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सशस्त्र होली युद्ध : कमल जोशी

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कोटद्वार तब कस्बे का रूप ले चुका था, पर इसके दिल में गाँव ही धड़क रहा था । मेरी तरह की एक पूरी पीढ़ी पैदा तो कोटद्वार में हुई थी, पर घर का माहौल उस पीढी से संचालित होता था, जो पहाड़ी गांवों से यहाँ आई थी। गांव की इस पीढी़ ने अपनी गाँव की परम्परा और विरासत को अभी छोड़ा नहीं था, पर कस्बे की मानसिकता हम पर हावी हो रही थी। पुरानी पीढी़ को परम्परा को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारी थी, पर हम जो यहीं पैदा हुए और पले बढे़ थे। एक अलग मानसिकता में जी रहे थे। हमें विपरीत माहौल में, जहां हम अपेक्षाकृत संसाधनविहीन परिवारों से थे, संसाधन वालों से टक्कर लेनी थी, न केवल जीना था वरन ‘इज्ज़त’ से और आत्म सम्मान से जीना था| संघर्ष वही पुराना और शास्वत था- वर्ग संघर्ष ! ‘हेव्स और हेव नोट’ के बीच का! और अपना सम्मान जुटाने के लिए ‘जुगाड़’ ही हमारा अस्त्र था|

मेरी होली की यादें 1964 से 1968 तक का फ़्लैशबेक है। परिवार अपनी होली गाँव की यादों के साथ गीत गाकर, मीठे स्वालीं (भरी पूरी) बनाकर और होलिका दहन के गीतों के साथ मनाता| मारवाड़ी व्यापारिक लोग अब होलिका दहन की परंपरा अपने हिसाब से मनाते। महिलायें राजस्थानी गीत  गातीं और गोबर के बने विशेष उपलों की माला से होलिका दहन स्थल पर पूजा करतीं। घरों में उनके गुजिया और नमक पारे बनते।

हम बच्चे होली अपने जुगाड़ तंत्र से मनाते। हमारी होली परम्पराओं की कम और वर्ग संघर्ष का नज़ारा थी। साफ़-साफ़ दो वर्ग थे। एक व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चे और कुछ नौकरी पेशा वाले माँ-बाप के बच्चे। ये बच्चे संसाधन युक्त थे। हमारी टक्कर दरअसल ऐसे ही परिवार के बच्चों से होती थी। इनके पास अब कुछ था, बाज़ार का खरीदा हुआ, और हमारे पास था केवल जुगाड़!

होली खेलने के लिए इनके अभिभावक खर्च कर सकते थे और हमें अपना मजा जुगाड़ से पैदा करना होता!

इस तरह होली हमारे लिए सिर्फ एक त्यौहार नहीं था- ये एक उल्लास, कर्मठता, रणनीति और जुगाड़ का समय होता था। आज की तरह बाजार में चायनीज़ टॉय पिचकारी और खुशबू वाले रंग नहीं थे। कैसा माहौल था और क्यों हम रणनीति में उलझते थे, आगे वृतांत में यह खुलासा होगा।

