Archive for: July 2016

खेल : प्रेमचंद

premchand

तीसरा पहर हो गया था। किसान अपने खेतों में पहुँच चुके थे। दरख्तों के साये झुक चले थे। ईख के हरे-भरे खेतों में जगह-जगह सारस आ बैठे थे। फिर भी धूप तेज थी और हवा गरम। बच्चे अभी तक लू के खौफ से घरों से न निकलने पाए थे कि यकायक एक झोंपड़े का दरवाजा खुला और एक चार-पाँच साल के लड़के ने दरवाजे से झाँका। झोंपड़े के सामने नीम के साये में एक बुढिय़ा बैठी अपनी कमजोर आँखों पर जोर डाल-डालकर एक टोकरी बुन रही थी। बच्चे को देखते ही उसने पुकारा, ”कहाँ जाते हो,  फुन्दन? जाकर अन्दर सोओ, धूप बहुत कड़ी है। अभी तो सब लड़के सो रहे हैं।”

फुन्दन ने ठनककर कहा, ”अम्मा तो खेत गोडऩे गईं। मुझे अकेले घर में डर लगता हैं।”

बुढिय़ा गाँव भर के बच्चों की दादी थी, जिसका काम बच्चों की आजादी में बाधक बनना था। गढिय़ा के किनारे अमियाँ गिरी हुई थीं, लेकिन कोई बच्चा उधर नहीं जा सकता, गढिय़ा में गिर पड़ेगा। बेरों का दरख्त लाल और पीले बेरों से लदा हुआ हैं। कोई लड़का उस पर चढ़ नहीं सकता, फिसल पड़ेगा। तालाब में कितना साफ पानी भरा हुआ है, मछलियाँ उसमें फुदक रही हैं, कमल खिले हुए हैं, पर कोई लड़का तालाब के किनारे नहीं जा सकता, डूब जाएगा। इसलिए बच्चे उसकी सूरत से विमुख अप्रसन्न थे। उसकी आँखें बचाकर सरक जाने की युक्तियाँ सोचा करते थे। मगर बुढिय़ा अपने अस्सी वर्ष के तजुर्बे से उनकी हर एक हरकत को ताड़ जाती थी और कोई-न-कोई उपाय कर ही लेती थी।

बुढिय़ा ने डाँटा, ”मैं तो बैठी हूँ। डर किस बात का है? जा सो रह, नहीं तो उठती हूँ।”

लड़के ने दरवाजे के बाहर जाकर कहा, ”अब तो निकलने की बेला हो गई।”

”अभी से निकल के कहाँ जाओगे? ”

”कहीं नहीं जाता हूँ, दादी।”

वह दस कदम और आगे बढ़ा। दादी ने टोकरी और सूजा रख दिया और उठना ही चाहती थी कि फुन्दन ने छलाँग मारी और फिर सौ गज के फासले पर था। बुढिय़ा ने अब सख्ती से काम न चलते देखकर नरमी से पुकारा, ”अभी कहीं मत जा बेटा।”

फुन्दन ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ”जतीन को देखने जाते हैं।” और भागता हुआ गाँव के बाहर निकल गया।

जतीन एक खोमचेवाले का नाम था। इधर कुछ दिनों से उसने गाँव का चक्कर लगाना शुरू किया था। हर रोज शाम को जरूर आ जाता। गाँव में पैसों की जगह अनाज मिल जाता था और अनाज असल कीमत से कुछ ज्यादा होता था। किसानों का अंदाज हमेशा दानशीलता की ओर उन्मुख होता है। इसीलिए जतीन करीब के कस्बे से तीन-चार मील का फासला तय करके आता था। उसके खोंमचे में मीठे ओर नमकीन सेव, तिल या रामदाने के लडडू, कुछ बताशे और खुटिटयाँ, कुछ पट्टी होती थीं। उस पर एक मैला-सा फटा-पुराना कपड़ा होता था, मगर गाँव के बच्चों के लिए वह अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल था, जिसे खड़े होकर देखने के लिए सारे बच्चे बेताब रहते थे। इनकी बालोचित प्रसन्नता, तत्परता में यह एक दिलचस्पं इजाफा हो गया था । सब-के-सब तीसरे पहर ही से जतीन का इंतजार करने लगने लगते थे हालाँकि ऐसे खुशनसीब लड़के कम थे, जिन्हें इससे कोई लाभ पहुँचता हो। मगर खोंमचे के निकट जमा होकर थाल पर ढके कपड़े को आहिस्ता से उठते और उन नेमतों की रानियों की तरह अपनी-अपनी जगह संकोच से बैठे देखना स्वयं में बेहद खुशनुमा था। हालाँकि जतीन का आना हर एक घर में कुहराम मचा देता था। और आध घंटे सारे गाँव में हंगामा-सा उपस्थित हो जाता था, मगर बच्चे इसका स्वागत करने को अधीर रहते थे। यह जानते हुए भी कि जतीन का आगमन उनके लिए हँसी का नहीं, रोने का मैाका है। सब-के-सब बड़ी बेसब्री से उसके इंतजार में रहते थे, क्योंकि मिठाइयों के दर्शन से चाहे जबान संतुष्ट न हो, पर मन की तसल्ली जरूर होती थी। फुन्दन भी इन्हीं गरीब लड़कों में था। और लड़के मिठाइयाँ खाते थे, वह सिर्फ भूखी निगाहों से देखता था। रोने और रुठने, बालसुलभ मिन्नत और खुशामद, एक से भी उसकी उद्देश्य-पूर्ति न होती थी, गोया नाकामी ही उसकी तकदीर में लिखी हो। मगर इन नाकामियों के बावजूद उसका हौसला पस्त न होता था।

आज फुन्दन दोपहर को न सोया। जतीन ने आज कच्ची गरी और इमरतियाँ लाने का जिक्र किया था। यह खबर लड़कों की उस दुनिया में किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना से कम न थी। सुबह से ही जतीन की तरफ मन लगा हुआ था। फिर ऐसी आँखों मे नींद कहाँ से आती?

