Archive for: March 2017

संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

sanjeev-thakur

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

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डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

चित्रकार जे.पी. सिंघलः कुछ यादें : ओमा शर्मा

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प्रसि‍द्ध चित्रकार और छायाकर जे.पी. सिंघल पर ओमा शर्मा का संस्मरण-

कुछ यादें आपके जेहन में हमेशा के लिए तारी हो जाती हैं और बारहा अनजाने ही। जे.पी. सिंघल साहब के साथ पहली मुलाकात की मुझे खूब याद है, जो वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा के घर एक दोपहर को हुई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो लेखक-कलाकार मित्र प्रभु जोशी अपने सुपरिचित अंदाज में वहां उपस्थित मेहमानों को कला और साहित्य की अपनी समझ के किसी पहलू पर संबोधित कर रहे थे। वहां घुसने के बाद मैं चुपचाप एक सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे वहां उपस्थित मेहमानों से मिलवाया। पहली मुलाकात के समय जैसा होता है सभी ने एक नागरीय मुस्कुराहट के साथ परिचय की अदला-बदली की, सिवाय सिंघल साहब को छोड़कर जो पहली मुलाकात पर ही ऐसे गले मिले जैसे कि मैं उनका कोई भूला-बिछड़ा दोस्त रहा हूँ। मैं तब तक उनको नहीं जानता था। उसी दौरान उन्होंने हाजी अली स्थित घर पर आने का निमंत्रण भी दे डाला जो उन दिनों मेरे घर से चंद मिनटों की ही दूरी पर था।

अगले रोज जब मैं उनके घर पहुंचा तो मुझे बड़े विरल कलात्मक अनुभव का एहसास हुआ। लिफ्ट के पास ही उनकी कई पेंटिंग लगी थीं। प्रवेश द्वार के पास उनके खास कलात्मक हस्ताक्षर की लिपि पीतल में जड़ी थी हालांकि मैं तब तक उससे वाकिफ नहीं था। उसके ठीक ऊपर कोई पुराना भित्तीचित्र था। थोड़ी देर इंतजार के बाद किसी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुला लिया। उस चौकोर कमरे में मेरा बाद में भी कई मर्तबा जाना हुआ लेकिन उसमें ऐसी अद्भुत चित्रकारियां, शिल्पकृतियाँ, म्यूरल और तरह-तरह की इतनी सारी आकृतियां सजी रखी थीं कि मैं वहां बैठकर सिर्फ हैरान और सुकून महसूस कर सकता था क्योंकि वैसा कमरा न मैंने पहले कभी देखा था न बाद में। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उस कमरे में सिर्फ अंतिम आकार लेती हुई चित्रकारियां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी अधबनी भी थीं जो किसी मधुबनी से कम नहीं थीं। थोड़ी देर बाद वे अपने उसी खास अंदाज यानी गोल गर्दनवाले कुर्ते और पायजामे में मुस्कुराते हुए आये और फिर से लिपटकर गले मिले। मैंने उनका एक मेजबान का अपनापन महसूस किया। मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि वो इतने बड़े-बुजुर्ग कलाकार थे और ऐसे खुलकर स्नेह बरसा रहे थे जिसकी कोई वाजिब वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। हां, मुझे एक सच्चे कलाकार की इंसानियत का एहसास जरूर हो रहा था। उसके बाद भी कई मर्तबा मिलना हुआ इसलिए उस पहली मुलाकात की बहुत सारी चीजें मैं भूल गया हूँ। बस मुझे याद है तो ये कि वो डेढ़ घण्टे का वक्फा मानो पलक झपकते ही निकल गया था। उस समय वे 76 साल के जवान थे। जिंदगी और आवेग से भरे हुए और दुनियादारी से तो एकदम ही बेपरवाह। और तो और उनमें कोई कलाकार होने तक का भरम नहीं था। उस समय वे सिर्फ शरीफ इंसान थे जो अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जी रहा हो। अलबत्ता ये आजादी पाने के लिए उन्होंने आधी सदी से ऊपर मशक्कत की थी। उनके दिमाग में उस समय अगर कुछ था तो बस यही कि अपने मेहमान को कैसे तवज्जो दी जाए। वे बातें करते और जैसे बेलगाम अतीत रास्तों में घुमक्कड़ी करने लगते। थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मैंने तयशुदा वक्त से कहीं ज्यादा उनका वक्त ले लिया है। जब मैं चलने लगा तो वो मेरे साथ लिफ्ट तक आ गये। लेकिन जब लिफ्ट आई, उसके बाद भी मेरे साथ उतर आये। मेरे लाख माना करने पर भी जब तक मैं अपने कार में नहीं बैठ गया उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा (और यह क्रम हर बार दोहराया गया)। जब मैं घर लौटा तो उनसे हुई मुलाकात मुझे रह रहकर याद आने लगी। मुम्बई में कौन किसी से इस तरह मिलता है? इतने खुले मन से कौन गले लगता है? कौन इतने गरमजोशी के साथ बातें करता है? कौन ऐसे ही मिलने-मिलाने के लिए आमंत्रित करता है।

