Archive for: October 2016

मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

शेखर जोशी

शेखर जोशी

वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशीजी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘मेरा ओलियागांव’ के अंश ‘हर शुक्रवार’ के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं। आप भी इन अंशों का आनंद लीजिए-

पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊँचाई पर बसा मेरा ओलियगाँव दो भागों में विभाजित है। इस छोटे से गाँव में मात्र ग्यारह घर हैं। गाँव की बसासत ऊँचाई वाले भाग में  बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है। ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है।

‘कुमाऊँ का इतिहास’ के लेखक पंडित बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकाण्ड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुँवर सोमचन्द से एक भविष्यवाणी की थी। वह यह थी कि यदि वह उत्तराखण्ड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है। तो, कुँवर 22 लोगों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई। कुँवर सोमचन्द ने कुमाऊँ में चन्द वंश राज्य की स्थापना की। सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चन्द राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया। सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे। ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गाँव के जोशी कहलाए।

अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागाँव में आकर बस गए।

काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है। सड़क के दाँईं ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है। दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है। इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागाँव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में। गाँव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई। इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना। बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गाँव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुँचाना मुश्किल हो जाता है।

गाँव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिनारम्भ की प्रतीति होती है। इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं।

ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है। पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है। घास के हाते ऊँची-ऊँची घास का कम्बल ओढ़ लेते हैं।

मैं भाग्यशाली था कि इसी गाँव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ। नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे चन्द्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चन्द्र शेखर लिखवाया। चन्द्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चन्द्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया।

हम तीन भाई-बहन थे। मैं उनमें सबसे छोटा था। कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था। लेकिन माता-पिता को अपनी सन्तान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है। मैं सबका लाड़ला था।

गाँव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे। हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता। हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है।

खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनन्द आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी। एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था। उसमें खूब घने पौधे होते थे। जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच ऊँचे, तो उनको वहाँ से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे। उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता। पानी से भरे खेत में दाँता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता। उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी। धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था। बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे। वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला। उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी। अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य ‘हुड़कीÓ को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता। कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं। अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिए जाते। औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं। हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता। वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम… हुड़की की आवाज के साथ। औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं। खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता। उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियाँ होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूँ की मिली हुईं रोटियाँ, कुछ पूडिय़ां और सब्जी। कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता। दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुँचाया जाता। सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते। शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था।

खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे। शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाए, इसलिए हुड़किया हुँकारी लगाता था—’धार में दिन है गो, ब्वारियो…। छेक करो, छेक करो।’ मतलब कि चोटी पर सूरज पहुँच गया है। जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो।

कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियाँ खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं। धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बाँस की चटाइयाँ को ‘मोस्टÓ कहते थे। ये पतले बाँस की नरसल की चटाइयाँ होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाइ 8 फुट की होती थीं। ये चटाइयाँ बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिए जाते थे। लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था। पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था। धान के खाली पराल को अलग करते। चाँदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता। एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया। कई मजदूर लगे थे। हमारी ईजा भी गई थीं। धान की वह खुशबू और चाँदनी रात, बहुत आनन्द आता था।

धान की पकी फसलों को नुकसान पहुँचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता। वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूँढ़ते रहते। लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवाँ बन्दूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूँस-ठूँस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते। यह काम देर रात में किया जाता था।

इस बन्दूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था। हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था।

उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था। वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था। ताऊजी की भरवाँ बन्दूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी। एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी। उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किए। उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था। उसने खूब ठूँस कर बारूद से सना यह सामान बन्दूक की नाल में भरा। अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी। वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुँह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया। बन्दूक ऊँचाई पर टिकाई हुई थी। उसके अन्दर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया। दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे। खैरियत यह थी कि उसकी आँखें सुरक्षित रहीं। गाँव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था। उस दिन राम ने अपनी टोपी आँख की भँवों तक खींच रखी थी। हादसे के बाद वह बन्दूक को यथास्थान रख आया ।

बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके। राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था। शायद उसी की यह कारस्तानी हो। लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी। राम अपने गाँव भाग गया।

पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनन्द होता था। पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नई स्फूर्ति से भर देती थी।

धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूँ की मड़ाई में भी बहुत आनन्द आता था। गेहूँ की पूलियाँ घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं। आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी। जब आँगन सूख जाता, तो पूलियाँ आँगन में फैला दी जातीं। फिर बैलों को गेहूँ की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—’हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले… कानि कै लालै बल्दा… पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले…’ मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/कंधे में लाद कर लाएगा, पीठ पर लाद कर लाएगा/बल्दा चल। बैल गेहूँ की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे। बैल गेहूँ न खा लें, इसलिए उनके मुँह में जाली बांधी जाती थी। बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता। एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते। इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूँ नीचे गिरता जाता। उसके बाद हम बच्चे जहाँ गाय-भैंस चरने जातीं, वहाँ से सूखा हुआ गोबर लेकर आते। पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता। गोशाला की रोज सफाई होती। गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता। वहाँ खाद का ढेर लगा रहता। जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती। वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी। वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी।

हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे। उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी। उसके जलने से राख बनती। बाँस की चटाइयाँ बिछा कर और उन पर गेहूँ डाल कर उसमें राख डाली जाती। फिर पैरों से उसको मिलाया जाता। राख कीटनाशक दवा का काम करती थी। यह गाँव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था। जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था। उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकट्् ठा किया जाता था। पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था। उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था। दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे। इससे ये चटाइयाँ वर्षों चलती थीं। मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टाँड़ के ऊपर डाल दिया जाता। जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता।

हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे। जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते। हम अपनी-अपनी क्यारियाँ बनाते थे। फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे। भिंडी की पौध नहीं होती थी। भिंडी के बीज बोए जाते। शाम को हम पौधों  में गिलास से पानी डालते थे। फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते। फिर उनमें फूल लगते। इसके बाद उनमें फल लगते। जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती। अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जाएगा। उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है।

इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था।

पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती। वहाँ बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं। खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है। बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था। बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती। पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे। जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता। उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे। इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी। हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टाँगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे। ऐसा हमने मन्दिरों में देखा होता था, जहाँ बलि दी जाती थी। मेरी एक कविता है–

काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अन्तर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बाँटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद।

खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं। पन्सारी के यहाँ चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है। दाडि़म का फूल सिन्दूरी रंग का होता है। आरी के दाँतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पाँच पंखुडिय़ाँ होती हैं। उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता। वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे। हम उनको इकट्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे। उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे।

