Archive for: April 2016

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत आप सब के लिए (अटैचमेंट खोलें). बच्चों के साथ काम करने वाले सभी साथियों से आग्रह है कि समय निकालकर कभी इस गीत को बच्चों के साथ गा सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए गीत के बोल नीचे दिए गए हैं. गीत और संगीत जाने-माने शिक्षाविद श्री आनंद द्विवेदी का है और इसे उनके निर्देशन में चलने वाले स्कूल- आश्रम पर्यावरण विद्यालय, अंजनीसैण (उत्तराखंड) के बच्चों और शिक्षकों ने गाया है.
………………………………………………….
चलो मिटाएं नफरत इस संसार से
मिलजुल कर हम रहना सीखें प्यार से
धरती दबी हुई जुल्मों के भार से
सहमी है इन्सानी अत्याचार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
सदियां बीतीं लड़ना हम छोड़ न पाए
नफरत की मजबूत बेडि़यां तोड़ न पाए
कभी धर्म के, भाषा के, रंग-जाति के
कभी देश के नाम पे खून बहाते आए
सीमाएं हैं धधक रही अहंकार से
टूट रहे हम अपने ही परिवार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
यारो बहुत हो गया नफरत का रस्ता छोड़ें
आओ फिर से घरती के टुकड़ों को जोड़ें
सीमाएं हों प्रेम के पावन संगम
आओ मिलकर आज वक्त की धारा मोड़ें
हम न गुलामी झेलेंगे लाचार से
चलों संवारें धरती मां को प्यार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
(आशुतोष उपाध्‍याय जी के सौजन्‍य से)

भोजन का सफ़र : आशुतोष उपाध्‍याय

digestion

यह नाटक मनुष्य के भोजन की पाचन यात्रा पर आधारित है. क्या होता है जब हमारा भोजन हमारे मुंह के भीतर जाता है? भोजन की यात्रा के जरिये बच्चों को पाचन तंत्र और पाचन क्रिया से परिचय कराने का यह बड़ा मनोरंजक प्रयास है-

पात्र परिचय

भोजन     : पोषक व अपोषक

मुंह          : मुख्त्यार सिंह

भोजन नली  : इसोफेगस फिसलस

आमाशय : आमाशय महाशय

लिवर      : जिगर जरूराबादी

पित्ताशय  : पैन्क्री आज

छोटी आंत  :   छुटकी

रक्त वाहिनियां   : लाल सैनिक

बड़ी आंत : बड़की

मलाशय  : गोबर भंडारी

मलद्वार    : लू का

कोरस

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

: सूत्रधार :

मेहरबान, कदरदान! लीजिये आपके मनोरंजन के लिए पेश है हमारा नया नाटक “भोजन का सफ़र”. इस नाटक में आप देखेंगे भोजन के दो जवान बेटे, माफ़ कीजिये दो हिस्से- यानी पोषक और अपोषक किस तरह पाचन तंत्र की यात्रा को अंजाम देते हैं. ये कहानी है पोषक और अपोषक की, जो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देते हैं. इस बेमिसाल सफ़र में उनका सामना होता है मुख्त्यार सिंह यानी मुंह से. इसोफेगस फिसलस यानी भोजन नली से, महाशय आमाशय से. जिगर ज़रूराबादी यानी लिवर व पेंक्री आज यानी पित्ताशय नाम के दो शायर पहलवानों से. फिर वे मिलते हैं छुटकी और बड़की दीदी यानी छोटी व बड़ी आंत से. इसके बाद पोषक और अपोषक बिछुड़ जाते हैं. पोषक को लाल सैनिक यानी रक्त वाहिनियां अपने साथ ले जाती हैं जबकि अपोषक गोबर भंडारी के किले यानी मलाशय तक पहुंच जाता है, जहां उसे लू का यानी मलद्वार धक्के मार के बाहर निकाल देता है.

दृश्य-1: मुंह

बड़ी-बड़ी मूंछों वाला मुख्त्यार सिंह एक हाथ में दांत वाली तलवार और दूसरे में लार की बोतल लेकर खड़ा है. पोषक और अपोषक सज-धजकर मुख्त्यार सिंह के दरवाजे पर आते दिखाई देते हैं.

मुख्त्यार सिंह       :        आओ दोस्तो आओ. कब से राह देख रहा हूं तुम दोनों की. हमारी छोटी और बड़की बड़ी देर से कुलबुला रही हैं तुम्हारे लिए. ये देखो दांत वाली मेरी तलवार और ये रही लार की बोतल. दोनों तैयार है.

