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बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

एक और दिवास्वप्न : कैलाश मंडलोई 

shekshik-dakhal

‘शैक्षिक दख़ल’ की समीक्षा-

शिक्षा जगत में हलचल मचाने वाली, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का चिंतन-मनन करती पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’, शिक्षा जगत के अंगों में लग रहे जंग को शिक्षकों के साझा प्रयास से खुरचने का प्रयास कर रही है। यह एक अनूठी पहल है। जुलाई 2016 का यह अंक ‘प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं बच्चे’ विषय पर केन्द्रित है। इसका प्रत्येक आलेख बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का एक प्रारूप प्रस्तुत कर रहा है। अपने बच्चों के प्रति चिंतित अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए यह अंक मार्गदर्शिका है। प्रारंभ के दो आलेख इस अंक की प्रस्तावना हैं। पहला आलेख ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दे’ महेश पुनेठा का है, जो इस और संकेत करते हैं कि अधिकांश पालक एवं शिक्षक अपनी झूठी सत्ता को बनाए रखने के लिए बच्चों के प्रश्नों से बचते हैं। ज्यादा प्रश्न करने वाले बच्चों को नापसंद करते हैं। इस आलेख द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है कि ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दें’ क्योंकि प्रश्न ही तो हैं, जो हमें खोज-आविष्कार-सृजन की और ले जाते हैं। प्रश्न ही बच्चे में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करते हैं। इस विषय की प्रस्तावना को आगे बढ़ाता हुआ दूसरा आलेख है- प्रश्न न करने का मनोविज्ञान जो फेसबुक परिचर्चा पर आधारित है। इस फेसबुक परिचर्चा में लग-भग 60-65 शिक्षकों, चिंतक व लेखकों ने प्रश्न न करने के मनोविज्ञान पर अपने-अपने विचार निम्न बिंदुओं पर दिए हैं-

  1. आप बच्चे को प्रश्न पूछने के लिए क्यों प्रोत्साहित करना चाहेंगे?
  2. बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं?
  3. यह भी एक तथ्य है कि बच्चे प्रश्न के गलत होने के डर से भी प्रश्न नहीं करते हैं,बहुत सारे बच्चों ने अपने उत्तर में यह बात कही। क्या आपको लगता है कि प्रश्न भी गलत हो सकता है? बच्चे के पास यह बात कहां से आई होगी?
  4. बच्चों में‘प्रश्न करने के प्रति झिझक’ की जड़ें क्या हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी देखी जा सकती हैं? 5. क्या आपको लगता है कि भाषा में अधिकार न होना भी बच्चे को प्रश्न करने से रोकता है?
  5. क्या प्रश्न करना सिखाया जा सकता है और कैसे?
  6. बच्चों को प्रश्न करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?

डॉक्‍टर अनिता जोशी का आलेख ‘प्राथमिक शिक्षण एक चुनौती’, प्राथमिक स्तर के बच्चों एवं प्राथमिक कक्षा के शिक्षकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। प्राथमिक स्तर पर बालक सृजन की प्रवृत्तियाँ रखता है। जिज्ञासा के कारण पूछताछ की प्रवृत्ति अधिक होती है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक का कार्य संवेगात्मक विकास द्वारा बच्चों को सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने योग्य बनाना है। अत: प्राथमिक स्तर पर अध्यापन करने वाला शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ है।

