिश्ते आनन-फानन मिल जाएँ।
लड़कियों के बदन का नमक ख़त्म हो जाए तो रिश्ता खोजना कितना मुश्किल होता है, ये वाक्य सनूबर अम्मी के मुख से इतना सुन चुकी है कि उसने अपने बदन को चखा भी एक बार और स्वाद में बदन नमकीन ही मिला।
इसका मतलब कि‍ उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों के बदन में नमक कम हो जाता होगा।
इस बात की तस्दीक के लिए उसने खाला की लड़की के बदन को चाट कर देखा था। उसके तो तीन बच्चे भी है और उम्र यही कोई पच्चीस होगी, लेकिन उसका बदन का स्वाद नमकीन था।
एक बार सनूबर ने अम्मी के बदन को चाट कर देखा। वह भी नमकीन था। फिर अम्मी ऐसा क्यों कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ बदन में नमक कम हो जाता है।
ये सब देहाती बातें हैं और तेरी अम्मी निरी देहातन है।
ऐसा अब्बू ने हंसते हुए कहा था, जब सनूबर ने बताया कि सबके बदन में नमक होता है, क्योंकि इंसान का पसीना नमकीन होता है और इस नमक का उम्र के साथ कोई ताल्लुक नहीं होता है।
अम्मी को सोचना चाहिए कि स्कूल में पढ़़ने वाली लड़की ये तो कतई नहीं सोचती होगी कि उसकी शादी हो जाए और वो लड़की अपने आस-पास के लड़कों या मर्दों में पति तलाशती नहीं फिरती है।
फिर लड़कियों की बढ़ती उम्र या बदन की रानाइयां माँ-बाप और समाज को क्यों परेशान किये रहते हैं। उठते-बैठते, सोते-जागते, घुमते-फिरते बस यही बात कि मेरी सनूबर की शादी होगी या नहीं।
सनूबर कभी खिसिया जाती तो कहती, “मूरख अम्मी…शादी तो भिखारन की, कामवाली की, चाट-वाले की बिटिया की भी हो जाती है। और तो और तुम्हारी पड़ोसन पगली तिवारिन आंटी की क्या शादी नहीं हुई, जो बात-बेबात तिवारी अंकल से लड़ती रहती है और दिन में पांच बार नहाती है कि कहीं किसी कारण अशुद्ध तो नहीं हो गई हो।दुनिया में काली-गोरी, टेढ़ी-मेढ़ी, लम्बी-ठिगनी सब प्रकार की लडकियाँ तो ब्याही जाती हैं अम्मी। और तुम्हारी सनूबर तो कित्ती खूबसूरत है।जानती हो मैथ के सर मुझे नेचुरल ब्यूटी कहते हैं।तो क्या मेरी शादी वक्त आने पर नहीं होगी?”
सनूबर के तर्क अपनी जगह और अम्मी का लड़का खोज अभियान अपनी जगह।
उन्हें तो जमाल साहब के रूप में एक दामाद दिखलाई दे रहा था।

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निकिता स्कूल में आज संजीदा दिखी।
सनूबर ने कारण जानने की कोशिश नही की। यह सनूबर की स्टाइल है। वह ज़बरदस्ती किसी के राज उगलवाने में यकीन नहीं करती। उसे मालूम है कि जिसे सुख या दुःख की बात शेयर करनी होगी, वो खुद करेगी। यदि बात एकदम व्यक्तिगत होगी तो फिर काहे किसी के फटे में टांग अड़ाना।
टिफिन ब्रेक में जब दोनों ने नाश्ते की मिक्सिंग की तो निकिता आहिस्ता से फूट पड़ी- “जानती है सनूबर, कल गज़ब हो गया रे !”
सनूबर के कान खड़े हुए लेकिन उसने रुचि का प्रदर्शन नहीं किया।
निकिता फुसफुसाई- “कल शाम मुझे देखने लड़के वाले आने वाले हैं!”
जैसे कोई बम फटा हो, निकिता का मुंह उतरा हुआ था। सनूबर भी जैसे सकते में आ गई। यह क्या हुआ, अभी तो मिडिल स्कूल में नवमी ही तो पहुँची हैं सखियाँ। उम्र पंद्रह या कि सोलह साल ही तो हुई है। इतनी जल्दी शादी!
-“तेरी मम्मी ने ऐतराज़ नहीं किया पगली।”
-“काहे, मम्मी की ही तो कारस्तानी है यह। उन्होंने मेरी दीदी की शादी भी तो जब वह सत्रह साल की थीं, तभी करा दी थी। कहती हैं कि उम्र बढ़ जाने के बाद लड़के वाले रिजेक्ट करने लगते हैं और हमें पढ़ा-लिखा कर नौकरी तो करानी नहीं बेटियों से।चार बहनों के बाद एक भाई है। एक-एक कर लड़कियाँ निपटती जाएँ, तभी सुकून मिलेगा उन्हें !”
सनूबर क्या कहती..कितने बेबस हैं सखियाँ इस मामले में।
उन्हें घर का सदस्य कब समझा जाता है।हमेशा पराई अमानत ही तो कहते हैं लोग।उनका जन्म लेना ही दोख और असगुन की निशानी है।
लड़कियों के सतीत्व की रक्षा और दहेज़ ऐसे मसले हैं, जिनसे उनके परिवार जूझते रहते हैं।

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निकिता की चिंता, “मुझे आगे पढा़ई करना है रे।अभी शादी नहीं करनी।क्या मेरी कोई सुनेगा?”
सनूबर क्या जवाब देती।
लड़कियों की कहाँ सुनी जाती है। उन्हें तो हुकुम सुनने और तामील करने की ट्रेनिंग मिली होती है।
अजब समाज है, जहां लड़कियों को एक बीमारी की तरह ट्रीट किया जाता है। बीमारी हुई नहीं कि जो भी कीमत लगे लोग, उस बीमारी से निजात पाना चाहते हैं।
और जब बिटिया बियाह कर फुर्सत पाते हैं लोग तब दोस्त-अहबाबों में यही कहते फिरते हैं- “गंगा नहा आये भाई…अच्छे से अच्छा इंतज़ाम किया। लेन-देन में कोई कसर नहीं रक्खी।”
सनूबर की भी तो अपने घर में यही समस्या थी।
आये दिन अम्मी अब्बू को ताने देती हैं- “कान में रुई डाले रहते हैं और बिटिया है कि ताड़ की तरह बढ़ी जा रही है। सोना दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। न जेवर बनाने की चिंता न कहीं रिश्तेदारी में उठाना-बैठना। क्या घर-बैठे रिश्ता आएगा? जूते घिस जाते हैं, तब कहीं जाकर ढंग का रिश्ता मिलता है ?”
अब्बू मजाक करते, “तुम्हारे माँ-बाप के कितने जूते घिसे थे।कुछ याद है, जो मैं मिला।ऐसे ही अल्लाह हमारी बिटिया सनूबर का कोई अच्छा सा रिश्ता करा ही देगा।”
अम्मी गुस्सा जातीं, “अल्लाह भी उसी की मदद करता है, जो खुद कोई कोशिश करे। हाथ पे हाथ रखकर बैठे आदमी के मुंह में अल्लाह निवाला नहीं डालता।आप मज़ाक में बात न टालिए और दुनियादार बनिए। अभी से जोड़ेंगे, तभी आगे जाकर बोझा नहीं लगेगा।”
सनूबर ने अपनी व्यथा निकिता को सुनाई।
दोनों सहेलियाँ उदास हो गईं.।
तभी टिफिन खत्म होने की घंटी बजी और वे क्लास-रूम की तरफ भागीं।