बिगौत की दावत

हमारे घर में गायें थीं। हमारी सबसे प्रिय गाय का नाम बसंती था। वह ईजा के मायके से आई हुई गाय की तीसरी पीढ़ी की थी, इसलिए ईजा उसको बहुत प्यार करती थीं। हम भाई-बहन उसको मौसी कहते थे। मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो कभी-कभी गायों को ग्वाले के पास छोडऩे के लिए ले जाता था। एक बार मैं बसंती के साथ छेड़-छाड़ कर रहा था—कभी उसके थन में हाथ लगा देता, तो कभी उसकी पूँछ को पकड़ कर सिर पर लगा देता।

बसंती ने सींग हिलाकर मना किया, लेकिन मेरी शैतानी बढ़ती गई। पहाड़ी रास्ते घुमावदार होते हैं। आखिर में तंग आकर बसंती ने सिर नीचा करके मेरी टाँगों के नीचे से सींग डाले और मुझे उठाकर ऊपर घुमावदार रास्ते पर रख दिया। जैसे—मुझे सजा दे दी हो। तब में समझ गया कि ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यह बात बसंती के प्रसंग में समझ में आई कि पशु मनुष्य की भाषा कैसे समझते थे। जब खेतों में फसल कट जाती थी, तो पशुओं को कुछ दिनों तक उन्हीं खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। एक बार कोई मेहमान आए, तो उस समय घर में चाय के लिए दूध नहीं था। ईजा ने खेत की तरफ जाकर बसंती को हाँक दी। बसंती ने सिर उठाकर ऊपर देखा। ईजा ने कहा, ”आ बसंती।’’ वह नजदीक आ गई। ईजा के हाथ में गिलास था। ईजा ने उस गिलास में थोड़ा दूध दुहा। फिर ईजा ने बसंती से कहा, ”अभी ठहर’’ और बसंती खड़ी रही। जैसे—सब कुछ समझ रही हो। ईजा घर आईं। गिलास अलमारी में रखा। कटोरदान से एक रोटी निकाल कर बसंती के लिए ले गईं। ईजा ने बसंती को रोटी खिलाकर उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ”जाओ’’ तो वह चली गई। इस तरह का सम्वाद पशुओं और मनुष्यों के बीच होता था।

और थोड़ा बड़े होने पर एक और घटना मेरे जीवन में घटी। हमारे गाँव के एक परिवार की गाय सुरमा थी। सफेद रंग की बड़ी खूबसूरत गाय थी। हमारे पंचायती ग्वाले मोहनदा को उस गाय से बहुत लगाव था। सुनते हैं कि वह अपने दिन के कलेवे से एक रोटी बचाकर सुरमा को खिलाते थे। सुरमा भी उनको बहुत प्यार करती होगी। एक बार मोहनदा काफल तोड़ते हुए पेड़ से नीचे गिर गए। वह शाम को जब जंगल से लौटते थे, तो बच्चों के लिए मौसम के हिसाब से जंगली फल लेकर आते थे। वह हम बच्चों के लिए काफल लाने के लिए पेड़ पर चढ़े होंगे, गिर गए। शाम हो गई। सारी गायें अपने-अपने बच्चों की याद कर घर चली आईं, लेकिन सुरमा मोहनदा के पास ही रह गई। मोहनदा उठने में लाचार थे। गाँव वालों ने देखा कि सभी गायें चली आई हैं, लेकिन मोहनदा साथ में नहीं हैं। सुरमा के घरवालों ने देखा कि सुरमा भी नहीं आई है। सब लोग दौड़े-दौड़े जंगल की तरफ गए। वहाँ देखा कि मोहनदा गिरे हुए हैं और सुरमा उनको चाट रही है। मोहनदा को उठा कर लाया गया और पीछे-पीछे सुरमा भी आ गई।

वह ऐसे आई, जैसे—मोहनदा की माँ हो।

हमारे ईजा-बाबू में एक गाय को लेकर खूब मतभेद हुआ था। इसकी याद मुझे आज भी है। हुआ यह कि एक दिन बाबू कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी  गाँव का एक आदमी अपने ढोरों को चरा रहा है। सभी पशु बहुत दुर्बल हो रहे थे। पैलागी-आशीष के बाद बाबू ने उन पशुओं की हालत पर चिंता जताई, तो वह व्यक्ति अपने पास घास-चारा न होने का रोना रोने लगा। उसने आग्रह किया कि एक गाय बाबू रख लें।

बाबू ने विनोद के लहजे में कहा, ”अब इस हाड़ के पिंजर का गोदान लेने के लिए मैं ही रह गया हूँ?’’

उस व्यक्ति ने फिर जिद की, ”आप वैसे न रखो, तो कुछ दाम दे देना, लेकिन आपके घर में यह पल जाएगी। मेरे घर में तो यह भूखी मर जाएगी और मुझे गोहत्या लगेगी। अच्छी नस्ल की गाय है, पर मुझ अभागे के घर आ मरी।’’

बाबू तब भी सहमत नहीं हुए तो वह गिड़गिड़ाया, ”आप पन्द्रह रुपये ही दे देना। उससे मैं दूसरे पशुओं के लिए घास खरीद लूँगा। मेरे दोनों ‘लुट’ इन्होंने चट कर दिए हैं।’’

उसकी इस दलील पर बाबू पसीज गए। उन्होंने उसे पन्द्रह रुपये देकर गाय हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया।

वह सफेद रंग की कद्दावर गाय थी। उसके सींग बैलों की तरह खूब बड़े थे। थनों के अलावा उसमें कोई भी लक्षण स्त्रैण होने का नहीं दिख रहा था। ईजा की पहली प्रतिक्रिया हुई, ”यह गाय है या बैल?’’

वह व्यक्ति गाय को गोशाला में खूँटे पर बाँधकर चला गया।

कहाँ ईजा की सुन्दर सलोनी बसंती गाय और कहाँ यह हड्डियों का ढाँचा!

नई गाय उपेक्षित ही रही। उस गाय को लेकर ईजा के अलावा दूसरा विरोध पंचायती ग्वाले मोहनदा का था। यह एक अलिखित नियम था कि गाँव में किसी गृहस्थ में किसी पशु की खरीद-फरोख्त हो, तो उसमें मोहनदा की सहमति जरूरी मानी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ था। मोहनदा गुस्साए हुए थे। दूसरे दिन एक आँख के धनी मोहनदा ने पशुओं को जंगल ले जाते हुए इस गरीब जीव को हाँक कर भगा दिया। वह इधर-उधर डोलती रही।

बाबू ने मोहनदा को पूरी बात बताई, तो वह नरम पड़े, लेकिन ईजा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह घर की जूठन पूर्ववत अपनी लाड़ली बसंती को देती रहीं और इसकी भरपूर उपेक्षा करती रहीं। लेकिन बाबू हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह भिगोए हुए भट और दूसरी पौष्टिक चीजें गो-ग्रास के पिण्ड में रखकर उसे खिलाते और उसके लिए अच्छा चारा छाँटकर अलग रखते।

कुछ दिनों बाद उस गाय की काया में सुधार आने लगा। उसके दूध की मात्रा भी बढ़ गई। बाबू कहते, ”इसका दूध अलग से गर्म कर उसे दूसरी ठेकी में जमाया करो। यह अच्छी नस्ल की गाय है। इसके दूध में चिकनाई ज्यादा है। इसके मक्खन में ज्यादा घी निकलेगा।’’ ईजा मुँह बिचकाती, लेकिन बाद में यह बात सच निकली।

उस गाय को हमारे गोठ में मान्यता प्राप्त करने में काफी समय लगा। इसका एक कारण शायद उसका कद और बड़े सींग भी थे और बसंती की तुलना तो थी ही!

