Archive for: September 2016

बिनबुलाया मेहमान : एंड्रयू हिंटन

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

लोबसेंग फुन्स्तोक एक पूर्व तिब्बती साधु हैं। उन्होंने पवित्र दलाई लामा के साथ प्रशिक्षण लिया और वर्षों तक पश्चिमी देशों में बौद्ध धर्म और ध्यान की शिक्षा दी। 2006 में वह साधु का चोला उतारकर भारत में अपने जन्म स्थान अरुणाचल प्रदेश लौट आये। यहां आकर उन्होंने हिमालय की तलहटी में अनाथ और गरीब बच्चों का एक समुदाय खड़ा कर दिया- झाम्त्से गत्सल बाल समाज– तिब्बती शब्द ‘झाम्त्से गत्सल’ का अर्थ है ‘प्रेम और दया का उपवन’। इस बाल समाज पर 2014 में एक फिल्म बनी- ‘ताशी एंड द मोंक’। झाम्त्से गत्सल की शुरुआत मात्र 34 बच्चों के साथ हुई। पिछले करीब एक दशक में यहां के बच्चों की संख्या बढ़कर 85 हो गयी है। 5 आश्रममाताएं और 13 शिक्षक इन बच्चों की देखरेख करते हैं। झाम्त्से गत्सल को उम्मीद है कि वह इतना विस्तार करे कि 200 बच्चे यहां रह सकें। इस साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक एंड्रयू हिंटन लोबसेंग फुन्स्तोक से उनके तकलीफ़देह बचपन और उस प्रेरणा के बारे में बातचीत कर रहे हैं, जिनकी बदौलत वह गरीब बच्चों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की राह बना पाए हैं।

क्या आप इस सवाल के जवाब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं कि आप कौन हैं और इस दुनिया में कैसे आये?

मेरा नाम लोबसेंग फुन्स्तोक है। मैं भारतीय हिमालय के सुदूरवर्ती अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुआ। जब मेरी मां गर्भवती हुए तो वह अविवाहित और बहुत छोटी थी। जाहिर है, गांव में यह भारी बदनामी की बात थी। उन्होंने छुप-छुपा के हमारे घर के शौचालय में मुझे जन्म दिया। उन्होंने मुझे सूखी पत्तियों से ढककर उसी तरह छोड़ दिया जैसे- लोग अपने मल को छोड़ते थे। मेरी बुआ और दादा-दादी ने किसी के रोने की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि‍ शायद कोई बकरी उनके खेत में आ गयी है और उनकी फसल को खा रही है। मेरी बुआ देखने के लिए बाहर आईं और उन्होंने सूखी हुई पत्तियों की नीचे कुछ हिलता हुआ नज़र आया। देखा तो वहां एक शिशु था और वह मैं था। मैं एक तरह से नीला-बैगनी पड़ चुका था- मौत के बिलकुल करीब।

आम तौर पर जब घर में कोई नया बच्चा आता है, परिवार वाले, दोस्त और पड़ोसी खुशियां मनाते हैं। लेकिन मेरा जन्म ऐसी घटना नहीं थी, जिसकी ख़ुशियां मनाई जा सकें। मैं अपने घरवालों के लिए कितना दुःख और बदनामी लेकर आया था। यही वजह थी कि छोटेपन में मुझे हमेशा कहा जाता था- ‘इस दुनिया में बिनबुलाया मेहमान’।

आपका बचपन कैसा था?

लोग सचमुच मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं लोगों की खिड़कियां तोड़ता और प्रार्थना पताकाएं फाड़कर आये दिन मुसीबतें खड़ी कर देता था। मुझे अच्छी तरह याद है, किसी ने मुझसे कहा था, “तुम कभी नहीं बदलोगे। तुम सुधरने वाले नहीं हो।” पता नहीं कैसे यह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी। आज भी मैं उस जगह हो देखता हूं और उन लम्हों को महसूस करता हूं। जाने कितनी बार मुझे लगता था इससे तो मर जाना अच्छा। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी थे जो तब भी मुझे बहुत प्यार करते थे, जब मैं प्यार के जरा भी लायक नहीं था। मैं इसे महसूस कर सकता हूं क्योंकि उनकी दयालुता के कारण ही आज मैं जिंदा हूं। किसी तरह उन्होंने मेरे भीतर कुछ महसूस किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि मुझे बदलने का एक ही रास्ता है- मुझे मठ में भेज दिया जाये।