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सनूबर को स्कूल जाना बहुत पसंद है। इस बहाने उसे घर-परिवार की बेढंगी वयस्तता से मुक्ति मिलती है। अम्मी चिल्लाती रहती है कि इतनी जल्दी क्यों स्कूल भागने की फिराक में रहती है सनूबर। टाइम होने से पांच मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए। कितना नजदीक है स्कूल।
-“का करती है माटीमिली इत्ता पहले जाकर, झाडू लगाती है का वहां?”
सनूबर का स्कूल में बहुत मन लगता है। वहाँ तमाम सहेलियाँ मिल जाती हैं। उनके सुख-दुःख सुनना, बेहिसाब गप्पें मारना। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में समानता-असमानता की विवेचना करना। टीवी पर देखी फिल्म या सीरियल पर बहस करना।
और भी इधर-उधर की लटर-पटर…लंतरानियाँ….
घर में क्या हो सकता है। बस अम्मी के आदेश सुनते रहो। काम हैं कि ख़तम ही नहीं होते हैं। जब कुछ काम न हो तो कपड़ों का ढेर लेकर प्रेस करने बैठो। ये भी कोई ज़िन्दगी है।
सनूबर के घर में तो और भी मुसीबतें हैं।कोई न कोई मेहमान आता रहता है। उनकी खातिरदारी करना कितना बोरिंग होता है। उस पर अम्मी-अब्बू के नए दोस्त जमाल साहेब। वह आये नहीं कि जुट जाओ खिदमत में। प्याज काटो, बेसन के पकौड़े बनाओ। बार-बार चाय पेश करो। अम्मी भी उनके सामने जमीन्दारिन बन कर हुकुम चलाती हैं-“कहाँ मर गई रे सनूबर, देखती नहीं..कित्ती देर हो गई साहब को आये। तेरी चाय न हुई मुई बीरबल की खिचड़ी हो गई।जल्दी ला!”
सनूबर न हुई नौकरानी हो गई।
-“कहाँ मर गई रे।देख, तेरे अब्बू का मोजा नहीं मिल रहा है।जल्दी खोज कर ला!”
-“मेरा पेटीकोट कहाँ रख दि‍या तूने।पेटी के ऊपर रखा था, नहीं मिल रहा है…जल्दी खोज कर ला!”
-“जा जल्दी से चावल चुन दे।फिर स्कूल भागना। बस सबेरे से स्कूल की तैयारी करती रहती है, पढ़-लिख कर नौकरी करेगी क्या। तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और तू जाने कब तक छोकरी बनी रहेगी।”
ऐसे ही जाने-कितने आदेश उठते-बैठते, सोते-जागते सनूबर का जीना हराम करते रहते।
सनूबर स्कूल के होमवर्क हर दिन निपटा लेती थी।
उसके टीचर इस बात के लिए उसकी मिसाल देते।
उससे गणित न बनती थी इसलिए उसने गणित की कुंजी अब्बू से खरीदवा ली थी।
बाकी विषय को किसी तरह वह समझ लेती।
वैसे भी बहुत आगे पढ़ने-पढ़ाने के कोई आसार उसे नज़र नहीं आते थे, यही लगता कि दसवीं के बाद अगर किस्मत ने साथ दिया तो बारहवीं तक ही पढ़ पाएगी वर्ना उसके पहले ही बैंड बज सकता है। अम्मी बिटिया को घर में बिठा कर नहीं रखेंगी- “जमाना खराब है।जवान लड़की घर में रखना बड़ा जोखिम भरा काम है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर माथा पीटने के अलावा क्या बचेगा। इसलिए समय रहते लड़कियों को ससुराल पहुंचा दो। एक बार विदा कर दो। बाद में सब ठीक हो जाता है। घर-परिवार के बंधन और जिम्मेदारियां उलटी-सीधी उड़ान को ज़मीन पर ला पटकती हैं।”
अम्मी कहती भी हैं- “अपने घर जाकर जो करना हो करियो।यह घर तुम्हारा नहीं सनूबर!”
तो क्या लड़की अपने माँ-बाप के घर में किरायेदार की हैसियत से रहती है?
यही तो निकिता ने भी थक-हार कर कहा- “मुझे उन लोगों ने पसंद कर लिया है सनूबर। इस साल गर्मियों में मेरी शादी हो जायेगी रे!”
सनूबर का दिल धड़क उठा।
-“गज़ब हो गया। पिछले साल यास्मीन ने इस चक्कर में पढाई छोड़ दी और ससुराल चली गई। कितनी बढ़िया तिकड़ी थी अपनी। जानती है- मार्केट में यास्मीन की अम्मी मिलीं थीं। उन्होंने बताया कि यास्मीन बड़ी बीमार रहती है। उसका ससुराल गाँव में है, जहां आसपास कोई अस्पताल नहीं है। उसकी पहली डिलवरी होने वाली थी और कमजोरी के कारण बच्चा पेट ही में मर गया। बड़ी मुश्किल से यास्मीन की जान बची। ईद में यास्मीन आएगी, तो उससे मिलने चलेंगे न। पता नहीं तुम्हारा साथ कब तक का है!”
निकिता की आँखों में आंसू थे।
उसने स्कूल के मैदान में बिंदास क्रिकेट खेलते लडकों को देखा।
सनूबर की निगाह भी उधर गई।
लडकों की ज़िन्दगी में किसी तरह की आह-कराह क्यों नहीं होती।
सारे दुःख, सारी दुश्वारियां लड़कियों के हिस्से क्यों दी मेरे मौला…मेरे भगवान।
और तभी निकिता ने घोषणा की- “हम लड़कियों का कोई भगवान या अल्लाह नहीं सनूबर!”
सनूबर ने भी कुछ ऐसा ही सोचा था, कहा नहीं कि कहीं ईमान न चला जाए।अल्लाह की पाक ज़ात पर ईमान और यकीन तो इस्लाम की पहली शर्त है।
लेकिन निकिता ठीक ही तो कह रही है।
कितनी तनहा, कितनी पराश्रित, कितनी समझौता-परस्त होती हैं लड़कियाँ।

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लड़कियाँ ज़िन्दगी के तल्ख़ हकीकतों से कितनी जल्दी वाकिफ होती जाती हैं।
लड़के जो लड़कियों को सिर्फ एक ‘माल’ या ‘कमोडिटी’ के रूप में देखते हैं, वे कहाँ जान पाते हैं कभी कि इन शोख चुलबुली लड़कियों को प्रतिदिन ज़िन्दगी की कई नई सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ता है।
ऐसे ही एक दिन सनूबर और निकिता यास्मीन से मिलने उसके घर गई।
मस्जिद-पारा में घर है यास्मीन का।
बड़ी मस्जिद के पीछे वाली गली में रहती है वह।
निकिता ने जींस-टॉप पहना था, जबकि सनूबर सलवार-सूट में थी। सनूबर मस्जिद-पारा आती है, तो बाकायदा सर पर दुपट्टा डाले रहती है।
यास्मीन ने घर का दरवाज़ा खोला था।
आह, कितना बेरौनक चेहरा हो गया है…गाल पिचके हुए और आँखों के इर्द-गिर्द काले घेरे। जैसे लम्बी बीमारी से उठी हो। तभी पीछे से यास्मीन की अम्मी भी आ गईं और उन्हें अन्दर आकर बैठने को कहा।
निकिता और सनूबर चुपचाप यास्मीन का चेहरा निहारे जा रही थीं। कितनी खूबसूरत हुआ करती थी यास्मीन, शादी ने उससे ख़्वाब और हंसी छीन ली थी।
यास्मीन स्कूल भर के तमाम बच्चों और टीचरों की मिमिक्री किया करती और खुद न हंसती, जब सब उसके मजाक को समझ कर हंसते तब ठहाका मार कर हंसती थ। उसकी हंसी को ग्रहण लग गया था।
निकिता और सनूबर उसकी दशा देख खौफज़दा हो चुकी थीं। क्या ऐसा ही कोई भविष्य उनकी बाट जोह रहा है। कम उम्र में शादी का यही हश्र होता है।फिर उनकी मांए ये क्यों कहती हैं कि उनकी शादियाँ तब हुई थीं, जब वे तेरह या चौदह साल की थीं। लेकिन वे लोग तो मस्त हैं, अपनी ज़िन्दगी में। फिर ये स्कूल पढ़ने वाली लड़कियाँ क्यों कम उम्र में ब्याहे जाने पर खल्लास हो जाती हैं?
ऐसे ही कई सवालात उनके ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे थे।
यास्मीन शादी का एल्बम लेकर आ गई और उन लोगों ने देखा कि यास्मीन का शौहर नाटे कद का एक मजबूत सा युवक है। दिखने में तो ठीक-ठाक है, फिर उन लोगों ने क्यों कम उम्र में बच्चों की ज़िम्मेदारी का निर्णय लिया। मान लिया शादी हो ही गई है, फिर इतनी हड़बडी़ क्यों की? बच्चे दो-चार साल बाद भी हो जाते तो क्या संसार का काम रुका रह जाता?
यास्मीन बताने लगी- “उनका मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज है। सुबह दस बजे जाते हैं तो रात नौ-दस के बाद ही लौटते हैं। गैरेज अच्छी चलती है, लेकिन काम तो मेहनत वाला है। मेरी जिठानी मेरी ही उम्र की है और उसके दो बच्चे हैं। इस हिसाब से तो उस परिवार में मैं बच्चे जनने के काबिल तो थी ही। मुझे वैसे भी कहानियों की किताब पढ़ने का शौक है। वहां पढाई-लिखाई से किसी का कोई नाता नहीं। बस कमाओ और डेली बिस्सर खाना खाओ- मटन न हो तो मछली और नहीं तो अंडा।इसके बिना उनका निवाला मुंह के अन्दर नहीं जाता। ये लोग औरत को चारदीवारी में बंद नौकरानी और बच्चा जनने की मशीन मानते हैं!”
तो ये सब होता है शादी के बाद और अपनी निकिता भी इस घनचक्कर में फंसने वाली है।
सनूबर ने गौर किया कि निकिता के चेहरे पर डर के भाव हैं।आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं, उसके चेहरे पर।
लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया है।
निकिता को जो मालूम हुआ है, उसके मुताबिक बीस एकड़ की खेती है उनकी, एक खाद-रसायन की दूकान है। दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं वहां। निकिता का होने वाला पति बड़ा भाई है, बीए करने के बाद खेती संभालता है और छोटा भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है। इसका मतलब निकिता घर की बड़ी बहू होने जा रही है।
ससुराल झारखण्ड के गढ़वा में है।नगर से सटा गाँव है उनका। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन निकिता की इच्छा किसी ने जाननी चाही। क्या निकिता अभी विवाह की जिम्मेदारियों में बंधने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार है? कहाँ बच्चियों की इच्छा पूछी जाती है। माँ-बाप पर एक अघोषित बोझ जो होती हैं लड़कियाँ।
यास्मीन का इलाज चल रहा है, डॉक्टर खान मेडम उसका इलाज कर रही हैं। उसे रक्ताल्पता है और ससुराली दिक्कतों ने मानसिक रूप से उसे कन्फ्यूज़ का कर दिया है।
-“अल्ला जाने कब उसका आत्म-विश्वास लौटेगा।कितनी बिंदास हुआ करती थी अपनी यास्मीन !” घर लौटते हुए सनूबर ने गहरी सांस लेकर यही तो कहा था, और निकिता भी भर रास्ता खामोश बनी रही।

