Archive for: December 2016

मिली आलस की सजा : मनोहर चमोली ‘मनु’

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ये उन दिनों की बात है, जब बिल्ली खूब मेहनत करती थी। खेती किसानी से अपना पेट भरती थी। वहीं विशालकाय चूहे दिन-रात खर्राटें लिया करते थे। एक दिन बिल्ली ने चूहों से कहा, ‘‘पेटूओं, कुछ काम क्यों नहीं करते?’’ चूहों का सरदार बोला, ‘‘हमारे पास काम ही नहीं हैं। तुम ही कोई काम दिला दो।’’

बिल्ली सोचने लगी। कहने लगी, ‘‘तुम तो जानते हो, मेरे खेत जंगल के उस पार हैं। मैं बगीचे की देखभाल करती हूं तो मेरे खेतों की फसलें बरबाद होती हैं। ये अखरोट का बगीचा यहां है। तुम सब मिलकर मेरे बगीचे की रखवाली करो। तुम्हें रोजाना भरपेट भोजन बगीचे में ही भिजवा दूंगी। याद रहे, अखरोट पक जाने पर उन्हें बोरों में रखकर मुझे देने होंगे।’’ चूहों के सरदार ने हामी भर दी। चूहे खुश हो गए। बिल्ली चूहों को बगीचे में ही खाना भिजवाती। वहीं चूहे भरपेट भोजन करते और चादर तानकर सो जाते। वे और भी आलसी हो गए थे।

दिन बीतते गए। पेड़ों पर अखरोट के फूल आए। पत्तियां आईं। अखरोट के फल लगे। पकने लगे। पककर खोल से बाहर आकर नीचे गिरने लगे। बगीचे में चूहों के खर्राटें ही सुनाई दे रहे थे। फिर एक दिन बिल्ली ने संदेशा भिजवाया, ‘‘सर्दियां आने से पहले अखरोट पक जाते हैं। बोरों के ढेर एक कोने में इकट्ठा कर दिए?’’

बंदर जैसे नींद से जागे हों। उछलकर खड़े हो गए। सरदार जम्हाई लेते हुए बोला, ‘‘चिंता न करें। अखरोट अपने खोल से बाहर आ गए हैं। पेड़ों के नीचे अखरोटों का अंबार लगा हुआ होगा। कल से उन्हें बोरों में भर देंगे। फिलहाल चादर ओढ़कर सो जाओ।’’ चूहों ने ऐसा ही किया।

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सुबह हुई। चूहों को देर से उठने की आदत थी। वे सोते ही रह गए। बगीचे में बंदरों का झुण्ड आ गया। गिलहरियां और खरगोश भी आ गए। बंदरों को मनपंसद भोजन जो मिल गया था। दोपहर हो गई। चूहे हड़बड़ाकर उठ बैठे। तभी बिल्ली भी आ पहुंची। बगीचा तहस-नहस हो चुका था। सारा नजारा देखकर बिल्ली आग बबूला हो गई। बिल्ली चिल्लाई, ‘‘आलसियो। तुम्हारा यह विशालकाय शरीर पिद्दीभर का हो जाए। तुम चैन से न रहोगे। दिन-रात खाते-कुतरते रहोगे। यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारे दांत बढ़ते ही चले जाएंगे। दूर हो जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगी।’’

ऐसा ही हुआ। पलक झपकते ही विशालकाय चूहे नन्हे से हो गए। सींग के बदले उनकी मूंछें उग आईं। चूहों में अफरा-तफरी मच गई। बेचारे चूहे डर के मारे खरगोशों के बिलों में दुबक गए। कहते हैं, तभी से चूहे बिल में रहने लगे। चूहों को देखते ही बिल्ली उन पर झपट पड़ती है।

 

(नंदन, अक्टूबर 2016 से साभार)

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र

रेनबो में दिव्यांग बच्चों ने बि‍खेरे इंद्रधनुषी रंग

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नोएडा : कोठारी इंटरनेशनल स्कूल में दिव्यांग बच्चों को प्रोत्साहित करने व मुख्यधारा के विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम रेनबो-2016 का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को ऐसा मंच उपलब्ध कराना था, जहाँ वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर सकें। इस कार्यक्रम में पहले दिन 8 दिसंबर को एकल गीत, ड्राइंग कलरिंग, कोलाज मेकिंग तथा पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं में दिल्ली-एनसीआर के 15 विद्यालयों के 67 बच्चों ने भागीदारी की। बच्चों ने अपने सुरों से एक नए इन्द्रधनुष की रचना कर दी।

चार घंटे चले इस कार्यक्रम में साक्षी एनजीओ की प्रबंधक-संस्थापक समाज सेविका डॉक्टर मृदुला टंडन तथा रोड सेफ्टी इमरजेंसी के प्रबंधक, मीडियाकर्मी व चर्चित शायर सुबोध लाल ने अपनी उपस्तिथि से बच्चों का मनोबल बढ़ाया।

कार्यक्रम में निर्णायक की भूमिका के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी, चित्रकार व मूर्तिकार पंकज मोहन अग्रवाल तथा युवा चित्रकार सहर रज़ा को आमंत्रि‍त किया गया।  गीत प्रतियिगिता में निर्णायक की भूमिका ख्यातिलब्ध ग़ज़ल गायक उस्ताद शकील अहमद खान तथा सितार वादक व ग़ज़ल गायक अकील अहमद ने निभाई। बच्चों की बनायीं कलाकृतियां देख सहर बरबस ही कह पड़ीं कि‍ यदि ऐसा विद्यालय उन्हें मिले तो वे दोबारा छात्र जीवन में लौटने को तैयार हैं।