मेरे दादा बड़े कठोर इंसान लगते थे, लेकिन उनका हृदय बड़ा कोमल था। वह जताते नहीं थे, लेकिन उनके प्यार को आप महसूस कर सकते थे। मेरे दादा-दादी के पास ज्यादा कुछ था नहीं, लेकिन दक्षिण भारत स्थित मठ के लिए प्रस्थान करने से ठीक एक दिन पहले दादा जी ने अपने पैजामों को काट-पीटकर एक थैला बनाया और इसमें खूब सारा पैसा डालकर बाहर मेरा नाम लिख दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमेशा अपने पास रखना और जब तक सचमुच बहुत ज़रूरत न पड़े इन्हें इस्तेमाल मत करना।” बहुत बाद में मैं इस बात को समझ पाया कि उन्हें मुझ से कितना प्यार था और किनता भरोसा मुझे पर करते थे।

इस तरह 7 वर्ष की आयु में आप घर छोड़कर मठवासी हो गए. वहां क्या हुआ?

मठ की दिनचर्या बहुत सख्त थी और अनुशासन बहुत कठोर। एक बच्चे के रूप में मेरे लिए यह कठिन था, लेकिन एक युवा साधु के रूप में मेरा दिमाग हर वक्त व्यस्त रहता था और मेरे पास कुछ और सोचने के लिए समय नहीं था। मुझे वहां की दिनचर्या, नीति, अनुशासन, गतिविधियां और मठ में किये जाने वाले तमाम कार्यों का पालन करना होता था। अच्छा बनाने में थोड़ा वक्त लगा। हर चीज़ के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक था, लेकिन एक बिंदु पर आकर मैंने सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मुझे भरोसा होने लगा कि मैं भी एक अच्छा इंसान बन सकता हूं।

मेरे शिक्षक से मिली शिक्षाओं में एक थी- तुम इस ब्रहमांड में एक बहुत विशाल परिवार के बहुत-बहुत छोटे हिस्से हो। खरबों मनुष्यों और अनगिनत जीवधारियों- जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों व पंछियों के बीच एक अदने से इंसान.। इस बात ने मुझे अपनी चुनौतियों व कठिनाइयों के बीच दूसरे जीवों से जुड़ने में बड़ी मदद की। और जब ऐसा होता है तो हमारा फोकस बदल जाता है। शिकायत करने के बजाय आप खुद से सवाल करने लगते हैं, “अपने परिवार, अपने बड़े परिवार को उनकी कठिनाइयों से बाहर निकलने में मैं कैसे मदद करूं।”

आज मैं अपनी कठिनाइयों को छोटे बच्चों के साथ साझा करता हूं, क्योंकि उनमें से अधिकतर उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जिनसे कभी मेरा वास्ता पड़ा था। मैं उन्हें यह भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं कि नकारात्मक होने की कतई ज़रूरत नहीं है। आज मैं जानता हूं कि मेरा जैसा तकलीफदेह बचपन भी एक तरह का आशीर्वाद है।

और कब आपको महसूस हुआ कि आप अपने अनुभवों को किसी सकारात्मक अंजाम में बदलना चाहते हैं?

मेरा ख़याल है कि बच्चों के समाज की स्थापना के बीज मेरे भीतर बहुत छोटी उम्र से थे।

जब मठ में मेरी परवरिश हो रही थी मेरे शिक्षक हमेशा इस बात की शिक्षा देते थे कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ-न-कुछ अर्थपूर्ण ज़रूर करो। वह हमें प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते थे और उसके बाद अपने और दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी काम करने का ज़ज्बा पैदा करते थे।

उन दिनों जब भी मैं घर आता था, देखता था कि यहां सारे बच्चे उसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं- कुछ करने के लिए यह सीधा सन्देश था। तब इस तरह के काम का मुझे कोई तजुर्बा नहीं था, आज जो मैं करता हूं, उसे कर पाने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैं कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के बारे में बोलता था।

आज मेरे पास जो कुछ भी है वह औरों की दयालुता की वजह से है। और अब मेरे सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि उस दयालुता की कीमत चुकाऊँ। मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मेरा बचपन भले ही कठिन रहा हो, मैं उनमें आस्था और भरोसा कभी नहीं खोऊंगा।

आपके बाल समाज के नाम का क्या महत्व है?

झाम्त्से गत्सल का मतलब है- ‘प्रेम और दयालुता का उपवन’। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे यह नाम पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त करता है। इन बच्चों को परिवार, प्रेम और अपनेपन के अहसास की ज़रूरत है।

यही कारण है कि मैंने इसे बाल समाज कहने का निर्णय लिया- यह उनका परिवार है, उनका समाज है और उनकी ज़िन्दगी है। झाम्त्से गत्सल में बच्चे अनाथ नहीं हैं। यहां उनके माता-पिता हैं, उनकी कई मांएं हैं, कई पिता हैं और कई-कई भाई-बहन हैं, जो उनका ख़याल रखते हैं। यहां उन्हें वह सब ख़याल, प्यार और मदद मिलती है, जिसके वे हकदार हैं।

और आपने यह समाज यहां क्यों शुरू किया?

