Archive for: May 2016

फीस की फाँस : अनुराग

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हर साल नया शैक्षिक सत्र होने के साथ ही लगभग शत-प्रतिशत निजी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन और अभिभावक आमने-सामने आ जाते हैं। मुद्दा वहीं जो पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है- फीस में अत्यधिक वृद्धि और मनमाना एनुअल चार्ज। कई स्कूलों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पुलिस बुलानी पड़ती है। मजेदार बात यह है कि इसी दौरान कुछ अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन कराने के लिए  इन्हीं स्कूलों के प्रबंधकों के आगे नाक रगड़ रहे होते हैं। उनके हर नियम-कायदे को मानने को लेकर उनका जवाब होता है, केवल ‘हां’। जरूरत पडऩे पर किसी की सिफारिश कराई जाती है। और इन सबके बावजूद डोनेशन तो देनी ही है। कैसी विडम्बना है कि आज अपने बच्चे के एडमिशन के लिए चिरौरी करने वाले ये माता-पिता भी अगले साल आंदोलनकारी अभिभावकों में शामिल हो जाएंगे। जब से देश में निजी स्कूलों का दौर शुरू हुआ है, एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिलेगा, जिसने बच्चा का एडमिशन कराते समय स्कूल प्रबंधन से हर साल बढऩे वाली फीस और एनुअल चार्ज के बारे में चर्चा की हो। या यह शर्त रखी होगी कि हर साल इतने प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ाओगे और एनुअल चार्ज नहीं देंगे। जब सब कुछ स्कूल प्रबंधकों की मर्जी से हो रहा है तो बाद में हायतौबा मचाने का क्या तुक है?
कमीज सौ-पचास रुपये से लेकर हजारों रुपये में आती है। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से ब्राड की कमीज खरीद लेता है और महंगी होने की शिकायत भी नहीं करता। निजी स्कूल भी ब्रांड बन गए हैं। हमें अपने बच्चों की अच्छी-बुरी शिक्षा से कोई मतबल नहीं है। हमें उनके लिए शिक्षा के ब्रांड की चिंता है ताकि समाज में कमीज के टैग की तरह इसका भी प्रदर्शन कर सकें।
यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मूल सोसाइटी के स्कूल की ब्रांच तो गिनी-चुनी हैं, बाकी तो उन्होंने फ्रेंचाइजी दी हुई हैं।
पिछले दिनों एक स्कूल के आंदोलनरत अभिभावकों से मिलने हुआ। सभी की आर्थि और सामाजिक स्थिति काफी अच्छी थी। वे धरना-प्रदर्शन कर चुके थे। जनप्रतिनिधियों से लेकर सीबीएसई के चेयरमैन से भी कई बार मिल चुके थे। गरमागरम बहस हो रही थी। सभी का लहू खौल रहा था। मैंने सुझाव दिया कि आप अपने क्षेत्र में सरकारी स्कूल की मांग क्यों नहीं करते? हर साल होने वाला यह झंझट ही खत्म हो जाएगा। सभी ने मुझे ऐसे घूर कर देखा, मानो मैंने
उन्हें आत्महत्या करने के लिए कह दिया हो।
इससे बड़ा भ्रम कुछ नहीं हो सकता कि निजी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। अधिकांश स्कूलों में ‘शिक्षा के उद्देश्य’ को लेकर ही सन्नाटा है, तो बाकी मुद्दों पर बात ही क्या की जाए। कोई भी व्यवसाय शुरू करने से उसकी विशेषज्ञता हासिल की जाती है या दो-चार साल कहीं काम करके अनुभव जुटाया जाता है। लेकिन स्कूल तो प्रापटी डीलर, डेयरी वाला, नेता-अभिनेता कोई भी खोल लेता है। बस पैसा होना चाहिए। इन स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्ति के क्या मापदंड है, यह अबूझ पहेली है। नियुक्ति के बाद उन्हें कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। फिर वहां बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा कैसे मिल सकती है? अधिक पैसे वसूलने के लिए आलीशान बिल्डिंग, महंगा फर्नीचर, हर क्लास में एसी और कंप्यूटर लगा देने भर से तो अच्छी शिक्षा बच्चों को नहीं मिल सकती। सरकारी स्कूलों में अध्यापक की नियुक्ति के लिए शिक्षा से जुड़ी विशेष डिग्री या सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। नियुक्ति से पहले ट्रेनिंग दी जाती है और समय-समय पर वर्कशाप आदि को भी आयोजन किया जाता रहता है। कौन-कौन से और कि‍तने निजी स्कूल अपने यहां अध्यापकों की नियुक्ति से पहले और बाद में यह प्रक्रिया अपनाते हैं। फिर इन स्कूलों के शिक्षक कैसे
श्रेष्ठ शिक्षक हो सकते हैं?

संवाद से खुली शिक्षा की राह : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

प्रमोद दीक्षित

प्रमोद दीक्षित

यही कोई दो-ढाई वर्ष पहले की बात है। वे जाड़े के दिन थे। उस दिन आसमान में सूरज का कहीं अता-पता न था, बादल हवा के साथ तैर रहे थे। नरैनी बीआरसी में मेरी नियुक्ति के ये शुरूआती दिन थे। मेरे साथ ही चार अन्य सहयोगी भी थे। मैं ठंड दूर करने के लिए हथेलियों को आपस में रगड़ रहा था। लेकिन ठंढ तन-मन में हावी थी। कुछ लकड़ियां जुटाकर हम सबने बाहर खुले में आग तापने का निश्चय किया। हालांकि, लकड़ियां गीली थीं और धुंवा उगल रही थीं, जो आंख-नाक में घुस रहा था। लेकिन इन्ही सीली लकड़ियों में आग भभकने की आशा में हम चारों ओर बैठे बातें कर रहे थे। तभी मेरे मोबाइल की घण्टी बजी। उधर से एक गांव का नाम लेते हुए खण्ड शिक्षा अधिकारी का निर्देश मिला, ‘‘इस गांव में ग्रामीणों ने प्राथमिक विद्यालय में ताला डाल दिया है। आप वहां जाइए। कैसे भी बने, बात करके ताला खुलवाकर शाम तक रिपोर्ट दीजिए।’’ इसके पहले कि मैं कुछ और पूछ पाता फोन कट गया। मैंने उस गांव के बारे में अपने सहयोगियों से कुछ जरूरी जानकारी जुटायी। कुछ अन्य स्रोतों से भी वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास किया तो पता चला कि वह गांव बागैं नदी के उस पार बीहड़ में स्थित है, लेकिन क्षेत्र में उस गांव की पहचान एक पढ़े-लिखे समझदार गांव के रूप में है। वहां के कुछ लोग नौकरियों में भी हैं। मालूम हुआ कि गांव के लोग अध्यापकों के कार्य-व्यवहार से खासे नाराज हैं। यह भी ज्ञात हुआ कि एक स्वयंसेवी संस्था वहां पिछले तीन सालों से आजीविका और शिक्षा के मुद्दे पर काम कर रही है और विद्यालय में ताला डालने के लिए लोगों को उसने ही उकसाया है। जाने से पहले मैंने वहां कार्यरत शिक्षकों से बात कर प्रकरण को समझने की कोशिश की, लेकिन सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। मैंने साथ चलने के लिए सम्बंधित संकुल प्रभारी से सम्पर्क किया तो ज्ञात हुआ कि वह दो दिन से बुखार से पीड़ित हैं और कहीं आ-जा पाने की स्थिति में नहीं हैं। सहकर्मियों ने कुछ अति‍आवश्यक कार्य पूरे करने का रोना रोया। आखिर ओखली में सिर कौन देना चाहेगा। खैर, मरता क्या न करता, मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और अकेले ही चल पड़ा।