बच्चों के सुरों से शकील साहब इतना प्रभावित हुए कि‍ बजाय सम्मान लेने के वे बच्चों से सीधा मुखातिब हुए और कहा कि‍ जो भी मंच की चौखट पर चढ़ गया, वो हर बच्चा विजेता है।

कार्यक्रम का समापन पुरस्कार वितरण से किया गया। ड्राइंग-कलरिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, बाल भारती स्कूल नोएडा, सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला।  कोलाज मेकिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीएलफ स्कूल नोएडा तथा खेतान स्कूल नोएडा को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मि‍ला।

पेंटिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, कैम्ब्रिज स्कूल साहिबाबाद, खेतान स्कूल नोएडा को  क्रमशः  पहला,  दूसरा व तीसरा स्थान मि‍ला।

मन के गीत में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीपीएस आरकेपुरम, डीएलएफ़ साहिबाबाद को क्रमशः पहला, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता, उपप्रधानाचार्य जसवीर चौधरी,  हेडमिस्ट्रेस नीरजा चैथले तथा समन्वयक रुचि बिष्ट ने निर्णायकमंडल व अतिथियों को सम्मानित किया।

धन्यवाद ज्ञापन में प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता ने इस कार्यक्रम को नियमित रूप से प्रतिवर्ष मनाने की योजना को साझा किया।

कार्यक्रम के दूसरे दिन विशेष शिक्षा से जुड़े पेशेवरों को एक मंच पर लाकर उनके द्वारा व्यवहार में लायी जा रही सर्वोत्तम विधियों तथा प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई। दूसरे दिन की सेमीनार में 17 पेशेवरों ने भागीदारी की और आने वाली संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की।  सेमीनार में अमर ज्योति स्कूल की प्रधानाध्यापिका सम्मा तुली तथा प्रकृति स्कूल की संस्थापिका प्रियंका भाबू भी उपस्तिथि रहीं। सेमीनार  की अध्यक्षता जाने-माने बाल मनोचिकित्‍सक डॉक्टर नागपाल ने की। प्रधानाध्यापिका ने अंत में घोषणा की कि‍ प्रत्येक वर्ष 9 दिसम्बर को इसी तरह सेमीनार का आयोजन किया जाएगा।

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नोटबंदी के सम्मोहन में इश्क़ :  शम्भू राणा

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जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा इन दिनों जान पड़ता है कि सम्मोहन के असर में है और साथ ही इश्क में भी मुब्तिला है। सम्मोहित आदमी वही महसूस करता है जो उसे करवाया जाता है। क्योंकि सम्मोहनकर्ता का यही निर्देश होता है। और इश्क की कैफियत का तो फिर कहना ही क्या। चारों ओर बस फूल ही फूल खिले होते हैं। दर्द मीठी लोरी सा लगता है और सड़े चूहे से गेंदे की सी महक आती है- जो तुमको पसंद वही बात कहेंगे, दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।