यह इलाका (अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला) आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में एक है। जब 2006 में हमने शुरुआत की, तब यह जगह इतनी दूर थी कि हम आपसी बातचीत में इसे जुरासिक पार्क का रास्ता कहते थे। एक छोटे से कस्बे से 6-7 किलोमीटर के मोटर के सफ़र के बावजूद ऐसे घने जंगल से गुजरना पड़ता था, जहां दिन के समय भी आप अकेले जाने में घबराएंगे।

इसलिए एक तरह से मैं महसूस करता हूं कि हमारा बाल समाज भी शुरुआत भी एक अनाथ की तरह हुई। यह वास्तव में कोई शानदार जगह नहीं थी, जहां लोग अच्छा काम करना पसंद करते।

यहां के बच्चे कौन है और वे कहां से आते हैं?

हमारे बच्चों में ज्यादातर पहले पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। जब हम गावों में जाते हैं तो परिवार के सबसे तेज-तर्रार बच्चे को नहीं चुनते, बल्कि हम पूछते हैं- कौन सबसे चुनौतीपूर्ण बच्चा है? ऐसा कौन सा बच्चा है जिसे कोई नहीं चाहता?

हमारा काम उस बच्चे को स्वीकार करना है जिसकी कोई और देखभाल नहीं कर सकता और कोई करना भी नहीं चाहता। और उस बच्चे को सबसे शानदार इंसान में बदलने में मदद करना।

और यह आप सिर्फ प्यार और दयालुता के सहारे करते हैं?

हमारे बच्चों में लगभग सभी ने अपने-अपने गांव में बड़ा कठिन बचपन गुज़ारा है। लोग कहते हैं, “हे भगवान्, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी, तुम्हें मनोवैज्ञानिक बुलाना पड़ेगा, मनोचिकित्सक ही इन बच्चों को ठीक कर सकता है।” लेकिन अपने आठ साल के इतिहास में हमने अपने बच्चों को किसी तरह की दवा नहीं खिलाई।

सबसे पहले मैं समझता हूं यह सब झाम्त्से गत्सल के सादगी भरे जीवन का असर है। हम बच्चे को अपनाते हैं- बिना किसी निर्णय के उसे गले लगाते हैं, अच्छा, बुरा, कैसा भी। इसके बाद हम वास्तव में उसके लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं और उसके साथ सहयोगपूर्ण बर्ताव करते हैं।

इसके बाद सब प्रेम की ताकत है। ख़याल रखने की ताकत या दयालुता की ताकत जो हम हर बच्चे को देते हैं. और यह प्रत्येक बच्चे के लिए मरहम का काम करता है। और मुझे पक्का भरोसा है कि यह उपाय काम करता है। बेशक इसमें समय लगता है, लेकिन अंततः बच्चे बदल जाते हैं।

हमारे बाल समाज में बच्चे जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए बराबर के भागीदार होते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है और वे समझ जाते हैं कि कैसे सक्रिय भागीदार बना जाता है।

मेरी समझ से यह स्वाभाविक है कि हमारे बच्चे निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं- हमारे बच्चे उस बदलाव के सक्रिय एजेंट हैं, जो हम अपने समाज में लाना चाहते हैं। वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं- खाना पकाने, सफाई, छोटे बच्चों की देख-रेख, धोना, नहाना- हमारे समाज में होने वाले हर काम में बच्चे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। इस तरह देखें तो समाज होने का अहसास और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद निश्चित रूप से झाम्त्से गत्सल की ख़ास बात है।

क्या आपका समाज अब भी बढ़ रहा है?

मेरे सबसे मुश्किल कामों में एक है कब और कैसे नए बच्चों को स्वीकार किया जाये। अभी हमारे पास 85 बच्चे हैं और 1000 से ज्यादा बच्चों के आवेदन पड़े हुए हैं।

रोज लोग मेरे पास आते हैं और ज्यादा बच्चों को लेने का आग्रह करते हैं। यह बहुत कठिन है, अगर मैं एक परिवार को हां कहता हूँ तो 10 अन्य को ना कहना पड़ता है। फिलहाल हमारे पास किसी भी नए बच्चे को लेने के लिए जगह और संसाधन नहीं हैं।

अंत में, आप किस चीज़ का अभ्यास करते हैं?