थोड़े दिन बाद उनका मेरे पास फोन आया कि भाई अरसा हो गया मिला जाए। मुझे पिछली मुलाकात अभी तक गुदगुदा रही थी। मैंने अपनी पत्नी को भी उनके घर जाने को राजी कर लिया ताकि वो भी महसूस कर सके कि एक सच्चे कलाकार से मिलना कितना ऊर्जा भरा होता है। सिंघल साहब और उनकी पत्नी श्रीमती माया सिंघल हमेशा बेहतरीन मेजबान थे। हम हमेशा उसी कमरे में बैठते जहां मैं पहली बार बैठा था। मैं किसी भित्तीचित्र के बारे में उनसे पूछता तो वह उसे हासिल करने तक की दास्तान छेड़ देते जिनकी तादात अच्छी खासी थी। पता नहीं उन्होंने ये बात छेड़ी या मैंने जिक्र किया, थोड़ी देर बाद हम उनके पेंटिंग रूम में चले गये जहां उनकी कई पेंटिंग्स अधबनी रखी थीं। एक तो ईजल पर ही रखी थी। एक बार तो मुझे लगा कि वह ईजल पर क्यों रखी है क्योंकि वह तो सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन उन्होंने थोड़ा सहमते करते हुए बताया कि अभी… इसका निचला हिस्सा थोड़ा खुरदुरा है…चेहरे के हाव-भाव में भी… ऊपर का आसमान बाकी चित्र से मेल नहीं खा रहा है। मुझे वाकई लगा कि मेरे देखने का नजरिया अभी कितना संकुचित है हालांकि मैं पॉल वालरी के इस कथन से वाकिफ था कि कोई भी कलाकृति कभी पूरी नहीं होती है; एक अवस्था के बाद वह दुनिया में समर्पित करनी होती है। शायद इसी को प्रभु जोशी ‘नष्ट होने का कगार’ कहते हैं। उसके बाद उन्होंने मुझे एक और पेंटिंग दिखाई जो एक स्त्री की थी। फकत काले रंग का इस्तेमाल। सांझ ढले के वक्त वह स्त्री किसी पहाड़ी पर आँखें मुंदे कुदरत और अपने आप से मगन थी। एक पारदर्शी हिजाब उसके ऊपर जरूर था लेकिन उसके रोम-रोम से मादकता रिस रही थी। अपनी कोहनी मोड़े वह औरत कमर के बल लेटी अपने ही खयालों में ऐसे खोयी थी जैसे- उसे अपनी दुनिया की या किसी और की कुछ पड़ी ही नहीं हो। या एक अबूझ आनन्द में डूबी हो। उस कमसिन की नाभी पूरी चित्रकारी को एक अतीव मादकता में घोले दे रही थी। इस तरह की चित्रकारी को देखना करिश्माई अनुभव था। यह एक बड़े आकार की पेंटिंग थी जिसमें सिर्फ एक ही रंग यानी काला और और उसमें अलग-अलग शेड्स इस्तेमाल किये गये थे। देखने में बहुत सहज लेकिन उतनी ही आकर्षक लग रही थी। मैं सोचने लगा फकत एक रंग और वह भी काले के सहारे कोई किसी के हावभावों को इतनी बारीकी से कैसे चित्रित कर सकता है? लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या? वह पेंटिंग तो मेरे सामने थी। तब तक मुझे पेंटिंग की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी (अभी भी नहीं है) लेकिन उस पेंटिंग का असर सम्मोहित करने वाला था।

लेकिन ये तो उस शाम इस तरह के अनुभव से गुजरने की शुरुआत भर थी। मैंने कला दीर्घायें देखीं हैं लेकिन इस तरह का कला अनुभव, और वह भी किसी के घर के छोटे से कमरे के भीतर, कहीं नहीं हुआ था। उसके बाद उन्होंने वहीं पर आधा दर्जन रखी पेंटिंगों में से एक उठाई और मुझे दिखाने लगे। अपनी पेंटिंग को दिखाने का उनका लहजा और जज्बा क्या खूब था। मैं पेंटिंग को उठाने में उनकी मदद करता तो वे मुझे रोक देते और इसरार करते कि मैं कहां किस कोण पर खड़ा होकर उस पेंटिंग को देखूं ताकि उनके सृजन को महसूस कर सकूं। मुझे एक पेंटिंग की अभी भी याद है। वह एक आदिवासी महिला की थी जो अपने अधनंगे बच्चे को गोदी में उठाये आसमान की तरफ देख मुस्कुराए जा रही थी। चित्रकार की बारीक निगाह से कुछ छूटा हुआ लग ही नहीं रहा था… उनके फटैले कपड़े, अलग-अलग रंगों के मोती, तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंगन, आँखों की चमक… बाजू में एक पेड़ भी था जिसके पत्तों के बीच से उतरी हुई धूप अलग-अलग आकारों में पसरी थी। वह महिला अपने बच्चे के साथ जहां खड़ी थी, उसका आस-पास भी चित्रकार ने पूरी बारीकी से दर्ज कर रखा था। प्रकृति की बारीकियों को इस तरह ‘चित्रित’ करना मेरे लिए बड़ा हैरत भरा था और वह आज भी है। कितनी देर तक काम किया गया होगा ताकि कुछ अखरे भी न और छूटे भी न… आखिर यही तो यथार्थवादी चित्रकारी की कसौटी होती है। बाद में मेरे मित्र भाई प्रभु जोशी ने बतलाया कि सिंघल साहब के यहां सूखे ब्रश का जिस अद्भुत और उस्ताद-परक ढंग से इस्तेमाल होता है, उसकी कहीं कोई मिशाल नहीं है। उनमें कहीं भी कोई ‘स्ट्रोक’ जैसी चीज गोचर नहीं हो सकती। इसलिए वे मानते हैं कि उनकी यथार्थवादी चित्रकारी समूचे बंगाल स्कूल की यथार्थवादी चित्रकारी पर भारी पड़ती है। उनको याद करते हुए जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो उस शाम देखी और दिखाई गयी दूसरी चित्रकारियां भी जेहन में आ रही हैं। लेकिन जो खास चीज याद आ रही है वह है सिंघल साहब का अपनी कला में यकीन। वो अपने रचे को ऐसी मार्मिक विनम्रता से दिखाते थे कि पता लगता कि उनके भीतर बैठा कलाकार कितना सच्चा और ईमानदार है। मेरे लिए तो यह जैसे कुबेर का खजाना था।
* *

