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बाल साहित्य : चुनौतियाँ और संभावनाएँ : राजेश उत्साही 

राजेश उत्साही

राजेश उत्साही

साहित्य क्या है ? पुराना कथन है कि साहित्य समाज का दपर्ण है। जैसा समाज में होता है, साहित्य में वही प्रतिबिम्बबित होता है। सही मायने में साहित्य का रिश्ता हमारे जीवन से है। हमारे जीवन में, हमारे आसपास जो घटता है, उसे देखकर या उसे भोगकर हम दुखी या सुखी होते हैं। खुश होते हैं या उदास होते हैं। गुस्‍सा होते हैं या क्रोधित होते हैं। हँसते हैं, खिलखिलाते हैं, रोते हैं, चीखते हैं। और जब कभी इस सबका आख्‍यान हम कहीं लिखा हुआ पढ़ते हैं तो हमें वैसा ही महसूस होता है जैसा उसे देखते या भोगते हुए महसूस करते हैं।
जिस कविता, कहानी,नाटक, उपन्‍यास आदि को पढ़ते हुए हम ऐसा महसूस करते हैं कि उसने हमें अतीव आनंद दिया या कि हम उसमें डूब गए, दरअसल उसने हमें पाठक के रूप में वह स्‍वतंत्रता प्रदान की जो हमें मनुष्‍य होने के नाते हासिल होनी चाहिए। साहित्‍य वास्‍तव में हमें उन जंजीरों से मुक्‍त करता है, जिनमें हम अमूमन जकड़े होते हैं।
शिक्षाविद् कृष्‍ण कुमार के शब्‍दों में, ‘साहित्‍य एक अपेक्षित अर्थ को जानने का जरिया है– उसके जरिए कुछ रूपाकारों को, कुछ रूपकों को प्रचारित करने का माध्‍यम है।’

मेरा अपना मानना है कि बाल साहित्‍य जैसा अलग से कुछ नहीं होता है। हो सकता है कि मेरा यह कथन आपको चौंकाए, यह भी संभव है कि आप मुझ से सहमत न हों। बरसों से यह अवधारणा चली आ रही है और तमाम विद्वान इसे मानते भी हैं। पर मुझे लगता है कि इस पर एक अलग नजरिए से विचार किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में एक वाक्‍या 2011 का है। भोपाल में मशहूर बाल विज्ञान पत्रिका चकमक के 300वें अंक के विमोचन समारोह का आयोजन था। इस अवसर पर वहाँ ‘बाल साहित्‍य की चुनौतियाँ’ शीर्षक से एक विमर्श रखा गया था। इसमें कई अन्‍य लोगों के अलावा जाने-माने फिल्‍मकार गुलज़ार साहब और कवि, लेखक प्रयाग शुक्‍ल जी भी मौजूद थे। चकमक की संस्‍थापक सम्‍पादकीय टीम का सदस्‍य होने के नाते मैं भी इस विमर्श में शामिल था। वहाँ मैंने यही बात कही। प्रयाग जी ने इसका प्रतिवाद किया। बहस आगे बढ़कर बाल साहित्‍य की गुणवत्‍ता पर पहुँची। गुलज़ार साहब ने इसका समाधान एक बहुत सुंदर कथन से किया। उन्‍होंने कहा कि, ‘अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसका आनंद बच्‍चे से लेकर बड़े तक ले सकें।’ अब आप सोचिए कि ऐसे साहित्‍य को आप किस श्रेणी में रखेंगे।

चलिए अब हम थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि बाल साहित्‍य जैसा अलग से कुछ होता है, तो वह अच्‍छा क्‍या होगा ? गुलज़ार साहब की बात मानें तो निश्चित ही वह जिसमें बच्‍चों से लेकर बड़े तक अपने को देख सकें। पर दिक्‍कत यहीं से आरम्‍भ होती है। हम ज्‍यों-ज्‍यों बड़े होते हैं या बड़े होने लगते हैं, जीवन को देखने का हमारा स्‍वतंत्र बालसुलभ नजरिया गायब होने लगता है। हम जीवन को स्‍वतंत्रता से देखने की बजाय प्रचलित मान्‍यताओं, नियमों और प्रतिबंधों के साथ देखने लगते हैं। तथाकथित नैतिकता और उसके आदर्श हमारे सामने आ खड़े होते हैं। ऐसे में जब हम किसी भी रचना को यह मानकर रचते हैं कि वह बच्‍चों के लिए है, तब तो हमारे सामने तमाम और बंदिशें और शर्तें भी आन खड़ी होती हैं। जैसे रचना किस उम्र के बच्‍चे के लिए लिखी जा रही है, भाषा क्‍या होगी, परिवेश क्‍या होगा। जो हम कहने जा रहे हैं, उसे समझ पाने के लिए जरूरी अवधारणाएँ बच्‍चे में विकसित हो गई होंगी या नहीं आदि आदि। जाहिर है ऐसा नियंत्रित लेखन जो रचेगा, वह कितना प्रभावी होगा कहना मुश्किल है।

मुश्किल यह भी है कि जब बच्‍चों के लिए कहकर लिखा जा रहा होता है तो ज्‍यादातर लेखक अपने अंदर के अतीत के ‘बच्‍चे’ को याद करके, ध्‍यान रखकर लिख रहे होते हैं। बिरले ही होते हैं, जो अपने आसपास के समकालीन बच्‍चे को देखकर, सुनकर, समझकर, उसके स्‍तर पर उतरकर उसे अभिव्‍यक्‍त या संबोधित कर रहे होते हैं। मैं अपनी बात को और अधिक स्‍पष्‍ट करने के लिए अगर यह कहूँ कि प्रेमचंद ने ‘ईदगाह’ कहानी बाल साहित्‍य कहकर तो नहीं लिखी थी। लेकिन ‘ईदगाह’ एक ऐसी कहानी है जो आज की तारीख में बच्‍चों के बीच खूब पढ़ी जाती है। या मैं यह याद करूँ कि प्रेमचंद की ही ‘पंच परमेश्‍वर’ तो मैंने पाँचवी कक्षा की पाठ्यपुस्‍तक में पढ़ी थी। यानी केवल ग्‍यारह साल की उम्र में। तो क्‍या आप उसे बाल साहित्‍य की श्रेणी में रख देंगे। इसमें आप चंद्रधर शर्मा गुलेरी की मशहूर कहानी ‘उसने कहा था..’ को भी जोड़ लें जो मैंने दसवीं या ग्‍यारहवीं में पढ़ी थी, तो क्‍या वह किशोर साहित्‍य कहलाएगी। कुल मिलाकर मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि साहित्‍य केवल साहित्‍य होता है, उसे श्रेणियों में बाँटने से हम साहित्‍य का भला कम, नुकसान ज्‍यादा कर रहे होते हैं। इसलिए एक विचारवान, गंभीर और सर्तक लेखक का यह दायित्‍व है कि पहले वह केवल लिखे। ठीक है कि आज के बाजार की मांग है कि वह पाठक को ध्‍यान में रखे, पर उसे अपने ऊपर हावी न होने दे। तो एक तरह से पहली चुनौती यही है। और यह एक शाश्‍वत चुनौती है। इसका मुकाबला हर दौर में हर पीढ़ी को करना होगा। बाल साहित्‍यकार का टैग भी मुझे पसंद नहीं। उसको लेकर भी वही आपत्ति है जो बाल साहित्‍य कहने में है। साहित्‍यकार, साहित्‍यकार होता है, वह बाल, किशोर या फिर वयस्‍क साहित्‍यकार नहीं होता।
बाल साहित्‍य का सरोकार जिन तीन लोगों से है या जिसे अंग्रेजी में कहते हैं जो उसके ‘स्‍टेकहोल्‍डर’ हैं, उनमें लेखक के अलावा पाठक या उसका उपयोग करने वाले के तौर पर बच्‍चा, बच्‍चे के अभिभावक या वे लोग जो इस साहित्‍य को बच्‍चे को उपलब्‍ध कराते हैं।
आइए, इन पर एक-एक करके बातचीत करते हैं।

