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गणित की कक्षा के कुछ अनुभव : रेखा चमोली

रेखा चमोली

रेखा चमोली

गणितीय अवधारणाओ को सही-सही समझने के लिए आवश्यक है कि बच्चे अंकों, संख्याओं व संबोधों को मूर्त रूप में ज्यादा-से-ज्यादा देख-समझ पाएं। अपने पिछले शैक्षिक अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकती हूं कि कई बार मैंने यह सोचकर कि गणितीय संबोधों को मूर्त रूप में दिखाने या सवाल हल करने में समय की फिजूलखर्ची होगी, अपना पूरा कौशल व श्रम सिर्फ श्यामपट-चाक, कापी-पैंसिल या किताब तक ही सीमित रखा, लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ कि इस तरीके से कक्षा के सभी बच्चों को अवधारणा समझ में आ गयी। इसमें बच्चों के सीखने की गति पूर्वज्ञान और अनुभव अमूर्त चिंतन की दक्षता आदि कारक तो शामिल थे ही, पर गणित जैसे अमूर्त विकास की नींव कैसी बनी थी अर्थात शुरुआत किस तरह से हुई थी, बहुत बडा़ कारक था। शिक्षण में जैसे-जैसे अनुभव बढ़ते गए मेरी इस विचार में दृढ़ता बढती गयी कि गणितीय अवधारणाओं की स्पष्ट व मजबूत समझ बनाने के लिए प्रारंभिक कक्षाओं में स्थूल वस्तुओं का उपयोग व उनके बारे में बातचीत ही पक्की नींव का कार्य करती है। यहां पर मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगी कि भाषा की कक्षा में किया गया मूल कार्य अर्थात समझकर पढ़ना-लिखना व स्वयं की कल्पना से चीजों को समझकर व्यक्त कर पाना (मौखिक, लिखित दोनों तरीकों से) किसी भी अन्य विषय को समझने की पहली कड़ी है। मेरे विद्यालय के संबंध में मैं भाषा का प्रयोग हिन्दी भाषा के लिए कर रही हॅूं।

कई बार हम गणित को सिर्फ अंकों व चिन्हों का खेल समझने की भूल कर लेते हैं, और इन्हीं प्रक्रियाओं का लगातार अभ्यास करवाते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि जैसे ही अभ्यास कार्य में कमी आती हे, सवालों को हल करने में होने वाली गलतियां बढ़ती जाती हैं। और कई बार यह भी होता है कि सवाल बच्चों के सिर के ऊपर से गुजर जाता है और हम ठगे से रह जाते हैं कि हम ने तो बहुत मेहनत से इन सवालों पर पर्याप्त अभ्यास कार्य करवाया था फिर बच्चे ये सवाल हल क्यों नहीं कर पा रहे ? हमारे प्राथमिक विद्यालयों में दुर्भाग्यवश विभिन्न कारणों से सवालों का गणितीय रूप में अर्थात संख्याओं व चिन्हों के आधार पर ही ज्यादातर अभ्यास कार्य करवाए जाते हैं। परिणामस्वरूप कई बार विभिन्न गणितीय अवधारणाएं किसी श्रृंखला (चेन) की तरह आगे नहीं बढ़ती, बल्कि यहां-वहां बिखरी दिखाई पड़ती हैं। वे एक दूसरे से सह सम्बन्ध स्थापित करती नहीं दिखाई पड़तीं। बच्चे जोड़, घटाना, गुणा, भाग व अन्य अवधारणाओं को एक-दूसरे से जुड़ता हुआ न देखकर अलग-अलग व सवाल हल करने के जटिल व कठिन स्तरों के रूप में देखते हैं। कक्षा में बच्चों की प्रक्रिया ‘कितना कठिन सवाल है यह’, के रूप में व्यक्त होती है।

शिक्षिका के रूप में कार्य करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लगातार सीखने-समझने की संभावना बनी रहती है। अपने पिछले 12 वर्षों के कुछ शैक्षिक अनुभवों को मैं आपके साथ साझा करना चाहती हूं, जिन्होंने गणितीय संबंधों को समझने में मेरी मदद की।

बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृति का विकास करना- विभिन्न शोधों के आधार पर यह बात साबित हुई है कि 7-11 वर्ष के अन्तराल में बच्चों में रचनात्मकता का विकास होता है। इससे पहले बच्चा अपने पूर्व अनुभवों अर्थात अपनी भावनाओं, कल्पनाओं व भाषा के उपयोग से चीजों व घटनाओं को समझाना प्रारम्भ कर चुका होता है। अब वह अपनी इन्हीं दक्षताओं के आधार पर सीखता हुआ नवीन ज्ञान का सृजन करता है। इस उम्र में एक सृजनाकार के रूप में विकसित होता है। यदि उसे उपयुक्त वातावरण मिले तो वह अपनी इस दक्षता का उच्चतम विकास कर पाने में सक्षम होता है। लगभग इसी उम्र के बच्चे प्राथमिक विद्यालय में होते हैं। बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति का विकास हो सके, इसके लिए मैंने बहुत सी गतिविधियों का उपयोग किया। उदाहरण स्वरूप समग्र भाषा शिक्षण पद्धति अपनाना, जिसमें भाषा सीखने के लिये अक्षरों के बजाय चित्रों, शब्दों व वाक्यों से शुरुआत की जाती है। विभिन्न अभ्यास कार्य करवाना। जैसे- किसी चित्र या विषय पर बच्चों से बातचीत करना, बातचीत के मुख्य बिन्दु लिखना व पढ़ना,  ढेर सारी कहानियां,  कविताएं बच्चों के साथ मिलकर पढ़ना। उन्हें अपनी मौलिक कविता-कहानी लिखने को प्रेरित करना, पुस्तकालय का भरपूर उपयोग करना,  पुस्तकालय का उपयोग पाठ्यपुस्तकों के साथ करना,  बच्चों के मौलिक लेखन को आपस में साझा करने के लिए प्रार्थना सभा में स्थान देना, उनकी रचनाओं से दीवार पत्रिका, बाल पत्रिका बनाना,  उसको डिस्प्ले करना व बच्चों को उसे पढ़ने को प्रेरित करना। बच्चों के मौलिक लेखन को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उदाहरण के लि‍ए चकमक, बाल प्रहरी आदि में प्रकाशन हेतु भेजना, बच्चों की पढ़ी व लिखी सामाग्री पर उनसे बात करना आदि प्रमुख रही।

इन गतिविधियों को करने का परिणाम यह रहा कि बच्चों ने जो पढ़ा-लिखा, उन्हें उसके बार में ठीक-ठीक पता था। पढ़ना-लिखना उनके लिए मशीनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनुभव जनित प्रक्रिया बनी, इससे उनमें स्वयं पढ़ने-लिखने की आदत का विकास हुआ।

बातचीत व कहानियों से गणितीय संबोध सिखाने की शुरुआत- कक्षा 1 व 2 के बच्चों को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से गणितीय संक्रियाएं को सिखाना प्रारम्भ किया। चूंकि छोटे बच्चों के लिए प्रत्येक वस्तु एक पात्र होती है, वे आसानी से कहानी को छोटे-छोटे पत्थरों (कंकड़ों या मनकों) की घटती-बढ़ती संख्या या कागज के रुपये, पैसे को खेलने से जोड़ पाए। 1 से शुरू कर 10, 20 या 100, 200 कंकड़ों या मनकों की पंक्ति बनाना, उन्हें उंगली लगाकर गिनना, विभिन्न आकृतियों पर कंकड सजाना व उन्हें गिनना, 5-5, 10-10 की पंक्तियां या ढेर बनाना, चीजों को बांटना या ज्यादा कम करना, जैसे खेलों ने बच्चों को संबोधों का सह सम्बन्ध या अन्तर करना सिखाया। इस दौराना हुई बातचीत ने उन्हें सीखे हुए को सुदृढ़ बनाने में मदद की। इसी के साथ शुरू हुई कापी पर अंकों को लिखने व चिन्हों के साथ संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत। अब बच्चे कहानी के साथ खेल रहे थे और अपनी बातचीत को अपनी कापी पर गणितीय रूप में लिख भी रहे थे। किसी आकृति पर कंकड़ या मनके सजाते हुए या एक लम्बी पंक्ति बनाते हुए जब वे गिनने की प्रक्रिया कर रहे थे, तो देख पा रहे थे कि 5 से 15 तक पहुंचने के लिए कितने अंक और बढ़ाने पड़ते हैं। 8 या 15 के बीच कितना अंतर होता है।

इसी प्रकार बातचीत करते हुए जोड़, घटाना, गुणा व भाग की संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत हुई, जो पहले वस्तुओं के प्रयोग के साथ फिर कापी पर अंकों व चिन्हों के प्रयोग के रूप में साथ-साथ चली। इससे बच्चे किसी संक्रिया को मूर्त रूप से भी देख पाए और अमूर्त के रूप में भी समझने की ओर आगे बढे़।

उदाहरण 1 – तुम्हारे पापा ने तुम्हें दो टाफी दी, दो टाफी भैया ने दी। बताओ- तुम्हारे पास कितनी टाफी हुई या मां ने तुम्हें दो चाकलेट दी, तुम्हारे पास 5 चाकलेट हो जाएं, इसके लि‍ए मां को तुम्हें कितनी चाकलेट और देनी होगी?

जब कक्षा 1, 2 या आवश्यकता पढ़ने पर बड़े बच्चों के साथ भी कंकड़ों के माध्यम से इस तरह की बातचीत की जाती है कि ये पांच कंकड़ों की पंक्ति है। इनको क्रम में लगाने से ये पत्थर पांचवां पत्थर है। दूसरी ओर से गिनने पर ये वाला पत्थर पांचवां पत्थर है और ये सब मिलाकर 5 हैं, तो बच्चे को बहुत सारी चीजें एक साथ समझ आती हैं। क्रम से बढ़ना, एक के बाद एक कम या ज्यादा होना, पांच या पांचवें में अन्तर पता चलना आदि।

उदाहरण-2– तुम्हारे घर में 5 मेहमान आए हैं, तुम्हें प्रत्येक मेहमान को 2-2 आम देने हैं। बताओ तुम्हें कितने आम चाहिए या तुम्हारे पास 15 आम हैं। इन्हें तुम्हें अपने 5 मेहमानों में बांटना है। बताओ- प्रत्येक को कितने आम्‍ मिलेंगे या अगर तुम्हें प्रत्येक को 4-4 आम देने हों तो तुम्हें कितने आम और चाहिए?

तुम्हारे पास 4 सेब थे। तुमने दो अपने भाई को दे दिए, तो तुम्हारे पास कितने सेब बचे। हम बड़ों की दृष्टि से ये सवाल बहुत सरल लगते हैं, पर बच्चा जब इन सवालों का हल कंकड़ों व अपने दोस्तों की मदद से निकाल रहा होता है तो मूर्त रूप से अभिनय करता हुआ, गिनता व बांटता हुआ अपने मस्तिष्क में संख्याओं की छबि बनाता चलता है। गणितीय चिन्ह व संख्याएं आत्मसात करता चलता है। इस तरह से की गई गणित की शुरुआत बच्चों की समझ को पुख्ता करती है, और उनमें स्थायी ज्ञान का निर्माण करती है।

मैजिक कार्ड्स का उपयोग करना- स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड बहुत मदद करते हैं। संख्याएं बनाते हुए जब बच्चे 100 और 5 के कार्ड को मिलाकर 105 बनाते हैं तो वे अंकों की जगह को समझते हैं, वहीं संख्याएं बनाते हुए तब तक संख्याएं सही नहीं बनती जब तक कि सभी कार्ड सही जगह पर एक-दूसरे के उपर ना रखे हों। कार्ड जमा करके संख्याएं बनाने के खेल में बहुत-सी अन्य गतिविधियां करवाई जा सकती हैं।

क. अलग-अलग संख्याएं बनाना व उनमें सबसे बड़ी व सबसे छोटी संख्या पहचानना।

ख. कार्ड की मदद से स्थान बदल-बदल कर नयी-नयी संख्याएं बनाना।

. आरोही व अवरोही क्रम में लगाना।

घ. सबसे बड़ी संख्या से सबसे छोटी संख्या घटाना।

ड. अलग अलग बच्चों के पास अलग-अलग संख्या कार्ड हैं, जो संख्या श्यामपटृ पर लिखी है, या मैंने बोली है, वह संख्या मिलकर बनाना। उदाहरण- 5326 बनाने के लिये, वे बच्चे आगे आएंगे जिनके पास 5000, 300, 20 व 6 के कार्ड होगे।

इसी तरह के कार्ड बनाने की आवश्यकता तब लगी, जब कुछ बच्चों ने एक सौ तीन को 103 की बजाए 1003 लिखा।

कई बार कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चे भी उन संख्याओं को लिखने में गलतियां कर देते हैं, जिनमें किसी स्थान पर शून्य भी होता है। ऐसे में समझ आता है कि स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इस अंक का मान हजार है और इसका इकाई है और ये दोनों मिलकर 60001 बना रहे हैं, कहने से काम नहीं चलता। शुरू में बच्चों को कार्ड या रंगबिरंगे मनकों से समझने की आवश्यकता होती है। जब बच्चे खुद कार्ड बनाकर या मनके चुनकर संख्याएं बनाते हैं तो वे उनके स्थान के मान को समझ रहे होते हैं।

जिन बच्चों के साथ कक्षा 1, 2 में अवधारणों के ठीक तरह से काम हुआ होता है, वे ही बच्चे कक्षा 3,4,5 की दक्षताओं पर काम कर पाते हैं। कक्षा 3,4,5 में पाठ्यक्रम के अनुसार काम शुरू करने के लिए बेस तैयार होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि अब संक्रियाएं थोड़ी बड़ी व जटिल होती जाती हैं। ऐसे में पूर्व में बनी समझ अगर स्पष्ट नहीं है, तो नवीन अवधारणाओं को समझने में बाधाएं आती हैं।

गणित क्रम व पैटर्न का खेल है। इसमें संबोध एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। बिना पहला स्टेप पूरा किए सीधे दूसरे या तीसरे स्टेप पर नहीं जा सकते।

संख्या ढूंढो़ सवाल बनाओ-

कक्षा 3,4,5 को स्वयं सवाल बनाकर लाने को कहने पर पता चला कि बच्चे जानबूझकर छोटी संख्याओं से सवाल बना रहे हैं? बड़े बच्चे भी भले ही 7,8 अंकों की संख्या लिख रहे हैं, पर वे अंकों को 4,5 से बड़ा नहीं लिख रहे। इससे ये बात समझ में आई कि बच्चों में बड़ी संख्या या हासिल लेने के लिए डर है। उन्हें डर है कि‍ कहीं उनका सवाल गलत न हो जाए। एक दिन जब कक्षा 3 में जोड़ के कुछ सवाल श्यामपट पर लिख रही थी, तो कुछ बच्चे पूछने लगे कि हासिल वाले सवाल हैं या बिना हासिल वाले। बच्चों को हासिल वाले सवालों से इतना डर क्यों लगता है?

एक और समस्या कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चों के साथ आई, जब मैंने उन्हें दो अलग-अलग संख्याओं को देकर घटाने का इबारती प्रश्न बनाने को कहा तो कुछ बच्चे बड़ी व छोटी संख्या में अन्तर नहीं कर पाए। उन्हें समझ नहीं आया कि किस संख्या को पहले लिखें और किस को बाद में। उन्होनें बिना समझे पहली संख्या को पहले लिखकर उससे दूसरी संख्या को घटाने का प्रयास किया व जहां तक संख्या घटी उसे घटाकर छोड़ दिया।

उदाहरण- 2468-8392= 076

एक और समस्या आई, जब चार पांच अलग-अलग संख्या देकर जोड़ने के सवाल में कुछ बच्चों ने संख्याओं को गलत लगाकर जोड़ दिया और ये ध्यान भी नहीं दिया कि इतनी बड़ी संख्या में उत्तर कैसे आ सकता है? उदारण 20, 402, 7, 27, 3205 को जोड़ना।

-20+402+7+27+(…)+ 3205+18925

जब बच्चे कक्षा 4,5 में इस तरह की गलतियां करते हैं तो यह बहुत ही खीझ और गुस्सा दिलाने वाली घटना होती है। लगता है इतनी छोटी-छोटी बातें बच्चे क्यों समझ नहीं पा रहे।

हालांकि एक बार ध्यान दिलाने पर बच्चों को अपनी गलती का तुरंत पता चल जाता है, पर कुछ दिनों बाद पुनरावृति‍ करने पर कुछ बच्चों के साथ फिर से ऐसी समस्याएं आती हैं। ऐसे में पूरी कक्षा को एक साथ लेकर किसी नई अवधारणा पर काम करना मुश्किल होता है।

वे क्या कारण होते होंगे, जिनसे बच्चे संख्याओं व संक्रियाओं को समझ नहीं पाते, उन्हें संख्याओं से खेलने का मन नहीं करता, उनका ध्यान उनके बड़े आकार या मान की तरफ नहीं जाता ? जब मैंने इस दिशा में सोचना शुरू किया तो पाया कि स्थानीय मान की समझ न होने के अलावा इसका एक प्रमुख कारण बच्चों में संख्याओं का उपयोग करने हेतु कोई उत्साह नहीं होना भी है, वो उत्साह जो उन्हें कहानी या कविता की किसी किताब को पढ़ने में आता है। वो उत्सुकता जो उन्हें पुस्तकालय में जाने की होती है, गणित की किताब देखते ही भय में क्यों बदल जाती है?

अपने आसपास देखकर मुझे कुछ संख्या बताओ पूछने पर जब बच्चों ने दो -चार संख्याएं ही बताई तो मुझे घोर निराशा हुई। बच्चे क्यों नहीं संख्याओं को खोज पा रहे। बच्चों का ध्यान संख्या की ओर आकर्षित करने के लिए मैंने अगले कुछ दिन व्यावहारिक अभ्यास करने का निश्चय किया। दरअसल, गणित की मुख्य समस्या यही है, किताबी संक्रियाओं को व्यवहार में न उतार पाना।

हमने अपने काम की शुरुआत संख्या ढूंढ़ने से की और चीजों को गिनना शुरू किया। जैसे- हमारे विद्यालय में कितने कमरे हैं, तुम्हारी कक्षा में कितने चार्ट लगे हैं, कक्षा में कितनी लड़कियां और कितने लड़के हैं? क्यारी में फूलों के कितने पौधे लगे हैं? आदि।

पहले दिन बच्चों ने सिर्फ संख्याएं खोजीं। विद्यालय में भी और घर में भी।

दूसरे दिन कक्षा में संख्याओं को और विस्तार से खोजा गया। आपस में बातचीत कर संख्याएं ढूंढी़ गईं, जिसके लिए कुछ बिन्दू बनाए। जैसे- तुम्हारी उम्र कितनी है, तुम कितने भाई-बहन हो, तुम्हारे दोस्त की उम्र कितनी है। मैंने बच्चों से कहा वे दो-दो के जोड़े में एक-दूसरे से ऐसे सवाल पूछें जिनसे उन्हें संख्याएं मिलें।

आज घर से संख्याएं ढूढ़ने के लिए भी कुछ प्रश्न बनाए।

जैसे- तुम्हारे घर में कितने सदस्य हैं, उनमें महिलाएं कितनी हैं और पुरुष कितने हैं, बड़े कितने, बच्चे कितने? कौन कहां तक पढ़ा लिखा है, उनकी उम्र कितनी है आदि।

बच्चे घर से ये सारी जानकारि‍यां एकत्रित कर के लाए।

जब हमारे पास बहुत सारी संख्याएं एकत्रित हो गईं, तो इनसे सवाल बनाने की प्रक्रिया शुरू की। कुछ सवालों के उदाहरण स्वयं बच्चों को दिए व उन्हें नए सवाल बनाने को प्रेरित किया। अब बच्चों के पास संख्याएं थीं और उन संख्याओं से सवाल बनाने थे। बच्चों को इसमें मजा आया। वे सवालों के पैटर्न पहचानने लगे, संक्रियाओं का आपसी सम्बन्ध पहचान झटपट नए सवाल बनाने लगे। उनमें एक-दूसरे से ज्यादा सवाल बनाने की होड़ होने लगी। साथ ही एक-दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगी। गणित उन्हें अपने स्वयं के जीवन व घर में आसपास नजर आने लगा। सवाल तैरने लगे। बच्चों ने अपनी घर परिवार में एकत्रित हुई संख्याओं पर 25-30 सवाल बनाए।

जैसे- तुम्हारी मां की उम्र कितनी है?