  (पोषक-अपोषक के नजदीक पहुंचने पर उन्हें सूंघता और छूता है) ओहो.. आज तो बड़ी खुशबू बिखेर रहे हो तुम दोनों…! अरे.. बड़े गरमा-गरम भी लग रहे हो..!!

पोषक        : तसल्ली रखो मुख्त्यार भैया. ऐसी भी क्या जल्दी है. मगर एक रिक्वेस्ट है हमारी.

मुख्त्यार सिंह       :        रिक्वेस्ट? कैसी रिक्वेस्ट??

अपोषक    : इस बार खूब बारीक काटना हमें. बारीक काटे बिना निगलोगे तो आपके पड़ोसी मिस्टर इसोफेगस को बड़ी तकलीफ होगी.

पोषक        : और हां, लार फेंकने में भी कतई कंजूसी मत करना. पिसाई ठीक होगी तो हम फिसलते हुए मजे से लुढ़क जायेंगे.

अपोषक    : याद है, पिछली बार तुमने ठीक से लार नहीं फैंकी थी! जानते हो क्या हुआ? इसोफेगस सर हमसे उलझ गए. कितनी देर तक उन्होंने हमें अपनी चौकी पर रोके रखा!

पोषक        : वो तो अच्छा हुआ हिचकियां सुनकर किसी ने तुम्हारे दरवज्जे से खूब सारा पानी उड़ेल दिया. तब जाकर हम मिस्टर इसोफेगस की चौकी से निकल पाए.

मुख्त्यार सिंह       :        ये अच्छा याद दिलाया बेटा. आज मैं तुम्हें कायदे से काट-पीसकर भेजूंगा. लार का क्या कहना… एक नंबर की मूडी है. कभी-कभी तो खाने के नाम पर ही बरसने लगती है. और कभी मुंह ठूंस दो तो भी रिसने का नाम नहीं लेती. मैं तो कहता हूं तुम्हारे स्वाद में दम होगा तो खुद को वो रोक नहीं पाएगी.

अपोषक    : अबकी बार मम्मी ने हमें अच्छे से तैयार कर के भेजा है. मिर्च-मसाला डाल के खूब चटपटा बनाया है. देखते हैं कैसे नहीं निकलती लार की बच्ची!

पोषक        : बातें बहुत हो गईं मुख्त्यार भैया. हम ठंडे हुए जा रहे हैं. जल्दी से हाथ बढ़ाओ और हमें भीतर खींच लो.

मुख्त्यार सिंह दोनों को दरवाजे से भीतर खींचकर उनपर तलवार चलाता है और बीच-बीच में लार की बोतल उडेलता है. पोषक और अपोषक कचर-कचर की आवाज करते हुए नीचे गिर जाते हैं.

दृश्य-2: भोजन नली

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए इसोफेगस फिसलस की चौकी पर आते हैं. इसोफेगस अपने पांवों का गेट बनाकर खड़ा है. दोनों गेट के भीतर जाने को आतुर हैं.

पोषक-अपोषक        :         गुड मॉर्निंग मिस्टर इसोफेगस! प्लीज अलाऊ अस टू गो इनसाइड. यू नो, छुटकी एंड बड़की दीदीज आर ईगरली वेटिंग फॉर अस.

इसोफेगस   : वेलकम किड्स. दिस टाइम यू लुक फ्रेश एंड लुब्रिकेटेड. गुड, गुड, वैरी गुड! मेनी टाइम्स यू कम अनकट एंड ड्राई. इट पेन्स मी अ लॉट!

पोषक और अपोषक इसोफेगस के पांवों के नीचे से कठिनाई से निकलते हैं. वह उन्हें पीछे से लात मारकर आगे बढ़ाता है.

दृश्य-3: आमाशय

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए आमाशय महाशय के दरवाजे पर पहुंचकर उन्हें आवाज लगाते हैं.

पोषक        : महाशय जी… ओ महाशय जी… सो गए क्या?

आमाशय    : आया जी आया… अरे मैं तो जाने कब से तुम्हारी राह देख रहा था. इंतजार में मेरा जी खट्टा हो जाता है.

अपोषक     : खट्टा? वो क्यों महाशय जी?

आमाशय    : तुम्हें याद करते ही मेरे भीतर तेज़ाब के आंसू निकलने लगते हैं. ना जी ना, ये तो ख़ुशी के आंसू होते हैं. तुम दोनों से बड़ा प्यार है न मुझे.

पोषक        : हां. हमें भी आपके आंसुओं में डुबकी लगाने में बड़ा मज़ा आता है. तेज़ाब हमारे पोर-पोर में घुस जाता है.

अपोषक     : और महाशय जी आप हमें अपनी गोद में बिठाकर झुलाते भी तो हो. हमारा बदन मथकर मट्ठा हो जाता है.

