Archive for: June 2016

काव्योत्सव के बहाने सार्थक पहल

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

गंगोलीहाट: लोकतांत्रिक साहित्य मंच की ओर से 11 व 12 जून को ब्लाक संसाधन केन्द्र गंगोलीहाट के सभागार में दो दिवसीय ‘ काव्योत्सव’ संपन्न हुआ। इसमें कविता पोस्टर प्रदर्शनी, दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो, काव्यगोष्‍ठी, प्रकृति भ्रमण तथा नागार्जुन के कृतित्व पर विचार गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

पहले दिन दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में शि‍क्षक-कवि व आलोचक  महेश चंद्र पुनेठा ने इसके उद्देश्‍यों पर प्रकाश डालते हुए, विभिन्न विद्यालयों से आए हुए बच्चों, अभिभावकों, शि‍क्षकों व उपस्थित जन समूह को उपयोगी व्याख्यान दिया। दीवार पत्रिका के माध्यम से किस प्रकार बच्चों की रचनात्मक क्षमता का विकास होता है तथा वे विषय को आसानी से समझते हुए अपनी सम्पूर्ण भागीदारी का निर्वहन करते हैं, को देशभर में चल रहे दीवार पत्रिका निर्माण व उसके प्राप्त हो रहे सकारात्मक परिणाम के माध्यम से समझाया। उन्होंने स्वयं अपने विद्यालय में इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को साक्ष्य सहित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों के सम्मुख प्रस्तुत किया तथा शि‍क्षकों से अपील की कि वे बच्चों में रचनात्मक शक्ति का विकास करने तथा उनकी कल्पना शक्ति को पंख देने के लिए व स्थाई ज्ञान को प्राप्त करने में सहज रूप से दीवार पत्रिका का उपयोग करें। इससे जहां एक ओर बच्चे अपने समय का सदुपयोग करेंगे, वहीं दूसरी ओर उनमें सीखने और समझने की जिज्ञासा निरन्तर बढ़ेगी। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्मम से सीखने-सिखाने में इसकी उपयोगिता का सहज चित्रण किया। बीच-बीच में बच्चों के साथ पहेली, चुटकुले, बिंब निर्माण, षीर्शक चयन से संबंधित गतिविधियां करवाई गईं। एक अच्छी दीवार पत्रिका में क्या-क्या स्तम्भ होने चाहिए तथा उन्हें कैसे तैयार किया जा सकता है आदि के संबंध में स्लाइड शो के माध्यम से बताया। बच्चों को कुछ छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाईं। इस स्लाइड शो तथा उस पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतीकरण के बाद विद्यालयों से आए हुए छात्र-छात्राओं से विविध विधाओं पर मौलिक लेखन करवाया गया। यद्यपि प्रारंभ में बच्चों में कुछ झिझक देखी गई, परन्तु जैसे ही उन्होंने लिखना आरंभ किया, धीरे-धीरे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता गया और वे सहज रूप से लिखने लगे। इस कार्यशाला में बच्चों ने लेखन की बारीकियों को समझते हुए कई विधाओं पर स्वयं अपनी रचनाएं तैयार कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम स्थल में सुप्रसिद्ध चित्रकार कुंवर रवीन्द्र द्वारा बनाए गए देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। रेनेसां और कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय के विद्यार्थियों सहित स्थानीय शि‍क्षकों, आमंत्रित कवियों और साहित्य व कला प्रेमियों ने दशाईथल में आयोजित इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इन कविता पोस्टरों का अवलोकन करते हुए भी बच्चों ने कविता की बारीकियों को समझा और शायद इसी का परिणाम था कि शाम को आयोजित कवि गोष्ठी में लगभग बीस छात्र-छात्राओं ने अपनी मौलिक कविताओं का मंच पर पाठ किया। गंगोलीहाट जैसी छोटी जगहों पर इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन होना बड़ी बात है। इससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूझान बढ़ता है। बच्चों में चित्रों को पढ़ने की क्षमता का विकास होता है। कविता की समझ पैदा होती है। लगभग चार दर्जन पोस्टरों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें हिंदी के प्रतिष्ठित कवियों की कविताएं थीं। जिन कवियों की कविताओं के पोस्टर लगाए गए उनमें प्रमुख थे- शील, रघुवीर सहाय, मानबहादुर सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, नरेश सक्सेना, केशव तिवारी, शि‍रीष कुमार मौर्य, अनुज लुगुन, नवनीत पांडे, बुद्धिलाल पाल, महेश चंद्र पुनेठा, अविनाश मिश्र, रेखा चमोली।

उल्लेखनीय है कि कुंवर रवीन्द्र अब तक लगभग अठारह हजार से अधिक चित्र और कविता पोस्टर बना चुके हैं। देश के लगभग दो सौ छोटे-बड़े शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। गत वर्ष पिथौरागढ़ में आयोजित पहले लोक विमर्श कार्यक्रम में इन चित्र और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें देशभर से लगभग दो दर्जन साहित्यकार उपस्थित रहे।

सायं सात बजे से ब्लाक संसाधन केन्द्र के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कुमाऊंभर से आए हुए प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। साथ ही बीच-बीच में देश-विदेश के प्रतिष्ठित कवियों का काव्य पाठ उनके स्वयं के स्वर या किसी दूसरे के स्वर में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। इन कवियों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, पाश, नाजिम हिकमत, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अनामिका, मुक्तिबोध आदि प्रमुख थे। कवि सम्मेलन में कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय से आए लगभग दो-दर्जन छात्राओं द्वारा भी स्वरचित कविताओं का वाचन किया, जिसे काफी सराहा गया। कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजकीय इण्टर कालेज दशाईथल के प्रधानाचार्य किशोर कुमार पन्त रहे। काव्‍य संगोष्‍ठी का संयोजक युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कि‍या।

अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर कवियों ने अपनी कलम की पैनी धार चलाते हुए समाज को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का आह्वान किया। सम सामयिक विषयों के साथ-साथ ऐसे विषयों को इन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया, जहां पर सामान्य व्यक्ति की निगाह नहीं जाती है। सभी प्रतिष्ठित कविगणों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में मौजूद विसंगतियों-विडंबनाओं पर करारी चोट की गई तथा एक लोकतांत्रिक और शोषणमुक्त समाज बनाने का स्वप्न पेश किया। देर रात्रि तक चले इस कवि सम्मेलन में अल्मोड़ा से आये चर्चित कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी, युवा कवि-आलोचक  महेश पुनेठा, रमेश चन्द्र जोशी, कुमाऊंनी कवि प्रकाश चन्द्र जोशी,  विनोद उप्रेती, राजेश पन्त, डा. मोहन आर्य, आशा सौन, विक्रम नेगी, नवीन विश्‍वकर्मा, ‘बाखली’ के संपादक गिरीश पाण्डे ‘प्रतीक’ दिनेश पाण्डे, कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, किशोर कुमार पन्त आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में विद्या प्रसाद भट्ट, रवि पुनेठा, नवीन चन्द्र पन्त,  कमलेश पन्त,  राजेन्द्र खाती,  सुनील उप्रेती,  संदीप जोशी, हरीश पण्डा, मनोज वर्मा, श्री दिनेश पाण्डे, डा. ज्योति निवास पन्त, कुमारी रेणू साह, दीपक पन्त और पिथौरागढ़ से आए ‘आरम्भ’ समूह के युवा साथी रोहित बि‍ष्‍ट, आयुष जोशी, महेन्द्र रावत, अभि‍षेक पुनेठा सहित दो दर्जन से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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दूसरे दिन की शुरूआत पाताल भुवनेश्‍वर गुफा के भ्रमण से हुई। देवदार के जंगलों के बीच अवस्थित यह गुफा लगभग डेढ़ सौ मीटर लंबी है। यह पौराणिक गुफा है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के मानसखंड में भी है। वहां से लौटकर  बाबा नागार्जुन के कृतित्व पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं का कहना था कि बाबा नागार्जुन जनता के कवि हैं। उनकी कविताएं सीधे जनता से संवाद करती हैं। उनके जीवन और भाषा दोनों को अपनी कविताओं का अंग बनाते हैं। क्रियाशील जीवन से कथ्य और रूप का चुनाव करते हैं। नागार्जुन जीवनभर उन्हीं के पक्ष में लिखते रहे और जनविरोधी सत्ता का प्रतिपक्ष रचते रहे। यह प्रतिपक्ष केवल कविता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जीवन में भी दिखता था। जनआंदोलनों में भाग लेना और जेल जाना इस बात का उदाहरण है। नागार्जुन न केवल जनता के कष्‍टों और संघर्षों को चित्रित करते हैं, बल्कि उनसे मुक्ति का रास्ता भी बताते हैं। सामूहिकता पर उनका गहरा विश्‍वास रहा। अपने लोक और जनपद से गहरे तक सपृक्त रहे। इस सबके चलते वह जनकवि कहलाए।