फुन्दन ने बाग में पहुँचकर सोचा- क्या अभी सबेरा हैं? इस वक्त तो जतीन आ जाता था, मगर नहीं, अभी सबेर है। चून्नू, सोहन और कल्लू एक भी तो नहीं उठे। जतीन सड़क पर पहुँच गया होगा। इमरतियाँ जरूर लाएगा, लाल और चिकनी होंगी। एक बार न जान कब… ‘हाँ’, दशहरे के मेले में एक इमरती खाई थी। कितनी मजेदार थी! उस जायके को याद करके उसके मुँह में पानी भर आया। लालसा और भी तेज हो गई। वह बाग के आगे निकल गया। अब सड़क तक समतल मैदान था, लेकिन जतीन का कहीं पता न था।

कुछ देर तक फुन्दन गाँव के निकास पर खड़ा जतीन की राह देखता रहा। उसके दिल में एक गुदगुदी उठी- आज मैं सबसे पहले जतीन को पुकारूँगा। मैं जतीन के साथ-साथ गाँव में पहुंचूंगा। तब लोग कितना चकराएँगे। इस ख्याल ने उसकी बेसब्री में और इजाफा कर दिया। वह तालियाँ बजा-बजाकर दिल-ही-दिल में चहकता हुआ सड़क की ओर चला।

संयोग से उसी वक्त गेंदा आ गया। यह गाँव का पंचायती कुत्ता था, चौकीदार का चौकीदार, खिलौने का खिलौना। नित्य नियमानुसार तीसरे पहर का गश्त लगाने निकला था। इसी वक्त साँड और बैल खेतों में घुसते थे। यहाँ पहुँचा तो फुन्दन को देखकर रुक गया और दुम हिलाकर गोया पूछा- तुम आज यहाँ क्यों आए? फुन्दन ने उसके सिर पर थपकियाँ दीं, मगर गेंदा को ज्यादा बातचीत करने की फुरसत न थी। वह आगे बढ़ा तो फुन्दन भी उसके पीछे दौड़ा। अब उसके दिल में एक ताजा उमंग पैदा हा रही थी। वह अकेला न था। उसका दोस्त भी साथ था। वह अब कच्ची सड़क पर जतीन का स्वागत करना चाहता था। सड़क पर पहुँचकर उसने दूर तक निगाह दौड़ाई। जतीन का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। कई बार उसे भ्रम हुआ, वहाँ जतीन आ रहा है, मगर एक लम्हें में उसका भ्रम टूट गया। सड़क पर दर्शनीय दिलचस्प चीजों की कमी न थी। बैलगाडिय़ों की कतारें थीं। कभी-कभी एक्के और पैर-गाडिय़ाँ भी निकल जाती थीं। एक बार एक ऊँट भी नजर आया, जिसके पीछे वह कई सौ कदम तालियाँ बजाता गया, मगर इन दिलचस्पियों में वह लालसा किसी मीनार की तरह खड़ी थी।

सड़क के किनारे आमने-सामने दो दरख्त खड़े थे। उनमें आम के दरख्त भी थे। इस लालसा में उसे आमों पर निशाना मारने का एक दिलचस्प खेल हाथ आया, मगर आँखें जतीन के लिए ठीक रास्ते पर लगी थीं। यह बात क्या है, आज वह आ क्यों नहीं रहा है?

धीरे-धीरे साया लम्बा होता गया। धूप किसी थके हुए मुसाफिर की तरह पाँव फैलाकर सोती हुई मालूम हुई। अब तक जतीन के आने की उम्मीद रही। उम्मीद में वक्त चला जाता था। मायूसी में वह गोया घुटने तोड़कर बैठ गया। फुन्दन की आँखों से निराशा के आँसू बहने लगे। हिचकियाँ बँध गईं। जतीन कितना बेरहम है! रोज आप ही दौड़ा आता था। आज जब मैं दौड़ा आया तो घर बैठ रहा। कल आएगा तो गाँव में घुसने न दूँगा। उसकी बालोचित आरजुएँ अपने सारे उत्साह के साथ उसके दिल को मथने लगीं।

सहसा उसे जमीन पर एक टूटा हुआ झब्बा नजर आया। इस निराशा और असफलता के आलम में बचपन की नैसर्गिक निश्चिंतता ने दु:ख दूर करने का सामान पैदा कर दिया। कुछ पत्तियाँ चुनकर झब्बे में बिछाईं। उसमें कुछ बजरियाँ और कंकड़ चुनकर रखे। अपना कुरता उतारकर उसको ढाँका और उसे सिर पर रखकर गाँव की और चला। अब वह जतीन को ढूँढऩे वाला लड़का न था, खुद जतीन था। वही अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल सिर पर रखे उसी तरह अर्थहीन आवाज लगाता हुआ, रफ्तार भी वही, बात करने का ढंग भी वही। जतीन के आगे-आगे चलकर क्या उसे वह खुशी हो सकती थी, जो इस वक्त जतीन बनकर हो रही थी, वह हवा में उड़ा जा रहा था- मृगतृष्णा में हकीकत का मजा लेता हुआ, नकल में असल की सूरत देखता हुआ। खुशी के कारण से किस कदर निस्पृह है। इसकी चाल कितनी मस्तानी थी। गुरूर से उसका सिर कितना उठा हुआ था!

