Archive for: February 2017

पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूरत : महेश पुनेठा

 

shekshik-dakhal

हमारे समाज में आप पढ़ने की स्थिति का अनुमान इसी बात से लगा सकते हैं कि आपके आस-पड़ोस और जानने-पहचानने वाले लोगों में से कितने लोग ऐसे हैं, जिनके घर में किताबों का एक  शेल्फ है? ऐसे लोगों के नाम लेने के लिए आपको अपनी याददाश्त पर अतिरिक्त जोर देना पड़ेगा। उसके बाद भी आपको ऐसे लोग अंगुलियों में गिने जाने लायक मिलेंगे। उनमें से भी अधिकांश ऐसे होंगे, जिनके शेल्फ में पुस्तकों के नाम पर आपको केवल पाठ्य पुस्तकें, प्रतियोगिता पुस्तकें या धार्मिक पुस्तकें ही मिलेंगी। ‘शैक्षिक दखल’ ने हिंदी समाज में पढ़ने की स्थिति का आकलन करने के लिए पिछले दिनों एक अध्ययन किया तो पाया कि एक हजार पढ़े-लिखे लोगों में से पचास लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिनके भीतर स्वाध्याय की प्रवृत्ति हो। इसका पता इस बात से चलता है कि महानगरों और जिला मुख्यालयों को छोड़ छोटे शहरों में सार्वजनिक पुस्तकालयों का नितांत अभाव है। आधे से भी कम स्कूल हैं, जहां पुस्तकालय या वाचनालय हैं। इनमें से भी लगभग 25 प्रतिशत स्कूल ही हैं, जहां नियमित रूप से पुस्तकों का लेन-देन होता है। ये पुस्तकें भी अधिकांशतः पाठ्यक्रम से या प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुडी हुई रहती हैं। ऐसे पुस्तकालय कम हैं, जहां से बच्चे अपनी मन-पसंद किताबें लेकर पढ़ सकें। निजी पुस्तकालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। पढने-लिखने की प्रवृत्ति रखने वालों में से भी केवल पचास प्रतिशत लोगों के घरों में ही निजी पुस्तकालय हैं। स्वाध्याय की प्रवृति रखने वाले अधिकांश लोग अध्ययन, अध्यापन और लेखन के क्षेत्र से ही जुड़े हैं। इससे बाहर के दो प्रतिशत लोग भी नहीं हैं।

जब न पर्याप्त संख्या में सार्वजनिक पुस्तकालय हों, न स्कूलों में पुस्तकालय और न निजी पुस्तकालय, ऐसे में भला पढ़ने की संस्कृति कैसे विकसित हो सकती है? चारों ओर नकारात्मक माहौल है। पढ़ना या तो परीक्षा पास करने या रोजगार प्राप्त करने या फिर समय व्यतीत करने तक सीमित होकर रह गया है। कुछ नया जानने-समझने और उसको बदलने, विश्‍वदृष्‍टि‍ और संवेदनशीलता को विस्तार देने के लिए पढ़ने वालों की संख्या कम ही देखी जाती है। लेखन और अध्यापन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों में भी बहुत कम हैं, जो पढ़ने से संबंध रखते हैं। वे भी बिना पढ़े ही काम चला ले जाते हैं। पढ़ने के लिए किसी के पास समय न होने का बहाना है, तो किसी के पास संसाधनों के अभाव का। जबकि एक चेतनाशील समाज अर्थात ऐसा समाज जो सही-गलत का निर्णय सोच-समझ कर ले सके, बनाना है तो पढ़ने का संस्कार डालना जरूरी है। आहार-निद्रा की तरह पढ़ने को जरूरी कर्म बनाना। इसकी शुरुआत बचपन से करने की जरूरत है। बचपन में यदि पढ़ने की आदत लग गयी तो समझिए वह जीवनभर नहीं जाती। इसके लिए घर में माता-पिता को भी पढ़ने को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।