हमारी यानी मेरी और मेरे षड्यंत्रकारी साथियों की उम्र ही होगी यही कोई 12-13 साल। हम बच्चे भी थे और बड़े भी। हम उस परिवार से थे, जहां ये समझा जाता बच्चे को पैसा देने का मतलब उसे बिगाड़ना है! हमें यानी अनिल को और मुझे साल में तीन बार ही खर्चे के लिए पैसे मिलते थे। एक दशहरे के रावण फूंकने के मेले के लिए, जिसमें हम लाल सेलिफेन की पन्नी के बने चश्मे और एक गुब्बारे लगी पिपरी खरीदते। यह बात अलग थी कि‍ घर आते-आते चश्मे टूट जाते और पिपरी की आवाज ख़त्‍म हो जाती। और यदि आवाज कामयाब रही तो पों पों से परेशान घरवाले पिपरी छीन लेते। पर हम हिम्मतवाले अगले साल फिर यही दोहराते। पैसे मिलने का दूसरा मौक़ा होता था, गिंदी के मेले का, जो मवाकोट में होता। यहां नारंगी रंग से सरोबार जलेबी की चाह पिपरी पर भारी पड़ती और पूरे दो आने की ज़लेबी खा जाते। हां, एकाध टुकड़ा साथ आए दोस्त को दे देते, जो अपनी रकम फूटे हुए चश्मे पर गंवा चुका होता। तीसरा मौका खर्च मिलने का होता था- होली। इससे रंग ख़रीदने की जुगत होती थी। पिताजी गीले रंगों के खिलाफ थे। वे गुलाल खरीदकर लाते और हम से कहते कि‍ इसी से होली खेलो। अब आप ही सोचिए कि‍ उस उम्र में क्या सिर्फ सूखी होली खेली जा सकती है? हम मां के पीछे पड़ जाते, रोते, ज़मीन पर पैर घिसटते़। इतने पराक्रम करने के बाद मां हम दोनो भाइयों को चार आने देतीं, इस हिदायत के साथ कि ‘फालतू में मत खर्च करना !’

बाजारी सिंथेटिक रंग उस वक्त जर्मनी से इम्पोर्ट होते थे- महंगे होते। इन रंगों के आने से पहले नारंगी रंग के टेसू के फूलों से ही होली खेलने का प्रचलन था। पहाड़ से लगे मैदानी इलाके के गांवों के ज्यादातर लोग इन्ही फूलों का रंग बनाने के लिए प्रयोग करते थे। मां के दिए इतने कम पैसों में कितना बाजारी रंग आ पाता?

हमारे कस्‍बे के ही व्यापारिक परिवारों और ऊंची आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चे भी होते थे। ये खुलकर बाजारी रंग का इस्तेमाल करते। महंगे बाजारी रंग को हम विशेष दोस्त पर लगाने के लिए बचाते थे और बाकी गीले रंग के लिए हम एडवेंचर ट्रिप पर जाते। कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर, नजीबाबाद जाने वाली सड़क पर टेसू के फूल के पेड़ थे। टेसू माने पलाश या ढाक। फ़रवरी मार्च में इस पर फूलों का उबाल आता है। उबाल ही कहूंगा, क्योंकि‍ उस वक्त इस पर पत्ते नहीं दिखाते, बल्कि ये फूलों की रजाई ओढ़ लेता है।

होली हमारे लिए महंगी पिचकारी और रंग से लैस विरोधियों पर दबदबा बनाने का संघर्ष होती। हम ‘आर्थिक संकुचन’ की वजह से रंग खरीद नहीं खरीद सकते थे। विकल्प के तौर पर हम टेसू के फूलों से रंग बनाने की रणनीति पर काम करते। पर इस पर भी पेंच था। हमारे घरवाले हमें उतनी दूर जाने की इज़ाज़त नहीं देते थे। इसलिए हमें उन्हें बिना बताए टेसू के फूल जमा करने जाना होता था।