हर वो हिन्दुस्तानी जो वर्तमान में सांसे ले रहा है परम सौभाग्यशाली है कि उसे उपरोक्त अद्भुत और ऐतिहासिक मनोदशा के अनुभव के लिए एक और जन्म लेने की जहमत से राहत मिल गई। जो मर गए और जो अजन्मे हैं, हमें उनके फूटे नसीबों पर दो आंसूं बहाने चाहिए कि वे इस अद्भुत अनुभव से वंचित रह गए।
इन्द्रजाल कॉमिक्स का मुख्य पात्र मेंड्रेक आपको याद होगा जो जबरदस्त मैस्मेरिज्म से अपने प्रतिद्वंदियों को भ्रमित कर पल भर में धराशाई कर देता था। बांकी उठा-पटक का काम उसका बलवान दोस्त लोथार कर देता था। शुद्व स्वदेशी अंदाज में बताइए- वर्तमान समय में चाचा चौधरी कौन, साबू कौन और राकेट कौन ?
मौजूदा समय को यूं ही अद्भुत नहीं कहा, यह वाकई अद्भुत, अनोखा और टाइम कैप्सूल में ममी बना कर रखने लायक है। क्योंकि इतिहास में ही भविष्य के बीज छिपे होते हैं।
हम एक नये किस्म का तर्कशात्र गढ़ा जाना देख रहे हैं। बड़े से बड़े तर्कशास्त्री को भी लाजवाब कर देने वाली नई दलीलों के जनसुलभ संस्करण इन दिनों फिजा में गर्दिश कर रहे हैं। हमारे जवान रात, दिन खड़े होकर देश की हिफाजत कर रहे हैं और आप जरा देर लाइन में खड़े नहीं रह सकते, क्यों देश को बदनाम करते हो ? जनता को जब इतनी तकलीफ हो रही है तो उस आदमी की तकलीफ का अंदाजा लगाइए जो अकेला करोड़ों लोगों की परेशानी दूर करने में लगा है…।
यह समय नए धंधों और लतीफों का भी है। एक धंधा कमीशनखोरी का है और दूसरा कुछ पैसों के बदले किसी के लिए लाइन में लगने का, कि ज्यों ही नंबर आए मुझे फोन कर देना, मैं तब तक दूसरे काम निपटा लूं। लतीफा एक बैंक कर्मचारी ने सुनाया कि हमारी ब्रांच में चार-छः लोग शादी का कार्ड लेकर आ चुके हैं, कि हमें ढ़ाई लाख रुपया दो। चैक करने पर उनके खाते में ढ़ाई लाख से कम निकले। उन्होंने कार्ड लहराते हुए कहा, तो क्या हुआ, अखबार में छपा है शादी है तो ढ़ाई लाख मिलेंगे, टीवी में भी आया था।
यह मनोदशा प्यार में पड़े हुए की-सी नही तो और क्या है कि आदमी यह सोच कर खुश है जिन्दगी में पहली बार उनके खाते में इतना रुपया है, वर्ना मेरी कहां औकात। ठीक है मेरा नहीं है, दोस्त का है, रिश्तेदार का है, बनिए का है, मालिक का है पर है तो अभी मेरे खाते में न ? तो ? मैं तो इस जनम में सोच भी नहीं सकता था।
टेलीविजन में अलौकिक नजारा है, देखने वालों की आंखें एक अजीब सी कैफियत से डबडबा आई हैं। एक 97 साल की उम्रदराज महिला लाइन में लगकर पुराने नोट बदलवा रही हैं। निःसन्तानों को अपने बेऔलाद होने का अब कोई अफसोस नहीं। जब वो महिला लाइन में लग सकती हैं तो हम अपनी पेशाब की थैली हाथ में लिए, गर्भ में बच्चा लिए, दुधमुंहे बच्चे को घर में छोड़, दुःखते घुटने और कमर, शुगर और बीपी के साथ, कुछ देर धंधा बंद करके, नौकरी से बंक मार के, बैसाखी के सहारे क्यों नहीं लाइन में लग सकते? अन्न जहां का हमने खाया, वस्त्र जहां के हमने पहने, उनकी रक्षा कौन करेगा बे ? हम करेंगे-हम करेंगे।
रोज सुबह-सुबह चाय के साथ बड़े ही शुभ-शुभ समाचार हमारी रगों में कानों और आंखों के जरिए उतर रहे हैं। हमारा पड़ोसी पाकिस्तान पूरा बर्बाद हो गया और चीन आधा। कश्मीर में अमन आ गया। माओवादी पता नहीं कहां चले गए। सारे जमाखोर उजड़ गए, बड़े-बड़े उद्योगपतियों का भट्टा बैठ गया, सारे राजनीतिक दलों को खाने के लाले पड़ गए, फंला लालाजी ने अपने सारे कर्मचारियों को दो साल का वेतन एक मुश्त दे दिया, काली कमाई गंगाजी में बहा दी, लोग नहर में जाल डालकर नोट पकड़ रहे हैं। हर खोखे वाले ने स्वाइप मशीन रख ली है। (शनिदान वालों ने भी शायद मशीन आर्डर कर दी हो) आम आदमी खुश है ये देखकर कि पृथ्वी में जब से जीवन शुरू हुआ पहली बार ऐसा हुआ कि सबकी औकात ढ़ाई लाख मात्र की हो गई, फिर चाहे राजा हो या रंक। यह अद्भुत दौर है। इतने बड़े फैसले की खबर मंत्रीमंडल तो क्या वित्‍त मंत्री तक को नहीं लगने दी- लोग बातें कर रहे हैं, ताली पीट रहे हैं, आपस में धौल जमा रहे हैं, खुशी के अतिरेक में गुटके की पीक अपने ही गिरेबान में गिरी जा रही है, कोई नहीं जी-कोई नहीं, सोने की चिड़िया, विश्व गुरु और भौत सही दिमाग लगाया गुरु उसने, नास्त्रेदमस ने भी कहा है….. जैसे वाक्य, कानों में रस घोल रहे हैं।
एकाध टीवी चैनल, बीच-बीच में कुछ अखबार और सोशल मीडिया बदमजगी पैदा कर दे रहे हैं, कि लाइन में लगे इतने लोग मर गए, शादी टल या टूट गई, मय्यत घर में पड़ी रही बेटा लाइन में लगा रहा, पुराने नोट होने पर मरीज भर्ती नहीं हो पाया नतीजन दर्द ही दवा बन गया। सेना के साथ हुई मुठभेड़ के बाद कश्मीरी अलगाववादियों के पास चूरन के नोटों की खेप बरामद, हजार का नोट छः सौ में चला, लोग रजाई लेकर एटीएम के बाहर सोये, देर रात काम निपटा कर बैंक कर्मचारी घर जा रहे थे, गाड़ी भिड़ गई परलोक सिधारे, विदेशी पर्यटक वापस जाने के लिए चन्दा कर रहे हैं, दिहाड़ी मजदूर मजबूरन घर चले गए, बाजार बैठ गया, दो हजार रुपया जेब में है मगर आदमी चाय नहीं पी सकता, दारू की दुकान में सैल्स मैन कहता है- पव्वा नहीं पूरा खम्बा लो तभी नोट चलेगा, पार्टी विशेष से जुड़े कई लोगों के पास से लाखों-करोड़ों की नई करेंसी पकड़ी गई…।
एक योगाचार्य बेचारे न जाने किस मजबूरी से बैंक की लाइन में लगे और गश खाकर गिर पड़े। अब बताइए योग विद्या का इससे ज्यादा नुकसान और कौन कर सकता है? मजे की बात यह कि उन्होंने ही फरमाया था कि बैंकों में लम्बी लाइनें जो हैं वो विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित हैं।
लगता है जैसे कोई पागल या नशेड़ी एक बेतरतीव सी कहानी सुना रहा हो- एक बुढ़िया थी जो बचपन ही में गुजर गई…।
मैंने भी अपने बड़ों से सुना है सो आगे बढ़ा देता हूं कि उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। थामे रहिए, हमें हर हाल में सकारात्मक सोचना चाहिए, उम्मीद करनी चाहिए कि भला होगा। उम्मीद के इस दामन को हाथों में ही थामे रहें, इससे आंखें न ढंक लें।
वर्तमान परिदृश्य की तुलना सम्मोहित और प्यार में पड़े हुए की-सी मनोदशा से की थी। सम्मोहन में आदमी लगभग बेहोश होता है और प्यार तो जगजाहिर है कि अंधा होता ही है। सम्मोहन से देर सबेर आदमी बाहर निकल आता है पर इश्क बड़ा कमीना होता है, इसे आदमी दिल पर ले लेता है। दरअसल, आजकल इश्क कोई करता नहीं, इसकी आड़ में व्यापार करते हैं, बदले में कुछ चाहते हैं। वर्ना तेजाब से चेहरा क्यों जला देते या ऐसा गाना क्यों लिखते- तुम किसी और की होगी तो मुश्किल होगी? इश्क करने के लिए बड़ा जिगर चाहिए साहब कि जरूरत पड़ने पर आप खुशी-खुशी अपने हाथों अपनी प्रेमिका का कन्यादान कर दें। ऐसे आशिक इस संसार में कुल जमा कितने होंगे आपके हिसाब से? यही बात सोच के मैं खुश हूं कि डरा हुआ हूं, कह पाना मुश्किल है फिलहाल।