‘नागार्जुन का व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक गोष्‍ठी की अध्यक्षता करते हुए युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जो आजीवन समाज में बदलाव के लिए लिखते रहे और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कविताएं लिखीं, पहले वे उससे होकर गुजरे। उनकी समदृष्टि ही उन्हें समकालीन साहित्यकारों से पृथक बनाती है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, घटित हो रहे अत्याचारों आदि पर अपनी कलम चलाई और इसके लिए जो भी दोषी हो, उसे कटघरे में खड़ा किया। चाहे वो कितना ही प्रभावशाली ही क्यों न हो। जन सामान्य की भलाई के लिए आजीवन सत्ता से उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें समाज में वो सब दिखता था, जो कि औरों की नजरों में नहीं होता था। उन्होंने कवियों से अपील करते हुए कहा कि आज साहित्यिक क्षेत्र के लोगों को लिखने के लिए बाबा नागार्जुन को पहले पढ़ना होगा। विशेषतया कवियों को ध्यान देना होगा कि वे जिस प्रकार का साहित्य सृजन कर रहे हैं, उसे जि‍ए भी। कविता को जीना बहुत जरूरी है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो इसका और भी महत्व हो जाता है, जबकि महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। ऐसी स्थिति में कोरे आदर्शों का कोई महत्व नहीं होगा। अतः हम सभी साहित्य बिरादरी के लोगों को चाहिए कि समाज की आवश्‍यकताओं के अनुरूप लिखा जाए और उसे जिया जाना भी जरूरी है। बाबा नागार्जुन चूंकि जनकवि थे, उनके आदर्शों पर चलकर ही हम वास्तविक साहित्य साधना करते हुए समाज हित में कुछ सकते हैं।

बतौर मुख्य अतिथि पशु चिकित्सक व युवा कवि डॉ. मोहन आर्या ने नागार्जुन की चर्चित कविता ‘हरिजन गाथा’ का संदर्भ देते हुए कहा कि भले इस कविता की कुछ सीमाएं हैं, बावजूद इसके यह दलित जीवन और प्रतिरोध की एक बड़ी कविता है। उनके समकालीनों ने कभी इस तरह के वि‍षय नहीं उठाए। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्‍यकता है कि हम बाबा नागार्जुन को समझें। इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उनके साहित्य का अध्ययन करें। जिन परिस्थितियों व देशकाल में उनके द्वारा लिखा गया, इसे भी ध्यान में रखना होगा। इससे पूर्व युवा कवि विक्रम नेगी ने नागार्जुन की कविता ‘बाकी बच गया अंडा’ का पाठ किया। शि‍क्षक-कवि राजेश पंत ने नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा पर बोलते हुए उनकी ‘अकाल और उसके बाद’ तथा ‘देवदार’ कविताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने भी इस बात पर बल दिया कि कवियों के लिए उनका साहित्य पढ़ना ही नहीं, बल्कि उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। ‘आरम्भ’ समूह की ओर से अभिषेक पुनेठा, रोहित बिष्‍ट, महेंद्र रावत, आयुष जोशी ने संयुक्त रूप से नागार्जुन की प्रदीर्घ कविता ‘हरिजन गाथा’ की नाट्य प्रस्तुति दी। युवा कवि-छायाकार विनोद उप्रेती ने नागार्जुन की कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि हमें नागार्जुन के जीवन-मूल्यों को अपने में उतारकर कविता लिखनी होगी। तभी सही अर्थों में हम उनकी परम्परा को आगे बढ़ा पाएंगे। अल्मोड़ा से आए कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी ने नागार्जुन को समर्पित अपनी ‘आरक्षण’ कविता सुनाई। महेश चंद्र पुनेठा ने नागार्जुन के जनकवि कहलाने के कारणों पर अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि नागार्जुन की कविताएं जनता के यथार्थबोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्‍यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागार्जुन की लोकप्रियता का सबसे पहला कारण उनकी सहजता ही है। उनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है। दूसरा कारण उन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज पर। तीसरा कारण उनकी लोकपरकता रही। वह लोक और जनपद के बहुत नजदीक रहे, वहीं से कथ्य और रूप ग्रहण किया। क्रियाशील जन से ही भाषा सीखी। चौथा कारण- बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी। समूह में रहना और सामूहिक संघर्ष करना उनकी फितरत में शामिल रहा। उन्होंने जहां भी दमन-शोषण-उत्पीड़न तथा जीवन का अपमान देखा, अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया। पांचवा कारण- प्रकृति से उनकी निकटता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। इनमें जीवन का सौंदर्य और जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होते हैं। वरिष्‍ठ कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी ‘शूल’, युवा कवयित्री आशा सौन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर ज्योति निवास पंत, दीप पंत, जोगा राम आदि साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विचार गोष्‍ठी  का सफल संचालन युवा कवि और ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चंद्र पाण्डेय ‘प्रतीक’ ने किया।

प्रस्तुति – रमेश चन्द्र जोशी

टीना डाबी: सफलता के निहितार्थ : प्रेमपाल शर्मा

टीना डाबी

टीना डाबी

टीना डाबी- सिविल सेवा परीक्षा 2015 की टॉपर। पूरे देश ने खुशी मनाई। पिछले कुछ वर्षों के परिणामों को याद करें, तो इस बार कुछ अतिरिक्‍त कवरेज मिली। टीना डाबी को भी और दूसरे स्‍थान पर रहे कश्‍मीर के अनंतनाग के अतहर अमिर को भी। दोनों को अलग-अलग कारणों से। पिछले वर्ष प्रथम आई इरा सिंघल पर भी देश को फख्र हुआ था, क्‍योंकि वह विकलांग थीं। पिछले वर्ष पहले पांच स्‍थानों में चार लड़कियों को मिले थे. 10, 12वीं से लेकर देश की ज्‍यादातर परीक्षाओं में लड़कियों का बेहतर प्रदर्शन यह बताता है कि भारतीय समाज इस जकड़न पूर्वाग्रह के बावजूद कुछ-कुछ बदल रहा है।

टीना की सफलता के तो यही निहितार्थ है। प्रथम प्रयास, मात्र ग्रेजुएट, उम्र केवल 22 वर्ष। जैसे ही सिविल सेवा परीक्षा में बैठने लाइक हुई, फर्राटे से पहले स्‍थान पर। संघ लोक सेवा आयोग से प्राप्‍त मार्कशीट के अनुसार दूसरे स्‍थान से काफी ऊपर है टीना। और यह सब कुछ इतना सहज लगा- टीना और उनकी मां दोनों की ही भाव भंगि‍मा से। सिर्फ इरादा था, सिविल सेवा में बैठने का ग्‍यारहवीं कक्षा से ही। शेष नियमित पढ़ाई। बाकी जिंदगी भी उतनी ही सहज-खेलना, नॉवेल पढ़ना, शॉपिंग यानी बड़े लक्ष्‍य पाने के लिए बहुत सहज-साधारण जीवन भी पर्याप्‍त है।