आमाशय    : अच्छा.. अब और न तरसाओ. जल्दी से भीतर आकर तेज़ाब के तालाब में डुबकी लगा लो. आओ.. आओ.

पोषक और अपोषक आमाशय के घुटनों के नीचे से सरकते हुए आगे बढ़ते हैं. उनके मुंह से छपाक-छपाक की आवाजें निकलती हैं. वे तालाब में नहाने का अभिनय करते हैं.

 दृश्य-4: लिवर (जिगर) और पित्ताशय

आमाशय से बाहर निकलते ही पोषक और अपोषक को दो पहलवान- जिगर ज़रूराबादी और पैन्क्री आज मिलते हैं. दोनों पहलवान शायराना मिजाज़ के हैं.

जिगर       :           जिगर नाम है, ज़रूरी काम है अपना,

तले-भुनों को रसों से पचा के रखना.

जो पचे नहीं, वो सूरमा-ए-सफर निकले

ढाल बदबू में उन्हें भी बढ़ा के रखना.

पैन्क्री आज  :        वाह, वाह…! क्या शेर किल किया है ज़नाब! मगर एक ठो इधर वाला भी सुनिए:

जो मीठे होते हैं वो जानलेवा हो सकते हैं,

दाग जवानी के क्या बुढ़ापे में धो सकते हैं?

मीठी चीज़ों पे कंट्रोल हमारी ड्यूटी है

कड़वे बीज भी सेहत के लिए बो सकते हैं.

पोषक        : सलाम जिगर साहब, सलाम पैन्क्री साहब… आज तो महफिल सजा के बैठे हैं आप दोनों!

अपोषक    : अरे कुछ हमें भी तो सुनाइये हुज़ूर.

जिगर       : क्यों नहीं, क्यों नहीं… मुलाहिजा फरमाइए..

पोषक तत्वों के बिना नहीं भोज में जान,

चटपट खाना देखके क्यों होता अभिमान.

क्यों होता अभिमान जंक औ कचरा खाते,

बदन को कुछ ना लगता, सौ दफे टट्टी जाते.

पैन्क्री आज :        अपोषक की महिमा कोई कम नहीं है,

भोजन में इनके बिना दम नहीं है.

जो इनको नियम से चबा के न खाता,

सज़ा के तौर पे उसका पेट सूख जाता.

पोषक        : वाह, वाह… आज तो तबियत खुश कर दी आपने.

अपोषक    : लाइए अब जल्दी से हमें हमारी सौगात दीजिये ताकि हम छुटकी और बड़की दीदी के दीदार कर सकें.

दोनों पहलवान अपनी-अपनी बोतलों से पोषक और अपोषक पर कुछ छिड़कते हैं. छींटे पड़ते ही पोषक और अपोषक अँधेरे की ओर भाग जाते हैं.

दृश्य-5: छोटी आंत

पोषक और अपोषक छोटी आंत के दरवाजे पर खड़े हैं. छोटी आंत उन्हें देखकर ख़ुशी से नाचने लगती है.

छुटकी       : आखिर आ ही गए तुम दोनों. तुम्हारे इंतज़ार में मैं कब से कुलबुला रही हूं.

पोषक        : छुटकी दीदी, हम आ तो गए हैं. लेकिन मेरी एक शिकायत है. तुम हर बार हम दोनों को जुदा कर देती हो. यह ठीक नहीं. हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं. हम हमेशा साथ रहना चाहते हैं.

छुटकी       : मैं जानती हूं, लेकिन क्या करूं लाल सैनिक सिर्फ पोषक को ही अपने साथ ले जाते हैं. वे कहते हैं अपोषक उन्हें नहीं चाहिए.

अपोषक    : (चिढ़कर) आखिर मुझे ले जाने में उन्हें दिक्कत क्या है? क्या मैं भोजन का ज़रूरी हिस्सा नहीं हूं?

छुटकी       : कौन कहता है ज़रूरी हिस्सा नहीं हो? तुम्हारे बिना पाचन क्रिया पूरी नहीं होती. लेकिन खून में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं. अगर तुम खून में पहुंच गए तो नुकसान ही पहुंचाओगे. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी वजह से शरीर बीमार पड़ जाय.

अपोषक    : नहीं नहीं मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ हो. मुझे बिछुड़ना  मंज़ूर है पर बदनामी नहीं.

(पोषक से) विदा दोस्त. हमारी जुदाई का समय आ गया है. तुम इन सैनिकों के साथ लाल सागर के सफ़र में निकलो. मुझे हमेशा की तरह बड़की दीदी के पास जाना होगा.