(उपन्यास अंश)

 लोक जीवन और बाजारीकरण : गिरीश चंद्र पांडेय प्रतीक 

कर्म की भाषा / त्रिलोचन

रात ढली, ढुलका बिछौने पर,
प्रश्‍न किसी ने किया,
तू ने काम क्या किया
नींद पास आ गई थी
देखा कोई और है
लौट गई
मैंने कहा, भाई, तुम कौन हो.
आओ। बैठो। सुनो।
विजन में जैसे व्यर्थ किसी को पुकारा हो,
ध्वनि उठी, गगन में डूब गई
मैंने व्यर्थ आशा की,
व्यर्थ ही प्रतीक्षा की।
सोचा, यह कौन था,
प्रश्‍न किया,
उत्तर के लिए नहीं ठहरा
मन को किसी ने झकझोर दिया
तू ने पहचाना नहीं ?
यही महाकाल था
तुझ को जगा के गया
उत्तर जो देना हो
अब इस पृथिवी को दे
कर्मों की भाषा में।

बहुत कुछ बदल रहा है भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सरोकारों के रूप में, प्रकृति से लेकर पुरुष तक सब में परिवर्तन देखा जा सकता है। हमारे गाँव शहर बन जाने को आतुर है। और गाँव और शहर में बंटा लोक जीवन के संघर्ष भी कहीं न कहीं बदले हैं। और यह परिवर्तन न पूरी तरह नकारात्मक है न सकारात्मक, इसे हम इस रूप में समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे परिवर्तन के मायने आखिर हैं क्या।
लोक जीवन और उसके संघर्षों से उपजे पर्व शहरीकरण के साथ बदलाव की ओर या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ह्रास की ओर अग्रसर हैं। क्या कारण है कि लाखों-करोडों लोग मुँह से यही बोलते भी हैं कि लोक पर्वों का स्वरूप बदल गया है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार है कौन। क्या केवल समाज जिम्मेदार है । इस मामले में केवल समाज को दोष देना उचित नहीं लगता। जिन संघर्षों और परिस्तिथियों में इन पर्वों को लोगों ने अपने मनोरंजन और सामजिक चेतना को जागृत करने के लिए शुरू किया होगा, उस समय पर्वों का स्वरूप कुछ और रहा होगा। साल दर साल भौतिक विकास के साथ मानवीय चेतना और रहने खाने-पीने के तारीकों में  बदलाव के फलस्वरूप पर्वों के भी रूप और रंग बदलते गए। उनको मनाने के तरीके बदलते गए। पहले ग्रामीण जीवन की सामूहिकता और सरलता में रचे पगे तीज त्यौहार समूह में ही पूर्ण किये जाते थे। किसी भी लोक में नृत्य, गीत, सामूहिकता के द्योतक ही नहीं, उसका जीवन थे। जैसे- पहाड़ विशेषकर उत्तराखण्ड के आलोक में होली, बग्वाल, हिलजात्रा, पांडव नृत्य आदि विधाओं को देखें तो पूर्णतः सामूहिकता से पोषित लोक विधाएं हैं। और इनके पीछे श्रम की महत्ता रही है। यह केवल कोरा मनोरंजन नहीं था। इसकी पहली शर्त और आवश्यकता सामूहिकता और संवेदनशीलता थी, जो समय और विद्रूप विकास के साथ सामूहिकता से एकात्मकता की ओर अग्रसर है । जिसने तीज त्योहारों के स्वरूप को ही नहीं बदला वरन हमारे जीने के, सोचने के, खाने-पीने और रहने के तरीकों को बदला है। हम हर स्तर पर समाजोन्मुखी से आत्मोन्मुखी हुए हैं। श्रम के प्रति धारणा बदली है। उसके प्रति जो नकारत्मकता बाजार ने बड़ी ही चालाकी से परोसी है, उसके परिणामों का ही असर है। हम हर पर्व को बाजार से रेडीमेड खरीद लाना चाहते हैं। उसे अपना सामाजिक स्टेटस भी मान बैठे हैं। हम थोड़ा गहराई से लोक पर्वों की प्रकृति को देखेंगे तो उनका सौंदर्य सामूहिकता, साहस, श्रमशील जीवन, ऐंचे-पेंचे, में था, जिस ढांचे को समाज और उसके द्वारा पोषित बाजार ने लगभग ढहा दिया है।

अगर उत्तराखण्ड के परिपेक्ष में बात करें तो पलायन ने यहाँ की लोक संस्कृति को कमजोर किया है। संस्कृति मंचों पर दो-तीन दिन के ढोल पीटने और नाचने-गाने से नहीं बचने वाली। कोई भी त्यौहार केवल मनोरंजन नहीं होता। वह उस समाज की सभ्यता का द्योतक  भी होता है। और इसके लिए उस क्षेत्र की आबो हवा, पानी, गाड़- गधेरे, जंगल, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी या कहा जाए- पारिस्तिथिकी  जिम्मेदार ही नहीं पोषक, और तोषक भी होती है। हमें पहले गांवों को बचाना होगा। नहीं तो समाज जहाँ जाएगा वहां की पारिस्तिथिकी के अनुसार लोक को तोड़ेगा मरोड़ेगा, गमले में केले के पेड़ लगायेगा, पैकेट में बंद घुघुते, रेडिमेड ऐपण, और पिछौड़े ही संस्कृति होंगे। और वही लोक भी लोक की पहिचान भी और बाजारीकरण से प्रभावित लोक भाषा भी। ऐसा नहीं की लोक अब है ही नहीं, लोक अभी भी है । पर लोक जीवन अपनी पहिचान बदल रहा है। लोक जीवन को अगर हम संकुचित दृष्टि से देखेंगे तो वो लोक के साथ अन्याय होगा। लोक किसी एक जगह या परिवेश में बंध नहीं सकता। उसकी सीमाएं असीमित हैं। वो शहर की गलियों में भी उतना ही है, जितना गाँव के चौपालों में। बस उसे पहिचानने की और सहेजने की आवश्यकता है।

लोक की धूल से सने लोग बड़े सरल और सहज होते हैं। उनके लिए लोक की हवा और पानी प्राकृतिक और परिष्कृत चीजें हैं। वो धारे, नौले से डबका कर भर लाते हैं फौले, गगरी और पी लेते हैं गट-गट। उन्हें उबालने और परिष्कृत करने की जरूरत महसूस नहीं होती । पर अब बाजार के उपकरणों डिब्बे बंद खाने, ने लोक को लोक न रहने देने की कसम खा ली है। इस बाजारीकरण के दुष्प्रभावों से बचना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन कुछ जागरूकता लायी जाए तो इसके प्रभावों को कुछ कम तो किया ही जा सकता है। लोक भी गतिशील होता है और होना भी चाहिए। लोक जीवन और उसके संघर्षों को रेखांकित किया जाना चाहिए। उसका सबसे बड़ा अस्त्र श्रम है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना और समझना होगा।

(बाखली, जनवरी-जून का संपादकीय)

अनंत भटनागर की कवि‍ताएं

अनंत भटनागर

वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है

संकरी सड़कों पर
दाएं-बाएं
आजू-बाजू से काट
वाहनों की भीड़ में
अक्सर
सबसे आगे
निकल जाती है
वह लड़की
जो
मोटरसाइकिल
चलाती है

सोचता हूँ
जब लड़कियों के लिए
दुनिया में
वाहन चलाने के
अनेकानेक
सुन्दर व कोमल
विकल्प मौजूद हैं
तब भी आखिर
वह लड़की
मोटरसाइकिल ही
क्यों चलाती है ?