तुम्हारी उम्र कितनी है?

तुम्हारी मां और तुम्हारी उम्र में कितना अंतर है?

विद्यालय व घर से सवाल बनाना शुरू करके हमने अपने आसपास संख्याएं एकत्रित की। कुछ बच्चों के साथ मिलकर मैंने कुछ टहनियां एकत्रित की। बच्चों ने उन टहनियों पर लगे पत्तों की संख्या गिनी व उन पर सवाल बनाए।

जैसे- सबसे ज्यादा पत्ते किस टहनी पर लगे हैं? सारी टहनियों को मिलाकर कितने पत्ते हैं?

अभी मैं यह सोच ही रही थी कि क्या यह तरीका काम करेगा ? बच्चों का गणित की कक्षा में मन लगेगा। उनका संख्याओं के प्रति उत्साह जागेगा कि बच्चे स्वयं अपनी वस्तुओं व आसपास की चीजों पर सवाल बनाकर दिखाने लगे। जैसे- गणित की किताब में 187 पेज हैं, हिन्दी की किताब में 144 पेज हैं। बताओ किसके पेज ज्यादा हैं? और कितने ? दोनों किताबों के पेज मिलाकर कितने पेज हैं? अगर इसमें संस्कृत की किताब के पेज भी मिला दिए जाएं तो कुल कितने पेज हो जाएगें?  इस तरह के सवालों को हल करने के बाद मैंने बच्चों का ध्यान सवाल बनाने के कुछ पैटर्न की तरफ दिलाया, जिससे हम स्वयं उन सवालों को बना सकें व अभ्यास कर सकें।

जैसे- घटाने के बड़े सवाल बनाना, जिनमें बार-बार हासिल लेनी पड़े, कैसे बनाएंगे ?इसी के साथ बच्चों से दुबारा हासिल की अवधारणा व आवश्यकता पर भी बात की। उन्हें संख्या कार्ड बनाना सिखाया, बच्चों ने इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड स्वयं बनाए व उनसे खूब खेला।

बच्चों ने अपनी चीजों,  स्कूल,  घर व आसपास खूब सारे पैटर्न ढूंढे़। संख्याओं से तरह-तरह के पैटर्न बनाए। बच्चों को सवाल करने अच्छा लगे, उनका आत्मविश्वास बढे़ इसके लिए उनसे कक्षा 1, 2, 3 व कक्षा 5 से 1, 2 , 3 व 4 की गणित की किताब से सवाल हल करवाए। बच्चों ने यह गतिविधि दो तरह से की। वे सवाल जिनका हल उन्होंने मौखिक रूप से निकाला और वे सवाल जिन्हें कापी पर हल करना पडा़। इन सवालों को हल करते हुए उन्होंने यह भी जाना कि वे कितने तरह के सवाल हल कर पा रहे हैं और उन्हें कहां परेशानी हो रही है। बच्चों का संकोच खत्म हुआ। वे यह कहकर सवाल दिखाने आए कि मुझे इतने तरह के सवाल करने आ गए हैं, पर यहां पर कठिनाई आ रही है। जिन बच्चों ने जल्दी-जल्दी काम किया, उन्होंने बाकि बच्चों की मदद की। इस तरह काम करने से सारी समस्याएं तो खत्म नहीं हुई, पर गणित की कक्षा का माहौल जरूर बदल गया। बच्चों में सवालों का हल खोजने की इच्छा जगी। मेरा भी खुद पर आत्मविश्वास बढा़।

ये बात सही है कि गणित में हम प्रत्येक चीज को स्थूल रूप में नहीं दिखा सकते, हमें कल्पना करना व अमूर्त में देखना, महसूस करना आना चाहिए। पर इस अमूर्तता को बच्चे अच्छी तरह समझ पाएं इसके लिए प्रारम्भिक कक्षाओं में खासतौर पर कक्षा 1 व 2 में बच्चों के साथ ढेर सारी बातचीत बहुत जरूरी होती है। सिर्फ गणितीय तरीकों से जिन बच्चों के साथ सवालों को हल करने का अभ्यास करवाया जाता है, वे इबारती प्रश्न हल करते हुए गलतियां करने लगते हैं, क्योंकि वे संबोधों को समझ नहीं पाते। उन्हें पता नहीं चलता कि इस सवाल में किस संक्रिया का उपयोग करना है?

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गणित में रुचि लें तो हमें उन्हें संख्याओं से खेलना सीखाना होगा, उन्हें संख्याएं देखने, खोजने के लिए प्रेरित करना होगा।

इसमें कोई शंका नहीं कि हमारे अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में दो शिक्षक होते है। कहीं-कहीं तो एक ही शिक्षक के भरोसे पूरा विद्यालय होता है। तब इस तरह से गतिविधियों को कराने हेतु पर्याप्त समय नहीं रहता, पर हमें इसी समय व संसाधनों में से कुछ तरीके निकालने होंगे।

मेरे साथ अक्सर होता है कि इन गतिविधियों में काफी समय लग जाता है। लगता है कि अब क्या होगा, क्या बाकी का पाठ्यक्रम समय पर सिखा पॉंऊगी? पर आश्चर्यजनक रूप से इन गतिविधियों के बाद बच्चों के काम करने की गति व उत्साह बढ़ जाता है  और हम पाठ्यक्रम के अनुसार दी गई संक्रियाएं पूरी कर पाते हैं।

शिक्षक होने के लिए बहुत जरूरी है कि निरन्तर सीखने-सिखाने की लौ मन में जगी रहे। आज मैंने क्या सीखा और अपने बच्चों को क्या सिखा पाई। ये बात रोज काम खत्म होने पर मन में उठनी चाहिए। एक बेचैनी बनी रहनी चाहिए कि बच्चे वे दक्षताऐं हासिल क्यों नहीं कर पा रहें, जिनके लिए मैं इतना प्रयास कर रही हूं। क्या बच्चों में कमियां हैं ? क्या मुझे मेरे तरीके बदलने चाहिए? तभी कुछ बात बन सकती है। अपनी पिछले 12 वर्षों के शिक्षण कार्य में मैंने बच्चों के साथ बहुत कुछ सीखा है। ये सीखना जारी है।

शिक्षा का गिरता स्तर जिम्मेदार कौन :   कैलाश मंडलोई

  कैलाश मंडलोई

कैलाश मंडलोई

शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक इस प्रक्रिया से गुजरता हुआ कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। अगर हम शिक्षा की तमाम परिभाषाओं को एक साथ रख दें और फिर कोई शिक्षा का अर्थ ढूंढे़ तो भी हमें कोई ऐसा अर्थ नहीं मिलेगा, जो अपने आप में पूर्ण हो। वर्तमान में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा से लिया जाता है।

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर जो घमासान मचा है, उस परिप्रेक्ष्य में गाँधी, नेहरू और के. टी. शाह के बीच हुई बहस का एक संस्मरण लिखना जरूरी है।

स्वतंत्रता के पूर्व जब जवाहर लाल नेहरू देश की भावी शिक्षा नीति का मसौदा तैयार कर रहे थे, तो गाँधीजी ने के. टी. शाह से पूछा कि आप भावी भारत की शिक्षा कैसी चाहते है? इस पर शाह ने उत्तर दिया कि हम ऐसी शिक्षा चाहते है जिसमें किसी कक्षा में अगर मैं यह सवाल करूँ कि मैंने चार आने के दो सेब खरीदे और उन्हें एक रुपये में बेच दूँ तो मुझे क्या मिलेगा? तो सारी कक्षा एक स्वर में जवाब दे आपको जेल मिलेगी, दो वर्ष का कठोर कारावास मिलेगा। यह उदाहरण हमें यह बताता है कि हमने स्वतंत्रता के पूर्व शिक्षा की किस नैतिकता की अपेक्षा की थी?

किंतु आज शिक्षा शब्द ने अपने अंदर का अर्थ इस कदर खो दिया है कि आज न उसके अंदर का संस्कार जिंदा है और न व्यवहार। शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकता, अव्यवस्था, अनैतिकता और कल्पनाहीनता का पर्याय बन गई है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है? हालांकि काफी हद तक यह बात सही है कि स्कूलों में कुछ शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्‍कूल वक्त पर पहुँचते नहीं हैं। शिक्षक वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है। आये दिन किसी मुद्दे को लेकर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया है। शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न लगना लाजिमी है।

लेकिन यह बात भी सही है कि बहुत से शिक्षक हैं, जो ईमानदारी से पढ़ा रहे हैं। उनके बच्चों में शैक्षिक गुणवत्ता की दक्षताएं हैं। फि‍र सभी शि‍क्षकों दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।

उद्देश्यों और मूल्यों का सवाल आते ही कई लोग आदर्शवाद की धारा में बह जाते हैं। वे उन भौतिक परिस्थितियों को भूल जाते हैं जिनसे उद्देश्यों पर अमल किया जाना है, जिनमें मूल्यों को जीवन में उतारा जाना है। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षक दोषी हैं या यह शिक्षा व्यवस्था और उसको अपने हित में नियंत्रित-निर्मित करने वाली आर्थिक राजनीतिक शक्तियाँ? गिरते स्तर के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु शिक्षा से जुड़े घटकों यथा समाज, प्रशासन, शिक्षक पाठ्यक्रम स्वयं छात्र इत्यादि पर एक दृष्टि डालना उचित होगा।

शिक्षा के गिरते स्तर के कारण उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है। लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग है। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा और न ही सामाजिक चिंतन किया जा रहा है। बातें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की अक्‍सर सुनने में आती है। किन्तु सुधार कहीं नजर नहीं आता।

कुछ दिनों से शिक्षा विभाग में बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर संकुल स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा एक नाटक खेला जा रहा है। इसमें बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता की जाँच की जा रही है, टेस्ट ले रहे हैं। वह भी कैसे की जो स्कूल 45 प्रतिशत उत्‍कृष्ट घोषित हैं, उनके शिक्षकों को बेसलाइनटेस्ट हेतु पेपर दिये। इसमें दो टेस्ट थे। प्रत्येक टेस्ट में भाषा, गणित और अंग्रेजी की लगभग सभी मूलभूत दक्षताओं पर प्रश्‍न थे। और कहा कि‍ कल प्रथम टेस्ट लेना व परसों अंतिम टेस्ट और आपको प्रथम टेस्ट के बाद अंतिम टेस्ट में बच्चे की गुणवत्ता में सुधार भी बताना है। यह कैसे और कहाँ तक संभव है? शिक्षकों पर दबाव डाला जा रहा है कि उनका स्कूल गुणवत्ता पूर्ण की श्रेणी में आ जाए। जिले, विकास खण्ड, संभाग और राज्य स्तर तक के शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी स्कूलों में जा रहे हैं और निरीक्षण कर रहे हैं। अधिकारी शिक्षकों को फटकारनुमा समझाइश देते हैं कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करें। यह कैसी विडंबना है कि स्कूलों में शिक्षक पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्थापित करने का भारी दबाव तो है, मगर उसके लिए तैयार ही नहीं किया गया। उल्टे शिक्षकों को प्रतिमाह प्रशिक्षण के बहाने कक्षा शिक्षण से दूर करने की साजिश रची जा रही है। इसके तहत देश की भोली भाली जनता को यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि शासन को उनके बच्चों की खूब परवाह है। लेकिन उनके जो शिक्षक हैं, वे सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण उनके बच्चे शैक्षिक गुणवत्ता में पिछड़ रहे हैं। सरकार की गलत शिक्षा नीतियों के जो दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं, उनमें सुधार करने कि बजाय इसका ठीकरा शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है। यह कहाँ तक उचित है? सरकार दोष देने के बजाय शिक्षकों को क्षमतावान बनाए।’’ यह कहना है शैक्षिक कार्यकर्ता कालूराम शर्मा जी का।

आज इस बात पर भी गौर करना है कि जिन बच्चों की शिक्षा के बारे में सरकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वे बच्चे किस तबके से आते हैं? उनकी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शैक्षिक स्थिति के साथ स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? क्या ये कारक इन बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे है? यदि हाँ तो फिर सरकार और उनके ये उच्च अधिकारी इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या कर रहे हैं?

आज यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार की दोषपूर्ण शिक्षा नीति के साथ सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। वर्षभर शासकीय शिक्षकों से कई प्रकार के गैर शैक्षिक कार्य लिए जा रहे हैं, जिससे वे अपने छात्रों को पूरा समय नहीं दे पाते और उनके छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। निजी विद्यालय बुनियादी सुविधाओं का उचित प्रबंध रखते हैं। श्री सतीशचन्द्रा के अनुसार, ‘‘आज सरकारी और निजी विद्यालयों में फर्क बहुत साफ नजर आता है। दोनों की पढ़ाई के स्तर में जमीन आसमान का अन्तर है। इसकी एक वजह सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास अधिकारों का अभाव है। निजी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास असीमित अधिकार होते है।’’ यह शिक्षा के निजीकरण का नकारात्मक पहलू भी है। आज हालात यह है कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। लोगों का अंग्रेजियत का मोह और साथ ही प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ के कारण 70 से 80 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में दर्ज हो गए हैं।

सरकारी विद्यालय की शिक्षा की आलोचना दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद भी करते हैं। वे कहते है, ‘‘आज गरीब से गरीब आदमी से बात कीजिए, चाहे वह रिक्शा चालक हो, रेहड़ी लगाता हो या दिहाड़ी मजदूरी करता हो, इनमें से कोई भी अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ाना चाहता। सभी निजी विद्यालयों की ओर भाग रहे हैं, वह भी अंग्रेजी माध्यम की ओर। सर्व शिक्षा अभियान योजना के माध्यम से स्कूल न जाने वाले बच्चों का रुझान स्कूलों की तरफ होना यह साबित करता है कि शिक्षा पाने के लिए हर कोई गंभीर है। लेकिन शासकीय व्यवस्था को देखकर लोगों का मोह भंग हो रहा है। जिससे पैसे वालों के बच्चे निजी स्कूलों मे पढ़ाई करते है। शिक्षा के निजीकरण ने समाज के उच्च वर्गो के स्वार्थ के लिए अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का काम किया है। आज सरकारी स्कूल में समाज के सबसे पिछड़े व अति गरीब वर्ग के बच्चे ही सरकारी शिक्षा का अभिशाप झेलने के लिए विवश हैं।

गौर करने वाली बात है कि जब हमारे देश में शिक्षा के बीच खाईं बनी हुई है, तो उससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होगा। एक तरफ सरकार शिक्षा में सुधार की योजनाएं बनाने में दिलचस्पी दिखाती है, तो दूसरी ओर योजनाओं के सही क्रियान्वयन की ओर कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं की जाती है? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा  का ग्राफ दिन प्रतिदि‍न नीचे की ओर जायेगा। सरकार शिक्षा में किए जा रहे भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाये तो शिक्षा की गुणवत्ता कायम हो सकती है।

बहरहाल, यदि गरीब का बच्चा सरकारी विद्यालय जाता है और उसे सही शिक्षा नहीं दी जाती है और वह शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद अनपढ़ रह जाता है, तो यह सरकार के लिए एक वि‍चारणीय प्रश्न है। सबसे अहम बात यह है कि सरकार शिक्षा में किये जा रहे भेदभाव को मिटाने की ओर पहल करे। देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो। सभी के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम हो जिससे देश में समरसता का वातावरण बने और शिक्षा के निजीकरण ने अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का जो काम किया है, वह कम हो सके।

रिमिक्स के दौर की हिंदी : रोहित प्रकाश

hinglish

शुरुआत से पहले                   

कवि आलोक धन्वा के इकलौते कविता संग्रह का शीर्षक है- ‘दुनिया रोज बनती है’[1]। उसी तर्ज पर मैं ये कहना चाहता हूं कि भाषा रोज बनती है। हिंग्लिश  कुछ जानी और कुछ अन्जानी सी भाषा है और मेरी समझ में इसके बनने का सिलसिला अभी तक उस स्थिति में नहीं पहुंचा है, जहां हम इसे बना हुआ मान लें। भाषाशास्त्री आयशा किदवई भी उस प्रचलित धारणा को खारिज़ करती हैं, जिसमें हिंग्लिश को एक स्वायत भाषा के रूप में देखा जाता है.। उनका मानना है कि, “हिंग्लिश कोई स्वायत भाषाई चीज़ नहीं है। यह, दरअसल, प्रयोगों का एक समुच्चय है। लेकिन यह राजनीतिक रूप से भाषाई प्रयोगों की महत्वपूर्ण व्यवस्था है।”[2] मेरा यह अनुमान है कि आने वाले वक्त में इसके मायने हमारे सामने ज्यादा स्पष्टता के साथ जाहिर होंगे। फिलहाल ये स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि हमारे (शहरी और कस्बाई) जीवन में हिंग्लिश का हस्तक्षेप मुखर है। इसमें मैं ये भी जोड़ना चाहता हूं कि हिंग्लिश अकेले नहीं बन रही है, उसके साथ-साथ एक नई हिंदी और एक नई इंग्लिश भी बन रही है। इस बात को कहने के पीछे सामान्य तर्क ये है कि बहुभाषी समाजों में ट्रैफिक अक्सर दो-तरफा होता है, सिर्फ लेने या सिर्फ देने की बजाय भाषाएं ज्यादातर लेन-देन की समझ से संचालित होती हैं। वह हिंदी या अंग्रेजी, जो हिंग्लिश के सांचे (अगर ऐसा कोई सांचा है तो?) में नहीं ढली है, उन पर भी एक-दूसरे का बढ़ता हुआ असर हम देख सकते हैं।

हिंग्लिश से मेरा अभिप्राय वह भाषा-प्रयोग है, जो हिंदी तो है लेकिन अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग उसमें अबाध रूप से होता है। कभी-कभी अंग्रेजी के समूचे वाक्य तक उस भाषा-प्रयोग में शामिल हो जाते हैं। यह प्रयोग दूसरी तरफ से भी हो सकता है, जिसमें अंग्रेजी की नदी बहती है और हिंदी उसमें गोते लगाती है। लेकिन यहां मेरी मुराद पहले किस्म के प्रयोगों को समझने की है। भाषाविज्ञानी संकेत-मिश्रण (code-mixing) और संकेत-परिवर्तन (code-switching) जैसी पारिभाषिक शब्दावलियों के जरिये इस प्रक्रिया की व्याख्या करते हैं। कभी संवाद और संप्रेषण की जरूरत और कभी प्रभाव उत्पन्न करने की कोशिश के तहत इसका इस्तेमाल होता है। ऐसा कहना अतिरेक न होगा कि हिंदी अब सरकार से ज्यादा बाजार की भाषा है (और सरकार की ताकत और बाजार की ताकत आपस में घुल-मिल गई है), और बाजार सरकारी हिंदी या आम जीवन की हिंदी की जगह हिंग्लिश के चलन को बढ़ावा दे रहा है। नए बाजार के वैश्विक चरित्र और उसमें शामिल तकनीक की भाषाई मजबूरी ने इस प्रयोग को तीव्र किया है। इस परचे के दौरान हिंग्लिश की ‘चाल, चेहरा और चरित्र’ ज्यादा स्पष्टता से सामने आएंगे।