मेरा प्रमुख अभ्यास करुणा, स्थिरता, एकाग्रता को ज्यादा-से-ज्यादा बढ़ाने तथा धैर्य व दृढ़ता के मेरे प्रशिक्षण पर आधारित है।

अमीर या गरीब, पूर्व या पश्चिम, शिक्षित या अनपढ़, स्त्री या पुरुष- सभी मनुष्यों में एक बात सामान है- सब अपने जीवन में आनंद और खुशियों की कामना करते हैं।

मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ मिली जिसे करते हुए इतनी ख़ुशी और आनंद की प्राप्ति होती है। यही मैं महसूस करता हूँ। मैं कितना किस्मत वाला हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं इसी तरह के कामों को करने और आगे बढ़ाने के लिए कई जन्म लूं। इस काम को करने में मुझे अपार ख़ुशी और आनंद मिलता है।

अनुवाद : आशुतोष उपाध्याय

कक्षा पहली के बच्चे : भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

एक

आपने सुना कभी
किसी हिटलर को कहते
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ

कक्षा पहली के बच्चे
ऐसा हर रोज़ कहते हैं-
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ।

दो

कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
हथेलियों के बीच
बच्चे के गाल
महसूस कर रहे हैं
उंगलियों का दबाव
और ठोढ़ी टिकी हुई है
हथेलियों की जड़ों पर
कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
जैसे थामा हो पृथ्वी
हथेलियों के बीच !

तीन

कक्षा पहली के बच्चे
नहीं जानते सौदा
किस चिड़िया का नाम होता है
वे नहीं समझते गिव एंड टेक का अर्थ
कक्षा पहली के बच्चे
हमारे थोड़े से समय के बदले
ढेर सारा प्यार दे देते हैं।

चार

कक्षा पहली के बच्चे
कहीं भी कभी भी
गाने लगते हैं जन गण मन…
जब चाहे
उनका मनकक्षा पहली के बच्चे
सुबह की प्रार्थना सभा में
पैर के अंगूठे से
धरती पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हैं
जब और लोग गाते हैं जन गण मन…

पाँच

बहुत दिनों के बाद
अपनी कक्षा से बाहर आए हैं
कक्षा पहली के बच्चे
जैसे अपने नीड़ों से निकलकर मेमनें
चल पड़ते हैं भेड़ों के साथ
उनसे सटकर
कक्षा पहली के बच्चे
अपनी टीचर जी के साथ
तितलियाँ पकड़ने का खेल खेल रहे हैं
बहुत दिनों के बाद
खिली है धूप
तो जैसे शामिल हो गई हो
चुपके से बच्चों की दूधिया खुशी में…
पहली कक्षा के बच्चे जैसे
बादलों के पीछे से
सूरज की तरह निकले
और छा गए
धूप की तरह पूरे मैदान में..

छः

कक्षा पहली के बच्चे
मायूस दिखते हैं जब
टॉयलेट के सामने
निकर आधी ऊपर चढ़ाए
बटन या हूक लगाने का
सफल-असफल प्रयास करते हैं
वे नहीं चाहते
कोई उन्हें देख ले नंगा
पहली कक्षा के बच्चे
अपनी टीचरजी से सटकर खड़े होते हैं
वे टीचरजी के होंठों को देखकर
और छूकर सीखते हैं-
‘आ’ आम का, ‘ए’ से एप्पल
‘औ’ से औरतकक्षा पहली के बच्चे
उनकी टीचरजी के ज़रा देर करते ही
खुद बन जाते हैं टीचर
चॉक पकड़कर श्यामपट पर
बनाते आदमी मकान चिड़िया तितली
छड़ी पकड़कर नन्हें हाथों में
खेलने लगते मैडम-मैडम
कक्षा पहली में
कम अज कम पाँच बच्चे होते
कक्षा के मॉनीटर….कक्षा पहली के बच्चे
केवल अपने टीचर को पहचानते हैं
वे उन्हें ‘टीचरजी’ कहकर पुकारते हैं
टीचरजी के मुंह पर उंगली रखते ही
अपने मुंह पर उंगलियाँ रख लेते हैं
और इशारा होते ही उनका
नाचने लग जाते हैंकक्षा पहली के बच्चे
समझते हैं प्यार की भाषा !!