डॉक्‍टर इसपाक अली का आलेख जनजातीय समाज, उसकी शिक्षा और समस्या की बात करता है।  ‘बचपन, कल्पनाशीलता और शिक्षा’ आलेख में आनन्द गुप्ता प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मक सोच को कैसे बचाया जाए। इस बारे में सबसे बड़ी भूमिका विद्यालय और शिक्षकों को भी निभानी होगी। उनका कहना है कि शिक्षकों की सोच में भी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता होनी चाहि‍ए तभी वे अपने बच्चों में इन गुणों का विकास कर सकेंगे। कालूराम शार्मा अपने आलेख में कहते हैं कि ‘जब जवाब पता है तो सवाल क्यों?’ कथित शिक्षा व्यवस्था चाहती है कि उसकी कक्षा के बच्चे हूबहू वहीं जवाब दें, जो अपेक्षा की जाती है। और वह अपेक्षा पाठ्य पुस्तक की सीमा से बंधी होती है। यानी सवाल भी मेरे और जवाब भी मेरे। यह कैसे हो सकता है। यहाँ वे प्रोफेसर यशपाल की बात रखते हैं। प्रोफेसर यशपाल कहते हैं कि स्कूल के सवालों और असल जिंदगी के सवालों में फर्क क्यों? वैसे इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद ऐसे शिक्षक मिल ही जाएंगे, जो मौलिक सवाल उठाते हैं या बच्चों को सवाल करने को प्रेरित करते रहते हैं। देवेश जोशी का आलेख ‘उत्तर से मत डरिए, प्रश्‍न न पूछने से डरिए’, जब छात्र द्वारा पाठ्यक्रम को छोड़कर कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो शिक्षक की क्या प्रतिक्रिया होती है और एक छात्र के मन पर इसका क्या प्रभाव हुआ, शिक्षकों को संदेश देता आलेख है। जब बच्चों को बार-बार चुप कराया जाता है, उन्हें आधे-अधूरे जवाब दिए जाते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चों मन में प्रश्न के प्रति एक नकारात्मक ग्रंथि बन जाती है, जिससे वे प्रश्न करने से हिचकिचाते हैं। क्या करें कि प्रश्न के प्रति बच्चों की हिचकिचाहट दूर हो, इसे प्रस्तुत करता आलेख ‘प्रश्न करने से हिचकिचाते बच्चे’।

चिंतामणि जोशीजी कि कहानी ‘और दिलबर नठ गया’, एक ड्राप-आउट बालक की कहानी है। यह दिल को छूने और मन को झकझोर देने वाली कहानी है, जो अभिभावकों एवं शिक्षकों को अपने दायित्वबोध का संदेश दे रही है कि प्रताड़ना कभी भी प्रेरणा नहीं बन सकती और न ही प्रेरणा के बिना कोई बच्चा किसी प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकता है। इसलिए यह सत्य है कि‍ बच्चे प्रताड़ित होकर आगे नहीं बढ़ते और इसी बात को आपने सही तरीके रखा है।

‘बचपन के दिन’ स्तम्भ के तहत ‘गुड-सेकेंड लड़का’ आलेख में लेखक पद्मनाभ मिश्र ने अपने बचपन से लेकर नौकरी लगने तक के जीवन का एक ऐसा स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें हर बार उनकी इच्छा के विपरीत हुआ। इसे पढ़ने पर लगता है कि कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ है और हम देखते है कि‍ कहीं-न-कहीं आम बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। मिश्रजी ने अपने जीवन चरित्र के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि‍ बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार विषय पढ़ने की व्यवस्था की जानी चहिए। लेख बड़ा है, लेकिन बहुत कुछ देने वाला है। ‘आते हुए लोग’ स्तम्भ में, ‘मैं मासाप नहीं, तानाशाह बन गया’ आलेख में लेखक तारा सिंह चुफाल शाला में भयमुक्त वातावरण की बात करते हैं। बचपन में उन्होंने जो शिक्षकों की तानाशाह झेली, उसका सतही चित्रांकन किया है, जिसे आज भी कई मासूम बच्चे झेल रहे हैं। जब उन्हें गरीबी और बेरोजगारी ने बेमन से शिक्षक बनाया, वे भी तानाशाह बन गए। जब कई वर्षों बाद उन्होंने पाया की बच्चों को सिखाने की नहीं, उनसे सीखने की आवश्यकता है। और फिर कैसे उन्होंने बच्चों को प्यार किया, अपना बनाया। वे चाहते हैं कि‍ प्रत्येक शिक्षक बच्चों से प्यार करे, दुलार करे फिर पढ़ने-पढ़ाने की बात हो। ‘डायरी के पन्ने’ स्तम्भ में रेखा चमोली का आलेख ‘बच्चों की रचनात्मकता का एक मंच- बाल शोध मेला’, जो बच्चों को सीखने- सिखाने की प्रक्रिया में एक नवाचार लिए है। क्या है बाल शोध मेला इसका वर्णन विस्तार से किया गया है। बहुत ही रोचक व गतिविधि आधारित जानकारी है। अलग-अलग विषय लेकर इसे शाला में वर्ष में एक या दो बार करवाना चहि‍ए।