बच्‍चे हमारे साहित्‍य के पाठक हैं। पर बच्‍चों के बारे में या किसी भी बच्‍चे के बारे में हम वास्‍तव में कितना जानते हैं, इस पर हमें विचार करना चाहिए। पहली बात पाठक होने के लिए बच्‍चे का साक्षर होना आवश्‍यक है। बच्‍चों को साक्षर करने के लिए यानी उन्‍हें शिक्षा देने के लिए जिस स्‍तर पर प्रयास हो रहे हैं, वे सब हमारे सामने हैं। यहाँ थोड़ा-सा विषयांतर होगा, लेकिन हमें हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को इस संदर्भ में टटोलना होगा, उसका परीक्षण और आकलन करना होगा। वास्‍तव में वह बच्‍चों को किस तरह से शिक्षित करती है। बल्कि कई मायनों में यह कहना ज्‍यादा बेहतर होगा कि वह बच्‍चे को शिक्षित होने से एक हद तक रोकती है।

इस संदर्भ में कृष्‍णकुमार कहते हैं कि, ‘बाल साहित्‍य की व्‍याप्ति के रास्‍ते में सबसे बड़ी रुकावट हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था का यह चरित्र है कि वह पाठ्यपुस्‍तक केन्द्रित है और पाठ्यपुस्‍तक के इर्द-गिर्द ही सारी शिक्षा व्‍यवस्‍था घूमती है। अध्‍यापक का सारा प्रयास उसके आसपास ही होता है, उसको लेकर ही रहता है। और शिक्षा व्‍यवस्‍था की जो धुरी है वह तो बिलकुल ही पाठ्यपुस्‍तक से चिपकी हुई चलती है। पाठ्यपुस्‍तक स्‍वयं परीक्षा व्‍यवस्‍था से पैदा होने वाले भावों से आवेशित हो उठती है। जो डर परीक्षा के बारे में सोचकर बच्‍चों को लगता है, वही डर शिक्षकों को पाठ्यपुस्‍तकों को देखकर लगने लगता है। क्‍योंकि उनको मालूम होता है कि यह वह चीज है जो मुझे उस समूह से, मेजोरिटी से बात करवाएगी। और वही चीज है जो पढ़ने का मन नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे पढ़नी ही पड़ेगी। पाठ्यपुस्‍तक ऐसा प्रतीक बन गई है कि जिसके सामने दुनिया भर में फैला हुआ अनुभव-जगत, बच्‍चे का ज्ञान,   बच्‍चे को मिलने वाली अपने जीवन की खुराक, उन सबका कोई मायना नहीं रहा। इसके जरिए ही हर चीज का परीक्षण होगा। इसके जरिए ही स्‍कूल चलेंगे, इसकी धुरी पर चलेंगे। और अगर आप सरकार की इन कोशिशों को देखें तो बहुत बड़ी कोशिश यही रहती है कि पाठ्यपुस्‍तक समय पर पहुँच जाए और उसकी पढ़ाई शुरू हो जाए।’
यहाँ यह बात रेखांकित करने की भी आवश्‍यकता है कि पिछले कुछ वर्षों में बच्‍चों को पाठ्यपुस्‍तकों के आतंक से मुक्‍त करने की तो नहीं, पर पाठ्यपुस्‍तकों को ऐसी बनाने की कोशिश जरूर हुई है जो बच्‍चों को कम आतंकित करें। हालाँकि मौजूदा दौर में यह प्रयास कहाँ तक जाएगा, कह नहीं सकते।

तो मूल बात यह है कि हमारा जो पाठक है, वह पाठ्यपुस्‍तक के आतंक से भरा हुआ होता है। इस बात को ठीक से और संवेदनशीलता के साथ समझने की जरूरत है। यहाँ उसके सामने चुनौती होती है कि कुछ और पढ़ना यानी पाठ्यपुस्‍तक से या फिर अपनी स्‍कूली शिक्षा से विमुख होना। लेकिन अगर पाठ्यपुस्‍तकों से इतर साहित्‍य उसे ऐसा कुछ दे रहा हो, जो उसे अपनी नीरस शिक्षा को और रोचक बनाने में भी काम आए तो फिर उसकी रुचि उसमें बढ़ेगी। लेकिन जाहिर है कि उसकी रुचि ऐसा कुछ पढ़ने में कतई नहीं होगी,जो उसे उन्‍हीं तमाम बंदिशों,  उपदेशों, तथाकथित नैतिक मूल्‍यों की और घिसी-पिटी अवधारणाओं की ओर ले जाए, जो वह घर से लेकर स्‍कूल तक में लगातार सुनता और पढ़ता ही रहता है।
मैं यहाँ एक बार फिर कृष्‍णकुमार जी को याद करना चाहूँगा। वे कहते हैं कि, ‘हम सब लोग बाल साहित्‍य के शौकीन हैं, सोचते रहते हैं कि यह क्षेत्र क्‍यों लगातार दिक्‍कत पैदा करता है। मामला सिर्फ 0बाल साहित्‍य का नहीं है, कई और चीजों का भी है। कलाओं का मामला है। स्‍कूल में कलाओं की भी व्‍याप्ति नहीं हो सकी है। पुस्‍तकालय की व्‍याप्ति नहीं हो सकी है। हम बनाते जरूर हैं, इसमें पैसा भी खर्च होता है, लेकिन वह चीज दिखती नहीं है।’
मुझे लगता है इस दिशा में और जगह भी काम हुआ होगा, लेकिन पिछले दो-एक वर्ष से उत्‍तराखंड के स्‍कूलों में इस दिशा में उल्‍लेखनीय प्रयास हुए हैं, जिनके परिणाम भी बेहतर रहे हैं। शिक्षक और कवि Mahesh Punetha और उनके साथियों की पहल से स्‍कूलों में ‘दीवार पत्रिका’ का एक आंदोलन ही खड़ा हो गया है। मेरा मानना है कि इस पहल ने साहित्‍य और बच्‍चों के बीच की जड़ता को तोड़ने का काम किया है। चकमक बाल विज्ञान पत्रिका में सत्रह बरस तक संपादकीय जिम्‍मेदारी निभाने से प्राप्‍त अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि बच्‍चे अपने हमउम्र साथियों का लिखा हुआ पढ़ना कहीं अधिक पसंद करते हैं। यह पसंद उनमें न केवल पढ़ने की, बल्कि अच्‍छा पाठक बनने की आदत को विकसित करती है। वह उनमें अपने को अभिव्‍यक्‍त करने के लिए भी प्रेरित करती है। दीवार पत्रिका शायद उन्‍हें यह मौका दे रही है। जहाँ वे खुद लिखते हैं, पढ़ते हैं, चर्चा करते हैं, समीक्षा करते हैं। वास्‍तव में यह प्रक्रिया उनमें एक पाठक के साथ एक लेखक के संस्‍कार भी रोप रही है। बच्‍चे की समझ के बारे में कई और बातें कही जा सकती हैं।

पर मैं यहाँ केवल वह कहूँगा, जो प्‍लेटो ने लगभग दो हजार साल पहले कहा था कि, ‘बच्‍चा दरअसल बड़ों के बीच एक विदेशी की तरह होता है। जैसे किसी विदेशी से जिसकी भाषा आपको न आती हो जब आप बात करते हैं तो आपको मालूम होता है कि मेरी कई बातें वो ठीक समझेगा, कई नहीं समझेगा या गलत समझ जाएगा। और जब वह बोलता है, अपनी भाषा में बोलता है और हमको उसकी भाषा नहीं आती तो हम उसकी पूरी बात नहीं समझ पाते। कुछ समझते हैं, कुछ नहीं समझते हैं, और इस तरीके से जो आदान-प्रदान होता है वह आधा-अधूरा होता है।’ हमें बच्‍चे को भी इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखकर देखना और समझना चाहिए।
अब हम दूसरे स्‍टेकहोल्‍डर की बात करें। वे हैं साहित्‍य के वाहक यानी बच्‍चों के अभिभावक या फिर स्‍कूल। थोड़ी देर पहले हमने पाठ्यपुस्‍तकों की चर्चा के बहाने अपरोक्ष रूप से स्‍कूल की बात कर ही ली है। स्‍कूल की अपनी सीमाएँ और मजबूरियाँ हैं। उन पर और भी चर्चा हो सकती है।