वह विद्यालय मेरे कार्यालय से लगभग 25 किमी दूर था। बाइक आगे बढ़ी जा रही थी और कस्बा पीछे छूट रहा था। मैं चिंतित था। मन में अनेक प्रश्न कौंध रहे थे। आखिर गांव के लोगों ने विद्यालय में ताला क्यों डाला होगा? शिक्षकों ने क्या गड़बड़ कर दी होगी? संस्था के लोगों ने गांववालों को ऐसा करने के लिए क्यों उकसाया होगा? इसी उधेड़बुन और मन ही मन सवालों के उत्तर खोजता मुख्य मार्ग से अब मैं सम्पर्क मार्ग में आ चुका था। मार्ग के दोनो ओर दूर-दूर तक फैले धान के खेत मन मोह रहे थे। पकते धान की महक अच्छी लग रही थी। मेंड़ों पर लगे बबूल के पेड़ों से रिसते गोंद को खाते पक्षियों के झुण्ड और उनका कलरव वातावरण में स्वर लहरी बिखेर रहा था। पल भर को मन उनमें रमता और दूसरे ही पल तमाम आशंकाओं से घिर जाता। एक अज्ञात भय मेरी पोर-पोर में समाया जा रहा था। अचानक एक बाज पक्षी बिल्कुल मेरे सिर के ऊपर से किसी ‘फाइटर प्लेन‘ की तरह झपट्टा मारते हुए सामने के खेत से एक चूहे को पंजों में दबोच ले गया और एक सियार दाहिनी ओर के खेत से निकल सड़क पार कर जंगली झाड़ियों में घुस गया। विचारों का जाल एकदम से छिन्न-भि‍न्‍न हो गया और मैं कल्पना लोक से यथार्थ की खुरदुरी पगडंडी पर हिचकोले खाते आगे बढ़ने लगा। अब खेतों की माटी का रंग और बनावट बदलने लगी थी। खेतों में अरहर और ज्वार-बाजरे की फसल अपने यौवन में हवा के साथ बलखाती नाच रही थी। मैं प्रकृति का यह हरापन आंखों में भर लेना चाहता था। मैंने बाइक बन्द की और दोनों हाथों को फैलाकर ताजी हवा को खींच कर फेफड़ों में भर लिया। ऊपर आसमान में बादलों के बीच से सुनहरी किरणें फूट रही थीं। उस समय मैं दुनिया का सबसे खुश आदमी था। लेकिन सामने नजर जाते ही मेरे होश उड़ गये क्योंकि नदी का बालूभरा पाट मेरी परीक्षा लेने को तैयार प्रतीक्षारत था। नदी में पुल नहीं था। एक बारगी लगा कि कहीं रास्ता तो नहीं भटक गया। मैं नदी पार करने के बारे में सोच ही रहा था कि पीछे से किसी ने आवाज दी,‘‘बाबू जी, कैथा-महुआ के पेड़ के नीचे से ढलान मा बस नाक कै सीध चले जाव। कच्चा पुल से नदी पार करतै चढ़ाई मा गांव मिल जाई।’’ मैंने अपने पीछे खेत में काम कर रहे उस वृद्ध किसान से विद्यालय और वहां हुई घटना के बारे में जानकारी ली और धन्यवाद दे आगे बढ़ गया। गांव नदी पार करते ही ऊपर टीले में था। मैं गांव में प्रवेश कर चुका था। अब वह विद्यालय और वहां की भीड़ दिखाई पड़ने लगी थी। मैं अपने आपको मन ही मन तैयार कर रहा था।

जब मैं विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंचा तो लगभग आधा दिन बीत चुका था। बाहरी गेट खुला हुआ था। विद्यालय के चैनल और अन्य कक्षा-कक्षों पर दो-दो ताले पड़े हुए थे। कुछ बच्चे अपने बस्ते लिए इधर उधर घूम रहे थे। कुछ बच्चे बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे थे। कुछ गिप्पी-गेंद और कुछ बच्चे एक लकड़ी के फट्टे के बैट और कपड़े के गेंद से क्रिकेट खेल रहे थे। लड़कियों की संख्या काफी कम थी और लगभग छोटी उम्र की थीं। वे अपने एक बड़े समूह में खो-खो खेल रही थीं तो चार लड़कियों का एक छोटा समूह पूरी घटना से बेखबर ‘गोट्टा‘ खेलने में व्यस्त और मस्त था। महिलाएं भी थीं लेकिन उनकी सक्रिय सहभागिता नहीं थीं। वे केवल मूकदर्शक थीं और सम्भवतः विभाग पर दबाव बनाने के लिए उनको प्रयोग किया जा रहा था। वे लम्बा घूंघट काढ़े भीड़ के एक ओर खड़ी आपस में बातें कर रही थीं और घूंघट को केवल दो अंगुलियों से अजीब प्रकार से मोड़कर उन अंगुलियों के बीच में से पूरी भीड और घटनाक्रम़ पर नजर रखे हुए थीं।

शायद, वहां उपस्थित शिक्षक ने मुझे देख लिया था और उत्साह से मेरी ओर लपकते हुए बोल पड़ा, ‘‘साहब आ गये, साहब आ गये।’’ लोगों के चेहरे मेरी ओर मुड़ गये। मैं उनके चेहरों पर आक्रोश और व्यवस्था के प्रति विद्रोह के भाव स्पष्ट पढ़ पा रहा था। मैं उनके और समीप पहुंच चुका था। ऐसी भीड़ से यह मेरा पहला सामना था और मैं अन्दर से डर रहा था। हालांकि, मैंने स्वयं को दृढता और विश्वास से भरा बनाये रखने की पुरजोर कोशिश की हुई थी। लेकिन सच सही था कि मैं किसी अनहोनी और एक अनजाने भय से ग्रस्त था।

मुझे वहां कोई नहीं जानता था। उस शिक्षक ने गांववालों से मेरा परिचय कराया। मैंने गांववालो को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए समझाया, ‘‘देखो, विद्यालय एक सरकारी सम्पति है। बच्चों की पढ़ाई को जबरन रोकना, दरवाजों पर ताला डालना, भवन का दुरुपयोग करना, किसी भी प्रकार की तोड़-फोड़ करना और सरकारी काम में बाधा पहुंचाना अपराध हैं। आपसे अनुरोध है कि सभी ताले खोल दें ताकि पढ़ाई सुचारू रूप से चल सके। आपकी जो समस्यायें या मांगें हैं, वे सब मुझसे कहें। मैं आपकी बात सक्षम अधिकारियों तक पहुंचा कर समाधान निकालने का भरसक प्रयास करूंगा।‘‘

मैंने देखा कि मेरी चेतावनी का उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था। उनकी मांग थी कि बेसिक शिक्षा विभाग का कोई बड़ा अधिकारी आए, तभी ताला खुलेगा और बातचीत होगी। उन लोगों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया और मुझ पर एक साथ हजारों प्रश्नों की बौछार कर दी। मैं संकट में फंस चुका था। मैंने सोचा कि यदि मैंने वहां उपस्थित व्यक्तियों से अब गर्म तेवर में बात की तो मामला और उलझ सकता है। क्योंकि वहां मौजूद हर व्यक्ति उत्तेजित था और आक्रामक भी। जिसके मन में जो आ रहा था, वह बोल रहा था। कुछ किशोर-से लड़के बीच-बीच में चैनल में दो-चार लात भी मार दे रहे थे, शायद विकृत व्यवस्था के प्रति गुस्से के इजहार का उनका अपना तरीका था। भीड़ का एक हिस्सा चारदीवारी को तोड़े दे रहा था। उन्हें लग रहा था कि हिंसक व्यवहार ही समाधान है। वहां जोर-जोर से आवाजें आ रही थीं। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। सब अपनी-अपनी हांक रहे थे। वह भीड़ थी, वहां कोई नेता नहीं था या यह कहूं कि वहां हर कोई अपने आप को दूसरे से ज्यादा बड़ा नेता दिखाने की अघोषित होड़ में शामिल था। उसका कारण था कि निकट भविष्य में ग्राम पंचायत के चुनाव होने वाले थे।

मैंने भीड़ से कहा कि इस तरह हल्ला-गुल्ला और तोड़-फोड़ करने से  किसी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। संवाद से रास्ते खुलते हैं। आपका गुस्सा जायज हो सकता है। लेकिन याद रखिए, गुस्से में भटकाव की सम्भावना हुआ करती है। क्यों न हम सभी आराम से बैठ कर बातचीत करें। विद्यालय और शिक्षकों को लेकर आपकी जो भी समस्यायें हैं, प्रश्न हैं या अपेक्षाएं हैं, बेझिझक कहिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि‍ आपको समाधान मिलेगा। मेरे इस प्रस्ताव पर बुजुर्ग सहमत होते दिखे, लेकिन नये उत्तेजित खून ने उन्हें मोड़ दिया। डोर मेरे हाथ में आते-आते रह गई। एक बार फिर परिसर में नारेबाजी होने लगी। उनमें किसी उच्चाधिकारी से बात करने की जिद थी। मैं लगभग असहाय था, लेकिन हार मानने को तैयार न था। मैंने फिर कोशिश की।

अब मैंने उन बुजुर्ग लोगों, को जो अब तक मेरी बातें ध्यान से सुन रह थे और कहीं न कहीं सहमत थे,  तथा संस्था के कार्यकर्ता से भी आग्रह किया कि ताला खुलवायें। लोकतांत्रिक तरीके से ही समाधान निकलेगा। बातचीत ही अंतिम रास्ता है। मैंने उन लोगों की अपने अधिकारी से भी बात करवाई। आखिर वे ताला खोलने और बैठने को तैयार हो गए।