यथार्थत: उसके बालोचित चेहरे पर ऐसी स्वाभाविकता थी कि क्या मजाल कि जरा भी हँसी आ जाए। इस शान से वह गाँव में दाखिल हुआ। लड़कों ने उसकी आवाज सुनी, ”रेबड़ी कड़ाकेदार!” और सब-के-सब दौड़े आन-की-आन में। फुन्दन उत्सुक सूरतों से घिरा हुआ है, उसी तरह जैसे जतीन घिर जाया करता था। किसी ने न पूछा, ‘यह क्या स्वाँग हैं?’ दिल ने दिल की बात समझी। मिठाइयों की खरीद होने लगी। ठीकरों के पैसे थे, कंकड़ और बजरियों की मिठाई। इस खेल में लुत्फ कहीं ज्यादा था। भौतिकता में आध्यात्मिकता का अंदाज कहाँ, मुसर्रत कहाँ, उडऩे का अनुभव कहाँ!

मुन्नू ने एक ठीकरा देकर कहा, ”जतीन, एक पैसे की खुट्टियाँ दे दो।”

जतीन ने एक पत्ते में तीन-चार कंकड़ रखकर दे दिए।

खुट्टियों में इतनी मिठास, इतना स्वाद कब हासिल हुआ था!

(लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त पुस्तक ‘प्रेमचंद : बच्चों की कहानि‍यां’ से साभार)

जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा : ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

इसे एक पहेली ही माना जाना चाहिए कि स्मृति पर इधर पड़ते उत्तरोत्तर निर्मम प्रहारों के चलते जब सुबह तय की गई कोई जरूरी बात शाम तक मलिन और पस्त हालत में बच जाने पर राहत और हैरानी देने लगी है तब, प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’ कहानी के तन्तु 34-35 वर्ष बाद कैसे जेहन में बचे पड़े रह गए हैं? कक्षा सात या आठ की बात रही होगी। कोर्स में ‘ईदगाह’ थी। तब हमें न तो कविता, कहानी से कोई वास्ता होता था न उसके लेखक से। खेती-क्यारी करने के बीच पढ़ाई ऐसा जरूरी व्यवधान थी, जिसमें खेती-क्यारी से मुक्ति की संभावनाएं छिपी थीं। परीक्षा में ज्यादा नहीं, ठीक-ठाक नम्बर मिल जाएं। बाकी लेखक या उसके सरोकारों से किसी को क्या वास्ता? होते होंगे किसी परलोक के जीव, जो पहले तो लिखते हैं और फिर अपने लिखे से दूसरों पर बोझ चढ़ाते हैं। पता नहीं किस परम्परा के तहत लेखक की लघु जीवनी सी रटनी होती थी… आपका जन्म सन अलाँ-फलाँ को अलाने प्रदेश के फलाने गाँव में हुआ, आपकी शिक्षा बीए-सीए तक हुई, आपकी प्रमुख कृतियों के नाम हैं… आपकी रचनाओं में तत्कालीन समाज की झांकी प्रस्तुत होती है। सन इतने में आपका निधन हो गया…।

सारी विद्या चौखटेबद्ध और रटंत।

इसी सब के बीच जब प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ पढ़ी तो पहली बार ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जो पढ़ाई से सरासर अनपेक्षित था। नाम और परिवेश ही तो कुछ अलग थे वर्ना सब कुछ कितना अपना-अपना सा था। हिन्दू बहुल हमारे गाँव में मुस्लिम परिवार चार-छह ही थे, मगर दूसरे भूमिहीनों की तरह पूरी तरह श्रम पर आश्रित और इतर समाज में घुले-मिले। विनय और शील की प्रतिमूर्ति। लिबास और चेहरे-मोहरे से थोड़ा मुसलमान होने का शक पनपे अन्यथा जुबान में भी वैसा जायका नहीं था। गाँव में मस्जिद नहीं थी इसलिए ईद के रोज तीन कोस दूर बसे कस्बे ‘पहासू’ जाना पड़ता था। उसके सिमाने पर अजल से तैनात एक भव्य, भक्क सफेद मस्जिद गाँव से ही दिखती थी। इसी के बरक्स तो लगा कि ईदगाह हमारे गाँव के, हमारे साथ खेलते-कूदते अकबर, वजीरा, बशीरा या अहमद खाँ की कहानी है। यूँ हमारे गाँव में बृहस्पतिवार के दिन साप्ताहिक हाट लगती थी, जिसमें हम बच्चों को पड़ाके (गोल-गप्पे), चाट-पकौड़ों के साथ प्लास्टिक के खिलौने देखने-परखने को मिल जाते थे, मगर कस्बे के लाव-लश्कर, तड़क-भड़क और भीड-भड़क्के के मुकाबले वह सब नितान्त फीका और दोयम था। एक अकिंचन परिवार के प्रसंग से शुरू होकर ‘ईदगाह’ उसी कस्बे की रंगत में गो उंगली पकड़कर हामिद के साथ मुझे सैर कराने ले गई… रास्ते में आम और लीचियों के पेड़, यह अदालत है, यह कॉलेज, हलवाइयों की दुकानें, पुलिस लाइन… हरेक का स्पर्शरेखिक संदर्भ देकर कहानी अपने उदात्‍त मकाम की तरफ इस सहजता से आगे बढ़ती है मानों उसे अपने पाठकों पर पूरा यकीन हो कि उसके संदर्भों को वे अपनी तरह से जज्ब करने को स्वतंत्र रहेंगे। कुछ हद तक कहें तो यहाँ बात ईद या ईदगाह की नहीं है; वह तो जैसे एक माध्यम है, ग्रामीण कस्बाई समाज के संदर्भों को उकेरते हुए एक मूलभूत मानवीय रचना को पैबस्त करने का। ईद यानी उत्सव।