‘अनुभव अपने-अपने स्तम्भ’ में उत्तम मिश्रा का आलेख ‘मैं अपने छात्रों के घर जाऊंगा’, एक शाला त्यागी बच्चे को शाला में वापस लाने से उसकी नौकरी लगने तक की सच्ची कहानी। पत्रि‍का का प्रत्येक आलेख समाज, अभिभावक एवं शिक्षकों से यही प्रश्न पूछ रहा है कि प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं, बच्चे? कौन से कारक हैं, जो बच्चे को प्रश्न पूछने से रोकते हैं? लेकिन एक स्कूल ऐसा भी है, जहां बच्चे स्वयं प्रश्न पत्र तैयार करते हैं। यह एक नया प्रयोग कर रहा है- अजबपुर प्राथमिक विध्यालय।

अंत में दिनेश कर्नाटक लिखते हैं कि बच्चे प्रश्न नहीं करते क्यों कि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्न नहीं करते। हम प्रश्न करते तो बच्चे भी प्रश्न करते।

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

mother.माँ

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)

उदार और धर्मनिरपेक्ष परम्परा की निरन्तरता जारी रहेगी : हामि‍द दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामि‍द दाभोलकर अंधवि‍श्वास के खि‍लाफ संघर्षरत रहे नरेंद्र दाभोलकर के पुत्र है, जि‍नकी 20 अगस्त 2013 में पूणे में हत्या कर दी गई थी। हामि‍द अपने पि‍ता की वि‍रासत को उसे तेवर के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। हामि‍द दाभोलकर से लेला बावदम की बातचीत-

सभी सार्वजनिक मन्दिरों में स्त्रियों के प्रवेश की माँग को लेकर आपके पिता ने सन् 2000 में एक आंदोलन की शुरुआत की थी। उनके इस संघर्ष के बारे में कुछ बताएं।

शनि सिगनापुर मध्य महाराष्ट्र में एक जगह है, जिस पर वर्ष 1998 में गुलशन कुमार द्वारा ‘सूर्य पुत्र शनिदेव’ नाम से एक फि़ल्म बनाने के बाद इस स्थान की मान्यता बढ़ी और यह स्थान एक चर्चित तीर्थस्थल बन गया। बहुत से लोगों का विश्वास है कि यह मन्दिर एक जागृत देवस्थान है। शाब्दिक रूप से ‘जागृत’ का अर्थ होता है कि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा में ईश्वर का वास है। अत: दृश्यमान रूप से देखें तो ईश्वर नहीं चाहता कि उसके पवित्र स्थान पर महिलाएं प्रवेश करें, इसलिए पारम्परिक रूप से यहाँ उनका प्रवेश वर्जित रहा। मजेदार तथ्य यह है कि यहाँ मन्दिर के चारों तरफ दीवार नहीं है और यह पवित्र स्थल महज एक चबूतरा है जिस पर एक काले पत्थर के रूप में देवता स्थापित है। यह भी मान्यता है कि यहाँ देवता चोरी करने वालों को दंड देते हैं इसलिए इस गाँव में चोरी की घटनाएं नहीं होतीं तथा घरों के दरवाजों पर ताला भी नहीं लगाया जाता। हालाँकि सिगनापुर की कोतवाली में दर्ज एफ.आई.आर. कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। नरेंद्र दाभोलकर के नेतृत्व में ‘महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ ने इन्हीं मान्यताओं के खिलाफ गत पन्द्रह वर्षों में लम्बा संघर्ष किया था।

यह सब वर्ष 1998 में शुरू हुआ जब सत्यशोधक सभा नाम की एक संस्था (जिसका गठन महात्मा फुले के समता और न्याय सम्बन्धी विचारों के प्रसार हेतु किया गया था) द्वारा अहमदनगर में एक राज्य स्तरीय महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें इस मन्दिर की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए गए। सत्यशोधक सभा ने इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया, परन्तु महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने संघर्ष का मन बना लिया था। इस तरह व्यापक प्रारम्भिक तैयारी तथा समाज और मीडिया में गहन विचार-विमर्श के बाद नवम्बर 2000 में एम.ए.एन.एस. ने शनि सिगनापुर की तरफ मार्च करने की घोषणा कर दी। महाराष्ट्र की अनेक सामाजिक विभूतियां जैसे डॉ एनडी पाटिल, बाबा अधव, श्रीराम लागू आदि ने इस आंदोलन को समर्थन दिया और इस मार्च में शामिल होने का भी निश्चय किया। इस मार्च में करीब 1200 एम.ए.एन.एस. स्वयंसेवक अपनी-अपनी पत्नियों के साथ शामिल हुए। दाभोलकर इस बात को लेकर प्रयत्नशील थे कि यह आन्दोलन पूरी तरह सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित रहे और कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में न ले तथा बलपूर्वक इस पवित्र स्थल में प्रवेश न करे।

क्या उस वक्त तीव्र विरोध का सामना नहीं करना पड़ा था, जबकि राजनीति और धर्म का मिश्रण किया जा रहा था और हिन्दू धार्मिक संगठनों के साथ-साथ शिवसेना और बीजेपी भी इस आंदोलन के विरोध में डटे हुए थे?

महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस आंदोलन की घोषणा के बाद बीजेपी, शिवसेना और अन्य कट्टर समूहों ने विरोध शुरू कर दिया, जो हिंदुत्व का इस्तेमाल घृणा फ़ैलाने के लिए कर रहे थे। इनकी तरफ से यह विरोध अपेक्षित था, परन्तु दुर्भाग्य से कांग्रेस ने भी इस आंदोलन का विरोध किया, हालाँकि वे यह विरोध अपरोक्ष रूप से कर रहे थे। विडम्बना देखि‍ए कि महाराष्ट्र के तत्कालीन सामाजिक न्याय मंत्री दिलीप सोपल ने दाभोलकर को खुलेआम धमकी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने शनि सिगनापुर की तरफ बढ़ने की कोशिश की तो उनके हाथ-पैर काट दिए जाएंगे।

दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सक्रिय सदस्यों को यह चुनौती भी दी गई कि वे इस मार्च में अपने साथ अपनी माताओं और पत्नियों को भी साथ लाकर दिखाएँ और शनि के प्रकोप को भुगतें। यही कारण था कि आंदोलन से जुड़े सभी एक्टिविस्ट के साथ या तो उनकी माँ थी या फिर पत्नी। जैसा कि अंदेशा था दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सभी कार्यकर्ताओं को अहमदनगर जिले में प्रवेश करते ही गिरफ्तार कर लिया गया, परन्तु इस आंदोलन ने जो लहर पैदा की, उस पर नियंत्रण नहीं किया जा सका। हमें लगता है कि अभी दो महीने पहले जिस महिला ने वहाँ पूजा-अर्चना की तथा अन्य संगठनों द्वारा महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को लेकर जो आवाज बुलन्द की जा रही है दरअसल, इसी आंदोलन को अपनी तरह से आगे बढ़ाने की ही मुहिम है।

यह आंदोलन आगे कैसे बढ़ा था?

इस आंदोलन के शुरू होने के बाद हमने इसे और मजबूत बनाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया की राह पकड़ी। इस मुद्दे को लेकर दाभोलकर तथा एम.ए.एन.एस. की वरिष्ठ साथी शालिनी ओक द्वारा बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई। इस याचिका पर अनेक बार सुनवाई हुई, परन्तु अत्यंत धीमी न्यायिक प्रक्रिया के चलते यह मामला पन्द्रह साल तक अटका रहा।

एक बार फिर इस जनहित याचिका की तरफ लोगों का ध्यान गया जब सबरीमाला से सम्बंधित इसी तरह की एक और जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई और नवम्बर 2015 में एक महिला द्वारा शनि सिगनापुर के पवित्र स्थल पर पूजा आदि सम्पन्न की गई। महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस रोक के खि‍लाफ इसी सप्ताह एक राज्य स्तरीय विरोध आयोजित किया और जनहित याचिका के मामले में जल्दी सुनवाई के लिए एक याचिका दायर की गई। पिछले सप्ताह एडवोकेट नलिनी वर्तक द्वारा इसी मुद्दे को लेकर एक अलग जनहित याचिका भी दायर की गई और एम.ए.एन.एस. की याचिका को भी इसी के साथ जोड़ दिया गया। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय इसी जनहित याचिका के सन्दर्भ में आया है।

इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बात है कि इसी भेदभाव पर हाजी अली दरगाह को लेकर दो मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिका। मुझे लगता है कि‍ इस जनहित याचिका को जितना ध्यान मिलना चाहिए था, उतना मिला नहीं। मुस्लिम महिलाओं का दरगाह के खि‍लाफ इस तरह जनहित याचिका के लिए आगे आने का निर्णय ऐतिहासिक है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी स्वीकार किया है कि यह प्रेरणा उन्हें शनि सिगनापुर से संबंधित जनहित याचिका से मिली थी। दाभोलकर हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु हाल ही में हुए संघर्ष के दौरान एम.ए.एन.एस. ने इस मुद्दे को तार्किक परिणिति तक ले जाने की पूरी कोशिश की है।