उन लोगों ने अपने अन्य साथियों से बात कर सभी ताले खोल दिए और शिक्षक बच्चों को कक्षाओं की ओर ले जाने लगे। मैंने संतुष्टि की एक गहरी सांस ली। गला सूख रहा था और उस ठंड में भी मैंने एक गिलास पानी गटक लिया।

मैं किसी कमरे में समुदाय के कुछ चयनित लोगो के साथ बैठना चाह रहा था ताकि शान्त और बेहतर वातावरण में बातें हों और टकराव से बचा जा सकें। लेकिन उन लोगों की इच्छा थी कि बाहर खुले में बैठा जाए ताकि सब लोग अपनी बात रख सकें और बातचीत की पारदर्शिता बनी रहे। विद्यालय से दरियां और प्लास्टिक की चटाइयां निकाल कर बरगद के नीचे चबूतरे पर बिछा दी गईं। लगभग शान्ति थी। हां, कभी-कभी बरगद पर बैठे किसी कौवे की कांव-कांव से नीरवता जरूर भंग होती, लेकिन थोड़ी देर में वह उड़ गया। आकाश में बादलों का छंटना शुरू हो गया था।

अब वहां पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्यालय प्रबन्ध समिति के सदस्यों, पंचायत प्रतिनिधियों एवं गांव के अन्य लोग एक साथ बैठे थे। मैंने अनुरोध किया कि यह एक अच्छा अवसर है कि हम प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी, शिक्षकों से अभिभावकों की अपेक्षाएं तथा शिक्षकों की पालक अभिभावकों से अपेक्षाएं क्या हैं, इस पर बात कर सकते हैं। मैंने एक दांव और चला कि आप सब खुले मन से अपने विचार और सुझाव रखें कि इस विद्यालय को बेहतर कैसे बनाया जाए। बच्चों को एक रचनात्मक वातावरण मिले और बच्चों का बिना बाधा के सीखना संभव हो सके। यह दूसरों के दोष गिनाने का समय नहीं है। हम सबको मिलकर साथ-साथ कदम बढ़ाना होगा, तभी हम सही मायनों में शिक्षा उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेंगे। मैं देख रहा था कि‍ वे शान्त मन एवं स्थिर जरूर थे लेकिन उनमें हरेक के अन्दर एक ज्वालामुखी धधक रहा था और भभकता लावा बाहर निकलने को व्यग्र था।

चुप्पी तोड़ते हुए एक युवा अभिभावक ने कहा कि स्कूल कभी भी समय से नहीं खुलता। बच्चे इधर-उधर खेलते-घूमते रहते हैं और अक्सर लड़ने-झगड़ने लगते हैं। किसी दिन कोई बच्चा चोटहिल हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा। दूसरे कोने से एक बुजुर्ग का आक्रोश फूटा,  ‘‘क्या कारण है कि कक्षा 3, 4 व 5 के बच्चें भी हिन्दी की किताब नहीं पढ़ पाते और गणित के सामान्य सवाल हल करने में कठनाई आती है?’‘ मेरे पास बैठे व्यक्ति, जो शायद कहीं नौकरी करते हैं और छुट्टी में घर आए थे, ने कहा कि यहीं विद्यालय के पास में मेरा घर है और जब मैं यहां होता हूं तो देखता हूं कि शिक्षक बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर पिटाई करते हैं। उन्हें मुर्गा बना देते हैं, गदहा और बेवकूफ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। साहब, क्या ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित है? तभी उस बात में जोड़ते हुए एक नवयुवक जो शायद कस्बे के किसी निजी स्कूल में शिक्षक है, ने अपनी बात कही कि यहां के अध्यापक कहते हैं कि बच्चे कुछ सीखते नहीं हैं। मै एक बात जानना चाहूंगा कि उन्होंने सीखने के कैसे और कितने अवसर बच्चों को उपलब्ध कराए हैं? वे बच्चों को कितना समझते हैं? क्या पाठ रट लेना ही सीखना है? तभी पीछे खड़ा एक युवक तीखे स्वर में बोला कि यहां के अध्यापक कक्षा में ही गुटका-तम्बाकू चबाते रहते हैं और बच्चों से ही दुकान से गुटका मंगवाते हैं। क्या यह ठीक आचरण है।

मैं देख रहा था कि अध्यापकों के सिर झुके हुए थे। इन बातों को सुनकर वहां उपस्थित शिक्षकों के चेहरों में तमाम भाव आ-जा रहे थे। उनमें से एक ने कहा कि विद्यालय में हम दो शिक्षक हैं। एक शिक्षामित्र और मैं सहायक अध्यापक। विद्यालय का चार्ज भी मेरे पास है। मुझे विभागीय कार्यों जैसे एमडीएम का खाद्यान्न उठाने, छात्रवृत्ति हेतु बैंक में बच्चों के खाता खोलवाने, बन रहे एकल कक्ष की सामग्री खरीदने एवं अचानक आ गए अन्य कार्यों को करने हेतु न चाहते हुए भी स्कूल से बाहर जाना पड़ता है। बैठकों में संकुल एवं बीआरसी जाना होता है। वहीं शिक्षामित्र का दूरस्थ बीटीसी का प्रशिक्षण बीआरसी में चल रहा है। उसकी ड्यूटी मतदाता सूची संशोधन कार्य में भी बीएलओ के रूप में पिछले छह महीनों से लगी है और तहसील की भागदौड़ बनी रहती है। इसके अलावा वह पल्स पोलियो अभियान में भी अपनी सेवाएं दे रहा है। हममें कमियां हो सकतीं हैं, इसके बावजूद हमारी कोशिश रहती है कि विद्यालय समय से और नियमित खुले। बच्चों को बेहतर शैक्षिक माहौल दे पायें। हमें आपसे सहयोग भी नहीं मिलता। कोई भी बच्चा नियमित नहीं आता है। जो बच्चे एक दिन आते हैं, वो दूसरे दिन नहीं आते और दूसरे दिन आने वाले बच्चे अगले दिन नहीं आ पाते। इस कारण हम विषय को आगे नहीं बढ़ा पाते और वहीं उलझे रहते हैं। जबकि हम देखते हैं कि अभिभावक बच्चों को विद्यालय न भेजकर अपने साथ खेतों पर काम करने ले जाते हैं।

इतना सुनते ही एक प्रौढ व्यक्ति, जो शायद खेतों से सीधे चला आया था और पास ही घास का गट्ठर रखे बैठा था, लगभग चिल्लाते हुए बोला,  ‘‘ देखा साहब, जब लड़कन-बिटियन का स्कूल मा कुछ सीखैं का ना मिली तो हम उन्हैं काहे का इस्कूल भेज कै टाइम बरबाद करी। तौ अपने साथ लेवा जाइत है कि खेती-किसानी का काम सीख लेंय अउर हमार बोझा हल्काय।’’ अन्य गांववासियों ने भी उसकी बात में हां मिलाई और कहा कि यह बात सोलह आने सच है।

मैंने विद्यालय में लड़कियों की कम संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आप लोगों को चाहिए कि लड़कियों को विद्यालय भेजें। लड़कियों के शिक्षित हुए बिना विकास की बात बेमानी है। फिर उन्हें दूसरे घर जाना है। उनका समर्थ और सशक्त होना बहुत जरूरी है। मेरी इस बात पर महिलाओं की ओर से किसी ने कुछ कहा जो मैं दूर होने के कारण सुन न पाया। तब कालेज जाने वाले एक छात्र ने उस महिला की बात को साझा करते हुए कहा कि विद्यालय में कोई शौचालय न होने के कारण वे अपनी सयानी लड़कियों को नहीं भेजते। उसने एक बात अपनी ओर से जोड़ी कि यहां लड़कियों का नाम देर से लिखाते हैं। इस कारण कक्षा 5 तक आते-आते वे 14-15 साल की हो जाती हैं। नरम वातावरण में हमारा संवाद गति पकड़ रहा था और हम सही दिशा में जा रहे थे। लोग बेझिझक अपनी बात कर रहे थे। विद्यालय के प्रति उनकी सकारात्मक सोच को मैं समझ रहा था। तभी किसी के घर से एक लड़का चाय लाया और गिलासों में आठ-दस लोगों को चाय दी। चाय अच्छी थी, चीनी के साथ बहुत हल्का-सा नमक भी डाला गया था। थोड़ी गरमाहट का अनुभव हुआ। बातों का क्रम फिर चल पड़ा। लेकिन अब गुस्सा नहीं एक दूसरे को समझने और सहयोग देते हुए विद्यालय को बेहतर बनाने का दोस्ताना भाव था। संवाद से शिक्षा की राह खुल रही थी।