एक बादल एक बूँद एक नाव  : रजनी गुसाईं

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गड-गड-गरड़… आकाश में बादल गरज रहे थे। चमकती धूप गायब हो गई थी। काले बादलों ने सूरज को ढक दिया था। दोपहर में ही अँधेरा छा गया। “मम्मी, लगता है, बारिश होने वाली है। बड़ा मजा आएगा।” नन्हीं हिमी ने अपना होमवर्क करते हुए कहा।

“पता नहीं ये बादल कब बरसेंगे! इतनी देर से तो बस गरज ही रहे हैं! यह उमस भरी गर्मी और बिजली भी चली गई हैं।” मम्मी हाथ का पंखा हिलाते हुए बोली और किचन में चली गई।

हिमी पहली तीन में पढ़ती हैं और अपने मम्‍मी–पापा के साथ बहुमंजिला इमारत की पंद्रहवी मंजिल के फ्लैट में रहती है। हिमी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका कमरे में ठंडक भर गया। हिमी खिड़की के पास खड़ी हो गई। उसने बाहर झांककर देखा। आकाश में बादल-ही-बादल दि‍खाई दे रहे थे। वे हवा के झोंको से इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। तभी हिमी की खिड़की के पास से एक बड़ा-सा काला बादल गुजरा। हिमी उसे आवाज लगाते हुए बोली, “सुनो बादल राजा, बस गरज ही रहे हो! बरसोगे कब?”

हिमी की आवाज सुनकर काला बादल रुक गया। वह बहुत उदास लग रहा था। वह बोला “मेरा मन बरसने को नहीं करता।” बादल के अंदर बैठी नन्हीं-नन्हीं बूँदें भी बादल की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती हुई बोलीं “हमें भी रिमझिम-रिमझिम बारिश बनकर नहीं बरसना।”

हिमी को उनकी बातें सुनकर आश्‍चर्य हुआ। अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए वह बोली, “लेकिन तुम लोग धरती पर बरसना क्यों नहीं चाहते?”

काला बादल बोला “पहले जब में बरसता था तो बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते थे। गलियों में, घरों की छतों में बारिश में भीगते थे। धमाचौकड़ी मचाते थे।”

नन्ही बूँदें बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “हम जब बरसती थीं, तो हमारे पानी में बच्चे पैरों से छप-छपकर खेलते थे! रुके हुए पानी में कागज की रंग-बिरंगी नाव बनाकर तैराते थे। बच्चों की यह चुलबुली शरारतें देखकर बड़ा मजा आता था। लेकिन अब वो बात नहीं हैं।” कहते-कहते नन्हीं बूँदें उदास हो गईं।

काला बादल बोला, “अब बच्चे बारिश में घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों की शरारतों के बिना हमें भी बरसना अच्छा नहीं लगता।”

काले बादल और बूंदों की बात सुनकर हिमी सोच में पड़ गई। फिर धीरे से बोली, “ओ काले बादल सुन। हम बच्चे बारिश में भीगना चाहते हैं। खेलना चाहते हैं, लेकिन मम्मी-पापा हमें खेलने नहीं देते। वे कहते हैं, ‘बारिश में भीगने से जुखाम हो जाएगा। बीमार पड़ जाओगे।”

हिमी की बात सुनकर अब काला बादल सोच में पड़ गया।

“हिमी, हिमी उठो। होमवर्क करते-करते ही सो गई।” हिमी को नींद से जगाते हुए मम्मी बोली।

मम्मी की आवाज सुनकर हिमी एकदम से उठकर बैठ गई। आँखों को मींचते हुए बोली, “मम्मी, काला बादल कहाँ गया?”