न्यायिक लड़ाई में बहुत लम्बा समय लगा, परन्तु इसने कुछ लोगों को इस दौरान शिक्षित भी किया। उदाहरण के लिए शिव सेना और बीजेपी ने पलटी खाते हुए वर्ष 2011 में कोल्हापुर के महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सफल मुहिम चलाई थी।

यह एक तरह का आदर्श न्याय (poetic justice) ही कहा जाएगा कि जिन लोगों ने सन् 2000 में महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर दाभोलकर का विरोध किया था, उन्हीं के द्वारा सन् 2011 में इस मुद्दे के पक्ष में मुहिम चलाई गई। अब तो आर.एस.एस. तक खुलेआम इस मुद्दे को अपना समर्थन दे रही है।

दाभोलकर कहा करते थे कि यदि हम किसी भी मुद्दे को लेकर समाज के भीतर लगातार अपनी बात करते रहें तो समाज की गुणात्मक व्यवस्था में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। इन दिनों इस मुद्दे को लेकर यही सब महसूस किया जा सकता है।

कुछ अत्यंत उग्र तत्वों और उन समूहों को छोड़कर जिनके आर्थिक हित सीधे तौर पर जुड़े हुए है। जैसा कि शनि सिगनापुर के ट्रस्ट का मामला है, जहाँ यह मुद्दा धर्म से अधिक स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, बाकी समाज की मुख्यधारा में बहुत कम समूह हैं, जो इस आंदोलन के विरोध में हैं, क्योंकि इन दिनों लैंगिक समानता लगभग स्वीकार्य है।

महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश करने से रोकना पूर्वाग्रह के साथ- साथ असंवैधानिक भी है। इसके बावजूद इस असमानता को विभिन्न हलकों से सहयोग मिल रहा है। क्या यह आधुनिक भारत और उदारवादी महाराष्ट्र का मज़ाक उड़ाना नहीं है? वास्तव में यह महाराष्ट्र की उदारवादी सोच की परम्परा पर हमला है। आपके पिता तथा गोविन्द पानसरे दोनों की हत्या मूलत: विचारधारा, तर्क और धर्म की रचनात्मक आलोचना पर हमला है?

इन दिनों यह एक मिथक है कि महाराष्ट्र एक उदार राज्य है। अधिक-से-अधिक हम यही कह सकते हैं कि यह एक उदार राज्य था। हम इसे किस मुँह से उदार कह सकते हैं, जब दिनदहाड़े दाभोलकर और कॉमरेड पानसरे की हत्याएं की गई हों और सालों बाद भी हत्यारों का कोई पता नहीं चल सका हो। यह बेहद दु:खद है कि यह धरती न सिर्फ महात्मा फुले, छत्रपति शिवाजी महाराज और डॉ अम्बेडकर की जन्मभूमि है, बल्कि नाथूराम गोडसे और अन्य धार्मिक कट्टर संगठनों की भी जन्मस्थली है, जो सम्भवत: दाभोलकर, कॉमरेड पानसरे और प्रो. कलबुर्गी के हत्यारे हैं। अपने नेतृत्वकर्ताओं को खोने के बावजूद एम.ए.एन.एस. जैसे संगठन महाराष्ट्र के उदारवादी चरित्र और धर्मनिरपेक्ष परम्परा को जीवित रखने के लिए कठिन संघर्ष कर रहे हैं।

आपने कहा था कि आर.एस.एस. और बीजेपी तथा दक्षिणपंथी विचारधारा से लैस अन्य संगठनों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत सुविधाजनक विरोध का रास्ता है और जरूरत इस बात की है कि इन संगठनों को इनके कृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। कृपया इस बात की हाल ही में आए न्यायालय के फैसले, तर्कशीलता और धर्म की रचनात्मक आलोचना के सन्दर्भ में व्याख्या करें?