गोधूलि में गले में बंधी घंटियों के साथ गायों का जंगल से लौटना बड़ा मोहक होता था। एक मुख्य गाय होती थी। उसके गले में एक गोल खोखल ताम्बे या पीतल का पाइप जैसा होता था। उसके अन्दर टकराने वाला लकड़ी का एक टुकड़ा होता था। जब गाय चलती थी, तो घन-घन-घन-घन-घन की आवाज आती थी। अन्य गायें मुख्य गाय के पीछे-पीछे आती थीं। यह एक संकेत होता था कि गायें लौट आई हैं। घन-घन-घन की आवाज को बछड़े भी सुनते होंगे, तो वे भी अपनी भाषा में खुशी जताने लगते थे। गाय के गले में बंधे पाइपनुमा वाद्य की घन-घन चिडिय़ों की चहचहाट के साथ एक मधुर सांगीतिक रचना प्रस्तुत कर देती थी।

गायें जब जंगल से लौटतीं, तो कभी-कभी, कोई गाय बेचैन-सी दिखाई देती। घर वाले उसकी बेचैनी का कारण समझ जाते और एक छोटे टब में पानी लाकर उसमें मुट्ठीभर नमक घोलकर उसके सामने रख देते। वह ज्यों ही पानी पीती, उसकी नाक के दोनों छेदों से लपलपाती हुई जोंकें बाहर निकलतीं, जिन्हें हाथ से खींचकर बाहर फेंक दिया जाता। जो जोंकें नमकीन पानी में गिर जातीं, वे तत्काल विलीन हो जातीं। जोंकों से मुक्ति पाकर गायें फिर सहज हो जाती थीं। पहाड़ों में गीली जगहों पर जोंकें रहती हैं और पैदल चलने वालों के पैरों से चिपक कर खून चूसने के बाद मोटी होकर अपने आप गिर जाती हैं। आदमी को जब पैर में खुजली होने लगती है, तब उसे इस शोषण का पता चलता। मेरे साथ जब भी ऐसा हुआ, खुजलाने पर उस जगह सूजन आ जाती थी।

जब गायें बियाती थीं, तो सयाने लोग 22 दिनों तक उनका दूध नहीं पीते थे। गाय बियाने के 22वें दिन लापसी बनाई जाती थी और चमू देवता के थान पर चढ़ाई जाती थी। चमू पशुओं के देवता होते हैं। उसके बाद सयाने लोग भी दूध पीने लगते थे। लेकिन इस बीच दूध को गर्म करने पर वह छेने जैसा हो जाता था। पहाड़ में उसे बिगौत कहते हैं और मैदानी इलाके में खिजरी। प्राय: गाय दूध कम देती थी। ऐसा होता नहीं था कि पूरे गाँव के बच्चों को खिजरी खाने के लिए एक साथ बुला लिया जाए। ऐसे में एक-एक घर के बच्चों को बुलाया जाता था। उनको खिजरी दी जाती थी। फिर दूसरे दिन अगले घर के बच्चों को बुला लिया जाता। ऐसे मौके कई आते थे। लोगों की गाय बियाती थी, तो दूध फेंका नहीं जाता था, बच्चों को दिया जाता था। आज भी खिजरी खाने की इच्छा होती है।

गायों के नवजात बछड़ों को कुलाँचे भरते देखने का सुख और उनके साथ हाथ-पैरों के सहारे उछल-कूद करने का सुख जिन बच्चों ने उठाया है, वे ही इसकी ताईद कर सकते हैं।

अन्न और गोरस के प्रति बहुत आदर भाव प्रदर्शित किया जाता था, क्योंकि ये दोनों ही जीवनदायी तत्व माने जाते थे। दूध या दही यदि भूमि पर गिर जाता, तो उसे तत्काल पोंछ दिया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़े। इसी प्रकार अन्न को भी पवित्र माना जाता था।

मानसरोवर यात्रा : दि‍नेश कर्नाटक

Macaulay ka jinn tatha any kahaiyan

वह इस घर में आज से पहले कभी नहीं आया था। छह साल पहले अनायास इस घर से उसका सामना हुआ था। तब से इस घर से जुड़ी हुई बातें हर क्षण उसके मन-मस्तिष्क में घूम-घूमकर उसे परेशान करती रही थीं। उसे लगता रहा था कि वह दूसरे रास्तों से इस घर से पिण्ड छुड़ा सकता है, लेकिन यह घर और यहाँ के लोग साए के साथ उसके साथ लगे रहते। इस घर से मुक्‍ति‍ पाने के लिए उसने क्या-क्या नहीं किया, कैसे-कैसे रास्तों पर नहीं चला, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गई थीं।

पहले उसे लगा था- दूर जाकर वह इस घर और यहाँ के लोगों को भूला सकेगा, लेकिन वह जितना दूर जाता था, यह घर उतना ही उसके करीब आ जाता था। इसी शहर में उसका अपना घर है। पहले वह कहीं से भी आता था, तो सबसे पहले वहीं जाता था। सभी की तरह वह भी अपने घर में जाकर ही चैन से सो पाता था। तब वह सोचता था- कितनी अजीब बात है कि आदमी कितनी तरक्की क्यों न कर ले, दुनिया के किसी भी छोर पर क्यों न पहुँच जाए, लौटकर अपने ही घर आना चाहता है।

लेकिन अब उसी तीव्रता से यह घर उसे अपनी ओर बुला रहा था। अन्तत: उसकी समझ में आया कि उसे इस घर और उसमें रहने वाले लोगों से मिलकर ही सुकून मिल सकता है।

वह बरामदे में पड़ी हुई पुरानी खाट के सिरहाने पर ऐसे बैठ गया, मानो लम्बी जद्दोजहद के बाद अपने गंतव्य में पहुँच गया हो और अब उसे कहीं और न जाना हो। खाट उसके वजन के पड़ते ही कराहने लगी और तब तक कराहती रही, जब तक उसने उसके वजन को अपने में जज्ब नहीं कर लिया।

घर की हालत देखकर लग रहा था या तो वहाँ कोई रहता नहीं है और अगर रहता भी है तो अभी मौजूद नहीं है। जल्दी किसी के आने की सम्भावना को न देखते हुए वह और भी फैलकर बैठ गया। उसे लग रहा था- अब उसे किसी चीज की जल्दी नहीं है। अब उसे और कहीं नहीं जाना है। उसे नए रास्तों के बारे में नहीं सोचना है। उसे तो अब खुद को प्रस्तुतभर कर देना था। कितना आसान था यह, लेकिन अब तक वह इस आसान से काम को कर नहीं सका था। शायद आदमी के जीवन की यही विडम्बना है कि सवालों के जवाब काफी नजदीक होते हुए भी उनकी तलाश में वह जाने कहाँ-कहाँ भटकते रहता है।