मेरे ठीक बगल में बैठे गांव के तीस वर्ष तक प्रधान रहे एक वृद्ध ने कहा कि आज जो कुछ भी यहां हुआ उसका खेद है। लेकिन यह लाभ भी हुआ कि वास्तविकता को समझ पाए हैं। मन को पढ़ पाए हैं। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि आज विद्यालय और समाज की दूरी बढ़ी है। विद्यालय के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। जबकि सरकार विद्यालय के विकास में समाज की भूमिका को महत्व दे रही है। लेकिन शिक्षक कभी भी गांव से सलाह-मशविरा नहीं करते। कभी किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं करते। वे मोटर साइकिल से आते हैं और चले जाते हैं। आज शिक्षक एक सरकारी कर्मचारी बन कर रह गया है। जिसमें बच्चों और इस विद्यालय के प्रति अपनेपन का भाव नहीं हैं। समाज से भी कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि यह विद्यालय बहुत पुराना है। अब नया और पक्का भवन जरूर बन गया है, लेकिन इसमें प्राण नहीं हैं। अपने विद्यार्थी जीवन की यादें साझा करते हुए बोले कि तब यह भवन कच्चा था और खपरैल थी। इसकी देखरेख अभिभावक और गांव के अन्य लोग मिलकर करते थे। शिक्षक भी बच्चों से अपने बच्चों जैसा व्यवहार करते थे और कोई भेदभाव नहीं था। शिक्षकों का गांव के प्रत्येक घर में आना-जाना था। और सबके सुख-दुख में सहभागी थे। हम सब ने अपनी शुरुआती पढ़ाई इसी विद्यालय से पूरी की और कई उपलब्धियां हासिल की थीं।

तभी एक बुजुर्ग बोला कि क्या ज्ञान किताबों में ही मिलता है? गांव में तमाम कामों में कुशल और कलाओं में दक्ष लोग हैं, जिनको स्कूल में बुलवा कर बच्चों को सिखवाया जाए तो बच्चें हुनर में भी प्रवीण हो जाएंगे। मुझे उनकी बात में बडा दम नजर आया। मैने अनुरोध किया कि अपनी बात को खुल कर बताएं। उन्होनें कहा कि हमारे गांव में मिट्टी के बर्तन बनाने, बांस से पंखा-डलिया बनाने, जूट से चटाई-पाखरी बनाने के पुस्तैनी काम होते हैं। आज के बच्चे ये काम सीखने में शर्माते हैं। ये कला नष्ट होने की कगार पर है। मेरा सुझाव है कि यदि इन्हे स्कूल से जोड़ दिया जाए तो वे इसके महत्व को समझेंगे और यह कला बची रहेगी।

शाम घिर आई थी। समस्या का समाधान भी लगभग हो चुका था। अब चलने की बेला थी। मैंने सबके सहयोग के लिए आभार ज्ञापित करते हुए अनुरोध किया कि इस विद्यालय में आपने पढ़ा और अब आपके बच्चे भी पढ़ रहे हैं। यह विद्यालय आपका है। यह इस गांव की सम्पति है, साझी विरासत है। इसकी रक्षा करना आपका नैतिक और सामाजिक दायित्व है। सबके चेहरे खिले हुए थे। रोम-रोम से उत्साह छलक रहा था। वे मुझे छोड़ने गांव के छोर तक आए।

उस विद्यालय से बराबर सम्बंध बना रहा। बाद में उस पूरी ग्राम पंचायत के शिक्षकों के साथ खण्ड शिक्षा अधिकारी ने बैठक कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। वे शिक्षक अब वहां नहीं हैं, लेकिन नई भर्ती में तीन नए शिक्षकों की नियुक्ति हो गई है। और हां, एक प्रधान अध्यापक भी पहुंच गए हैं। स्थितियां पहले से अच्छी हैं लेकिन कोई उल्लेखनीय बहुत बड़ा बदलाव हम नहीं कर पाए हैं। हम सबकी सीमाएं हैं। लेकिन गांव सन्तुष्ट है और मैं..? शायद नहीं,  क्योंकि अभी बहुत कुछ करना शेष है।

आरक्षण : खत्म नहीं, समीक्षा हो : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

कथाकार और शि‍क्षावि‍द प्रेमपाल शर्मा ने आरक्षण की समीक्षा की आवश्‍यकता पर जोर दि‍या हुआ लेख इसी वर्ष फरवरी में लि‍खा था। इसमें उठाए गए सभी मुद्दे गौरतलब हैं-

आरक्षण की आग में वर्ष 2015 के अंतिम दिनों में गुजरात (पटेल समुदाय) सुलग रहा था, जनवरी 2016 में आंध्रप्रदेश (कपू समुदाय) और फ़रवरी में हरि‍याणा-राजस्थान में गुर्जरों की मांग और हिंसा से हम सब वाकिफ हैं। पटेल, जाट जैसे  सवर्ण ओबीसी दर्जा चाहते हैं, तो गुर्जर मीणाओं की तर्ज पर अनुसूचित का। मंडल आयोग के बाद यह होड़ और तेज हुई है। आर्थिक, सामाजिक कारण हैं, तो राजनीतिक और भी ज्यादा। ये सभी समुदाय किसानी के पेशे से हैं, जो निरंतर घाटे का सौदा साबित हो रहा है, इसलिए युवा मरने–मारने पर उतारू हैं। सैंकडों जाने अभी तक जा चुकी हैं। जाहिर है कि‍ नेता तो ऐसे मसलों पर सिर्फ रोटियां सेकना चाहते हैं, लेकिन प्रगतिशीलता, संवेदना, जनपक्षधरता का दावा करने वाले पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं? क्या ऐसी चुप्पी अपराध नहीं है? एक बार मुकम्मिल समीक्षा कर समाधान क्यों नहीं खोजा जाता?

प्रस्तावना –     आरक्षण खत्‍म नहीं होना चाहिए, इसकी पूरी प्रक्रिया, पद्धति, कार्यान्‍वयन की समीक्षा हो। यदि जरूरत हो तो बढ़ाएं और समयबद्ध कार्यक्रम के तहत पूरा करें। इसकी सियासत पर तुरंत रोक लगे।