कोई तीज-त्योहार निम्न-मध्य वर्गीय समाज में कितनी उत्सवधर्मिता के साथ प्रवेश करता है, उसकी कितनी बाह्य और आन्तरिक छटाएं होती हैं, यह हम कहानी पढ़ते हुए लगातार महसूस करते रहे। ‘सालभर का त्योहार है’ जैसे जुमले-फलसफे की अहमियत अन्यत्र नहीं समझी जा सकती है। उसी के साथ अमीना का मन जब बेसबब आ धमकी ‘निगोड़ी ईद’ से ‘मांगे के भरोसे’ के साथ दो-चार होता है तो वह सारा परिवेश अपनी उसी शालीन क्रूरता के साथ पेश हो उठता है, जिससे हमारा गाँव-समाज किसी महामारी की तरह आज भी पीड़ित है। आज की स्थितियों के उलट उस कैश-स्टार्व्ड दौर में मेरा मन हामिद के साथ एकमएक होते हुए उन तमाम बाल-सुलभ लालसाओं और प्रतिबंधित आकर्षणों से मुक्त नहीं हो पाता था, जिसके संदर्भों के विपर्यास के बतौर कहानी आकार लेती है। आपातकाल से जरा पहले के उस वक्त में एक या डेढ़ रुपये (जो पचास वर्ष पूर्व हामिद के तीन पैसे ही बनते) के सहारे पूरे बाजार का सर्वश्रेष्ठ निगल डालने की हसरत कितने असमंजसों और ग्लानियों का झूला-नट बनती होती थी, उसे याद करके आज हंसी और कंपकंपी एक साथ छूटती है। दस पैसा के तो खांगो पड़ाके, पच्चीस पैसा में मिलंगी दो केला की गैर (‘गैर’ आज कौन कहता है ?) पचास पैसे को कलाकन्द, पच्चीस पैसा की गुब्बारे वाली पीपनी, गाँव में हिंडोला कहां आवे है सो एक चड्डू तो… और एक चिलकने का चश्मा।

ठहरो ठहरो मियां, बजट बिगड़ रहा है।
क्या करूं, किसे छोड़ूं ?
चलो, केला केन्सिल।
नहीं, नहीं एक तो ले लूं।

मगर वह नामुराद एक केला के पंद्रह पैसे ऐंठता है। साढ़े बारह बनते हैं, भाई तू तेरह ले ले। खैर कोई बात नहीं, अपन के पास कभी ढेर सारे पैसे हुए न तो दोनों टैम केले ही खाया करूंगा। तंगहाली में ये जुबान मरी कितनी चुगली करती है। रेवड़ी भी चाहिए, गुलाब-जामुन और सोहन हलवा भी। बाल-मन के कितने भीतर तक घुसा है, यह तिकौनी मूंछों वाला लेखक। हामिद से चिमटा जरूर खरीदवा लिया है, मगर इतने सजे-धजे बाजार में लार तो उसकी जरूर टपकी होगी। लिखा ही तो नहीं है बाकी जो पंक्तियों के बीच से झांक रहा है, वह कुछ कम बयान कर रहा है।

कक्षा में जब कहानी खत्म हुई तो मास्साब ने पूछा – कहानी का शीर्षक ‘ईदगाह’ क्यों है ? ये क्या बात हुई मास्साब। लेखक को यही शीर्षक अच्छा लगा इसलिए। नहीं। यह ईदगाह में आकर ईद मनाते लोगों के बारे में है, इसलिए। नहीं, यह हमारे भीतर ईदगाह सी पाक और मजबूत भावनाओं के बारे में है, जो तमाम अकिंचन और विषम परिस्थितियों के बीचोंबीच रहकर भी अपना वजूद नहीं खोने देती है। कभी मरती नहीं है, हारती नहीं है। यही हैं प्रेमचंद। अमीचन्द- मास्साब बिल्कुल सही कह रहे हैं सतपाल। अरे सतपाल, एक बात कहूँ। ये जो लेखक है ना प्रेमचंद, इनकी शक्ल गाँव के हमारे बाबूलाल ताऊ से एकदम मिलती है। कसम से।

किताबों की दुनिया में जीवन के अक्स निहारती उस कच्ची उम्र में बाबूलाल ताऊ की भूमिका अपनी जगह बनाती जा रही थी। हमारे जीते जी मानो सदियों से वे एकसा, खरहरा जीवन और जीवनचर्या पहने चले आ रहे थे… कमर में कमान सा झुकाव, बिवाइयाँ जड़े चपटे निष्ठुर पैर, खिचड़ी बेगरी दाढ़ी और चलते समय बाजुओं का बैक-लॉक। बोली में हतकाय-हतकाय यानी इसलिए के आदतन बेशुमार प्रयोग के बावजूद बाबा आदम के समय से चले आ रहे उनके किस्सों में हमें भरपूर कथारस और रोमांच मिल जाया करता था।