उसे याद आ रहा था- इस मकान के करीब से वह कॉलेज के दिनों में भी कई बार गुजर चुका था। तब कभी इसकी ओर ध्यान नहीं गया था। तब क्या पता था कि कभी इस तरह इस घर से वास्ता पड़ेगा। वैसे भी इस मकान में ऐसा कुछ खास नहीं था कि कभी इसकी ओर नजरें घूमतीं। फिर उन दिनों एक अलग ही सुरूर होता था। अलग ही मस्ती छायी रहती थी। वह दोस्तों की दुनिया में ऐसे खो जाया करता था कि साधारण से लेकर असाधारण चीजों तक की ओर ध्यान नहीं जाता था।

अब सोचता है, तो पाता है कि भाग्य ने उसे वह सब दिया था, जिसको पाने की लोग कल्पना किया करते हैं। बड़ा घर, समाज में रुतबा और खर्चने को धन। शरीर भी उसने अपने परिवार वालों जैसा पाया था– ऊँचा कद, ऊँची छाती और चौड़े कंधे। उन दिनों गाँव-कस्बों के छोटे-बड़े मैदानों में शाम के समय बॉलीबाल खेलने के लिए लड़के इकट्ठा हो जाया करते थे। कई टूर्नामैंट होते थे। बॉलीबाल का उसका जैसा खिलाड़ी दूर-दूर तक दूसरा नहीं था। टूर्नामैंटों में उसका खेल देखने के लिए दूर-दूर से लोग आया करते थे। खासतौर से उसके ‘स्मैश’ जिनका विरोधी टीमों के पास कोई तोड़ नहीं होता था। नेट के पास बॉल मिलते ही वह चीते की फुर्ती से उछलकर प्रहार करता था। कभी अचूक ‘प्लेसिंगÓ तो कभी इतना जोरदार प्रहार कि सामने के किसी की बॉल की लाइन में आने की हिम्मत नहीं होती थी।

व्यक्तित्व ऐसा की जहाँ से गुजरता लोग पलटकर उसकी ओर देखने लगते थे। हमेशा तीन-चार यार-दोस्त उसके साथ लगे रहते थे। बाकी उससे बात करने या उसका साथ पाने को तरसते थे। शायद इसीलिए लोगों की प्रशांसाभरी आँखें देखने की उसे आदत सी पड़ गई थी। तीखी और तटस्थ नजरों से उसे चिढ़ होने लगी थी। अपने सामने किसी के ऊँचे कद को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था। हार उससे सहन नहीं होती थी। हमेशा विजेता की तरह दिखते रहना उसकी फितरत बन चुकी थी।

पिता का चलता हुआ कारोबार था। पैसों की कमी नहीं थी। जो चाहता, वह मिल जाया करता था। उन दिनों जब लड़कों की जेब में आने-जाने तक के लिए पैसों का टोटा होता था, वह ‘भट्…..भट्’ करती हुई बुलेट में कॉलेज आया करता था।

किसी मैच के दौरान मामूली-सी बातचीत पर गोविन्दपुरी के लड़कों ने उसके खास दोस्त देवा को देख लेने की धमकी दे दी थी। देवा छाया की तरह हर वक्त उसके साथ रहा करता था। वह उसका इस कदर मुरीद था कि उसके लिए कुछ भी कर सकता था। देवा को दी गई धमकी, उसे खुद को दी गई लगी थी।

इस चुनौती से वह तिलमिला कर रह गया था और बदले की आग में सुलगने लगा था।

आखिर इस इलाके में किसमें इतनी हिम्मत है, जो उसके दोस्त को देखेगा।

इसके बाद उसने रोज शाम को अपने दोस्तों के साथ गोविन्दपुरी की ओर जाना शुरू कर दिया था। इरादा साफ था- हो जाए टक्कर और उनकी भी समझ में आ जाए कि उन्होंने किस को ललकारा है!

उधर, उनकी बढ़ती हुई सरगर्मी को देखते हुए गोविन्दपुरी के लड़के भी उनको सबक सिखाने की तैयारी करने लगे थे। उनकी तैयारी पूरी होती, उससे पहले ही एक दिन वह घटना घटी थी।

मौहल्ले में घूमते हुए एक लड़के का घूरना उससे बर्दाश्त नहीं हुआ था। उसको पास बुलाकर उसने उसके दो-तीन थप्पड़ रसीद कर दिए थे। वह तो वहाँ से खिसक लिया, लेकिन वहाँ पर मौजूद एक युवक उससे उलझ गया।

”उसको काहे को मारा?’’ उसने सीधे उसके पास आकर सवाल किया था।

”चल…चल रास्ता नाप। तू हमको जानता नहीं है।’’

”मैं तो यहाँ सभी को जानता हूँ। बताना अपने बारे में…मैं भी जान लूँ।’’ उसने मुस्कराते हुए कहा था।

”तेरी तो।’’ देवा अपने पर काबू नहीं रख पाया था।

वह फुर्ती से एक ओर हटा और उसने देवा के चेहरे पर इतना जोरदार घूँसा मारा कि उसे सारी दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी। पहले तो वह एक ओर बैठ गया और फिर अपनी दोनों टाँगें फैलाकर लेट गया।

इसके साथ ही उसके साथ के सभी लड़के उस पर झपट पड़े थे। वह उन सबसे अकेले ही इतनी आसानी से साथ लड़ रहा था, जैसे बच्चों के साथ खेल, खेल रहा हो। उनके गुस्से और हड़बड़ाहट का वह खूब फायदा उठा रहा था। उसके जोरदार पंचों से कुछ ही देर में उसके साथियों के पैर उखडऩे लगे थे।

तब दोस्तों को पीछे धकेलकर वह सामने चला आया था। वह भी कुछ ही देर तक उसका सामना कर पाया था। उसके सधे हुए पंच इसे भी परेशान करने लगे थे। ऐसा उसके साथ अब तक नहीं हुआ था। वह गुस्से से उफनने लगा था, तभी देवा चिल्लाया था, ”मार साले को।’’ और उसने उसके हाथ में लम्बो-सा चाकू थमा दिया था। और देखते-ही-देखते उसके हाथों से वह हुआ, जिसके बारे में उसने भी कभी नहीं सोचा था।

उसको दोनों हाथों से अपना पेट पकड़कर खून के फव्वारे को रोकने की कोशिश करते हुए देखकर वह भीतर-ही-भीतर दहल उठा था। दोस्तों की भागने की ‘हाँक’ के साथ वह भी दौड़ पड़ा था, लेकिन दौड़ते हुए उसे लगा था, जैसे- उसके पैरों में लोहे की बेड़ी बांध दी गई हो। उसकी आँखों के आगे कभी युवक का चेहरा तो कभी खून की धार आ-जा रही थी।

उस दिन के बाद से उसके भीतर का पुराना इंसान उससे दूर होने लगा था और एक बिल्कुल नया इंसान जन्म लेने लगा था।