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हमारी चुनौती यह होती कि उतनी दूर से टेसू के फूलों को लाया कैसे जाए, वह भी बिना घर वालों के पता चले। इसके लि‍ए ज़रूरी था कि‍ आने-जाने के लिए साइकिल हो। हमारी गैंग के कुछ सदस्य साइकिल-धारी होते थे। वे अचानक महत्वपूर्ण हो जाते। अब हम उनकी चमचागिरी करते और वह भी तात्कालिक महत्व का फायदा उठाते हुए नखरे दिखाते और हमसे उस दौरान होमवर्क से लेकर पहले बैटिंग करने की शर्तें रखते। हम मन ही मन बाद में देख लेने का संकल्प करते हुए उनकी हर बात मानने को मजबूर रहते। कुछ ऐसे दोस्त भी निकल आते जो वैसे तो अपने दम पर बाज़ार से रंग लाकर होली खेल सकते थे, पर हमारे एडवेंचर की बाते सुन हमारे साथ रोमांच के अनुभव के लिए अपनी साइकिल ऑफर कर देते। इन दोस्तों के बावजूद ज्यादा साइकिल की जरूरत होती तो किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती, जिसके पास साइकिल हो और दूसरे हमारे गिडगिड़ाने का उस पर प्रभाव हो सकने की गुंजाइश हो। ऐसे लोगों को आईडेंटीफाई कर किन्ही दो-तीन पर ‘जीरो-इन’ किया जाता। उतने ही समूह बना कर उनके पीछे पड़ जाते कि‍ हमें एक दिन के लिए साइकिल उधार दे दो। हम विनीत दिखने की, भीषण आज्ञाकारी होने के और अच्छे बच्चे होने के तमाम सबूत उन्हें देते| चाहे हमारे माता-पिता दयाशील हों ना हों, एकाध सज्जन ऐसे दयावान मिल ही जाते थे कि जो हमें साइकिल देने पर राज़ी होते। पर इस शर्त भी होती कि वह टेस्ट लेंगे कि हमें साइकिल चलानी आती भी है कि‍ नहीं। हम अपने बीच के सबसे कुशल साइकिल चालक का चुनाव कर परीक्षा में पेल देते। वह बेचारा भी कई बार परीक्षक की पैनी निगाहों से घबरा जाता और साइकिल ठीक से चला नहीं पाता, फेल हो जाता तो उस व्यक्ति से साइकिल मिलना कठिन हो जाता। फिर हमें दूसरे ऐसे व्यक्ति को खोजना पड़ता, जिसकी मान मनुव्वल कर साइकिल मिल सकती हो। साइकिलों की व्यवस्था होने के बाद तय होता कि‍ कब टेसू के फूल जमा करने चलना है!

अब होली से तीन-चार दिन पहले का कोई दिन फूल जमा करने के लिए चुन लिया जाता। घर से थैले या पुराने मेजपोश जमा कर किसी एक के घर में रख दि‍ए जाते। इस काम के लिए जगदीश का घर था। उसके पिता नहीं थे। माँ अकेली थीं। उसे घर से होली खेलने के लिए कुछ मिलता नहीं था। सबसे बड़ी बात, उसकी माँ शुरू में तो जंगल जाकर फूल इकठ्ठा करने की मना ही करती थीं। पर जब जगदीश, बिना बाप का इकलौता पुत्र दहाड़ मार-मार कर रोने लगता, तो माँ का दिल पिघल जाता। वह न केवल उसे हमारे साथ जाने की आज्ञा दे देतीं, बल्कि हमारे षड्यंत्र में शामिल भी हो जातीं। यहाँ तक की एक्सपिडिशन–दिवस पर हमारे लिए दस-बारह रोटी भी बना देतीं। एक्सपिडिशन के लिए ऐसा दिन चुना जाता, जो इतवार न हो, क्योंकि इतवार को घर वालों को दिन का हिसाब देना होता। इसलिए स्कूल लगने वाला दिन चुना जाता। साल के इस वक्त स्कूल दिन का हो जाता था यानी सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का। एग्जाम नज़दीक होते इसलिए एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर हम 8 बजे ही जगदीश के घर जमा हो जाते और चल पड़ते एक साइकिल पर दो-तीन के हिसाब से अपने थैले लेकर। नजीबाबाद की तरफ जाते हुए ढाल होता। तेज़ी से चले जाते। पता ही नहीं चलता की कब बारह किलोमीटर पूरे हुए। पलक झपकते ही 12 किलोमीटर तय हो जाते और लगता कि‍  सामने सड़क के किनारे के टेसू के पेड़ हमारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। साइकिल किनारे खड़ी कर दी जाती। कमज़ोर दिल वाले तो नीचे झड़े हुए फूलों को जमा करने लगते और हम एड्विन्चारिस्ट पेड़ों पर चढ़ कर फूलों भरी टहनी तोड़ कर नीचे गिराते। सारे फूलों को इकट्ठा कर थैलों में और मेजपोश में बांधने का काम नीचे रहने वाले सदस्यों का होता। अब जाने का वक्त होता, तो एक बड़ी समस्या हो जाती। हम में से कुछ अति जोश में पेड़ पर ज्याद ऊपर चढ़ जाते पर वापस उतर नहीं पाते, क्योंकि‍ वापस उतारते वक्त नीचे देखना होता है। नीचे देखते तो पता लगता कि‍ हम कितने ऊपर आ गए हैं! यह सोचते ही पैर कांपने लगते कि पैर फिसला तो कितनी चोट लगेगी। हिम्मत टूटने लगती। अब सारा समूह उन्हें किसी तरह सुरक्षित उतारने में लग जाता। कुछ ऊपर चढ़ कर उसे बताते हुए उतरते कि वह कहाँ पर पैर रखे, कहाँ से टहनी को पकड़े। बाकी सदस्य नीचे से ही निर्देश देते। ये निर्देश उतरने वाले को ज्यादा कन्फ्यूज़ कर देते। कुल जमा बात यह होती कि‍ जितना समय फूल तोड़ने में खर्च होता, उससे डेढ़ गुना पेड़ पर चढ़े महारथियों को उतरने में लगता।