सात

मेरे सपनों में आते हैं
कक्षा पहली के बच्चे
आते हैं और गुदगुदाने लगते है
पत्नी कहती है
हँसता हूँ मैं नींद में…।

आठ

दौड़ता रहता हूँ मैं
बड़ी कक्षाओं के बच्चों के बीच
कि जैसे एक डर सा लगने लगा है
इन दिनों बड़ी कक्षाओं के बच्चों से
ज़रा सी देर हुई नहीं कि
घटी कोई दुर्घटना
कि जैसे बच्चे बच्चे नहीं रहे
बड़ी कक्षाओं के…

कि जैसे-
बड़ी कक्षाओं के बीच
झूलता रहता हूँ
दोनों हाथों के बल
हवा में लटके होते हैं
दोनों पैर…
कि जैसे-
फुरसत ही नहीं
सांस लेने की भी …

पर मिलते ही
पहली कक्षा के बच्चों को
सांसों को इत्मिनान आ जाता है।

नौ

कक्षा पहली के बच्चे
दौड़ रहे हैं/कूद रहे हैं
मचल रहे हैं
गिर रहे हैं/उठ रहे हैं
उड़ रहे हैं
कक्षा पहली के बच्चे
गा रहे हैं कोई गीत
समूह में नाच रहे हैं
खेल रहे हैं कित-कित
लूट रहे हैं मज़ा
हल्की-हल्की बारिश में भीगने का

कक्षा पहली के बच्चे को भूख लगी है
वे मिड डे मील खा रहे हैं…

कक्षा पहली के बच्चे
तड़प रहे हैं
पेट पकड़-पकड़ कर
उल्टियाँ कर रहे हैं
पास पड़ी हुई
खुली हुई किताबे है
हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं…

दस

कक्षा पहली का बच्चा
चलता है सड़क पर ज
सड़क पर नहीं होती उसकी आँखें
वह देखता है
फूल पत्ती तितली आसमान
बादल बिजली बरसात गाय और गोबर
चीटियाँ पिल्ले और कुत्ते और कौवें धूल धुआ
तेज रफ्तार गाड़ियाँ
बाइकों का शोर और
रिक्‍शे की पों पों
भले लगते हैं
कक्षा पहली के बच्चे को
पहली कक्षा का बच्चा
छूता है जब कागज़ की नाव
उंगलियों के पोरों से
तो वह चलने लगती है बेपाँव
पाँव की ठोकर लगते ही
छोटा गोलाकार पत्थर
फुटबाल बन जाता है
क्क्षा पहली का बच्चा नहीं होता

सड़क पर कभी अकेला-उदास!!

ग्यारह

वह बच्चा
कक्षा पहली का
पहुँच नहीं पाया
अपनी कक्षा में
अब तक
दरअसल
खोज रही है
उसकी आँखें
धरती पर कोई नई चीज़
जो काम की हो उसके
मसलन
चकमक पत्थर
लकड़ी का एक
अदद टुकड़ा-
चिकना और बेलनाकार
सुनहली मक पत्ती !!

हिंदी अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो!

Hindi Academy

नई दि‍ल्ली : हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है।

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से सूचना दी गई कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा। उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों– अरुणदेव (समालोचन), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा), को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें ‘त्रुटिवश’ इस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को ‘मानवीय भूल’ मानकर उसकी अनदेखी करें। बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया। सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है।

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है। ‘दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है। मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं। किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने/बने रहने की बुनियादी शर्त है। वह न होने की स्थिति में वे जिनके ‘परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं। इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे। वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है।

(मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव) और संजीव कुमार (उप-महासचिव) की ओर से 16.09.2016 को जारी बयान)

बच्चो ने बनाए मॉडल और लगाया बाल विज्ञान मेला

मॉडल बनाते बच्चे

मॉडल बनाते बच्चे

अल्मोड़ा : अलायन्स फॉर साइंस प्रोग्राम के तहत रामगंगा वेली पब्लिक स्कूल मासी अल्मोड़ा में 7-10 सितम्बर 2016 तक मॉडल मेकिंग वर्कशॉप तथा बाल विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। इस मेले में 30 मॉडल को लिया गया। मॉडल मेकिंग के लिए 8वीं व 9वीं कक्षा के 36 छात्रों को मेले के लिए चुना गया था।

मॉडल मेकिंग

7 व 8 सितम्बर  को बाल विज्ञान मेले के लिए चयनित मॉडल बनाए गए। इसके लिए 36 छात्रों को 8 समूह में बांटा गया। सभी ग्रुप ने 3-3 मॉडल्स बनाए। जब भी कोई मॉडल बनता तो उसकी कार्यप्रणाली व मॉडल से पुष्ट होने वाले नियम पर भी चर्चा की जाती थी। दो दिनों में सभी मॉडल्स बना लिए गए। मॉडल मेकिंग के दौरान बच्चे बहुत तल्लीन थे। बच्चों से हुई बातचीत से पता लगा कि उन्होंने ऐसे मॉडल पहली बार बनाए। बच्चे मॉडल की सुन्दरता पर विशेष ध्यान दे रहे थे।