कभी लगता है कि
यह उसके भाई ने
खरीदी होगी
और वह
छोड़ गया होगा
घर परिवार
या फिर
हो सकता है
यह उसके पिता की
अन्तिम निशानी हो
और,
बेचना उसे
नहीं हो
स्वीकार

हो सकता है
वह लड़की
एक्टिविस्ट हो
और मर्दों की दुनिया
के अभेद्य दुर्ग को
सुनाना चाहती ह
अपनी ललकार

कभी-कभी
सोचने लगता हूँ
क्या करती होगी
वह लड़की
जब कभी जाती होगी
अपने बॉयफ्रेंड के साथ
मोटरसाइकिल पर
पीछे बैठकर

क्या
बलखाती / मुस्काती
लतिका सी पुलकित
सिमट जाती होगी
अपने हर अंग में
हर वांछित/अवांछित
ब्रेक पर
या झुंझलाती/झल्लाती
रहती होगी
उसकी
धीमी रफ्तार पर

अवसरों की वर्षा में
दिनोंदिन
घुलती दुनिया में
जल, थल, वायु
के भेद भुलाकर
जब लड़कियां
चलाने लगी है
रेल, जहाज,
हवाई जहाज
एक लड़की
के मोटर साईकिल
चलाने पर इतना
सोच-विचार
आपको बेमानी लग
सकता है

मगर,
इन दकियानूसी सवालों
की गर्द
आप हटाएं
इससे पहले ही
पूछ लेना चाहता हूँ
एक सवाल

क्या
आप नहीं चौंके थे
उस दिन
जब आपने
पहली बार किसी
एक लड़की को
मोटरसाइकिल चलाते
हुए देखा था ?

विरासत में मिले
हजारों साल पुराने
खजाने को
मस्तिष्क में समेटते हुए
क्या आपको नहीं लगता
कि
आकाश-पाताल को
पाटने से
कठिन होता है
सोच की खाइयों को
भर पाना
जल थल
भेदने से
कठिन होता है
जड़ तन्तुओं को
सिल पाना
हाथ पैर
काटने से
कठिन होता ह
सड़े घावों
को चीर पाना

इसलिए
उस लड़की के
सामने से गुजरते हुए
सोचता हूँ अक्सर
क्या शादी के बाद भी
चला पाएगी वह
मोटरसाइकिल
क्या बदल पाएगी
वह
वक्त के पहिये की
रफ्तार
क्या
वह आगे बैठी होगी
और पति
होगा
पीछे सवार ?

मोबाइल फोन

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां भेजे
सन्देश
कबूतरों के हाथ
और/करती रहें
जवाब की
अनवरत प्रतीक्षा

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां जागें
रात-रात
और छिपकर
रेशमी कपड़ों पर
सिल दें
कोई एक नाम

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां लिखें
कविताएं
और/गुनगुनाती
इठलाती
गुजार दें
सुबह-शाम

प्रेम जैसी
सरल चीज के लि
इतनी कठिनाई
सहने का
समय नहीं है यह

प्रेम के लिए
अब उपलब्ध है
एक मोबाइल दुनिया
मोबाइल दुनिया
जहाँ
हर वक्त/हर जगह
किया जा सकता है
प्रेम
जहाँ हर क्षण
पलटी जा सकती है
प्रेमियों से
मनुहार
जहाँ हर रोज
बदले जा सकते है
प्रेमी

मोबाइल दुनिया में
प्रेम के लिए
शब्द ही नहीं
सम्पूर्ण शब्दावली है
प्रेम के लिए
क्षणिक चित्र नहीं
गति‍क दृश्‍यावली है
कविता ही नह
गीत है, स्वर है
ध्वनि गत्यावली है

इस गतिशील दुनिया में
प्रेम के लिए
लम्बी तपस्या/गहन
साधना करते रहन
का समय नहीं है
अब किसी के पास
इतने अन्तराल में तो
किए जा सकते हैं
अनेकानेक प्रेम
एक के बाद एक
या फिर
एक साथ

मोबाइल फोन
ने कर दिया हैं
प्रेम करना
बहुत आसान

सचमुच !
प्रेम की अनुपस्थिति में ही
होता है
प्रेम करन
बहुत आसान।

महात्माजी

महात्माजी
खाते नहीं हैं
अन्न
वस्त्र धारण नहीं करत
खुला ही रखते हैं
तन-बदन
वर्षों पहले त्याग चुके हैं
गृहस्थ जीवन

तुम्हारे जैसे नहीं हैं वह
पदार्थ-अपदार्थ के लिए
ललचाता नहीं है
उनका मन

पेट भरने के लिए
खा लेते हैं
सूखी मेवा
शि‍ष्यों ने करवा दिया है
आश्रम
वातानुकूलन
शि‍ष्यायें चंचल हैं
करती हैं
अविचल सम्पूर्ण सेवा

महात्माजी
परम त्यागी हैं।

शुक्र है

बाल खुशनसीब है
अब तक साथ निभा रही है
हिना

अपनी उम्र को
उम्र में मिलाते हुए
उसने भी गुजार दी है
एक लम्बी उम्र

डर है कि कुछ
भूरे-भूरे विभीषण
असलिय
बताने लगे हैं.

शुक्र है
पतझड़
अभी बहुत दूर है

अनामिका, अंकल!

हँसी की
हजारों वॉट
बरसाकर
धीरे से
उसने रख लिय
अपनी जींस की
पिछली पॉकेट में
सेलफोन

फिर लेपटॉप के
दोनो पंखों को फैलाकर
उड़ने लगी असीम
आकाश में

एयरपोर्ट के
वेटिंग लाऊंज में
मित्रता के तमाम
पर्यायवाचियों को
दुहराते हुए
मैंने उससे पूछा था
उसका नाम

मित्रता की तमा
संभावनाओं को खारिज
करते हुए
उसने कहा-
अनामिका, अंकल !

काँप रहा है मन

देहरी पर
रखते हुए
बाहर
काँपता है
जैसे दिया
काँप रहा हैं मन
मीत तुम्हें
स्कूल को सौंपते हुए.

फूल/तुम
घबरा ना जाना
अजनबी पंखुरियों के साथ
डरना मत
स्कूल की अनजानी
हवाओं से
न होना बेचैन
क्लासरूम की
अपरिचित गंध से

डर रहा हूँ मैं
कहीं टीचर के
रंगबिरंगी सूट में तुम्हें
दिखने न लगे गुब्बारे
बच्चों की खिलखिलाहट से
याद न आ जाएं
तुम्हें अपने
खासमखास खिलौने

कुछ कहना चाहो
तुम
और न कह पाने की
जुम्बिश में
फूट न पड़े
रूलाई

रोशन
जिन्दगी की आस में
दीप तुम्हें
सौंप रहा हूँ
दुनिया को

काँप रहा है मन

औरत एक सवाल है

धरती पर उसके
जमते कदम
बढ़ती गति
और
पंखिल परवान
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

उसकी खिलखिलाहट
चहकती हँसी
महकती मुस्‍कान
उसकी खिलती आँख
खुलती हुई वाक्
दिन पर दिन
ऊँची उठती नाक
उसके कपड़ों की नाप
कर्मों की छाप
कदमों की थाप

उसकी आस
उसके अहसास
खुद पर बढ़ता
विश्‍वास
जिनि‍क लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

युग-युग से
मानस की कुन्द कारा में
द्रोपदी के केश
सीता का पुनर्प्रवेश
अहिल्या निर्निमेष
गार्गी के प्रश्‍न
मांडवी का मन
और
मीरा का नर्तन.
माधवी का मोल
गांधारी कर कौल
और
उर्मिला का अनबोल
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक  सवाल है

आदिम इच्छाओं के तल
कुचलते आए हैं जो सपनों को
वे ही कि‍या करते है
सवाल
औरत को लेकर
वे ही दिया करते हैं
जवाब
अपने चेहरे बदलकर.