लेकिन टीना की सफलता पूरे देश को कई दिशा दिखा सकती है। सबसे पहले एक लड़की वह सब कुछ कर सकती है, ब ] ccबबल्कि लड़कों से बेहतर। इसलिए जो लोग, विशेषकर हिन्‍दी पट्टी में पुत्र रत्‍न की दौड़ में लड़कियों के जन्‍म को अभिशाप मानते हैं, उनका सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। सोने में सुगंध टीना के इस चयन से भी आई कि उन्‍होंने हरियाणा को अपना कैडर (क्षेत्र) चुना है और वह इसलिए कि हरियाणा जैसे राज्‍यों में लड़के-लड़की में भेदभाव, पूर्वाग्रह सबसे ज्‍यादा है। क्रूरता की हद तक। पैदा होने तक की आज़ादी नहीं। फिर उनके कपड़े, पढ़ने और सामाजिक हिस्‍सेदारी पर भी उतने ही प्रतिबंध। नतीजा समृद्धि के बावजूद लिंग अनुपात सबसे खराब। ऊपर से पुरुष दंभ, भारतीय संस्‍कृति, जातीय पूर्वग्रहों में फली-फूली खाप पंचायतें। पड़ोस के राज्‍य पंजाब, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली और राजस्‍थान की भी मोटा-मोटी यही स्थिति है। उम्‍मीद है कि‍ ये सभी राज्‍य और इनके नागरिक टीना की सफलता से कुछ सबक लेंगे। टीना जैसे नौजवान अफसरों के लिए भी यह चुनौती है कि सेवा में आने के बाद वे कैसे अपने इरादों को पूरा कर पाते हैं।

महात्‍मा गांधी ने कहा था कि स्‍त्री शिक्षा का और भी महत्‍व है क्‍योंकि उसका असर कई परिवारों और पीडि़यों पर होता है। टीना के उदाहरण से भी यह स्‍पष्‍ट है। मां पढ़ी-लिखी इंजीनियर हैं और मराठी हैं। बेटियों की बेहतर देखभाल और पढ़ाई के लिए उन्‍होंने स्‍वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। इसीलिए बेटी ने बार-बार अपनी सफलता का श्रेय मां को दिया। कितने महत्वपूर्ण हैं मां के संस्‍कार, वरना हिन्‍दी पट्टी की सामान्‍य मां पहले तो बेटियां होने का ही उम्रभर जब-तव शोक मनाती रहती और क्‍या वे ऐेसा सपना अपनी बेटी को दे पाती कि तुम्‍हें आईएएस परीक्षा देनी है। यहां मां-बाप के दबाव और दिशा में अंतर समझने की जरूरत है। ग्‍यारहवीं में टीना ने विज्ञान में पढा़ई शुरू की। मां और बेटी को लगा कि वह सामाजिक विज्ञान, राजनीति शास्‍त्र, इतिहास में बेहतर कर सकती है तो दो महीने बाद ही विज्ञान छोड़कर हयूमैनिटीस विषय ले लिए। दुनियाभर विशेषकर यूरोप, अमेरिका की शिक्षा व्‍यवस्‍था में बिना किसी प्रतिबंध, नियम के मनमर्जी विषय पढ़ने, बदलने की आजादी है। इसी से पूरी सफलता मिली और फिर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में भी राजनीति विज्ञान में टॉप किया। इंजीनियर मां की दिशा और प्रगतिशीलता की दाद देनी पड़ेगी वरना न जाने कितने अभिभावक अपने बच्‍चों को जबरदस्‍ती इंजीनियर, डॉक्‍टर बनाने पर आमादा हैं और इस दबाव में बच्‍चों की आत्‍महत्‍या की खबरें रोज सुनने को मिलती हैं। पूरा देश और अभिभावक टीना के उदाहरण से सीख सकते हैं कि रुचि के विषयों को पढ़ना कितना आनंददायक है और राष्‍ट्रीय सफलता दिला सकता है। टीना की सफलता इंजीनियरिंग कॉलेज के धंधे पर भी प्रश्‍न खडा़ करती है। पिछले दो दशक के संघ लोक सेवा आयोग के आंकड़े भी बताते हैं कि अधिकांश सफल अभ्‍यार्थियों की शिक्षा जरूर इंजीनियर या विज्ञान विषयों में हुई, लेकिन सिविल सेवा परीक्षा में उन्‍होंने अपने मन के विषय सामाजिक विज्ञान, इतिहास, साहित्‍य, मनोविज्ञान, समाज शास्‍त्र जैसे ही चुने। सिविल सेवा की गुणवत्‍ता के लिए यह अच्‍छा संकेत है।

कश्‍मीर के अतहर आमिर की सफलता का भी देश ने मन से स्‍वागत किया है और इससे कश्‍मीर के नौजवान प्रेरणा ले सकते हैं। तीन वर्ष पहले तो कश्‍मीर के एक छात्र ने सिविल सेवा में टॉप किया था। अतहर फिलहाल रेलवे की सेवा में है और उनकी शिक्षा हिमाचल के मंडी जिले में हुई है। ऐसे उदाहरण ही कश्‍मीर के नागरिकों को राष्‍ट्रीय धारा में शामिल होने और एक भारतीय के रूप में आत्‍मसात करने में मदद करेंगे। टीना, अतहर, अर्तिका, जसमीत संधू, अमीर अहमद जैसे सैकड़ों वि‍भि‍न्‍न पृष्‍ठभूमि के छात्रों की सफलता संघ लोक सेवा आयोग की पूर्ण निष्‍पक्षता, चयन प्रक्रिया के प्रति भी आश्‍वस्‍त करती है कि धर्म, जाति क्षेत्र के पूर्वग्रहों से ऊपर उठकर हमारी संस्थाओं को काम करने की जरूरत है। पहले देश, संस्‍थान ऐसी पीढियां बनाते हैं और फिर ऐसी पीढि़यां देश का निर्माण करती हैं।

लेकिन परिणाम घोषित होते ही इस बार एक अवांच्छित बहस ने भी जन्‍म ले लि‍या। परिणाम घोषित होते ही एक माननीय संसद सदस्‍य ने टीना की सफलता पर इंडियन एक्‍सप्रेस को बताया कि ‘एक दलित लड़की ने टॉप किया है। 40-50 वर्ष पहले ऐसा संभव नहीं था। ऐसा आरक्षण की नीतियों के चलते हुआ है’ आदि-आदि‍। बात सही है, लेकिन ऐसी अद्धितीय सफलता पर जाति के आधार पर टिप्‍पणी बताती है कि जातीय पूर्वाग्रह सवर्ण और दलित दोनों में ही कितने गहरी जड़े जमाए हुए हैं। स्‍वयं टीना और उसके मां-बाप भी कभी इस रूप में इस सफलता को देखना नहीं चाहेंगे। टीना ने कुल 1078 सफल उम्‍मीदवारों में सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त किए हैं, केवल दलितों में ही नहीं और इसलिए पूरे देश की लड़कियां, उम्‍मीदवारों के लिए एक मिसाल हैं। टीना ने जाति के प्रश्‍न पर हिकारत से जबाब ठीक ही दिया कि ‘मैं सभी नागरिकों के लिए बिना भेदभाव काम करूंगी।’ अच्‍छा हुआ टीना ने इस पहचान को झटक कर तुरंत दूर कर दिया और जातिवादी बाजों के चुंगल से बाहर आ गईं।

लेकिन क्‍या जातिवाद स्‍वार्थ, गिरोह, राजनीति टीना की पहचान को जाति से मुक्‍त रहने देगी? हरियाणा जैसे राज्‍यों में तो यह क्रूरता की हद तक है। आए दिन झज्‍जर, गोहाना या हाल ही में जाट आरक्षण की हिंसा मध्‍ययुगीन समाज की याद दिलाती है। अफसोस और दुर्भाग्‍यपूर्ण बस यही है कि माननीय संसद सदस्‍य ने दलित होते हुए भी न जाने किस शेखीबघारने में जाति की शिनाखत पहले की, सफलता की बाद में। क्‍या सवर्णों के ऐसे उल्‍लेख कि ‘इनके पिता, दादा संस्‍कृत के प्रंकाड पंडित थे और ऊंची चोटी के विद्वान ब्राह्मणों में गिनती की जाती थी’ में कोई अंतर है। लोकतंत्र यहीं सबसे आधुनिक विचार है, जो बाप-दादों के कंधों के भरोसे नहीं टिका रहता। लोकतंत्र में व्‍यक्ति की अपनी अस्मिता है, उसके काम गुणों के आधार पर। उसे न वंश की वैशाखी की जरूरत, न जाति, कुल, क्षेत्र की। दुर्भाग्‍य से पिछले साठ सत्‍तर सालों के सांचे ने हमारे संसद सदस्‍य, बुद्धिजीवियों, लेखकों को ऐसा बना दिया है कि वे जाति के सांचे के बिना मनुष्‍य की पहचान कर ही नहीं सकते। उस पर दावा और दंभ यह कि हम जाति, समुदाय, धर्म से ऊपर उठना चाहते हैं। यदि ऊपर उठना चाहते हो तो प्रत्‍यक्ष और परोक्ष ऐसी मानसिकता से बचना होगा।