“कैसा काला बादल? हिमी लगता हैं, तुमने कोई सपना देखा होगा।” कहते हुए मम्मी कमरे से बाहर चली गई!

हिमी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। हिमी ने मम्मी को आवाज लगाई, “मम्मी मुझे कागज की नाव तैरानी है।”

मम्मी कमरे में आई! हँसते हुए बोली, “यहाँ कागज की नाव कहाँ तैराओगी?”

“मम्मी नीचे सोसाइटी के कंपाउंड में चलते हैं। वहां पानी भर गया है।” हिमी जिद करने लगी। आखिर मम्मी को हिमी की जिद के आगे झुकना पड़ा, “ठीक हैं चलते हैं, लेकिन ज्यादा देर बारिश में नहीं भीगना।” मम्मी ने हिमी से कहा। यह सुनकर ख़ुशी से उछलते हुए हिमी ने टेबल के नीचे से पुराना अखबार निकाला और मम्मी के साथ बैठकर जल्दी-जल्दी नाव बनाने लगी। नाव बनकर तैयार थी। इसके बाद दोनों सोसाइटी के कंपाउंड में आ गए! हिमी पानी में छपाक-छपाक करते हुए बारिश में भीगने लगी। कागज की नाव उसने बारिश के बहते पानी में छोड़ दी। नाव पानी में डगमग-डगमग करते हुए आगे बढ़ने लगी। यह देखकर हिमी ख़ुशी से उछलते हुए ताली बजाने लगी। हिमी को बारिश के पानी में खेलते देख सोसाइटी में रहने वाले दूसरे बच्चे भी कागज की नाव लेकर कंपाउंड में आ गए। अब बारिश के पानी में कागज की बहुत सारी नाव तैरने लगीं। नन्हीं-नन्हीं बूँदें रिमझिम-रिमझिम बरस रही थीं। सारे बच्चे पानी में छपाक-छपाक करते और ख़ुशी से चिल्लाते। हिमी आसमान की तरफ देखकर बोली, “ओ बादल राजा, ओ नन्हीं बूंदों, अब तो खुश हो।”

उसकी सहेली दि‍व्या ने पूछा, “हि‍मी कि‍ससे बात कर रही हो।”

“कि‍सी से नहीं।” कहकर हि‍मी मुस्‍कराई और पानी में छप-छप करने लगी।

‘अनहद’ का भीष्म साहनी अंक और राजेश उत्साही की कवि‍ताएं

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चर्चा-ए-कि‍ताब-

17 मई 2016

आज ‘अनहद’ अंक-6 प्राप्त हुआ। हर बार की तरह विविध सामग्री से भरा हुआ है। ‘शताब्दी वर्ष’ के चलते पत्रिका का बड़ा हिस्सा भीष्म साहनी पर केन्द्रित है। ‘समालोचना’ खंड-1 में वरिष्ठ कवि हरीश चन्द्र पाण्डेय पर चार महत्वपूर्ण आलेख और उनकी पांच नयी कवितायें हैं, तो खंड-2 में प्रदीप सक्सेना पर आलोचनात्मक आलेख और उनका स्वयं का एक आलेख। विशेष प्रस्तुति के रूप में वरिष्ठ कवि-आलोचक विजेंद्र का लोकधर्मी चीनी कविता पर विस्तृत आलेख है। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि चंद्रकांत देवताले की डायरी के पन्ने हैं। ममता कालिया, भालचंद्र जोशी और योगिता यादव की कहानियां हैं। हरवंश मुखिया का इतिहास पर एक आलेख है। अमृता शेरगिल की चित्रकला पर अशोक भौमिक ने लिखा है। मधुरेश, बजरंग बिहारी तिवारी और विजय गौड़ ने अलग-अलग विषयों पर विमर्श किया है। रामजी तिवारी का यात्रा वृतांत है। साथ ही एक दर्जन से अधिक किताबें ‘कसौटी’पर कसी गयी हैं। इसके अलावा नीलकमल, शंकरानंद, जयप्रकाश फ़कीर और ज्ञान प्रकाश की कवितायेँ हैं।

आज सायंकालीन भ्रमण में इन कविताओं का ही पाठ किया गया और उन पर चर्चा हुई। जयप्रकाश फ़कीर की कविताओं ने सभी को विशेष रूप से प्रभावित किया। आज से हमारे एक और युवा साथी राजेश पन्त इस सायंकालीन भ्रमण का हिस्सा बने हैं। उनके शामिल होने से हम और अधिक समृद्ध हुए हैं। हम सभी उनकी साहित्य और समाज की गहरी समझ से लाभान्वित होंगे।