सिर्फ इन चेहरों से
पर्दा उठने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गूंगा होने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गुमनां बनने तक
औरत एक सवाल है

(कवि‍ता संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ से साभार)

आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

मनुष्यता के पक्ष में है वजाहत का लेखन : प्रो बेनिवाल

अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाते असग़र वजाहत।

नई दिल्ली : लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ वि‍श्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम लेखक होते हैं जिन्हें पढ़कर सचमुच जीवन भर प्रेरणा मिलती हो। असग़र वजाहत ऐसे बड़े लेखक हैं जिन्होंने भारत विभाजन पर ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को मार्मिक कृति लिखकर मनुष्यता के पक्ष में एक महान कृति की रचना की है। आयोजन में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने असग़र वजाहत के साथ अपने रंगमंच के अनुभव सुनाए और कहा कि उनके साथ रहकर ही जाना जा सकता है कि बड़ा लेखक जीवन में कितना सहज और सरल होता है। प्रोफेसर मोहन ने असग़र वजाहत के आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ को इधर लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया। विश्वविद्यालय में रंगमंच के सलाहाकार अनूप त्रिवेदी ने ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ के मंचन में प्रयुक्‍त दो गीत सुनाए तथा हबीब तनवीर के प्रसिद्ध तराने ‘अब रहिये बैठ इस जंगल में’ की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव ने असग़र वजाहत पर विशेषांक निकालने के कारण रखते हुए कहा कि वे हमारी भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति के भी बड़े लेखक हैं, जिन्होंने चार विधाओं में प्रथम श्रेणी की रचनाएं लिखी हैं। उन्होंने कहा कि एक सच्‍चा लेखक असल में अपने समय और समाज से अभिन्न होता है और यह अभिन्नता उसे बेचैन बनाती है। असग़र वजाहत की बेचैनी हमारे भारतीय समाज की बेचैन आवाज़ ही तो है। अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर विवेक सचदेव ने असग़र वजाहत के लेखन के महत्त्व पर कहा कि उनका लेखन पढ़ना भारत को सही अर्थों में जानना है।

इससे पहले उदयपुर से आए प्रोफेसर प्रदीप त्रिखा, रोहतक से आए प्रोफेसर जयवीर हुड्डा, प्रोफेसर अनूप बेनिवाल, शिक्षा अधिष्ठाता प्रोफेसर संगीता चौहान, अरबिंदो कालेज के प्रो राजकुमार वर्मा सहित अतिथियों ने अंक का विधिवत लोकार्पण किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए असग़र वजाहत ने अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाए। अंगरेजी विभाग के डॉ समी अहमद खान ने असग़र वजाहत पर इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एक स्लाइड शो दिखाया। आयोजन में डॉ नरेश वत्स, डॉ राजीव रंजन, डॉ शुभांकु कोचर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी तथा अध्यापक उपस्थित थे।

फोटो एवं रिपोर्ट – रोहित कुमार

मन की आँखें : शशि‍ कांडपाल 

बच्चों के साथ शशि‍ कांडपाल।

जिंदगी अनुभवों से भरी रंगीन किताब ही तो है- कुछ खट्टे, कुछ मीठे, कुछ सबक की तरह और कुछ जीवन को नया मोड़ देने वाले अनुभव। उनमें से एक बच्चा है- बाताश! जैसे- हिंदी में पवन होता है न!

पति की नौकरी के तबादले कहीं टिकने ही नहीं देते थे और नए माहौल में ढलने के साथ-साथ आसपास के स्कूल में नौकरी भी ढूंढ़नी पड़ती, क्योंकि स्कूल जाये बिना मेरा मन नहीं लगता था- चाहे छुटपन में पढ़ने जाना हो, चाहे अब पढ़ाने। जहाँ जाती शिक्षिका की आवश्यकता मेरा इन्तजार कर रही होती।

पति‍ को नागालैंड, दीमापुर ट्रांसफर मिलते ही लगा, शायद अब मैं नहीं पढ़ा सकूंगी क्योंकि वह जगह हमारे लिए न सिर्फ नई थी, बल्कि कई भ्रांतियां भी सुनने को मिल रही थीं। असम बहुत बुरे दौर से गुजर रहा रहा था। बोडो आन्दोलन का असर दीमापुर में भी था। भारत के अन्य प्रांतों से आए लोगों को जिन्हें नागा लोग ‘प्लेन मानु’ कहते, उनके बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते और स्कूल में सिर्फ दक्षिण भारतीय इसाइयों को पढ़ाने के लिए चुना जाता है आदि आदि। स्टाफ़ ने हमारे लिए तीसरी मंजिल पर मकान भी ढूंढ़ रखा था, लेकिन रात-बिरात आते भूकम्पों से परेशान हो गए। ऐसे में एक पड़ोसन ने सुन्दर सा मकान दिखाकर सूचना दी कि यह डीएफओ साहब के बंगले का आउट हाउस है। वह सिर्फ एक टीचर को ही किराये पर देंगे। अगर आप नौकरी ढूंढ़ लें तो काम बन सकता है।

दो-चार स्कूलों के पते के साथ नौकरी ढूंढ़नी  शुरू की और एक मिशनरी स्कूल में हिंदी टीचर की  जगह खाली  मिल गई। मिशनरी स्कूल सुबह से दोपहर तक सामान्य बच्चों के लिए चलता और दोपहर बाद ग़रीब बच्चों को पढा़या जाता था। उन बच्‍चों को पढ़ाने लोग स्वेच्छा से आते थे। आवश्यक सामग्री भी मिशनरी और लोगों की चैरिटी से जुटाई जाती।  सिस्टर्स के ग्रुप्स न सिर्फ पढ़ाते, बल्कि गरीब, कमजोर तबकों से आये बच्चों का एक हॉस्टल भी चलाते, जिनमें उन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लि‍ए कई काम-धंधे भी सिखाये जाते। देखा-देखी मैं भी चल रहे प्रयासों में हाथ बंटाती या कहूं मुझे ऐसी सेवा देने में अजीब-सा सुकून मिलने लगा था।

हम छुट्टियों में अन्य संस्थाओं द्वारा किये जा रहे कामों को देखते, कहीं लूम पर बुनाई होती तो कहीं कपड़े सिले जाते और उससे हुए लाभ से संस्थाओं के बच्चों का भरण पोषण होता। उनमें कई बच्चे मंदबुद्धि, हाथ-पैरों से लाचार, लेकिन अपनी दिनचर्या कर सकने लायक होते। फिर भी सामान्य से कमजोर ही रह जाते, ज्यादा दिक्कत अंधे बच्चों के साथ होती। उनका दीमापुर में कोई अलग से विद्यालय न होने की वजह से ख़ास ट्रेनिंग नहीं दी जा पा रही थी और वे सिर्फ गिरिजाघरों में गाये जाने वाले कोरस सीखते या कोई वाद्ययंत्र सीखते।

मैं प्रभु के बनाये संसार के हर अणु की प्रशंसक हूं। माँ कहती- कभी किसी की कमजोरियों पर मत हँसों क्योंकि यह उस व्यक्‍ति‍ का नहीं, बल्कि उस महाप्रभु की कृति का अपमान होगा जिसने उसे बनाया।
कभी सोचती- अगर मेरी एक टांग न रही तो?
लंगडा के चलती…
कभी चीजें टटोलती, गिर-गिर पड़ती और घरवाले समझ जाते कि‍ आज मेरे नयन छुट्टी पर हैं।
कभी बहरी और कभी गूंगी…
मुझे गूंगा होना सबसे ज्यादा भाया और आज तक इस्तेमाल में लाती हूं- न जाने कितनी खरीददारी में होने वाली झक-झक, झगडे़ टालना, समय को उसका हिसाब करने देना जैसे बड़े प्रोजेक्ट, गूंगे रह कर पूरे किये। दीमापुर सब्जी मंडी में सब्जीवाले मुझे कई महीने तक गूंगा समझ कर इशारों से मोलभाव समझा देते और मैं शांति से काम चला लेती, क्योंकि भाषा आती नहीं थी और कहीं सुना था कि‍ नहीं बोलने से एनर्जी भी बचती है।

जाड़े के दिनों में स्कूल सबसे ज्यादा कार्यशालाएं आयोजित करता। बच्चों में स्फूर्ति भी रहती और बड़े-बड़े मैदानों का उपयोग होकर शारीरिक वर्जिश भी होती। एक दिन कोहिमा की एक संस्था जो अंधे और बहरे बच्चों के लिए काम करती थी, से आग्रह आया कि‍ वह एक पखवाडे़ के लिए इच्छुक टीचर्स को आमंत्रित करते हैं ताकि वे इस संस्था  में आकर अपनी सेवाएं दें-  क्राफ्ट, डांस, मार्शल आर्ट या सिलाई-कढ़ाई ताकि बच्चों को कुछ नया सिखाया जा सके। सच कहूं तो ये मौके टीचर्स को बहुत कुछ सिखा जाते हैं और कोहिमा घूमने का आकर्षण भी था।