यह सच है। किसी भी सामाजिक आंदोलन के बारे में एक आत्मश्लाधापूर्ण विकल्प के बारे में सोचना बहुत आसान काम है। परन्तु एक राजनीतिक कालखण्ड में जहाँ बीजेपी जो योजनाबद्ध रूप से साम्प्रदायिक है और कांग्रेस जो व्यावहारिक रूप से सांप्रदायिक है और इन दोनों दलों के बीच इस देश का आम नागरिक पिस रहा हो, तब इस तरह की लम्बी लोकतान्त्रिक लड़ाई का रास्ता ही एक मात्र विकल्प के रूप में बचता है।

हम इस बात को लेकर सचेत हैं कि हाल ही में आया न्यायलय का फैसला महज शुरुआत है। इस फैसले के बाद की घटनाओं को यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमें अपने संघर्ष को जारी रखना होगा ताकि किसी भी अन्य धार्मिक स्थल पर लैंगिक आधार पर भेदभाव न हो सके। यही नहीं संगठित धर्म द्वारा जारी शोषण के खि‍लाफ भी आमजन को शिक्षित करना होगा तथा धर्म की रचनात्मक आलोचना के प्रति सचेत करने की दिशा में भी काम करना होगा।

फ्रंटलाइन (फरवरी अंक) से साभार
अनुवाद : मणि मोहन

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चों को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

नई दि‍ल्ली : 31 जुलाई 2016 को कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती को पहली बार प्रथम विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया। पांच केन्द्रों इलाहाबाद, झाल्डा, मसूदा, रालेगांव और सालिपुर में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए गए। इनमें मुख्यतौर पर सत्यजीत रे द्वारा निर्मित फीचर फिल्म सद्गति व पूस की रात दिखाई गई। बच्चों ने कहानियों का पाठ किया, चित्र बनाए, उनकी प्रदर्शनी लगाई गई और नाटक भी किए। हालांकि यह ऐसा पहला मौका था, जब विज्ञान केन्द्रों को इस तरह का कोई आयोजन कि‍या गया, लेकिन सभी ने पूरे उत्‍साह से कार्यक्रमों में भाग लि‍या। वि‍शेष रूप से बच्‍चे बढ़चढ़कर आयोजन का हि‍स्‍सा बने। इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता यह है कि‍ इससे विज्ञान के साथ-साथ समाज के प्रति भी बच्चों के सकारात्मक नजरिये को विकसित किया जा सकता है। केंद्रों की कार्यक्रम की रि‍पोर्ट-

झाल्दा कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर पर किया गया, जिसमें 43 बच्चों की भागेदारी रही। सभी बच्चों को सत्यभान व केशब ने दो कहानियां पढ़कर सुनाईं। उन पर बात की और उन कहानियों पर चित्र बनाने के लिए कहा। सभी ने चित्र बनाए। बच्चों ने खुद जज करके कुछ बेहतरीन चित्रों को चुना, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी दिए गए। बाकी सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए। बिजली न होने के कारण फिल्म का शो नहीं हो पाया।

सालिपुर  कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर में किया गया, जिसमे 12 बच्चों ने हिस्सा लिया। कई बच्चे प्रेमचंद के बारे में नहीं जानते थे। उन्‍हें प्रेमचंद के जीवन और रचनाकर्म के बारे में बताया गया। सद्गति फिल्म दिखाई गई।

मसूदा मसूदा ब्लॉक में दो जगह बाल विज्ञान खोजशाला मसूदा व बाल विज्ञानं खोजशाला नगर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दोनों जगह कुल 62 (56 बच्चे, 5 अभिभावक व 1 अध्यापक) लोगों ने भागेदारी की। प्रेमचंद की तीन कहानियां पढ़ी गईं। उन पर चर्चा की गई व बच्चों ने चित्र बनाए। इसके अलावा दोनों ही जगह सद्गति फिल्म के शो हुए।

इलाहाबादयहाँ दो जगहों पर कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम श्रीमती लखपती देवी जूनियर हाई स्कूल बिरौली बेरुवा कौशाम्बी में हुआ। यहां कुल 127 लोगों ने भागीदारी की। दूसरा कार्यक्रम साइंस सेंटर पर हुआ, जिसमे कुल 27 लोगों की भागीदारी रही। मुंशी जी की कथा और उपन्यास के गँवई परिवेश से जुड़े पात्रों को 22 बच्चों ने अपनी  चित्रकारी से प्रदर्शित किया। इतना ही नहीं बच्चों ने प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह, पूस की रात, घास वाली और बलि‍दान आदि कहानियां सुनाईं। इसके अलावा लोगों को सत्यजीत राय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सद्गति एवं पूस की रात’ भी दिखाई गई।