पोषक        : विदा मेरे दोस्त.

(दोनों गले मिलते हैं और गाते हैं.)

ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे

तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे…2

ऐ मेरी जीत तेरी जीत, तेरी हार मेरी हार

सुन ऐ मेरे यार

तेरा ग़म मेरा ग़म, मेरी जान तेरी जान

ऐसा अपना प्यार

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

सब से दुश्मनी

ये दोस्ती…

छुटकी       : आओ पोषक, लाल सैनिक तुम्हें लेने पहुंच गए हैं.

लाल सैनिक पोषक को अपने कंधों पर उठा के ले जाते हैं. अपोषक आगे बढ़ता है और बड़की के दरवाजे पर पहुँच जाता है.

दृश्य-6: बड़ी आंत

अपोषक बड़ी आंत के दरवाजे पर खड़ा है. बड़ी आंत उसका स्वागत करती है.

बड़की        : आओ अपोषक. तुम्हारे बिना मेरा घर खाली-खाली लग रहा था. यह तुम्हारे हाथ में क्या है?

अपोषक    : ओह… ये तो पोषक का पानी है. विदाई के वक्त मैं उसे लौटाना भूल गया. अब क्या करूं? पानी के बिना वह लाल सागर का सफ़र कैसे करेगा?

बड़की        : फिक्र मत करो अपोषक. इस पानी को मुझे दे दो. मैं उसे पोषक के पास पहुंचा दूंगी.

अपोषक    : बहुत बहुत धन्यवाद बड़की दीदी. अब मैं निश्चिन्त होकर आगे जा सकता हूं.

बड़की        : ज़रूर जाओ मगर थोड़ा ध्यान से. आगे का रास्ता अंधेरा और बदबूदार है. अपने आसपास के पानी का ध्यान रखना. गन्दे पानी में जाना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं.

अपोषक    : हां, पिछली बार गंदे पानी के कारण मुझे दस्त बनाना पड़ा था. बार-बार निकलने से मेरी हालत खस्ता हो गयी थी. अच्छा दीदी अब चलता हूं. नमस्ते.

दृश्य-7: मलाशय व मलद्वार

अपोषक आगे बढ़कर गोबर भंडारी के घर पहुंचता है. हट्टे-कट्टे अपोषक को देखकर गोबर खुश हो जाता है.

गोबर भंडारी          :        आओ अपोषक. इस बार तुम बड़ी अच्छी सेहत लेकर आये हो!

अपोषक    : माफ़ करना भंडारी जी, पिछली बार मैंने आपको मुसीबत में डाल दिया था. इस बार मैं गंदे पानी से दूर ही रहा हूं. कोई तकलीफ नहीं होगी आपको.

गोबर भंडारी          :        पानी से ज्यादा दूर भी मत चले जाना. तुम ज्यादा कड़क हो गए तब भी मेरी मुसीबत बढ़ जाएगी.

(लू का को आवाज देता है) अरे लू का! कहां मर गया? जल्दी से आ और अपोषक को बाहर धकेल.

सिकुड़ता-फैलता लू का दौड़ता हुआ आता है और अपोषक का हाथ पकड़ता है.

लू का        : ठीक से पांव जमाकर कूदना अपोषक भाई. वरना बाहर गिरते ही तुम्हारा कचूमर निकल जाएगा.

अपोषक    : धन्यवाद लू का. तुम मेरा कितना ख़याल रखते हो. मुझे हल्का सा धक्का तो दो ताकि मैं हवा में कूद सकूं.

लू का अपोषक को धक्का देता है. धक्का देते ही जोरदार धमाका होता है और अपोषक एक ढेर बनकर ज़मीन पर गिर जाता है.

सारे कलाकार मंच पर वापस आते हैं और पहला वाला कोरस फिर से गाते हैं.