  1. जब तक कोई समाज असमानता की इतनी परतों– जातिगत, क्षेत्र, धर्म, नस्‍ल, नियम, विश्‍वास, अंधविश्‍वास, लैंगिक आदि में जकड़ा हो, इनसे मुक्ति की तलाश और प्रयास में कुछ कदम सत्‍ता या शासन को उठाने ही होंगे । उसे चाहे आरक्षण का नाम दें या सकारात्‍मक (Affirmative) कदम का। यह पूरे समाज, राष्‍ट्र की सुख, शांति और विकास के लिए जरूरी है। मिड डे खाना, आंगनबाड़ी स्कूल, अस्पताल से लेकर हर सार्वजनिक स्थलों पर रोज दलितों के साथ भेदभाव और अत्याचार की ख़बरें आती हैं। आरक्षण का विरोध करने वालों का फर्ज है कि पहले इन बुराइयों, भेदभावों के खिलाफ सामने आएं। आरक्षण की जड़ यह असमानता और भेदभाव है।
  2. लेकिन कोई भी कदम, उपचार, नीति उसी रूप में सदा के लिए कारगर नहीं हो सकती। बिल्‍कुल दवा की तरह। उसे बराबर जॉंचने की जरूरत है कि क्‍या उपचार ठीक भी हो रहा है। कहीं उल्‍टा असर तो नहीं हो रहा है। यहां तक कि अच्‍छे प्रगतिशील धर्मों के लिए भी यही सिद्धांत लागू होता है। हिन्‍दी के विद्धान, मनीषी हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन यहां महत्‍वपूर्ण है– ‘जो धर्म परम्‍पराएं वक्‍त के साथ नहीं बदलतीं, जिन पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, वे उस धर्म को भी नष्‍ट कर देती हैं।’ विज्ञान का नाम ही बार-बार अपने को जांचने, परखने, परीक्षण और प्रश्‍न करने का है। इसीलिए जिस वैज्ञानिक युग में हम जी रहे हैं या भारत आगे बढ़ रहा है, वहां हर कार्य के लिए यही वैज्ञानिक विधि अपनाने की जरूरत है। अत: पिछली सदी में शुरू किए आरक्षण के कदम, कसौटियों को नए सिरे से इन्‍हीं समाजशास्‍त्रीय वैज्ञानिक पद्धतियों पर कसा, परखा जाना चाहिए, बल्कि यह मांग की जानी चाहिए कि जब अन्‍य संस्‍थाओं की समीक्षा की गई है तो इस मुद्दे पर सरकारें क्‍यों बचती रही हैं? समीक्षा शब्‍द से ही बेचैनी क्‍यों ?
  1. सामाजिक समानता के रास्‍ते आर्थिक और फिर राजनीतिक बराबरी के लिए लगभग सौ वर्ष पहले आरक्षण की जो शुरुआत मुख्‍यत: दक्षिण और महाराष्‍ट्र में फूले, साहूजी महाराज आदि ने की और सामाजिक बराबरी के मसीहा बाबा साहेब अम्‍बेडकर ने जिसके लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसमें इसे उम्‍मीद के मुताबिक सफलता क्‍यों नहीं मिली? समाज के दबे-कुचले, पिछड़े, साधनहीन वर्गों के लिए गांधी, नेहरू, पटेल की सद्इच्‍छाओं के के बावजूद क्‍यों इन्‍हीं कार्यों में से काशीराम, मायावती या दूसरे राजनेताओं को आगे आना पड़ा है ? आधी शताब्‍दी कम नहीं होती। और इस दौर में शासन भी मोटा-मोटी एक ही पार्टी का रहा। क्‍या नीतियों में कमी रही या शासन की नीयत में? या समाज में गैर बराबरी की संरक्षक सामंती, धार्मिक शक्तियों इतनी मजबूत रहीं कि बराबरी का स्‍वप्‍न अभी भी उतना ही दूर है। या यह गैर बराबरी अब धर्म जाति की अपनी-अपनी सत्‍ता, अस्मिता को कायम रखते हुए जाति विशेष के अंदर भी एक कैंसर की तरह चारों ओर फैल रही है?
  1. क्‍या इन कट्टर बहसों के धुरंदरों में आरक्षण शब्‍द भी एक ऐसे धर्म का यर्थाथ नहीं होता जा रहा कि अपने-अपने भगवानों, पैगम्‍बरों ने जो कह दिया, कर दिया उस पर बहस करना गुनाह होगा, जो बोले उसे फांसी पर लटका दो। क्‍या हर महत्‍वपूर्ण मुद्दे को ‘होली काऊ’ बनाना या घोषित करने से किसी का भी भला होने वाला है? क्‍या संविधान की आस्‍था इसकी इजाजत देती है? क्‍यों यह मूल अधिकार, नीति निर्देशक तत्‍व और संविधान के संशोधन, समीक्षा और प्रगतिशील चेतना के खिलाफ नहीं है?
  1. समीक्षा, संशोधन के चंद उदाहरण– संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भारतीय नौकरीशाही के उच्‍च पदों के लिए की जाने वाली भर्ती प्रक्रिया की कई बार समीक्षा की गई है। इसमें सबसे प्रमुख है वर्ष 1974 में गठित कोठारी समिति, जिसने वर्ष 1976 में अपनी रिपोर्ट दी और संसद में बहस के बाद वर्ष 1979 की सिविल सेवा परीक्षा से उसे लागू किया गया। इसकी क्रांतिकारी सिफारिश थी, अपनी मातृभाषाओं में उत्‍तर लिखने की छूट। अंग्रेजी का एकाधिकार समाप्‍त। वाकई करिश्‍माई था यह कदम। परीक्षा में बैठने वाले उम्‍मीदवारों की संख्‍या एक साथ दस गुना बढ़ गई और अपनी भाषा में पढ़े नौजवान पहली बार अंग्रेजी के दुर्ग में प्रवेश कर सके।

क्‍या इस समीक्षा से फायदा पूरे देश को नहीं हुआ ?

क्‍या यह लोकतंत्र के हित में नहीं हुआ ?

ठीक दस बरस बाद वर्ष 1989 में फिर प्रोफेसर सतीश चंद की अध्‍यक्षता में एक समिति बनी, यह जांचने के लिए कि क्‍या कोठारी समिति की सिफारिशें ठीक हैं? उनका कार्यान्‍वयन ठीक है ? ठीक दस बरस बाद 1999 में प्रोफेसर योगेन्‍द्र कुमार अलघ की अध्‍यक्षता में समि‍ति‍, फिर समीक्षा की गई। नई सरकार ने हाल ही में सीसैट विवाद आदि के चलते फिर एक समिति गठित की है।

क्‍या ऐसी समीक्षा लोकतंत्र के खिलाफ है? नहीं। बल्कि उस कहावत को सार्थक करती है– ‘चलता पानी निर्मला’ यानी जिस नदी का पानी चलता रहता है, वह निर्मल, शुद्ध बना रहता है, ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है।

आरक्षण को इसलिए राष्‍ट्रहित में ऐसे तालाब में बदलने से बचाने की जरूरत है, जिसमें राजनेता और समाज के स्‍वार्थी तत्‍व सिर्फ सत्‍ता की मछलियों की खातिर बदबू  फैला रहे  हैं। शिक्षा के मसले पर भी बार-बार समीक्षा हुई है । 1948 में राधाकृष्‍णन आयोग, 1964 में कोठारी आयोग आदि‍। इसके अलावा, डाक्‍टर जाकिर हुसैन, प्रोफेसर यशपाल समिति ने भी बहुमूल्‍य सुझाव दिए हैं। एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव बार-बार के विवाद के बावजूद एक जीवित लोकतंत्र का उदाहरण हैं।

राज्‍यों के पुनगर्ठन, भाषा आदि के पक्षों पर भी समीक्षा की गई है। प्रशासनिक आयोग का गठन, ज्ञान आयोग भी इसी वैज्ञानिक दृष्टि की कड़ी है।

आजादी के बाद का सबसे चमकीला उदाहरण है, सूचना का अधिकार। क्‍या अंग्रेजों के जमाने में लागू सरकारी गोपनीय नियम (Official secret Act 1923)  से देश चल सकता है ? लाल फीताशाही, भ्रष्‍ट्राचार से लड़ने के खिलाफ सूचना का अधिकार सबसे प्रभावी हथियार शामिल हुआ है। कुछ विद्धानों के अनुसार संसद से भी बेहतर।

क्‍या ‘आरक्षण की बहस’ को भी संसद से मुक्‍त नहीं किया जाना चाहिए ? क्‍या देश में बुद्धिजीवी, पत्रकार, संपादक, समाज विज्ञानी, शिक्षाविद, वैज्ञानिकों की टीम  ऐसी समीक्षा, बहस नहीं कर सकती?

  1. समाज में जातिवाद विशेषकर ग्रामीण भारत में मद्देनजर आरक्षण की जरूरत अभी भी बनी हुई है। सही शिक्षा का अभाव, धार्मिक अंधविश्‍वास और वर्ण, धर्म की जकड़बंदी अभी अपनी अमानवीयता को नहीं छोड़ सकी। मनुष्‍य-मनुष्‍य के बीच भेद का ऐसा कलंक दुनिया कि किसी भी सभ्‍यता में न है, न सोचा जा सकता। दुर्भाग्‍य यह कि ऐसा भयानक कलंक शताब्दियों तक न केवल टिका रहा, बल्कि और क्रूर होता गया। आजादी के बाद या कहें ब्रिटिश काल के अच्‍छे मानवीय पक्षों के सम्‍पर्क में ‘जाति प्रथा’ पर जोरदार हमला हुआ है, लेकिन यह राक्षस अभी मरा नहीं है। लेकिन क्‍यों ? यदि एक दवा कारगर नहीं हो तो दूसरी आजमायी जाए और यहीं इसे जारी रखने और समीक्षा की जरूरत है। क्‍यों निर्धारित कोटा पूरा नहीं हो पाया ? क्‍यों समान शिक्षा या अंतिम आदमी तक शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य पहुंचाने की बजाय पूरी नीतियों ‘क्रीमीलेयर’ बनाने में तब्‍दील हो गई? मुकम्मिल समीक्षा हो, देशव्‍यापी बहस हो और फिर कदम उठाए जाएं।
  1.  समीक्षा के लिए कुछ और जीवंत उदाहरण–

(क): दो वर्ष पहले भारतीय विदेश सेवा की अमेरिका में तैनात एक महिला खाबरगड़े चर्चा में आई थीं । कारण उनकी नौकरानी ने उन पर अत्‍याचार के आरोप लगाए थे । मामला गंभीर था, अमेरिका के कानूनों के अनुसार। लेकिन भारत में महिला अधिकारी के पक्ष में जो आवाजें उठीं, वे उनकी जाति समर्थक ज्‍यादा थीं। तभी पता चला कि अत्‍याचारी दलित है और नौकरानी ईसाई। खैर यह पक्ष अलग बहस की मांग करता है, लेकिन आरक्षण की समीक्षा के संदर्भ महत्‍वपूर्ण बात यह है कि श्रीमती खाबरगड़े के पिता भी आई.एस.एस. सेवा में थे और दलित आरक्षण ले चुके हैं। उनकी बेटी भी उसी का फायदा लेकर विदेश सेवा में है। इनके बच्‍चे जो अमेरिका में पढ़ रहे है, वे भी मौजूदा कानून के अनुसार दलित आरक्षण के हकदार हैं।

क्‍या वाकई इनके बच्‍चों को आरक्षण मिलना चाहिए?