अब तू-तू मैं-मैं का समय होता। बात यह थी कि‍ आते वक्त तो ढाल था। कोई भी आराम से साइकिल चला लेता। वापस आते वक्त काम की थकान तो होती, साथ-साथ चढा़ई भी, ऊपर से डबलिंग यानी दो-दो एक साइकिल पर। फूलों का बोझ अतिरिक्त। जहां आते वक्त सब कहते साइकिल मैं चलाऊंगा-साइकिल मैं चलाऊंगा। जाते वक्त हाल उल्‍टे हो जाते। अब कहते कि‍ साइकिल तू चला–साइकिल तू चला। खैर थोड़ी कहासुनी के बाद मामला सेटल होता कि‍ बारी-बारी से सब चलाएंगे। इस वक्त सबसे सुखी अपने को वह समझते जिन्हें साइकिल चलानी नहीं आती। पर उन्हें खुश कैसे रखा जा सकता था, जब सब दुखी हों? इसलिए उनसे कहा जाता कि‍ तुम साइकिल पर धक्का लगाओ। अब उनकी हंसी गायब हो जाती और वह रस्तेभर साइकिल को धक्का देते आते। वापसी में बस एक सुकून था। रास्ते में गन्ने के क्रशर थे, वहाँ पेराई होती थी। वहां की शर्त एक होती थी की जितने चाहे गन्ने खा लो, पर ले जाने की इज़ाज़त नहीं थी। वहां पर रुक कर गन्ने खाए जाते और एनर्जी रिस्टोर की जाती। गन्ने खाने में हमें समय का ध्यान ही नहीं रहता। कितनी भी जल्दी करते, पर घर पहुँचने में देर हो जाती। अब देर शाम को घर पहुंचते। जिन के घरवाले भले मानस होते वे सिर्फ डांट खाते, हमारे नसीब ये भलमनसाहत नहीं थी इसलिए मार पड़ती। पर हमें और दिनों की अपेक्षा दर्द कम होता था क्योंकि हम टेसू के फूल जो ले आए थे। अगले दि‍न टेसू का रंग बनाने की कल्पना में देर तक नींद नहीं आती और जब आती तो थके शरीर को इतनी नींद आती कि सुबह हमें उठाने के लिए घर वालों को खूब मशक्कत करनी पड़ती|