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी  

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

पाचन के इस किस्से को तुम याद हमेशा रखना

बॉडी पर जो ख़तरा लाये उसको कभी न चखना

कि पानी साफ़ पिला मितरा

कि पानी खूब पिला मितरा

कि सबके हाथ धुला मितरा

समय पर खूब सुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

एक शब्‍दयोगी की आत्‍मगाथा : अनुराग

Shabdvedh

शब्‍दों के संसार में पि‍छले सत्‍तर साल से सक्रिय अरविंद कुमार को आधुनि‍क हिंदी कोशकारि‍ता की नीवं रखने का श्रेय जाता है। कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए अपना सब कुछ दांव में लगाने वाले अरविंद जी का जीवन संघर्ष भी कम रोमांचक नहीं है। पंद्रह साल की उम्र में उन्‍होंने हाई स्‍कूल की परीक्षा दी और पारि‍वारि‍क कारणों से रि‍जल्‍ट आने से पहले ही दि‍ल्‍ली प्रेस में कंपोजिंग से पहले डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटरी सीखने के लि‍ए नौकरी शुरू कर दी। एक बाल श्रमि‍क के रूप में अपना कॅरि‍यर शुरू करने वाले अरविंद कुमार कैसे दि‍ल्‍ली प्रेस में सभी पत्रि‍काओं के इंचार्ज बने, कैसे अपने समय की चर्चित फि‍ल्‍म पत्रि‍का ‘माधुरी’ के संस्‍थापक संपादक बन उसे एक वि‍शि‍ष्‍ट पहचान दी और फि‍र कैसे रीडर डायजेस्‍ट के हिंदी संस्‍करण ‘सर्वोत्‍तम’ की की शुरुआत कर उसे लोकप्रि‍यता के शि‍खर तक पहुंचाया, ये सब जानना, एक कर्मयोगी के जीवन संघर्ष को जानने के लि‍ए जरूरी है।

कोशकार अरविंद कुमार के जीवन के वि‍भि‍न्‍न पहलुओं और कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए गए उनके कार्यों को समेटे हुए पुस्‍तक ‘शब्‍दवेध’ एक दस्‍तावेजी और जरूरी    कि‍ताब है। अरविंद जी के जीवन और कर्मयोग के अलावा इस दस्‍तावेजी पुस्‍तक में प्रकाशन उद्योग के वि‍कास और हि‍न्‍दी पत्र-पत्रि‍काओं के उत्‍थान-पतन की झलक भी इसमें मि‍लती है। यह पुस्‍तक नौ संभागों पूर्वपीठि‍का, समांतर सृजन गाथा, तदुपरांत, कोशकारि‍ता, सूचना प्रौद्योगि‍की, हिंदी, अनुवाद, साहि‍त्‍य और सि‍नेमा में बंटी है।

समांतर कोश बना कर हिंदी में क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार की यह अपनी तरह की एकमात्र आत्मकथा है। कारण- वह अपने निजी जीवन की बात इस के पहले संभाग पूर्वपीठिका के कुल 21 पन्नोँ मेँ निपटा देते हैं। जन्म से उस दिन तक जब वह माधुरी पत्रिका का संपादक पद त्याग कर दिल्ली चले आए थे और लोग उन्हें पागल कह रहे थे। उन का कहना है, ‘मेरे जीवन मेँ जो कुछ भी उल्लेखनीय है, वह मेरा काम ही है। मेरा निजी जीवन सीधा सादा, सपाट और नीरस है।’ इसके बाद तो  किताब में शब्‍दों के संसार में उनके अनुभवों और योगदान की उत्तरोत्तर विकास कथा है।

समांतर सृजन गाथा और तदुपरांत नाम के दो संभागों में हम पहले तो समांतर कोश की रचना की समस्याओँ और अनोखे निदानोँ से अवगत होते हैं। यह जानते हैं कि कथाकार कमलेश्‍वर द्वारा उसके नामकरण में सहयोग और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा उसका प्रकाशन कैसे हुआ और उनके अन्य कोशों (समांतर कोश, अरविंद सहज समांतर कोश, शब्देश्‍वरी, अरविंद सहज समांतर कोश, द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी, भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोकभाषा शब्दकोश, बृहत् समांतर कोश, अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी, अरविंद तुकांत कोश) से परिचित होते हैं। किसी एक आदमी का अकेले अपने दम पर, बिना किसी तरह के अनुदान के इतने सारे थिसारस बना पाना अपने आप मेँ एक रिकॉर्ड है।

कोशकारिता संभाग हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोश कला के सामाजिक संदर्भ और दायित्व तक ले जाता है। अमर कोश, रोजेट के थिसारस और समांतर कोश का तुलनात्मक अध्ययन पेश करता है।

सूचना प्रौद्योगिकी संभाग में अरविंद बताते हैं कि उन्होंने प्रौद्योगिकी को किस प्रकार हिंदी की सेवा में लगाया। साथ ही वह वैदिक काल से अब तक की कोशकारिता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ पेश करने में सफल होते है। मशीनी अनुवाद की तात्कतालिक आवश्यकता पर बल देते है।

हिंदी संभाग मे वह हिंदी की मानक वर्तनी पर अपना निर्णयात्मक मत तो प्रकट करते ही हैं, साथ ही हिंदी भाषा में बदलावों का वर्णन करने के बाद आंखों देखी हिंदी पत्रकारिता मेँ पिछले सत्तर सालोँ की जानकारी भी देते है।