अमेरिका, इंग्‍लैंड में रहते, पढ़ते ये कौन सी अस्‍पृश्‍यता, सामाजिक भेदभाव के शिकार हुए ?

आजादी के बाद दलितों की वो तीसरी-चौथी पीढ़ी, जिसके पिता, दादा उच्‍च सरकारी सेवाओं, विश्‍वविद्यालयों में रहे हैं, महानगरों में जिनका जीवन सबसे पॉश कालोनियों में बीता है, क्‍या वे इस सामाजिक रियायत के हकदार हैं ? मौजूदा वक्‍त में ऐसे हजारों सरकारी अधिकारी हैं, जिनके बच्‍चों ने गॉंव देखा तक नहीं है, वे पढ़ने के लिये इंग्‍लैंड, अमेरिका में रहे हैं, लेकिन भारत में कदम रखते ही उन्‍हें आरक्षण का सहारा चाहिए।

क्‍या यह समता, बराबरी के सिद्धान्‍त के वैसे ही खिलाफ नहीं है, जैसे सवर्णों को मिली जन्मजात विशेषाधिकार ?

क्‍या खुर्जा के किसी गॉंव में मजदूर, मोची का लड़का दलितों में ऐसे सवर्णों के रहते कभी आरक्षण का फायदा उठा पाएगा ?

यदि जरूरत हो तो आरक्षण का प्रतिशत और बढ़ाया जाए, लेकिन समृद्ध (क्रीमी लेयर) को इससे तुरंत बाहर करने की जरूरत है। इन्‍द्रा साहनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमीलेयर के सिद्धान्‍त को एससीएसटी कोटा पर भी लागू करने का सुझाव दि‍या था। ओ.बी.सी. के लिए यह सिद्धांत कुछ कर्मियों के बावजूद लागू हो गया, राजनीतिक दबाव, लोकतंत्र की दुहाई देते हुए इस जरूरी समानता के खिलाफ दलितों का एक वर्ग आज तक डटे हुए है। आरक्षण के नाम पर सामाजिक असंतोष की जड़ें यही हैं। चार बरस पहले राजस्‍थान के गुर्जरों का भी यही दर्द था। पूरा देश जानता है कि राजस्‍थान के मीणाओं ने आदिवासियों के लिए आरक्षित कोटा कैसे हड़प लिया है। जो कोटा बस्‍तर, नागालैंड, लद्दाख, भील, झारखंड के सचमुच आदिवासियों और उनकी संस्‍कृति, पिछड़ेपन को ध्‍यान में रखकर नियत किया गया था, पचास के दशक में दबाव की राजनीति के तहत मीणा एस.टी. समूह में शामिल हो गए, क्‍योंकि वे अपेक्षाकृत समृद्ध हैं, तीन-चार पीढ़ी से प्रशासन में हैं अत: दौड़ में आगे भी। उसी क्षेत्र में रहने वाले गुर्जर इसी से आहत हैं कि वे भी दबाव बनाकर क्‍यों नहीं  आदिवासी के फायदे के हकदार बनें? नतीजा- हिंसा, आंदोलन, रेल रोको, सड़क तोड़ो। फिर जाट भी इसी दौड़ में शामिल हुए। और ताजा मामला गुजरात के पटेलों का है, जिसे बिहार के नीतिश, लालू ने भी तुरंत समर्थन दिया है। कभी पटेलों की मांग के खिलाफ बोलने वाली कांग्रेस पीछे से पटेलों की मांग को हवा दे रही है। भारतीय जनता पार्टी का रवैय्या भी मंडल आयोग से लेकर जाट आरक्षण तक ऐसा ही रहा है।

इस राजनीतिक, सामाजिक विकृति को एक बड़े समीक्षा आयोग से ही हल किया जा सकता है।

  1. यू.पी.एस.सी. के ताजा परिणाम– भारत की उच्‍च नौकरशाही के लिए आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम भी आरक्षण समीक्षा की तुरंत मांग करते हैं। पिछले दो दशकों में गॉंव, देहात पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले उम्‍मीदवार लगातार कम हो रहे हैं। वे चाहे दलित हों या सवर्ण । वर्ष 1979 में जब कोठारी समिति ने अपनी भाषा में परीक्षा देने की इजाजत दी थी, तो पहली पीढ़ी के पढ़े, लिखे, गॉंवों में रहने वाले मोची, बढ़ई, कुम्‍हार, जाटव, मजदूरों के बच्‍चे सफल हुए थे। अब वे पूरी तरह गायब हैं । उनका कोटा वे हड़प रहे हैं, जो शहरों में है, जिनके पिता अफसर हैं जो दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी और शाहजहां रोड में रहते हैं और जिनका माध्‍यम अंग्रेजी है। मौजूदा स्थिति के क्रीमीलेयर अपने ही दलित भाइयों का हक मार रहा है। भाषा, आर्थिक स्थिति के सभी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि ओ.बी.सी. की तरह क्रीमीलेयर एस.सी.एस.टी. कोटा में भी लागू होनी चाहिए और सख्‍ती से।
  2. कुछ बातें क्रीमीलेयर के बारे में– मंडल कमीशन के निर्णय में क्रीमी लेयर शामिल हुआ था और बहुत अच्‍छी मंशाओं के साथ। लेकिन यहां भी राजनीति हु। समानता के सिद्धान्‍त पर इसे भी एस.सी.एस.टी. पर लागू किया जाना चाहिए था। ओ.बी.सी. पर लागू भी हुआ है, तो हास्‍यास्पद ढंग से। जिस देश की सरकारें और योजना आयोग वी.पी.एल के मामले में प्रतिदिन प्रति व्‍यक्ति छब्‍बीस रूपये की आय जीने के लिए पर्याप्‍त मानती हों, वहीं क्रीमीलेयर को तब मानती है, जब प्रतिदिन दो-तीन हजार से ज्‍यादा आय हो। क्‍या प्रति व्‍यक्ति आय और क्रीमीलेयर निर्धारण में कोई वैज्ञानिक दृष्टि अपनायी जाती है या जैसे सवर्ण अपने लिए कोई न कोई जुगाड़ ढूंढ लेते हैं, वैसे ही लोग इन वर्गों में आरक्षण के नाम पर पैदा हो गए हैं। वाकई अमीरों से गरीब नहीं जीत सकते। वे चाहे किसी भी जाति, धर्म के हों– भारतीय परिवेश में ।
  1. जे.एन.यू. का अनुभव इस समीक्षा में मदद कर सकता है और यह है भी उतना है वैज्ञानिक। इसमें जाति का महत्‍व तो है, लेकिन उतना ही वंचित सुविधाओं (Deprivations) का है। जैसे इसके मुख्‍य घटक हैं– जहॉं पैदा हुए, बचपन बीता, आरंभिक शिक्षा हुई ? शिक्षा का माध्‍यम, आर्थिक स्थिति, लड़का या लड़की, पिता का व्‍यवसाय, कॉलेज शिक्षा, जाति आदि। इस फामूले में एक दलित जो बांदा या उड़ीसा, केरल के गॉंव में पला बड़ा है, उसे दिल्‍ली में चाणक्‍यपुरी में पले-बढ़े से पहले रखा जाएगा। सिर्फ जाति के प्रमाण-पत्र से काम नहीं चलेगा।
  1. पिछड़ा आयोग के सदस्‍य रहे और जाने-माने समाजशास्‍त्री धीरूभाई सेठ की टिप्‍पणी भी यहॉं विचारणीय है– ‘आयोग का मेरा अनुभव मुझे बताता है कि जाति प्रथा का असर मंद करने के लिए जो ताकतें और प्रक्रियाऍं खड़ी हुई थीं, वे अब खुद जाति प्रथा की अनुकृति बनती जा रही हैं। प्रगति के कई सोपान चढ़ चुकी पिछड़ी जातियों का एक बड़ा और मजबूत निहित स्‍वार्थ बन चुका है। वे अपने से नीची जातियों के साथ वही सुलूक कर रहे हैं, जो कभी द्विजों ने उनके साथ किया था। मैं आयोग की पहली टीम का सदस्‍य था। कुल मिला कर स्थिति यह बनी है कि आयोग के सदस्‍य, उससे जुड़ी नौकरशाही और पूरा का पूरा क्षेत्र ही इसी जबरदस्‍त निहित स्‍वार्थ की नुमाइंदगी करता नजर आता है। ये लोग मिलकर पूरी कोशिश में रहते हैं कि किसी भी तरह से पिछड़ी जातियों को अत्‍यधिक पिछड़े और कम पिछड़े में वर्गीकृत न होने दिया जाए। जब मैं आयोग में था, उस समय भी प्रभुत्‍वशाली पिछड़ी जातियों द्वारा ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ प्रतिरोध होता था।