धीरे-धीरे हम लोगों की खूब छनने लगी। किसी बड़े बुजुर्ग कलाकार जिसने पूरी जिन्दगी ही कला के सृजन में बिताई हो, उससे उसकी या दूसरों की कला या फिर जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर बात करना बड़ा आस्वाद भरा था। सिंघल साहब क्योंकि उम्र और अऩुभव के किसी अऩ्तर को नहीं मानते थे इसलिए हम बड़े याराने ढंग से गुफ्तगू करते। उसी दौरान मुझे पता लगा कि वे अपने श्वेत-श्याम वाले छाया-चित्रों को एक जगह इकट्ठा कर कॉफी टेबल बुक तैयार करना चाह रहे थे। पिछले चालीस साल के परिदृश्य में एक भी तो अभिनेत्री ऐसी नहीं…सायरा बानो से लेकर रेखा-हेमा-जीनत और श्रीदेवी से लेकर माधुरी-ऐश्वर्य और कैटरीना तक… जो अपने कमसिन दौर में उनके कैमरे की गिरफ्त में न आयी हो। इनमें ज़्यादातर छाया चित्र उनके मशहूर होने से ठीक पहले के दिनों के रहे होंगे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी के पीछे बैठी एक तस्वीर दिखायी और पहचानने का इसरार किया। तस्वीर में मुझे बहुत कुछ पहचाना सा लग रहा था लेकिन मैं सुनिश्चित नहीं हो रहा था कि वह कौन हो सकती है। बारह-तेरह साल की उम्र में सभी उसी मासूमियत और भोलेपन से भरे होते है। मेरे असमंजस को ताड़ते हुए उन्होंने बताया कि ये नीतू सिंह है जो यकीनन कमसिन होते हुए संभावनाओं से भरी-भरी लग रही थी। कनखियों से देखती हुई उसकी अदा किसी को भी अपनी तरफ लुभा सकती थी। मैंने और दूसरे चित्र भी पलटे, हर चित्र अपने उस श्वेत-श्याम रूप में उस अभिनेत्री के बाहरी ही नहीं भीतरी सौंदर्य तक को छलका दे रहा था। एक चित्र को देखकर मैं रुक गया। उसमें वह युवती पत्तों से भरी जमीन पर दोनों हाथों को सिर की तरफ फैलाए ऐसे लेटी थी जैसे कुदरत ने इसे अभी-अभी किसी सुकून से नवाजा हो… शान्त, तृप्त और अपने में मगन। सिंघल साहब की यह भी एक खूबी थी कि वे सिर्फ प्राकृतिक रौशनी ही इस्तेमाल करते थे, कैमरे का फ्लैश नहीं। उस छायाचित्र को देखकर मैंने वाजिब सवाल किया कि उस चित्र के ऐंगल को देखकर उन्होंने कैमरे को कैसे सेट किया होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने कैमरे को लेकर पेड़ की टहनी के ऊपर बमुश्किल संतुलन बनाते हुए लेटना पड़ा था।
“लेकिन आप पेड़ पर चढ़े कैसे?”
उस दृश्य की कल्पना से मेरे भीतर जिज्ञासा हुई।
“अरे उस हिरोइन ने ही मुझे सहारा देकर ऊपर चढ़ाया था।”
उन्होंने चुश्की ली।

बातों के बीच में ये मजाहिया तेवर उनकी आदत थी। लेकिन जब बात उनकी कला या किसी की भी कला की बात हो तो वो एकदम गैर-समझौतावादी हो जाते। प्रभु जोशी के जल रंगों के वो ऐसे मुरीद थे कि कोई भी उनकी बातों से लहालोट हो जाए। उनके जलरंगों की इतनी तारीफ करते, उनकी बारीकियों को ऐसे मार्मिक ढंग से बताते कि कैसे धूसर रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनवस के एक-एक गोशे को किस अनुपात में पिरोया गया है कि प्रभु जोशी जैसा जलरंगी चित्रकार कोई दूसरा नहीं हो सकता। और यह सब कहते हुए किसी को ये लग ही नहीं सकता था कि वे खुद एक चित्रकार हैं। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रभु जोशी के गणेश श्रृंखला के चित्रों को देखा (जो बेशक मुम्बई के बाजार के लिए तैयार किये गये थे) तो वे उन्हीं प्रभु जोशी को लगभग लताड़ने में रत्ती भर नहीं हिचके!
“क्यों? तुम ये सब क्यों करते हो, क्या जरूरत है? इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा…. और तो और वो पैसे भी नहीं जिसके लिए तुमने इन्हें बनाया है…”
मेरे सामने ही वे प्रभु जोशी पर दहाड़ने लगे।

इसी तरह एक बार जब वे मेरे घर आये और हुसेन साहब की बनी पेंटिंग को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले “… ये हुसेन साहब का बहुत चालू वाला काम है… हुसेन साहब ने इसे ज्यादा से ज्यादा एक घण्टे में बना दिया होगा… ये उनकी आदत थी, दोस्तों को खुश रखने की।”
मुझे उनकी बात और बारीकी पसन्द आयी।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