एक रोज उन्होंने हीरा-मोती नाम के दो बैलों की कथा छेड़ दी… कि कैसे वे मन-ही-मन एक-दूसरे की बात समझ जाते थे, अपने मालिक (झूरी) से कितना प्यार करते थे, कैसे उन्होंने किसी दूसरे (गया) के घर पानी-सानी ग्रहण करने से इन्कार कर दिया, कैसे एक बिजार (सांड) के साथ संगठित होकर लड़े, कैसे सींग मार-मारकर मवेशी खाने की दीवार में छेद करके छोटे जानवारों को मुक्ति दिलाई और कैसे वे वापस अपने ठीये पर लौट आए। रवायती अन्दाज के बावजूद लगा कि ताऊ ने इस बार कुछ अलग और ज्यादा अपनी-सी कहानी सुनाई है। फितरत मासूमियत और तेवर के स्तर पर यह कहानी दो बैलों की है या दो बच्चों की ? या अभावों-पराभवों के बीच उम्र गुजारते उन तमाम निरीह असंख्यों की जिन्हें नियति और मूल्यों पर भरोसा है, मगर जिनका वजूद हीरा-मोती जैसे बेजुबानों सा है। जिन्दगी जिन्हें दर रोज के हिसाब से दुलत्ती जड़ती है और जिसे किस्मत का लेखा समझकर वे कबूल करते चलते हैं। यह निराशावादी नहीं, जीवन को उसके नग्न यथास्वरूप में स्वीकार करने का फलसफा है। ‘पड़ने दो मार, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे’ यह मानो हीरा नहीं मास्टर हीरालाल कह रहे हैं, जो विवाह के सात वर्ष बाद विधुर हो गए और कुछ वर्ष बाद जब दूसरा विवाह किया तो पहले विवाह से उत्पन्न बड़ा लड़का घर छोड़कर भाग गया। मालकिन की लड़की से उन्हें हमदर्दी है कि कहीं खूंटे से भगा देने के इल्जाम में सौतेली माँ से न पिटे। लड़ाई में जब सांड बेदम होकर गिर पड़ा तो मोती उसे और मारना चाहता है मगर हीरा की बात कि ‘गिरे हुए बैरी पर सींग नहीं चलाना चाहिए’ ग्रामीण और महाभारतीय संस्कारों के आगोश में वॉइस ऑफ सेनिटी की तरह फैसलाकुन हो जाती है। ग्लोबलाइजेशन और उससे जुड़ी सांस्कृतिकता से कोसों पहले के उस साठोत्तरी काल और अपने लड़कपन के उस दौर में श्वेत-श्याम मानसिकताओं के पहलुओं को रेखांकित-दर्ज करती इस कहानी में बाद में पता लगा लेखकीय आदर्शवादी यथार्थ चाहे भले हो, मगर मिथकीय पात्रों के बावजूद यह कहानी के उस सर्वप्रमुख गुण यानी पाठकीय कौतूहल की भरपूर आपूर्ति करती जा रही थी, जो इन दिनों लिखी जा रही अनेक कहानियों में पुरानी शुष्क गांठ की तरह अटकता है। कहानी की शुरूआत में गधे और सीधेपन को लेकर जरूर संक्षिप्त आख्यान सा है, मगर वह इंजैक्शन लगाने से पूर्व स्प्रिट से त्वचा को तैयार किए जाने जैसा ही है। और भाषा तो ऐसी कि बच्चा पढ़े तो सरपट समझता जाए और बूढ़ा पढ़े तो उसके काम का भी खूब असला निकले। खुदरा वादों-विवादों की किस दौर में कमी रही है, लेकिन अपने रचे-उठाए पात्रों और उनकी स्थितियों को लेकर कहानीकार की निष्ठा अडिग तरह से पवित्र और सम्पन्न खड़ी दिखती है।

आदर्शोन्मुखी नैतिकता की चौतरफा मंडराती हवा में दूसरी शक्ति कदाचित फिर भी नहीं होती कि खेत-खलिहान और ढोर-डंगरों को सानी-पानी देने के बीच मिले अवकाश में पाठ्यक्रम के अलावा कुछ और पढ़ने को विवश हो जाते (मानस का गुटका और ‘कल्याण’ के अंक इसकी चौकसी में तैनात थे) बशर्ते कि उस ‘पढ़ाई’ में आनन्द का इतना स्वभावगत पुट न होता कि प्रेमचन्द नाम के महाशय की जो कहानी जब जहां मिल जाए, मैं उसे निगल डालने को लालायित रहता। ‘पंच-परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘पूस की रात’, ‘दूध का दाम’, ‘मंत्र’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी अनेक कहानियाँ उस सिलसिले में चिन दी गईं।

उपन्यास जरूर देर से पढ़े, लेकिन कोर्स में कोई था ही नहीं और लाइब्रेरी जैसी चिड़िया तो दूर-दूर तक नहीं थी।

प्रेमचन्द की कहानियों को लेकर एक आदिम अतृप्ति भाव तो अलबत्ता आज भी बना हुआ है।

 

बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं : दिनेश कर्नाटक

shekshik dakhal

इस बार मई माह में देहरादून में प्राथमिक शि‍क्षकों के मॉड्यूल निर्माण हेतु आयोजित एक कार्यशाला में प्रतिभाग किया। वहां एस. सी. आर. टी., उत्तराखंड की प्रवक्ता हेमलता तिवारी हमारे समूह की संयोजक थीं। हेमलता दीदी उत्साही शि‍क्षक प्रशि‍क्षिका हैं। उनकी शि‍क्षण प्रक्रिया तथा बाल मनोविज्ञान को लेकर समझ साफ है। जब समझ साफ होती है तो आत्मविश्वास होना स्वाभाविक है। हेमलता दीदी समूह के समक्ष हंसते-मुस्कराते हुए आतीं। खुलकर बातें करती। इसका असर यह होता कि प्रतिभागी जबरदस्ती ओढ़ी जाने वाली गंभीरता से मुक्त होकर सहज हो जाते और अपनी बात खुलकर कहने लगते। अपने इस अंदाज से हेमलता दीदी कटे-कटे रहने वाले प्रतिभागियों को भी बगैर कुछ कहे कार्य करने के लिए प्रेरित करतीं। एक ओर जहां वे माहौल को बिलकुल सहज बना देती थीं, वहीं अपनी कार्ययोजना पर दृढ़ता तथा गंभीरता से काम करतीं। इस प्रकार वे अपने शैक्षणिक उद्देश्‍य की ओर तेजी से बढ़ती जातीं।