इस बात में जरूर दम है कि चालीस-पचास वर्ष पहले ऐसा शायद संभव नहीं था। लेकिन यहां भी आरक्षण से ज्‍यादा भारतीय समाज में लड़की की उपलब्धि का होना चाहिए। कितनी कम लड़कियां स्‍कूल जा पाती थीं पचास वर्ष पहले? कॉलेज तो और भी कम। वैज्ञानिक तो आज भी दुर्लभ हैं। इसे पूरे लोकतंत्र की उपलब्धि के रूप में देखना चाहिए कि लड़कियां ऐसी सर्वोच्‍च परीक्षा में बार-बार अव्‍वल आ रहीं हैं। इस बार पहले बीस में पांच और सौ में 22 लड़कियां हैं। परीक्षा देने वाली संख्‍या के अनुपात से कहीं ज्‍यादा। पिछले वर्ष 2014 की सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम पांच स्‍थानों में पहले चार लड़कियों को ही मिले थे। उपलब्धि का यशोगान ये परिणाम हैं। निश्चित रूप से समाज के दलित, वंचित, गरीब तबके को चालीस वर्ष पहले पढ़ने-लिखने की ऐसी सुविधाएं नहीं थीं। आरक्षण और दूसरी कल्‍याणकारी योजनाओं ने समाज के इस तबके को आगे बढ़ाने में मदद की है। संभव है कि‍ टीना के माता-पिता को भी उसका कुछ लाभ मिला हो। लेकिन इस मंजिल तक पहुंचना तो बेशक निजी प्रतिभा, श्रम का ही उदाहरण माना जाएगा।

अगर जातिवादी जिद्द यही है कि आरक्षण से ही यह संभव हुआ है, तो बहस के कुछ नए दरवाजे खुलते हैं और वक्‍त आ गया है, जब उन पर बात होनी चाहिए। कितने दलितों के मां-पिता उच्‍च सरकारी सेवाओं में हैं और दिल्‍ली जैसे महानगरों में पोस्‍टिड हैं? क्‍या कोई गरीब मां सरकारी नौकरी छोड़कर बच्‍चों की शिक्षा में जुट पाएगी? कितने दलित लेडी श्रीराम जैसे संस्‍थानों में पंहुचते हैं? बहुत कम। इसीलिए देशभर से सामने आ रहे उन सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए कि जो दलित, आदिवासी वैसी ही सुविधाओं में पढ़ रहे हैं, उन्‍हें आरक्षण के लाभ से दूर रखा जाए, जिससे कि वह उन्‍हीं के समुदाय के नीचे के तबकों तक पहुंच सके। संघ  लोक सेवा आयोग के ताजा परिणामों को यदि तीस साल पहले से तुलना की जाए तो यह बात और ज्‍यादा जरूरी लगती है। 2015 के परिणाम और कटऑफ पर एक नजर:-

अनारक्षित(UR) अ.पि.वर्ग(OBC) अनु.जाति(SC) अनु.ज.जाति(ST)
सी सैट 107 106 94 91
मुख्‍य परीक्षा 676 630 622 617
अंतिम परिणाम 877 814 810 801
कुल चुने गए 499 314 176 89

(कुल सफल 1078)

पिछले कुछ वर्षों में सीसैट और मुख्‍य परीक्षा में किए गए नित नए बदलावों के मद्देनजर इन आंकड़ों को भले ही प्रतिनिधि नहीं माना जाए, लेकिन एक बात तो साफ है कि पिछले कुछ वर्षों में सामान्‍य उम्‍मीदवार और आरक्षित वर्ग के कटऑफ में बहुत कम अंतर बचा है। अस्‍सी के दशक में जो अंतर दो सौ नम्‍बरों के आसपास होता था, अब घटकर पचास से लगभग अस्‍सी तक आ गया है यानी 15-20 प्रतिशत से घटकर 3-4 प्रतिशत तक। यह दलित वर्ग में पढ़ने-लिखने के प्रति आई चेतना और उप‍लब्धि का स्‍पष्‍ट परिणाम है यानी अब उन्‍हें बहुत थोड़ी सी रियायत चाहिए। तथाकथित सवर्ण नम्‍बरों के आधार पर उन्‍हें ज्‍याद दिन तक निम्‍न स्‍तर का भी नहीं मान सकते।

लेकिन यह निष्‍कर्ष इतने भोले नहीं हैं। इसे पूरी समग्रता में जांचने की जरूरत है। चार दशक पहले जब ये आरक्षित वर्ग में चुने जाते थे, तो ये पहली पीढ़ी के पढ़े-लिखे थे। 50-60 प्रतिशत के सफल अथ्‍यर्थियों के मां-बाप किसान, मजदूर, मोची। गांवों के स्‍कूलों में मातृभाषा में पढ़े हुए। सिविल सेवा में दरवाजे कोठारी समिति की अनुशंसाओं के तहत वर्ष 1979 (जनता सरकार) में खुले तो सही मायनों में इन सेवाओं का जनतंत्रीकरण हुआ। हर वर्ग, जाति क्षेत्र की पूरे देश से हिस्‍सेदारी बढी़। वर्ष 1979 में पिछले वर्षों की तुलना में दस गुना उम्‍मीदवार सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हुए थे। वर्ष 1988 में और 2000 में क्रमश: प्रो. सतीश चन्‍द्र और प्रो. अलघ  कमेटी ने भी अपनी समीक्षा रपट में इस पक्ष की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। लेकिन दुर्भाग्‍य से देश की अन्‍य उच्‍च सेवाओं इंजीनियरिंग, मेडिकल, वन आदि में मातृभाषाओं में लिखने की छूट आज तक नहीं मिली। वर्ष 2011 में तत्‍कालीन सरकार ने तो अंग्रेजी और लाद दी थी, जिसे नई सरकार ने हटाया है। अंग्रेजी सीसैट से हटाते ही पिछले वर्ष भारतीय भाषाओं के माध्‍यम से सफल उम्‍मीदवार की संख्‍या वर्ष 2012 और 2013 की पांच प्रतिशत से बढ़कर दस प्रतिशत को पार कर गई। इस वर्ष के आंकड़ों का अभी इंतजार है।

आइए लौटते हैं इस मुद्दे पर कि कटऑफ के बीच फासला कम होने के मायने क्‍या हैं? एक निष्‍कर्ष तो सीधा यह कि दलित और अन्‍य वर्ग के उम्‍मीदवारों की अकादमिक योग्‍यता, प्रतिभा लगातार प्रगति पर है। टीना डाबी के उदाहरण से तो यह बात जगजाहिर हो गई है। लेकिन न भूलने की बात यह है कि इन वर्गों के कुछ लोगों को भी अब वे सब सुविधाएं मिल रही हैं जिनसे ये सैकड़ों वर्षों से वंचि‍त थे और इसलिए आरक्षण प्रदान किया गया था।

आयोग की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि अब ये भी अधिकांश अंग्रेजी निजी स्‍कूलों में पढ़े हैं, परीक्षा का माध्‍यम अंग्रेजी है, पिछले कई दशकों से नगर, महानगरों में रहते हैं और अभिभावकों की आय भी सवर्णों के लगभग बराबर है। अपृश्‍यता, सामाजिक भेदभाव गांवों में जरूर जारी है, लेकिन इनमें से अधिकांश को वैसा तीखा अनुभव नहीं है। यूं भारतीय मानस, काले-गोरे का भेद तो अफ्रीका और अंग्रेजों से भी ज्‍यादा अपने भाई-बहनों तक से करता है। याद कीजिए आजतक टीवी चैनल की ऐंकर जब टॉपर से हिन्‍दी में प्रश्‍न कर रही थी तो उनका जबाव अंग्रेजी में था। हारकर ऐंकर को हिन्‍दी में कहने के लिए कहना पड़ा। फिर भी जबाव इंगलिश में आए। जबकि दूसरे स्‍थान पर रहे अतहर आमिर हिन्‍दुस्‍तानी में बहुत सहज थे। यह नुक्‍स निकालने की जगह नहीं है। सिर्फ इतना कहना है कि जिन्‍हें पर्याप्‍त समान सुविधाएं मिली हुई हैं, उन्‍हें आरक्षण से बाहर रखने की कोई युक्ति खोजी जानी चाहिए, जिससे सही मायनों में गरीब, वंचित इन सेवाओं में आ सकें। गरीब वंचितों की भागीदारी तंत्र को ज्‍यादा मानवीय बनाती है।