उन्हीं दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से मेरा कहानी संग्रह आने वाला था। मेरे मन में ऐसे ही बात उठी कि क्या किताब के कवर पर उनकी किसी पेंटिंग का इस्तेमाल हो सकता है? या वे कोई मेरी फोटो खींच सकते हैं? मैंने उनसे इस बात का जिक्र भर क्या कर दिया कि उनका दिल तो मदद के लिए उमड़ पड़ा। वे मुझे अपने दूसरे कमरे में ले गये जहां उनकी न जाने कितनी अमूर्त चित्रकारियां बनी रखी थी। एक यथार्थवादी चित्रकार की कूची ने जो अमूर्तन का संसार रचा हुआ था वह कम स्तब्धकारी न था। एक तरह से यथार्थवादी और अमूर्तन, पेंटिंग की दुनिया के दो छोर हैं। कला में अमूर्तन की जरूरत और महत्तव एक दिलचस्प विषय रहा है। अमूर्तन उत्तरोत्तर विकास का पैमाना माना जाता रहा है हालांकि बाज़ हल्कों में जो कलाकृति समझ में न आये या कुछ भी समझाती सी न लगे उसे सहजता से अमूर्त कह दिया जाता है। खैर, मैंने उनके भण्डारगृह से एक का चयन किया जो अंततः बहुत खुबसूरत ढंग से मेरे कहानी संग्रह “कारोबार” का कवर बनी। भारतीय ज्ञानपीठ में कार्यरत मेरे एक मित्र ने बताया कि उसको देखकर तत्कालीन संपादक गदगद हो गये थे क्योंकि इस तरह की चित्रकारी उनकी नजर में इसके पहले कभी नहीं आयी थी और न शायद इसके बाद। जहां तक फोटो लेने की बात थी वह भी उन्होंने उसी वक्त कह दिया कि शनिवार को खींचेंगे। अभी तक मेरी किताबों में गये मेरे चित्र किसी नुक्कड़ के फोटो स्टूडियो में पासपोर्ट साइज के बनवाये हुए थे। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मेरे भीतर किसी नामी या अच्छे फोटोग्राफर द्वारा चित्र खिंचवाने की इच्छा न थी क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे से वाकिफ ही नहीं था। कोई फोटो खींचने में कितनी देर लगती है? लेकिन पहली बार पता चला कि फोटो खींचने का भी एक ‘सत्र’ होता है। और वो उस पूरे ‘सत्र ‘की तैयारी से ही उस शनिवार मेरे घर आये थे…हैट और सस्पेंडर चढ़ाए…तरह-तरह के लेंसों का जत्था उठाए। कभी वे मुझे खिड़की के पास खड़ा कर देते, कभी सोफे पर बिठाते, कभी खुद सोफे पर चढ़ जाते और कभी नीचे बैठकर, यहां तक की लेटकर अपने कैमरे का ऐंगल सेट करते। कई बार ये भी हुआ कि वे उस मुद्रा में यूँ ही पड़े रहे क्योंकि उनके मुताबिक मैं ‘रिलैक्स’ नहीं था।
“मैंने तुम्हारी कहानियां नहीं पढ़ी हैं, मगर पढ़ लूंगा… लेकिन तुम्हारे चेहरे में एक दार्शनिकपना(इदन्नमं) है … मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ… इसलिए… कुछ जान-बूझकर सोचने या पोज बनाने की जरूरत नहीं है… जैसे हो वैसे ही रहो… क्योंकि मैं जानता हूँ तुम क्या हो।” वे कैमरा छोड़ बड़े मनुहार और संयम से मुझे समझाने लगते। कौन फोटोग्राफर, जिसके पास हिन्दी सिनेमा की एक से एक अभिनेत्री अपना फोलियो बनवाने को ललायित रहती रही हों, इस तरह कर सकता था? लेकिन सिंघल साहब तो सिंघल साहब थे। उन्हें कुछ करना होता था तो पूरे सलीके और स्नेह से करते थे। सृजन का अभिप्राय ही उनके लिये पूरे जी जान से अपने को समर्पित कर देना था। मैंने यह भी देखा कि उन्होंने जान लिया था की किस तरह तकनीकी के सहारे से( मैकेनटॉश कंप्यूटर) अपने सृजन में चार चांद लगाये जा सकते हैं। मेरी किताब को आये अब कई वर्ष हो चुके हैं। उसका दूसरा संस्करण भी आ गया जिसमें वही पेंटिंग और उनका खींचा गया मेरा चित्र है। इतना ही नहीं उस चित्र को मैंने उसके बाद आई दूसरी किताबों में भी इस्तेमाल किया। मुझे ही नहीं मेरे करीबी कई मित्रों को लगता है कि कोई दूसरा चित्र मुझे इससे बेहतर नहीं दिखा सकता है।
जो भी हो इस बहाने सिंघल साहब के साथ मेरी संगत बनी रहती है।