आयोग की पहली टीम का ज्‍यादातर वक्‍त तो मंडल आयोग द्वारा बनाई सूची को तर्कसंगत बनाने में खर्च हो गया, क्‍योंकि‍ सूची में बड़ी खामियॉं थीं। अब स्थिति यह है कि मजबूत पिछड़ी जातियों के हितसाधक आरक्षण के फायदे निचली ओ.बी.सी. जातियों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं। खासतौर से दक्षिण के ओ.बी.सी. जिन्‍हें सबसे पहले आरक्षण मिल गया था। इन तगड़ी ओ.बी.सी. जातियों को सत्‍ता भी मिल गई है। वे आरक्षण के फायदे अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते। जो समुदाय पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनकी शिनाख्‍त नहीं की जा रही है, और न की जाएगी ।

इंद्रा साहनी वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विरोध में जाता है यह रवैया । लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की एक समस्‍या होती है कि एक सीमा के बाद नौकरशाही और राजनीतिक हित मिल कर उन्‍हें आपस में तोड़कर हितों के औजार में बदल देते हैं । यह हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के पिछड़ेपन का चिह्न है । (‍पृष्‍ठ, 102, 103 और 105) (‍पुस्‍तक : सत्‍ता और समाज- संपादन- अभय कुमार दुबे)

पिछड़ों के लिए आरक्षण की पूरी बहस पर इससे बेहतर टिप्‍पणी नहीं हो सकती। पुस्‍तक में ‘आरक्षण के पचास साल’ खंड के अंतर्गत चार उप शीर्षकों में इस मुद्दे पर विचार किया है । ये अध्‍याय हैं- धर्म, जाति निरपेक्ष नीति के विविध आयाम; आरक्षण विरोधियों के तर्कों की असलियत; आरक्षण नीति; एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता थी अति पिछड़ों और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सवाल । धीरूभाई के शब्‍दों में- आरक्षण के जरिए प्रगति के अवसरों को हड़पने की इस होड़ ने हमारी लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति को अलोकतांत्रिक रुझानों से ग्रस्‍त कर दिया है। इसके कारण झूठे-सच्‍चे आश्‍वासन दिए जाते हैं, और अंतत: समाज को तनावग्रस्‍त होना पड़ता है। बिरादरियों के बीच का भाई-चारा खत्‍म होता है। गुर्जरों को दिया गया आश्‍वासन तो एक उदाहरण है, मुसलमानों को धर्म आधारित आरक्षण देने के अध्‍यादेश तक जारी किए जा चुके हैं। हिंदू समाज की संरचना की जानकारी रखने वाला कोई भी प्रेक्षक जानता है कि प्रजापतियों (कुम्‍हारों) को समाज में अछूत या दलित नहीं माना जाता। लेकिन, पिछले दिनों उन्‍हें भी (उत्‍तर प्रदेश में प्रजापतियों को) अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रयास किया जा चुका है। (पृष्‍ठ 244)’

संक्षेप में (आरक्षण नीति : एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता) धीरू भाई के निष्‍कर्ष हैं:-  इन्दिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरक्षण का अनुचित लाभ उठा रहे समुदायों की शिनाख्‍त की जाए और उन्‍हें इस लाभ से बाहर किया जाए। आरक्षण नीति का पुन: संस्‍कार करने के लिए आरक्षित समुदायों के बीच पूरे देश में न केवल राज्‍य स्‍तर पर, बल्कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनिवार्य तौर से श्रेणियां बनाना उचित होगा। मसलन, अनुसूचित जनजातियों में मीणा और जाटव जैसे समुदाय हैं, जो वाल्‍मीकियों और पासियों के मुकाबले बहुत आगे बढ़ चुके हैं। उपश्रेणियॉं बनाने से यह भी पता लग सकेगा कि आरक्षण का लाभ उठाने से वंचित रह गई जातियां कौन-कौन सी हैं और अत्‍यधिक कमजोर जातियों को आरक्षण का लाभ उठाने के काबिल बनाने के कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं । अगर इन पहलुओं पर जोर नहीं दिया जाएगा तो पूरी बहस आरक्षण के प्रतिशत के आस-पास ही सिमट कर रह जाएगी। पिछड़े वर्गों में घुस आए अगड़े समुदायों और उनके बीच बन चुके जातिगत कोटिक्रम का स्‍वार्थ यही है। (पृष्‍ठ 246 और 247)

  1. एम्‍स, अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय सरीखे अल्‍पसंख्‍यक विश्‍वविद्यालय, शिक्षण संस्‍थान, विदेशी विश्‍वविद्यालयों में आरक्षण का सवाल जैसे सैंकड़ों ज्‍वलनशील बहसें हवा में जिन्‍दा हैं और कभी भी 1990 के मंडल आयोग की याद ताजा करा सकती हैं । कुछ वर्ष पहले एम्‍स में यह दोहराया जा चुका है। गुजरात में पटेल लामबंद हो रहे हैं । जाट और गुर्जर पहले से ही सड़कों पर हैं। वक्‍त का तकाजा है कि‍ धीरूभाई सेठ जैसे समाजशास्‍त्री, चिंतक, गैर पार्टी कार्यकर्ता की बातों पर ध्‍यान देकर सरकार ‘क्रीमीलेयर’ को बाहर करते हुए आरक्षण को और प्रभावी बनाए। देश हित के लिए भी और समाज के हित के लिए भी ।
  2. हाल ही में हुए एक महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन कास्‍ट इन ए डिफरेंट माउल्‍ड (caste in a different mould; understanding the discrimination) लेखक : राजेश शुक्‍ला, सुनील जैन, प्रीति कक्‍कर बिजनेस स्‍टैंडर्ड का प्रकाशन 2010) में दिए गए तथ्‍य आंखें खोलने वाले हैं। संक्षेप में जहां उत्‍तर प्रदेश में एक दलित की औसत आय उनचालीस हजार रुपये प्रतिवर्ष है, वहीं पंजाब में तिरेसठ हजार है। बिहार में ओबीसी की औसत आय चालीस हजार है, जबकि महाराष्‍ट्र में चौहत्‍तर हजार। कर्नाटक में एक आदिवासी की औसत आय प्रतिवर्ष बासठ हजार रुपये हैं तो बिहार में सवर्ण जाति की भी सिर्फ इक्‍यावन हजार। इतना ही अंतर आदिवासी जनता के बीच है। एक अनपढ़ आदिवासी परिवार की औसत आय केवल साढ़े बाइस हजार प्रतिवर्ष है, जबकि आदिवासी ग्रेजुएट की पिचासी हजार। गांव के आदिवासी की औसत आय सैंतीस हजार रुपये है, तो शहरी का एक लाख से ज्‍यादा। यानी देश के अलग-अलग हिस्‍सों में सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन की तस्‍वीर इतनी भिन्‍न है कि उसे सिर्फ जाति के नाम पर इकहरे मानदंड से व्‍याख्‍यायित नहीं किया जा सकता। इस पुस्‍तक के सभी आंकड़े धीरूभाई की स्‍थापनाओं को प्रमाणित करते हैं ।

दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी में रहने वाले दलित, आदिवासी किसी भी पैमाने से आरक्षण के हकदार नहीं हैं, बल्कि अपनी ही जाति के वंचितों की बाधा बन रहे हैं। आज यदि आरक्षण और अपनी भाषा के अप्रतिम योद्धा लोहिया होते तो धीरूभाई सेठ, राजेंद्र सच्‍चर, वीजी वर्गीज और दूसरे विद्वानों की तर्ज पर खुद अपने नारे और उसके सिद्धांत को बदल देते। वे पांच साल इंतजार के हक में भी नहीं थे ! 75 वर्ष के बाद तो आरक्षण की समीक्षा होनी ही चाहिए। ख़त्म करने का तो सवाल ही नहीं है।