मॉडल्स पर चर्चा

9 सितम्बर को स्थानीय अवकाश की वजह से स्कूल बंद था। इसलिए सभी 36 छात्रों को कुछ समय के लिए बुलाया गया था ताकि मॉडल्स के ऊपर चर्चा की जा सके। यह दिन चर्चा के लिए रखा था। सभी 8 ग्रुप्स को दो बड़े ग्रुप में बांटा गया और अपने-अपने मॉडल्स पर चर्चा के लिए आधा घंटे के समय दिया गया। क्योंकि मॉडल मेकिंग के दौरान भी मॉडल्स पर चर्चा हुई थी,  इसलिए बच्चे अपने मॉडल के लिए घर से तैयारी करके आए थे। ग्रुप चर्चा के दौरान बच्चों को स्वयं यह तय करना था कि उन्हें कौन-सा मॉडल प्रस्तुत करना है। बच्चों ने अपनी रुचि के आधार पर अपने मॉडल चुने। जिस मॉडल में बच्चों को समझने में कठिनाई हो रही थी, उस पर उन्हें मदद की गई। इस दिन बच्चों को अपने मॉडल पर आधारित चार्ट भी बनाने थे। यह काम घर के लिए दिया गया।

बाल विज्ञान मेला

10 सितम्बर को बाल विज्ञान मेले का आयोजन हुआ। इसमें कम्युनिटी इन्वोल्मेंट के लिए स्कूल की आर्ट शिक्षिका द्वारा पोस्टर थे, जिन्हें कस्बे में 4-5 जगहों पर चिपकाया गया था। अभिभावकों को भी सूचित किया गया था। पास के दो राजकीय विद्यालयों के शिक्षक और छात्रों को भी विज्ञान मेला देखने के लिए निमंत्रण भेजा गया था। लगभग 150 से ज्यादा अभिभावक, 30 शिक्षकों तथा 250 छात्रों ने मेले का आनंद लिया। सभी ने इस तरह के प्रयास की सराहना की।

मासी जैसे छोटे से कस्बे में यह पहला आयोजन था, जिसमें बच्चों द्वारा बनाए गए मॉडल्स की प्रदर्शनी लगी थी और बच्चे बिना किसी झिझक के अपने मॉडल के बारे में बता रहे थे। स्कूल के व्यवस्थापक संतोष मासीवाल ने बच्चों को उत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी रखे थे। इसके लिए कुछ मापदंडों पर बच्चों को परखा गया। जैसे- मॉडल की कार्यप्रणाली, प्रस्तुतीकरण, बच्चे का आत्मविश्वास, मॉडल की सुन्दरता आदि।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

प्रस्तुति‍: आशीष कंडपाल

हिंदी  नहीं, हिंदी  दिवस : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

बाकी भाषाओं का तो वे जाने, हिन्‍दी के लेखकों के साथ तो मुझे लगता है कि‍ ऐसी स्थिति आ ही गई होगी, जो मेरे साथ है। कहानियों की कोई कमी नहीं है। जल में तैरती, भागती मछलियों की तरह। अनगिनत।

लिखने का इरादा करता हूं। संतोष से भर उठता हूं। कलम फड़फडा़ती  है, लेकिन फिर वही ख्‍याल। किसके लिए?  कौन पढ़ेगा?  कोई पढ़ भी रहा है? महानगर  के किसी भी बच्‍चे,  नौजवान से पूछ लीजिए। ‘बस पढ़ लेता हूं। पांचवी तक एक विषय था। अब तो लिख भी नहीं सकता। सच कह रहा हूं, अंकल! कई साल से नहीं लिखा हिन्‍दी में। स्‍कूल में तो मैम फाइन कर देती थी। कान उमेठ देती थी, बोलने पर। घर पर मम्‍मी-पापा भी नहीं चाहते थे कि‍ मैं हिंदी में लि‍खूं। मैंने एक बार हिन्‍दी में कविता लिखी। पापा ने बहुत डांटा। वैसे मेरे बाबाजी ने भी कविताएं लिखी हैं, पर अब वे मेरे साथ अंग्रेजी सीखते हैं। पीटी की मीटिंग में बाबाजी जाते हैं, न  कभी-कभी। मुझ से भी अंग्रेजी पूछ लेते थे। मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। जब मैंने अंग्रेजी में कविता लिखी तो मुझे सबने प्‍यार किया। नानाजी तो इतनी दूर से गिफ्ट लेकर आए थे। हां बोल लेता हूं। डांस भी करता हूं, हिन्‍दी गानों पर।’