काश, कभी कोई भारतीय भाषाओँ का उम्‍मीदवार भी सिविल सेवा में टॉप कर पता! माननीय संसद सदस्य जाति की बातें करने की बजाय इन पक्षों पर बात करते तो ज्यादा अच्छा रहता।

एक और विचारणीय पक्ष। किसी की भी प्रतिभा का पैमाना सिर्फ इकहरी परीक्षा से संभव नहीं है। इस कसौटी पर कसें तो महात्‍मा गांधी से लेकर आइंसटाइन, डार्विन, मंटो रामचंद्र शुक्‍ल कोई भी खरा नहीं उतरता। सिविल सेवा परीक्षा भी इसका अपवाद नहीं है। पिछले दो वर्ष के उदाहरण। वर्ष 2014 की परीक्षा की टॉपर इरा सिंघल के सीसैट (प्रथम चरण) में केवल 206 नम्‍बर थे। और कटऑफ जनरल श्रेणी की थी 205। महज दो नम्‍बर कम होने से इरा मुख्‍य परीक्षा में नहीं बैठ सकती थी। सब जानते हैं कि विकलांगता के बावजूद वह 2014 की परीक्षा के अंतिम चयन में टॉपर थी। टीना डाबी का मामला भी इससे मिलता-जुलता है। प्रथम चरण(सीसैट) में टीना को मिले 96.66 और एससी कैटीगरी में कटऑफ थी 94, जबकि सामान्‍य श्रेणी में 107.23। भले ही पहले चरण में टीना को कुछ रियायत मिली है, लेकिन मुख्य परीक्षा में टीना डाबी ने सभी को पछाड़ कर पहला स्‍थान पाया। लब्‍बोलुआब यह है कि महत्‍वपूर्ण प्रथम आना या निन्‍यानवे प्रतिशत लेना या पास, फेल होना नहीं है, अंतिम रूप से आप समाज को क्‍या देते हैं, आपका आंकलन इस बात से किया जाएगा और समाज को भी करना चाहिए। पूरी परीक्षा प्रणाली में इस पक्ष पर सुधार की जरूरत है। इसलिए सफल होने पर न इतने अहंकार में फूले-फूले फिरें, न असफल होने पर अपने को इतना हीन मानें।

अंतिम प्रश्‍न पूरी सिविल सेवा परीक्षा के मकसद और चरित्र का है। पिछले पांच वर्ष से आज़ादी के बाद से सबसे ज्‍यादा भर्ती हो रही है। हर विभाग को नए युवा अधिकारियों की जरूरत है। आई.ए.एस से लेकर आई.पी.एस, तक और रेलवे से आयकर तक। जहां नीचे के पदों पर कटौती जारी है, ऊपर का पिरामिड लगातार भारी होता जा रहा है। अब दर्जनों की जगह सैकडों सचिव स्‍तर के पद हैं और हजारों संयुक्‍त सचिव स्‍तर के। नौकरशाही पर खर्च भी इसलिए बढ़ रहा है। हर वेतन आयोग पिछले के मुकाबले वेतन और भत्‍ते और बढ़ा देता है, इस तर्क पर कि निजी क्षेत्र में ज्‍यादा बेहतर तनख्‍वाहें हैं। सर्वश्रेष्‍ठ प्रतिभाओं को सरकार में लाने का तर्क भी इसमें शामिल है। लेकिन सर्वे बताते हैं कि सर्वश्रेष्‍ठ प्रतिभाएं अब सिविल सेवा की तरफ नहीं देख रहीं। ज्‍यादातर अब वे आ रहे हैं जिन्‍हे शक्ति, सुविधाएं पूरी चाहिए और कम से कम मेहनत करनी  पडे। साक्षात्‍कार और दिखावे के लिए कुछ भी कहें, पब्लिक हित की बजाय वे निजी हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बढ़ती लाल फीताशाही और भ्रष्‍टाचार बढ़ने के पीछे नौकरशाही की यही मानसिकता है। अगर कुछ कर गुजरने का ऐसा ही जज्‍बा होता तो हजारों की भर्ती के बावजूद सरकारी संस्‍थान, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, कानून व्‍यवस्‍था समेत पूरा प्रशासन इतना लचर नहीं होता और न भारतीय नौकरशाही को दुनिया की भ्रष्‍टतम होने का तमगा मिलता। कारण जो भी हों सरकारी तंत्र की अक्षमता ही दिनोंदिन निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए जिम्‍मेदार है। लेकिन इनसे बड़ा दोष तो उस राजनीति का है, जिसके डंडे के बल ये बंदरी की तरह नाचते हैं।

हमारे देश को एक सक्षम नौकरशाही की जरूरत है और यूपीएससी जैसी संस्‍था ये काम बखूबी कर रही हैं। चुनौती यह है कि टीना डाबी, अतहर आमिर, अर्तिका, संधू के सपनों और आदर्शों को हासिल करने में हमारा लोकतंत्र कितनी मदद करता है। 1981 बच के टॉपर प्रदीप शुक्‍ला, उत्‍तर प्रदेश कैडर के जेल में हैं और ऐसी ही अन्‍य दर्जनों अफसर। वरना सिविल सेवा के परिणामों पर जनता यही कहेगी कि ’चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात।

(समयांतर, जून 2016 से साभार)

पेड़ों को प्रणाम : देवेन्द्र मेवाड़ी

TREE

आज पर्यावरण दि‍वस है। इस अवसर पर पढ़ि‍ए लोकप्रि‍य वि‍ज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की डायरी का अंश। यह डायरी अंश उनकी पुस्तक ‘वि‍ज्ञान और हम’ से लि‍या गया है-

5 जून 2012

सुबह-सुबह सोचा– आज पर्यावरण दिवस है, मुझे भी कुछ करना चाहिए। लेकिन, क्या? कुछ देर सोचता रहा, फिर तय किया कि इस मौके पर मुझे कुछ पेड़ों से गले मिलना चाहिए। उनसे बातें करनी चाहिए। बाहर निकला। चिलचिलाती धूप थी। पारा 44 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा था। लेकिन, पेड़? वे तो इसी आग उगलती धूप में खड़े होंगे। मुझे भी इसी धूप में उनके पास जाना चाहिए। मैं मिला, पांच पेड़ों से गले मिला– अमलतास, बरगद, सिल्वर ओक और पीपल से।

अमलतास सोसायटी के आँगन में ही खड़ा है, जिसे हमारी सोसायटी के बुजुर्ग आर.पी. भटनागरजी ने अपने हाथों से लगाया था। वे आज नहीं हैं। उनका लगाया अमलतास है। हर साल मार्च-अप्रैल में यह अपनी पत्तियाँ गिरा देता है और फिर पूरे पेड़ पर पीले, झुमकों से झूलते फूलों की बहार आ जाती है। यह हमारा अपना देशज पेड़ है। मैंने अमलतास को बाँहों में भरा, तो जैसे मौन रह कर भी वह मेरे कान में बोला, ”भटनागरजी लगा गए मुझे। देखो, आज कितने कीट-पतंगे और पक्षी मेरे पास आकर तुम्हारी दुनिया को गुलजार कर रहे हैं। कोयल आकर गाती है। बुलबुलें चहचहाती हैं। गौरेयाँ, सनबर्ड और नन्ही-सी दर्जिनें मेरी शाखों पर फुदकती रहती हैं। इस बार तो हरियल भी आकर मेरी पत्तियों की ओट में विश्राम कर गए। चीटियों की ये कतारें तुम देख ही रहे हो। दिनभर मेहनत करती हैं। और मैं, मैं अपनी बहार से तुम्हारी खुशियाँ बढ़ाता हूँ।’’