इस उदाहरण से एक बात स्पष्‍ट है कि सीखना-सिखाना भयमुक्त, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल में ही अच्छा हो सकता है। भयभीत तथा तनावग्रस्त शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं अपने विद्यार्थियों को प्रेरित नहीं कर सकते। वे उन्हें भय और तनाव ही दे सकते हैं। परिवार तथा शि‍क्षा से जुड़े लोगों का यह दायित्व है कि वे अपने आस-पास सहज, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल की रचना करें। अच्छा शि‍क्षण; अच्छी कहानी, अच्छी कविता तथा अच्छे गीत की तरह विद्यार्थी में आत्मविश्‍वास पैदा करता है। उसे बोलने, भागीदारी तथा प्रश्‍न करने के लिए प्रेरित करता है। बच्चों के मूल्यांकन की एक बड़ी कसौटी उनका मौलिक प्रश्‍न करना है। पढ़े हुए को उगल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि पढ़े हुए से प्रश्‍नों का जन्म लेना। अगर एक शि‍क्षक के पढ़ाने के बाद बच्चे सवाल करने लगते हैं तो यह शि‍क्षक की सफलता है।

बच्चे जन्म के साथ अपार ऊर्जा, उत्साह तथा जिज्ञासा लेकर जन्म लेते हैं। यह गुण हर बच्चे में जन्मजात होता है। अगर इन गुणों को सही दिशा मिल जाती है तो ये बच्चे अपने घर-परिवार, समाज-देश को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी ऊर्जा, उत्साह और जिज्ञासा क्षीण पड़ने लगती है। इसके कारण हमारे परिवार तथा समाज में विद्यमान हैं। कम बच्चे ही होते हैं, जो अपने शि‍क्षकों, अभिभावकों की सहायता से अपने रास्ते को पहचानकर पूरी तन्मयता से उस दिशा की ओर बढ़ चलते हैं। शेष बच्चों को उनकी राह खोजने में सहायता करने वाला न तो घर में होता है, न स्कूल में और न समाज में। ऐसे दिशाविहीन नागरिकों से घर, समाज तथा देश भी दिशाहीनता का शि‍कार हो जाता है।

बच्चों के साथ कैसा बर्ताव किया जाए ? इस बारे में हमारे वहां न तो घर-परिवार और न ही देश-समाज की कोई स्पष्‍ट समझ है। अधिकांश लोग मौका मिलने पर स्त्रियों और बच्चों से अच्छा व्यवहार नहीं करते। हमारे वहां विवाह लोगों के लिए स्त्री-पुरुष मिलन की स्वीकृत संस्था भर होती है। लोग इसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियों से परिचित नहीं होते। उनके पास अपने घर तथा बच्चों के लिए कोई योजना नहीं होती। जैसे ही जिम्मेदारियों का बोझ पड़ना शुरू होता है, वे मैदान छोड़कर भागने लगते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में बच्चों का आगमन अनामंत्रित अतिथि की तरह होता है। वे उनके आगमन को स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को मां-बाप का सहज प्रेम तथा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। वे जन्म के बाद से ही बच्चों का उत्पीड़न करने लगते हैं। उत्पीड़ित बच्चे उत्पीड़ित समाज की रचना करते हैं। वे जहां भी जाते हैं, आधे-अधूरे मन के साथ जाते हैं। न वे स्कूल में रम पाते हैं और न समाज में। आत्मकेन्द्रित समाज के लिए बच्चों की जिज्ञासा, उनके सवालों का कोई अर्थ नहीं होता। उनके सवालों को वे परेशान करने की चीज समझते हैं। अतः डांटकर या मारकर चुप करा देते हैं।

घर के बाद बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था स्कूल है। स्कूल तथा वहां के शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं बच्चों के प्रति सकारात्मक होंगे तो बच्चे खुलकर उनसे सवाल कर सकेंगे। उनकी जिज्ञासा को पंख लगेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बहुत दिन हुए सोशल मीडिया में किसी प्रतिष्‍ठि‍त स्कूल के हॉस्टल में रह रहे बच्चों के साथ वहां के वार्डन द्वारा की जा रही मारपीट का एक वीडियो देखा था। वार्डन सामने खड़े प्राइमरी स्तर के बच्चों को एक-एक कर सामने लाता, उन्हें बेंत से पीटता, फिर उठाकर फैंक देता। बच्चों के साथ मारपीट का वह वीडियो दिल दहला देने वाला था। लोगों ने अपने बच्चों को अच्छी शि‍क्षा के लिए उस तथाकथित नामीगिरामी स्कूल में भेजा होगा और वहां उनके साथ इस तरह का अमानवीय बर्ताव हो रहा है। वह वार्डन बच्चों को भयभीत करके नियंत्रण में रखना चाहता है। वही नहीं हम सब भी यही करते हैं। हम सब को यही तरीका सबसे आसान लगता है। बच्चे से बात करने, उसकी समस्या को ध्यान से सुनकर समाधान निकालने के लिए न तो हमारे पास, न हमारी शि‍क्षा व्यवस्था में और न ही हमारे पाठ्यक्रम में समय है, न ही धैर्य है और न ही इस पद्धति पर हमें यकीन है। परिणाम यह है कि हम अपने निजी तथा सार्वजनिक जीवन में भय के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

बच्चे के जीवन में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं का महत्व माता-पिता के बराबर है। जितना समय वे घर में रहते हैं, लगभग उतना ही समय वे स्कूल में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं तथा अपने साथियों के साथ बिताते हैं। स्कूल न सिर्फ बच्चों के शैक्षिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, मानसिक तथा कलात्मक उन्नयन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उनके सामाजीकरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि बच्चों के प्रति इतनी तरह से जिम्मेदार स्कूल इन भूमिकाओं को निभाने के लिए तैयार है ? क्या स्कूल को अपनी इन जिम्मेदारियों का एहसास है ? जवाब में यही कहा जा सकता है कि अपने देश में स्कूल की अवधारणा कई तरह के उद्देश्‍यों में उलझकर रह गई है। कहीं इसका उद्देश्‍य पैसा कमाना है। कहीं अपने धर्म या मत का प्रचार करना। कहीं किसी खास उद्देश्‍य के लिए दीक्षित करना, जैसे सैनिक स्कूल, धार्मिक शि‍क्षा आदि-आदि। कहीं शि‍क्षा दिए जाने का दिखावा भर किया जाता है।