अनुवाद संभाग मेँ अनुवादकों की मदद के लिए कोशों के स्थान पर थिसारसों की वांछनीयता समझाते हैं। इसके साथ ही गीता के अपने अनुवाद के बहाने संस्कृत भाषा को आज के पाठक तक ले जाने की अपनी सहज विधि दरशाते हैं और ऐसे अनुवादों में वाक्यों को छोटा रखने का समर्थन करते हैं। वह प्रतिपादित करते हैँ कि पाठक के लिए किसी संस्कृत शब्द का अर्थ समझना कठिन नहीँ होता, बल्कि दुरूह वाक्य रचना अर्थ ग्रहण करने मेँ बाधक होती है।

साहित्य संभाग हर साहित्यकार के लिए अनिवार्य अंश है। इंग्लैंड के राजकवि जान ड्राइडन के प्रसिद्ध लेख काव्यानुवाद की कला के हिंदी अनुवाद शामिल कर उन्होंने हिंदी जगत पर उपकार किया हैा ड्राइडन ने जो कसौटियां स्थापित कीं, वे देशकालातीत हैं। ग्रीक और लैटिन महाकवियों को इंग्लिश में अनूदित करते समय ड्राइडन के अपने अनुभवों पर आधारित लंबे वाक्यों और पैराग्राफ़ोँ से भरे इस लेख के अनुवाद द्वारा उन्होँने इंग्लिश और हिंदी भाषाओँ पर अपनी पकड़ सिद्ध कर दी है। यह अनुवाद वही कर सकता था जो न केवल इंग्लिश साहित्य से सुपरिचित हो, बल्कि जिसे विश्व साहित्य की गहरी जानकारी हो।

सिनेमा संभाग की कुल सामग्री पढ़ कर कहा जा सकता है कि यह सब साहित्य संभाग मेँ जाने का अधिकारी था। कोई और फ़िल्म पत्रकार होता तो सिने जगत के चटपटे क़िस्सों का पोथा खोल देता, लेकिन अरविंद यह नहीं करते। जिस तरह उन्होंने माधुरी पत्रिका को उन क़िस्सोँ से दूर रखा, उसी तरह यहाँ भी वह उस सब से अपने आप को दूर रखते हैँ। यहाँ हम पढ़ते हैं जनकवि शैलेंद्र पर एक बेहद मार्मिक संस्मरणात्मक लेख, राज कपूर के साथ उन की पहली शाम के ज़रिए फ़िल्मोँ के सामाजिक पक्ष और दर्शकों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा, फ़िल्म तकनीक के कुछ महत्वपूर्ण गुर।

माधुरी पत्रिका की चर्चा करने के बहाने वह बताते हैँ कि क्यों उन्होँने फ़िल्म वालों से अकेले में मिलना बंद कर दिया- जो बात उजागर होती है, वह पत्रकारिता मेँ छिपा भ्रष्टाचार।

इस संभाग मेँ संकलित लंबा समीक्षात्मक लेख माधुरी का राष्ट्रीय राजमार्ग प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार रविकांत ने लिखा है,  जो अरविंद जी के संपादन काल वाली माधुरी के सामाजिक दायित्व पर रोशनी डालता है और किस तरह अरविंद जी ने अपनी पत्रिका को कलात्मक फ़िल्मोँ और साहित्य सिनेमा संगम की सेवा मेँ लगा कर भी सफलता हासिल की।

शब्दवेध की अंतिम रचना है प्रमथेश चंद्र बरुआ द्वारा निर्देशित और कुंदन लाल सहगल तथा जमना अभिनीत देवदास का समीक्षात्मक वर्णन। यह एक ऐसी विधा है जो अरविंदजी ने शुरू की और उन के बंद करने के बाद कोई और कर ही नहीँ  पाया। देवदास फ़िल्म का उन का पुनर्कथन अपने आप मेँ साहित्य की एक महान उपलब्धि है। यह फ़िल्म की शौट दर शौट कथा ही नहीँ बताता, उस फ़िल्म के उस सामाजिक पहलू की ओर भी इंगित करता है। देवदास उपन्यास पर बाद मेँ फ़िल्म बनाने वाला कोई निर्देशक यह नहीँ कर पाया। उदाहरणतः ‘पूरी फ़िल्‍म मेँ निर्देशक बरुआ ने रेलगाड़ी का, विभिन्‍न कोणों से लिए गए रेल के चलने के दृश्यों का और उस की आवाज़ का बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। पुराने देहाती संस्‍कारों में पले देवदास को पार्वती से दूर ले जाने वाली आधुनिकता और शहर की प्रतीक यह मशीन फ़िल्‍म के अंत तक पहुँचते देवदास की आवारगी, लाचारी और दयनीयता की प्रतीक बन जाती है।