मैंने भी अमलतास को बाँहों में भर कर मौन भाषा में ही उससे कहा, ”जानते हो, स्वीडन के एक विश्व प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी कार्ल लिनीयस तुम्हारा नामकरण कर गए हैं? तुम्हारा वैज्ञानिक नाम तय कर गए हैं– कैसिया फिस्टुला। उन्होंने तुम्हारी दालचीनी की जैसी छाल को देख कर यूनानी भाषा में तुम्हारे वंश का नाम ‘कैसियाÓ और लम्बे, पाइप जैसे फूलों को देखकर तुम्हारी जाति का नाम लैटिन भाषा में ‘फिस्टुला’ रख दिया! लैटिन भाषा में पाइप या बाँसुरी को फिस्टुला ही कहते हैं। तो, भाई अमलतास, हमारे लिए तो आप अमलतास ही हैं, लेकिन सारी दुनिया आपको ‘कैसिया फिस्टुला’ के वैज्ञानिक नाम से फौरन पहचान लेगी। अंग्रेजों ने आपको देखा, तो उन्हें आप अपने यूरोप के फूलदार पेड़ लैबर्नम जैसे लगे। इसलिए उन्होंने आपका नाम रख दिया– इण्डियन लैबर्नम! और हाँ, मुम्बई में तो आपके पेड़ों से सजी एक सड़क का नाम ही है– लैबर्नम रोड।’’

अमलतास के साथ काफी देर तक यों ही खामोशी से बातें करके मैं आगे गेट की ओर बढ़ा, जहाँ इस आवासीय सोसायटी की शुरुआत से ही एक बरगद भी पनपता रहा है। अब वह अच्छा खासा जवान पेड़ बन चुका है और उसकी शाखों से सैकड़ों जटाओं की तरह भूरी हवाई जड़ें झूलती रहती हैं। मेरे फ्लैट की बालकनी से वह साफ दिखाई देता है।

उसके पास जाकर मैंने उसे प्रणाम किया। उसके चौड़े सीने से लगा और उसकी लम्बी जटाओं पर हाथ फेरा। वह दर्द से कराहा और अपनी मौन भाषा में बोला, ”अच्छा किया तुम आ गए। कोई रूक कर मेरी बात ही नहीं सुनना चाहता। न जाने कहाँ की जल्दी में तेजी से आते-जाते रहते हैं। अच्छा, मेरी बात सुनो। मैं जानता हूँ, मेरी कराह सुन तुम्हें दर्द हुआ। सोचो– मुझे कितनी पीड़ा होती होगी? जरा ऊपर देखो। जब भी ऊपर आसमान की ओर अपनी बाँहें फैलाता हूँ, ये तार-बाबू आकर मेरी बाँहें काट जाते हैं। नहीं समझे? अरे, इन बिजली के तारों के रखवाले। मैं कौन-सा छूना चाहता हूँ, इन्हें? छूते ही मेरी बाँहों में तेज सनसनी दौड़ जाती है, इनसे। वह पीड़ा तो मैं ही जानता हूँ ना?

”अब इसमें मेरी क्या गलती, तुम्हीं बताओ? यहाँ मैं लगा था, तो मेरे सिर पर तार खींचने की क्या जरूरत थी? मैं तो चल-फिर कर हट नहीं सकता ना? न कुछ उनसे बोल सकता हूँ। मेरे बोल भी तो केवल वहीं समझेगा, जो मेरा दर्द समझेगा, मेरे पास आएगा। है ना? दिनभर मेरी छाँव में सुस्ताने और मेरे लाल-लाल फल खाने के लिए कितने पंछी आ जाते हैं, कोई जानता है? मेरे फलों पर जान छिड़कती हैं वे।’’

वट वृक्ष की बात सही थी। उसका दर्द समझने की जरूरत है। मैंने उसके सीने को सहलाया और उसने खामोशी से कहा, ”वट भाई, आप तो हमारे सयाने और पूजनीय पेड़ हैं…” कि तभी वट बोला, ”हाँ, जानता हँू। कुछ महिलाएँ आकर यहां दीया जला जाती हैं, आरती करती हैं और रक्षा का धागा लपेट जाती हैं। मेरी नहीं, अपनी और अपनों की रक्षा के लिए! अरे, मेरा दर्द भी तो समझो!’’

मैंने बरगद से कहा, ”अच्छा सुनो बरगद भाई, आपको पता है, कलकत्ता के निकट शिबपुर में भारतीय वनस्पति उद्यान है। उसमें आपका ही बिरादर एक बरगद का पेड़ है, जिसकी उम्र करीब 250 वर्ष है। लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और उसकी कम-से-कम 2800 हवाई जड़ें हैं। कई जड़ें तो जमीन तक पहुँच कर खूब मोटी हो गई हैं और लगता है, जैसे– वे भी तना ही हैं। वह इतना बड़ा है कि बरगद का पेड़ एक छोटा-मोटा जंगल लगता है! और हाँ, बंगलौर में भी आपका एक बहुत बड़ा बिरादर है। वहाँ लोगों ने उसका नाम ही ‘डोडा अलाडा मारा’ यानी बरगद का बड़ा पेड़ रख दिया है। वह तीन-चार एकड़ में फैला हुआ है। उसकी उम्र लोग 400 साल बताते हैं।’’

बरगद को उसके बुजुर्ग बिरादरों के बारे में सोचता हुआ छोड़ कर मैं आगे बढ़ा और सोसायटी के उस पार दिखाई देते सिल्वर ओक के सदाबहार पेड़ों की जोड़ी के पास पहुँचा। सोचा– बरगद और अमलतास तो हमारे देश के ही अपने पेड़ हैं, लेकिन देखें सुदूर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के मूल निवासी ये सिल्वर ओक यहाँ कैसा महसूस कर रहे हैं। पास गया तो लगा चिलचिलाती धूप में खड़े सिल्वर ओक जैसे मुस्कुरा रहे हो। फर्न जैसी चमकीली पत्तियों से भरी लम्बी शाखाएँ हवा में फैली थीं और पेड़ों के सिरे आसमान छूने की कोशिश में थे। ऊपर से हरी दिखती पत्तियाँ नीचे से चाँदी-सी चमक लिए थीं। वे ऊँची हरी-भरी शाखाएँ कौवों की एक जोड़ी के मन को शायद काफी भा गई होंगी तभी तो उन्होंने उनमें अपना घोंसला बनाया होगा। जब में सिल्वर ओक के पेड़ों से चुपचाप बातें कर रहा था, तब दोनों काक वहाँ ऊँचाई पर मौजूद थे।

वहाँ खड़े-खड़े मुझे याद आया–  ये ‘ओक’ यानी बाँज की बिरादरी के तो हैं नहीं, फिर इन्हें ‘सिल्वर ओकÓ क्यों कहा गया होगा? इस सवाल के जवाब में मुझे अपने गाँव के बाँज के पेड़ और उनकी चपटी, आरीदार पत्तियाँ याद आईं, जिनकी निचली सतह चाँदी की तरह चमकीली होती है। पत्तियों की इसी चाँदी-सी चमक के कारण इस पेड़ को ‘सिल्वर ओक’ कहा गया होगा।

गर्मियों में जब इन पर बहार आती है, तो इनकी शाखाएँ लम्बे बोतल ब्रुश जैसे पीले-नारंगी फूलों के 8 से 15 सेंटीमीटर लम्बे गुच्छों से भर जाते हैं। इन फूलों से जो फलियाँ बनती हैं, उनमें कड़े पंखदार बीज होते हैं। फलियाँ फटती हैं और बीज हवा में तैरते हुए आसपास जमीन पर आ गिरते हैं। तेजी से बढऩे वाले सुंदर सिल्वर ओक के पेड़ प्राय: घरों की चाहरदीवारी के साथ-साथ या शहर की सड़कों के किनारे लगाए जाते हैं। चंडीगढ़ शहर में इन पेड़ों की शोभा देखते ही बनती है। मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि ऊपर पेड़ पर से आवाज आई– काँव! काँव! सिल्वर ओक के पेड़ों और कौवों की जोड़ी से विदा लेकर मैं अगले पेड़ की ओर बढ़ा, जो दूसरी कालोनी के पास स्कूल के लम्बे-चौड़े प्रांगण में खड़ा था। यानी पीपल का विशाल पेड़।