अब बारी थी, रंग पकाने की। टेसू के फूलों से रंग नि‍कालने के लिए उन्हें पानी में उबालना पड़ता है। अब इतने सारे यानी बोराभर कर जमा किए गए फूलों को उबालने के लिए बर्तन भी बड़ा चाहिए। वह कहाँ से आए। गांव की तरह पंचायत घर के बर्तन तो इस कस्‍बे में होते नहीं थे। हमारी नज़र में एक ही बर्तन रहता था- हज्ज़न मियां का टब। पास के धोबी का बड़ा टब। हज्ज़न चच्चा हमारे शहर के धोबी थे। उनका नाम हज्ज़न मियां क्यों पड़ा, यह भी कथा थी। उन्हें हज जाने की बड़ी तमन्ना थी। पर गरीब आदमी हज जाने का खर्चा कैसे जुटाए ! वे अपने हज जाने की हसरत की और हज की कहानियाँ हर एक को सुनाते थे। शायद इसलिए ही उनका नाम हज्ज़न मियां पड़ गया। अब हमारा सारा गैंग हज्ज़न चच्चा के चक्कर काटने लगता, “चच्चा- एक दिन के लिए हमें टब दे दो।” हम जानते थे कि‍ हम तीन-चार दिन तक टब लौटा नही सकते। पर एक दिन के लिए मांगने पर टब मिल सकता था। और सच बात तो यह भी थी कि‍ हज्ज़न चच्चा भी जानते थे कि‍ अगर ये लोंडे-मोंडे  रंग बनाने के लिए टब ले गए, तो जल्दी वापस मिलेगा नहीं। वह हमारे अनुनय-विनय पर ‘कत्तई नही’ ही जवाब देते। हम सुबह से हज्ज़न चच्चा ‘प्रेसवाले’ के पास आकर बारी-बारी से अनुनय-विनय करते पर हमें ‘कत्तई नहीं’ से ज्यादा जवाब सुनने को नहीं मिलता। वे कहते, “पिछली बार भी दिया था। तुमने उसे काला कर वापस किया। मेरे धोये हुए कपड़े खराब हो गए। मैं दो दिन तक टब धोता रहा।”

हम भगवान से लेकर माँ तक की कसम खाकर उनसे कहते, “चच्चा, इस बार मोसे (धुवें) से काला नहीं करेंगे और धो कर देंगे।” पर हमारी बात सुनकर वह फिर ‘कत्तई नहीं’ कहते और अपने काम में लग जाते। हम हज्ज़न चच्चा की मस्जिद से लगी दुकान पर उन्हें घेर कर बैठ जाते— उदास| दिन के खाने का समय हो जाता। हम भूखे प्यासे बैठे रहते। घर से बार-बार खाना खाने आने के संदेशे आने लगते। पर हम टस से मस नहीं होते| हज्ज़न चच्चा परेशान होने लगते। चहरे का भाव बदले बिना बार-बार कनखियों से हमारी और देखते। बच्चे बिना खाना खाए भूखे प्यासे बैठे हैं। बाहर से कठोर दिखने वाले हज्ज़न चच्चा को यह सहना मुश्किल हो जाता। वह जब इस तरह देखते तो हम समझ जाते कि‍ अब हम जंग जीतने वाले हैं। हम अपना मुंह और लम्बा लटका लेते, पेट पकड़ने लगते मानो भूख से दम निकल रहा हो। अब इससे आगे हज्ज़न चच्चा सह नहीं सकते थे। दो-चार गालियाँ देते और टब देने की हामी भर देते, इस ताकीद के साथ कि‍ ‘हरामियों, टब जैसा साफ़ दिया जा रहा है, वैसे ही साफ़ वापस करना होग!’ हम सब समवेत स्वर में ‘बिलकुल’ कहते और हज्ज़न चच्चा बिना दांत वाली मुस्कराहट के साथ हमें टब दे देते। वह जानते थे कि‍ हमारी ‘बिलकुल’ में बिलकुल भी इमानदारी नहीं है और उन्हें टब कालिख से भरा हुआ मिलेगा। पर बच्चे तो उनके लिए फ़रिश्ते थे।