लेकिन उनके साथ बातें करना, उनके बताये अनुभव का गवाह बनना, उनके खयालात से वाकिफ होना या कभी-कभी उनकी तुनक मिजाजियों से गुजरना बहुत रोमांचक था। वे अपने यकीनों में पूरे जोश-खरोश से जीते थे जैसा बहुत सारे कलाकारों की फितरत होती है। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो वो कुछ फोटोग्राफ्स का पुलिंदा लिये बैठे थे। बड़े अजीबो-गरीब ढंग के फोटोग्राफ्स थे। बम्बई और उसकी तमाम भीतरी-बाहरी पहचान को दर्ज करते हुए। कई वर्षों का काम रहा होगा। और फोटोग्राफ्स क्या थे? बम्बई की दीवारों पर लिखी गयी इबारतें और पोस्टर्स… कोई चारकोल से लिखा हुआ… कोई आधा मिटा हुआ… कोई एक दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ… कोई भीड़-भड़क्के के बीच दबा हुआ तो कोई सुनसान में पड़ा हुआ। क्या ऐसे वाहियात संदेशों–जिन्हें उस शहर को पढ़ने की फुर्सत नहीं– से कोई कला बरामद की जा सकती है? या कहें, कि क्या इस तरह की मामूलियत कला में ढाली जा सकती है? मैं सोचने लगा। लेकिन सिंघल साहब एक सोचते-विचारते कलाकार थे। जीवन के आंवे से अपना माल-पानी उठाते थे। उनके भीतर हरदम कुछ न कुछ चलता रहता था। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में बंबई आकर अपनी कैलेंडर आर्ट के सहारे उन्होंने आर्थिक रूप से अपने को ठीक-ठाक सुरक्षित कर लिया था जिसे बाद में उनके फिल्मों से जुड़ने के कारण और पुख्तगी मिल गयी थी। वे मुख्य धारा की लगभग सौ फिल्मों से उनके पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया का जिक्र करते वक्त उनका जायका कुछ कसैला सा हो जाता “… बड़ी कारोबारी दुनिया है भाई…एक से एक कमजर्फ वहां बैठा होता है…फिल्मों की दुनिया कलाकार की दुनिया नहीं हो सकती है… लेकिन मेरे को क्या मेरा तो इसने भला ही किया।” वे जैसे सब कुछ भूलते-भालते एक फलसफे के सहारे बाहर निकल चुस्की लेने लग जाते। लेकिन उनको अपने संघर्ष के दिन याद रहते थे। यानी लड़कपन में मेरठ के दिन और बम्बई में आने के शुरुआती दिन भी। आडवानी एण्ड ऑरलीकॉन में काम करते हुए उन्होंने अच्छा-खासा मकाम बना लिया था, लेकिन वे खुलेआम स्वीकारते कि वे अभी भी कई तरह की असुरक्षाओं के शिकार हैं। हर कलाकार को अपने को चलायमान रखने के लिए अपने तईं कुछ न कुछ करना पड़ता है, चाहे वह कोई मुगालता हो या कोई टोटका। अगर कोई लेखक बीस-तीस साल से लगातार लिख रहा है तो उसे कुछ नहीं तो उस नैरंतर्य के लिए ही सराहा जाना चाहिए। सिंघल साहब तो फोटोग्राफी और चित्रकारी की दुनिया से पचास साल से ऊपर से जुड़े हुए थे और फिर भी वे ‘प्रवाह’ में थे। उन्होंने अभी अपने हथियार नहीं फेंके थे… जैसे कलाकार होना उनका स्वभाव हो। जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई उनकी कला प्रदर्शनी का मैं गवाह था। वह सचमुच एक विराट उपलब्धि थी। जहांगीर के नीचे के तीनों हॉल ही नहीं, पहली मंजिल पर बने दोनों कमरों को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। मुम्बई का कला-जगत जैसे सकते में आ गया था। एक तरफ उनकी आदिवासियों की श्रृंखला थी तो दूसरी तरफ उनकी अजंता-एलोरा की। एक तरफ उनकी अमूर्त चित्रकारियां थी तो दूसरी तरफ कैलेंडरों के लिए बनायी गई चित्रकारियां। एक कमरे में तो उनके पिछले चालीस सालों की मुम्बई की तमाम खूबसूरत अभिनेत्रियों के ही श्वेत-श्याम छायाचित्र थे। उन दिनों बात करते हुए वे एक अजीब मस्ती के आलम में झूमते दिखते! कभी वे अपनी पेंटिंगों के बारे में ही बताते तो कभी उनके सृजन के रहस्य के बारे में और कभी अपनी खुद की ग्रन्थियों के बारे में। वे उम्र और कला के ऐसे मकाम पर थे जहां सराहना और आलोचना बेमानी हो जाते हैं। उन्हें कहीं दिली तसल्ली थी कि अपनी आदिवासी श्रृंखला में वे एक ठेठ भारतीयता को दर्ज कर पाये हैं और अपनी अजन्ता एलोरा श्रृंखला में उन्होंने उन तमाम बेनाम कलाकारों को श्रद्धांजली दी है जिन्होंने सदियों पहले ऐसा करिश्माई काम कर छोड़ा था। प्रदर्शनी का विमोचन अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया जो मुझे बड़ा वाहियात लगा क्योंकि सारा मामला कम से कम कुछ समय के लिए कला की दुनिया से बेमेल हो चला था। लोगों के बीच अपनी बात रखते हुए उन्होंने कतर में बैठे मकबूल फिदा हुसेन से भी मोबाइल के जरिये आशीर्वचन लिये। मुझे वह गैरजरूरी लगा। मगर सिंघल साहब शायद हर सूरत उस प्रदर्शनी की सफलता देखना चाह रहे थे। जो भी हो प्रदर्शनी हर लिहाज से कामयाब थी। उन्हें भीतर कहीं ये भी सुकून था कि मुम्बई की कला की दुनिया में आखिर उन्होंने अपना झण्डा गाड़ दिया।
तो क्या वाकई उनका सपना पूरा हो गया?
क्या वाकई अब कुछ करने को नहीं बचा?
* *

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि अपने आखिरी दिनों में वे मुझसे कुछ कहना और बांटना चाहते थे… उनकी देखी-भाली कुछ कहानियां या वे अनुभव जिनसे वे गुजरे… जो उनके भीतर एक तड़प मचाये हुए थीं कि वे बाहर आयें। लेकिन सिंघल साहब के हाथ में कूची थी, कलम नहीं। एक बार मुझे देखकर लढ़ीयाते से बोले “… हम दोनों की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसी होगी… एक सोचता है, दूसरा उसे अंजाम देता है।” वे बतायेंगे और मैं लिखूंगा। उन्होंने दक्षिण की अभिनेत्री का कई बार जिक्र किया जिसका बचपन में ही उसके पिता ने बलात्कार किया था। आज वह न सिर्फ एक जानी-मानी अभिनेत्री और सांसद रह चुकी हैं बल्कि उसके नाम का एक मंदिर तक है। मुझे यह संक्रमण दिलचस्प लगा। मगर किसी न किसी वजह से हम लोगों की वह देर तक चलने वाली मुलाकातें नहीं हो सकीं। मैं कभी उनसे इसका जिक्र करता तो वे कुछ टालमटोली सी कर जाते। मुझे कुछ नहीं सूझता क्योंकि यदि कुछ होने वाला था तो उसमें पहल उन्हीं की थी। अस्सी वर्ष के एक कलाकार व्यक्ति के साथ बर्ताव करते समय आपको खयाल ज्यादा रखना होता है (हुसेन के साथ मेरा तजुर्बा गवाह था!)। वे अब भी कला की दुनिया में विचरण करते थे लेकिन निजी चैनलों पर आने वाले कुछ अनाप-सनाप धारावाहिकों में रमने लगे थे। उन धारावाहिकों के कुटिल चरित्रों के साथ वे निजी दुश्मनी सी मानने लगते। भाभी जी यानी श्रीमती माया सिंघल ने मुझे हौले से सूचित भी किया कि वे उन धारावाहिकों के रिपीट शोज को भी उसी तन्मयता और आवेग से देखते हैं। उसके चरित्रों के साथ ऊपर-नीचे होते हैं।

“लेकिन सिंघल साहब ये टी.आर.पी.के लिए बनाये गये, खड़े किये चरित्र हैं, असली नहीं हैं…” मैंने हौले से उन्हें समझाने की कोशिश की।
“क्या ऐसे चरित्र हमारे आस-पास नहीं भटक रहे हैं, क्या तुम अखबार नहीं पढ़ते हो। कितना कुछ गलत हो रहा है दुनिया में।”  वे लगभग मुझ पर गरज से पड़े।
मैं सहम गया।
मुझे लगा जैसे उन पर कोई बाधा आ गयी है क्योंकि यह सब इतना अप्रत्याशित था। पता नहीं अपने दिल के भीतर वे किस रहस्यमयी झंझट में उलझे थे।
जिन्हें हम चाहते हैं कई हमें उनके गुस्से और अप्रत्याशित को स्वीकारना ही होता है।
* *