अब यहाँ अभिभावक की बात करें। सीधे-सीधे साहित्‍य यानी किताबों तक बच्‍चों की पहुँच न के बराबर होती है। यानी एक तरह से किताब या साहित्‍य का चुनाव अभिभावक या फिर स्‍कूल के शिक्षक कर रहे होते हैं। मेरा अब तक अपना अनुभव यह कहता है कि अमूमन अभिभावक वह चुनते हैं जो उन्‍हें अच्‍छा लगता है, न कि बच्‍चे को। अभिभावक वह चुनते हैं जो उनके अपने संस्‍कार, मूल्‍य और विश्‍वासों को बल देता है, उनकी कसौटी पर खरा उतरता है। आमतौर पर ऐसा साहित्‍य जो बच्‍चों को कुछ नया करने, नया सोचने, सवाल उठाने या लीक से हटकर सोचने के लिए प्रेरित करे, मौका दे उसे अभिभावक पसंद नहीं करते। उन्‍हें लगता है उनके बच्‍चे उसे पढ़कर बिगड़ जाएँगे। बाल साहित्‍य की महत्‍ता, उसकी जरूरत और प्रासंगिकता पर अभिभावकों के बीच काम करने, उनकी संवदेनशीलता बढ़ाए जाने की जरूरत है। जैसे हम कहते हैं कि बच्‍चे की पहली पाठशाला घर है, तो उसी तर्ज पर बच्‍चे का दूसरा घर पाठशाला है। इस नाते में यहाँ शिक्षकों को भी इसमें शामिल करना चाहूँगा। अंतत: वे भी अभिभावक ही हैं।

उधर स्‍कूल में भी पुस्‍तकालय के माध्‍यम से जो बच्‍चों तक पहुँचता है, वह भी एक खास ढर्रे का साहित्‍य होता है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कुछ काम नहीं हुआ है। पिछले सालों में एनसीईआरटी में ही कृष्‍णकुमार जी के निर्देशन में अच्‍छे बाल साहित्‍य के लिए एक सेल गठित किया गया था। जिसने बहुत मेहनत के बाद अच्‍छी किताबों की एक सूची जारी की थी। विभिन्‍न राज्‍यों में स्‍कूलों में उसके अनुरूप उन किताबों की खरीद भी हुई, वे पुस्‍तकालयों में पहुँची भी। तमाम स्‍कूलों में उनका उपयोग हो भी रहा है, हो भी रहा होगा। लेकिन जितना हुआ है, वह नाकाफी है। उस पर ध्‍यान देने की जरूरत है। इसे भी हमें एक चुनौती के रूप में सामने रख सकते हैं। जो सकारात्‍मक अनुभव हमें विभिन्‍न जगहों से प्राप्‍त होते हैं, सफलता की कहानियाँ सुनाई देती हैं, उन्‍हें केवल प्रसारित करने की नहीं, बल्कि व्‍यावहारिक रूप में दुहराने की आवश्‍यकता है।

आइए, अब तीसरे स्‍टेकहोल्‍डर यानी लेखक की बात करें। एक बार फिर चकमक के अपने अनुभव से ही यह कहना चाहूँगा कि ऐसे लोगों की संख्‍या अच्‍छी खासी है जो यह मानते हैं कि बच्‍चों के लिए लिखना तो उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। फेसबुक जैसे माध्‍यम ने इस संख्‍या में केवल बाल साहित्‍य ही नहीं, अन्‍य क्षेत्रों में भी ऐसे लिक्‍खाड़ों की संख्‍या में इजाफा किया है। वास्‍तव में ऐसा है नहीं। जैसा कि मैंने आरंभ में कहा, अगर उसे दोहराऊँ कि गुलज़ार साब के शब्‍दों में अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसे पढ़ते हुए बच्‍चे से लेकर वयस्‍क तक आनंद महसूस करें। तो ऐसा साहित्‍य लिखने के लिए केवल बाएँ या दाएँ हाथ से काम नहीं चलेगा। अपने कान, अपनी आँखें, अपना दिमाग, अपनी समझ, अपनी सोच और अपना हृदय भी खुला रखना पड़ेगा।

इस संदर्भ में बाल साहित्‍य पर ऐसे आयोजन में पहली भागीदारी की एक याद मेरे मस्तिष्‍क में अब तक बसी हुई है। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है यह 1987 की बात है। जाने-माने लेखक और पत्रकार मस्‍तराम कपूर जी ने ‘अखिल भारतीय जुवेनाइल लिटरेचर फोरम’ के बैनर तले बाल साहित्‍य पर चर्चा का एक आयोजन दिल्‍ली में किया था। मैं चकमक की ओर से इसमें भाग लेने पहुँचा था। तब चकमक आरम्‍भ हुए मात्र दो साल ही हुए थे। आयोजन में निरंकार देव सेवक, डॉ. श्री प्रसाद और डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे जैसे दिग्‍गज मौजूद थे। देवसरे जी उन दिनों पराग का संपादन कर रहे थे। देवसरे जी ने अपने संबोधन में एक महत्‍वपूर्ण बात कही। उन्‍होंने कहा कि बच्‍चों को गौतम-गॉंधी बनने का उपदेश, सदा सच बोलो, मेरा देश महान, देश की राह में प्राणों की दो आहुति, मैं मातृभूमि पर कुर्बान जैसे जुमलों ही नहीं, उसकी अवधारणा से बाहर निकलने की भी जरूरत है। बहुत हुआ। एक समय था जब सच में हमको इन सब जुमलों और इस अवधारणा की जरूरत थी। लेकिन अब उससे कहीं आगे बढ़ना है।’
खैर, मेरे लिए तो उनकी यह बात लाइटहाउस के समान थी, जिसका पालन मैंने चकमक में किया। पर लगभग तीस-पैंतीस साल बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि अपने लेखन में इस तरह के जुमलों और अवधारणाओं का उपयोग करने वालों की संख्‍या में कमी नहीं आई है। या कहूँ कि इन्‍हें दरकिनार करके बेहतर सकारात्‍मक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण साहित्‍य रचने वालों की संख्‍या में पर्याप्‍त इजाफा नहीं हुआ है। मेरा मत है कि इसमें केवल इस तरह का लेखन करने वालों की ही कमजोरी नहीं है, उसे छापने वाले भी बराबरी के जिम्‍मेदार हैं। तमाम लघु बाल पत्रिकाएँ निकल रही हैं, अखबारों में रचनाओं को जगह दी जा रही है। लेकिन क्‍या उनमें व्‍यक्‍त किए जा रहे विचारों, मूल्‍यों और अवधारणाओं पर पर्याप्‍त विमर्श किया जा रहा है। यह मेरे लिए एक सवाल है। क्षमा करें, पर बच्‍चों के लिए लिखी गई ऐसी दस कविताओं में से मुझे कोई एक या दो ही उपयोगी लगती हैं। यही हाल कथा साहित्‍य का है। तो चुनौती लेखक की अपनी क्षमतावृद्धि की भी है। केवल लिखना ही नहीं, उसे पढ़ना भी होगा। और पढ़ने से आशय केवल बाल साहित्‍य से नहीं है, हर तरह के साहित्‍य से है।

मैं दो और बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा।
पहली बात, मेरा मानना है कि लेखक की अपनी एक राजनीतिक समझ भी होनी चाहिए, तभी वह अपने लेखन के साथ न्‍याय कर सकता है। असल में हम जिन मुद्दों पर लेखन में कमी देखते हैं, दरअसल वह अपरिपक्‍व या अधकचरी राजनीतिक समझ के कारण ही उपजती है। यहाँ राजनीतिक समझ का मतलब ‘पार्टी राजनीति’ नहीं है। लेखक को जाति, जेंडर, समानता, धर्म,  संप्रदाय, राष्‍ट्र, गरीब होने का अर्थ, आर्थिक गैरबराबरी आदि अवधारणाओं पर अपनी एक सुचिंतित समझ बनाने की जरूरत है।