छुट्टी का दिन था। वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। मैं जाकर उस विशाल पीपल के पेड़ के पास गया, उसके सीने से लगा और प्रणाम करके उसकी जड़ के पास बनी ऊँची मेंड़ पर बैठ गया। गर्मियों की उस तपती दोपहरी में भी पीपल की चमकीली पत्तियाँ हवा के झौंकों से सरसरा रही थीं। उसकी छाँव में मुझे हवा का शीतल झौंका छू गया। मेरे चेहरे पर खुशी के भाव देखकर जैसे पीपल बोला, ”ऐसा खुली हवा और खुला आसमान चाहिए मुझे। बच्चे आते हैं और मेरी छाँव में खूब खेलते हैं। शाखाओं पर पक्षी दिनभर चहचहाते हैं। तब मेरा सीना और भी चौड़ा हो जाता है, समझे?’’ उम्रदराज पीपल ने जैसे मुझसे पूछा।

”समझ रहा हूँ…समझ रहा हूँ।’’ मैंने मन-ही-मन दुहराया। हम आपस में विचारों से ही बातें कर रहे थे। मैंने कहा, ”आप तो हमारे लिए बहुत ही पवित्र वृक्ष हैं। सदियों से हम आपकी पूजा करते आ रहे हैं…’’ अभी मैं अपनी बात कह ही रहा था कि पीपल ने जवाब दिया, ”वह सब तो ठीक, लेकिन कई चिडिय़ों ने मुझे बताया कि तुम लोग पूजा के नाम पर मेरे कई बिरादर पेड़ों के पैताने इतनी गंदगी फैला देते हो कि कोई मनुष्य मेरी छाँव में बैठ भी नहीं सकता। यह कैसी पूजा है? मेरे आसपास साफ-सफाई रखो, मुझे खाद-पानी दो– सबसे बड़ी पूजा तो यही होगी।’’

”आप ठीक कह रहे हैं दादा।’’ मैंने बुजुर्ग पीपल से कहा। फिर उन्हें बताया, ”आपको हम लोग बोधि वृक्ष भी कहते हैं। बिहार के बोध गया में आपका ही बिरादर वह बोधि वृक्ष आज भी है, जिसके नीचे बैठ कर राजकुमार सिद्धार्थ ने तपस्या की थी। उन्हें उसकी छाँव में ज्ञान प्राप्त हुआ था और तब वे भगवान बुद्ध कहलाए। उस पीपल की टहनियाँ बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका, जापान, थाइलैंड, इंडोनेशिया और नेपाल आदि देशों को भेजी गईं। उन टहनियों से वहाँ भी पीपल पनपे।’’

”अब ये बातें तो तुम्हीं जानो, पर अच्छा किया मुझे भी बता दिया।’’

”धन्यवाद दादा। एक बात और। आप और आपके बिरादरों की उम्र तो सैकड़ों, हजारों साल होती है। दीर्घजीवी हैं आप।’’

”दीर्घजीवी तो हैं, अगर आदमी हमें लम्बी उम्र जीने दे तब ना। विकास के नाम पर वे हमें उखाड़ फैंके तो फिर कैसी लम्बी उम्र? तुम्हारे शहरों में और कई सड़कों के किनारों से हमारे बहुत से बुजुर्ग बिरादरों का नामो निशान मिटा दिया गया है।’’ बड़े दर्द के साथ पीपल ने कहा। मैंने उसके सीने से लग कर मन-ही-मन क्षमा माँगी और उसे पुन: प्रणाम करके तपती सड़क पर निकल आया। सड़क पर चलता रहा, चलता रहा और चौराहे पर पहुँच गया, जहाँ दो बेटियाँ एल्सटोनिया यानी सप्तपर्णी की घनी छाँव में बस का इंतजार कर रही थीं।

एल्सटोनिया कड़ी धूप में दम साधे मौन खड़ा था। मैंने उसे छुआ और बाँह के घेरे में लिया। उस शांत-प्रशांत पेड़ को देखकर मैं हैरान हुआ कि अंग्रेेजी में उसे ‘डेविल्स ट्री’ यानी शैतान का पेड़ क्यों कहा गया होगा? खैर, हम आदमियों में भी कई नाम स्वभाव के विपरीत रख दिए जाते हैं। हिन्दी में इसे ‘छतीनÓ शायद इसके घने छत्र के कारण कहा गया होगा। हिन्दी, मराठी में यह सप्तपर्णी भी कहलाता है, जिसका कारण समझ में आता है क्योंकि टहनियों के सिरे से इसकी अकसर सात पत्तियाँ घेरे में निकलती हैं।

एल्सटोनिया शायद मेरी बातें समझ गया था। मुझे लगा– वह कह रहा है– नाम में क्या रखा है भाई? मैंने मन-ही-मन जवाब दिया, ”रखा है छतीन भाई, नाम में बहुत कुछ रखा है। जैसे– आपका वैज्ञानिक नाम हमें बताता है कि आप एल्सटोनिया स्कालेरिस हैं। आपका नाम जाने-माने वनस्पति विज्ञानी सी. एलस्टन के नाम पर रखा गया है, जो कभी स्काटलैंड की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। इसलिए एल्सटोनिया तो है आपका वंश और स्कालेरिस है आपकी जाति। स्कॉलेरिस यानी स्कॉलर मतलब विद्यार्थी। कभी आपके तने से विद्यार्थियों के लिखने के लिए तख्तियाँ बनाई जाती थीं। इसलिए आपकी जाति का नाम स्कॉलेरिस रखा गया।’’ मुझे लगा पढ़ाई-लिखाई से नाम जुड़ा होने के कारण एल्सटोनिया खुश हो गया है। वैसे इसकी असली खुशी तो इसमें बहार आने पर दिखाई देती है। सिरे की टहनियों पर पत्तियों के घेरे के बीच से हरे-सफेद रंग के नन्हे फूलों के गुच्छे निकलते हैं। जिनसे आसपास भीनी-भीनी खुशबू आती रहती है। बाद में उनमें लम्बी-लम्बी पतली खूब फलियाँ लगती हैं, जो शानदार छतीन का नया श्रृंगार करती हैं।

मैं पाँच पेड़ों से मिल कर उनकी बातें सुन चुका था और उन्हें अपनी बातें सुना चुका था। सिर ऊपर सूरज तप रहा था। प्यास लग आई। सहसा याद आया– इतनी तपाने वाली गर्मी में इन पेड़ों की प्यास कौन बुझाता होगा? केवल धरती माँ। उसे भी हम सीमेंट-कंक्रीट से पाट रहे हैं। जब तब माँ धरती में नमी होगी, इनकी जड़ें इन्हें जीवित रखेंगी।….ये पेड़ सदा जीते रहें, यह कामना लेकर मैं घर को लौट आया।

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पुस्तक- वि‍ज्ञान और हम

लेखक: देवेन्द्र मेवाड़ी

मूल्य : 140 रुपये, सजि‍ल्द : 260 रुपये

प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन

433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम

गाजि‍याबाद-211014

ईमेल :anuraglekhak@gmil.com

भारतीय शि‍क्षा सेवा-सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सिफारि‍शें : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शि‍क्षा में सुधार के लि‍ए सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की दो सि‍फारि‍शें गौर करने लायक हैं। पहली- विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां संघ लोक सेवा आयोग करे। दूसरी- आठवीं तक फेल न करने की नीति‍ को बदला जाए। सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सि‍फारि‍शों और उनके दूरगामी परि‍णामों पर प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