मदर ने हम पांच लोगों को भेजने का निर्णय लिया और काम भी निर्धारित किए। किसी भी तरह के शारीरिक कमजोर बच्चों की संस्थाओं में सामान्य बच्चों से कुछ अलग कई काम होते हैं। इसलि‍ए क्राफ्ट या कुछ भी सिखाने के लिए भी अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं और ये हम सब के लिए एक चुनौती भी था। लेकिन बच्चों का मनोरंजन एक ऐसा काम था, जिसके लिए एक बचकाने व्यक्तित्व का होना जरूरी था, जो उन बच्चों में घुल मिल सके। नई-नई कहानियां बना सके और पूरे फील या आवाजों से उसे और मनोरंजक बना सके क्योंकि वहाँ उपलब्ध हर किताब की कहानियां, कवितायें बच्चे सुन-सुन कर ऊब चुके थे। जैसे ही कोई रटी रटाई कहानी या कवि‍ता शुरू करता वे शोर मचा देते…ये नहीं..ये नहीं…।

मुझे अपनी बेटी को बहलाने के लिए दिन में दो-चार कहानियां तो गढ़नी ही पड़ती थीं और इस काम से मानो मेरी कल्पनाशीलता को एक दिशा और उद्देश्य मिल गया था। चलते-फिरते बस कहानियां याद करने की कोशिश करती, कुछ अंग्रेजी में, कुछ हिंदी में, लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कहानियां समझने में भाषा कभी बाधा नहीं बनी। मैं  बड़ों की कहानियों को छुटका बनाती…उसमें बचकाने भाव भरती और अपनी आवाज में बदलाव और मुरकियों के साथ उन्हें सुनाती, तो वहां उपस्थित करीब पचास बच्चे सांस भी बिना आवाज के ले रहे होते कि‍ कहीं कुछ छूट न जाए…कोई मुझे देख नहीं पाता था तो मैं भी शर्म से परे आराम से उन्हें प्रसन्न होता देखती।

एक दिन कक्षा में घुसते ही एक किलकारी सी आवाज आई…
शशि दीदी!
मैंने सोचा- शायद कोई नार्मल बच्चा भी इनके बीच है, जो मुझे देखता और पहचानता है और बात आई गई हो गई।
मैंने कुछ खेल भी विकसित कर लिए थे। इसलि‍ए उन्हें खेलने के दौरान पाया कि‍ इनमें से किसी को कुछ भी दिखाई नहीं देता, तो आखिर मुझे पहचाना किसने? और कैसे ?
अगले दिन क्लास के दरवाजे पर पहुंचते ही फिर वही आवाज आई, लेकिन आज मैं चैतन्य थी। पाया कि‍ एक किशोर, दुबला और अति आकर्षक बच्चा ऊपर की तरफ देखते हुए मेरा नाम ले रहा है।
मैं उसके पास पहुंची और पूछा कि‍ उसने मुझे कैसे पहचाना?
‘आपकी खुशबू से।’ बच्‍चा मुस्‍कराया।
मैं निरुत्तर..हालाँकि ऐसा कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन हां, चन्दन की खुशबू लगाई थी।
दूसरे दिन फिर पहचान गया, जबकि आज चन्दन नहीं था।
कैसे पहचाना?
आपकी खुशबू से।
तीसरे दिन पावडर त्यागा, चौथे दिन क्रीम और पांचवें दिन सादे पानी से नहाई, लेकिन पहुंचते ही उसकी कुहुक ने मुझे फेल कर दिया।

वि‍ज्ञान के पास हजारों तर्क होंगे, विशेषज्ञ भी अपने मत रखेंगे, लेकिन मैंने अपने जीवन में पहली बार यह जाना कि दरवाजे पर कदम रखते ही मुझे पहचानने वाला यह बच्चा अति विशिष्ट है। मैदान में मैं उससे दूर घेरे में बैठती और वह पता नहीं कब आकर मेरी बगल में बैठ जाता और पल्लू को अपनी उंगलियों में लपेट रहा होता। उसने उन तमाम तरह के बच्चों की गंध के बीच मुझे कैसे पहचाना? मैं उठने की सिर्फ सोचती और वह पूछ बैठता- दीदी जा रही हो क्या?
मुझे उससे डर लगने लगा- और भी न जाने मेरे बारे में क्या-क्या जान जाता हो!

पंद्रह दिन बीतने तक यूं लगा कि‍ हम तो हमेशा से साथ हैं- दिन-रात, मेस में, ऑडिटोरियम में, बाग़ में हर समय साथ रहते। साथ ही यह और लगा कि‍ अब तो कार्यशाला  खत्‍म होने वाली है। इन मासूमों को छोड़ कर कैसे जायेंगे?

मैं बच्चों से खुलकर बात करना चाहती थी, लेकिन उससे पहले ही सिस्टर्स ने राय दी कि‍ तुम अचानक अपने घर चली गई हो और कुछ दिन बाद आओगी, कहकर बच्चों को बहला लेंगे। इन्हें जाने की सूचना मत देना, क्योंकि इनका जुड़ाव तुमसे बहुत ज्यादा हो गया है। रोना-धोना करेंगे और तुम्हे भी असुविधा होगी। इसलि‍ए मुझे चुप रहना पडा।
लेकिन वह लाठी टेकता स्टाफ रूम तक आ गया और बिना किसी की सहायता से सीधे मेरी जगह पर आकर बोला, ‘‘आप, कल से नहीं आएँगी ना?’’
मैंने सर पकड़ लिया क्योंकि अगर हंगामा हुआ तो सिस्टर्स मुझे दोष दे सकती थीं।
मुझे चुप पाकर बोला, ‘‘दीदी, आज आपकी आवाज में वह बात नहीं थी। आपने बहुत गलतियाँ भी कीं।’’ बात सच थी क्योंकि मैं अन्दर ही अन्दर उन बच्चों के लिए भावुक थी कि कल से इन्हें कौन कहानी सुनाएगा।

कुछ पल हम दोनों चुप रहे और बहुत साहसी होकर वह बोला, ‘‘अच्छा जब मैं बुलाऊं, तब आओगी क्या एक बार?’’ मैं बोल न सकी और उसका हाथ पकड़ कर थपथपा दिया।

छह महीने बाद मुझे संस्था की तरफ से एक समारोह में बुलाया गया। समारोह बोर्ड पर नजर पड़ी तो कुछ नवीन कहानियों को ब्रेल में परिवर्तित करने का सन्देश लिखा था।
और मेरे आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा, जब मैंने कहानी पढ़ने वाले की स्टाइल और कहानियां सुनीं। वे मेरी कहानियां थीं, जो किचेन में खाना बनाते, बर्तन धोते या अपनी बच्ची को बहलाते यूं ही बनाई थीं और उनको इस तरह से सराहे जाते देख कर निशब्द थी।
उस बच्चे ने उन कहानियों को ब्रेल में बदल कर अपने जैसे और बच्चों के लिए भी संरक्षित कर दिया।

इस बात को बीस साल से ज्यादा हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि‍ अब वह बच्चा कहाँ होगा, लेकिन जहाँ भी होगा कुछ आश्चर्यजनक ही कर रहा होगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

विवेक भटनागर

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

शि‍क्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध : महेश चंद्र पुनेठा

मुक्तिबोध

मुक्तिबोध

ज्ञान को लेकर बहुत भ्रम हैं। सामान्यतः सूचना, जानकारी या तथ्यों को ही ज्ञान मान लिया जाता है। इनको याद कर लेना ज्ञानी हो जाना माना जाता है। इस अवधारणा के अनुसार एक ज्ञान प्रदानकर्ता है तो दूसरा प्राप्‍तकर्ता, जिसे पाओले फ्रेरे ‘बैंकिंग प्रणाली’कहते हैं। इसमें शि‍क्षक जमाकर्ता और विद्यार्थी का मस्तिष्‍क बैंक की भूमिका में होता है। शि‍क्षक बच्चे के मस्तिष्‍क रूपी बैंक में सूचना-जानकारी या तथ्य रूपी धन को लगातार जमा करता जाता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि उसे लेने के लिए बच्चा तैयार है या नहीं। शि‍क्षक द्वारा कही बात ही अंतिम मानी जाती है। दरअसल, यह ज्ञान की बहुत पुरानी अवधारणा है। यह तब की है, जब शि‍क्षा की मौखिक परंपरा हुआ करती थी। सूचना, जानकारी या तथ्यों को रखने का रटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इनके हस्तांतरण का यही एकमात्र उपाय हुआ करता था। जो जितनी अधिक सूचना, जानकारी या तथ्यों को याद रख पाता था, वह उतना ही अधिक ज्ञानी माना जाता था। ज्ञान का यह सीमित और आधा अधूरा अर्थ है। वस्तुतः जो लिया या दिया जाता है, वह ज्ञान न होकर केवल सूचना या जानकारी है।