उन दिनों शहर में इस तरह की घटनाएँ काफी कम होती थीं। लोग उबल पड़े थे। जुलूस-धरने होने लगे थे। उसे अखबार से पता चला था कि उसके हाथों मारा गया युवक फौजी था और फौज की ओर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग मुकाबलों में भाग लेकर काफी नाम कमा चुका था। बूढ़े माँ-बाप और भाई-बहन उसी पर आश्रित थे। अखबारों में उसके द्वारा अर्जित किए गए कीर्तिमानों और उसके घर की खबरें आने लगी थीं।

तब बाहरी तौर पर सहज दिखने की कोशिश करने के बावजूद उसको एहसास हो गया था कि उससे बड़ा अनर्थ हो गया है। जितना वह यह सब सोचता था, उतना ही उसके भीतर की चट्टान दरक कर चूर-चूर होती जाती थी।

उसके अन्दर सवालों के तूफान उठते और उसे अपने साथ उड़ाकर किसी अनजान जगह पर लाकर पटक देते थे- क्या तू किसी को जीवन दे सकता है? नहीं दे सकता, तो तुझे किसी को मारने का हक किसने दिया?

यह सब मेरे अन्दर इकट्ठा हो चुके अहंकार की वजह से हुआ। मैं होश में नहीं था। लेकिन इतना गुस्सा मेरे भीतर आया कहाँ से? गोविन्दपुरी बार-बार जाने की जरूरत क्या थी? किसी का कहा मुझे इतना बुरा क्यों लगा था। उसे नजरअंदाज भी तो किया जा सकता था। और फिर क्या सिर्फ मुझे ही कहने का हक है, कोई और कुछ क्यों नहीं कह सकता है?

मैं दूसरों से अलग कैसे हो गया?

फिर हथौड़े के प्रहार की तरह लगातार यह स्वीकारोक्ति उसके दिमाग में चोट करने लगी थी कि मैं उसकी हत्या का दोषी हूँ। मैं अपराधी हूँ। मैं अपने किए की जिम्मेदारी से किसी तरह बच नहीं सकता।

तब उसके पास हँसने की कोई वजह नहीं रह गई थी और उसके चेहरे पर हमेशा छाए रहने वाली, दूसरों की मजाक उड़ाती मुस्कान गायब होने लगी थी। देवा की बातें अब उसे खुशी नहीं देती थीं, बल्कि कई बार तो उसे उसकी बातों पर गुस्सा आ जाता था। वह सोचता– क्या उसके पास दिल और दिमाग नहीं है? उधर देवा भी उसमें हो रहे बदलावों को समझ नहीं पा रहा था। दोस्तों की बातों पर वह झल्ला उठता था और उसकी समझ में आ रहा था कि उसने अपने साथ दोस्त नहीं, चमचे जोड़े थे। धीरे-धीरे उसकी अजीबो-गरीब बातों और हरकतों के कारण दोस्तों ने उसके पास आना छोड़ दिया। अब वह अकेला रह गया था। अकेलेपन ने उसे पीछे मुड़कर अब तक जिए जीवन की ओर झाँकने का मौका दिया।

थानेदार के साथ पिता का रोज का बैठना था। उसने दोस्ती निभाने का वादा कर दिया था। पिता ने भी उसी वक्त बैंक से निकाली हुई नई गड्डियाँ उसके सामने बिखेर दीं, जो उसने ‘ये तो बाद में भी हो जाता’ कहकर समेट ली थीं। चश्मदीद गवाह कोई था नहीं। तारीखें लगती रहीं। मुकदमा द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ता रहा।

उन दिनों उसके एक ओर सम्भावनाओं और उम्मीदों से भरी हुई जिन्दगी थी और दूसरी ओर निरंतर कचोटती हुई उसकी अन्तरात्मा। जीत रंगों से भरी हुई जिन्दगी की हुई थी। वकील उससे जो-जो कहने को कहता, वह जज के सामने दोहरा देता था, लेकिन हर झूठ के बाद भीतर से कोई उसे दुत्कारता था और हर रोज वह अपनी ही नजरों में गिरता जाता था।

और एक दिन गवाहों के बयानात के आधार पर उसे और उसके साथियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया।

वह बाहर के मुकदमे से तो बरी हो गया, लेकिन अपने अन्दर के मुकदमे में और भी बुरी तरह उलझकर रह गया।

सोते-जागते उसकी आँखों के आगे कभी बॉक्सर, तो कभी उसके बूढ़े माँ-बाप आ जाते, कभी उसके उदास भाई-बहन उससे सवाल करते, ‘हमने तेरा क्या बिगाड़ा, जो तूने हमको दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर कर दिया।’

उन्हीं दिनों उसका गुरुजी के आश्रम में जाना बढऩे लगा था।

वह आश्रम में जाता और संन्यासियों की मंडली के बीच में जाकर बैठ जाता। कुछ ही देर में एक हाथ से दूसरे हाथ में होते हुए चिलम उस तक पहुँच जाती। दो-तीन लम्बे कश खींचने के बाद वह सब कुछ भूलकर उनकी बातों में शामिल हो जाता था।

”क्या बात है, बेटा। तुम वैरागी से होते जा रहे हो।’’ एक दिन स्वामीजी ने उससे पूछा था।

वह एकाएक पूछे गए उनके प्रश्न का जवाब नहीं दे पाया था।

घरवालों से भी उसकी हालत छिप नहीं पाई थी। उन्होंने कई तरीकों से उसको समझाने की कोशिश की थी। शादी को लेकर दबाव डाला, पर वे उसे सहमत नहीं कर पाए।

अन्तत: उस घर के लोगों की जिम्मेदारी पिता द्वारा लेने के वादे के साथ वह विवाह के लिए राजी हुआ था। घरवालों को किसी भी कीमत पर अपना वारिस चाहिए था। उन्हें लगा था कि खूबसूरत बीवी और बच्चों को देखकर वह सब कुछ भूल जाएगा। शादी से पहले ही उसने लड़की को सब कुछ सच-सच बता दिया था, जिसका लड़की के निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ा था।

स्त्री के प्रति उसके मन में युवाओं जैसी जिज्ञासा और आकर्षण नहीं रह गया था।

सुबह वह जैसे ही बाहर के उजाले की ओर जाता, उसकी आँखों के आगे वही दृश्य घूमने लगते।

तब उसे स्वामीजी का ब्रह्मज्ञान राह दिखाता था- ‘जगत मिथ्या है। रिश्ते-नाते धन-दौलत सब झूठ है। जो आया है, एक दिन चला जाएगा। यहाँ का सब कुछ यहीं रह जाएगा। ज्ञान ही मुक्ति का उपाय है।’

ऐसी बातें उसने पहले कभी नहीं सुनी थीं। सुनी भी होंगी, तो कभी उन पर गौर नहीं किया था। इस तरह की बातें पहले उसे फिजूल लगती थीं। लोगों को मरते हुए देखा था। यह भी देखा था कि जब मौत आती है, तो वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करती। न किसी की दौलत उसे बचा पाती है और न ही कोई यहाँ से कुछ लेकर जाता है। आदमी खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। ‘फिर काहे की हाय तौबा!Ó स्वामीजी कहते थे। तब उसे कभी भी इस बारे में सोचने की फुर्सत नहीं मिली थी। अब उसके भीतर भी सवाल उठता था- ‘काहे की हाय तौबा!’