आठ मई, 2014 को मैं नाशिक में था जब फोटोग्राफर मित्र प्रदीप चन्द्रा का मेरे पास संदेश आया कि‍ प्रिय कला के हमारे एक दिग्गज सिंघल साहब नहीं रहे। मैं अवसन्न रह गया। पिछले चार वर्षों की मेल-मुलाकातों के बहुत सारे पल यकायक उमड़ने-घुमड़ने लगे। मेरे आस-पास एक बेचारगी तैर गई। उनके अप्रत्याशित रवैये का भी जैसे खुलासा सा हाथ लगने लगा। लेकिन मेरी चाहना थी कि उनके अन्तिम दर्शन अवश्य करूं। क्या यह मुमकिन होगा? संयोग से कनाडा में रहने वाले उनके छोटे पुत्र के आने से यह सम्भव हो सका।
जब मैंने उनको आखिरी बार देखा तो उनकी देह सिकुड़कर बहुत छोटी रह गयी थी। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन से कला की दुनिया को जो दिया था, उसकी अनूगूँज बनी हुई थी। लेकिन उनके दाह-संस्कार में शामिल होने वालों की तादाद बहुत कम थी। सिर्फ अंगुलियों पर गिनने लायक। कला की वह दुनिया जिसे उन्होंने जतन से इतना संवारा, उसे भी उनसे कुछ पड़ी नहीं रह गयी। क्या कहेंगे इसे? एक कलाकार का नसीब या मुम्बई की भागमभाग।
अलबत्ता, उनके चेहरे पर एक बच्चे की मासूमियत अभी भी तारी थी और मैं देख पा रहा था कि कैसे अपनी अंतिम सांस तक वे एक कलाकार की गरिमा बनाये रहे।

( ‘अकार’ से साभार)


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जेपी (जयंती प्रसाद) सिंघल  का परि‍चय

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

जन्म 24 अक्तूबर 1934, मेरठ, उत्तर प्रदेश। दस बरस की उम्र से चित्रकारी। आत्म दीक्षित। अठारह बरस की उम्र में मेरठ छोड़ बम्बई प्रस्थान। शेष जीवन मुम्बई में। बीस बरस की उम्र में ‘धर्मयुग’ में चित्र प्रकाशित। भारतीय देवी-देवताओं, लोक-कथाओं, मंदिरों, आदिवासियों और अजन्ता-एलोरा को लेकर कई कंपनियों के लिए कलैंडर बनाए जिनकी बिक्री की तादाद अस्सी करोड़ के ज्यादा। लगभग 2700 से अधिक मूल पेंटिंग्स। जितने अच्छे चित्रकार, उतने ही  अच्छे छायाकर। पिछले चालीस- पचास बरसों में देश की शीर्ष अभिनेत्रियों और मॉडल्स के छायाकर। राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए ज़ीनत अमान के किरदार को रूप देने में अहम योगदान। तभी से फिल्मों से जुड़ाव। ‘शान’, मिस्टर इंडिया’, ’हिना’ त्रिदेव’, ‘रॉकी’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, और ‘बेताब समेत हिन्दी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों की पब्लिसिटी डिजाइन। मकबूल फिदा हुसेन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ में विशेष सहयोग। जे जे स्कूल और जहांगीर कला दीर्घा में प्रदर्शनियाँ। श्री राम(75-76), कृष्ण लीला(1977) के कलेंडरों पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार। कलेंडर आर्ट्स के लिए दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार भी। सात मई 2014 को हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन।

आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं दिनेश कर्नाटक : डॉ शुक्ला

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हल्द्वानी:19 फ़रवरी 2017 को सत्यनारायण धर्मशाला में शैक्षिक दखल समिति के तत्वाधान में युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक के तीसरे कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने की तथा इसमें विशिष्ट अथिति डा. तारा चन्द्र त्रिपाठी तथा डा.प्रयाग जोशी रहे।

आधार वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने कहा कि वर्तमान दौर में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से साहित्य को बचाना बड़ी चुनौती है और दिनेश कर्नाटक के साहित्य में जो स्थानीयता है, वह सांस्कृतिक हमले को झेलती है। लेखक यदि अपने अनुभव क्षेत्र से बाहर चला जाये तो उसकी साहित्यिक यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकती, पर दिनेश जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके इस कहानी संग्रह में ही पांच कहानियाँ उनके अनुभव क्षेत्र, माध्यमिक शिक्षा के तंत्र और उसकी समस्याओं पर चर्चा करती हैं।

उन्होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक भीष्म साहनी की तरह ही कहानी की शुरुआत में कोई वातावरण नहीं बनाते, बस बिना कोई औपचारिकता के कहानी कहना शुरू कर देते हैं। कहानी के परिवेश के स्थानीय होने के कारण पाठक आसानी से कहानी से जुड़ भी जाता है। वह व्यवस्था पर चोट करने के स्थान पर अपनी कहानियों में सांस्कृतिक चर्चा करते हैं। दिनेश जी आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं।

डा. शुक्ला ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की कहानियां प्रश्नों से भरी हुई होती हैं और इनमे पहाड़ का दर्द शामिल होता है। कम से कम तीन जगह मुझे ऐसा लगा कि कि वह पात्रों की अंतर्द्वन्दता का कोई मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं करते, यह काम वह पाठक पर छोड़ देतें हैं। इनकी कहानियाँ सच से आँख मिलाने की कहानियाँ हैं जो पुरानी मान्यताओं पर चोट करती हैं और इनकी कहानियों का स्वर प्रतिरोध है।

इसके बाद दिनेश कर्नाटक ने अपनी एक कहानी ‘अच्छे दिनों की वापसी’ का वाचन किया। इसमें एक शिक्षक के अवसाद में जाने और फिर उससे लड़कर वापस आने का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बात उभारने का सफल प्रयास किया कि कैसे हमारे समाज में अवसाद को कोई रोग नहीं समझा जाता और यह भी कि इससे ग्रस्त व्यक्ति के प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। इस कहानी के वाचन से पूर्व दिनेश कर्नाटक ने कहा कि साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है कि यह आपको जीवन के हर कोने में ले जाता है।”