रालेगांव कार्यक्रम का आयोजन ब्रह्मगुप्‍त साइंस सेंटर रालेगांव, बाल विज्ञान शोधिका डोंगरखरडा और बाल विज्ञान शोधिका हिंगनघाट तीन जगह किया गया। इनमें कुल 35 बच्चों की भागीदारी रही।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में बच्चों को जानकारी दी गई जिस के आधार पर बच्चों ने चित्र बनाए।

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

kamal joshi,school

दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

शहरयार से एक मुकम्मल मुलाक़ात : संजीव ठाकुर

Shahryar

ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत उर्दू शायर शहरयार की प्रसिद्धि उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से पहले से ही रही है । उनकी शायरी उर्दू से बाहर– विशेष रूप से हिन्दी के पाठकों के बीच अरसे से पढ़ी–सुनी जा रही है । हालांकि एक सच और है कि शहरयार की प्रसिद्धि में चार चाँद लगाने का काम उनकी उन ग़ज़लों ने किया है जो उन्होंने  फिल्मों– खासकर ‘उमराव जान’ के लिए लिखीं थीं । फिल्म का असर समाज पर ज्यादा व्यापक पड़ता है इसलिए शहरयार का नाम भी ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ा । लेकिन  शहरयार नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बने । उन्हें ‘उमराव जान’ के गीतकार के रूप में स्वयं का परिचय देने में परेशानी भी होती थी । प्रेम कुमार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है– “पहले इस इंटरोडकशन पर कि मैंने उमराव जान के लिए गाने लिखे हैं, मुझे उलझन होती थी। लेकिन अब मैंने इस उलझन पर काबू पा लिया है। कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मैं अपनी अदबी अहमियत की वजह से फिल्म में गया था- और अब अदब में फिल्म की वजह से वापस आ रहा हूँ।“ (पृ.69)

शहरयार साहब ने ऐसी अनगिनत बातें की हैं प्रेम कुमार को दिए साक्षात्कारों में! प्रेम कुमार ने उन साक्षात्कारों को ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार’ नाम से संकलित कर दिया है। वैसे तो इस किताब में संकलित तीन लंबे साक्षात्कारों से शहरयार साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व की काफी बातें निकलकर सामने आती हैं, लेकिन सन 2011 के आठ महीनों की कई बैठकों में कभी किसी, तो कभी किसी मुद्दे पर शहरयार साहब से बात कर तिथिवार जो सामग्री प्रेम कुमार ने प्रस्तुत की है, उसमें शहरयार साहब के जीवन, उनके परिवेश, उनके घर-परिवार, उनके साहित्य आदि की अनेकानेक बातें कभी सायास तो कभी अनायास पाठकों के सामने आ गई हैं। साक्षात्कार करने की प्रेम कुमार की खासियत है कि बहुत कम पूछकर वह किसी से बहुत अधिक कहलवा लेते हैं। प्रेम कुमार की यह खासियत इस किताब में भी बखूवी दिखाई दे जाती है। बहुत ही शालीनता से प्रेम कुमार वैसे सवाल भी पूछ डालते हैं, जिन्हें पूछने में आम-तौर पर किसी को झिझक हो सकती है। मसलन सेक्स, स्त्री-पुरुष संबंध, समलैंगिकता, विवाहेतर संबंध आदि से जुड़े सवाल! जवाब देने वाले शायर शहरयार की ईमानदारी की बात भी कबूल करनी पड़ेगी कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से सवालों के जवाब दिए हैं। अपने बारे में कही उनकी यह बात काबिले गौर है- “सेक्स की जानकारी मुझे बहुत कम उम्र में हो गई थी। ये मेरी बहुत कमजोरी रही। मैं बहुत इमेजिनेटिव था। जिस्म मुझे अट्रेक्ट करता रहा। अच्छी ज़िंदगी गुजारने का बहुत शौक रहा। यही कि अच्छा खाना, अच्छा पहनना, ताश खेलना…! शराब पीना बहुत जल्दी शुरू कर दिया था।“ (पृ.36)

इसी तरह अपनी पत्नी से अलगाव की बात भी वह बड़े आराम से कह जाते हैं। (पृ.75) पत्नी पर बिना किसी दोषारोपण के जिस तरह वह इस हकीकत का बयान करते हैं, वह उनके बड़प्पन का एहसास कराए बिना नहीं रहता। प्रेम कुमार तो उनसे दूसरी शादी के बारे में भी सवाल पूछने से नहीं चूकते! इसके जवाब में वह अपना ही शेर प्रेम कुमार को सुना देते हैं- “बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया/हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया।“