फिर एक दिन वह हमेशा के लिए स्वामीजी की शरण में चला गया और उसने चोला धारण कर लिया।

पिता को पता चला तो दनदनाते हुए स्वामीजी के पास पहुँचे। स्वामीजी ध्यान में थे।

मगर सेठ को उन्होंने अपने दिव्य चक्षुओं से देख लिया था।

‘ओऽम्…शंति…ओऽम्…शांति…।’ कहकर जब उन्होंने अपनी सांसारिक आँखें खोलीं, तो सामने चिंतामग्न सेठ को देखा। वह सब समझ गए। उन्होंने इशारे से बाकी लोगों को वहाँ से जाने के लिए कहा।

”तुमको कुछ कहने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे आने का प्रयोजन मैं समझ गया हूँ। तुमको पता नहीं है, तुम्हारा बेटा किस हालत से गुजर रहा है। इस हालत में वह कैसे पहुँचा, मुझे सब बता चुका है। तुमको कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। वह मेरी शरण में है। बल्कि तुमको तो खुश होना चाहिए कि वह कहीं और नहीं गया, उसने कोई अनिष्टकारी कदम नहीं उठाया। चिन्ता मत करो। मैं धीरे-धीरे उसे ठीक करके तुमको लौटा दूँगा।’’ कहकर स्वामीजी सहज आँखों से उसकी ओर देखने लगे।

उसके पिता ने जवाब में कुछ कहने की चेष्टा की, जिसे ‘बस’ कहकर स्वामीजी ने रोक दिया।

फिर दीक्षा लेने के लिए स्वामीजी ने उसे हरिद्वार भिजवाया था। एक बड़े और भव्य आश्रम में वह तीन महीने तक रहा था। सुबह भक्तों के साथ गंगा में स्नान करने जाता था। दिनभर का समय आश्रम के रखरखाव और सत्संग में बीतता था। शाम को गंगा आरती में भाग लेता था। भोजन आहार-विहार हर चीज का समय तय था। ये तीन महीने उसे अपने जीवन का स्वर्णिम समय लगा था।

वहाँ से लौटने के बाद जब वह स्वामीजी के आश्रम में पहुँचा, तो उससे मिलने के लिए माता-पिता के साथ उसकी पत्नी भी मौजूद थी। उस दिन उसने सोचा था- उसके एक ओर मोह-माया से भरी हुई आकर्षक जिंदगी है और दूसरी ओर उसे हर समय परेशान करता, उसका अपराध। अब उसे तय करना है कि वह अपराधबोध के साथ जिए या उसका प्रायश्चित करे।

स्वामीजी के मठ में लौटकर उसने एक बात और महसूस की थी। भक्तों के सामने शांत और प्रफुल्लित दिखने वाले स्वामीजी मठ के लोगों के सामने अलग ही रूप में नजर आते थे। वहाँ के सभी लोग उनसे डरे हुए रहते थे। कब किस पर बिगड़ जाएँ, इसका भय बना रहता था। लगता था, जैसे- वे मठ के मालिक हैं और बाकि सब नौकर। उसे लगता था- धर्म तो बहाना है। दरअसल, यह सब उसके नाम पर जीवन जीने का एक तरीका है। फर्क सिर्फ इतना है कि गम-ए-रोजगार के लिए कोई गीत गाता है, तो कोई अभिनय करता है। यहाँ यह सब लोगों के जीवन के उद्धार के नाम पर हो रहा था, जबकि इस सारे उद्यम से उद्धार अकेले स्वामीजी का हो रहा था।

स्वामीजी दैवीय भोजन ग्रहण करते। दिव्य बिस्तर में सोते। उनका कक्ष दैवीय छटा से भरपूर था। वे स्कार्पियो से सफर करते थे। हालाँकि उनके बेड़े में दो गाडिय़ाँ और भी थीं। वह बड़े लोगों से मिलते थे। छोटे लोगों को उन तक पहुँचने की सुविधा नहीं थी।

बहुत जल्दी ऊब गया था, वह इस सब से।

और ऊब से निजात पाने के लिए पहाड़ों की ओर निकल गया था।

काफी भटकने के बाद जब भीतर कुछ भी बदलता हुआ नहीं लगा था, तो किसी पहुँचे हुए सिद्ध ने मानसरोवर की यात्रा पर जाने का सुझाव दिया था। उसने कहा था- ‘उस पवित्र मानसस्थली पर जाकर तुमको अपने सारे सवालों के जवाब मिल जाएँगे। वहाँ की हवा, मिट्टी और पानी इतना शुद्ध है कि उस धरती पर कदम रखते ही आदमी वह नहीं रह जाता, जो वह वहाँ पहुँचने से पहले होता है। पवित्र झील के जल की तरह वहाँ अपने भी आर-पार देखा जा सकता है।’

उसी क्षण बड़ी तीव्रता के साथ यह एहसास हुआ था कि वह यात्रा यहाँ क्यों नहीं की जा सकती। अपने आर-पार यहाँ क्यों नहीं देखा जा सकता?

तभी तय किया था कि खुद से मोह की रही-सही डोर भी टूट जाए, तो अच्छा। शरीर से लगा, आखिरी वस्त्र भी गिर जाए तो अच्छा।

इस तरह इधर-उधर भटकते रहने से कुछ प्राप्त नहीं होगा। सबसे बड़ी बात है– अपने भीतर की यात्रा की जाए। खुद का सामना किया जाए बाकि सब भटकाव है। सारी यात्राएँ व्यर्थ हैं।

यही है सच्चा ज्ञान, इसी में छुपा है मुक्ति का रहस्य।

उस दिन से एक अलग ही तरह की मौज, अलग ही तरह के आत्मविश्वास से भर गया था, वह।

दो जोड़ी आँखें देर तक उसे देखते रही थीं। जब वह नहीं टला तो हाथ में पानी लेकर एक बुढिय़ा प्रकट हुई,  ”पानी पियो बाबाजी, और कुछ सेवा करने की इस घर की कुव्वत नहीं है।’’

पानी का लोटा हाथ में पकड़कर वह गौर से बुढिय़ा की ओर देखने लगा।

”जानता हूँ माता, तेरे ऊपर वज्रपात हुआ है।’’ उसने उससे कहा था।

बुढिय़ा इस तरह अचानक कही गई उसकी बात का अर्थ समझ नहीं पाई। जब अर्थ उसकी समझ में आया, तो उसने हाथ जोड़ दिए, ”सच कह रहो हो महाराज! सब समय-समय की बात है। इस घर में कभी बहुत ज्यादा नहीं था, तो इतना तो होता ही था कि दरवाजे में आया हुआ खाली हाथ नहंी जाता था। अब तो आप देख ही रहे हो।ÓÓ कहकर उसने उसको घर की ओर दिखाते हुए खुद भी घर के चारों ओर नजर दौड़ाई, ”पहले होनहार बेटा गया। उसके पीछे उसके पिता भी चले गए। बेटा मेरा लाखों में एक था। लोगों के दु:ख-सुख में काम आने वाला। सभी कहते थे- ऐसा बेटा बड़े भाग से मिलता है। लोगों की नजर लग गई उसे…मारा गया एक दिन।’’

”तू परेशान न हो माँ, मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए। जो चाहिए था, वह मिल गया। प्यासा था, तेरे हाथ का पानी मिल गया, जैसे– मुझे सब मिल गया। किसका आसरा है, गुजर कैसे होती है?’’