———————–

पुस्‍तक : शब्दवेध: शब्दों के संसार में सत्तर साल– एक कृतित्व कथा
लेखक : अरविंद कुमार
मूल्य रु. 799.00
प्रकाशक: अरविंद लिंग्विस्टिक्स, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065
संपर्क – मीता लाल. फ़ोन नंबर: 09810016568–ईमेल: lallmeeta@gmail.com

 

कृषि का पाठयक्रम : प्रेमपाल शर्मा

agriculture.prempal sharma

अपनी शिक्षा व्‍यवस्‍था की परतें जितनी चकित करती हैं उतना ही क्षुव्‍ध भी। एक तरफ चाहे हजारों प्रति माह फीस और दूसरी तरफ दलिया, चावल के मिड डे मिल के धुर्वांन्‍त हों या पढ़ाए जाने वाले विषयों की विभिन्‍नता और प्रचुरता दोनों। लेकिन दिल्‍ली के स्‍कूल में खेती की जानकारी मेरे लिए भी एकदम नयी थी। तुरंत मेरी उत्‍सुकता किताब देखने को हुई। उत्‍तर प्रदेश में छठी से आठवीं तक सत्‍तर के दशक में कृषि एक विषय के रूप में पढ़ा था। उस किताब को मैं वर्षों तक दिल्‍ली अपने साथ इसलिए रखे रहा कि पिता के व्‍यवसाय खेती लिखने के कारण नौकरी के साक्षात्‍कार में अक्‍सर एकाध प्रश्‍न खेती से संबंधित जरूर पूछ लिया जाता था। अब तो साक्षात्‍कार में शायद ही कोई खेती, किसानी जानने वाला बैठता है, वहां होते हैं अमेरिका के शहर, गलियों या वर्डसवर्थ, चोंसर, इलियट के मुग्‍ध प्रशंसक।

बड़ी काम आती थी यह किताब। फसलों के साथ-साथ भैंस, गाय की किस्‍में उनके फोटो सहित, उनकी बीमारियां, फसलों में लगने वाले कीड़े, कीटनाशक और हरित क्रांति, गेंहू धान की किस्‍में आदि। लेकिन ग्‍यारहवीं की इस किताब ने तो बहुत निराश किया। कृषि के नाम पर विवरणिका भर। क्‍या एन.सी.आर.टी या सी.बी.एस.सी. या दिल्‍ली सरकार ने कोई किताब नहीं बनाई? क्‍या दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के किसी कॉलेज में कृषि विषय है? सभी का उत्‍तर ना में था। चिल्‍ला स्‍कूल के प्राचार्य भी इन बातों को जानकर उतने ही दुखी थे।

देश की लगभग अस्‍सी प्रतिशत जनता खेती के काम में जीवन बिताती है। सबसे बड़ा रोजगार नियोक्‍ता। दुनिया भर में दुग्‍ध उत्‍पादन, गेंहू आदि में नम्‍बर वन। लेकिन केन्‍द्रीय स्‍तर पर पठन-पाठन या अच्‍छी किताबें एक नहीं।

और कुरदेने से पता चला कि कि दिल्‍ली के लगभग साठ स्‍कूलों में ग्‍यारहवीं बारहवीं में कृषि नाम का विषय है और ज्‍यादातर गांवों, देहात के स्‍कूलों में इस के पढ़ने वाले छात्र भी हैं। खुशी हुई यह जानकर कि किसानी से जुड़े कुछ बच्‍चे और खेती में काम करने वाले उनके मां-बाप, मजदूरों तक कुछ तो व्‍यवस्थित जानकारी पहुंचेगी। हलांकि यह भी सच है कि ऐसी पुस्‍तकें लिखने वाले शहरी जीवन तक ही सीमित रहे हैं तो उस किसान के लिए यह पुस्‍तकें बहुत काम की भी नहीं होती जिसका ज्ञान सैंकडों वर्षों परंपरारित अनुभव पर टिका है और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रकृति के साथ रहकर प्रमाणिक हुआ है। फिर भी विज्ञान, नई खोजों, मौसम, नए अच्‍छे कीटनाशक, नई प्रजातियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। साठ के दशक में हरित क्रांति न आयी होती तो हम खाद्यानों में आत्‍म निर्भर न हुए होते। इतनी बड़ी जनसंख्‍या के आगे तो अकाल आए दिन तांडव करता।