मैं अपने परचे में हिंग्लिश की उपस्थिति को ‘कानूनी’ दायरे में समझने की कोशिश करूंगा। कानूनी शब्द का इस्तेमाल मैं लगभग मुहावरे की तरह रोजमर्रा की जिंदगी में प्रचलित वाक्य का सहारा लेकर कर रहा हूं, जिससे शायद सब वाकिफ होंगे- ‘बोलने से नहीं चलेगा, लिखित में दो’।

किसी भी भाषा की निर्मिति और पहचान का आधार उसका अधिकाधिक इस्तेमाल होता है, और जब वो ‘बोलचाल’ से आगे जाकर ‘लिखित’ का रूप लेने लगती है, उसी समय उसके औपचारिक होने की शुरूआत भी हो जाती है। निरंतर विविध विषयों की सूचना देने की अपनी क्षमता की वजह से दैनिक अखबार इस प्रक्रिया को रोजमर्रा के जीवन में देखने का सबसे अच्छा माध्यम हैं. अखबारी पत्रकारिता के इस खास महत्व के बारे में राकेश भट्ट की राय काफी महत्वपूर्ण है-

“…अख़बारी पत्रकारिता एक नई सामाजिक-वैचारिक चेतना की सैद्धांतिक संभावना, अर्थ-निर्माण के नए तरीके, और संवाद-संबंधी व्यवहार के मौखिक निश्चय को प्रस्तुत करती है।”[3]

इसलिए मैंने हिंग्लिश की इस परिघटना का विश्लेषण करने के लिए राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स पर ध्यान केन्द्रित किया है। हिन्दी में लगभग दर्जनभर राष्ट्रीय स्तर के अखबार निकलते हैं, लेकिन इसे हम हिंग्लिश का प्रतिनिधि अखबार कह सकते हैं। हो सकता है कि आने वाले दिनों में हिंग्लिश को स्थापित करने का श्रेय लेने वाले दावेदारों की कतार में नवभारत टाइम्स सबसे आगे हो।

इस लेख में दो प्राथमिक कार्य किए गए हैं। पहला, जो हिंग्लिश भाषा नवभारत टाइम्स द्वारा बनाई जा रही है, वह कैसी है? उसमें किस तरह का मिश्रण हो रहा है? अंग्रेजी के शब्दों का उसमें अनुपात क्या है? बुनियादी रूप से लिखित भाषा को बदलने का इसमें आग्रह है या ये दाल-भात में सिर्फ चटनी की तरह है? ऐसा कर पाने की कोशिश में मोटे तौर पर अक्टूबर, 2013 से मार्च, 2014 तक के नवभारत टाइम्स का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया गया है। यही इस लेख की प्राथमिक शोध सामग्री है. दूसरा, हिंग्लिश और नवभारत टाइम्स की भाषा को लेकर हिन्दी समाज की क्या प्रतिक्रिया रही है? इसके लिए यत्र-तत्र लिखे गए आलेखों, टिप्पणियों और निजी बातचीत व अनुभवों का सहारा लिया गया है। हिंदी को लेकर शुद्धतावादी आग्रहों और वैचारिक लचीलेपन के टकराव को समझने की कोशिश भी की गई है।

हिंग्लिश के उपयोग को लेकर मेरी धारणा, अनुभव या विचार बहुत लचीले नहीं थे। मुझे लगता है कि साहित्य की पृष्ठभूमि और विशिष्ट सामूहिकता के बीच रहने की वजह से मेरे साथ ऐसा हुआ। बोलचाल की भाषा में कुछ इंग्लिश के शब्द आ भी जाएं, लेकिन लिखते समय मैं सचेत रूप से इसका ख़्याल रखता था कि इंग्लिश के शब्द उसमें न आ पाएं। भाषा को लेकर जो शुद्धतावादी आग्रह है वो भाषाई ‘ज्ञान’ के दावे से उपजा है। इस नजरिये से देखने पर विद्वानों के एक समूह की ये मान्यता स्वाभाविक लगती है कि इस ज्ञान का अभाव ही हिंग्लिश के उभार की वजह है। दूसरी तरफ ये स्थिति एक संसारिक तथ्य की तरह लगती है कि भिन्न समूहों के बीच संवाद की मजबूरी या उत्कट भावनात्मक इच्छा का भी ये परिणाम हो सकता है। हिंग्लिश के कुछ चुनिंदा अनुभवों में 2002 की एक उल्लेखनीय याद शामिल है। इराक पर अमरीकी हमले के ख़िलाफ़ मैंने एक कविता लिखी जो जार्ज बुश को संबोधित थी। उसकी आख़िरी पंक्ति थी, ‘क्योंकि बुश तुम बहुत अच्छा मुस्कुराते हो, रियली!’ मुझे लगता है कि यही वो जगह है, जहां से हिंग्लिश की जरूरत शुरू होती है। ये जगह संवाद की है, संप्रेषण की है, बात पहुंचाने की कोशिश ने इस जगह को निर्मित किया है।

निश्चित तौर पर, टीवी, इंटरनेट, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग आदि ने हिंग्लिश के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। इनकी देखा-देखी अख़बारों और पत्रिकाओं ने भी ये राह पकड़ ली है। मनोरंजन, खेल, व्यापार  आदि से जुड़ी ख़बरों की भाषा तो अनिवार्य रूप से हिंग्लिश हो गई है। हिंग्लिश के ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क ‘युवा’ होता है, क्योंकि वो यही भाषा समझता है। मेरा एक निजी अनुभव भी इसकी तस्दीक़ करता है। हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर के जिस ओप-एड पेज़ पर मैं तीन साल से एक कॉलम लिख रहा था, अचानक एक दिन वो पेज़ बंद कर दिया गया और उसकी जगह ‘लिव वेल, लुक वेल’ नाम का नया पेज़ शुरू हो गया। दैनिक भास्कर के प्रबंधन ने अख़बार को युवाओं की ओर उन्मुख बनाने के लिए ये नीतिगत फ़ैसला लिया था।

छोटे शहरों के 12वीं-बीए पास युवा जब नौकरी की तलाश में बड़े शहरों में दाख़िल होते हैं, तो इनके जीवन और काम की स्वाभाविक भाषा हिंग्लिश ही होती है। जब आप भाषा नहीं जानते तो भाषा बनाते हैं, और जब बहुत बड़ी आबादी भाषा बनाने के काम में लगी हो, तब वो अच्छी-खासी हिंग्लिश बन जाती है।

खुले बाजार की अर्थव्यवस्था के दौर में एक विशिष्ट सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली एक बड़ी आबादी की सीमित बौद्धिक जरूरतों को पूरा करने का काम टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स ने किया। जैसा कि आमतौर पर कारोबारियों के बारे में मशहूर है कि वे न सिर्फ उपभोक्ता की जरूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि उनकी जरूरतों को बढ़ाते भी हैं। इस समूह के बारे में खुशवंत सिंह की राय काफी उल्लेखनीय है-

“इसे (टाइम्स ऑफ इंडिया समूह) चलाने वाली त्रिमूर्ति जानती है कि क्या जरूरी और क्या गैर-जरूरी है। आर.के. लक्ष्मण गैर-जरूरी नहीं है (उनका महत्व तीन संपादकों जितना है)। ईश्वर और धर्म भी गैर-जरूरी नहीं हैं। इसलिए इसमें ईश्वर, योग, ध्यान पर लेख और धर्मग्रंथों से उद्धरण होते हैं। अपर्याप्त कपड़े पहनी अभिनेत्रियां भी गैर-जरूरी नहीं हैं- पुरूष पाठकों को हर सुबह कुछ रोमांच की जरूरत होती है। पुस्तकें और पुस्तक-समीक्षा उतनी ही गैर-जरूरी है जितने संपादक।”[4]

मेरा अनुमान है कि पांरपरिक अखबारी हिंदी नवभारत टाइम्स के लिए गैर-जरूरी (dispensable) हो चुकी थी। इसकी पुष्टि समूह के कार्यकारी अध्यक्ष राहुल कंसल भी करते हैं-

“मैं टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स दोनों के साथ करता हूं- दो अखबार जो भाषाओं के संकरण (hybridization) के साथ सबसे ज्यादा प्रयोग करते हैं। और मैं कहता हूं कि हिंग्लिश में एकीकरण की ताकत है, जो अंग्रेजी के ‘चटनीफिकेशन’ (chutnefication) की तुलना में मुख्य रूप से हिंदी के ‘केचपाइजेशन’ (ketchupization) का परिणाम है। हिंदी एक स्पंज (sponge) की तरह रही है, जो जितना संभव है अंग्रेजी को सोख रही है…। हमारे संपादकों को कहा जाता है कि अंग्रेजी के शब्दों का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल करें जिससे पाठक परिचित हैं-  और ये मदद करता है।”[5]

यह कथन नई हिंदी के साथ-साथ उस नई अंग्रेजी की तरफ भी इशारा करता है, जिसका जिक्र मैंने इस पर्चे में पहले किया है। बहरहाल, नवभारत टाइम्स की हिंग्लिश पर लौटने से पहले इस हिंदी अखबार के ऐतिहासिक कालक्रम को जान लेना उचित होगा। 3 अप्रैल 1947 से इसका प्रकाशन शुरू हुआ। पहले इसका नाम ‘नवभारत’ था, जिसे 29 जून 1950 को ‘नवभारत टाइम्स’ कर दिया गया। इसके पहले संपादक सत्यदेव विद्यालंकार थे। उसके बाद से 18 संपादकों ने इस अखबार की जिम्मेदारी संभाली है, जिनमें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, विद्यानिवास मिश्र आदि शामिल हैं।[6] फिलहाल इसका संपादन रामकृपाल सिंह कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया अध्येता सेवंती निनान इसके इतिहास का सार कुछ इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं-

“बेन्नेट्, कोलमैन एंड कं. ने अप्रैल 1947 में नवभारत टाइम्स की शुरूआत स्वतंत्र भारत को इसकी अपनी भाषा में संबोधित करने के घोषित मिशन के साथ की। 1980 के दशक के मध्य में दिल्ली, बॉम्बे, पटना, जयपुर, लखनऊ के संस्करणों के साथ इसने राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करना शुरू किया। जब राजेन्द्र माथुर ने नई दुनिया का संपादन छोड़कर नवभारत टाइम्स का संपादन करना शुरू किया, तो इसे गुणवता के लिए संपादकीय प्रतिष्ठा भी हासिल हुई, और इसके प्रसार में भी तेजी से इजाफा हुआ। लेकिन श्रमिक संगठनों की समस्याओं के चलते 1989 में लखनऊ में 8 महीने की कामबंदी के बाद प्रबंधन ने 1990 में लखनऊ और पटना संस्करण को पूरी तरह बंद कर दिया। 1991-92 में इसने एक नीतिगत निर्णय के तहत दिल्ली, बॉम्बे को छोड़कर सारे संस्करण बंद कर दिए। हालांकि नवभारत टाइम्स ने 2005 में दिल्ली, बॉम्बे के हिंदी बाज़ार में नेतृत्व का दावा किया, लेकिन हिंदी अख़बारों के बाज़ार में बहुत पहले ही गंभीर राष्ट्रीय प्रतियोगी के रूप में इसकी पहचान खत्म हो चुकी थी।”[7]

अभी नवभारत टाइम्स के  लगभग 8 संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। दिल्ली और मुंबई के पुराने संस्करणों के अलावा एनसीआर पर ध्यान केन्द्रित करते हुए 2007 में गाजियाबाद, फरीदाबाद और नोएडा से अखबार के संस्करण शुरू किये गए। हालांकि, 2008-9 की मंदी के दौरान इनको स्थगित कर दिया गया, लेकिन 2010 में गुड़गांव के नए संस्करण के लांच के साथ इन्हें फिर से शुरू किया गया। 2011 में ग्रेटर नोएडा से भी अखबार निकलने लगा और 2013 में लगभग दो दशक के बाद दिल्ली संस्करण की छपाई लखनऊ से भी होने लगी। अखबार के ब्रांड हेड अमन नायर का कहना था कि इन स्थानीय संस्करणों के जरिये स्थानीय विज्ञापनदाताओं से जुड़ने का एक बड़ा मौका हासिल होगा।[8] विज्ञापन आधारित पत्रकारिता की इस सोच का सिरा टाइम्स समूह के प्रबंध निदेशक विनीत जैन की उस सहज स्वीकारोक्ति से जुड़ता है, जो उन्होंने द न्यू यार्कर के केन ऑलेटा के सामने की थी-

टाइम्स को पत्रकारिता के व्यापार में शामिल मानना इसे काफी सीमित करने वाली सोच है।”[9]

इस बयान की विस्तृत व्याख्या वरिष्ठ पत्रकार आर. जगन्नाथन ने कुछ ऐसे की थी-

“टाइम्स ऑफ इंडिया मानता है कि इसका मिशन “उपभोग” (consumption) को सहज बनाकर विज्ञापनदाताओं के हितों को बढ़ावा देना है। पत्रकारिता इस व्यापार में एक सहायक है।”[10]

मैं लगे हाथ नवभारत टाइम्स और विज्ञापन के रिश्ते के इतिहास से जुड़ी हुई एक जानकारी भी यहां रखना चाहता हूं, जिससे थोड़ा-थोड़ा उस समय का भी अंदाजा लग सके जब पत्रकारिता और उसकी भाषा में बड़े बदलाव होने शुरू हुए थे। पहली बार पहले पन्ने पर आधे पेज का विज्ञापन अंसल हाउसिंग ने 23 दिसंबर, 1996 को दिया था और पूरे पन्ने का पहला विज्ञापन डूलक्स पेंट का होली के दिन 24 मार्च, 1997 को आया था।[11]

इस स्थिति में ये संदेह करने की गुंजाइश बहुत बढ़ जाती है कि नवभारत टाइम्स के सारे संस्करण विज्ञापन के बाजार को भुनाने के रणनीतिक चुनाव हैं। इन दोनों बातों पर मैं इसलिए जोर दे रहा हूं, क्योंकि ये वजहें भाषा के उस अर्थशास्त्र को गढ़ रही हैं, जिसमें हिंग्लिश नाम का उत्पाद सर्वाधिक मुनाफे की गारंटी देता है।

नवभारत टाइम्स की भाषा हमारे लिए हिंग्लिश की एक नई दुनिया के दरवाजे खोलती है. ‘कानूनी’ दायरे के भीतर इस पैमाने पर रोजमर्रा के जीवन में हिंग्लिश के उत्पादन और उपभोग का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि दूसरे दैनिक अखबार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहे। दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान आदि अखबारों में हिंग्लिश को लेकर नीति के स्तर पर एक लचीलापन आया है, लेकिन वे अभी भी चुनिंदा विषयों तक सिमटे हुए है और तुलनात्मक रूप से हिंग्लिश का इस्तेमाल वहां कम है। मुख्य रूप से, युवाओं से जुड़े मुद्दों, फैशन और सिनेमा आदि में ये अखबार हिंग्लिश का इस्तेमाल करते हैं। जनसत्ता, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा आदि अखबारों की भाषा में अंग्रेजी के चालू शब्द ही शामिल हो सके हैं। आई नेक्सट् एक ऐसा टैब्लॉइड (छोटे आकार का अखबार) है जिसके उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के 13 शहरों से संस्करण निकलते हैं। यह दैनिक जागरण समूह का अखबार है। ऐसा लग सकता है कि नवभारत टाइम्स की भाषा से इसका मुकाबला है, लेकिन कुछ बातें उसे अलहदा बनाती हैं। अव्वल तो ये एक टैब्लॉइड है, ये खुद के द्विभाषी (bilingual) होने का दावा करता है, और इसमें रोमन लिपि और अंग्रेजी व्याकरण में हेडलाइंस वगैरह लगाए जाते हैं। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि अमर उजाला समूह का टैब्लॉइड कॉम्पैक्ट ऐसी किसी कोशिश में नहीं लगा है। इस संदर्भ में मुझे टाइम्स समूह की नीतियों के असर के बारे में आउटलुक पत्रिका के संपादक कृष्णा प्रसाद की राय काफी महत्वपूर्ण लगती है-

“हर प्रतिद्वंदी पहले इस पर भड़कता है, इसे लेकर नाराज़ होता है, और फिर चुपचाप इसकी नकल करने लगता है। भारतीय बाजार के हर खिलाड़ी, भाषा कोई भी हो, के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं और जो अख़बार ऐसा कहते हैं कि वो ये नहीं कर रहे हैं, बुनियादी रूप से झूठ बोल रहे हैं।”[12]

अजब-गजब भाषा

ये एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हिंग्लिश की ये परिघटना सिर्फ हिन्दी में नहीं, बल्कि इंग्लिश में भी हो रही है। इस तरह से देखा जाए तो ये दो-तरफा यातायात (two-way traffic) है। राकेश एम. भट्ट ने अंग्रेजी अखबारों की हिंग्लिश का अध्ययन करते हुए 2001 से 2006 के बीच के करीब 5 वर्षों में द टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के क्रमश: 145 और 144 अंकों (issues) में संकेत-परिवर्तन (code-switching) को देखने की कोशिश की है। उनके अनुसार, 2001 में द टाइम्स ऑफ इंडिया के 30 अंकों में 181 और 2006 के 31 अंकों में 225 बार संकेत-परिवर्तन यानी हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल हुआ, कुल 145 अंकों में 856 उदाहरण ऐसे हैं।[13] यहां मेरा ये निवेदन है कि नवभारत टाइम्स के हर अंक में होने वाले संकेत-परिवर्तन हजारों की संख्या में हैं। इस तरह का अंतर निश्चित रूप से एक नई व्याख्या की मांग करता है। बावजूद इसके इन दोनों स्थितियों में कुछ वैचारिक समानताएं भी हैं। भट्ट लिखते हैं-

“अख़बार में होने वाले संकेत-परिवर्तन एक ऐसी राह दिखलाते हैं, जिसमें सांस्कृतिक पाठ व्यापक सांस्कृतिक मूल्यों और विचारधाराओं के निर्माण में शामिल होते हैं।”[14]

शायद यही वजह है कि अखबारों द्वारा विकसित की जा रही भाषा का सामाजिक जीवन में पुनर्उत्पादन होता है और वो एक लापरवाह, अचेतन अभिव्यक्ति से आगे जाकर संस्कृति की शक्ल लेने लगती है। अखबारों में होने वाले संकेत-परिवर्तन के उद्देश्यों की व्याख्या भी भट्ट स्पष्ट तरीके से करते हैं-

“अंग्रेजी-हिंदी संकेत-परिवर्तन अख़बार के विशिष्ट जगत में सामाजिक कर्ताओं को विरासत में हासिल सामाजिक प्रयोगों की व्यवस्थाओं से मुक्त होने और रचनात्मक रूपांतरण में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हुए प्रतीत होते है। अपनी परंपरा के सांस्कृतिक संसाधनों का लाभ लेते हुए, अन्य परंपराओं के साथ-साथ, नए प्रयोगों की तरफ मुड़ने के लिए भी वे प्रेरित करते हैं।”[15]