दूसरी बात, साहित्‍य की तमाम छोटी-बड़ी पत्रिकाएँ निकलती हैं, उनमें से कई आला दर्जे की हैं, लेकिन उनमें भी बाल साहित्‍य को लेकर कोई चर्चा नहीं होती। कोई लेख नहीं छपते। बच्‍चों की किताबों की कोई समीक्षा नहीं होती। कायदे से जो लोग बच्‍चों के लिए नहीं लिख रहे हैं, उन्‍हें कम से कम बच्‍चों के लिए लिखे जा रहे समकालीन साहित्‍य पर अपनी टिप्‍पणी तो करनी ही चाहिए। क्‍योंकि उनकी पत्रिकाओं के लिए भी कल के पाठक आज के बच्‍चे ही होंगे। अगर उन्‍हें अच्‍छा साहित्‍य पढ़ने को नहीं मिलेगा, तो वे कल इन पत्रिकाओं तक भी नहीं पहुँचेगे। दूसरी तरफ अगर हमें हमारे बाल साहित्‍य को अधिक सार्थक और ऊर्जावान बनाना है तो इस दिशा में प्रयास करने होंगे, साहित्यिक पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। वहाँ बाल साहित्‍य पर विमर्श बढ़ाना होगा।

कुत्ते (केनिस फेमिलिएरिस) की दुम टेढ़ी क्यों : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

आपने देवेंद्र मेवाड़ी जी की वि‍ज्ञान वि‍षयों पर लेख, कहानी, संस्‍मरण, कवि‍ता, यात्रावृत्तांत आदि‍ वि‍धाओं पर लि‍खी रचनाएं तो बहुत पढ़ी होंगी। अब पढ़ि‍ए उनका लि‍खा बेहद रोचक व्यंग्य-   

पिछली बार ट्रेन से सफर करते हुए मेरे सहयात्री किसी स्टेशन पर सुबह के धुंधलके में उस समय उतर गए थे, जब मैं नींद के सुखद झौंकों में झूल रहा था। उन्होंने मुझे झंझोड़ा था और उनींदी आंखों से मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों में मेरी दाईं हथेली दबाए कह रहे थे- इतने बढ़िया साथ के लिए धन्यवाद। फिर वे उतर गए, मगर बाद में आंख खुली तो पाया रात भर अपने महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्यों के बारे में बताते हुए उस मेधावी वैज्ञानिक ने शोध पत्रों की जो फाइल मुझे दिखाई थी, वह उसे सीट पर ही भूल गए हैं। लेकिन, अब क्या हो सकता था? नाम-पते के लिए सारी फाइल टटोल डाली लेकिन लगता है, शोध पत्र लिखने-लिखवाने में वे इतना व्यस्त रहे होंगे कि नाम-पता लिखना भूल गए अथवा वरिष्ठता क्रम में बाद में लिखने का निश्चय किया होगा कि क्या पता शोधपत्र प्रकाशनार्थ भेजते समय तक कौन नाम जोड़ना-छोड़ना पड़े। और, जो नाम जल्दी में उन्होंने मुझे बताया था वह कुछ इतना नया और अपरिचित-सा था कि मेरे मस्तिष्क से ही निकल गया है।

लेकिन, उस मेधावी और कुछ कर गुजरने की उद्दाम इच्छा वाले वैज्ञानिक की महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दस्तावेज यह फाइल तो है। उसी में से एक शोधपत्र प्रस्तुत कर रहा हूं। संयोगवश यदि मेरे सहयात्री उन वैज्ञानिक महोदय की दृष्टि इस शोधपत्र पर पड़े तो उनसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि अविलंब पत्र-व्यवहार करें तथा इस महत्वपूर्ण शोधपत्र पर अपने हक की घोषणा करें ताकि इस खोज का श्रेय कोई अन्य व्यक्ति बिना मेहनत किए ही न लूट ले। इसी आशय के साथ उनकी फाइल से निकालकर फिलहाल यह एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया जा रहा है। इससे उनकी मेधा और वैज्ञानिक अनुसंधान के अथक प्रयास का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। – लेखक

 भूमिका

कुत्ता अर्थात् केनिस फेमिलिएरिस रीढ़धारी, स्तनपोषी पशु है। आम बोलचाल में इसे ‘कुक्कुर’ या ‘श्वान’ भी कहा जाता है। यह मांसाहारी कुल और ‘कैनिडी’ परिवार का सदस्य है। अब तक प्रकाशित साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया में इस पशु की लगभग 37 जातियां पाई जाती हैं, लेकिन श्वान प्रजनकों द्वारा व्यापक संकरण करके इनकी अनेक नस्लें तैयार करने में सफलता प्राप्त की गई है (फेयरचाइल्ड, 1921, स्मिथ, 1933)। यही कारण है कि आज नन्हें मोंगरेल और चाऊ से लेकर खूंखार ग्रेहाउंड और टैरियर तक सैकड़ों प्रकार के श्वान हमारे आसपास दिखाई देते हैं।

इनके आकार और रूप-रंग में भारी विभिन्नता पाई जाती है। आकार में कोई छोटा (एडवर्ड, 1913) तो कोई बहुत बड़ा (नेल्सन, 1915) होता है। एंडर्सन (1917) के अनुसार कई कुत्ते झबरीले होते हैं लेकिन इमर्सन इत्यादि (1914,17,21) ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि उनके द्वारा जांचे गए 155 में से 137 कुत्तों के शरीर पर 5 से.मी. से बड़े बाल नहीं थे। इससे साफ पता चलता है कि अधिकांश कुत्तों के शरीर पर छोटे-छोटे बाल होते हैं। लेकिन, स्मिथ (1705) का कहना है कि इनके शरीर पर लंबे बाल होते हैं। इनकी आंखें, कान और घ्राणशक्ति बहुत तेज होती है (मिलर, 1918) और ये गंध के आधार पर आखेट करते हैं (पावेल, 1941)। इनकी टांगें लंबी, पतली और पूंछ प्रायः झबरीली होती है (वाकर, 1891)। चोपड़ा (1946), प्रियर्सन (1975) तथा विक्टर (1976) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में 150 में से 104 कुत्तों की पूंछें झबरीली नहीं पाई गईं जिससे यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि अधिकांश कुत्तों की पूंछ पर बाल छोटे होते हैं।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन और अनेक प्राणिशास्त्रियों के साथ निजी पत्र व्यवहार (अप्रकाशित) से पता चला है कि कुत्ता चाहे किसी देश, जाति, नस्ल या रंग-रूप का हो, पूंछ उसकी टेढ़ी ही होती है। यह सार्वभौम सत्य है। लेकिन, लेखकों को आश्चर्य है कि इस दिशा में अब तक नगण्य कार्य किया गया है। आज तक वैज्ञानिकों का ध्यान इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर आकर्षित न हो सका कि कुत्ते की दुम (पूंछ) टेढ़ी ही क्यों होती है। इस धारणा पर कि ‘कुत्ते की दुम बारह वर्ष तक नली में रखने के बाद भी टेढ़ी ही रहती है’ अब तक कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं किया गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी सत्यता प्रमाणित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। सामान्यजन से जुड़े इस प्रश्न के समाधान के लिए लेखकों ने पहली बार प्रयास किया है और अपने परीक्षण के परिणाम इस शोधपत्र में प्रस्तुत किए हैं। इस 12 वर्षीय विशिष्ट अनुसंधान योजना के लिए लेखकों को राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद से कुल 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जिससे आवश्यक उपकरणों और विभिन्न साधनों के अतिरिक्त एक वरिष्ठ तथा एक कनिष्ठ अनुसंधान अधिकारी, दो वरिष्ठ तथा तीन कनिष्ठ तकनीकी सहायकों, एक प्रयोगशाला सहायक, एक पत्रवाहक, एक ड्राइवर तथा चार एनिमल अटेंडेंटों की व्यवस्था की गई।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि आदमी ने कम से कम 10 हजार वर्ष पहले केनिस फेमिलिएरिस को पालना शुरू किया था। कहा जाता है, कभी मानव भेड़िए के बच्चे पकड़ कर अपनी गुफा में लाया था जो उसके साथ हिल-मिल गए और शिकार के साथी बन गए। बाद में यह प्राणी लगातार स्वामिभक्त बनता गया। (खूंखार भेड़ियों से खून का रिश्ता होने के बावजूद इसमें इतनी स्वामिभक्ति किस ‘जीन’ के कारण और कब आई, यह श्वान प्रजनकों के लिए पृथक शोध का महत्वपूर्ण विषय है।) लेकिन, अब तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि क्या कुत्तों के मूल जनकों की पूंछें भी टेढ़ी थीं अथवा नहीं। गुफाचित्रों में अब तक हिरन, रेंडियर और सांडों की ही अनुकृतियां देखी गई हैं। कुछ देशों में कुत्तों की जो प्राचीन मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं, उनसे भी इस बारे में कुछ पता नहीं चलता क्योंकि पूंछ बहुत छोटी बनाई गई है।