ज्ञान कभी दिया नहीं जा सकता है। ज्ञान का तो निर्माण या सृजन होता है। इसलिए आप दूसरों को सूचना या जानकारी तो दे सकते हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान के साथ बोध का गहरा संबंध है। ज्ञान निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है, जो अवलोकन, प्रयोग-परीक्षण, विश्‍लेषण से होती हुई निष्‍कर्ष तक पहुंचती है। ज्ञान द्वंद्व और संश्‍लेषण से उत्पन्न होता है। अनुभवों और तर्कों की उसमें विशेष भूमिका रहती है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य की सारी अवधारणाएं उसके अपने अनुभवों के आधार पर बनती हैं। शि‍क्षा में ज्ञान की यह अवधारणा ‘रचनात्मकतावाद’के नाम से जानी जाती है, जो अपेक्षाकृत नई मानी जाती है। भारतीय शि‍क्षा में इस अवधारणा की गूंज बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सुनाई देना प्रारम्भ होती है। लेकिन मुक्तिबोध ज्ञान को लेकर इस तरह की बातें पांचवें दशक में लिखे अपने निबंधों में कहने लगे थे। ज्ञान, बोध, सृजनशीलता, सीखने जैसी अवधारणाओं को लेकर उनके निबंधों में बहुत सारी बातें मिलती हैं। मुक्तिबोध ज्ञान और जानकारी के बीच के इस अंतर को स्पष्‍ट करते हैं। भले ही उनकी यह बात सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में आती है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में भी वह सटीक बैठती है। मुक्तिबोध ज्ञान के विकास के बारे में कहते हैं- ‘‘बुद्धि स्वयं अनुभूत विशि‍ष्‍टों का सामान्यीकरण करती हुई हमें जो ज्ञान प्रस्तुत करती है, उस ज्ञान में निबद्ध ‘स्व’से ऊपर उठने, अपने से तटस्थ रहने, जो है उसे अनुमान के आधार पर और भी विस्तृत करने की होती है।…ज्ञान व्यवस्था…जीवनानुभवों और तर्कसंगत निष्‍कर्षों और परिणामों के आधार पर होती है।…तर्कसंगत (और अनुभव सिद्ध) निष्‍कर्षों तथा परिणामों के आधार पर, हम अपनी ज्ञान-व्यवस्था तथा उस ज्ञान-व्यवस्था के आधार पर अपनी भाव-व्यवस्था विकसित करते।…बोध और ज्ञान द्वारा ही ये अनुभव परिमार्जित होते हैं यानी पूर्व-प्राप्त ज्ञान द्वारा मूल्यांकित और विश्‍लेषि‍त होकर, प्रांजल होकर, अंतःकरण में व्याख्यात होकर, व्यवस्था-बद्ध होते जाते हैं।’’  वह पुराने ज्ञान में नवीन ज्ञान को जोड़कर सिंद्धांत व्यवस्था का विकास करने की बात करते हैं। यहीं पर द्वंद्व और संश्‍लेषण की प्रक्रिया चलती है। उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध नहीं, वरन् उत्थानशील और ह्रासशील शक्तियों का बोध भी है।…ज्ञान भी एक तरह का अनुभव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। इसलिए वे ज्ञान को काल सापेक्ष और स्थिति सापेक्ष मानते हैं। उसे जीवन में उतारने की बात कहते हैं- ‘‘ज्ञान-रूपी दांत जिंदगी-रूपी नाशपाती में गड़ना चाहिए, जिससे कि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वादन कर सके।’’

आज सबसे बड़ी दिक्कत शि‍क्षा की यही है कि वह न संवेदना को ज्ञान में बदल पा रही है और न ज्ञान से संवेदना पैदा कर पा रही है। फलस्वरूप आज की शि‍क्षा एक सफल व्यक्ति तो तैयार कर ले रही है, लेकिन सार्थक व्यक्ति नहीं अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अपने समाज के प्रति जिम्मेदार और हाशि‍ए पर पड़े लोगों के प्रति संवेदनशील हो, जिसके लिए शि‍क्षित होना धनोपार्जन करने में सक्षम होना न होकर समाज की बेहतरी के लिए सोचना हो। ऐसे में यह महत्वपूर्ण बात है कि मुक्तिबोध ज्ञान को संवेदना के साथ जोड़कर देखते हैं। ‘चांद का मुंह टेड़ा है’कविता की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- ‘ज्वलंत अनुभव ऐसे/ऐसे कि विद्युत धाराएं झकझोर/ज्ञान को वेदन-रूप में लहराएं/ज्ञान की पीड़ा/रुधिर प्रवाहों की गतियों में परिणित होकर/अंतःकरण को व्याकुल कर दे।’इसलिए वह यह आवश्‍यकता महसूस करते हैं कि संवेदनात्मक उद्देश्‍य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्‍य के बाल्यकाल से ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करे, जो संवेदनात्मक उद्देश्‍यों की पूर्ति करे। संवेदनात्मक उद्देश्‍यों से उनका आशय स्व से ऊपर उठना, खुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना है। दूसरे के मर्म में प्रवेश कर पाना तभी संभव है, जब शि‍क्षा दिमाग के साथ-साथ दिल से भी जुड़ी हो, वह बच्चे की संवेदना का विस्तार करे। इसी कारण ज्ञानात्मक-संवेदना और संवेदनात्मक-ज्ञान की अवधारणा उनकी रचना-प्रक्रिया और आलोचना की आधार रही।

मुक्तिबोध अनुभव को, सीखने और रचना के लिए बहुत जरूरी मानते हैं। कोई भी रचना ‘अनुभव-रक्त ताल’में डूबकर ही ज्ञान में बदलती है। देखिए ‘भूरी-भूरी खाक धूल’कविता की ये पंक्तियां- नीला पौधा/यह आत्मज/रक्त-सिंचिता हृदय धरित्री का/आत्मा के कोमल आलबाल में/यह जवान हो रहा/कि अनुभव-रक्त ताल में डूबे उसके पदतल/जड़ें ज्ञान-संविधा की पीतीं।’वह अनुभव को पकाने की बात करते हैं । देखा जाए तो शि‍क्षा एक तरह से अनुभवों को पकाने का ही काम तो करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं ,‘‘वास्तविक जीवन जीते समय, संवेदनात्मक अनुभव करना और साथ ही ठीक उसी अनुभव के कल्पना चित्र प्रेक्षित करना- ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते। उसके लिए मुझे घर जाकर अपने में विलीन होना पड़ेगा।’’ वह सिद्धांत की नजर से दुनिया को देखने की अपेक्षा अनुभव की कसौटी पर सिद्धांत को कसने तथा विचारों को आचारों में परिणित करने के हिमायती रहे। यही है ज्ञान निर्माण या सृजन की प्रक्रिया। ‘ज्ञान अनुभव से ही शुरू होता है। ज्ञान के सिद्धांत का भौतिक रूप यही है।  जब व्यक्ति अनुभवों से सीखना छोड़ देता है, उसमें जड़वाद आ जाता है। कितनी महत्वपूर्ण बात कही है उन्होंने, आज तमाम शि‍क्षाविद् इसी बात को तो कह रहे हैं, ‘‘यह सही है कि प्रयोगों में गलती हो सकती है। भूलें हो सकती हैं। किंतु उसके बिना चारा नहीं है। यह भी सही है कि कुछ लोग अपने प्रयोगों से इतने मोहबद्ध होते हैं कि उसमें हुई भूलों से इंकार करके उन्हीं भूलों को जारी रखना चाहते हैं। वे अपनी भूलों से सीखना नहीं चाहते हैं। अतः वह जड़वादी हो जाते हैं।’’ पर इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मुक्तिबोध प्रयोग और अनुसंधान के नाम पर अब तक मानव जाति को प्राप्त ज्ञान का अर्थात सिद्धांतों से इंकार करते हों। उनका स्पष्‍ट मानना था, ‘‘इसका अर्थ यह कि बदली हुई परिस्थिति में परिवर्तित यथार्थ के नए रूपों का, उनके पूरे अंतःसंबंधों के साथ अनुशीलन किया जाए, उनको हृदयगंम किया जाए।’’  आज इसे ही सीखने का सही तरीका माना जा रहा है। वास्तविक अर्थों में सीखना इसी तरह होता है। यही सीखना स्थाई होता है। सीखने का मतलब कुछ जानकारियों को रट लेना नहीं है। सीखना तो व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। ऐसा परिवर्तन जो चेतना को अधिकाधिक यथार्थ संगत बना दे,  जिसके के लिए मुक्तिबोध अतिशय संवेदनशील, जिज्ञासु तथा आत्म-निरपेक्ष मन की आवश्‍यकता पर बल देते हैं। वह अनुभवों से सीखने की ही नहीं, बल्कि अनुभव-सत्य को जन तक पहुंचाने की बात भी कहते हैं- ‘तब हम भी अपने अनुभव/सारांशों को उन तक पहुंचाते हैं जिसमें/जिस पहुंचाने के द्वारा हम, सब साथी मिल/दंडक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सकें।’(‘भूरी-भूरी खाक धूल’)। देखा जाय तो यही शि‍क्षा का असली उद्देश्‍य भी है। यदि शि‍क्षित होने पर हम जनहित में कुछ कर नहीं पाए तो उसकी क्या सार्थकता है?