इस किताब को पढ़कर शहरयार साहब के बचपन, घर-परिवार, पिता, बच्चे, मित्र आदि के बारे में पता चलता ही है, धर्म, ईश्वर, आम-आदमी, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री आरक्षण बिल, विश्वविद्यालय, समकालीन साहित्यकारों, हिन्दी के साहित्यकारों आदि के बारे में भी उनके विचारों का पता चल जाता है। मंचों पर शायरी कम पढ़ने के बारे में भी उनका एक खास तर्क था। मंच पर पापुलर शायरी पढ़ने को वह अच्छा नहीं मानते थे- “बहुत पापुलर करना वल्गराइज़ करना भी हो जाता है बहुत बार!” (पृ.26)

शहरयार साहब ने गज़लों से ज्यादा नज़्मो को अपनी शायरी में महत्त्व दिया था, लेकिन लोग उन्हें गज़लकार ही ज्यादा मानते थे। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था- “आमतौर से जब मेरी शायरी पर बात की जाती है तो आम लोग गज़ल को ही सामने रखते हैं… जबकि मैंने नज़्में गज़लों से ज्यादा लिखी हैं और नयी उर्दू शायरी के सिलसिले में मेरा ज़िक्र मेरी नज़्मों के हवालों से ज्यादा किया जाता है।“ (पृ.64)

और जब प्रेम कुमार शहरयार साहब से उनके ‘साहित्यिक प्रदेय’ के बारे में पूछते हैं तो वह बड़ी विनम्रता से कहते हैं- “हिन्दोस्तान और दुनिया में इतने बड़े-बड़े लोग…. कारनामे करने वाले लोग पैदा हुए हैं…। उस पर… हम अपनी ढपली बजाते रहें…। हमारी क्या विसात… समंदर में कतरा! ऊपर से देखिए…. नुक्ता-नुक्ता नज़र आता है आदमी! नीचे से आप देखते रहें…आईना सामने रखकर खुद को देखते हैं और बड़ा समझते हैं। मगर सच तो यह है…जैसा यगाना चंगेजी का एक शेर है….

‘बुलंद हो तो खुले तुझपे राज़ पस्ती का
इस ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या-क्या!’

इस किताब में एक लंबा साक्षात्कार पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज पर भी है। इस साक्षात्कार में फैज के बार में शहरयार साहब ने कई महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। एक प्रस्तुत है-“हाँ, हाँ, मेरी उनसे बारहा मुलाक़ात हुईं। बहुत ही निजी तरह की महफिलें। उन मुलाकातों में कभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की समस्याओं या रिश्तों वगैरह पर बातें नहीं हुआ करती थीं। वो यहाँ या वहाँ के मसायलों के बारे में कभी गुफ्तगू नहीं किया करते थे। वो कहते थे कि हम तो भाई मुहब्बत के सफ़ीर हैं। और इसके अलावा कुछ सोचते नहीं। उनकी पूरी शायरी में भी कोई ऐसी फीलिंग नहीं है जिसमें नफरत, जंग की हिमायत, दूरी फैलाने या फासला पैदा करने वाला कुछ हो। ऐसा कुछ दूर-दूर तक वहाँ नहीं है।“ (पृ.81)

इस किताब की एक और खासियत है कि इसमें प्रेम कुमार ने शहरयार साहब की चुनी हुई शायरी भी पेश कर दी है। इससे यह किताब शहरयार साहब की शायरी से अनजान पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी बन गई है। शहरयार साहब के व्यक्तित्व, उनके जीवन, उनके विचार वगैरह के साथ-साथ उनकी शायरी को पढ़कर पाठक शहरयार साहब से एक मुकम्मल मुलाक़ात इस किताब के जरिये कर सकते हैं। शहरयार साहब के ज्ञानपीठ मिलने के बाद उनसे हुई मुलाक़ात और उनकी मृत्यु के बाद का विवरण भी प्रेम कुमार ने इस किताब में प्रस्तुत कर दिया होता तो यह किताब शहरयार साहब की और मुकम्मल तस्वीर पेश करने में कामयाब होती !

पुस्तक : बातों–मुलाकातों में शहरयार
साक्षात्कारकर्ता : प्रेम कुमार
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ल
मूल्य : 395 रुपये            

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।