”महाराज, अब इस घर में कोई नहीं आता। यहाँ आकर किसी को क्या मिलेगा? हम अब किसी के क्या काम आ सकते हैं? हम तो किसी का दिया हुआ भी लौटा नहीं सकते। छोटा बेटा है, कहीं लग-लुग जाए, तो इस घर का कुछ भला हो।’’

”थोड़ा पानी और मिलेगा माँजी?’’ उसने गिलास बुढिय़ा की ओर बढ़ा दिया।

”जा बेटा, बाबाजी के लिए पानी और ले आ।’’ उसने परदे की ओट में खड़ी लड़की से कहा था।

”तूने बताया नहीं माँ, घर का खर्च कैसे चलता है?’’

”कुछ तो पैंशन मिल जाती है। एक संस्था वाले आए थे। पूछताछ करने के बाद कहने लगे- हम आप जैसे भाग्य के मारे लोगों की सहायता करते हैं। बैंक में खाता खुलवाया। अब हर महीने उसमें कुछ रुपये आ जाते हैं। पिछले दिनों कह रहे थे- लड़की के लिए कोई योग्य लड़का मिले, तो हमें खबर कर देना। शादी का सारा खर्चा हमीं उठा लेंगे। अपना पता दे गए हैं। बेटी के लिए कोई ठीक-ठाक लड़का मिल जाता, तो गंगा नहा आती।’’

”चिन्ता मत कर माँ, सब ठीक हो जाएगा। लड़का भी मिल जाएगा। ब्याह भी हो जाएगा।’’

‘बाबाजी, पता नहीं क्यों तुम्हारे कहने पर आस-सी जग रही है।’’ बुढिय़ा देर तक उसकी ओर देखती रही, ”भूख लगी होगी। सुबह की बासी रोटी पड़ी होगी। सब्जी भी नहीं होगी। चीनी के साथ खाओगे।’’

”खाऊँगा माँ, जरूर खाऊँगा।’’

उसने खूब चाव से रोटियाँ खाईं और मुँह-हाथ धोकर बुढिय़ा से हाथ जोड़कर कहा, ”अब जाऊँगा, माँ।’’

”फिर कभी आना, बेटा। तेरी बातों से बड़ा आसरा मिला।’’

”मौका मिलेगा, तो जरूर आऊँगा, माँ।’’

उसके जाते ही बेटी माँ पर बिगड़ गई थी, ”किसी को भी घर में बैठाकर अपनी राम कहानी सुनाने लगती है। तुझे पता है न, कैसा समय है? किसी का क्या भरोसा।’’

”जानती हूँ, बेटा। अब किससे डरें…किस बात के लिए डरें…हमारे पास अब क्या बचा है, जिसकी फिक्र में मरे जाएँ।’’

वहाँ से निकलकर वह बगैर किसी को अपने आने की खबर दिए हुए घर और उन सभी जगहों का चक्कर लगा आया, जहाँ से उसके बचपन और जवानी की यादें जुड़ी हुई थीं। फिर वह सीधे पुलिस स्टेशन की ओर को चला गया था। थानेदार को सारी बातें सच बताकर उसे लगा– अब उसकी मानसरोवर परिक्रमा पूरी हो चुकी है।

(लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त दि‍नेश कर्नाटक के कहानी संग्रह ‘मैकाले का जि‍न्न तथ अन्य कहानि‍याँ’ से साभार)

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कहानी संग्रह- मैकाले का जि‍न्न तथा अन्य कहानि‍याँ
लेखक- दि‍नेश कर्नाटक
मूल्य– अजि‍ल्द- 170 रुपये
सजि‍ल्द– 350 रुपये
प्रकाशक- लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड- 3
इंदि‍रापुरम- 201014, गाजि‍याबाद
ईमेल- anuraglekhak@gmail.coom

नोट- 168 पेज की इस पुस्तक में ‘मानसरोवर यात्रा’ सहि‍त 15 कहानि‍याँ हैं।

क्या सचमुच टीवी सीखने में बाधा डालता है : ग्वेन डेवार

television

टीवी के प्रभाव से मुठभेड़

शोधों से टेलीविजन और शिशुओं में भाषा के विकास के बीच संबंध का पता चलता है। बच्चे जितना ज्यादा समय टीवी के सामने बिताते हैं, बोलना सीखने की उनकी रफ़्तार उतनी ही धीमी हो जाती है। क्या यह सच है?

कुछ लोगों का निष्कर्ष है कि बच्चों में टेलीविजन का सीधा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस नज़रिए के मुताबिक़ टेलीविजन सिगरेट की तरह नशीला होता है। लेकिन सिगरेट जहां फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है, वहीं टेलीविजन दिमाग का कबाड़ा कर डालता है। टीवी देखने से आप (सचमुच) बेवकूफ हो जाते हैं।

लेकिन इस प्रकार तालमेल बिठाने को सीधे-सीधे कार्यकारण संबध नहीं कहा जा सकता और इस मसले की और गहरी जांच-पड़ताल कुछ और बात कहती है-

टीवी को भाषा ग्रहण करने की घीमी रफ़्तार से जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह शिशुओं और बड़ों के बीच होने वाली बातचीत के ज़रूरी समय को चुरा लेता है।

आंकड़े वास्तव में क्या कहते हैं

टेलीविजन सूचना प्रसारित करने का एक माध्यम भर है। निश्चय ही सूचना ज्यादा महत्वपूर्ण है, माध्यम नहीं। बेशक शोध बताते हैं कि जो बच्चे ब्लूज क्लूज जैसे आयु-संगत शैक्षिक कार्यक्रम देखते हैं, उनमें शो में दिखाई गयी सूचनाओं को बताने या समस्याओं को हल करने की क्षमता में तात्कालिक सुधार दिखाई देता है।

संभवतः, टेलीविजन के कुछ पहलू- जैसे तेज गति या दृश्यों का जल्दी-जल्दी पटाक्षेप- अल्पकालिक ध्यानाकर्षण काल के विकास में मदद करते होंगे। इस चिंताजनक विचार को कई अध्ययनों से बल मिलता है। हाल के एक प्रयोग में ‘तीव्र-सम्पादित’ और ‘धीमे सम्पादित’ टेलीविजन के 4 से 7 वर्ष के स्कूली बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन किया।