लेकिन किसी भाषाई प्रवृति के पीछे संगठित मंशा के सूत्र तलाशने की कोशिशें कई बार निशाने पर नहीं लगती, ये भटका भी सकती हैं। भाषाई मिश्रण की नीति या छूट और मिश्रण के स्वरूप की व्यवस्थित समझ का हमेशा तालमेल होना जरूरी नहीं होता। खासतौर पर अखबारी पत्रकारिता की शैली नीति और कार्य के बीच संयोजन के ऐसे अवसर अक्सर मुहैया नहीं करा पाती। इसलिए भट्ट की ये स्थापना अतिरंजना का शिकार लगती है-

“माध्यम का परिवर्तन, एक सोद्देश्य और रणनीतिक तरीके से, संदेश का सांस्कृतिक रूप से निकटवर्ती व्याख्यात्मक संदर्भ उत्पादित करता है, जिसके साथ अख़बार का द्विभाषी/द्विसांस्कृतिक पाठकवर्ग काफी परिचित है।”[16]

कम से कम हिंदी के मामले में तो ऐसा नहीं लगता कि द्विभाषी पाठक की कल्पना किसी किस्म की भाषाई रणनीति का सबब बन सकती है। हिंदी अखबारों के पाठक वर्ग का अंग्रेजी भाषा पर अधिकार, अपवादों को छोड़कर, उतना नहीं होता कि उसे द्विभाषी कहा जा सके और खासतौर पर शहरों में अंग्रेजी का साधारण ज्ञान भी पाठकों को अंग्रेजी अखबारों की तरफ मोड़ देता है। इस संदर्भ में प्रिंट और टीवी मीडिया के बीच क्या एक बड़ा अंतर है? क्या विशिष्ट अवसरों पर टीवी के दर्शक हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी चैनलों की तरफ चले आते हैं? क्या दृश्य माध्यम की ताकत, पैकेज प्रणाली के तहत टीवी चैनलों की उपलब्धता और पढ़ने में लगने वाली मेहनत का अभाव कुछ ऐसे कारण हैं जो दर्शकों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं? इन सवालों का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है।

प्रिंट और टीवी पत्रकारिता की तुलना कई और महत्वपूर्ण बिंदुओं को सामने ला सकती है। इससे बोलचाल और लिखित भाषा के अंतर को समझने में भी मदद मिल सकती है। वैसे यह मानना एक गलतफहमी है कि न्यूज़ चैनलों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है। एक न्यूज़ चैनल में काम करने और लंबे समय से एक दर्शक के रूप में हिंदी और अंग्रेजी के चैनलों को देखने के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि उनमें आसान भाषा बोलने का आग्रह जरूर है, लेकिन हिंग्लिश की तरफ कोई निर्णायक झुकाव नहीं है। आदत और जरूरत के हिसाब से तालमेल बनाने का लचीलापन भी है। निश्चित रूप से, युवा, व्यापार, फैशन, सिनेमा आदि से जुड़ी ख़बरों में हिंग्लिश का अधिकाधिक इस्तेमाल होता है। हिंग्लिश कानों की तो आदत बन चुकी है, लेकिन आंखों को अभी भी ये चुभती है, खासतौर पर लंबी रपटों में। इसलिए प्रिंट ये खतरा पूरी तरह से नहीं उठा पाया है, क्योंकि सुनाना तो आसान है लेकिन पढ़ाना मुश्किल।

प्रिंट जगत पर व्यापक दृष्टि डालने पर नवभारत टाइम्स का उदाहरण अपवाद की तरह नज़र आता है। एक बड़ा अंतर यह भी है कि न्यूज़ चैनल क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों किस्म के है, लेकिन अख़बार क्षेत्रीय संस्करणों में बंट गए हैं। जगह के हिसाब से उनके भाषा-प्रयोगों में तब्दीली आती रहती है। दूसरी तरफ, निजी रेडियो चैनलों और विज्ञापन वगैरह में हिंग्लिश ने एक सहजता प्राप्त कर ली है। शहरी और उच्च-कस्बाई जीवन इनके निशाने पर हैं, क्योंकि वे खपत के इलाके हैं। रेडियो की तो ज्यादातर अंतर्वस्तु (Content) युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। विज्ञापन के साथ भी यह एक हद तक लागू होता है। साहित्यिक लेखन में हिंग्लिश का असर शायद इनमें सबसे कम है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में कुछ कहानियां और उपन्यास लिखे गए, जिनमें हिंग्लिश के प्रयोगों की बहुतायत है, लेकिन इन्हें ‘लोकप्रिय साहित्य’ के रूप में देखा जाता है। बड़े पैमाने पर जो साहित्य लिखा जा रहा है, उनमें किरदार भले ही कभी-कभार हिंग्लिश का प्रयोग कर लेते हों, आख्यान में वो ज्यादा नजर नहीं आता। इस पृष्ठभूमि में नवभारत टाइम्स की भाषा काफी ‘बोल्ड’ लगती है, भले ही ‘ब्यूटीफुल’ न हो।

वैसे अखबार के पाठक संकेत-परिवर्तन के माध्यम से आई अंग्रेजी से ज्यादातर परिचित होते हैं क्योंकि वे आम इस्तेमाल में होती हैं और अखबार को इसी स्थिति का लाभ मिलता है। दूसरी तरफ, कई बार अंग्रेजी के शब्दों का चयन पाठकों को चुनौती भी देता है। यह चुनौती पाठकों को बांधती है और दूर भी करती है। मैं आगे नवभारत टाइम्स की भाषा का विश्लेषण करते वक्त इन दोनों प्रवृतियों को उदाहरण के जरिये साबित करने की कोशिश करूंगा। आगे बढ़ने से पहले मैं यहां एक स्वीकारोक्ति करना चाहता हूं। इस शोध के दौरान नवभारत टाइम्स की भाषा को जितना ज्यादा मैं पढ़ रहा था, मेरा ये एहसास लगातार मजबूत हो रहा था कि ये वो हिंग्लिश नहीं है जिसे हम इस्तेमाल करते हैं और जिसके बारे में विरोधी चिंतित और पक्षधर उत्साहित रहते हैं। यह हमारी कल्पनाओं से बहुत आगे की हिंग्लिश है। मैं आपके सामने उसके कुछ नमूने पेश कर रहा हूं।

7 अक्टूबर 2013 को ‘मेट्रो के पास इमरजेंसी लैंडिंग’ शीर्षक से पहले पन्ने पर छपी खबर की भाषा देखिए-

“गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस से टू-सीटर प्लेन ने दिल्ली की तरफ उड़ान भरी लौटते वक्त पायलट को तकनीकी फॉल्ट का पता चला तो पार्क में इमरजेंसी लैंडिंग कराई

…प्लेन इमरजेंसी लैंडिंग कर रहा था। लैंडिंग सेफ थी और दोनों पायलट भी सलामत थे, अचानक पायलट घोष को लगा कि प्लेन में टेक्निकल फॉल्ट है…।”

ये हिंग्लिश तो है, लेकिन उसी दिन दूसरे पन्ने पर छपी खबर जैसी नहीं। इस खबर का शीर्षक है, ‘हैंड, फुट एंड माउथ डिजीज’। इसके कुछ वाक्यांश हैं-

“घबराएं नहीं, बस रहें एलर्ट
मानसून सीजन में वायरस रहता है ज्यादा एक्टिव, फैलती है बीमारी
बॉडी के अंदर फ्यूइड कम न होने दें
पैरेंट्स के नाम एडवाइजरी जारी
स्कूलों ने प्राइमरी सेक्शन को क्लोज कर दिया है
शरीर पर रैशेज हैं
सभी क्लासेज को क्लोज नहीं किया जा सकता
फॉगिंग करवाई जा रही है…।”

इन दोनों खबरों में एक बात ध्यान देने लायक है। पहली खबर में जहां तकनीकी और टेक्निकल दोनों शब्द हैं, वहीं दूसरी खबर में बॉडी और शरीर हैं। पृष्ठ.4 पर युवाओं और शिक्षा से जुड़ी खबर में लगभग 50 फीसदी शब्द अंग्रेजी के हैं-

“DU फाउंडेशन कोर्स
25 मार्क्स प्रोजेक्ट के होंगे
ग्रुप के हर स्टूडेंट्स को बराबर नंबर
20 नंबर का सेमेस्टर एग्जाम
15 नंबर प्रेजेंटेशन के बेस्ड पर”

ये हाल युवाओं से जुड़ी लगभग हर खबर के साथ है। लेकिन आर्थिक मामलों से संबंधित खबरें एक नए किस्म की हिंग्लिश लेकर आ रही है। पृष्ठ. 11 पर नई दिल्ली से बाबर जैदी की खबर है, ‘फाइनेंसियल सेक्टर पर फोकस से लॉस’। पहला पैराग्राफ है-

“इनवेस्टमेंट में डायवर्सिफिकेशन सेफ्टी नेट का काम करता है, लेकिन ये तभी असरदार होता है जब फोकस्ड नहीं हो।”

इसी पन्ने पर मुंबई से शिल्पी सिन्हा की खबर की भाषा भी इसी तरह की है। ‘नए बीमा नार्म्स से घटेगा एजेंटस का कमीशन’ शीर्षक इस खबर में आगे लिखा गया है-

“…ट्रेडिशनल प्रोडक्ट्स के लिए नए नार्म्स बनाए हैं, जिसका मकसद पॉलिसीहोल्डर्स के लिए कॉस्ट घटाना, रिटर्न बढ़ाना, और मृत्यु होने की स्थिति में पेआउट बढ़ाना है। नए नार्म्स से इंश्योरेंस कंपनियों को पॉलिसीज के डिसकंटीन्यूएशन से होने वाला बेनिफिट भी कम होगा।”

यहां यह सवाल उठता है कि आर्थिक मामलों से जुड़ी खबरों में अंग्रेजी के शब्दों की बहुतायत क्यों हो जाती है ? इसकी एक वजह तो ये है कि अर्थव्यवस्था की चुनिंदा अंग्रेजी शब्दावली अरसे से आम चलन में हैं, लेकिन दूसरा फार्मूला यह है कि ये खबरें मूलत: अंग्रेजी में लिखी जाती हैं और उनका अनुवाद होता है। अनुवाद करते वक्त अंग्रेजी के शब्दों को ज्यादा-से-ज्यादा रहने दिया जाता है। इसका एक और नमूना मैं यहां पेश कर रहा हूं। 19 अक्टूबर 2013 को पृष्ठ.17 पर कोलकाता से ऋतंकर मुखर्जी की खबर है- ‘छोटे पैक का कश लेंगे सिगरेट मेकर्स’। खबर की शुरुआत कुछ इस तरह होती है-

“छोटे प्राइस पैक लॉन्च कर मार्केट रिवाइव करने के मामले में आईटीसी और गॉडफ्रे फिलिप्स जैसे टॉप सिगरेट मेकर्स कोला और एफएमसीजी फर्मों की राह पर आगे बढ़े हैं।”

इसके उलट उसी दिन अखबार के पहले पन्ने पर ‘OMG! ओह माई गोल्ड’ शीर्षक से एक खबर छपी है। इसके शीर्षक में तो हिंग्लिश की बाजीगरी है, लेकिन मूल खबर में नहीं। क्योंकि न तो ये डेस्क पर लिखी गई है और न अंग्रेजी में। इसे अनिल यादव ने डौंडियाखेड़ा से हिंदी में लिखकर भेजा है-

“उन्नाव के इस गांव में गंगा किनारे बने विशाल टीले पर सुरक्षा चाक-चौबंद थी। कुछ देर बाद यहां दबा खजाना निकालने के लिए खुदाई शुरू कर दी गई। बताया जा रहा है कि 19वीं शताब्दी के इस किले में 1000 हजार सोना दबा हुआ है।”

मैं यहां यह जोड़ दूं कि ये सबकुछ संत शोभन सरकार के सपने के बाद घटा था। 8 दिसंबर 2013 को पहले पन्ने पर छपी खबर के साथ भी कुछ ऐसा ही है। शीर्षक है- ‘हंग से तंग होगी दिल्ली?’. इस खबर में कई उपशीर्षक हैं,  ‘मैजिक नंबर 36’, ‘सीन 1’, ‘सीन 2’, ‘सीन 3’, ‘सीन 4’. दिलबर गोठी की इस पूरी खबर में अंग्रेजी के शब्द न के बराबर हैं।

‘चंडीगढ़ जैसी नाइटलाइफ स्ट्रीट मिल जाए तो…’ चंडीगढ़ से अजय गौतम की पृष्ठ.11 पर छपी यह खबर मूल हिंदी में लिखे होने के बावजूद अंग्रेजी शब्दों से भरी हुई है। क्योंकि यहां मसला युवाओं और खानपान की किस्मों से जुड़ा है। यहां इस बात को भी समझने की जरूरत है कि हिंग्लिश की इस रचना प्रक्रिया में संवाददाताओं और पत्रकारों की भौगोलिक पृष्ठभूमि भी काफी मायने रखती है।

हिंग्लिश का एक ज्यादा तर्कसंगत उदाहरण सचिन के संन्यास लेने के बाद हुई पत्रकार वार्ता की 18 नवंबर 2013 को पहले पन्ने पर छपी रिपोर्ट है। शीर्षक है- ‘पछतावा नहीं, खेलना बंद करने का यह राइट टाइम था’. आगे के कुछ वाक्य हैं-

“बॉडी मेसेज देने लगती है
24 दिन रिलैक्स करने दीजिए
वाइफ के साथ ब्रेकफास्ट एंजॉय किया
टेक्सट मेसेज भेजे थे।”

शायद नवभारत टाइम्स इसी हिंग्लिश को गढ़ना चाहता है जिससे शहरी मध्यवर्ग जुड़ सके, लेकिन इस प्रयास में वो कभी ज्यादा और कभी कम के दो अन्य ठिकानों के बीच झूलता रहता है। क्योंकि नीति तो है, लेकिन समान रूप से प्रशिक्षित कार्यपालक नहीं हैं। भाषा की एकरूपता की कोई गंभीर कोशिश भी नहीं दिखती। बेतरतीब प्रयोगों के जरिये ‘जो हो रहा है, होने दो’ वाली चाल है।

उसी दिन नई दिल्ली से नरेन्द्र नाथ की पृष्ठ.5 पर छपी खबर ‘टॉप लीडरों ने पब्लिक से जुड़ने का खोजा नया तरीका’ इससे एक मिलता-जुलता दूसरा उदाहरण है-

“टिवटर, FB पर इलेक्शन फाइट
कांग्रेस और बीजेपी दोनों इस मीडियम का ज्यादा यूज करने में लगी है
आईटी सेल में कई एक्सपर्ट

दोनों दलों के आईटी सेल में आईआईटी और आईआईएम पासआउट प्रोफेशनल इनके सोशल मीडिया कैंपेन को मैनेज करते हैं।”

ऐसा नहीं है कि हिंग्लिश के बारे में लोग सिर्फ बाहर बात कर रहे हैं, नवभारत टाइम्स के पन्नों पर भी बड़े धूमधाम से इसका जिक्र हो रहा है। 15 दिसंबर 2013 को पृष्ठ.8 पर गुलजार का इंटरव्यू छपा है, जिसमें वो कहते हैं कि उन्हें हिन्दुस्तानी-हिंग्लिश का घालमेल पसंद नहीं है। अलबत्ता, ठीक उसके बगल में छपी एक बड़ी खबर का शीर्षक है, ‘टीन एज की मुश्किलें कुछ यूं होंगी आसान’। पृष्ठ.9 पर छपी खबर कहती है, ‘स्ट्रोक के खिलाफ नई डिवाइस’, ‘इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग, तो रोग रहेंगे दूर’। लेकिन सबसे दिलचस्प उसी दिन पृष्ठ.14 पर स्पेशल स्टोरी के तहत छपी खबर है- ‘सेक्सुअल अर्ज या दिमागी मर्ज?’. ये अर्ज उर्दू का नहीं, अंग्रेजी का है। अब गुलजार जो चाहें अर्ज करते रहें, तुकबंदी, लयात्मकता, चालू मुहावरे, स्थापित शब्दावलियों और चमकदार पंक्तियों को इस्तेमाल करने का लोभ इस तरह के प्रयोग के लिए उकसाता है, जिसके नवभारत टाइम्स में अनेक उदाहरण मिलते हैं।

केजरी की 18 वॉल (15 दिसंबर 2013), द ग्रेट इंडियन कॉमन मैन (1 जनवरी 2014), केजरी का पावर प्ले (2 जनवरी 2014), मल्टिब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश का शटर डाउन (14 जनवरी 2014), कांग्रेस पर डबल अटैक (7 फरवरी 2014), केजरी का ब्रेकअप डे (15 फरवरी 2014), दिल्ली में डबल होंगे ऑटो (23 फरवरी 2014), आखिर कस्टडी में सहारा चीफ (1 मार्च 2014), स्वीट 16, सोलहवीं लोकसभा के लिए चुनाव नतीजे 16 मई को (6 मार्च 2014) आदि पहले पन्ने पर की गई कारीगरी हैं। इन सारी हेडलाइंस में न सिर्फ अंग्रेजी के पहचाने शब्द हैं, बल्कि ये हिंदी पब्लिक के सामाजिक जीवन में रचे-बसे जुमले हैं।

थोड़ी कम रचनात्मकता के साथ अन्य पन्नों पर भी यह सिलसिला यूं ही चलता रहता है, पेसर्स पर सेलेक्टर्स का भरोसा (1 जनवरी 2014, पृष्ठ.16), पावर कट से शॉक में सीएम (10 जनवरी 2014, पृष्ठ.3), AK का परफेक्ट एग्जिट प्लान (15 फरवरी 2014, पृष्ठ.2), डीयू के सुपरफेस्ट की ग्रैंड ओपनिंग, इनोवेशन का भी तड़का (15 फरवरी 2014, पृष्ठ.2), इंडियन पॉलिटिकल लीग-2014 (1 मार्च 2014, पृष्ठ.14), उफ…ड्रीम प्रोजेक्ट ही बन गया ‘नाइटमेर’ (1 मार्च 2014, पृष्ठ.15), सेवन चीयर्स फॉर IPL 7 (29 मार्च 2014, पृष्ठ.18)। यहां यह बात साफ कर देनी जरूरी है कि हमेशा राजनीति की अपेक्षा मनोरंजन, खेल और युवाओं पर आधारित खबरों की विस्तृत रिपोर्ट में अंग्रेजी के शब्द ज्यादा आते हैं। एक तथ्य यह भी है कि अंग्रेजी शब्दों की भरमार उन खबरों में ज्यादा होती है जिसमें थोड़ा ‘फन एलीमेंट’ होता है। अक्सर राजनीति भी उस कोटि में दाखिल हो जाती है। गंभीरता की भाषा हिंदी हो जाती है। इसका एक उदाहरण यह है कि धर्म-अध्यात्म के पन्ने पर कोई छेड़छाड़ नहीं होती, ज्यादा से ज्यादा हिंदी के शब्द होते हैं।

लेकिन कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं जो इस निष्कर्ष से टकराते हैं। 1 जनवरी 2014 को ‘पॉलिसी और पर्सनैलिटी’ (पृष्ठ.14) आम चुनाव को ध्यान में रखकर लिखे गये संपादकीय का शीर्षक है। 2 जनवरी 2014 को संपादकीय पन्ने पर सुधांशु रंजन का लेख है, ‘प्राइवेसी को टकराव का मुद्दा न बनाएं, गुजरात स्नूपगेट की पूरी सचाई दुनिया के सामने आनी चाहिए’। संपादकीय पेज पर ही 5 फरवरी 2014 को मोहन गुप्त का लेख ‘हिंदी के तीन बेस्टसेलर नॉवेल’ (पृष्ठ.16) छपा है। इसमें गुनाहों का देवता, मैला आंचल, राग दरबारी के नाम शामिल हैं। आमतौर पर संपादकीय पेज ऐसे प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत नहीं करता, क्योंकि कथित रूप से ये विचार का पन्ना होता है और विचार की भाषा तो गंभीर ही होनी चाहिए यानी हिंदी!