मोदी सरकार द्वारा गठित पांच सदस्‍यीय सुब्रमण्‍यम समिति ने अपनी लगभग दौ सौ पृष्‍ठों की रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सोंप दी है। कुल मोटा-मोटी तैंतीस विषयों पर समिति को विचार करना था और इस समिति के अध्‍यक्ष थे- पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर.सुब्रमण्‍यम, जो प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ अपने प्रखर विचारों, लेखों और सामाजिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं। उम्मीद के मुताबिक समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिनमें एक सिफारिश अभूतपूर्व ही कही जाएगी। यह है-विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां भी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सिविल सेवा परीक्षा की तर्ज पर हों। विश्‍वविद्यालयी शिक्षा सुधार के लिए यह बहुत जरूरी और दूरगामी कदम होगा। यों शिक्षा समवर्ती सूची में है, लेकिन विश्‍वविद्यालयों के निरंतर गिरते स्‍तर को रोकने के लिए यह तुरंत किया जाना चाहिए। विश्‍वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती में राजनीति, भाई-भतीजावाद, जातिवाद और पिछले दिनों अन्‍य भ्रष्‍टाचार का ऐसा बोलबाला हुआ है कि पंसारी कि दुकान कि नौकरी और विश्‍ववि‍द्यालय कि नौकरी मे अंतर नहीं बचा। रोज-रोज बदलती नेट परीक्षा, पी.एच.डी में उम्र के मापदंडों ने पूरी पीढ़ी का विश्‍वास खो दिया है। फल-फूल रहें हैं, तो राजनीतिक शोधपत्र लाइनों पर खड़े शिक्षक संगठन और उनके नेता। नतीजन बावजूद इसके कि इनके वेतनमान, पदोन्‍नति और अन्‍य सुविधाएं अखिल भारतीय केन्‍द्रीय सेवाओं के समकक्ष है, न इनकी रूचि पढ़ाने में है न शोध में। सिफारिश, भ्रष्‍टाचार के जिस पिछले दरवाजों से इनकी भर्ती हुई है, पूरी उम्र ये शिक्षक और इनके संगठन उन्‍हीं के इशारों पर नाचते रहते हैं। इसीलिए न शोध का स्‍तर बचा है न अकादमिक माहौल का। यही कारण है कि प्रतिवर्ष अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया से लेकर पूरे यूरोप में पढ़ने के लि‍ए भारतीयों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। एक तरफ विदेशी मुद्रा का नुकसान, देश से प्रतिभा पलायन और दूसरा अपने संसाधनों का बेकार होते जाना- बेरोजगारी का बढ़़ना। क्‍या हमारे विश्‍वविद्यालयों  को उस पैमाने पर विश्‍वविद्यालय कहा जा सकता है, जहां कुछ संख्‍या विदेशी छात्रों की हो या मेधावी विदेशी विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों, शिक्षकों की? उत्‍तर भारत में तो स्थिति यह है कि दक्षिण भारत का भी शायद ही कोई छात्र मिले। केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों में जरूर उम्‍मीद बची है, लेकिन पतन वहां भी तेजी से जारी है। अखिल भारतीय सेवा का गठन भर्ती की बुनियादी कमजोरी को दूर करेगा। कम-से-कम यू.पी.एस.सी. जैसी संस्‍था की वस्‍तुस्थिकता, ईमानदारी, प्रगतिशील रूख पर पूरे देश को फख्र है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार ऐसी ही भर्ती प्रणाली न्‍यायिक सेवा में भी लाएगी। यही कदम सिद्द करेंगे कि क्‍यों यह पूववर्ती सरकारों से भिन्‍न है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण मगर उतनी ही विवादास्‍पद सिफारिश आठवीं तक बच्‍चों को फेल-पास न करने की नीति को उलटना और बदलना है। शिक्षा अधिकार अधिनियम में यह व्‍यवस्‍था की गई कि किसी भी बच्‍चे को आठवीं तक फेल नहीं किया जाएगा। उदेश्‍य यह था कि‍ जो बच्‍चे जल्दी स्‍कूल छोड़ देते हैं, उनको एक स्‍तर तक पढा़ई के लिए स्‍कूल में रोका जा सके। मगर कार्यान्‍वयन की खामियों की वजह से स्‍कूली शिक्षा की गुणवत्‍ता में भयंकर गिरावट आई है और इसलिए देश के अधिकांश राज्‍य इसके खिलाफ हैं। अठारह राज्‍यों में इसे हटाने का अनुरोध केन्‍द्र सरकार से किया है, जिनमें कर्नाटक, केरल, हरियाणा से लेकर दिल्‍ली जैसे राज्‍य भी शामिल हैं। शिक्षा का अधिकार कानून केन्‍द्र सरकार का बनाया हुआ है। अत: वही इसमें राज्‍यों के सुझावों और अब सुब्रमण्‍यम समीति‍ की सिफारिशों के मद्देनज़र परिवर्तन कर सकती है। किसी भी तर्क से केवल स्‍कूल में रोकना ही शिक्षा का मकसद नहीं हो सकता। बच्‍चे को कुछ ज्ञान, जानकारी, लिखना-पढ़ना भी आना चाहिए।

एन.सी.ई.आर.टी. और दूसरी संस्‍थाओं द्वारा समय-समय पर किए सर्वेक्षणों, अध्‍ययनों में यह सामने आया है कि अकेली इस नीति ने शिक्षा का नुकसान ज्‍यादा किया है। हाल के परिणाम भी इसके गवाह हैं। दिल्‍ली के दो स्‍कूलों में कक्षा नौ में लगभग नब्‍बे प्रतिशत बच्‍चे फेल हो गए। कारण आठवीं तक कोई परीक्षा न होने की वजह से उन्‍होंने कुछ सीखने की जहमत ही नहीं उठाई। अधिकांश मामलों में तो वे स्‍कूल भी नहीं आते। सुब्रमण्‍यम समिति ने पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा की अनुशंसा की है और यह भी कि फेल होने वाले छात्र को तीन मौके दिए जाएं और स्‍कूल ऐसे कमजोर बच्‍चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्‍त व्‍यवस्‍था, सुविधाएं जुटाएं। केवल स्‍कूल प्रशासन ने ही नहीं अभिभावकों ने भी इन सिफारिशों का स्‍वागत किया है। पुरानी नीति में थोड़ा सा बदलाव भी तस्‍वीर बदल देगा।

समिति की कुछ और सिफारिशें पुरानी बातों की पुनरावृत्ति माना जा सकता है। जैसे- विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग, ए.आई.सी.टी.ई का पुनर्गठन जिससे ये संस्‍थाएं और प्रभावी बनाई जा सकें। देश में विदेशी विश्‍वविद्यालयों  को अनुमति भी पुरानी सरकार देना चाहती रही है। देखना यह है कि इन मसलों पर जमीन पर राष्‍ट्रीय हित में परिवर्तन संभव होगा। तीन भाषा फार्मूले पर भी समिति उसी पुरानी नीति पर चलने के लिए कह रही है, जो वर्ष 1968 और वर्ष 1986 की शिक्षा नीति में शामिल था।

भाषा के मसले पर इस समिति से पूरे देश को ज्‍यादा उम्‍मीदें थी और नई मोदी सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के पक्ष के संदर्भ में इसे लागू भी किया था। वर्ष 2011 में यूपीए सरकार ने मनमाने ढंग से सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में अंग्रेजी लाद दी थी, जिससे भारतीय भाषा में सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या पन्‍द्रह प्रतिशत से घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गयी थी। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में इसे उलट दिया था। यों एक और समिति वी.एस. पासवान पूर्व सचिव की अध्‍यक्षता में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का जायजा ले रही है और उम्‍मीद है कि यह समिति दूसरी अखिल भारतीय सेवाओं जैसे- वन सेवा, चिकित्‍सा, इंजीनियरिंग आदि में भी भारतीय भाषाओं की शुरुआत करेगी। लेकिन सुब्रमण्‍यम समिति जैसी सर्वोच्‍च स्‍कूली और विश्‍वविद्यालयी दोनों स्‍तरों पर शिक्षा अपनी भाषाओं में देने की सिफारिश करती तो अच्‍छा रहता। सुब्रमण्‍यम उत्‍तर प्रदेश कैडर के अधिकारी रहे हैं, तमिलभाषी हैं और अपनी ताजा किताब ‘टर्निंग पांइट’ में अपने बचपन को याद करते हुए उन्‍होंने भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने की तारीफ और वकालत की है। विद्वानों की इतनी बडी़ समिति से ऐसे राष्‍ट्रीय मुद्दे पर तो देश को उम्‍मीद रहती ही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सरकारी स्‍कूलों में सुधार (अगस्‍त, 2015) कर्मचारियों को पढ़ाने की अनिवार्यता पर भी समिति और सरकार को दखल देना चाहिए।

समिति की सिफारिशें मानव संसाधन मंत्रालय के पास हैं। उम्‍मीद है समिति की सिफारिशों और जनाकाक्षाओं को मूर्तरूप देने में मंत्रालय विलंब नहीं करेगा। न बार-बार ऐसी समितियां ऐसे क्रांतिकारी सुझाव देती न तुरंत कार्यान्‍वयन करने वाली सरकारें ही सत्‍ता में आतीं। यथास्थितिवाद को ऐसे ही कदम तोड़ेगे।