सोचते-सोचते कलम एक तरफ लुढ़क गई है। कितने ही चेहरे घूम रहे हैं हिन्‍दी साहित्‍यकारों के। अब तो दिल्‍ली में हर पखवाड़े निगमबोध जाना पड़ता हैं। फिर उनकी शोक सभाएं। बस हो गई, साहित्‍य सेवा। कथाकार क्षितिज शर्मा उपन्‍यास छपने के इंतजार में ही चल बसे। कितनी मेहनत लगती है, ऐसी रचना में? पर कौन मानता है। प्रकाशकों के आगे लंबी लाइनें लगी हैं, छपवाने वालों की। कथाकार-कलाकार प्रभु जोशी कह रहे थे कि‍ प्रकाशक फोन ही नहीं उठाते। बोले न बोले सौ में निन्‍यानवे का यही रोना। पढ़ने वाले कम, लिखने वाले ज्‍यादा। रॉयल्टी शब्‍द तो  हिंदी से  गायब ही  हो  जाएगा। पंजाबी भाषा के  सन्दर्भ  में तीन दशक पहले  खुशवंत सिंह ने  कहा  था  कि वहां किसी को  रॉयल्टी नहीं मिली।

अभी  साहित्‍य अकादमी में पता चला कि अमृतलाल नागर की जन्‍मशती मनाई जाएगी। बड़ा अच्‍छा लगा। आखिर सौ वर्ष में तो कोई नाम लेगा एक बार। इतना भी हो जाए, तो कम नहीं। अभी 9 अगस्‍त को मनोहर श्‍याम जोशी को उनकी पत्‍नी ने अपने बेटों के पैसों से याद किया। सचमुच!  चाय-पकोड़े पर  कुछ लोग तो अभी जुट ही जाते हैं। भविष्य  में  शायद यह  भी  मुश्‍कि‍ल  होगा। हज़ार आमंत्रण  पर पचास श्रोताओं  का औसत  है और वे भी  बड़े–बूढ़े। औसत  आयु 70  साल,  जिनमे  पिचानवे प्रतिशत  शुगर  के मरीज़। पकोड़े  खाएं तो  मुश्किन, न खाएं तो भी। वे उन दिनों को  याद  करते हैं, जब सूखी  चाय  पर भी नौजवानों  की  भीड़  जुटी  रहती थी। लगता है कि‍ हिंदी  को भी शुगर की बीमारी लग गई।  बहुत बड़ी-बड़ी बातें  हुईं, लेकिन हिंदी  लेखन पर  नहीं।  कैसा कृतघ्‍न है हिन्‍दी समाज?  जिस साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान. धर्मयुग की नाव में सवार हिन्‍दी घर-घर तक पहुंची, उन साहित्‍यकारों, संपादकों को नई पीढ़ी जानती तक नहीं।

ऐसा नहीं कि सारा दोष राजसत्‍ता का ही है। राजसत्‍ता, राजनीतिक पार्टियों के साये में पले-बढ़े संघठनों ने भी कम नुकसान नहीं किया। कौन रोकता है, इन्हें कि ये संगठन, विश्‍वविद्यालय, स्‍कूल में धर्मवीर भारती, दिनकर, अमृतलाल नागर, जगदीश चन्द्र, पाश…. को याद नहीं कर सकते। हिन्‍दी भाषा की ताकत इन लेखकों में है। जनता इसे जानती है। लेकिन ये केवल उसी लेखक को याद करेंगे, जो इनके पार्टी  में रहा हो। परसाई जी ने इन्‍हीं लेखकों के लिए कहा था- “हैं तो ये शेर, लेकिन राजनीति के  सियारों की बारात में बेंड बजाते हैं।“

पार्टी का लेखक जनता का लेखक कभी नहीं बन सकता। इसलिए हिन्‍दी लेखक जनता से दूर होता गया।

दिमाग में दौड़ती कहानी फिर गायब हो गई है- पानी में तेजी से दौड़ती मछलियों की तरह। जब इतने बड़े-बड़े साहित्‍यकार गायब हो गए, उनकी किताबें गायब हो गईं, तो तुम्‍हें कहानी गायब हो जाने का अफसोस क्‍यों? चश्‍मे का नम्‍बर तो नहीं बढ़ा? कमर तो नहीं झुकी? वक्‍त से पहले बुढ़ा तो नहीं गए? पांडुलिपि तो दर-दर की ठोकर नहीं खा रही?  प्राण तो आराम से निकलेंगे।  वरना कहानी,  उपन्‍यास पूरा करने के चक्‍कर में इसी हिन्‍दी प्रदेश में घूमते रहते और यमराज का भैंसा भी इंतजार में भूखा मर जाता। लिखना है, तो किसी और भाषा में लिखें- जहां बच्‍चे इन किताबों को पढ़े। पुरस्‍कारों से कोई भाषा नहीं बचती। लेखक और समाज भी नहीं।