कल का सायंकालीन भ्रमण चर्चित कवि-संपादक राजेश उत्साही के कविता संग्रह ‘वह, जो शेष है’ के नाम रहा। कुछ दूर टकाडी गाड़ के किनारे चलने के बाद हम हरी-मुलायम घास पर बैठ गए। उत्साही जी की गाड़ की धारा और हरी घास की मानिंद जीवन से भरी कविताओं का आनंद लिया। सबसे पहले संग्रह की अंतिम और लम्बी कविता –‘नीमा’ का पाठ किया। यह मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों और संघर्षों को व्यक्त करती हुयी अनूठी कविता है। लगभग 18 पृष्ठों में फैली यह कविता जैसे-जैसे आगे बढती है, पाठक को अपने से जोड़ते चलती है। पता ही नहीं चलता है कि कब कविता पूरी हो गई। कवि-पत्नी को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह कविता हर मध्यवर्गीय परिवार की दास्ताँ है। जिसमें यह विडंबना मुखरित होती है कि किस तरह एक स्त्री भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक दबाव के चलते अपना पूरा जीवन परिवार के नाम कर देती है, लेकिन फिर भी हासिल आता है शून्य, तमाम कोशिशों के बावजूद वह बड़े-बूढों के आदर्शों पर खरी नहीं उतर पाती है कविता इतनी ईमानदारी से लिखी गई है कि हर पढने वाला उसमें अपना जीवन देखने लगता है। जब कविता पूरी हुई तो कवि मित्र चिंतामणि जोशीजी कहने लगे- इसे सुन मुझे अपना बीता जीवन याद आ गया। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। बहुत कम कवि होंगे, जो आपबीती को इतनी बेबाकी से कह पाते हों। कहीं भी पुरुष का अहं आड़े नहीं आता है। पत्नी के प्रति इतना सम्मान उसी मन में हो सकता है, जो सच्चे अर्थों में पत्नी से प्रेम करता हो। इस कविता में पूरी बात अभिधा और सीधी-सरल भाषा में कही गई है। बावजूद इसके कहीं भी कविता लद्धड गद्य में नहीं बदलती। जीवन राग में डूबी होने के कारण काव्य की लय उसमें शुरू से अंत तक बनी रहती है। यह राजेश उत्साही की कविताओं की मुख्य विशेषता ही है कि उनकी कवितायेँ कला के बोझ से दबी हुई नहीं, बल्कि जीवन राग से भरी हुई हैं। उनमें जीवन धडकता हुआ मिलता है। इसका कारण है, उनकी कविताओं में जीवन की जद्दोजहद का होना है।

राजेश उत्साही की कविता के केंद्र में श्रम संलग्न दुनिया है, वे लोग हैं जिनके बिना उच्च और मध्यमवर्ग अपने आरामदायक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इस दुनिया में कबाड़ खरीदते, गीत गाते, पालिश करते, झाड़ू लगाते बच्चे, चक्की पीसती स्त्री और तरह-तरह के श्रम करते जवान-बूढ़े सभी हैं। इस दुनिया के लोगों के दुःख-दर्दों और संघर्षों को कवि बहुत बारीकी से व्यक्त करता है। उनके साथ अभिजात्य दुनिया द्वारा किए जाने वाले अमानवीय और असंवेदनशील व्यवहार को रेखांकित करते हुए हमें उनके प्रति संवेदित करने की कोशिश करता है। साथ ही इस दुनिया के लोगों की आशा-आकांक्षाओं को स्वर देता है।

राजेश उत्साही के इस कविता संग्रह में प्रेम कवितायें भी हैं, सामाजिक सरोकारों की कवितायें भी और अपने व्यक्तिगत अनुभवों की कवितायें भी। व्यक्तिगत अनुभव की कवितायें इतनी सघन एवं सान्द्र हैं कि व्यक्तिगत न होकर हम सबकी जीवन की कवितायें हो जाती हैं। हर पाठक उनमें अपना जीवन देखने-महसूसने लगता है। उनके सुख-दुःख और संघर्ष में खुद को शामिल कर लेता है। यह इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है।इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविता केवल वही नहीं होती है, जो कम शब्दों में अधिक बात कहती हैं, बल्कि कविता वहां भी होती है, जहाँ जीवन की सघनता और उसके ताजे विवरण होते हैं। राजेश उत्साही अपने आसपास जो अनुभव करते हैं, अपनी ज्ञानेन्द्रियों से और महसूस करते हैं अपने अन्तस् से उसे ही अपनी कविता में अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए उनकी कवितायें सीधे दिल में उतर जाती हैं। हमें उनके नये कविता संग्रह का इन्तजार है।