प्राचीन साहित्य का अवलोकन करने पर लेखकों को इस तथ्य का पता लगा है कि धर्मग्रंथ ‘महाभारता’ में एक ऐसे कुत्ते का उल्लेख किया गया है जो ‘युधिष्ठिर’ नामक व्यक्ति के साथ हिमालय की चोटियों में चढ़ा था और उसके बिना ‘युधिष्ठिर’ ने स्वर्ग जाने से इंकार कर दिया था (ब्राउन, 1814, हम्फ्री, 1880), लेकिन उसकी पूंछ के स्वरूप के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसी प्रकार एक और रिलीजियस बुक ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने नवयुवकों, इंद्र और कुत्तों में एक समानता बताई है। लेकिन, इंद्र और नवयुवकों में किसी की भी दुम नहीं होती है (ब्राउन, 1809, प्रूथी 1813),, जिसे वे हिला सकें या जो टेढ़ी हो। इसलिए लेखक इस मत से सहमत नहीं हैं। उधर प्राचीन रोम में रीबिगल देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते की बलि दी जाती थी, ऐसा पता लगा है (डेविडसन, 1923)।

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में इस प्राणी पर किए गए अनगिनत प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। 60 वर्षीय ब्राउन-सेक्वार्ड (1889) ने इसके महत्व का उल्लेख किया। उसने इसके वृषणों के सत की सुई लगाकर पुनर्योवन पाने की घोषणा की थी। प्रो. नोनिन, मिंकोवस्की और मेरिंग (1889) ने इसकी पाचनक्रिया पर प्रयोग किए, मगर बरामदे में एक प्रयोगाधीन श्वान के मूत्र पर भिनभिनाती मक्खियां देखकर उसमें चीनी का पता लगा डाला। मगर केनिस फेमिलिएरिस पर सर्वाधिक प्रयोग रूसी शरीर-क्रिया विज्ञानी इवान पैत्रोविच पावलोव (1872-1888) ने किए। पावलोव (1888) ने अपने प्रारंभिक परीक्षण इसकी पाचन प्रणाली पर केंद्रित किए। उसने कुत्ते की आंत से एक नली जोड़ दी और उसके सामने मांस दिखा कर पाचनतंत्र में पैदा होने और नली के जरिए बूंद-बूंद टपकते पाचक रसों का पता लगाया। उसने यह भी सिद्ध किया कि खाने की घंटी बजने या खाना परोसने वाले की मात्र पदचाप से भी कुत्ते के पेट में पाचक रस पैदा होने लगते हैं। (पावलोव, 1902)।

इस विशिष्ट प्रयोग में न केवल कुत्ते वरन मानव की पाचन क्रिया पर तो प्रकाश पड़ा, लेकिन पूंछ पर प्रकाश डालने में ये वैज्ञानिक भी असमर्थ रहे। यह बात अलग है कि पाचन पर किए गए प्रयोगों के लिए पावलोव को सन् 1904 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। रूस में ही एक कुत्ते पर दो सिर जोड़ने के सफल प्रयोग भी किए गए। कनाड़ा में बैंटिंग तथा बैस्ट (1920) ने केनिस फेमिलिएरिस की पेंक्रिएज नामक ग्रंथि पर कार्य करके इंसुलिन की खोज की, जिससे डायबिटीज के मूल कारण का रहस्योद्घाटन हो सका। इस खोज के लिए उन्हें सन् 1923 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बावजूद पूंछ के वक्र होने के कारण अंधकार में ही पड़े रहे।

इसके बाद अंतरिक्ष संबंधी प्रयोगों में इस प्राणी का उपयोग किया गया। अनेक कुत्तों पर भारहीनता, गुरुत्वाकर्षण आदि के प्रभावों का गहन अध्ययन किया गया। लाइका नामक एक कुतिया को स्पुतनिक-2 नामक उपग्रह में 3 नवंबर 1957 को प्रथम बार अंतरिक्ष में भेजा गया। लेखकों को आश्चर्य है कि केनिस फेमिलिएरिस पर इतना अनुसंधान होने के बावजूद इसकी पूंछ का प्रश्न फिर भी अछूता ही रहा।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन से केवल एक संदर्भ का पता चलता है, जिसमें इस प्राणी की पूंछ पर ध्यान देने का प्रयास किया गया है। ज़ार के जमाने में रूस के चेलम नामक स्थान में (जो हमारे देश के शिकारपुर की तरह विख्यात है) लेयाक बिन लेकीश नामक एक दार्शनिक थे। उनसे यह पूछने पर कि कुत्ता अपनी दुम क्यों हिलाता है, जवाब मिला- क्योंकि उसका शरीर दुम की तुलना में अधिक ताकतवर है। अगर ऐसा नहीं होता तो जरूर दुम कुत्ते को हिलाती।

लेकिन, दुम टेढ़ी होने की समस्या यहां भी अछूती रह गई। इसीलिए लेखकों को आम आदमी की जिज्ञासा के विशेष संदर्भ में इस सार्वभौम समस्या पर विश्व में पहली बार अनुसंधान करने का श्रेय प्राप्त है।

सामग्री एवं विधि

इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया गयाः

कुत्ते के पिल्ले 40 (देशी 15, अलसेशियन 5, स्पेनियल 5, टैरियर 5, ग्रेटडेन 5, बुलडाग 5 ), लोहे की जंजीरें 40, प्लेटें 40, जलपात्र 40, चिलमचियां 40, बांस की नलियां 15, तांबे की नलियां 5, स्टील की नलियां 10, वर्नियर कैलिपर्स 5, एक किलो तक के विभिन्न बांट, पैमाने 10, एप्रन 10, रिकार्ड बुक, लेखन सामग्री आदि। इसके अतिरिक्त 40 पैराम्बुलेटर भी खरीदे गए। उनका उपयोग पिल्लों के लिए किया गया क्योंकि पिल्ले बड़े होने तक नलियों को संभालने में असमर्थ थे। अतः पैराम्बुलेटरों में उचित व्यवस्था की गई। कुत्तों को मौसम के कुप्रभावों से बचाने के लिए एक वातानुकूलित प्रयोगशाला का निर्माण किया गया। व्यय में यथासंभव कमी करने के लिए प्रयोगशाला के ही कुछ कमरों का वैज्ञानिकों एवं अन्य कर्मचारियों के बैठने हेतु उपयोग कर लिया गया, जिससे पृथक कार्यालय का भारी खर्चा बचाया जा सके।

प्रयोग के आरंभ में ही पिल्लों को 6 समूहों में बांट दिया गया जो इस प्रकार हैं-

10 पिल्लों की दुम में बांस की नली,

10 पिल्लों की दुम में स्टील की नली,

5 पिल्लों की दुम में तांबे की नली

5 पिल्लों की दुम में आवश्यक वजन लटकाया

5 पिल्लों का पुच्छ विच्छेदन, तथा

5 पिल्ले तुलना के लिए सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए।

पिल्लों की पूंछ में नलियां पहना दी गईं। उन्हें पैराम्‍बुलैटरों में घुमाया गया और आवश्यकता पड़ने पर नलियों को हाथ से सहारा देकर कमरों में घूमने-फिरने की सुविधा भी प्रदान की गई। पूंछविहीन अवस्था का अध्ययन करने के लिए 5 पिल्लों की पूंछें काट दी गईं। नली के बजाय पूंछ सीधी करने के लिए आवश्यक भार के मीट्रिक बांट लटकाए गए। पांच पिल्ले बिल्कुल सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए। सभी पिल्लों को दिन में दो बार दूध, चपाती व मांस और तीन बार पानी दिया जाता रहा। उनके स्वास्थ की नियमित रूप से जांच की जाती रही और प्रतिदिन शरीर का तापमान, रक्तदाब, नाड़ी हृदय की धड़कनों तथा सांस लेने की गति और त्वचा की संवेदनशीलता के आंकड़ें रिकार्ड किए जाते रहे। एक बार मांस और दो बार दूध में किसी खराबी के कारण कुत्ते बीमार पड़ गए थे, जिन्हें उचित देखभाल से ठीक कर लिया गया। लेकिन, आश्चर्य इस बात का है कि कुत्तों के साथ ही प्रयोगशाला के सभी कर्मचारी भी बीमार पड़ गए थे। इस संबंध में बाद में काफी सावधानी बरती गई।