पता नहीं कभी किस गफलत में वे रोज कागज काले करते थे। रात में सोने न सोने के बीच सिरहाने कागज पर अंधेरे में ही कुछ-कुछ नोट करते। लगता था, छपते ही दुनिया बदल जाएगी। दशकों तक इस भ्रम में जीते रहे। बदलता था तो बस घंटे दो घंटे या दिनभर का मूड।  लेकिन सूरज छिपने के साथ ही छूमंतरवाकई कितना खोखला था, सब कुछ। लेकिन जीने के लिए कुछ भ्रम भी तो चाहिए। सोशल मीडिया उसी भ्रम की अगली कड़ी साबित हुआ। किताबों, अखबारों से मोहभंग हुआ तो उसी सोशल मीडिया की तरफ उम्‍मीद से देखने लगे जिसकी सूरत से भी चिढ़ लगती थी। लेकिन यह क्‍या? लाइक तो करते हैं, पढ़ता एकाध ही है। अपने बच्‍चे तक नहीं देखते- कहने के बावजूद। ‘आप अंग्रेजी में लिखा करो पापा ! हिन्‍दी अब नहीं चलेगी।’ दीवारों पर चप्‍पे -चप्‍पे पर जब ऐसे इश्तिहार चिपके हों, तो कोई क्‍यों हिन्‍दी में लिखे।

लेकिन सितंबर में तो हम चलाएंगे ही। सितम्बर बुलावा देता फिर  रहा  है- हिंदी दिवस पर  आने और  गाने बजने  के लिए। जय हिंदी ! जय  हिन्दी दिवस!

बच्चों के लिए कविताएँ : संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

उफ़ कबूतर! ये कबूतर !

उफ़ कबूतर! ये कबूतर!
गूँ गूँ गूँ गूँ गुटर गुटर कर
कितना शोर मचाते हैं!

सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर
फड़ फड़ फड़ फड़ पंख फटककर
जबरन मुझे जगाते हैं!

बिना इजाज़त घर में घुसकर
शान से हर कमरे में फिरकर
हम पर रौब जमाते हैं!

आँख सदा रखते झाड़ू पर
चाहे कितनी रखो छिपाकर
सींकें ले उड़ जाते हैं!

फेंको तिनके झाड़-बुहारकर
पर जो भायी, उसी जगह पर
फिर-फिर उन्हें सजाते हैं!

डांटूं जब मैं हाथ झटककर
डरने का थोड़ा नाटक कर
गोल आँख मटकाते हैं!

आसमान में चक्कर भरकर
उड़े जहाँ से, वहीं बैठकर
गर्दन ख़ूब फुलाते हैं!

मकड़ी जाला बुनती है

मकड़ी जाला बुनती है
नहीं किसी की सुनती है
पूरे घर को देखभाल कर
कोने-अँतरे चुनती है
दम साधे जाले में बैठी
गुर शिकार के गुनती है
जाले पर झाड़ू फिरने पर
रोती है सिर धुनती है
किसे सुनाये दुखड़ा जाकर
दुनिया ऊँचा सुनती है.

बादल का वह नटखट बच्चा

बादल का वह नटखट बच्चा
हाथ छुड़ाकर अपनी माँ से
आगे-आगे दौड़ गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!
घूम रहा है जाने कब से
तरह-तरह के रूप बदलके
भालू, हाथी, कछुआ बनके
मेरी खिड़की तक आया तो
मछली बनकर तैर गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!

कैसे बतलाऊँ…

अक्सर पूछा करते हैं सब
चलते में इस तरह अचानक
यूँ तुम ठिठक क्यूँ रह जाती हो
खड़ी हुई तो खड़ी रह गई
कभी देखती कहीं एकटक रह जाती हो
कैसे यह समझाऊँ सबको
रस्ते में जब पेड़ कोई
या कोई बादल, कोई कौवा
बतियाने लगता है मुझसे
ठिठकी हुई नहीं होती हूँ, बह जाती हूँ…

सूरज का माथा गरमाया

सूरज का माथा गरमाया
चढ़ा है उसका पारा
होकर आगबबूला उसने
सब पर ताप उतारा
आसमान कोरे कागज़-सा
बिन पंछी बिन बदरा
पड़ा तार पर सूख रहा ज्यों
साफ़ धुला इक चदरा
हवा दुबक के जा बैठी है
छाया में कहीं छुपकर
कहीं बुखार ना हो जाये
इस तेज़ घाम में तपकर
पंछी मुँह लटकाये बैठे
कहाँ से पायें पानी
बच्चे उनके दाना माँगें
सुनते नहीं कहानी
तब धरती इक बड़े ताल में
पानी लायी भरकर
नंगे पाँव धूप में जल गये
भागी घर के अंदर
खिड़की से झाँका जो आयी
छप छप की आवाज़
ताल में सूरज नहा रहा था
छोड़ के सारे काज!