दून लिटरेचर फेस्टिवल 24-25 दिसम्बर को

नई दि‍ल्ली : टी.एस. इलियट ने कहा था, ‘जो लोग अपनी साहित्यिक विरासत की चिन्ता करना छोड़ देते हैं, वे जंगली तथा बर्बर हो जाते हैं और जो लोग साहित्य-सृजन करना छोड़ देते हैं, वो विचार और संवेदनशीलता को खो देते हैं।’ हिन्दी के क्षेत्र में यह संकट साफ़-साफ़ नजर आने लगा है। यहाँ के लोगों के जीवन की प्राथमिकता में बच्चों का कामयाब भविष्य, मकान तथा नये दौर के सुख-साधन तो हैं, लेकिन साहित्य, कला तथा संस्कृति से वे दूर होते जा रहे हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो अपनी साहित्यिक विरासत से परिचित होना चाहता है और न ही समकालीन सृजन से ही जुड़ना चाहता है। इस कारण न उसके पास कोई विचार है, न कोई आदर्श! न उसकी कोई प्रतिबद्धता रह गई है, न संघर्ष का माद्दा! सोशल मीडिया तथा स्मार्ट फ़ोन ने सारी दुनिया को लोगों की मुट्ठी में समेट दिया है। ऐसे में व्यक्ति भयानक तरीक़े से व्यस्त हो चुका है। वह त्वरित सूचनाओं के प्रभाव में है।
सोशल मीडिया के रूप में आया यह सामाजिक बदलाव विज्ञान और तकनीक से जुड़े वैश्विक परिवर्तन का एक चरण है जो समाज को परिवर्तित कर रहा है। आभासी दुनिया को अपने जीवन के अभिन्न अंग बना चुकी युवा पीढ़ी समाज की मुख्यधारा से किस प्रकार कट रही है, इसे हम अपने परिवेश को देखकर समझ सकते हैं। यद्यपि यह भी सत्य है कि साहित्य, सरोकार और संघर्ष की चर्चा के मंच के रूप में भी सोशल मीडिया का प्रयोग हो रहा है। मध्य-पूर्व में हुए जनसंघर्षों में सोशल मीडिया की भूमिका को पूरी दुनिया ने देखा है। शेष दुनिया की भाँति भारत भी तेज़ रफ़्तार से बदलाव के साथ क़दमताल कर रहा है। इसी क़दमताल के बीच परम्परावादी भारत और आधुनिक भारत के विरोधाभास भी हैं। भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है। हमारी जीवनशैली, लोकपरम्पराओं, धार्मिक प्रथाओं और बहुभाषावाद में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सामाजिक मान्यता, प्रथा, इतिहास और संस्कृति जैसे तत्व मिलकर लोक परम्पराओं को समृद्ध करते हैं। लेकिन थ्री डायमेंसनल (3डी) के इस युग में घर के भीतर और बाहर लोक-परम्पराओं के सकारात्मक चिह्न निरन्तर धूमिल हो रहे हैं।
देवी-देवताओं के पूजन की प्राचीन लोक-प्रथाओं से लेकर सार्वजनिक समारोहों तथा मेलों का स्वरूप भी बदल गया है। विवाह समारोहों में गाये जाने वाले प्राचीन गीत अब लुप्तप्राय हो गये हैं। इसी प्रकार दादी-नानी के क़िस्से और कहानियाँ भी अब केवल चर्चाओं के अंग बनकर रह गये हैं। कुल मिलाकर दुनिया के इस बदलाव ने लोक-परम्पराओं को न सिर्फ कड़ी चुनौती दी है, बल्कि शहरीकरण और एकल परिवारों के मौजूदा ढाँचे ने सामाजिक व्यवस्था के इन परम्परागत तत्वों को समाप्त कर दिया है। सामाजिक व्यवस्था में आ चुका यह बदलाव हमें कला और साहित्य में भी स्पष्ट हो गया है। कहानी और कविता का कथ्य भी भूमंडलीकरण के साथ ही बदल रहा है। इस बदलाव को हम चाय और पान के नुक्कड़ों के गायब हो जाने के रूप में भी महसूस कर सकते हैं, जहाँ अपनी बात कहने और सुनने को लोग आया करते थे। कहानी अब पढ़ने से ज़्यादा देखने और सुनने के लिए लिखी जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह वही दौर है जहाँ फिल्मों और धारावाहिकों की तरह ही कहानियों से भी गाँव के गँवई पात्र गायब हो गए हैं।
इन सब स्थितियों-परिस्थितियों के बीच पहाड़ हैं और पहाड़ के रचनाकार हैं। पहाड़ से जुड़ी उनकी चिंतायें भी हैं। रोज़ी-रोज़गार के लिए टूट चुके पहाड़ के परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार के सवाल भी हैं। इनके सबके केन्द्र में कहीं वह लोक भी है जिसने दुनिया को मौजूदा स्वरूप प्रदान किया है। लोक के गीत, लोक की कथाओं और लोक की गाथाओं के बिना साहित्य के मौजूदा ढाँचे की चर्चा कैसे संभव है। इसी प्रकार दलित, स्त्री आदि मौजूदा दशकों के विमर्श लगातार जरूरी बने हुए हैं। इन सबके बीच भारत की बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहुलवादी व समृद्ध लोकपरम्परा को कला और साहित्य के माध्यम से समझने व समझाने के साथ ही साझा करने के प्रयास के रूप में ‘समय साक्ष्य’ (प्रकाशन) की ओर से क्रि‍श्चयन रि‍ट्रीट एंड स्टडी सेंटर, राजपुर रोड, देहरादून में दून लिटरेचर फेस्टिवल (डीएलएफ-2016) का आयोजन में किया जा रहा है। इस आयोजन की परिकल्पना निम्न उद्देश्यों के साथ की गई है-

-हिन्दी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर विमर्श।
-पुस्तक लोकार्पण, पुस्तक चर्चा तथा पुस्तक प्रदर्शनी।
-लोक-साहित्य व लोक-कला की मौजूदा स्थिति पर चर्चा।
-साहित्यकारों, लोक कलाकारों, शिल्पियों, संस्थाओं, समूहों व पाठकों का एक मंच पर समागम।
-आंचलिक, स्थानीय व लोक-परम्पराओं से जुड़े रचनाकारों का एक मंच पर एकत्रीकरण।
-कार्यक्रम में साहित्य व कला से जुड़ी प्रदर्शनी, फिल्म स्क्रीनिंग आदि का आयोजन।