नवभारत टाइम्स जिस मोर्चे पर अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं भूलता, वो है पन्नों का नामकरण। मिथ मंथन, हेल्थ वॉच, फन डे, विचार विंडो, गेस्ट लेक्चर, टेक्नो ट्रिक्स, मनी मैनेजमेंट, किड KAT, जस्ट जिंदगी, एंटरटेनमेंट आदि कुछ ऐसे नाम हैं। लेकिन किसी भाषाई तैयारी के अभाव में नवभारत टाइम्स की हिंग्लिश अर्थ का अनर्थ भी कर देती है। अंग्रेजी शब्दों को देवनागरी में लिखने में अक्सर भूलें होती हैं। कई बार ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जाते हैं, जिससे हिन्दी के पाठक आमतौर पर वाकिफ नहीं होते। अखबार में अंग्रेजी के शब्दों को रोमन लिपि में भी लिखने का चलन काफी मजबूत है. शार्ट फार्म तो ज्यादातर रोमन में होते हैं, जैसे कि PMO, CBI, PR, PM, POSCO, FIR आदि।

यहां सवाल उठता है कि नवभारत टाइम्स भाषा के मामले में इतनी छूट कैसे ले लेता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो खुद को ‘पॉपुलर’ की श्रेणी में देखता है या देखना चाहता है। एक दूसरा सवाल यह भी है कि आखिर क्यों पॉपुलर आजाद-आजाद घूमा करता है, और गंभीर या अनपॉपुलर बंदिशों में जकड़ा रहता है?[17]

बहस की रंगीनियां

अप्रैल 2012 में गृहमंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने सभी मंत्रालयों और विभागों को दिशा-निर्देश जारी किया कि वे रोजमर्रा के कामकाज में अंग्रेजी के उन तमाम प्रचलित शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो आधिकारिक हिन्दी में शामिल नहीं है। इस आदेश पर एक अखबार की टिप्पणी थी- “आखिरकार आधिकारिक तौर पर हिंग्लिश ने वह जंग जीत ही ली जो अनाधिकारिक तौर पर नई पीढ़ी के जरिये वह डेढ़-दो दशक पहले ही जीत चुकी थी या साफ जीतती हुई दिख रही थी।”[18] लेकिन इस खबर में अपेक्षित गुस्से के विपरीत परिपक्व उदारता दिखती है- “दरअसल देखा जाये तो यह एक सही और व्यावहारिक निर्णय भी है क्योंकि कोई भी भाषा अपने शुद्धतावादी आग्रहों से नहीं विकसित होती. न ही किसी भाषा का विस्तार ही इन बंदिशों के चलते हो पाता है।”[19]

बहरहाल, यहां इस बात को भी याद रखना चाहिए कि ऐसी सरकारी पहल कोई पहली बार नहीं हुई है। 1972 में सरकार ने दस्तावेज, मसौदे आदि में आसान हिंदी के इस्तेमाल के पक्ष में फैसला लिया था। इसमें यह भी जोड़ा गया कि अगर उपयोगकर्ता हिन्दी शब्दावली को पूरी तरह समझ नहीं सका है, तो देवनागिरी लिपि में लिखे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किये जाने में कोई एतराज नहीं है।[20] इस नजरिये की स्पष्टता को जाहिर करने के लिए ये तथ्य भी काफी महत्वपूर्ण है कि केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा ‘मानविकी’ या ‘प्रशासनिक’ और पदनाम से संबंधित पारिभाषिक शब्दावली को ध्यान में रखकर एक शब्दकोश प्रकाशित किया गया था, जिसमें प्रचलित अंग्रेजी शब्दावली को नहीं हटाया गया था। लिहाजा, अभियंता को पहली और इंजीनियर को दूसरी प्राथमिकता दी गई थी।[21]

अलबत्ता, हिंग्लिश या हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल को लेकर शुद्धतावादी आग्रहों और वैचारिक लचीलेपन का इतिहास भी काफी पुराना और दिल्चस्प है। नेहरू और कुछ अन्य लोग शुद्धतावादी आंदोलन के दर्शन से काफी चिंतित थे, जिनका कहना था कि हिंदी में उर्दू के शब्दों की कोई जगह नहीं है। उस आंदोलन के नेता समान रूप से, शायद ज्यादा, अंग्रेजी शब्दों और उससे पैदा होने वाले अंग्रेजियत के असर के खिलाफ थे।[22] वर्तमान स्थितियों में यह बात एक मिसाल की तरह लग सकती है कि हिंदी का एक तबका इस सवाल को लेकर काफी संयमित राय रखता था। कुछ हिंदी विद्वान इस समझ को आगे बढ़ाने में लगे थे कि फारसी, हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों को, जो आम तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं, जस का तस छोड़ दिया चाहिए और अगर लोग उनका इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें इसकी इजाजत होनी चाहिए।[23] हिंदी और संस्कृत के विद्वान डॉ. बाबूराम सक्सेना ने इसके लिए एक मापदंड विकसित करने की पैरवी करते हुए कहा कि जो अंग्रेजी शब्द भारत के ग्रामीण जीवन में व्याप्त हैं, उन्हें रहने देना चाहिए।[24] लेकिन वास्तविक व्यवहार में अंग्रेजी शब्दों को निष्ठापूर्वक हटाया जाता रहा।[25]

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आईने में वर्तमान समय की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करने की कोशिश करें तो कुछ समानताएं और कुछ भिन्नताएं दिखाई देती हैं। नकार और स्वीकार तो दोनों वक्तों में है, लेकिन तब रोकना आसान था, अब नहीं। क्योंकि वैश्वीकरण की उपज, विलंबित आधुनिकता (late modernity) के युग में दाखिल होते ही भारत में हिंदी और अंग्रेजी के बीच की भाषाई सीमाएं, अपनी संबद्ध पहचानों के साथ, अस्थिर होने लगी थीं।[26]

हिंग्लिश को लेकर हिन्दी समाज में कई तरह की धारणाएं मौजूद हैं, ‘हिंदी नष्ट हो रही है’, ‘इतनी हिंग्लिश की जरूरत क्या है?’, ‘हिंदी का कुछ नहीं बिगड़ेगा’, ‘हिंदी समृद्ध हो रही है’ आदि-आदि. विरोध करने वालों का एक हिस्सा भावनात्मक आग्रहों से संचालित है। यह कोई असामान्य बात नहीं है क्योंकि भाषा का सवाल आते ही ज्यादातर लोग राष्ट्रवादी हो जाते है। लेकिन एक सुविचारित विपक्ष भी है जिनके तर्क गंभीर मूल्यांकन की जरूरत की तरफ इशारा करते हैं। हिंग्लिश के पक्ष में भी एक अच्छी-खासी तादाद है। वो अल्पसंख्यक नहीं है, बस उसकी आवाज में थोड़ी हिचक बाकी है।

अब मैं कुछ चुनिंदा लोगों के विचार सामने रख रहा हूं, इनमें कुछ हिंग्लिश को लेकर सामान्य तौर पर की गई टिप्पणियां हैं और कुछ सीधे नवभारत टाइम्स की भाषा को लेकर है। मैं अपने एक निजी अनुभव से इसकी शुरुआत कर रहा हूं। 2001-2 में जब मैंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी निभानी शुरू की, तब हमारे एक वरिष्ठ और पूर्व कॉमरेड शेखर सिंह ने मेरे बारे में जानने की कोशिश में एक साथी से पूछा, ‘वह कौन लड़का है जो बीबीसी की हिंदी बोलता है?’ दूसरा वाकया 2009 का है। हम कुछ मित्र दक्षिणी राजस्थान की यात्रा पर थे। कई जगहों पर आदिवासियों के साथ संवाद का कार्यक्रम था। यात्रा के तीसरे दिन ही मेरे मित्र और सहयात्री राजेश ने मुझसे कहा, ‘आप नवभारत टाइम्स की भाषा बोलकर जनता से नहीं जुड़ पाएंगे, कॉमरेड।’ ये दो मीडिया संस्थानों की भाषा से जुड़े उदाहरण हैं। तंज दोनों में है, लेकिन दूसरे में जरा हिकारत भी है। मेरा अनुमान है कि हिंग्लिश को लेकर हिंदी समाज में एक हिकारत की भावना भी रही है, जो शायद धीरे-धीरे कम हो रही है।

अमरेंद्रकुमार राय ने नवभारत टाइम्स का विस्तार से अध्ययन किया है। इसकी भाषा को लेकर उनका कहना है- “अखबार की भाषा बोलचाल की है, मगर आम लोगों के बालचाल की भाषा नहीं, बल्कि मेट्रो के लोगों के बोलचाल की भाषा। अखबार हिंदी का जरूर है, पर इसकी भाषा हिंदी नहीं है। इसमें अंग्रेजी के शब्द कुछ जरूरत से ज्यादा ही हैं। कई बार तो इन शब्दों का प्रयोग ये मानकर किया जाता है कि आम लोग इसे ही समझते हैं, इसके हिंदी स्वरूप को नहीं, लेकिन यह संपादकों और इसमें काम करने वालों की अपनी सोच है। वे जिस परिवेश में रह रहे हैं, वहां जो भाषा बोली जा रही है, उसी को आम लोगों की भाषा मान रहे हैं, जो कि एकदम गलत है। यह मेट्रो की भाषा है।”[27] उनके पास समझौते का एक मॉडल भी है, “दूसरी भाषा से शब्दों को लेना कोई बुरी बात नहीं है। इससे भाषा समृद्ध ही होती है, पर उन शब्दों का लेना बेहतर होता है जिसके लिए अपनी भाषा में उचित शब्द न हों, या कठिन हों, पर हर शब्द बाहरी भाषा खासकर अंग्रेजी से लिए जाएं, ये उचित नहीं है। इससे भाषा समृद्ध होने की बजाय अपना स्वरूप ही खो देती है। नवभारत टाइम्स में ऐसा ही हो रहा है। अब इसकी भाषा हिंदी की बजाय हिंग्लिश हो गई है।”[28] ऐसा कहते हुए अमरेंद्रकुमार राय इस बात को भूल जाते हैं कि हिंदी के भाषा-प्रयोगों में जो मिश्रण हो रहा है, वह सिर्फ हिंदी की जरूरत की वजह से नहीं, बल्कि कई कारणों से हो रहा है। प्रभाव उत्पन्न करने की कोशिश उसमें एक बड़ा कारण है।

“अरे यार, ‘लाइट’ की तो बहुत ‘प्रॉब्लम’ है हमारे ‘एरिए’ में, मैं तो ‘मंडे टेस्ट’ के लिए कुछ ‘रिवाइज’ नहीं कर सका।”  “मेरे यहां तो कल ‘गैस्टों’ की ‘लाइन’ लगी रही। उनके ‘किड्स’ तो बहुत ही ‘नॉटी’ थे। ‘प्रिपेटरी लीव’ भी ‘वेस्ट’ हो गई।” “सुन मेघा, दिव्या की ‘डिनर पार्टी’ में सब ‘डिशिज’ इतनी ‘टेस्टी’ थी कि आई कांट टैल यू!” “सर, आज का ‘पेपर’ तो इतना ‘टफ’ और ‘लैंदी’ था कि मैं तीन ‘क्वश्चंस’ तो ‘अटैंप्ट’ ही नहीं कर सका। ‘मोस्टली स्टुडैंट्स’ का पेपर ‘इन्कम्पलीट’ ही रह गया।” इन उदाहरणों को देने के बाद डॉ. रवि शर्मा इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसे वाक्य पब्लिक स्कूलों की देन हैं।[29] इस स्थिति से निपटने के लिए उनके पास पूरा नुस्खा तैयार है।[30]

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया अध्येता अमरेंद्र कुमार अपनी चिंता को चेतावनी की तरह सामने रखते हैं- “हमारे आर्थिक ढांचे को तो गड्डमड्ड कर ही दिया गया है, अब हमारी भाषा-संस्कृति को भी तहस-नहस करने में अंग्रेजी के हिन्दी भाषा में लगातार अवतरित करने के माध्यम से जुटे हुए हैं। अगर हमारे समाचारों की भाषा ‘हिंग्लिश’ हो जाएगी, तो हमारी भाषा नष्ट होगी और तब रूपांतर से हमारी संस्कृति नष्ट होगी।”[31]

हिन्दी अखबारों को अपने जीवन का अधिकांश समय दे चुके वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी नवभारत टाइम्स की भाषा पर विज्ञापन के असर को रेखांकित करने की कोशिश करते हैं- “हिन्दी के अखबारों ने, खासतौर से नवभारत टाइम्स ने अंग्रेजी मिली-जुली हिन्दी का न सिर्फ धड़ल्ले से इस्तेमाल शुरू किया है, बल्कि उसे प्रगतिशील साबित भी किया है। अखबार के मास्टहैड के नीचे लाल रंग से मोटे अक्षरों में एनबीटी लिखा जाता है। मेरा ख्याल है कि नवभारत टाइम्स ने ऐसा विज्ञापनदाताओं को लुभाने के लिए किया है। विज्ञापनदाता का हिन्दी जीवन-संस्कृति और समाज से रिश्ता नहीं है। वे फैशन के लिए एक खास तबके को लुभाते हैं। यह तबका हमारे बीच है, यह भी सच है। पर यह हिन्दी की मुख्यधारा नहीं है। बिजनेस के दबाव में यह धारा फैसले करती है।”[32]

योगेन्द्र जोशी हिंग्लिश की एक मिसाल देने के बाद कुछ सवाल खड़े करते हैं और साथ में एक बिल्कुल नई तजवीज भी दे डालते हैं-

चीफ़-मिनिस्टर ने नैक्सलाइट्स को डायलॉग के लिए इंवाइट किया है. लेकिन नैक्सलाइट्स अन्कंडिशनल मीटिंग के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार कांबिग आपरेशन बंद करे और उन्हें सेफ पैसेज दे तो वे निगोशिएशन टेबल पर आ सकते हैं।

“इस कथन को सड़क पर का आम आदमी क्या वास्तव में समझ सकता है? उसे मालूम है कि कांबिग क्या होती है और निगोशिएशन किसे कहते हैं? आखिर सोचिए, उर्दू और हिंदी में अंतर ही कितना है? जब उर्दू को अलग भाषा का दर्जा मिला हुआ है, तो ठीक उसी तरह हिंग्लिश को मान्यता क्यों न दी जाए?”[33]
14 अक्टूबर 2010 के नवभारत टाइम्स को देखकर विवेक रस्तोगी अपने गुस्से पर नियंत्रण ही नहीं रख पाते-

“आज तो इस अखबार ने बिल्कुल ही हद कर दी. आज के अखबार के एक पन्ने पर ‘Money Management’ में एक लेख छपा है-

एनपीएस में निवेश के लिये दो विकल्प हैं। पहला एक्टिव व दूसरा ऑटो अप्रोच, जिसमें कि PFRDA द्वारा अप्रूव पेंशन फ़ंड में इन्वेस्ट किया जा सकता है। इस समय साथ पेंशन फ़ंद मैनेजमेंट कंपनियां जैसे  LIC, SBI, ICICI, KOTAK, RELIANCE, UTI IDFC हैं। एक्टिव अप्रोच में निचेशक इक्विटी (E), डेट (G) या बैलेन्स फ़ंड (C ) में प्रपोशन करने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है। इन्वेस्टर अपनी पूरी पेंशन वैल्थ G असैट क्लास में भी इन्वेस्ट कर सकता है। हां, अधिकतम 50% ही E में इन्वेस्ट किया जा सकता है। जिनकी मीडियम रिस्क और रिटर्न वाली अप्रोच है वे इन तीनों का कॉम्बिनेशन चुन सकते हैं। वे, जिन्हें पेंशन फ़ंड चुनने में परेशानी महसूस होती है वे ऑटो च्वॉइस इन्वेस्टमेंट ऑप्शन चुन सकते हैं

अब मुझे तो लिखते भी नहीं बन रहा है, इतनी हिंग्लिश है, अब बताइये क्या यह लेख किसी हिन्दी लेखक ने लिखा है या फिर किसी सामान्य आदमी ने ? क्या इस तरह के लेखक ही समाचार पत्र समूह को चला रहे हैं ?”[34] लेकिन उनकी टिप्पणी की प्रतिक्रिया में विष्णु बैरागी ने जो लिखा, उसे आप सिर्फ गुस्सा नहीं कह सकते, “हिन्दी के साथ ऐसा अक्षम्य आपराधिक दुष्कृत्य करनेवाले नराधमों को मैं ‘मातृ सम्भोगी’ कहता हूं। यह सारा घालमेल ये लोग केवल ‘पैसे’ के लिए करते हैं। हिन्दी इन्हें क्या नहीं दे रही- रोटी, इज्जत, हैसियत आदि-आदि और ये हिन्दी को क्या दे रहे हैं?  इन्हें तो सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया जाना चाहिए।”[35]

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राजकिशोर हिंग्लिशीकरण के खतरे की सघनता को दिखाने की कोशिश करते हैं- “जो लोग मुख्यतः अंग्रेजी में काम करते हैं, उनकी हिन्दी हांफती रहती है और जो मुख्यतः हिन्दी में काम करते हैं, उनकी अंग्रेजी को हिचकी आती रहती है। क्या हम उस दौर की असहाय प्रतीक्षा करते रहें जब हिन्दी ‘द्विभाषी संस्कृति’ की नकली आभा से चमकने लगेगी और अंत में खोटा सिक्का असली सिक्के को बाजार से बाहर कर देगा? द्वंद का यह दौर पढ़े-लिखों और कम या गैर-पढ़े-लिखों के बीच नहीं, बल्कि पढ़े-लिखों और पढ़े-लिखों के बीच है। यही, एक ही, वर्ग हिंग्लिश का जनक है। इस वर्ग की झूठी तारीफ में ‘द्विभाषी संस्कृति’ नामक एक विचित्र चीज की कल्पना की गई है। हिंग्लिश को थोड़ी भी मान्यता मिल गई, तो वह बीस-तीस साल में ही हिन्दी को चट कर जाएगी…हिंग्लिशीकरण के बाद भी हिन्दी रहेगी, क्यों नहीं रहेगी, पर कुछ किताबों तक महदूद हो कर।”[36] राजकिशोर की चिंता तो वाजिब है, लेकिन समस्या की पहचान करने में और निष्कर्ष तक पहुंचने में वह भावनाओं का सहारा ले रहे है, तथ्यों का नहीं। द्विभाषी तो क्या, हमारे यहां सदियों से बहुभाषी संस्कृति रही है और उसके भीतर हीं भाषाएं बनती-विकसित-खत्म होती रही हैं। और हिंग्लिश को मान्यता कौन दे रहा है? ये द्वंद पढ़े-लिखों और पढ़े-लिखों के बीच नहीं, बल्कि शायद हमारे हीं भीतर है।