परिणाम

12 वर्ष की अवधि पूरी होने तक केवल 11 कुत्ते जीवित रहे। 29 में से 10 कुत्ते पेचिस, 5 कुत्ते रेबीज और 14 कुत्ते अज्ञात कारणों से मर गए (हो सकता है यह कुत्तों का कोई अज्ञात मगर महत्वपूर्ण रोग हो, इस पर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है)। 11 जीवित कुत्तों में से 2 बांस की नली वाले, 2 स्टील की नली वाले, 2 तांबे की नली वाले, 1 वजन वाला, 2 दुमकटे और 2 सामान्य रूप से बढ़े हुए कुत्ते थे।

12 वर्षों की अवधि में इनका रक्तचाप, हृदय की धड़कनें, सांस और नाड़ी की गति कभी सामान्य और कुछ अवसरों जैसे छेड़ने, मांस देखने या एक-दूसरे पर झपटने में असामान्य रही। पुच्छ- विच्छेदन के समय दिल की धड़कनें बहुत तेज हो गईं।

ठीक 12 वर्ष बाद 6 कुत्तों की पूछें नलियों में से बाहर निकालने पर कुत्तों के आकार के अनुसार उनकी मोटाई और लंबाई में पर्याप्त वृद्धि पाई गई और नली के बाहर निकलते ही पूंछें सामान्य रूप से टेढ़ी हो गईं। इसके साथ ही प्रयोगाधीन कुत्तों का व्यवहार भी सामान्य पाया गया क्योंकि शोधकर्त्ताओं को देखते ही वे सामान्य रूप से अपनी दुमें हिलाने लगे।

निष्कर्ष

उक्त 12 वर्षीय प्रयोग के परिणामों का विश्लेषण करने से सिद्ध होता है कि केनिस फेमिलियेरिस अर्थात् कुत्ते की पूंछ को 12 वर्ष तक नली में रखने पर भी (भले ही नली बांस की हो अथवा धातु की) वह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है।

आभार

इस महत्वपूर्ण  अनुसंधान योजना को स्वीकृत कर आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए लेखक राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के प्रति अत्यंत आभार प्रकट करते हैं। इस दीर्घकालीन प्रयोग के मार्गदर्शन तथा साहस बढ़ाने के लिए तथा विभिन्न देशों के कुत्तों का अध्ययन करने के लिए विदेश यात्रा की स्वीकृति देने हेतु हम अपने राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान के निदेशक महोदय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। विभागीय तथा अनुभागीय स्तर पर कार्य की सुविधा प्रदान करने के लिए हम विभागाध्यक्ष तथा अनुभागाध्यक्ष महोदय के आभारी हैं। हमारे विभागीय सहयोगियों के बहुमूल्य सहयोग के बिना यह कार्य हो ही नहीं सकता था। और, इस अनुसंधान आलेख की पांडुलिपि को फेयर तथा टाइप करने में अपनी गृहणियों से मिले अमूल्य सहयोग (घर के सभी कार्यों के अतिरिक्त!) के लिए हम व्यक्तिगत स्तर पर आभार प्रकट करते हैं।

भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

अल्मोड़ा : ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ और ‘पहरू’ पत्रिका ने संयुक्त रूप से 12, 13, व 14 नवम्बर को आठवाँ ‘राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मलेन’ जिला पंचायत सभागार, अल्मोड़ा में आयोजि‍त कि‍या। इसमें दिल्ली, लखनऊ, संभल, सहारनपुर, चंदौसी, फरीदाबाद, देहरादून और कुमाऊँ मंडल के सभी जिलों से आए हुए लगभग 160 कुमाउनी के साहित्यकारों और कुमाउनी भाषा प्रेमियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में कहानी, कविता, गीत, लेख, हास्य, रिपोर्ताज, शब्दचित्र आदि विधाओं की कुल 10 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

इस बार देवकी महरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार, खुशाल सिंह खनी को बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार, त्रिभुवन गिरि को शेर सिंह मेहता स्मृति कुमाउनी उपन्यास लेखन पुरस्कार तथा त्रिभुवन गिरि, श्याम सिंह कुटौला व पवनेश ठकुराठी को प्रेमा पंत स्मृति कुमाउनी खण्ड काव्य लेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा में हर विधा में साहित्य तैयार करने के लिए कुमाउनी भाषा प्रेमियों द्वारा दी गई आर्थिक मदद से चलाई जा रही लेखन पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत इस वर्ष 21 रचनाकारों की कृतियों को पुरस्कृत किया गया।

सम्मेलन में हर वर्ष कुछ बुजुर्ग रचनाकारों को ‘कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान’, कुछ भाषा प्रेमियों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा कुछ संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी नौ लोगों को कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान, पांच लोगों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा चार संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

ज्ञातव्‍य है कि‍ 13, 14, व 15 नवम्बर 2009 को अल्मोड़ा के कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागार में पहला तीन दिवसीय ‘कुमाउनी भाषा सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। तब से अब तक हुए सम्मेलनों में नि‍म्‍न प्रस्ताव पारित किए गए हैं- 1. कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

  1. उत्तराखण्ड में स्कूली पाठ्यक्रम में कुमाउनी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल किया जाए
  2. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड में ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ गठित की जाए
  3. अल्मोड़ा नगर के सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी स्वरूप को देखते हुए ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ का मुख्यालय अल्मोड़ा में बनाया जाए
  4. उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कुमाउनी भाषा के आदि कवि गुमानी पंत जी की याद में कुमाउनी भाषा रचनाकारों के लिए समग्र योगदान पर एक लाख रुपये के सालाना पुरस्कार की घोषणा की जाए
  5. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष 2009 से आज तक के सालाना पुरस्कारों की एकमुश्त घोषणा की जाए
  6. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पांच करोड़ धनराशि का एक कोष बनाया जाए। इसमें से रचनाकारों को पुरस्कृत-सम्मानित करने की योजना बनाई जाए
  7. कुमाउनी भाषा के रचनाकारों को किताब छपवाने के लिए अनुदान दिया जाए
  8. कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा द्वारा कसारदेवी में प्रस्तावित ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ के सभागार, पुस्तकालय आदि निर्माण हेतु शासन स्तर से अनुदान दिया जाए
  9. कुमाउनी भाषा के तीन बुजुर्ग और नामी कवियों शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, चारुचन्द्र पाण्डे व वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा सम्मान योजना में इसी बार ‘गुमानी पंत सम्मान’ या उससे भी बड़े सम्मान से सम्मानित किया जाए
  10. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा कुमाउनी रचनाकारों को दिए जाने वाले सम्मानों में कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकारों गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व बालम सिंह जनौटी के नाम पर सम्मान का नाम रखा जाए
  11. अगले वर्ष सन् 2012 से समिति द्वारा कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण कहानीकार स्व. बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार दिया जाएगा
  12. उत्तराखण्ड सरकार के उपक्रम ‘ उत्तराखण्ड हिन्दी अकादमी’ व ‘उत्तराखण्ड भाषा संस्थान’ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, निदेशक मंडल (कार्यकारिणी) में साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  13. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा हर साल कुमाउनी साहित्यकारों को पुरस्कार/सम्मान और किताब छापने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। पुरस्कार/सम्मान तथा पुस्तक प्रकाशन सहायता के लिए अलग-अलग चयन समितियों का गठन किया जाए और इन चयन समितियों में कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  14. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में वर्तमान में मात्र दस-पंद्रह हजार रुपये स्वीकृत किए जा रहे हैं, जो कि बहुत कम हैं। इतनी कम धनराशि में पुस्तक प्रकाशन संभव नहीं हैं। अतः पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में कम से कम पच्चीस हजार रुपये की धनराशि का प्रावधान किया जाए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आधार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जाने-माने इतिहासकार ताराचन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि कुमाउनी भाषा तभी बच सकती है, जब यहाँ के बच्चे, युवा और आम जन इसका प्रयोग निरन्तर दैनिक बोलचाल में करेंगे। यदि इसे हमारी नई पीढ़ी उपयोग में नहीं लाती है तो फिर इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग की भी कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी। अतः अपनी भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए हमें सरकारों की ओर देखते रहने के बजाए स्वयं अधिक से अधिक प्रयत्न करने चाहिए। हमें सालभर विद्यार्थियों के बीच जाकर जगह-जगह अनेक ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए, जिससे उनमें कुमाउनी भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हो। फिर बच्चों को साल में एक बार होने वाले इस तरह के बड़े सम्मेलन में अवश्य बुलाया जाना चाहिए। भविष्य में हमारे सम्मेलनों में नई पीढ़ी की अधिकाधिक उपस्थिति बेहद जरूरी है।

डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का कहना था कि भाषा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हमारी भाषा ही नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी। आज जब उत्तराखण्ड राज्य बने सोलह साल बीत चुके हैं, तो यह अत्यंत शोचनीय स्थिति है कि हम आज भी अपने ही राज्य में अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। पिछले इन सोलह सालों में हमारी कोई पहचान ही नहीं बन पाई है। उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी कि हमारा अस्तित्व बचा रहे और हमारी पहचान बनी रहे। कुछ विधायक, सांसद व मंत्री बना दिए जाने मात्र से हमारी पहचान नहीं बन सकती। हमारी पहचान तभी बनेगी, जब यहाँ के निवासियों की जिन्दगी और यहाँ की प्रकृति बची रहेगी तथा सामान्य जन को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान उपलब्ध होंगे। आज जब हमारे जीवन की सारी चीजों को राजनीति ही तय कर रही है तो ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट करने और आम जनता की घोर उपेक्षा करने वाली राजनीति पर सवाल उठाने के साथ-साथ जनहित की राजनीति को स्थापित करना भी बहुत जरूरी है।

उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि केवल ढेरों रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करते चले जाने से कोई विशेष बात नहीं बनती है। असली सवाल रचनाओं की दृष्टिसम्पन्नता और उत्कृष्टता का है। यदि हमारे द्वारा लिखी जा रही रचनाओं में बहुसंख्यक जनता के जीवन से जुड़े यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति न हो पाए तो लोग ऐसे साहित्य को पढ़ेंगे भी नहीं। अतः आज ऐसा साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान जीवन की प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान की सही समझ विकसित करने के साथ ही पाठक में एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा भी जगा सके।

पी.सी. तिवारी ने कहा कि समाज को दिशा तो अन्ततः राजनीति ही देती है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कितनी जमीन हमसे छिन गई, हमें इसके बारे में भी बात करनी पड़ेगी। अपनी कृषि भूमि, अपनी जमीन बचाने की बात मुख्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकारों द्वारा उद्योगपतियों व पूँजीपतियों को जिस तरह यहाँ की जमीन को कौड़ी के भाव दे दिए जाने का सिलसिला जारी है, क्या इससे हमारा सरोकार नहीं होना चाहिए। अपनी बोली-भाषा बचाने के लिए अपना परिवेश बचाना चाहिए, अपनी जमीन बचानी चाहिए, क्योंकि हमारा परिवेश बचेगा तो हमारी भाषा भी बचेगी। अतः भाषा के संकट पर सोचते हुए इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए। जब तक हम गाँवों को अधिकार नहीं देंगे, विकेन्द्रित व्यवस्था नहीं बनाएंगे, तक तक मुकम्मल तौर पर भाषा के संकट को भी हल नहीं किया जा सकता।

सम्‍मेलन में यह भी एक महत्वपूर्ण बात रही कि सरकारों द्वारा कुमाउनी भाषा के विकास और इसके रचनाकारों की माँगों के संदर्भ में अपेक्षित सहयोग न किए जाने से नाराज होकर, ताराचन्द्र त्रिपाठी जी के सुझाव पर, सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने समिति द्वारा कसारदेवी में निर्मित किए जा रहे ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ हेतु लगभग दो लाख रुप जमा किए जाने की घोषणा की।

ज्ञातव्य है कि‍  ‘जब भाषा बचेगी, आगे बढ़ेगी तभी हमारी संस्कृति भी बचेगी, वह भी आगे बढ़ेगी’ इसी सोच के तहत संस्कृति को बचाने के लिए भाषा को बचाना जरूरी समझते हुए सन् 2004 में ‘कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा के नाम से संस्था का गठन कराया गया था। फिर भाषा के विकास के लिए उसे बोलना, उसमें लिखना-पढ़ना जरूरी समझते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल बनाने के लिए तथा कुमाउनी भाषा में साहित्य की हर विधा में लेखन को बढ़ावा देने के लिए नवम्बर, 2008 से कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ का प्रकाशन शुरू किया गया। तब से यह पत्रिका लगातार नियमित रूप से निकल रही है और अक्टूबर 2016 तक इसके 96 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें 600 कुमाउनी रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और वर्तमान में लगभग 800 रचनाकार कुमाउनी में लिख रहे हैं।

संस्था द्वारा कहानी, कविता, बाल कविता, जनगीत, लोकगीत, जीवनी, यात्रावृत्तांत, उपन्यास, नाटक, देवगाथा आदि विधाओं की 29 कुमाउनी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

पहले राष्ट्र, फिर विश्व : प्रेमपाल शर्मा

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विश्व हिन्दी दिवस, विश्व हिन्दी सम्मेलन, विश्व गुरु जैसे शब्द बार-बार सुनते हुए मन में बेचैनी भी पैदा करने लगे हैं कि आखिर कब तक हम दुनिया को ऐसे प्रमाण पत्र दिखाने और उनसे शाबासी लेने के लिए समारोह, सेमिनार आयोजित करते रहेंगे? किसी वक्त 1975 में जब विश्व हिन्दी सम्मेलन का भाव पहली बार जगा था तो हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे खुलने की दस्तक हो रही थी। संविधान, संसद की आवाज सुनते हुए और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाड़ु आदि राज्‍यों के डर और हिन्‍दी लादने के खिलाफ आक्रोश को भांप कर कुछ-कुछ बीच का रास्ता अख्तियार किया गया था। जैसे पहले इन पन्द्रह-बीस वर्षों में हिन्दी में अनुदित साहित्य उपलब्ध कराया जाएगा, प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण के कदम उठाये जाएंगे जिससे कि हिन्दी अंग्रेजी का स्थन राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे ले सके। शब्दावली आयोग, अनुवाद ब्यूरो, राज्यों में हिन्दी ग्रंथ अकादमियां, संसदीय समिति सभी अपने-अपने स्‍तर पर सक्रिय थे। महत्‍वपूर्ण बात यह भी आजादी दिलाने वाली और उन आदर्शों में डूबी, दबी पीढ़ी राममनोहर लोहिया, टंडन, जयप्रकाश नारायण, आयंगर, सेठ गोविन्द दास जैसों की राष्ट्रीय स्वीकृति और हिन्दी के प्रति एक संतुलित दृष्टि भी धीरे-धीरे सरकार और जनमानस को हिन्दी की तरफ मोड़ रही थी। इसका प्रमाण है कि‍ पहले शिक्षा आयोग (1964-66) की सिफारिशों में और फिर संघ लोक सेवा आयोग की सर्वोच्‍च परीक्षा में वर्ष 1970 से निबंध में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्‍दी में भी लिखने की छूट देना। संसद की बहसों में भी अपनी भाषा के प्रति उत्‍साह और समन्‍वय देखा जा सकता है। स्‍वाभाविक ही था कि इस उत्‍साह को विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन के रूप में विश्‍व पटल तक ले जाया जाए।