शि‍क्षा से जुड़े लोग;  मुख्यतः शि‍क्षक या प्रशासक भी क्या शि‍क्षा की अवधारणा को समझते हुए इस क्षेत्र में हैं या केवल नौकरी या आजीविका के लिए ? सच तो यह है कि हमारे समाज का मूल ध्येय किसी भी तरह पैसा कमाना हो चुका है। उसमें भी शार्टकट से कमाने का प्रचलन अधिक होता जा रहा है। यानी मेहनत,  उद्यमशीलता तथा रचनात्मकता का कोई महत्व नहीं है। हमारे समाज में अभी भी लोग केवल इंजीनियर, डॉक्टर, व्यापारी, क्रिकेट का खिलाड़ी, अभिनेता, आईएएस, पीसीएस, मैनेजर ही बनना चाहते हैं। बहुत कम लोग हैं जो शि‍क्षा, कृषि‍, उद्यमीता आदि क्षेत्रों में जाना चाहते हैं। शि‍क्षा में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो जाना तो कहीं और चाहते थे, लेकिन वहां नहीं पहुंच पाने के कारण यहां आ गए। यहां आने में कोई बुराई नहीं है। जब आ ही गए हैं तो यहीं का हो जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश लोग यहां के नहीं हो पाते। वे इस पेशे को आजीविका के रूप में निभाते चले जाते हैं।

नौकरी करना और किसी पेशे को जीना दो अलग बातें हैं। नौकरी करने वाला किसी काम से आत्मिक रूप से नहीं जुड़ता। वह निर्लिप्त भाव से दिया गया काम कर देता है। शि‍क्षा का कार्य केवल शरीर ही नहीं आत्मा की भी संलिप्तता की मांग करता है। जब शि‍क्षक अपनी कक्षा के बच्चों से जुड़ने की कोशि‍श करता है तो बच्चे भी उससे जुड़ने लगते हैं। तब सीखना-सीखाना मिला-जुला कार्य हो जाता है। जब अपने विद्यार्थियों से जुड़ने की इच्छा न हो तो शि‍क्षण की प्रक्रिया नीरस हो जाती है। एक शि‍क्षक को अपने आप से हमेशा पूछना चाहिए कि क्या वह अपने विद्यार्थियों से अपने बच्चों की तरह पेश आता है ? क्या वह जब अपने विद्यार्थियों के पास जाता है तो उसी तरह से आह्लादित होता है, जैसे वह अपने बच्चों से मिलने के समय होता है ? अगर वह अपने शि‍क्षण को इस तरह करता है तो वह शि‍क्षण का आनंद उठाता है। जब शि‍क्षक आनंद में होता है तो उसके विद्यार्थियों को भी पढ़ने-लिखने में आनंद आता है। तब बच्चे सीखने लगते हैं और प्रश्‍न करने लगते हैं। दोनों के बीच आत्मीयता उत्पन्न होती है।

हिन्दी से एम.ए. करने के दौरान प्रोफेसर ओमप्रकाश गंगोला से मेरा कुछ ऐसा आत्मीय संबंध बना, जो आज 22-23 साल बाद भी कायम है। बात इतनी थी कि वे अपने विषय भारतीय तथा पश्‍चि‍मी काव्यशास्त्र से प्रेम करते थे और मुझे उस विषय को जानने-समझने की ललक थी। उनके लैक्चर के दौरान मैं उनसे तमाम सवाल करता और वे बड़े उत्साह से मेरी जिज्ञासाओं को शांत करते। मैं उनके जैसा गुरु पाकर आनंदित था और वे शायद एक जिज्ञासु छात्र को पाकर प्रसन्न थे। कई बार तो पूरी क्लास हम दोनों के प्रश्‍नोत्तर को सुनते रहती थी। प्राध्यापक और भी थे, मगर उनसे वह आत्मीयता नहीं बनी। कारण साफ है, उनमें से अधिकांश लोग सिर्फ नौकरी करते थे। वे क्लास में आते और अपना लैक्चर देकर चलते बनते। उन्हें किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं थी। उनकी पाठ योजना पहले से तय होती थी। वे संवाद से बचना चाहते थे। उनका सारा ध्यान कोर्स को पूरा करने में होता था। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे प्रश्‍न और संवाद को पसंद नहीं करते। शायद तभी उनमें से अधिकांश को मैं भूल चुका हूं।

बच्चे प्रश्‍न नहीं करते क्योंकि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्‍न नहीं करते। हम प्रश्‍न करते तो बच्चे भी प्रश्‍न करते।

(शैक्षि‍क दखल, जुलाई 2016 से साभार)  

संजीव ठाकुर  की बाल कवि‍ताएं

रोते रहते

रोंदूमल जी रोंदूमल
रोते रहते रोंदूमल
बात कोई हो या न हो
बस रोएँगे रोंदूमल !

मम्मी ने कॉफी न दी
पापा ने टॉफी न दी
फिर तो बात बतंगड़ कर
रोएँगे ही रोंदूमल !

किसी से मुँह की खाएँगे
चाहे खुद धकियाएंगे
अपने मन की न कर पाए
तो रोएँगे रोंदूमल !

जा छुपते

चोर एक न उनसे भागे
भौंक –भौंक कर कुत्ते हारे
बच्चों को तो खूब डरा दें
क्योंकि वे होते बेचारे !

गली–मुहल्ले के कुत्ते
होते हैं बीमार
सड़ी-गली चीजें ही हरदम
वो खाते हैं यार !

घर में पलने वाले कुत्ते
ऐयाशी करते
ए सी में सोते हैं
नाज़ों –नखरों में पलते !

चोर देखकर उनकी भी
सिट्टी होती गुम
जा छुपते मालिक के पीछे
नीचे करके दुम !