युवा कथाकार खेमकरण सोमन ने कहा कि मेरा दिनेश कर्नाटक से सर्वप्रथम परिचय तब हुआ, जब मैंने उनकी कहानी ‘झाडियाँ’ को कथाक्रम नामक पत्रिका में पढ़ा था, जो सुअर के इंसान बन जाने की कहानी है। उन्‍होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की सबसे अच्छी बात यह है कि वह सहजता और सरलता से कहानी कहते हैं। उनकी कहानियों में सामजिक जीवन, पर्यावरण, संस्कृति का विकृत रूप तथा उसका सही रूप भी दिखता है। उन्‍होंने कहा कि‍ ‘एक मूँछ प्रेमी का कुबुलनामा’ में परंपरा और आधुनिकता का गज़ब का संयोग है। इनके साहित्य को देखकर यह बात सही सिद्ध होती है कि साहित्यकार समाज के बारे में जितना चिंता करता है, उतना ही लिखता है।

कुमायूनी के ख्याति प्राप्त कवि और लेखक जगदीश जोशी ने कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि‍ ये कहानियां मानवीय मूल्यों की स्थापना करती हैं और मैकाले के ज़माने से लेकर आज तक जारी शिक्षा प्रणाली का ‘मुआइना तदंतो’ मतलब पोस्टमॉर्टम करती हैं। उन्‍होंने कहा कि‍ यथार्थ दो प्रकार का होता है- एक देखा हुआ और दूसरा भोगा हुआ। दिनेश कर्नाटक की कहानियों में भोगा हुआ यथार्थ है।

शम्भूदत्त पाण्डेय, शैलेय ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक व्यक्ति मन के कथाकार हैं। दिनेश को सलाह है कि जब भी वे अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पक्ष को उठायें तो उनकी मूल स्थितियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।

युवा कथाकार अनिल कार्की ने कहा कि‍ ‘मैकाले का जिन्न’ कहानी को पढ़ते हुए मुझे तब कि याद आती है, जब मैं गाँव से कक्षा ग्यारह में प्रवेश लेने मिशन स्कूल पिथौरागढ़ गया, तो अंग्रेजी के मासाब ने मेरी कमीज़ के पैन्ट से बाहर निकली होने के कारण मुझे एक झापड़ लगाया जिस कारण मैं आज तक अंग्रेजी नहीं सीख पाया। इसके बाद संस्कृत की कक्षा में भी जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव किया जाता था। उन्‍होंने ‘पीताम्बर मास्साब’ की चर्चा करते हुए कहा कि‍ इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपने प्राइमरी के मासाब पान सिंह याद आते हैं कि कैसे वो स्कूल शराब पी कर पहुँचते थे और हम सब बच्चे उनके आने तक धारे से पानी भर के लाते थे। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरी समझ में कहानी की सफलता इसमें है कि मैं उसे पढ़ते हुए कितना कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता हूँ। दिनेश कर्नाटक की कहानियां मेरी इस कसौटी पर पास होती हैं। इनकी कहानियां समाज द्वारा खड़े किये गए फ्रेमों से टकराती हैं और अभिव्यक्ति को बंद करने के इस दौर में भी टिकी रहती हैं।

प्रयाग जोशी ने कहा कि दिनेश की कहानियाँ बहुत रसीली तथा सहज होती हैं जिन्हें पढ़कर मैं तनावमुक्त महसूस करता हूँ।

लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि दिनेश के इस कहानी संग्रह के बहाने मुझे उत्तराखंड के साहित्य का पुनरावलोकन करने का अवसर मिला है। बटरोही ने कहा कि‍ लेखक के सामने एक चुनौती यह होती है कि वो अपने परिवेश को अपनी कथा भाषा में लाये, दिनेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन्होंने एक नई कथा भाषा शैली को जन्म दिया है।

कार्यक्रम में प्रभात उप्रेती, कस्तूरी लाल, तारा चन्द्र त्रिपाठी ने भी कहानी संग्रह पर वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘शैक्षिक दखल‘ समिति के कोषाध्यक्ष डा. दिनेश जोशी ने समिति के बारे में जानकारी देकर की। उन्‍होंने दिनेश कर्नाटक के इस कहानी संग्रह के संदर्भ में कहा कि‍ लेखक अपने लिए नहीं,  समाज के लिए लिखता है।

अंत में शैक्षिक दखल समिति की ओर से डा. विवेक ने लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के संचालक डा. महेश बवाड़ी ने दिनेश कर्नाटक के इतनी कम उम्र में तीसरे कहानी संग्रह का छपने को पूरे हल्द्वानी के लिए गौरव की बात बताया।

कार्यक्रम में शशांक पाण्डेय, गिरीश पाण्डेय, बसंत कर्नाटक, गणेश खाती, नवेन्दु मठपाल, सुरेन्द्र सूरी, राजेंद्र पाण्डेय, कन्नू जोशी, हेम त्रिपाठी, हिमांशु पाण्डेय सहित शहर के कई साहि‍त्‍यप्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्तुति‍ : गिरीश पांडे 

गांवों में बहार है : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

हाल ही में दिल्‍ली के एक प्रोफेसर ने फेसबुक पर लिखा कि बाईस साल बाद वे अपने गांव जा रहे हैं। गांव पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश का, दि‍ल्‍ली से मात्र साठ-सत्‍तर किलोमीटर दूर। वे बस से जा रहे थे। रास्‍ते के ढाबे, चाय की चुस्कियों के विवरणों से पता चल रहा था कि जैसे आंखों देखा हाल जानने और लिखने के लिए ही उन्‍होंने बस पकड़ी है।

मेरी नजर में बाईस साल कोई बड़ा रिकार्ड नहीं है। रेलवे में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया कि उन्‍हें अपने बदायूं जिले में गांव छोड़े सैंतीस साल हो गये। उनकी सफाई है- ‘क्‍या बताएं… बच्‍चे तैयार होते नहीं हैं। बड़ी बेटी अमेरिका चली गई तो छोटी ने तो दसवीं के बाद ही अमेरिका जाकर पढ़ने का इरादा कर लिया। बेटा पुणे में है। गांव में रखा भी क्‍या है!’