साप्ताहिक पाञ्चजन्य भी अप्रैल 2012 के अपने अंक में ‘हिंग्लिशकरण’ की इस समस्या को एक खास संदर्भ में पेश करता है- “लोकसभा की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार ने अभी इस्लामाबाद जाने पर कहा- ‘यदि आपका मानस गुलाम है, भाषा गुलाम है तो आप अपनी आर्थिक गुलामी किस प्रकार दूर कर सकते हैं?’ फिर भारत सरकार इस सत्य को क्यों नहीं समझती? उसने अभी कुछ समय पूर्व जारी किये गये पत्रक में स्वयं ही अपने कार्यालयों को सरल हिन्दी के नाम पर ‘हिंग्लिश’ के प्रयोग की छूट क्यों दे दी है? यह छूट तो समाचार पत्र-पत्रिकाओं के ‘हिंग्लिशकरण’ को निश्चित रूप से बढ़ावा ही देगी।”[37]

सिर्फ नवभारत टाइम्स के पन्नों पर नहीं, बल्कि उसके ब्लॉग पर हिंग्लिश को लेकर विमर्श चल रहा है। रोहतक, हरियाणा के राजेश कश्यप लिखते हैं- “अब हिन्दी के समक्ष ‘हिंग्लिश’ सबसे बड़ी विकट चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। सरकारी तंत्र से लेकर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया तक, बॉलीवुड से लेकर गांव की गलियों तक और आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों के एक बड़े धड़े तक ‘हिंग्लिश’ का बोलबाला स्थापित हो चुका है। ऐसे में हिन्दी पर ‘हिंग्लिश’ का हमला कितना घातक सिद्ध हो सकता है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। चूंकि, हिन्दी हिन्द की राष्ट्रभाषा है तो हर हिन्दुस्तानी का यह नैतिक फर्ज बनता है कि वह हिन्दी के हित में अपना समुचित योगदान दे। हिन्दी को सरल तो बनाया जाए, लेकिन हिन्दी के हितों को ताक पर रखकर नहीं। हिन्दी के विद्वान व विदुषियों को आगे बढ़कर ऐसा रास्ता निकालना अथवा सुझाना चाहिए, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।”[38]

खुद को छात्र बताने वाले पीयूष द्विवेदी ‘भारत’ का विश्लेषण सतही है या गूढ़, इसका फैसला आप ही करें, “हिंग्लिश कोइ प्रामाणिक भाषा नहीं, वरन आधुनिक युवा मन की उपज मात्र है। अगर हिंग्लिश के परिप्रेक्ष्य में हम ये कहें, तो गलत नहीं होगा कि रोजगार के अवसरों पर अंग्रेजी के लगभग अनिवार्य अस्तित्व के बावजूद, सामान्य-बोलचाल में हिंदी का जो संप्रभु अस्तित्व था, उसमे हिंग्लिश के रूप में अंग्रेजी द्वारा एक बड़ी सेंध लगाई जा चुकी है, जिसको कि या तो हम समझ पा नहीं रहे हैं, या फिर समझना चाहते ही नहीं हैं।”[39]

टीवी पत्रकार और एंकर राजेंद्र देव अपने पेशे के भाषाई स्वभाव के विपरीत ये सोच जाहिर करते हैं- “हिंदीभाषी समाज अपनी ही भाषा को लेकर संजीदा नहीं है। आप अपने आसपास गौर फरमाइए, प्रबुद्ध वर्ग को भी देखिए. कितने ऐसे हैं जो भाषा की शुद्धता पर ध्यान देते हैं, कितने ऐसे हैं जिनकी जबान हिंग्लिश का इस्तेमाल नहीं करती, कितने ऐसे हैं जो इस बात का ख्याल रखते हैं कि हिंदी के एक छोटे से वाक्य में भी उन्होने किसी अंग्रेजी शब्द का इस्तेमाल  नहीं किया ?”[40]

अब राघवेन्द्र सिंह का फैसला भी सुनिए- “इससे हिंदी का कोई प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा, वरन उसका नाश हो रहा है। हिंदी को कोई व्यापक स्वीकार्यता भी नहीं मिल रही, बल्कि जाने-अनजाने अंग्रेजी को व्यापक स्वीकार्यता मिल रही है।”[41]

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर कुछ तार्किक ढंग से बात करने की कोशिश करते हैं- “इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किसी शब्द विशेष के न होने की दशा में उसका स्थानापन्न शब्द किसी दूसरी भाषा का हो सकता है, किन्तु जब हिन्दी में सही शब्द मौजूद हो तब जबरन अंग्रेजी का प्रयोग भाषा को हिंग्लिश बनाकर उसकी विद्रूपता को दर्शाता है।”[42]

इन प्रतिक्रियाओं से अभी तक शायद ये समझ बन चुकी होगी कि हिंदी समाज में हिंग्लिश को लेकर एक नकारात्मक रवैया है, जिसे आमतौर पर एक तथ्य के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन दूसरी तरफ उसी हिंदी समाज में हिंग्लिश का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इसलिए एक दूसरा पक्ष भी है। मोहिंदर कुमार की राय कुछ अलग ही है- “जब हिन्दी किसी भी रूप में जन-जन तक पहुंचेगी और इसके पढ़ने और बोलने वाले होंगे तो स्तर के विकास की सम्भावना रहेगी, अन्यथा इसके स्वरूप के बदलने की सम्भावना से अधिक इसके विलुप्त होने की सम्भावना हो जायेगी। एक और बात जो विचारणीय है, वह यह है कि हिन्दी का हिंग्लिश रूप समाज के सभी वर्गों द्वारा समान रूप से ग्राहय है और पूर्ण रूप से स्पष्ट भी। दूसरे शब्दों में शुद्ध हिन्दी के वाक्य और हिंग्लिश के समानार्थक वाक्य का समान अर्थ ही प्रेषित होता है।”[43]

भगवान बाबू शजर ने भी इसकी तस्दीक की, “अगर वास्तविक स्वरूप की बात करें तो केवल हिन्दी इस्तेमाल करना बहुत ही कठिन है। अंग्रेजी और उर्दू के इस्तेमाल से हिन्दी सोलह श्रृंगार की हुई दुल्हन सी सजी लगती है। हिंग्लिश का प्रयोग हिन्दी को समृद्ध कर रहा है। इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होनी चाहिए कि हिंग्लिश का आना हिन्दी के लिए सुखद है और इससे हिन्दी का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं।”[44]
हिंग्लिश की पक्षधरता सिर्फ पाठक नहीं, बल्कि विशेषज्ञों का भी एक वर्ग कर रहा है। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में प्राध्यापक डॉ. मुकुल श्रीवास्तव लिखते हैं, “आज बात होती है कि आखिर हिंदी में अंग्रेजी के शब्द क्यों प्रयोग हो रहे हैं? हो हल्ला जोरों पर है। इससे हिंदी के खत्म होने का डर क्यों सता रहा है? क्या इससे पहले उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का प्रयोग नहीं होता रहा है? हम यही तो कहते हैं- “ये हमारी किस्मत में नहीं था। क्या इसपर किसी ने ऐतराज किया? नहीं न? गौर से देखिये यहां किस्मत शब्द उर्दू ही तो है। क्या इससे हिंदी को कोई नुकसान हुआ? हकीकत में ये नुकसान नहीं उसकी श्रीवृद्धि है।”[45]

मध्य प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग में स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध केन्द्र में प्राध्यापक प्रोफेसर विष्णु कुमार अग्रवाल का उत्साह हिंग्लिश से संबंधित एक सूचना ने बढ़ा दिया, “अभी एक समाचार सुना कि विदेशी राजदूतों, जो कि भारत में पदस्थ हैं, को हिंग्लिश सीखने का हुक्म अपनी सरकार से प्राप्त हुआ है। इसका प्रयोजन हिंदी को आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि अपने व्यापार की सुरक्षा के मद्देनजर ऐसा किया जा रहा है। कुछ भी हो फायदा तो हिंदी को होगा ही।”[46]

अंशुमाली रस्तोगी अपने बगावती तेवर में पीढ़ियों के फर्क का सवाल उठाते हैं, “हिंदी भाषा के साथ अगर अंग्रेजी के शब्द प्रयोग किए जा रहे हैं या हिंदी को हिंग्लिश की शक्ल में लिखा-बोला जा रहा है, तो इसमें हर्ज ही क्या है? यह बदलते जमाने की भाषा है। इस भाषा में नई तरह की ताजगी और बनावट है। यह नई पीढ़ी, नए जमाने की भाषा है। साथ-साथ, अगर यही भाषा साहित्य या शब्दकोश में भी प्रयोग की जा रही है, तो इतनी परेशानी क्यों? यह जरूरी नहीं कि जो-जैसा साहित्य जिस भाषा में पुराने या वरिष्ठ साहित्यकारों-कहानीकारों ने लिखा, युवा पीढ़ी भी वैसा ही लिखे।”[47]

मैं यहां वर्धा हिन्दी शब्दकोश में हिंग्लिश की कथित दमदार मौजूदगी को लेकर 2014 के मार्च-अप्रैल में जनसत्ता के पन्नों और उसके बाहर चली बहस में नहीं जा रहा हूं। वह अलग से एक शोध का विषय है। लेकिन इतना कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा कि वर्धा हिंदी शब्दकोश और उसे लेकर चली बहस इतना तो तय करती ही है कि हिंग्लिश के सवाल पर हिंदी समाज (यहां इसे हिंदी साहित्य कह सकते हैं) में एक किस्म का सत्ता-सतुंलन है।

इन प्रतिक्रियाओं से क्या जाहिर होता है ? भाषा को लेकर भावुक होना एक सामान्य बात है, लेकिन कई बार उसका न होना चकित करता है। उसकी क्या वजह हो सकती है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदी की दुर्दशा के सामूहिक अनुभव ने लोगों को इस सुधार की ओर प्रेरित किया है और उदार बनाया है ? या फिर ये बदलाव बाजार, विज्ञापन, तकनीक और सामाजिक वर्गों की महत्वाकांक्षाओं से संचालित है? अगर सच में ये प्रक्रिया पहचान और संस्कृति के सवालों से जुड़ी है तो फिर पुरानी पहचान और संस्कृति के विशेषाधिकारों का क्या हुआ ?

अंत की जगह

इस अध्ययन के दो बुनियादी मकसद थे- एक खास किस्म के भाषा व्यवहार और उससे संबंधित प्रतिक्रिया को जानना। इन दोनों के दिमागी ढांचे और प्रेरक तत्वों को समझना भी उतना ही जरूरी था। ये कहना कतई गलत न होगा कि कई तरह की हिंग्लिश चलन में है और उसके साथ सहजता या रस्साकशी का रिश्ता इस बात पर निर्भर करता है कि मिश्रण का अनुपात कितना है। भट्ट के अध्ययन का प्रस्थान बिंदु इससे जुड़े कई राज खोलता है-

“भारतीय अंग्रेजी अखबारों में हिंदी का इस्तेमाल एक असंबद्ध (discursive) स्पेस- एक तीसरा स्पेस (भाभा 1994)- सृजित करता है, जहां पहचान (identity) के प्रतिनिधित्व (representation) की दो व्यवस्थाएं आपस में मिलती हैं और वैश्विक-स्थानीय तनावों की प्रतिक्रिया में एक तरफ सह-संशोधित एवं वस्तुकृत होती हैं, और दूसरी तरफ प्रतिरोध और विनियोग (appropriation) के जरिये संवाद-संबंध पर आधारित पहचानें (identities) गठित होती हैं।”[48]

हिंदी अखबारों के संबंध में थोड़े-बहुत बदलावों के साथ इस प्रक्रिया को हम घटित होते हुए देखते हैं। लेकिन मैं यहां इतना जोड़ना चाहूंगा कि पहचान की दोनों व्यवस्थाएं समान प्रातिनिधिक हैसियत के साथ एक वक्त में मौजूद नहीं होतीं, इसलिए हमें इन्हें विशिष्ट संदर्भों के दायरे में देखना होगा। शायद तभी हम नवभारत टाइम्स के भिन्न उद्देश्यों और अभ्यासों के अतिरिक्त समुच्चय की वजह जान पाएंगे। प्राप्ति और ग्रहण में फर्क होता है। नवभारत टाइम्स जैसे अखबार जो भाषा परोस रहे हैं, क्या पाठक उसे समूचेपन में आत्मसात कर पा रहे हैं? हिन्दी पाठक वर्ग की मनोदशा पर भी भट्ट की ये स्थापना लागू होती है-

“तीसरा स्पेस एक असंबद्ध स्पेस होता है जिसे प्रतीकात्मक रूप से वे सब साझा करते हैं, जो खुद को कहीं बीच में पाते हैं-  ना पारंपरिक ना हीं आधुनिक। यह तीसरा स्पेस उन्हें एक नए प्रतिनिधित्व की संभावना देता है, अर्थ-निर्माण की, और एक एजेंसी (agency) की।”[49]

लेकिन परंपरा और आधुनिकता के बीच की किसी सतह पर खड़ा होना एक नई संभावना के साथ-साथ एक ऐसे द्वंद को भी जन्म देता है, जो धीरे-धीरे एक ग्रंथि में तब्दील हो जाती है। शायद इस ग्रंथि से बचने के लिए ही लिखित भाषा में शुद्धता का आग्रह बना रहता है, जबकि बोलचाल में हिंग्लिश आसानी से पच जाती है। इसके पीछे जो समझ काम कर रही है, भट्ट उसकी शिनाख्त करते हैं-

“लिहाजा द्विभाषी संसाधनों का दक्षप्रयोग अर्थ की व्याख्या और उत्पादन में सहायक होता है- दो भाषाएं व्याख्या के दो वैचारिक ढांचे को प्रस्तुत करती हैं: हिंदी-पुराना, अंग्रेजी-नया।”[50]

किसी से दूर जाने या मुक्ति पाने का इससे बेहतर बहाना क्या हो सकता है कि वो पुराना हो गया है, और तब तो ये और भी जायज लगता है, जब उसमें पुराने फिल्मी गानों जैसा माधुर्य भी न हो। रूपर्ट स्नेल ने इस स्थिति का सही विश्लेषण किया है-

“सरकारी दायरों में प्रचलित हिंदी के अति-औपचारिक जगत के अनाकर्षण, चाहे जिस भी कारण से हो, ने अंग्रेजी शब्दों के लंबी-अवधि में होने वाले रिसाव को बारिश के मौसम की बाढ़ में बदल दिया है। इसके परिणामस्वरूप हिंदी की प्रतिभा मलिन हुई, और इसके पर्यावरणीय संतुलन को अथक नुकसान हुआ।”[51]

जो भाषा लाखों लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है उसके प्रति दुराग्रह रखने की कोई वजह नहीं हो सकती। लेकिन कुछ जटिलताओं को समझना भाषाई अभ्यास की दृष्टि से जरूरी है। ये विलाप भी लग सकता है, लेकिन स्नेल के इस कथन की हकीकत को हम अपने अनुभव से जानते हैं-

“हिन्दी पर अंग्रेजी के असर का एक परिणाम हिंदी की प्राकृतिक सुस्पष्टता और सुन्दरता का कम होना है। यहां तक की खुद अपने हीं भौगोलिक क्षेत्र के भीतर इसका अपना सहज कोश विदेशी, गूढ़ और सनकी लगता है।”[52]

अलबत्ता यह बात एक हद तक सही है कि साहित्य के क्षेत्र में शुद्ध हिंदी अबाध और उर्वर तरीके से विकसित हुई है।[53] लेकिन उसकी भी अपनी सीमा है क्योंकि साहित्य अपने आप में पूरी दुनिया नहीं है। इसे अक्सर समाज का आईना कहा जाता है, लेकिन यह असली दृश्य को छिपा भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है।[54]

बहरहाल, मैं अपनी बात एक वाकये के साथ खत्म करना चाहता हूं। दिल्ली के तीनमूर्ति भवन में हिन्दी में समाजविज्ञान की संभावना तलाशने के उद्देश्य से एक कार्यशाला आयोजित की गई थी।[55] पहले सत्र की अध्यक्ष और कार्यशाला की संयोजक ने जिस हिंदी का इस्तेमाल किया उसमें तो समाज विज्ञान कतई संभव नहीं है। बीज वक्ता ने भी कठिन पारिभाषिक शब्दावलियों के हिंदी अनुवाद कर रखे थे। मजेदार बात यह है कि सवाल-जवाब के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में इतिहास पढ़ाने वाले एक सज्जन ने हिंग्लिश में समाज विज्ञान करने की गुंजाइश के बारे में पूछ दिया, लेकिन इसका जवाब बीज वक्ता ने यह कहते हुए दिया कि अभी तक हिंग्लिश को लेकर उन्होंने जो कुछ पढ़ा है, उसमें काफी शुद्धतावादी आग्रह है। यह वाकया हिंग्लिश को लेकर मौजूद दुविधा का एक मेटाफर है। जब आप हिंदी में आते हैं तो शुद्धता की कसौटी पर खड़ा उतरने की कोशिश करते हैं, उससे मन ही मन असंतुष्ट भी रहते हैं, साथ में किसी वैकल्पिक स्थिति को बनाने की पहल नहीं करते क्योंकि आप स्वीकृति के बगैर शुरुआत नहीं करना चाहते और भाषा के चक्कर में अपने ज्ञान पर लांछन भी नहीं लगाना चाहते।

तो फिलहाल ऐसा लगता है कि नवभारत टाइम्स जिस ‘कानून’ को बनाने की कोशिश कर रहा है, व्यापक दायरे में अभी उसे स्वीकार्यता नहीं मिली है। हिंग्लिश का विचारधारात्मक अभियान भी अपनी भलाई इसी में देख रहा है कि एक मजेदार चीज के तौर पर इस नए और जोशीले हिंग्लिश का उत्सव मनाया जाए जो युवा संस्कृति के रोमांच की गूंज पैदा करता है।[56] क्योंकि इतना तो शायद सभी मानेंगे कि अपने मूल में, हिंग्लिश दो (या ज्यादा) समान रूप से (हालांकि अलग प्रकार से) मूल्यवान भाषाओं के साथ रहने की समस्या का एक रचनात्मक हल है।[57]

[1] आलोक धन्वा, दुनिया रोज बनती है, दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1998

[2] http://sarai.net/hinglish-workshop-18-19-august-2014-recordings/

[3] Rakesh M. Bhatt (2008), In other words: Language mixing, identity representations, and third space, Journal of Sociolinguistics 12/2, p. 182

[4] Khuswant Singh (2009), YE OL’ LADY OF BORI BUNDER, Sheela Reddy (Compiled and Edited by), Why I Supported the Emergency: Essays and Profiles, Delhi: Penguin Books, p.257-258

[5] Rahul Kansal (2011), Panel Discussion II: Is English a Unifying Force?, Rita Kothari, Snell Rupert (Eds.), Chutnefying English: The Phenomenon of Hinglish, Delhi: Penguin Books, 2011, p. 206

[6] अमरेंद्रकुमार राय, नवभारत टाइम्स, अच्युतानंद मिश्र (सं.), हिन्दी के प्रमुख सामाचारपत्र और पत्रिकाएं- 3, दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, 2010, पृ. 73-75

[7] Sevanti Ninan (2007), Headlines From the Heartland: Reinventing the Hindi Public Sphere, Delhi: Sage Publications, p. 44-45

[8] http://www.samachar.com/NBT-fortifies-base-in-NCR-launches-Greater-Noida-edition-lj3jL6cijcd.html

[9] http://www.newyorker.com/magazine/2012/10/08/citizens-jain

[10] http://www.firstpost.com/india/media-moguls-inside-the-minds-of-samir-and-vineet-jain-479062.html

[11] अमरेंद्रकुमार राय, नवभारत टाइम्स, अच्युतानंद मिश्र (सं.), हिन्दी के प्रमुख सामाचारपत्र और पत्रिकाएं- 3, दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, 2010,  पृ. 76

[12] http://www.newyorker.com/magazine/2012/10/08/citizens-jain

[13] Rakesh M. Bhatt (2008), In other words: Language mixing, identity representations, and third space, Journal of Sociolinguistics 12/2, p. 183

[14] वही, पृ.182

[15] वही, पृ.196

[16] वही, पृ.189

[17] Francesca Orsini (2009), Print and Pleasure: Popular Literature and Entertaining Fictions in Colonial North India, Delhi: Oxford India Press

[18] http://ranchiexpress.com/158227

[19] वही.