पढ़ने की आदत विकसित करने की दिशा में हिंदी समाज में कोई बहुत बड़ा आंदोलन तो नहीं दिखाई देता है, पर छोटे-छोटे कुछ प्रयास अवश्‍य जारी हैं। भले ही ये मरुद्यानों की तरह हैं। लेकिन इन प्रयासों से कुछ राह निकलती सी दिखती है। पता चलता है कि बेहतर समाज बनाने की चाह हो तो शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप मध्यप्रदेश के युवा कवि मोहन कुमार नागर की इस पहल को ही देखा जा सकता है। मोहन पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने-पढ़ाने का शौक है तो उन्होंने अपने अस्पताल की गैलरी को ही वाचनालय में बदल दिया है। उनके पास जो भी पत्र-पत्रिकाएं और किताबें आती हैं, उन्हें वह अपने अस्पताल की गैलरी में रख देते हैं। जहां से वहां आने वाले जो भी चाहें किताबें उठाकर पढ़ सकते हैं। मोहन को इस बात की कसक है कि किताबें जरा कम हैं, लेकिन जब करीब सात-आठ लाख की आबादी वाले शहर में एक भी पुस्तकालय न हो और न साहित्यिक माहौल तब उनकी यह छोटी-सी पहल भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी तरह गुरिया-बौंसी, बांका, बिहार में राजेश झा हैं जिन्होंने अपने पुश्तैनी घर के एक तल को पुस्तकालय में तब्दील कर दिया है। 300 पुस्तकें हैं, 27 बच्चे नियमित और कुल 50 बच्चे अनियमित रूप से उसमें शाम 5 से 8 बजे तक पढ़ाई करते हैं। ऐसे प्रयासों के लिए दृढ-संकल्प और गहरे सरोकारों की आवश्यकता होती है, जैसा हमें उत्तराखंड के सीमांत जिले बागेश्वर के शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत में दिखाई देती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत रुचि के चलते जिले के अनेक सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों को काफी समृद्ध कर दिया है। इसके लिए उन्होंने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का सहयोग लिया। अपने क्षेत्र के विधायकों और पंचायत प्रतिनिधियों को विद्यालयों को पुस्तकालय हेतु धनराशि‍ देने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से जनप्रतिनिधियों ने अनेक विद्यालयों को धनराशि‍ प्रदान की। उनका संकल्प है कि जिले के प्रत्येक सरकारी स्कूल में एक समृद्ध पुस्तकालय हो और नियमित रूप से उसका संचालन हो। वह स्कूल प्रशासन को भी इस बात के लिए प्रेरित करते हैं। नयी-नयी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं से बच्चों और शिक्षकों को परिचित कराते हैं। स्वयं अच्छा साहित्य उन तक पहुंचाते हैं। यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि शिक्षा से जुड़े अधिकारी इस तरह पुस्तकालयों के संचालन के प्रति गंभीर हो जायें तो समाज का परिदृश्य बदलने में देर नहीं लगेगी।

साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध लोगों ने अपने-अपने तरीके निकाले हैं। देहरादून में साहित्यकार शशि‍भूषण बडोनी रहते हैं। वह देशभर से निकलने वाली छोटी-बड़ी तमाम पत्रिकाएं अपने पढ़ने के लिए मंगाते हैं और खुद पढ़ने के बाद अपने परिचितों को दे देते हैं। न केवल आसपास के परिचितों को बल्कि दूर-दूर तक डाक द्वारा भेजते हैं। हिमाचल प्रदेश के सुंदरगांव में रहने वाले हिंदी के चर्चित कवि सुरेश सेन निशांत विभिन्न लघु पत्रिकाओं को झोले में डालकर सुधी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। बांदा में यही कार्य प्रमोद दीक्षित भी कर रहे हैं। शि‍क्षा में नवाचारों को आगे बढ़ाने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने शि‍क्षक मित्रों के साथ मिलकर ‘शैक्षिक संवाद मंच’ का गठन किया है। प्रमोद जी देशभर से शि‍क्षा संबंधी साहित्य मंगाकर उसे वितरित करते हैं और उस पर चर्चा आयोजित करवाते हैं। गाजियाबाद के अनुराग ‘लेखक मंच प्रकाशन’ के माध्यम से सस्ती पुस्तकें प्रकाशि‍त कर इस तरह के प्रयासों को अपने तरीके से बल प्रदान कर रहे हैं। उनकी हमेशा कोशि‍श रहती है कि बच्चों के बीच कुछ ऐसी गतिविधियों का आयोजन किया जाय जिससे उनके भीतर पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि पैदा हो। व्यक्तिगत स्तर पर और भी इस तरह के प्रयास हो रहे होंगे, जिसकी जानकारी अभी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है।