तथापि यह इस दावे का प्रमाण नहीं कि टीवी आपको बेवकूफ बनाता है।

वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि टीवी प्रोग्रामों को देखते या सुनते रहने से छोटे बच्चों को बातचीत करना सीखने में मुश्किल आती है।बोलना सीखने की क्रिया में बच्चों को वास्तविक सामाजिक संवाद से बहुत लाभ होता है

बोलना सीखने के मामले में जीवंत बातचीत का कोई विकल्प नहीं

भाषा उपार्जन के क्षेत्र की प्रमुख वैज्ञानिक पैट्रिशिया कुल ने बच्चों पर किये कुछ दिलचस्प प्रयोगों में इस तथ्य की पुष्टि की है।

कुल और उनके सहयोगियों ने 9 महीने के अमेरिकी बच्चों को उनके लिए अनजान भाषा- मेंडेरिन चाइनीज से रू-ब-रू कराया। प्रयोग के दौरान बच्चे मेंडेरिन बोलने वाले एक जीते-जागते इंसान के संपर्क में आते थे। 12 सत्रों के बाद इन बच्चों ने मेंडेरिन भाषा की कतिपय सामान्य ध्वनियों में फर्क करने की क्षमता में बढ़ोतरी का स्पष्ट संकेत दिया।

लेकिन जब यही प्रयोग कुछ अन्य बच्चों पर टीवी ट्यूटर के साथ दोहराया गया तो परिणाम बिलकुल अलग आये। टीवी के जरिये मेंडेरिन के संपर्क में आने वाले बच्चे इस भाषा की सामान्य ध्वनियों में फर्क करने वाले लेकिन प्रयोग में शामिल नहीं किये गए (कंट्रोल) बच्चों की बराबरी भी नहीं कर पाए।

दोनों प्रयोगों में मेंडेरिन बोलने वाले सीधे बच्चों की आंखों में आंखें डालते थे, खिलौनों के बारे में बोलते थे और शिशुओं के अनुकूल ख़ास तरह की स्टाइल (शिशु निर्देशित भाषा) में बोलते थे। प्रयोगों के बीच सामाजिक कारक का अंतर था। जैसा कि कुल ने नोट किया- “शिशु प्रकटतः कम्युटेशनल ऑटोमेटन नहीं होते, बल्कि प्राकृतिक भाषा सीखने के लिए उन्हें एक सामाजिक शिक्षक की ज़रूरत पड़ती है।

शोधकर्ता कहते हैं कि कहानियां सुनने या टीवी देखने के बजाय बातचीत करने से भाषा के विकास में जबरदस्त सकारात्मक प्रभाव पड़ता है

इस विचार की हाल में हुए एक शोध से पुष्टि हुई है, जिसमें 0 से 4 वर्ष के बच्चों पर एक रिकॉर्डिंग उपकरण फिट किया गया था. इस उपकरण की मदद से शोधकर्ता वस्तुगत रूप से यह माप सकते थे कि प्रत्येक बच्चे ने बड़ों के साथ बातचीत करते हुए और टेलीविजन देखते हुए कितना वक्त बिताया। शोध के बड़े दिलचस्प परिणाम निकले।

शोधकर्ताओं में पाया कि सामजिक वार्तालाप- यानी आमने-सामने की बातचीत, बड़ों और बच्चों के बीच आगे-पीछे बातचीत का बेहतर भाषाई विकास से सीधा रिश्ता है। शिशु और छोटे बच्चे बड़ों के साथ जितना ज्यादा बातें करेंगे, उनके भाषाई कौशल उतनी ही जल्दी बेहतर होंगे।

इसके विपरीत, बड़ों के एकालाप सुनने का- जिसमें कहानियां सुनना भी शामिल है- बच्चों के भाषाई विकास पर मामूली असर पड़ता है। दोनों ओर की बातचीत का प्रभावव सिर्फ बड़ों को बोलते सुनते रहने की बनिस्बत छः गुना ज्यादा होता है।

और टीवी? शोधकर्ताओं ने जब बच्चों द्वारा बातचीत में बिताए जाने वाले समय को निश्चित रखा तो टीवी का बच्चों पर न तो सकारात्मक असर दिखाई दिया और न ही नकारात्मक।

हाल के कुछ अन्य अध्ययनों के भी ऐसे ही परिणाम आये। जब  शोधकर्ताओं ने इस सन्दर्भ में छोटे बच्चों के विकास पर ध्यान दिया तो उन्होंने पाया कि जो बच्चे बड़ों के साथ बातचीत करने में ज्यादा समय बिताते हैं, उनकी शब्द सामर्थ्य बहुत ज्यादा होती है। आसान सी बात है कि दूसरों को बोलते सुनने भर से कोई फायदा नहीं होता।

और एक प्रयोग जिसमें वीडिओ चैट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया, वास्तव में सब कुछ स्पष्ट कर देती है। सराह रोजबेरी व उनके सहकर्मियों ने शिशुओं के एक समूह पर किये गए प्रयोग में दो तरह के वयस्क वार्तालाप का उपयोग किया- एक में एक वयस्क स्काइप के जरिये सीधे बातचीत कर रहा था। दूसरे में वयस्क स्काइप में बोलता तो दिखाई दे रहा था, मगर वास्तव में यह बातचीत पहले से रिकॉर्ड की हुई थी।

दोनों ही स्थितियों में बच्चों ने वयस्क के साथ बोलने का प्रयास किया, लेकिन सिर्फ लाइव वयस्क ही बच्चों की बातचीत, सवालों व चेहरे के हाव-भावों का सही ढंग से प्रत्युत्तर दे पा रहा था। पहले से रिकॉर्ड की गई बातचीत वाला वयस्क टेलीविजन के होस्ट की तरह बात कर रहा था- जो दर्शकों को बांधे रखने का प्रयास तो करता है, लेकिन बच्चे के आकस्मिक सवालों या भावाभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकता।

इन सत्रों के बाद बच्चों का यह देखने के लिए परीक्षण किया गया कि क्या वे ऐसे अपरिचित नए शब्दों को सीख पाए, जिन्हें वयस्क ने इस्तेमाल किया था। सिर्फ उन्हीं बच्चों ने नए शब्दों को पकड़ा था जो वास्तविक बातचीत शामिल थे।

कुल मिलाकर निष्कर्ष क्या हैं? हमें ऐसे बच्चों पर टीवी के प्रभावों की चिंता करनी चाहिए, जो भाषा सीख रहे हैं। लेकिन भाषा ग्रहण करने की क्षमता  पर किये गए शोध का यह निष्कर्ष नहीं है कि सीखने में हो रही देरी के लिए सीधे तौर पर टेलीविजन का हाथ है, बल्कि ज्यादा उपयोगी सन्देश यह है कि बच्चों को आमने-सामने की सच्ची पारस्परिक बातचीत से ज्यादा फायदा होता है। शायद माता-पिता ने बच्चों के टीवी से चिपके रहने की चिंता करने के बजाय उनके साथ अर्थपूर्ण बातचीत का समय निकालना चाहिए।

(प्रो. ग्वेन डेवार पेरेंटिंग साइंस (http://www.parentingscience.com) की संस्थापक हैं )

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)