[20] S. Dwivedi (1981), Which Hindi?, Hindi on Trial, Delhi: Vikas Publishing, p. 213

[21] वही, पृ. 218

[22] वही, पृ. 210

[23]  वही, पृ. 211

[24]  वही, पृ. 212

[25]  वही.

[26] Rakesh M. Bhatt (2008), In other words: Language mixing, identity representations, and third space, Journal of Sociolinguistics 12/2, p.180

[27] अमरेंद्रकुमार राय, नवभारत टाइम्स, अच्युतानंद मिश्र (सं.), हिन्दी के प्रमुख सामाचारपत्र और पत्रिकाएं- 3, दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, 2010,  पृ. 67-68

[28]  वही.

[29] डॉ. रवि शर्मा, हाय अंग्रेजी, बाय हिंदी, ग्लोकल हिंदी, दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, 2006, पृ. 69

[30] वही, पृ. 73

[31] http://old.bhadas4media.com/article-comment/960-media-hindi-language.html

[32] http://pramathesh.blogspot.in/2010/07/blog-post_24.html

[33] https://hinditathaakuchhaur.wordpress.com/tag/हिंग्लिश/

[34] http://kalptaru.blogspot.in/2010/10/blog-post_14.html

[35] वही.

[36] http://raajkishore.blogspot.in/2010/10/normal-0-false-false-false-en-us-x-none.html

[37] http://www.hindimedia.in/2/index.php/2013-08-01-13-07-44/2013-08-01-13-08-35/1840-hindi-and-hinglish-conspiracy-to-create-the-hindi-media

[38] http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BURILAGEYALAGEBHALI/entry/ह-न-द-क-ह-र-स-क-सबब-बन-ह-ग-ल-श

[39] http://articlesofpiyush.blogspot.in/2013/09/blog-post_17.html

[40] http://samachar4media.com/Hinglish-is-ruining-the-Hindi-Journalism

[41] http://raghvendrasingh.jagranjunction.com/2013/09/07/हिंदी-ब्लॉगिंग-‘हिंग्लिश/

[42] http://kumarendra.jagranjunction.com/?p=604065

[43] http://mohinder56.jagranjunction.com/2013/09/23/हिन्दी-ब्लोगिंग-’हिंग्ल/

[44] http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/09/27/हिंग्लिश-वाली-हिन्दी-contest/

[45] http://mukulmedia.blogspot.in/2012/06/blog-post_07.html

[46] http://sahityahindi.blogspot.in/2012/10/blog-post_6726.html

[47] http://hathodaa.blogspot.in/2014/04/blog-post_12.html

[48] Rakesh M. Bhatt (2008), In other words: Language mixing, identity representations, and third space, Journal of Sociolinguistics 12/2, p. 177

[49] वही, पृ. 182

[50] वही, पृ. 188

[51] Rupert Snell (2011), Hindi: Its Threatened Ecology and Natural Genius , Rita Kothari, Rupert Snell (Eds.), Chutnefying English: The Phenomenon of Hinglish, Delhi: Penguin Books, p. 36

[52] वही, पृ. 23

[53] वही, पृ. 31

[54] वही, पृ. 31-32

[55]http://www.nehrumemorial.nic.in/en/events/icalrepeat.detail/2014/08/07/186/-/bharatiya-bhashaon-mein-rajnitik-chintan-ki-sambhavana-shodh-vimarsh-aur-bahas.html

[56] वही, पृ. 36

[57] वही.

अंधेरे वक्त में रोशनी के लिए ज्ञान-मीमांसा की कुदरती मानवीय प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा: लाल्टू  

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

नई दिल्ली: ‘ज्ञान की जमीन’ यानी मनुष्य को वह कहां से मिलता है और जो कुछ वह जानता है, जिसे सच मानता है, वह किस हद तक ठोस सचाई है, इस बारे में कवि-वैज्ञानिक और पत्रकार लाल्टू ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘ज्ञान की जमीन और जमीनी ज्ञान: अंधेरे वक्त में रोशनी की तलाश’ विषय पर 20 नवंबर 2016 को आयोजित पांचवे कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में अपने विचार रखे।

लाल्टू ने कहा कि आदतन लोग उन बातों को नहीं जानना चाहते जो उनकी मान्यताओं से संगति नहीं रखती हैं। इसलिए उनकी हर जानकारी के साथ उनकी पृष्ठभूमि और पूर्वाग्रह जुड़े होते हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात और मानव विकास के आंकड़े का संदर्भ देखा जा सकता है। भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए लगभग एक दशक से यह झूठ फैलाया गया कि गुजरात देश का सबसे विकसित राज्य है, लेकिन तथ्य यह है कि मानव विकास के आंकड़े में गुजरात पिछले तीन दश कों से ग्यारहवें नंबर पर रुका हुआ है। भक्तों को यह जानकारी नहीं चाहिए, इसलिए वे इसे कभी नहीं देखते हैं।
लाल्टू ने सवाल उठाया कि जो कुछ प्रत्यक्ष दिखता है, वही सच होगा यह मान लेना स्वाभाविक है, पर ऐसा क्या है, जो दिखने से छूट गया ? अगर वह दिख जाए तो क्या जो पहले दिख रहा था, उस बारे में हमारा निर्णय पहले जैसा ही रह जाएगा ? उन्होंने कहा कि सामान्य समझ ज्ञान की बुनियाद नहीं होती, वह देशकाल पर निर्भर होती है और अक्सर विरोधाभासों से भरी होती है। उन्होंने कहा कि कि ‘हमें ज्ञान है’ का अहसास एक तरह का अहं पैदा करता है। यह जान लेना कि हम इस अहंकार से ग्रस्त हो सकते हैं, काफी नहीं होता। इस अहंकार के नतीजे भयंकर होते हैं। लाल्टू ने सवाल उठाया कि जिन्हें अज्ञानी मानकर हम अनजाने में दरकिनार कर रहे होते हैं, वे किसके दर जा पहुंचते हैं? क्या वे किसी शैतान के गुलाम हो जा सकते हैं? उन्हें वह समझ क्यों नहीं हासिल हासिल होती है, जो हममें है? ये कौन हैं जो ‘झूठ ही सच है’ का नारा लगाते हुए हमें दबोच रहे हैं?

भारत और अमेरिका की हाल की राजनैतिक घटनाएं ऐसे सवाल खड़ी करती हैं। लाल्टू ने कहा कि जिस अंधेरे दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें कुदरती तौर पर हमें ज्ञान-मीमांसा की जो काबिलियत मिली है, उसको बढ़ावा देना होगा। इस अँधेरे दौर में हम रोशनी की तलाश कैसे करें, यह हमारे लिए अहम सवाल है। मनुष्य तर्क और भावनात्मकता के साथ भाषा और एहसासों के अर्थ ढूंढ सकता है। इसे बचाए रखना इस वक्त की सबसे बड़ी लड़ाई है।
व्याख्यान के बाद श्रोताओं के साथ लाल्टू का विचारोत्तेजक संवाद हुआ। शम्भु यादव ने मौजूदा वैज्ञानिक विकास और मार्क्सवाद के अंतर्संबंधों पर सवाल किया। मृत्युंजय ने ज्ञान के माध्यमों के लगातार अप्रामाणिक होते जाने का सवाल उठाया। वन्दना ने ज्ञान की प्रक्रिया में ‘एक्सपोजर’ का सवाल उठाया। आस्था और भ्रम के सन्दर्भ का सवाल महेश महर्षि ने पूछा। मंगलेश डबराल ने ज्ञान के सामान्यीकरण का प्रश्न उठाते हुए बहस को और जीवंत बनाया। इसके पहले कवि-वैज्ञानिक लाल्टू ने कुबेर दत्त के गद्य की पहली पुस्तक ‘एक पाठक के नोट्स’, कवि कृष्ण कल्पित ने जयनारायण द्वारा सम्पादित  ‘कल के लिए’ के कुबेर दत्त विशेषांक का और वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने कुबेर दत्त की बिल्लियों और बिल्लियों पर लिखी गई देश-दुनिया की कविताओं पर आधारित टेबल कैलेण्डर का लोकार्पण किया। इस मौके पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक ने कुबेर दत्त पर केंद्रित कविता पढी, ‘कल के लिए’ के सम्पादक जयनारायण का ऑडियो सन्देश सुनाया गया। डॉ. बलदेव बंशी ने कुबेर जी से जुड़े संस्मरण सुनाए। कृष्ण कल्पित ने कहा कि दुनिया में शायद ही कुबेर जी जैसा कोई दूसरा प्रसारक होगा, जिसने 30 साल तक कला-साहित्य पर उत्कृष्ट कार्यक्रम बनाया हो। उन्होंने उनको उच्च कोटि के प्रसारक और संवेदनशील कवि के रूप में याद किया। युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने उन्हें अत्याधुनिक दृष्टि वाला और भारतीय समाज में गहरे धंसा जनसांस्कृतिक बुद्धिजीवी बताया।
आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि हम किससे संवाद करते हैं, इस पर विचार करना बेहद जरूरी है। हमारे समय की विडम्बना यह है कि संवाद के भीतर से जनता गायब होती जा रही है जबकि इस दौर में दोस्तों की खोज बेहद जरूरी है। कार्यक्रम का संचालन सुधीर सुमन ने किया। कार्यक्रम के आरम्भ में रेल दुर्घटना और नोटबंदी के कारण मारे गए आम लोगों के शोक में एक मिनट का मौन रखा गया। उसके बाद संगवारी के कपिल शर्मा, अतुल और देवव्रत ने हबीब जालिब की नज़्म ‘क्या लिखना’ सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने किया।

इस अवसर पर कवि मंगलेश डबराल, मृत्यंजय, कहानीकार महेश दर्पण, योगेन्द्र आहूजा, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक, जसम के महासचिव आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, बजरंग बिहारी तिवारी, कवितेंद्र, पत्रकार आनंद प्रधान, पंकज श्रीवास्तव, रंगकर्मी लोकेश, राजेशचंद्र, फ़िल्मकार संजय जोशी, शिक्षिका उमा गुप्ता, शुभेंदु घोष, भारतेंदु मिश्र, श्याम सुशील, वासुदेवन, मालती गुप्ता, जितेन्द्र, किरण शाहीन, बृजेश, मनीषा, वंदना, तूलिका, सोमदत्त शर्मा, रविदत्त शर्मा, अरुणाभ सौरभ, इरेंद्र, रामनिवास, रोहित, दिनेश, अनुपम आदि मौजूद थे।

 (जसम दिल्ली की ओर से रामनरेश द्वारा जारी)

अनुप्रिया की बाल कवि‍ताएं

anupriya-picबचपन

बचपन कच्ची पगडण्डी
मानो उड़ती धूल
घने अँधेरे जंगल में
ये उजास के फूल

बादल काला दौड़  लगाये
आसमान के पार
ताक -झाँक के  देख रहा है
धरती  का संसार

नए परिंदे ढूँढ़ रहे  हैं
असमानी वो रंग
छोड़ कहाँ  आये वो सपने
जाने किसके संग

नन्हे-मुन्ने बना रहे हैं
एक नयी पहचान
फ़ैल रही है हर  होठों पर
मीठी सी  मुस्कान।

एक कहानी प्यारी

सोच रहा हूँ लिख ही  डालूं
एक कहानी प्यारी
होंगे  उसमे भालू ,बन्दर
और गोरैया न्यारी

एक छोटा बागीचा होगा
होंगे उसमें फूल
मीठे फल और सुन्दर तितली
अरे! गया मैं भूल

एक नदी बहती होगी
और होगा उसमें  पानी
नन्हें बन्दर करते होंगे
फिर कोई शैतानी

भालू और गोरैया की
होगी पक्की यारी
भेदभाव ये नहीं जानते
ना ही दुनियादारी

गर्मी के दिन

ऊँघ रहा है सूरज ओढ़े
नीला आसमान
तितली के होठों पर आयी
मीठी सी मुस्कान

करे  ठिठोली  बादल प्यारा
हवा झूमकर गाए
कानाफूसी करे परिन्दे
गर्मी के दिन आये

घर की हर मुंडेर पर
लगी धूप सुस्ताने
धमाचौकड़ी करने बच्चे
ढूँढे़ नए ठिकाने

अरे  गिलहरी भागी देखो
कौवे करते शोर
जाग गए हैं सपने सारे
गर्मी की एक भोर।

हो गयी अब तो भोर

ब से बन्दर चढ़ा डाल पर
क से कोयल गाए
भ से भालू रहा देखता
म से मछली खाए

च से चमचा लेकर भागी
ग से गुड़िया रानी
घ से घोड़ा रहा हाँफता
दे दो  प से पानी

फ से सुन्दर फूल खिले
त से तितली मुस्काये
छ से छतरी पीली लेकर
ल से लड़की जाए

ख से खरहा झट से दौड़ा
ज से जंगल की ओर
न से नींद से जागो तुम सब
हो गयी अब तो भोर।

बरखा रानी

बरखा रानी अब तो आओ
गर्मी बहुत सताए
सबका अब है हाल बुरा
ये पल -पल बढती जाए

आकर अपनी रिमझिम बूंदें
हम पर तुम बरसाओ
काले बादल के कंधे पर
चढ़कर बस आ जाओ

झुलस रहे हैं पंछी ,पेड़
है उदास जग सारा
अपने हाथों से इनमे
भर दो जीवन दोबारा …..

बचपन

ढूँढा बहुत सलोना बचपन
लगता खेल खिलौना बचपन
सख्त हुई इस दुनिया में है
नरम -नरम बिछौना बचपन
उम्मीदों की पगडंडी पर
पीछे -पीछे छौना बचपन
घर की दीवारों के भीतर
प्यारा सा हर कोना  बचपन
मेरे -तेरे सबके भीतर
थोड़ा सा तो हो ना बन
कंप्यूटर की इस नगरी में
है पत्ते का  दोना  बचपन

बादल प्यारे

बादल प्यारे आसमान के
क्या तुम भी सुस्ताते हो
पंख नहीं है लेकिन फिर भी
कैसे तुम उड़ जाते हो

कोई परिंदा आकर तुमसे
करता भी है बात
या फिर यूँ ही अकेले ही
कट जाती है रात

काले बादल कहो जरा
है भीतर कितना पानी
तुम भी नटखट मेरे जैसे
करते हो शैतानी

डाँट  तुम्हें भी पड़ती क्या
अपनी अम्मा से बोलो
हम तो हैं अब दोस्त बने
मुझसे तो राज ये खोलो

सच कहता हूँ अम्मा

जब भी देखूं मुझको यह

संसार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
हर बार नया लगता है

रोज नया लगता है सूरज
और रात भी नयी-नयी
रोज चमकते तारों का
अंबार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

लगती नयी किताबें अपनी
जूते  और जुराबें अपनी
लगता है स्कूल नया
हर यार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

पापा की मुस्कान नयी
और दीदी का झुंझलाना
दादा -दादी का मीठा
दुलार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

आशा के बादलों की बरसात करतीं कवि‍ताएं

पढना बहुत लोगों का शौक होता है। अपने-अपने तरीके से लोग इसके लिए समय निकालते हैं। लेकिन घुमते हुए भी पढना और वह भी सामूहिक रूप से, ऐसा आपने  कम ही सुना होगा। घूमना  हो और  उसके साथ पढना, साथ ही पढ़े पर चर्चा इसके तो क्या कहने। उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पि‍थौरागढ़ में कुछ शिक्षक-साहित्यकार साथी- महेश पुनेठा, चिंतामणि‍ जोशी, गि‍रीश पांडे, वि‍नोद उप्रेती, राजेश पंत, नवीन वि‍श्वकर्मा ‘गुमनाम’ आदि‍, जब सायंकालीन भ्रमण में जाते हैं, तो उनके हाथों में कोई-न-कोई पुस्तक होती है। वे उस पुस्तक को न  केवल पढ़ते हैं, बल्कि उस पर चर्चा भी करते हैं। उन्होंने इसे ‘चर्चा-ए-किताब’ नाम दिया है। इस अभियान की शुरुआत इस वर्ष (2016) मई से हुई। इसमें दो-तीन से लेकर कभी दस-बारह तक भी लोग हो जाते हैं। बाहर से  शहर में आने वाले साहित्यिक मित्र भी इसका हिस्सा बनते हैं। कभी-कभार पत्रिका या किताबों के लोकार्पण जैसे आयोजन भी इसमें होते है।

‘चर्चा-ए-किताब’ को ‘लेखक मंच’ पर इसी स्‍तंभ के तहत दि‍या जा रहा है। आप भी इस अनोखे ‘सायंकालीन भ्रमण’ का आनन्‍द लीजि‍ए। साथ ही अनुरोध है कि‍ आप भी जब अपने मि‍त्रों, परि‍चतों से मि‍लें तो इस पर चर्चा जरूर करें कि‍ पि‍छले दि‍नों कौन-सी अच्‍छी रचना या कि‍ताब पढ़ी। इससे समाज में रचनात्‍मक माहौल बनने में जरूर मदद मि‍लेगी।

9 मई 2016

rohit-kaushik

आज सायंकालीन भ्रमण के दौरान साथ में था, पिछले दिनों प्रकाशित रोहित कौशिक का काव्य संग्रह- ‘इस खंडित समय में’। संग्रह की कुछ  कविताओं का पाठ किया गया। इस संग्रह की कवितायें एक ऐसे समय को बारीकी से व्यंजित करती हैं, जिसमें ‘तार-तार हैं रिश्ते, तार-तार हैं संवेदनाएं, भरोसा तार-तार है, तार-तार हैं कल्पनाएँ और वहशीपन के  द्वारा मासूमियत को तार-तार किया जा रहा है।’ रोहित की कविता इस  तार-तार होते समय में जिसे वह खंडित समय कहते हैं, एक भरोसा पैदा करने की कोशिश करती हैं। वह दुःख-पीड़ा-करुणा, हर्ष-उल्लास के जीवद्रव्य से हृदयहीनता की बंजर जमीन पर कविता का पौधा पैदा करते हैं। यह कविता का पौधा उनके लोकजीवन के अनुभव और संवेदना से फलता-फूलता है। उसमें किसान-मजदूर का पसीना भी चमकता है और  कूड़ा बीनती फटेहाल बच्ची की करुणा भी फूटती है। उनकी कविता  अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ तनकर खडी हो जाती है। इस तरह निराशा के वातावरण में घिर आए आशा के बादलों की बरसात करती है। हमसे बढ़ती हमारी दूरी को ही ख़त्म करती है। साथ ही धर्म के हथियार से चेतना को कुंद करने की सत्ता की साजिश का पर्दाफाश करते हुए उसमें चोट भी करती है। अच्छी बात यह है कि रोहित अँधेरे के पसर जाने को जिंदगी का ख़त्म हो जाना नहीं मानते हैं, बल्कि वह मानते हैं कि अँधेरे से ही आती है रौशनी की लौ। हमारी जिंदगी को नयी राह दिखाता है अँधेरा। ऐसा वही कवि मान सकता है, जो जिंदगी के कागज़ पर अहसास की कलम से कविता लिखता है। वही गाँव से गायब होते गाँव को देख सकता है। अपने समय और समाज में घट रही समसामयिक घटनाओं को अपनी कविताओं का विषय बना सकता है। रोहित ने साम्प्रदायिकता, किसानों की आत्महत्या, उग्र राष्ट्रवाद, दामिनी बलात्कार काण्ड जैसे विषयों पर कवितायें लिखी हैं। उनका यह पहला ही संग्रह है और इसमें कथ्य और शिल्प के स्तर पर जैसी परिपक्वता दिखाई देती है, वह उनके भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है।