कार्यक्रम

प्रथम दिवस 24 दिसम्बर 2016
पंजीकरण 9-10 बजे
उद्घाटन सत्र 10 बजे 11.00 बजे
हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया
संबोधनः पुरुषोत्तम अग्रवाल, बटरोही
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

प्रथम सत्र 11.00 बजे 1.00 बजे तक 
भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी
(सन्दर्भः जाति, धर्म, स्त्री, साम्प्रदायिकता, गांव, बाजार, नया पाठ और तकनीक)
अध्यक्षः सुभाष पंत
बीज भाषणः जितेन ठाकुर
सहभागः कॉन्ता रॉय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे, अनिल कार्की
संयोजकः दिनेश कर्नाटक
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याह्न भोजन 1.00-2.00 बजे

द्वितीय सत्र 2.00-4.00 बजे
हिन्दी कविताः चेतना और पक्षधरता
(सन्दर्भः खेत, किसान, गांव, शहर, पहाड़, घर, परिवार और समाज आदि)
अध्यक्षः मंगलेश डबराल
बीज भाषणः लीलाधर जगूड़ी
सहभागः राजेश सकलानी, शैलेय, प्रकृति करगेती, आशीष मिश्र
संयोजकः डॉ. अरुण देव
चाय: कार्यक्रम में ही खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

तृतीय सत्र 4.00-6.00 बजे
स्त्री और आधुनिकता
अध्यक्षः सुमन केसरी
बीज भाषणः शीबा असलम
मंच पर: सुजाता तेवतिया, सन्ध्या निवेदिता, निधि नित्या
संयोजकः मनीषा पांडे
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
भोजन 8-9 बजे रात्रि

चतुर्थ सत्र: 9 बजे से 11 बजे
कवि और कविता
अध्यक्षः डॉ. अतुल शर्मा
आमंत्रित कविः स्वाति मेलकानी, डॉ. माया गोला, केशव तिवारी, चेतन क्रान्ति, डॉ. राम विनय सिंह, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र सक्सेना, राजेश आनन्द ‘असीर’, नदीम बर्नी, जिया नहटौरी, शादाब अली, रेखा चमोली, नदीम बिस्मिल, प्रतिभा कटियार, सुभाष तराण।
संयोजकः डॉ. प्रमोद भारतीय

द्वितीय दिवस, 25 दिसम्बर 2016

प्रथम सत्र 10.00-12.00 बजे
लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य
(सन्दर्भः लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, वीरगाथाएं, कहावतें व किं‍वदंतियां)
अध्यक्षः डॉ. दाताराम पुरोहित
बीज भाषणः डॉ. प्रभा पंत
मंच पर: डॉ. प्रभात उप्रेती, महाबीर रवांल्टा, डॉ. शेर सिंह पांगती
संयोजक: डॉ. उमेश चमोला
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
चाय: कार्यक्रम में ही

द्वितीय सत्र 12.00-2.00 
बाल साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं
(सन्दर्भः परिवार, समाज, संस्कृति, स्कूल, घर, किताबें, बस्ता, पुस्तकालय, वाचलनालय, विकास, परिवर्तन आदि)
अध्यक्षः उदय किरौला
बीज भाषणः राजेश उत्साही
मंच परः डॉ. दिनेश चमोला, मुकेश नौटियाल, डॉ. शीशपाल, डॉ. उमेश चन्द्र सिरतवारी
संयोजकः मनोहर चमोली ‘मनु’
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

समानान्तर
द्वितीय सत्र 12.00-2.00
बाजार, मीडिया और लोकतंत्र
अध्यक्षः कुशल कोठियाल
बीज भाषणः सुन्दर चन्द्र ठाकुर
मंच परः अनुपम त्रिवेदी, पवन लाल चंद, लक्ष्मी पंत
संयोजकः भूपेन सिंह
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याहन भोजन 2.00-2.30

तृतीय सत्र 2.30- 4.30 बजे
कथेतर साहित्यः समय और समाज
(यात्रा, संस्मरण, डायरी, पत्र, आत्मकथा, विज्ञान लेखन आदि पर संवाद)
अध्यक्षः देवेन्‍द्र मेवाड़ी
बीज भाषण- डॉ. शेखर पाठक
मंच परः तापस चक्रवर्ती, एस.पी. सेमवाल, आकांक्षा पारे कासिव
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

चतुर्थ सत्र 4.30-6.30 बजे 
आंचलिक साहित्यः चुनौतियाँ एवं संभावनाएं
अध्यक्षः डॉ. अचलानंद जखमोला
बीज भाषणः डॉ. देब सिंह पोखरिया
मंच पर: मदन मोहन डुकलाण, नेत्र सिंह असवाल, डॉ. हयात सिंह रावत, रमाकांत बैंजवाल
संयोजकः गिरीश सुन्दरियाल

पंचम सत्र-6.30- 7.30 
विभिन्न पुस्तकों पर चर्चा
व्यावहारिक वेदान्त: सरला देबी, समीक्षकः शशि भूषण बडोनी
साहिर लुधियानवीः मेरे गीत तुम्हारेः सुनील भट्ट, समीक्षकः- मुकेश नौटियाल
मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां: दिनेश कर्नाटक, समीक्षकः- भाष्कर उप्रेती
खुली चर्चा/चाय
भोजनः  8-9.00 बजे

छठा सत्र 9-11 बजे 
समापन