अब रंग बनाने की कारसाजी शुरू होती! जगदीश के घर की छत पर ही चूल्हा बनता। मोहल्ले में और कोई अपनी छत ख़राब क्यों करने देता भला। फिर जगदीश की माँ की शरण में जाया जाता। जगदीश की माँ को भी सफाई कर देने का भरोसा दिया जाता और पत्थर-ईंट जमा कर टब के लिए चूल्हा बना दिया जाता। लकड़ी की विशेष परेशानी नहीं थी। सभी घरों में लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल होता था। सभी अपने अपने घर से लकड़ी चुरा-चुराकर जगदीश के घर की छत पर जमा कर देते थे। उत्साह में हम इतनी लकड़ी जमा कर देते थे कि‍ रंग बनाने के बाद भी इतनी बच जाती कि जगदीश  की माँ को महीने भर तक लकड़ी के लिए जंगल जाने की ज़रूरत नही रहती।

तय होता कि‍ छोटी होली यानी होलिका दहन वाले दिन से एक दिन पहले रंग ‘पकाया’ जाएगा। हम सभी जगदीश के यहाँ जमा हो जाते। छत पर भट्टी लगती, टब चढ़ाया जाता। उसमे टेसू के फूल और पानी भर दिया जाता। इसके बाद भट्टी सुलगाने का काम शुरू होता। हमने कभी भट्टी सुलगाई होती, तो सुलगती ना! इस काम का अनुभव किसी को नहीं था। जब जगदीश की माँ आधे घंटे तक हमें इस तरह परेशान देखतीं तो वह हंसती हुई आतीं और लकड़ी ठीक से बैठा कर आग सुलगातीं। रंग पकने लगता।

अब हमारा काम होता भाग सिंग हलवाई के कारीगर को घेरना। रंग फेंकने के लिए पिचकारी भी चाहिए होती है। व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चों के पास तो बाज़ार से खरीदी पीतल की बेहतरीन पिचकारी होती। महँगी पिचकारी खरीदने के लिए हमारे माँ-बाप साफ़ मना कर देते कि‍ एक दिन के खेलने के लिए पिचकारी खरीदना फ़िज़ूलखर्ची है। बात सही भी थी। जब घर में दूसरी ज्यादा प्राथमिकताएं हों, तो पिचकारी पर खर्च वास्‍तव में फ़िज़ूलखर्ची ही था। यहाँ पर भाग सिंग हलवाई के मिठाई बनाने वाले कारीगर की एक्सपर्टाइज की ज़रूरत होती। मिठाई कारीगर नत्था भाई बांस की पिचकारी बनाना जानता था। शाम को जब मिठाई बनाई जानी बंद होती, तो हम उसके पीछे पड़ जाते। वह भी अपनी कला दिखाने को बेताब रहता, पर चाहता था कि‍ हम उसकी कुछ खुशामद करें ही। हम तो खुशामद करने को उतारू रहते। जब वह ‘हाँ’ कहता, तो अगला काम होता बांस की व्यवस्था करना। पिचकारी बनाने के लिए बांस की ज़रूरत होती। हम कुछ मोटे-मोटे बांस आम के बाग़ वाले मुस्लिम मालियों से माँगते। उन्हें तब कुंजड़ा कहा जाता था। उनके पास मोटे बांस होते। उनका इस्तेमाल वह अपनी बहंगी बनाने के लिए करते थे। उनके पास इस्तेमाल के बाद मोटे बांस के टुकड़े बचे होते। उन्हें वे सम्‍भाल देते थे। वे जानते थे कि‍ होली के पास बच्चे बांस माँगने आएंगे। वह इन बांसों का सौदा करते। बांस देने से पहले वह हमसे कसम खिलवाते कि‍ इस बार गर्मियों में जब आम लगेंगे, तो हम उनके बगीचों में आम चोरने (चुराने) नही आएंगे। हमारा हाल तो यह होता कि‍ उनके कुछ कहने से पहले ही हम कसम खाकर बताते कि‍ इस साल तो क्या, हम तो पिछले साल भी आम चुराने नहीं आए थे। हमारे ज्यादा कलाकार साथी तो उनसे मुखबरी की डील तक कर लेते। बच्चों की स्मृति बहुत कम होती है। गर्मी आते-आते हमारी स्मृति सूख जाती और आम चुराने का मौलिक अधिकार का जज्बा हमारी रगों में दौड़ने लगता।