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

फीसद की अंधी दौड़ : अनुराग

percentage

पि‍छले दि‍नों हमारे पड़ोस रह रहे आठ-नौ साल के यश का रिजल्ट घोषित हुआ। मैंने उससे पूछा कि पास हो गया? उसने ‘हां’ में सिर हिला दिया। मैंने अगला सवाल किया कि कौन-सी क्लास में आ गया है। उसने जवाब दिया कि पांचवीं में। मैंने मुस्कराते हुए कहा कि मिठाई तो बनती है। उसने मायूसी से कहा कि नहीं। मैंने पूछा कि क्यों? उसने उत्तर दिया कि नम्बर कम आए हैं। मैंने अगला सवाल किया कि कितने नंबर आए हैं? उसने कहा कि 93 प्रतिशत। मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए कि यह तो बहुत अच्छे नंबर है। वह बोला कि मेरा 96 परसेंट का टारगेट था। तीन परसेंट कम रह गए। यह कहते हुए उसका मुंह और लटक गया।

यश तो फिर भी फोर्थ में पढ़ रहा था, नर्सरी-केजी वाले बच्चों का भी कम बुरा हाल नहीं है। ‘स्टार कम क्यों आए’ का डंडा लिए अभिभावक हर समय सिर पर सवार हैं। उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों की तर्ज पर दूसरों बच्चों से तुलना और बुरा-भला कहना आम बात है। यह घर-घर की कहानी है।

नंबरों के प्रतिशत को लेकर हमारे देश में इस कदर मारामारी है कि समझ और ज्ञान की तो बात ही नहीं होती। वह स्कूल अच्छा जिसके छात्रों के अधिक नंबर आएं और बच्चा भी वही दुलारा, जो अधिक-से-अधिक नंबर लाए। स्कूल भी इसकी आड़ में अभिभावकों का खूब आर्थिक शोषण करते हैं। वह अपने स्कूल का रिपोर्ट कार्ड बताते हैं कि हमारे यहां इतने बच्चों के 97-98 परसेंट और इतनों के 90 परसेंट से अधिक नंबर आए हैं। जब बच्चों के नंबर अधिक आ रहे हैं तो फीस, डवलपमैंट चार्ज और अन्य चार्ज अधिक लगेंगे ही। इसलिए बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आते ही स्कूलों के बोर्ड और बेनर जगह-जगह दिखाए देने लगते हैं, जिनमें उस स्कूल के सभी अधिक अंक लाने वाले बच्चों के फोटो और उनके अंक प्रतिशत को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है।

अभिभावक भी बच्चे को एडमीशन दिलाते समय मान लेते हैं कि सबसे अधिक अंक लाने वालों में उनका बच्चा भी होगा। वे यह भूल जाते हैं कि सबकी अलग-अलग क्षमताएं हैं। रुचियों में भी अंतर है। जिस बच्चे मन पढ़ाई में न लगता हो, उसे खेल, संगीत, नृत्य, रंगमंच, लेखन आदि में रुचि हो सकती है। एक प्रतिभाशाली बच्चे को केवल इसलिए नष्ट कर दिया कि उसके नंबर कम आते है। यह भी मान लिया कि बच्चा पढऩे में सामान्य से भी नीचे है। उसकी किसी और क्षेत्र में रुचि भी नहीं है। वह डॉक्टर, इंजीनियर या कोई अन्य अधिकारी नहीं बन सकता। तो भी उसे आत्महत्या के लिए तो विवश नहीं किया जा सकता। कई बार बहुत अच्छे नंबर वाले बच्चे भी एक-दो परसेंट के चकर में या कम्पीटन की तैयारी कर रहा बच्चा मनपसंद ब्रांच नहीं मिलने के डर से आत्महत्या कर ले रहा है।

इन आत्महत्यों के लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले दिनों परीक्षा में अच्छे नंबर न ला पाने के डर से होशंगाबाद में पशु चिकित्सक के इकलौते बेटे और सागर जिले के बीना में शिक्षक की बेटी ने फांसी लगाकर जान दे दी। छात्र सीबीएसई से कक्षा 12वीं और छात्रा मध्यप्रदेश बोर्ड से कक्षा 12वीं की परीक्षा दे रही थी। छात्र ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि ‘सॉरी मम्मी-पापा, मुझसे फिजिक्स नहीं बनती। मैं फेल नहीं होना चाहता।‘ छात्रा ने अपने रजिस्टर में लिखा था, ‘पापा मैं अंग्रेजी में अच्छे नंबर नहीं ला सकती, मैं जा रही हूं।‘

बोर्ड परीक्षाओं के परि‍णाम आने का दौर शुरू हो चुका है। डर लगा रहता है कि‍ कि‍सी बच्‍चे के आत्‍महत्‍या करने की खबर पढ़ने-सुनने को न मि‍ल जाए।

केवल छात्रों की काउंसिलिंग करके इन आत्महत्याओं को नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है। खासतौर से मूल्यांकन पद्धति को लेकर। न जाने क्यों इन बच्चों की मौत राजनीतिज्ञों को परेशान नहीं करती? बुद्धिजीवि भी इसे सहज भाव से ले लेते हैं। विभिन्न मुद्दों को लेकर आए दिन सड़क पर उतरने वालों को भी यह मुद्दा आंदोलन के लायक नहीं लगता।

गागर में सागर : स्मिता

vigyan aur hum

विज्ञान को अगर रोचक तरीके से लिखा जाए, तो किशोर छात्रों के लिए यह विषय जानकारीपरक होने के साथ-साथ मजेदार भी हो सकता है। विज्ञान को कुछ ऐसा ही बनाने का प्रयास किया है वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी ने। देवेन्द्र लगभग 25 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें से ज्‍यादातर विज्ञान पर आधारित हैं। ‘विज्ञाननामा’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि प्रमुख किताबें हैं, जो किशोरों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। विज्ञान को सरल और रोचक अंदाज में लिखने के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लेखक उत्तराखंड के नैनीताल जिले से हैं। जो व्यक्ति प्रकृति के बीच ही पला-बढ़ा है, उससे बेहतर प्रकृति को और कौन समझ सकता है?

देवेन्द्र ने ‘वि‍ज्ञान और हम’ में कम शब्दों में विज्ञान के कई पहलुओं को खेल-खेल में बताया है। ‘सुनो मेरी बात’ अध्याय में लेखक ने अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों को याद करते हुए विज्ञान के प्रति अपनी रुचि के पनपने की बात बताई है। आसमान में चमकते सूरज, चांदनी बिखेरते चांद, आकाश में अनगिनत तारों, पहाड़, घाटियों, मैदानों, नदियों, पेड़-पौधों के बारे में भी ढेरों सवाल रहते हैं। अमीर खुसरो की एक पहेली ‘एक थाल मोती भरा..’ की मदद से लेखक ने सौरमंडल के बारे में बड़े ही रोचक अंदाज में बताया है। उन्होंने एक पत्र के माध्यम से पृथ्वी के बारे में कुछ खास जानकारियां दी हैं, जिससे जटिल टॉपिक भी पठनीय बन जाता है। आगे एलियन के माध्यम से पृथ्वी, उसकी गोलाई, लंबाई, भार, केंद्र के तापमान आदि के बारे में बिल्कुल अलग तरीके से पेश किया है। इसके अलावा, समुद्र की अनोखी दुनिया, धरती के तपने और पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में बड़े ही आकर्षक ढंग से बताया है।

‘ताबीज’ नाटक के माध्यम से उन्होंने अंधविश्वासों के पीछे के सत्य को उजागर करने की कोशिश की है। इस किताब की जान है महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, वैज्ञानिक मेघनाद साहा और माइकेल फैराडे के जीवन की झलकियों की दिलचस्प अंदाज में प्रस्तुति। यदि कहानी के फॉर्मेट और सरल भाषा में बात कही जाए, तो कठिन विषय भी आसानी से समझा जा सकता है। माता-पिता अपने बच्‍चों के लिए यह किताब खरीद कर उनका ज्ञानवर्धन कर सकते हैं।

(दैनि‍क जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण्‍, 08 मई 2016 से साभार)

पुस्‍तक- वि‍ज्ञान और हम
लेखक- देवेन्‍द्र मेवाड़ी
मूल्य – अजि‍ल्‍द-140 रुपये, सजि‍ल्‍द – 260 रुपये
प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजि‍याबाद-201014
ईमेल-anuraglekhak@gmail.com