बहुत मजा आता है

जाड़े की गुनगुनी धूप में
पैर पसारे लेटे
या फिर खाते मूँगफली के
दाने बैठे–बैठे
बहुत मजा आता है भाई 
बहुत मजा आता है !

मक्के की रोटी पर थोड़ा
साग सरसों का लेकर
या फिर गज़क करारे वाले
थोड़ा–थोड़ा खाकर
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

औ अलाव के चारों ओर
बैठे गप–शप करते
बुद्धन काका के किस्से
लंबे–लंबे सुनते
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

गधे का गाना

गधे ने गाया गाना
उल्लू ने पहचाना
बंदर ने उसे माना
मेंढक हुआ दीवाना ।

कोयल ने मारा ताना–
‘तुझे न म्यूजिक आना ‘
गधे को फर्क पड़ा न
गाता रह गया गाना !

चलो चलें हम मॉल

हम जाएंगे शिप्रा मॉल
कोकू ! रख दो अपनी बॉल

रिक्शे से हम जाएंगे
मैक्डोनल्ड में खाएंगेचलने वाली सीढ़ी पर
हम तुम चढ़ते जाएंगे
अंदर मिलती आइसक्रीम
दोनों जमकर खाएंगे ।चम-चम करती दुकानों से
मैं ले लूँगी सुंदर ड्रेस
ले लेना तुम दो–एक गाड़ी
खूब लगाना फिर तुम रेस ।कोकू ! जल्द सँवारो बाल
हम चल रहे शिप्रा मॉल !

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा
अब कैसे नहलाओगी ?
क्या चावल धो पाओगी ?
दाल कहाँ से लाओगी ?
झाड़ू–पोंछा, बर्तन कपड़े
तुम कैसे कर पाओगी ?
सूख रहे जो पौधे बाहर
उनका क्या कर पाओगी ?
कहीं आ गया कोई घर पर
उनको क्या दे पाओगी ?
कितनी बार कहा पापा ने
बात कभी न मानोगी
हो जाएगी खाली टंकी
तब जाकर पछताओगी !

बाहर जाकर खेलो

खेल रहा है बाहर पिंटू
तुम भी घर से निकलो चिंटू !बाहर जाओ, दौड़ो, कूदो
क्या टी॰ वी से चिपके हो ?
कंप्यूटर से खेल रहे तुम
पके आम से पिचके हो !
बाहर खेल रहे हैं बच्चे
तुम उन सबसे छिपके हो ?बाहर जाकर खेलो चिंटू
बाहर खेल रहा है पिंटू !

मुझे सुहाता

मुझे सुहाता मेरी अम्मा
दीपों का त्योहार
अंधकार का दुश्मन होता
दीपों का त्योहार ।

लोग जलाते हैं दीये
घर में और गली में
तरह–तरह बल्ब लगते
घर में और गली में

‘दीपावली मुबारक हो ‘
सब कहते हैं सबको
‘आओ एक मिठाई खा लो ‘
सब कहते हैं सबको !

बस फट–फट आवाज़ पटाखों की
न सुहाती मुझको
बारूद की दुर्गंध ज़रा भी
नहीं सुहाती मुझको !

प्रेमचंद के बहाने

premchand

31 जुलाई को कालजयी कथाकार प्रेमचंद का जन्‍मदि‍न है। आज जि‍स तरह से साम्प्रदायि‍कता, जाति‍वाद, अमानवीयता, सामाजि‍क असमानता, संवेदनहीनता बढ़ रही है, ऐसे में प्रेमचंद हमें रास्ता दि‍खा सकते हैं। सरल, सहज और मानवीय सरोकारों से परि‍पूर्ण लेखन के कारण आज भी प्रेमचंद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

हमारी योजना है कि‍ प्रेमचंद जयंती पर पठन–पाठन को लेकर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाएं। जैसे— उनकी कहानि‍यां का पाठ हो, मंचन हो और उन पर चर्चा हो। पुस्तक मेले, पोस्टर प्रदर्शनी, काव्य पाठ जैसे आयोजन भी कि‍ए जाएं। यह जरूरी है कि‍ इन कार्यक्रमों में बच्चों की सक्रि‍य भागेदारी हो।

इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाने इसलि‍ए जरूरी हैं कि‍ अच्छा साहि‍त्य बच्चों में रचनाशीलता का वि‍कास करता है। आज रवीन्द्रनाथ टैगोर देश और दुनि‍या में जाने जाते हैं, तो इसका श्रेय रवीन्द्र जयंती के अवसर पर ऐसे साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों को ही जाता है। न केवल प्रेमचंद, बल्कि अन्य साहि‍त्यकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और दूसरे महापुरुषों की जयंती पर इस तरह के आयोजन कि‍ए जाएं। इसका फायदा आने वाली पीढ़ी को भी मि‍लेगा।

संचार माध्यमों की दूसरी प्राथमि‍कताओं, कैरि‍यर की आपाधापी और समाज में गैर–साहि‍त्यि‍क माहौल के कारण बडे और बच्चे सभी साहि‍त्य से दूर होते जा रहे हैं। यह बेहद भयानक स्थि‍ति‍ है।

दोस्तो, अनुरोध है कि‍ आप सभी अपने–अपने स्तर पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त करें। देशभर के अलावा वि‍देशों में रह रहे साथी भी इसमें सहयोग दें। अगर सार्वजनि‍क स्तर पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पा रहे हैं, तो कम–से–कम अपने आसपास के बच्चों या अपने परि‍जनों के साथ बैठकर प्रेमचंद की कि‍सी कहानी का पाठ या उनके जीवन प्रसंग की चर्चा तो कर ही सकते हैं।

लेखक मंच के लि‍ए आपके कार्यक्रम की रि‍पोर्ट का इंतजार रहेगा।

धन्यवाद सहि‍त
अनुराग
9871344533
anuraglekhak@gmail.com