एकलव्य, रूम टू रीड, ए.पी.एफ. जैसे कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की पहल कदमी को छोड़ दें तो इस दिशा में सामूहिक रूप से भी कुछ प्रयास हो रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये किसी सरकारी या बड़ी संस्था से प्राप्त आर्थिक सहायता से न होकर कुछ लोगों या समुदाय के सहयोग से संचालित हैं। इसी तरह के प्रयास हैं जो किसी आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। जैसे उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘क्रिएटिव उत्तराखण्ड’ नाम से सक्रिय है। इस संस्था ने शहर के बीच स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बेकार पड़े कमरों को शहर के समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों की मदद से बेहतरीन पुस्तकालय में बदल दिया। अब स्कूल के समय पर इस स्कूल के बच्चे और शाम को शहर के अन्य लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। इसी तरह चमोली जनपद के सुदूर चोपता क्षेत्र के युवाओं ने मिलकर कड़ाकोट शिक्षा मंच का गठन कर पुस्तकालय और गतिविधि केन्द्र स्थापित किया है। अब तक जन सहयोग से इस केन्द्र में 1500 से अधिक किताबें, दैनिक हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों के साथ ही कम्प्यूटर और एक प्रिं‍टर है। गांव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय में कम्प्यूटर और किताबों को रखने के लिये फर्नीचर तैयार किया है। इसके पीछे ग्रामीणों की सोच है कि अगर हमें अपने बच्चों को खुशहाल भविष्य देना है तो हमें अपने गांव को और बेहतर करने के लिए लगातार काम करना होगा।

यह देखने में आया है कि पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए पुस्तकालय का होना ही पर्याप्त नहीं है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों और पुस्तकालय से जुड़ें इसके लिए कुछ गतिविधियों का होना भी जरूरी लगता है। इस दृष्‍टि‍ से कुछ प्रयासों का उल्लेख भी यहां करना चाहेंगे। कवि मित्र अजेय से पता चला कि लिखने-पढ़ने की गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिमाचल के कुल्लू में तकरीबन 10 सालों से एक समूह काम कर रहा है। ग्रुप का नाम है संवाद कुल्लू। पहले नवलेखन कार्यशाला के रूप में शुरू हुए इस ग्रुप ने अब हर उम्र के साहित्य प्रेमियों के दोतरफा संवाद का रूप ग्रहण कर लिया है। लगभग हर सप्ताह सदस्य मिलते हैं। किसी तय लेखक या किताब पर चर्चा होती है। लाइब्रेरी के कान्फ्रेंस हाल में ही सब लोग चर्चा करते हैं। हर तरह की रुचि और विचारधारा वाले लोग इस में सम्मिलित होते हैं। छात्रों और युवाओं को अपनी बात कहने के लिए प्रेरित किया जाता है।

पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में डॉ. डी. डी. पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। जहां विज्ञान के साथ-साथ साहित्य और अन्य चीजों पर बच्चों के लिए बेहतर वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है। विज्ञान की कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा अनेक साहित्यिक गतिविधियां जैसे दीवार पत्रिका का निर्माण, बच्चों में पढ़ने की रुचियां उत्पन्न करने के लिये उनको पत्रिकाएं देना, बच्चों के बीच बाल फिल्में दिखाना आदि, संचालि‍त होती हैं। इसी तरह का पिथौरागढ़ शहर में युवाओं का एक समूह है- आरंभ स्टडी सर्किल। इस समूह से जुड़े अधिकांश युवा स्थानीय डिग्री कालेज में अध्ययनरत हैं। नयी पीढ़ी में पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने की दिशा में पिछले तीन सालों से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। ये न केवल स्वयं अध्ययन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। हर शाम घूमने के लिए निकलते हैं तो इनके हाथ में कोई न कोई नयी किताब होती है, जिसका न केवल पाठ करते हैं बल्कि किसी स्थान पर बैठ चर्चा भी करते हैं। इतना ही नहीं इनके द्वारा पढ़ने के इच्छुक लोगों को पुस्तकें उपलब्ध करवाने हेतु एक बुक क्लब बनाया गया है। समूह के साथियों के पास उपलब्ध किताबों की सूची बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाई गयी हैं और उसमें संपर्क नंबर दिए गए हैं। इच्छुक व्यक्ति फोन से संपर्क करते हैं और उन्हें उनके बताए स्थान पर पुस्तक उपलब्ध करवा दी जाती है। दूसरे पुस्तकालयों से पुस्तकें लेकर भी समूह से जुड़े युवा अपने मुहल्ले के बच्चों को पढ़ने को देते हैं। यह अपने तरह का एकदम नया प्रयोग है। इस समूह द्वारा स्थानीय महाविद्यालय में ‘आरंभ’ नाम से एक दीवार पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है। समय-समय पर गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। पिछले दिनों कविता पोस्टर बनाकर महाविद्यालय की दीवारों पर लगाए गए। साहित्य के प्रति नयी पीढ़ी में लगाव पैदा करने का उनका यह प्रयास अनूठा है। इस तरह के प्रयासों को संगठित करने और गति देने की आवश्यकता है। देशभर में हो रहे ऐसे और प्रयासों को भी चिह्नित करने और सामने लाने की जरूरत है। केवल पढ़ने की संस्कृति के अभाव का रोना-रोने से कुछ नहीं होगा। अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारें इस दिशा में कुछ ठोस करेंगी, ऐसी आशा करना भोलापन होगा। हमें खुद ही पहलकदमी लेनी होगी।