आंकडों की भूल-भूलैया में फँसी स्कूली व्यवस्था : धीर झिंगरन

education

मैं हमेशा से यह मानता रहा हूं कि सही उद्देश्य के लिए इकट्ठे किए गए आंकडे और उनका विश्लेषण शिक्षा के क्षेत्र में साक्ष्य आधारित निर्णय लेने में मददगार होते हैं। लेकिन आजकल ऐसा लगने लगा है कि आंकडे जुटाना ही मकसद हो गया है। आंकडे जुटाने के इस अतिरेक का आलम यह है कि प्रतिदिन कोई-न-कोई नई वेबसाइट या पोर्टल बन जाता है और वह स्कूलों और शिक्षा संस्थानों से आंकडों की मांग करता रहता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि इस प्रकार के उपक्रम वास्तव में स्कूलों की गुणवत्ता और बच्चों के सीखने में सुधार के काम के लिए व्यर्थ की कवायद ही होते हैं, क्योंकि केवल आंकडे इकट्ठे करने और स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार का आपसी सम्बन्ध ही मिथ्या धारणा है।

आंकडे इकट्ठे करने का कुछ साल पहले शुरू हुआ यह उत्सव इस समय नियन्त्रण से बाहर हो चुका है। इस प्रकार का अतिरेक भरा और अनियन्त्रित रूप से आंकडे इकट्ठे करने का काम वस्तुतः आज एक बीमारी का रूप ले चुका है।

एनसीईआरटी द्वारा समय-समय पर नेशनल अचीवमेन्ट सर्वे कराए जाते हैं। इसके बावजूद ज्यादातर राज्य सरकारें भी इस प्रकार के अचीवमेन्ट सर्वे कराने लगी हैं। हम अब एक ऐसी विश्व रिकॉर्ड को तोड़ने वाली आंकडे इकट्ठे करने की गतिविधि करने जा रहे हैं, जिसमें कक्षा 1 से 8 तक के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 12 करोड बच्चों के आकलन के आंकडे केन्द्रीकृत राष्ट्रीय डाटाबेस में दर्ज किए जाएंगे ताकि प्रत्येक बच्चे की सीखने की प्रगति पर लगातार नजर रखी जा सके। इस प्रकार की विचित्र/विलक्षण गतिविधि कुछ राज्यों में पहले से ही विद्यमान है। दो वर्ष पहले एक राज्य के शिक्षा सचिव ने मुझे गर्व से बताया कि उनके राज्य के सभी कक्षाओं के 60 लाख बच्चों के कक्षास्तरीय प्रगति का पूरा ब्योरा उनके लैपटाप में मौजूद है। और इसके माध्यम से वे हर बच्चे की सफलता पर नजर रख सकते हैं। उन्हें यह अच्छा नहीं लगा, जब उनसे पूछा गया कि यह डाटाबेस दूरदराज के एक गांव में पढ़ने वाली लड़की गीता की उसके सीखने में सुधार करने में कैसे मददगार होगा? मेरी इस प्रकार की अनुचित और निराशापूर्ण बातों के बदले में उन्होने यह बताया कि इस निगरानी के कारण ही अप्रैल के अन्त में केवल छह महीने में ही लाखों स्कूली बच्चों के ग्रेड में सुधार (डी से सी में अथवा बी से ए में) आया है। मुझे नहीं पता कि वे शिक्षा सचिव वास्तव में यह जानते थे या नहीं कि जिला और ब्लॉक स्तरीय शिक्षा अधिकारियों ने शिक्षकों को यह सलाह दी थी कि साल के अन्त में बच्चों की प्रगति में सुधार दिखना चाहिए। (उन्होने इस पर बल नहीं दिया कि सुधार होना चाहिए)। इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए बहुत सारे अध्यापकों ने साल के शुरुआत में बच्चों को निम्न ग्रेड में रखा ताकि साल के अन्त में बच्चों की प्रगति में सुधार दिखाया जा सके।

गाय को रोज-रोज तोलने से उसका वजन नहीं बढ़ जाता।

इस स्थिति में कोई यह सोच सकता है कि शैक्षिक प्रगति के बार-बार आकलन से बच्चों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है- यह मासूमियत से उपजा विचार है या आंकडों और उसके विश्लेषण तथा उसके लुभावने प्रस्तुतिकरणों की आड में शिक्षा की कमजोर गुणवत्ता और बच्चों के निम्न अधिगम परिणामों की उपेक्षा करने का एक प्रयास है।

बच्चों के अधिगम परिणामों का आकलन बहुत महत्वपूर्ण है और इस प्रकार के अचीवमेन्ट सर्वे हमें वृहद् एवं समेकित तस्वीर बताते हैं और सम्भावित समस्या के क्षेत्रों को पहचानने में मदद करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारा पूरा ध्यान इस प्रकार के आंकडे इकट्ठे करने और केन्द्रीय स्तर पर उनका विश्लेषण करने पर होना चाहिए, जबकि इस प्रकार की कवायद से कक्षा शिक्षण की प्रक्रियाओं में सुधार के सम्बन्ध में हमें कोई मदद नहीं मिलती। बच्चों के सीखने में सुधार केवल तभी हो सकता है, जब हम वर्तमान में प्रचलित कक्षा शिक्षण में तरीकों में बदलाव का प्रयास करें।

आंकडे इकट्ठा करने की यह मुहिम इस प्रकार लगती है जैसे- हम मुख्य मुद्दे का तो कुछ नहीं कर सकते तो चलो कम-से-कम आंकडे तो इकट्ठे कर ही लेते हैं। इस प्रकार के अनावश्यक आंकडे इकट्ठे करने के उदाहरण हमारी शिक्षा व्यवस्था में बहुतेरे मिल सकते हैं। कई राज्य सरकारें 75.100 विविध प्रकार के संकेतकों के आधार पर हर स्कूल के बारे में प्रत्येक छह महीने या एक वर्ष में आंकडे इकटठे करती हैं और उनको कम्प्यूटर में दर्ज करती हैं। जब तक इन आंकडों को कम्प्यूटर में दर्ज करने का काम पूरा होता है, तब तक अगले चक्र के आंकडे इकट्ठे करने का समय शुरू हो चुका होता है। इस प्रकार का काम सिर्फ यह भ्रम पैदा करता है कि हम सभी स्कूल की गुणवत्ता के सुधार के काम में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं।

ब्लॉक और जिला स्तर पर नीचे से ऊपर की ओर होने वाले इस स्कूल स्तरीय आंकडे इकट्ठे करने की कवायद का नतीजा यह होता है कि नीचे के पायदान पर खडे हुए लोगों अर्थात शिक्षकों को यह लगने लगता है कि गुणवत्ता में सुधार के लिए उनकी भागीदारी सिर्फ प्रपत्रों को भरना भर है (एक गणना के अनुसार एक स्कूल को वर्ष भर में 40-50 प्रपत्र भरने होते हैं।) और स्कूल में सुधार के लिए सुझाव आंकडों के विश्लेषण के बाद उच्च अधिकारियों द्वारा दिए जाएंगे।

हमारे सरकारी तन्त्र में तथ्य/साक्ष्य आधारित निर्णय लेने की कोई राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति नहीं है। निरन्तर इकट्ठा किए जा रहे आंकडे बताते हैं कि लगभग 10 प्रतिशत सरकारी प्राथमिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत अनेक नये शिक्षकों की भर्ती की गई है, लेकिन यह नियुक्ति वहां नहीं की जाती है, जहां वास्तव में आवश्यकता है, बल्कि उन स्कूलों में होती है, जहां उनकी ज्यादा जरूरत नहीं होती। वस्तुतः अधिक-से-अधिक आंकडे इकट्ठे करने मात्र से ही तथ्य/साक्ष्य आधारित निर्णय लेने की संस्कृति विकसित नहीं की जा सकती।

हमारी शिक्षा व्यवस्था की क्षमतायें सीमित हैं। इस समय शिक्षा तन्त्र में काम करने वाले अधिकतर लोग (शिक्षक से लेकर राज्य स्तर के नेताओं तक) अन्य व्यवस्थागत पहलूओं की अपेक्षा केवल आंकडे इकट्ठे करने को ही महत्व दे रहे हैं, जबकि अन्य व्यवस्थागत पहलूओं में सुधार की तुरन्त आवश्यकता है। इस प्रकार से आंकडे इकट्ठा करने की मनमानी प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है। हमें अपने संसाधनों,  ऊर्जा और चिन्तन को सरकारी स्कूलों में सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं में बदलाव लाने में लगाना चाहिए। और यह शिक्षक शिक्षा को मजबूत करने और स्कूल आधारित आकलनों में बदलाव के माध्यम से किया जा सकता है। बच्चों के सीखने में प्रभावी सुधार के लिए मूलभूत इकाई केवल स्कूल ही हो सकता है।

राज्य और केन्द्रीय नेतृत्व को यह समझना होगा और इसे पहचानना होगा कि सरकारी स्कूली तन्त्र में विद्यमान विभिन्न समस्याओं/प्रश्नों का उत्तर/समाधान केवल आंकडे इकट्ठे करने से नहीं हो सकता। हमें यह करने की आवश्यकता होगी कि इस प्रकार इकट्ठे किए जा रहे आंकडों की हम गहन समीक्षा करें और यह देखें कि आंकडे इकट्ठे करने के उद्देश्य, इस काम के लिए अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में से लिया गया समय, हमारी विश्लेषण करने की क्षमता और फॉलोअप के लिए इन आंकडों की उपयोगिता के लिहाज से हमारी यह कवायद कितनी सार्थक है। यदि हम इन बिन्दूओं पर राज्य एवं केन्द्र स्तर पर प्रत्येक कक्षा के आकलन से सम्बन्धित आंकडों को इकट्ठा करने और उनको कम्प्यूटर में दर्ज करने के काम को ईमानदारी से देखने की कोशिश करेंगें तो हमें यह काम/पागलपन निरर्थक ही लगेगा।

 (धीर झिंगरन लेंग्वेज एण्ड लर्निंग फाउण्डेशन के निदेशक और पूर्व आईएएस ऑफिसर हैं।)

‘अभिरंग’ नाटक प्रतियोगिता में प्रथम

नाटक 'जनता पागल हो गई है' का एक दृश्य।

नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ का एक दृश्य।

नई दिल्ली : भारत सरकार के प्रतिष्‍ठान भारत कंटेनर निगम लिमिटेड की ओर से  आयोजित  सतर्कता जागरूकता सप्ताह-2016 के अन्तर्गत हुई नाट्य प्रतियोगिता में हिन्दू कॉलेज की नाट्य संस्था ‘अभिरंग’ ने पहला स्थान प्राप्‍त किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में हुई इस प्रतियोगिता में छह कॉलेजों श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, श्री अरबिंदो कॉलेज, रामलाल आनंद कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, सेंट स्टीफंस कॉलेज और हिंदू कॉलेज ने भाग लिया था। ‘अभिरंग’ ने प्रसिद्ध नाटककार शिवराम के चर्चित और बहुमंचित नाटक ‘जनता पागल हो गई है’  के लिए पच्चीस हजार रुपये का पहला पुरस्कार जीता। नाटक के निर्देशक युवा रंगकर्मी और शिवराम की नाट्य मंडली के सदस्य आशीष मोदी थे। ‘अभिरंग’ के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने बताया कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध सतर्कता के निमित्त आयोजित इस प्रतियोगिता में शिवराम के नाटक में पागल की भूमिका में आशुतोष  कुमार शुक्ल, जनता की भूमिका में पियूष पुष्पम, नेता की भूमिका में शिवानी, पूंजीपति की भूमिका में पूजा, पुलिस अधिकारी की भूमिका में स्नेहदीप, और सिपाहियों की भूमिका में राहुल, दीपिका, जागृति ने अपने जीवंत अभिनय से दर्शकों  को खासा प्रभावित किया। नेपथ्य सहयोग में चंचल सचान और अन्य विद्यार्थी थे।

सभागार में भारत कंटेनर निगम लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, मुख्य सतर्कता अधिकारी, निदेशक, प्रख्यात जूरी सदस्यों, कॉनकोर के अधिकारियों, मीडिया और शिक्षा बिरादरी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

निर्णायक मंडल में श्री रॉबिन आईपीएस (दिल्ली पुलिस), श्री आलोक शुक्ला (थिएटर अभिनेता, लेखक, निर्देशक और पत्रकार) और श्रीमती रत्ना बाली कांत (मूर्तिकार और प्रदर्शन कलाकार) थे। हिन्दू कालेज की प्राचार्या डॉ अंजू श्रीवास्तव ने ‘अभिरंग’ के नाट्य मंडल को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी है।

प्रस्तुति‍-आशुतोष कुमार शुक्ल, संयोजक, अभिरंग, हिन्दू कॉलेज

मिट्ठू : संजीव ठाकुर

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स्कूल से आकर, खाना खाकर रोज की तरह श्रुति बालकनी में खड़ी हो गई थी। उसकी मम्मी किचन में काम कर रही थीं। तभी कहीं से आकर एक तोता रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति उसे देख बहुत खुश हुई। उसने उसे पकडऩा चाहा, मगर वह उड़ गया और दो मिनट बाद फिर आकर रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति ने समझा, ‘जरूर इसे भूख लगी है।‘ वह किचन के अंदर गई और फ्रिज से ब्रेड का टुकड़ा निकालकर ले आई। मम्मी पूछती रह गईं कि ‘क्या ले जा रही हो?’ लेकिन उसने नहीं बताया। मम्मी उसका पीछा करते-करते बालकनी तक आ गईं। मम्मी के आते ही तोता उड़कर चला गया।

श्रुति नाराज हो गई, ”आप क्यों आ गईं? मेरा तोता उड़कर चला गया। मैं उसके लिए ब्रेड लाई थी।’’

”बेटा! तोतों को ब्रेड ज्यादा पसंद नहीं है। उन्हें तो भिगोए चने पसंद हैं और हरी मिर्चें पसंद हैं।’’ मम्मी ने समझाना चाहा।

”तो ठीक है, मैं हरी मिर्च ही ले आती हूँ।’’ श्रुति ने कहा और फ्रिज खोलकर हरी मिर्च ले आई। लेकिन तोता दुबारा नहीं आया। निराश होकर श्रुति सो गई।

अगले दिन फिर जब श्रुति स्कूल से आकर, खाना खाकर बालकनी में खड़ी थी, तोता फिर आ पहुँचा। श्रुति खुश हो गई। बोली, ”आओ, तोता, आओ! मैं तुम्हारे लिए मिर्च लाती हूँ।’’

वह मिर्च ले आई। तोता उसे खाने लगा। श्रुति को देखकर बहुत मजा आ रहा था। वह सोच रही थी, ”अब इसे मिर्च लगेगी और यह ‘आह! आह!’ करने लगेगा।‘’ लेकिन पूरी मिर्च खाने के बाद भी तोता निश्चिंत बैठा रहा।

श्रुति मम्मी को यह बात बताना चाहती थी इसलिए वह अंदर गई। तोते के मिर्च खाने की बात बताई और कहा, ”मम्मी! कल थोड़े चने भिगो देना? मैं तोते को दूँगी!’’

”ठीक है।’’ कहकर मम्मी उसे सोने को ले गई। सोते समय वह तोते की ही बात करना चाहती थी। उसे लग रहा था कि तोते का भी कोई नाम होना चाहिए। पता नहीं उसके मम्मी-पापा ने उसका क्या नाम रखा होगा? उसने अपनी मम्मी से यह बात पूछी। मम्मी ने बताया, ”इसका नाम मिट्ठू है।’’

”अच्छा! बड़ा प्यारा नाम है! आपको कैसे पता चला?’’ श्रुति ने कहा।

”बेटे! सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही हुआ करते हैं।… अब सो जाओ।’’

श्रुति की समझ में नहीं आया कि सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही क्यों होते हैं? लेकिन उसे यह नाम पसंद आया था।

अब वह रोज मिट्ठू की प्रतीक्षा करती। उसके लिए चना-मिर्च एक कटोरे में लेकर बाहर खड़ी रहती। एक दूसरे कटोरे में पानी भी रख लेती। मिट्ठू रोज आता। उछलता, कूदता। मिर्च खाता, पानी पीता और फुर्र हो जाता। अब वह श्रुति के कंधे पर भी चढ़कर बैठ जाता, कभी उसकी हथेली पर भी। लेकिन जैसे ही वह उसे पकडऩा चाहती, वह उड़ जाता।

मम्मी श्रुति के रोज-रोज के इस खेल से ऊबतीं। उसे जल्दी सोने को कहतीं। श्रुति को सोना अच्छा नहीं लगता—मिट्ठू के साथ खेलना अच्छा लगता था। उसने एक उपाय निकाल लिया। मम्मी के साथ वह बिस्तर पर चली जाती और आँखें मूँदकर सोने का नाटक करती। जब उसकी मम्मी सो जातीं तो उठकर बालकनी में चली जाती, और मिट्ठू के साथ खेलती।

एक दिन इसी तरह मम्मी को सुलाकर जब वह बालकनी में गई तो मिट्ठू नहीं आया। वह सोने चली गई। अगले दिन भी वह नहीं आया। उसके अगले दिन भी नहीं। कई दिनों तक वह नहीं आया तो श्रुति परेशान हो गई।

एक दिन मम्मी की डाँट की परवाह न कर उसने पूछ ही लिया, ”मम्मी! अब मिट्ठू क्यों नहीं आता?’’

”तुम्हें कैसे पता कि नहीं आता है? तुम तो सो जाती हो? वह आता होगा।’’

”नहीं मम्मा! मैं तो रोज मिट्ठू से मिलती थी। तुम्हारे सोने के बाद वह आता था।’’

”तो ठीक ही है, नहीं आता है। अब कम-से-कम तुम ठीक से सोओगी तो?’’

”मगर मम्मी, वह आता क्यों नहीं?’’

”क्या पता बेटे?….हो सकता है किसी बहेलिये ने उसे पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया हो? बाजार में बेच दिया हो?’’

”ये बहेलिया क्या होता है, मम्मा?’’

”बेटे! बहेलिया पक्षियों को पकडऩे वाला होता है।’’

”वो तो बहुत खराब आदमी होता है मम्मा!’’

आज सोते समय श्रुति सोच रही थी कि कहीं से उसके पास सचमुच की कोई बंदूक आ जाती तो वह बहेलियों को उसी तरह गोली मार देती, जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है!….पता नहीं उसका मिट्ठू कहाँ चला गया?