एन.सी.आर.टी. दिल्‍ली में है और यह स्‍कूल भी। पिछले दिनों बड़ी मेहनत और सैंकड़ों की टोलियों ने नया पाठयक्रम बनाया। फिर ‘कृषि’ क्‍यों छूट गया?  अभी ही नहीं उससे पहले भी क्‍यों छूट गया ? और क्‍या यह विषय भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को देखते हुए इतना ही महत्‍वपूर्ण नहीं है जितनी जानकारी हर बच्‍चे को चाहिए? क्‍या गांव, किसान सिर्फ पिकनिक, दरिद्रता, बीमारी आदि बुराइयों के लिए ही याद आते हैं? या ज्‍यादा से ज्‍यादा पर्यटकों को बताने के लिए कि पीला-पीला जो दिखाई दे रहा है यह सरसों है और यह झ डीनुमा फसल ईख, गन्‍ने  की। भला हो पत्रकार पी साईनाथ जैसे पत्रकारों का जिन्‍होंने विदर्भ, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक समेत देश भर में लाखों किसानों द्वारा की गई आत्‍महत्‍याओं के बारे में लिखा। वेंगन, कपास की उन कृत्रिम, परिवर्तित फसलों के बारे में बताया जिसके जाल में भारतीय कृषि फंसती जा रही है। पिछले दिनों तो टी.वी., अखवारों में तो बहस भी इन मुद्दों पर पर्याप्‍त रही फिर भी कृषि या खेती की अच्‍छी किताबें क्‍यों नहीं बनाई गई? क्‍या इसलिए कि एनसीआरटी की पुस्‍तकें पढ़ने वाले ज्‍यादातर शहरी स्‍कूलों तक सीमित हैं और इन्‍हें बनाने वाले भी। हिन्‍दी के लेखक संजीव का उपन्‍यास ‘फास’ जरूर किसानों की आत्‍महत्‍या पर है पर यह भी उस समस्‍या पर है जो इस विषय की भरपाई नहीं कर सकता। आश्‍चर्य कि इतिहास पर तो पुरातन पंथी से लेकर सभी हाथ आजमाना चा‍हते हैं, मौजूदा समय की खेती, किसानी पर नहीं। बाकई गढ़े मुर्दे उखाड़ना, खेत गोड़ने, खेती को जानने से ज्‍यादा आसान है।

ऐसा नहीं है कि कृषि की जानकारी वाली इन किताबों के पाठक नहीं है। पिछले दिनों पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के पुस्‍तकालय में जिन पुस्‍तकों की सबसे ज्‍यादा मांग शिक्षक और बच्‍चों ने की, वे खेती की यही किताबें थी। अपनी-अपनी भाषा हिन्‍दी में। वह चाहे दूध की कहानी है या फसलों की मुख्‍य बीमारियां, कीटनाशक, नयी फसलें या जानवरों की बीमारियां या रखरखाव संबंधी। माना कि कुछ जानकारी भूगोल या विज्ञान विषयों से पूरी हो जाती है लेकिन जब पत्रकारिता, मीडिया, फिल्‍म, फैशन के लिए हिन्‍दी में किताबों का अम्‍बार है तो दो-चार खेती पर भी होनी चाहिए। इससे अच्‍छा तो मराठी, गुजराती और दक्षिण के राज्‍य हैं, जहां खेती की किताबें भी प्रादेशिक भाषाओं में हैं और मासिक पत्रिकाएं भी नियमित निकलती हैं।

उॅंगली दिल्‍ली स्थित विश्‍वविद्यालयों की तरफ भी उठती है। पांच तो मशहूर विश्‍वविद्यालय हैं। जेएनयू, जामिया, अम्‍बेडकर, इन्‍द्रप्रस्‍थ और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अस्‍सी कॉलेज भी हैं। क्‍या किसी में भी कृषि नहीं पढ़ायी जा सकती है? यहां अर्थशास्‍त्र के सभी शाखाएं– विजनेस अंतर्राष्‍ट्रीय, बहुराष्‍ट्रीय, इंजीनियरिंग के पचासों रूप हैं। पिछले दिनों आये दिन विश्‍वविद्यालय में परिवर्तनों की हवा बह रहीं है। सेमेस्‍टर प्रणाली, चार वर्षीय, ग्रेडिंग प्रणाली और अब क्रेडिट का शोर। अफसोस ‘कृषि’ पढ़ाना किसी की भी प्राथमिकता में नहीं रहा ? शायद किसान और गांव भी। कृषि मंत्रालय के बदले नाम में किसान कल्‍याण जुड़ गया है। नया बज़ट भी किसानों की बात कर रहा है। उम्‍मीद है कि‍ खेती किसानों के सभी आयामों पर तन मन धन से काम होगा। देश में सब से ज्‍यादा रोज़गार तो कृषि में ही है।