पढ़ने की जब बात आती है तो एक सवाल यह भी उठता है कि क्या पढ़ा जाये? पढ़ने के लिए हमारे चारों ओर इतनी सामग्री बिखरी पड़ी है कि यह तय करना जरूरी है। यह देखा जाता है कि हम अपना बहुत सारा समय ऐसा कुछ पढ़ने में गंवा देते हैं जो न हमारे व्यक्तित्व को समृ़द्ध करता है, न सूचना-जानकारी को और न ही विश्‍वदृष्‍टि‍ को व्यापक करता है। बस हम पढ़ते ही जाते हैं। इस तरह बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है, जो जरूरी होता है। अतः हमें चयन करने की आवश्‍यकता पड़ती है। उपलब्ध समय और जरूरत के बीच सही तालमेल स्थापित करना पड़ता है। एक शि‍क्षक के रूप में हमें क्या पढ़ना चाहिए, इस पर विस्तार से लिखने की यहां पर गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इतना सारा है कि उसे हम एक आलेख में नहीं समेट सकते हैं। लेकिन यहां पिछले दिनों वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशि‍त वरिष्‍ठ शि‍क्षाविद् शि‍वरतन थानवी की पुस्तक ‘भारत में सुकरात’ का उल्लेख अवश्‍य करना चाहेंगे। इस पुस्तक में लेखक द्वारा उन तमाम पत्र-पत्रिकाओं, लेखों, निबंधों और पुस्तकों का उल्लेख किया है जो एक शि‍क्षक के लिए उपयोगी हैं। साथ ही उनका पढ़ा जाना क्यों जरूरी है, उन कारणों को भी रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के तरीकों के बारे में हमें बहुत कुछ सुझाती है। इस संदर्भ में उनका मानना है कि पाठ्येतर साहित्य का पढ़ना वस्तुतः प्रतिबंध नहीं, प्रोत्साहन का विषय होना चाहिए। जो मन में आए और जब मन में आए पढ़ने की स्वतंत्रता और साधन हम देते रह सकें तो बच्चे हल्की-फुल्की रहस्य-रूमान की सामग्री पढ़ते-पढ़ते चित्रकला, फोटोग्राफी और डाक टिकट संग्रह संबंधी लेख-स्तम्भ की पुस्तकें भी पढ़ने लग सकते हैं। पढ़ने के लिए वातावरण तभी सक्रिय होगा, जब यह मानें कि‍ बिना किसी वर्जना के बच्चे पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें पढ़ने को स्वतंत्र हैं। शि‍वरतन थानवी जगह-जगह अपने जीवन के पढ़ने से जुड़े अनुभव बताते चलते हैं, जिससे पुस्तक रोचक, आत्मीय और विश्‍वसनीय हो गई है। इस पुस्तक में संकलित आलेख- झोले में पुस्तकालय-मास्टर मोतीलाल जी, पोथी का सुख, शि‍क्षक क्या पढ़े-क्यों पढ़ें, आपके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं?, पढ़ने की आदतें :पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें और बच्चे, किताब कैमरा है कि आंख आदि विशेष उपयोगी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह किताब न केवल उन किताबों की जानकारी देती है, जो हमें पढ़नी चाहिए बल्कि पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती है।