लेकिन हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की कहानी का विश्‍लेषण कई किन्‍तु-परन्‍तु के साथ रुक-रुक कर चलता है। विश्व सम्मेलन तो धडा़धड़ नियत अंतराल पर धूमधाम से हो रहे हैं, लेकिन क्या हिन्दी देश के प्रशासन, शासन, शिक्षा, न्यायालय में भी उसी गति से बढ़ रही है? या बिल्कुल उल्टा हो रहा है कि विश्व भाषा बनाने, संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा की मांग और दुहाई तो बार-बार भाड़े के नारों की तरह दी जाती है, लेकिन अपने देश की न्याय व्यवस्था से लेकर शिक्षा, प्रशासन में हिन्‍दी प्रयोग की बातें सिर्फ हिन्‍दी अधिकारियों के हवाले छोड़कर हम मुक्ति पा लेते हैं। पहली बार जनता सरकार में विदेश मंत्री बने अटल बिहारी बाजपेयी का संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में हिन्‍दी में दिया ओजपूर्ण भाषण कुछ वर्षों तक तो लोगों को अनुप्रमाणित करता रहा, लेकिन अपनी संस्‍थाओं में ‘हिन्‍दी के प्राण’ स्थाई तौर वह भाषण भी भर नहीं पाया। हकीकत तो यह है कि 1990 आते-आते सत्‍ता अंग्रेजी की देहरी पर घुटने टेकने के लिए पहुंच चुकी थी। उसके बाद आये उदारीकरण और वैश्‍वीकरण के सपने ने तो हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं पर ऐसा पाटा मारा कि हिन्‍दी विश्‍व में तो तथाकथित दावे करती घूम रही है, सम्‍मेलनों में भी हिन्‍दी के नाम पर खाने-पकाने वाले सपूत गर्व से फूले फिरते हैं, लेकिन अपने देश के साहित्‍य, मानविकी, शिक्षा, चिंतन पुस्‍तकालय में एकदम सूखा पड़ चुका है। सन् 1980 तक विद्वानों की मूल हिन्‍दी में लिखी दर्जनों मशहूर किताबें- इतिहास, राजनीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान की मिल जाएंगी, उसके बाद श्‍यामाचरण दुबे, कृष्‍ण कुमार जैसे एकाध विद्वान को छोड़कर शायद ही मिले। वर्ष 1979 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में अपनी भाषाओं के माध्‍यम की छूट देना भी भारतीय भाषाओं के स्‍वर्ण काल की तरफ बढ़ता पहला कदम था, लेकिन पता नहीं फिर क्या दुरभि संधियां हुई कि केवल अंग्रजी सबको पीछे छोड़ती हुई आगे आ रही है।

कुछ उदाहरण पर्याप्‍त होंगे। हाल ही में घर पर एक कामगार का अनुभव। शाम को उसने कुछ जल्‍दी जाना चाहा। क्‍यों? मुझे लौटने पर अपने बच्‍चे को लेना है, दिल्‍ली के एक टयूशन केन्‍द्र से। उसने खुश होकर बताया कि पूर्वी दिल्‍ली के एक नामी स्‍कूल में उसके बच्‍चे का आर्थिक कमजोर बच्‍चे (EWS) के आरक्षण में दाखिला हो गया है। लेकिन उसकी शिक्षिका कहती है कि इसकी अंग्रेजी कमजोर है। अत: इसको अंग्रेजी का टयूशन दिलाओ। पहली कक्षा से ही अंग्रेजी का यह आतंक धीरे-धीरे पूरे देश को ही अपनी गिरफ्त में ले रहा है। दिल्‍ली का मुखर्जीनगर इलाका गवाह है कि कर्मचारी चयन आयोग, संघ लोक सेवा आयोग से लेकर बैंक, लॉ, यूनिवर्सिटी में सफलता के लिए अंग्रेजी कितनी महत्‍वपूर्ण है। अपनी भाषा आये या न आये यदि अंग्रेजी आती है तो नौकरी पक्‍की। फिर हिन्‍दी की किताब क्‍यों पढ़ें?

भला हो मोदी सरकार का कि पुरानी कांग्रेस सरकार के निर्णय को उलटते हुए सिविल सेवा परीक्षा के जिस प्रथम चरण (सीसैट) में वर्ष 2011 में अंग्रेजी घुसा दी गई थी, उसे निकाल दिया गया है। यहां यह उल्‍लेख करना जरूरी है कि जनता सरकार के दौरान वर्ष 1979 से लेकर 2010 तक कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुपालन में सीसैट की प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी नहीं थी, लेकिन यूपीए की अंग्रेजीदां सरकार ने बिना संसद को विश्‍वास में लिए बिना किसी महत्‍वपूर्ण विमर्श के अंग्रेजी को सीसैट की आड़ में लाद दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि हिन्‍दी भाषी राज्‍यों समेत समस्‍त भारतीय भाषाओं के जिन सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या 15 से 20 प्रतिशत होती थी, घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। प्रधानमंत्री के हस्‍तक्षेप, न्‍यायालय की सक्रियता और बिहार, उत्‍तर प्रदेश के उम्‍मीदवारों के आंदोलन से भारतीय भाषाओं की जीत हुई और फिर से सफल उम्‍मीदवारों का प्रतिशत बढ़ रहा है।

लेकिन विश्‍व दिवस को सामने रखते हुए क्‍या इसे जीत माना जा सकता है? हरगिज नहीं। इतनी चौकियां तो हमारे पास सत्‍तर के दशक यानी 1979 तक ही आ गयी थीं। कोठारी समिति ने तो यह भी कहा था कि सभी सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं को माध्‍यम बनाया जाए। फिर क्‍या हुआ? क्‍या भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, आर्थिक सेवा, सम्मिलित चिकित्‍सा सेवा आदि दर्जनों केन्‍द्रीय सेवाओं में हिन्‍दी आज तक प्रवेश कर पायी? क्‍यों हमारे हिन्‍दी के दिग्‍गज, लेखक, प्राध्‍यापक, पत्रकार, राजनेता केवल विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन की ही वाट जोहते हैं? वक्‍त आ गया है कि हम नौकरि‍यों और शिक्षा में स्‍कूलों से लेकर विश्‍वविद्यालय तक अपनी भाषा के प्रवेश के लिए पूरे जोर से संघर्ष छेड़ दें। उम्‍मीद भरा आकाश मौजूदा सरकार है, जिसका प्रधानमंत्री केरल से कश्‍मीर तक केवल हिन्‍दी में ही अपनी बात सहजता से कहता है- बिल्‍कुल गांधी, लोहिया कि परंपरा में कि भाषा के बिना लोकतंत्र गूंगा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी का मानस हिन्‍दी या अपनी भारतीय भाषाओं से बहुत दूर था। इसका प्रमाण हाल ही में शिक्षाविद कृष्‍ण कुमार के आलोचना में छपे उस लेख से भी मिलता है, जब नेहरूजी निराला, महादेवी वर्मा के लेखन साहित्‍य को जानने से भी इंकार करते हैं। यहां विस्‍तार में जाने की आवश्‍यकता नहीं है न छिद्रान्वेशन और अतीत राग  की, लेकिन भारतीय भाषाओं के डूबने की पीठिका देश पर हावी उस सत्‍ता और उसके परजीवी लेखकों, बुद्धिजीवियों के उस दौर में मौजूद है, जिसके चलते हिन्‍दी पट्टी का अंतिम जन खस्‍ता हाल जिंदगी जीने को मजबूर है। न उसकी लिखी किताबें कोई पढ़ता, खरीदता न उसे समाज में उसकी कोई हैसियत। विचारणीय प्रश्‍न है कि पहले हिन्‍दी को राष्‍ट्र में स्‍थापित करें, फिर विश्‍व में। पुराना जुमला याद आता है- लोकल इज़ ग्‍लोबल यानी जो स्‍थानीय है वही वैश्विक है। विश्‍व से पहली देश में हिंदी को लाना होगा।