केवल दिल्ली नहीं, यह बात दूर-दूर तक फैली है। खुर्जा के एक बैंक में तैनात मेरे स्कूल के एक साथी ने बताया- ‘गांव मैं नहीं जाता। आखिर क्यों जाएं? वहां ऐसे देखते हैं जैसे कोई दुश्मन हो। वही लड़ाई-झगड़ों के किस्से। मैंने तो अब शादी-विवाह में जाना भी बंद कर दिया है। उनका गांव करोरा खुर्जा से दस कि‍लोमीटर दूर है और यहां हजरत पैदा हुए, पले, बढ़े, पढ़े।

कम से कम पूरे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश की तो यही कहानी है। किसी के भाई ने जमीन हथिया ली तो किसी को पिता के बंटवारे से असंतोष है। कई को जान तक का डर रहता है। एक साथी ने बड़ी संजीदगी से सलाह दी कि ‘यार, तुम जाते तो हो, पर संभल कर जाओ। रात न करना!’ उन्होंने अपना अनुभव बताया कि एक बार सर्दियों की शाम जैसे ही बस से उतरा तो पुलिया पर चार लोग थे। मुझे खुशी हुई कि एक परिचित मिल गया। मैंने उसकी आवाज से पहचान लिया। वह बोला कि भइया, तुम इस वक्त मत आया करो! यानी अगर पहचान में नहीं आता तो मेरा लुटना-पिटना तय था।

यह वही क्षेत्र है जहां छ: महीने पहले बुलंदशहर के पास जी.टी. रोड पर लूटपाट और बलात्‍कार की घटना हुई थी। जिसे इसी उत्‍तर प्रदेश उर्फ उत्‍तम प्रदेश के एक राजनेता और कद्दावर मंत्री ने राजनीतिक दुष्‍प्रचार बताया था। यह अलग बात है कि उन्‍हें ऐसा कहने पर सुप्रीम कोर्ट में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में माफी मांगनी पड़ी।

आखिर हालात ऐसे क्यों हुए कि आपको रात के किसी भी पहर अमेरिका में डर नहीं लगता, आस्ट्रेलिया में छूटा हुआ सामान अगले दिन मिल जाता है, लेकिन अपने देश में आप निश्चिंत नहीं हैं। जिस मातृभूमि को स्वर्ग से बढ़ कर बताते हैं, राष्ट्रगान-राष्ट्रगीत पर इतराते हैं, किसी इलाके के चप्पे-चप्पे को जानते-पहचानते भी हैं, वहां जाने में भी डर लगता हैं। अगर कभी जाते हैं तो उसके बारे में ऐसे बताते हैं, जैसे हम बचपन में कप्तान कुक की उत्तरी ध्रुव की विजय यात्रा या मैंगेलन के दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश के भयानक दुस्साहस के विवरण बता रहे हों।

वाकई इस असुरक्षा के बीच जो लोग रहते हैं, उनके जीवट का जवाब नहीं। सरकारी स्कूल बिल्कुल चौपट। नए नुक्कड़ अंग्रेजी के धंधा करते स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर बस कुछ सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। इसका नुकसान और ज्यादा है। दरअसल, ऊंची फीस देने के बाद वे और उनके मां-बाप खेती-क्यारी के अपने पारंपरिक काम से भी बचना चाहते हैं। सरकारी स्कूल की सहज हिंदी में शिक्षा उन्हें यथार्थ से इतना दूर नहीं करती थी। नौकरी खासकर सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं, कोई काम, व्यवसाय, उद्योग है नहीं, न समाज या सरकार ने कुछ सिखाया, तो आगे क्या हो! इनमें से कुछ ऐसे निकल जाते हैं जो सड़कों पर खड़े अंधेरे का इंतजार करते हैं कि कब कोई आए और ये उसका शिकार करें!

‘हारे को हरिनाम’ के सटीक उदाहरण के रूप में इस निर्वात में अचानक धार्मिकता ने खूब पैर पसारे हैं। जब भी गांव जाता हूं तो पता लगता है कि किसी पूजा का बड़ा आयोजन चल रहा है। चालीस-पचास साल पहले भी लोग पूजा-पाठ करते थे, लेकिन एक-डेढ़ दिन के भीतर खत्म। अब यह हफ्ते या इससे ज्यादा वक्त तक चलता रहता है। आधा गांव इसी में मशगूल रहता है। बाकी रोजमर्रा के कामकाज या तो किनारे होते गए या फिर टलने लगे हैं। धर्म-कर्म के आगे खेतों की परवाह कम होती गई है।

ऐसे में भक्ति का धंधा पूरे जोरों पर है। सामान्य रोजगार भले असंभव जैसे होते जा रहे हों, बनारस से लेकर पटना तक के पंडों-ज्योतिषियों के रोजगार में तेजी है। जाति-विभाजन के दंश और भी अमानवीय शक्ल में सामने आ जाते हैं। काश! धर्म ने समाज में जाति और इससे उपजने वाले विद्वेष को खत्म करने का काम किया होता। एक अच्छी शिक्षा, खेलकूद या दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां और प्रशिक्षण इस निर्वात को भर सकते थे। लेकिन बेईमानी और चौबीसों घंटे की धारावाहिक राजनीति ने उसे भी निगल लिया है। गांव अब वे गांव नहीं रहे जिसका सपना महात्मा गांधी देखते थे। बाबा साहब आंबेडकर सचमुच ज्यादा यथार्थवादी थे। वे जाति-व्यवस्था से जकड़न की मुक्ति शहरीकरण में देखते थे। लेकिन शहर के मेरे दिल्ली के अफसर दोस्त गांव वालों और आदिवासियों को दिल्ली की झुग्गियों में भी नहीं देखना चाहते और खुद गांव जाने से भी डरते हैं। बस दूर से गाते रहते हैं- ‘गांव में बहार है!’