‘शैक्षिक दखल’ के इस अंक में हम पढ़ने की संस्कृति की स्थिति और कारणों की एक पड़ताल कर रहे हैं। इसका उद्देष्य उन तरीकों को जानना-समझना है, जो बच्चों में स्वाध्याय की आदत विकसित करते हैं, ताकि एक शि‍क्षक या अभिभावक के रूप में हम भी उन्हें अपना सकें। यह उस दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। हम चाहते हैं कि यह क्रम आगे बढ़े और पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए एक रचनात्मक आंदोलन उठ खड़ा हो।

(शैक्षि‍क दखल, वर्ष-6, अंक-9, जनवरी 2017 से साभार)

‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

macaulay-ka-jinn-tatha-any-kahaiyan

हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी को हल्द्वानी में सत्यनारायण धर्मशाला के हॉल में अपराह्न 03 बजे से होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मण सिंह बि‍ष्ट ‘बटरोही’ जी करेंगे। मुख्य अति‍थि‍ इति‍हासवि‍द शेखर पाठक और वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ डॉ तारा चन्द्र त्रि‍पाठी व डॉ प्रयाग जोशी होंगे। बीज वक्ता डॉ शशांक शुक्ला होंगे। इनके अलावा कहानी संग्रह पर डॉ प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, शैलेय, जगमोहन रौतेला, डॉ महेश बवाड़ी, भास्कर उप्रेती, भूपेन सिंह, अनि‍ल कार्की, खेमकरण सोमन और सुधीर कुमार वि‍चार व्यक्त करेंगे।

दिनेश कर्नाटक 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सामने आई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के युवा पीढ़ी विशेषांकों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दिनेश कर्नाटक की कहानियों का फलक काफी विविधतापूर्ण तथा विस्तृत है। ‘पहाड़ में सन्नाटा’ तथा ‘आते रहना’ के बाद यह इनका तीसरा कहानी संग्रह है। वह बिना किसी शोरशराबे के कहानियाँ लिखने में लगे हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वह लोगों को चौंकाने या आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं लिखते। जीवन उनकी कहानियों में अपने वास्तविक रंगों के साथ सामने आता है। जीवन की विडम्बनाओं तथा अन्तर्विरोधों पर उनकी तीखी नजर रहती है। कहानी उनके लिए बेहतर दुनिया के निर्माण का औजार है। वह चाहते हैं कि कहानी पढक़र मनुष्य और अधिक मानवीय तथा सम्वेदनशील हो!

अपनी रचना यात्रा में यहाँ पर पहुँचकर वह अपनी कथाभूमि पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। संग्रह की हर कहानी पाठक को एक नये अनुभव क्षेत्र की यात्रा पर ले जाती है। ये कहानियाँ भाषा, कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से लेखक के विकास के एक और सोपान की खबर देती हैं।

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

vigyan-aur-hum

देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

गीता गैरोला का लेखन सामूहिकता का निजी प्रतिरोध

geeta-gairola

दिल्ली : हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती हैं। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए। चकोर पक्षी पर लिखे ‘प्यारे चक्खू’ को श्रोताओं से विशेष सराहना मिली तो एक अन्य प्रसंग में पहाड़ की स्त्रियों की आत्मीय छवियाँ भी मन को मोहने वाली थीं। आयोजन में युवा कवि और ‘दखल’ के संपादक अशोक कुमार पांडेय ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य स्मृतियों को जीवित रखने में मदद करता है। उसके सहारे हम जान पाते हैं कि मनुष्यों ने किस तरह संघर्ष कर अपना विकास किया है। उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता और धर्मान्धता को खतरनाक बताते हुए कहा कि रिवर्स गियर में चलकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तराखंड के जन संघर्षों और स्त्रीवादी आन्दोलनों में गीता गैरोला की भूमिका को रेखांकित करते पांडेय ने कहा कि उनका लेखन रोशनी देने वाला है।

हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने ‘मल्यो की डार’ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  हम सबके जीवन में ऐसे अनेक लोग आते हैं जो मामूली और साधारण हैं, लेकिन इनका लेखा करना हम सब के लिए सम्भव नहीं हो पाता। गीता गैरोला ऐसा करती हैं तो न केवल पहाड़ (और भारत भी) की सामासिक संस्कृति का निजी आख्यान रच देती हैं, अपितु जबड़े फैलाते उपभोक्तावाद के सामने सामूहिकता का निजी प्रतिरोध भी खड़ा करती हैं। साहित्य ऐसे ही तो अपने पाठकों को संस्कारवान बनाता है। उन्‍होंने कहा कि  स्त्री मुक्ति की छटपटाहट इन संस्मरणों में भी है और पितृसत्ता की जकड़न की प्रतीति भी।  फिर भी जो नहीं है, वह है स्त्री मुक्ति की वे तस्वीरें जो हिन्दी की स्त्री विमर्शवादी लेखिकाओं द्वारा बहुधा प्रयुक्त की गई हैं। यौन स्वतंत्रता और देह कामना भी जीवन से जुड़ी सचाइयां हैं लेकिन इन सचाइयों से गीता जी आक्रान्त नहीं हैं। आयोजन में बी ए प्रतिष्ठा संस्कृत के विद्यार्थी सत्यार्थ ग्रोवर ने पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की। इस आयोजन के दूसरे भाग में महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुबह’ के प्रवेशांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ रचना सिंह ने पत्रिका के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि स्त्री विषय पर केंद्रित प्रवेशांक में मूर्धन्य कला चिंतक कपिला वात्स्यायन से साक्षात्कार तथा कवयित्री अनामिका की कवितायेँ विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित की गई हैं। समारोह का संयोजन प्रकोष्ठ की आकांक्षा ने किया तथा अध्यक्षा सिमरन ने गैरोला को शाल ओढाकर अभिनन्दन किया।

फोटो एवं रिपोर्ट – मोनिका शर्मा

बच्चों को पसंद आया कि‍ताबों का साथ

ghumantoo-pustak-mela

ग़ाज़ियाबाद : इंदिरापुरम के रिहायशी इलाके ज्ञानखंड- 3 में 26 जनवरी को बच्चों के लिए घुमंतू पुस्तक मेले का आयोजन किया गया। इसमें एकलव्य, एनबीटी, सीबीटी, विज्ञान-प्रसार आदि विभिन्न प्रकाशनों की किताबों के लगभग दो सौ से ज्यादा ‘टाइटल’ प्रदर्शित किये गये।

घुमंतू पुस्तक मेले की संयोजक कोमल मनोहरे ने बताया, ‘इस तरह के आयोजन हम लगभग डेढ़ सालों से अलग-अलग स्कूलों, बस्तियों, ‘हाउसिंग सोसाइटी’ में कर रहे हैं। इस अभियान का मकसद किताबों से दूर हो रहे बच्चों को किताबों से दोस्ती कराना है और अच्छी किताबों को उन तक पहुँचाना है। जो भी हमारे इस अभियान को जानते हैं, वे हमें अपनी सोसाइटी या स्कूल में बुलाते हैं’।

बकौल कोमल अब यहाँ ही देख लीजिये रश्मि जी ने हमारे अभियान के बारे में सुना और हमें यहाँ बच्चों के बीच यह आयोजन करने का मौका मिला। इस कार्यक्रम की आयोजक रश्मि भरद्वाज पेशे से शिक्षिका हैं। वह कहती हैं, ‘किताबें बच्चों के परवरिश में सबसे ज्यादा सहायक हैं और इस टेलीवाइज्ड युग में किताबें कहाँ पढ़ी जाती हैं। हम तो इन बच्चों को किताबों की आदत डाल रहे है और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं।’

इस कार्यक्रम में बच्चों को कहानी सुनायी गई। बच्‍चों ने अपने मन के विषयों के चित्र बनाये। उनके बनाए चि‍त्रों को कार्यस्‍थल पर प्रदर्शित कि‍या गया। उन्हें एक लघु फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ भी दिखाई गई, जिसे रिदम जानवे ने निर्देशित किया है।

बारिश और कड़ी ठंड के बावज़ूद मेले में ज्ञान खंड-3 व आसपड़ोस के लोगों का आना-जाना लगा रहा।

बच्चों ने उत्सुकता और दिलचस्पी से इस आयोजन में भाग लिया जिसके संयोजन में माही और स्नेहा की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

kabutari-anti

साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र