आज शि‍क्षण में पीयर लर्निंग पर बहुत बल दिया जा रहा है। एन.सी.एफ.2005 में कहा गया है कि सहभागितापूर्ण सीखना और अध्यापन, पढ़ाई, भावनाएं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्‍चि‍त और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए। सहभागिता एक सशक्त रणनीति है। यह माना गया है कि समूह में या अपने साथियों से सीखना अधिक अच्छी तरह से होता है। उक्त दस्तावेज इसके पीछे यह तर्क देता है कि जब बच्चे और शि‍क्षक अपने व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव बांटते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और उनमें परखे जाने का भय नहीं होता है, तो इससे उन्हें उन लोगों के बारे में भी जानने का अवसर मिलता जो उनके सामजिक यथार्थ का हिस्सा नहीं होते। इससे वे विभिन्नताओं से डरने के बजाय उन्हें समझ पाते हैं। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध अपने एक निबंध ‘समीक्षा की समस्याएं’ में लिखते हैं- ‘‘जहां तक वास्तविक ज्ञान का प्रश्‍न है- वह ज्ञान स्पर्धात्मक प्रयासों से नहीं, सहकार्यात्मक प्रयासों से प्राप्त और विकसित हो सकता है।’’  यह अच्छी बात है कि मुक्तिबोध प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को नकारते हैं। हो भी क्यों न! यह एक पूंजीवादी मूल्य है और मुक्तिबोध समाजवादी समाज के समर्थक रहे। प्रतिस्पर्धा से कभी भी एक समतामूलक या सहकारी समाज नहीं बन सकता है। सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकती है।

सीखने के लिए स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। दबाव या भय में कुछ भी सीखना संभव नहीं है। स्वतंत्रता बच्चे को चिंतन और उसे सृजन के लिए प्रेरित करती है। बच्चे में सृजनशीलता के विकास के लिए स्वतंत्रता का होना पहली शर्त है। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध भी कहते हैं- ‘‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, दर्शन के लिए, विज्ञान के लिए अत्यधिक आवश्‍यक और मूलभूत है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना गतिमान नहीं हो सकती।’’ मुक्तिबोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक हैं। उनका मानना है कि भले ही यह एक आदर्श है फिर भी मानव की गरिमा और मानवोचित जीवन प्रदान करने के लिए बहुत जरूरी है। यह जनता के जीवन और उसकी मानवोचित आकाक्षांओं से सीधे-सीधे जुड़ा़ है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। यह सच भी है। हम अपने चारों ओर अतीत से लेकर वर्तमान तक दृष्‍टि‍पात करें तो पाते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े सृजन हुए हैं, वे सभी किसी न किसी स्वातंत्र-व्यक्तित्व की देन हैं। इन व्यक्तित्वों को यदि सृजन की आजादी नहीं मिली होती तो इतनी बड़ी उपलब्धि उनके खातों में नहीं होती। हर सृजन के मूल में स्वतंत्रता ही है। मुक्तिबोध इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं।

इस प्रकार ज्ञान की बदली अवधारणा और बाल मनोविज्ञान की दृष्‍टि‍ से विश्‍लेषण करें तो हम पाते हैं कि मुक्तिबोध का चिंतन बहुत तर्कसंगत और प्रगतिशील है। इसमें शि‍क्षा और मनोविज्ञान को लेकर उनकी गहरी समझ परिलक्षित होती है। एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच से लैस समाज बनाने की दिशा में उनका यह चिंतन बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आज जब ज्ञान को एक खास तरह के खांचे में फिट करने और तैयार माल की तरह हस्तांतरित करने की कोशि‍श हो रही है, तो मुक्तिबोध के ये विचार अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।

अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

मेरा जैसा मैं : गौरव सक्सेना

वैसे तो दुनि‍या का हर बच्चा बहुत खास है, लेकि‍न जि‍न बच्चों के  साथ मैं काम करता हूं, शायद वे इन सबमें भी सबसे कोमल-नि‍र्दोष-प्यारे हैं। हां, वि‍शेष अध्यापक होना सचमुच बहुत वि‍शेष है, कम से कम मेरे लि‍ए तो। ये बच्चे जि‍नके पास सीमि‍त शब्द हैं, कि‍तना कुछ बोलते हैं, जब वे मुस्कराते हैं, अचानक गले लग जाते हैं, रो देते हैं या जी खोल के हंसते हैं।

स्वलीनता (ऑटिज्म)  से ग्रसि‍त बच्चे ज्‍यादातर अपने परि‍वेश से सचेत संबंध स्‍थापि‍त नहीं कर पाते। अपनी बनाई दुनि‍या में वे जीते हैं और उस दुनि‍या में होने वाली गति‍वि‍धि‍यों में यदि‍ बदलाव हो या उनके क्रम को बदला जाए तो यह उनके लि‍ए एक भयावह समस्‍या हो जाती है।

मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि‍ स्‍वलीनता का संबंध बच्‍चे की बौद्धि‍क शक्‍ति‍ के साथ या उसके रचनात्‍मक कौशल से नहीं होता। ये बच्‍चे बडे़ ही हुनरमंद गायक, चि‍त्रकार, खि‍लाड़ी हो सकते है, यदि‍ इनकी संभावनाओं को सही तरह से आंका जाए।

बच्‍चों का व्‍यवहार कई अर्थों में अन्‍य बच्‍चों से अलग होता है। सबसे पहली समस्‍या होती है संवाद की- सब कुछ महसूस करने के बाद भी बच्‍चे खुद को ठीक से प्रस्‍तुत नहीं कर पाते। जो चीजें इनको अलग बनाती हैं वे हैं, समाज के नि‍यमों, परम्‍पराओं, संबंधों की जानकारी ने होना। इसके चलते कई बार ऐसा व्‍यवहार देखने को भी मि‍लता है, जो सामाजि‍क रूप से स्‍वीकार्य नहीं।

इन तमाम सारी सीमाओं के बावजूद ये बच्‍चे अपरि‍मि‍त कौशल के धनी होते हैं। आवश्‍यक नहीं है कि‍ प्रत्‍येक कौशल में ये अपनी उम्र के बच्‍चों जैसा प्रदर्शन करें, लेकि‍न जि‍स कौशल में रुझान होगा शायद उसमें बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता।

जो एक बड़ी समस्‍या जिसका सामना ये बच्‍चे करते हैं, वह है- हमारे अंदर धैर्य और जानकारी का अभाव। यदि‍ बच्‍चों की आवश्‍यकताओं और वि‍शेषताओं को समझ, उसके आसपास की चीजों को परि‍वर्तित कर दि‍या जाए, तो ये बच्‍चे समाज के लि‍ए उतने की उपयोगी होंगे, जि‍तने अन्‍य बच्‍चे। इन बच्‍चों पर मैंने एक कवि‍ता लि‍खी है, जो आपके साथ साझा कर रहा हूं–

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जैसा मैंने देखा तुमको कभी कभी
कुछ उल्झा-सुलझा
कभी कभी कुछ कहते सुनते
कभी कभी चुप रहते सहते
कभी कभी कुछ सपने बुनते

जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी पानी सा बहते
कभी कभी कुछ जड़ भी होते
कभी कभी मुस्काते हँसते
कभी कभी दुनिया से डरते
जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी तुम कह न पाये
कभी कभी तुम सुन न पाये
कभी कभी क्या, ज़्यादातर ही
हम सब धीरज धर न पाये

कभी कभी तुम खुद बोले हो
कभी कभी ख़ामोशी बोली

जैसा मैंने तुमको देखा
कभी कभी रिश्ते जीते हो
कभी कभी खुद में जीते हो
कभी कभी जो आ जाती है
चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे
कभी कभी जब बाँहों में भर
दिल आंखें सब भर देते हो

जैसा मैंने तुमको देखा

कभी कभी तुम काग़ज़ के कुछ

पंख लगा के उड़ जाते हो

कभी कभी तुम रंग सा घुल कर

सबके मन में बस जाते हो
कभी कभी जब दिल की बातें
टुकड़ों टुकड़ों बतलाते हो
कभी कभी तुम मीठी सरगम बनकर
उर में छिप जाते हो
जैसा मैंने तुमको देखा