बांस मिलने के बाद शाम को नत्था भाई की पिचकारी वर्कशॉप लगाती। वह बांस को गाँठ के पास से आरी से काटता और गाँठ के दूसरी तरफ के हिस्से को अगली गाँठ के समीप इस तरह एक खोखला बांस का सिलिंडर बन जाता। इन बांस के टुकड़ों को रात को छिपाकर भट्टी के पर रख देता। सुबह जब भट्टी सुलगती, तो वह भट्टी में एक मोटा सुवां लाल करने को रख देता और काम के बीच जब भी फुर्सत मिलाती बांस के सिलिंडर के गाँठ वाली मुंह की तरफ से ‘औप्तिमाम मार’ के लिए  गरम सुवें से छेद कर देता। हम भट्टी के बाहर से भीतर झांकते और नत्था भाई हमें देख कर वापस भागने को कहता कि‍ कहीं मालिक को यह पता न चले कि‍ काम के वक्त वह बच्चों की पिचकारी के लिए बांस पर छेद कर रहा है।

शाम को नत्था भाई छेद किए बांस लेकर आता। अब पिचकारी के लिए पिस्टन बनते। बांस की पतली डंडी के ऊपर कपडे की पट्टियाँ लपेट कर गुंडा सा बना लिया जाता। उसे खोखले बांस के सिलिंडर के अन्दर कस कर जाने लायक बनाया जाता। जिसे पीछे खींचने से बाल्टी से रंग पिचकारी में भर जाता और पुनः दबाने से वह फुहार की तरह बाहर निकालता। यह हमारी पिचकारी होती। छोटी होली को इस पिचकारी का ट्रायल होता, ‘ओप्तिमम मार’ के लिए बार-बार छेद का व्यास ठीक किया जाता। पिस्टन पर कपड़ा लपेटा जाता। जगदीश के घर की छत हमारा ‘एम्युनिशन स्टोर’ होता।

होली का दिन हमारा डी-डे होता। प्रभुत्व के संघर्ष का, जुगाड़ी वर्सेज संसाधन वालों का। लगभग आठ-नौ बजे हमें होली खेलने की इजाज़त मिलती। हमारा दल अपने ‘हथियारों’  और ‘अम्न्युनेशन’ के साथ गली के एक ओर तैनात होता। दूसरी ओर वह जिनके पास बाज़ार से ख़रीदे रंग और पिचकारी होती। लोकल वर्सेज़ ग्लोबल मार्किट की सीधी लड़ाई। पहले विरोधी पक्ष मार करता। लम्बी दूरी तक मार करने वाली पीतल की पिचकारी के रंगों से हम बिना हथियार उठाए ही रंगीन हो जाते। हमारी पिचकारियां आधी दूरी तक भी मार नहीं कर पातीं! उन्हें पिचकारी की रेंज तक लाने के लिए हमें रंगों की बौछारों में ही आगे बढ़ कर उन पर रंग डालना होता। हममे से कई हताहत हो जाते। हमारी हिम्मत भी काम नहीं आती, क्योंकि‍ बाजारी रंग तेज़ होते और हमारा टेसू का रंग उनके सामने फीका होता। बीच-बीच में हमारी पिचकारी के पिस्टन के कपडे़ की पट्टी खुल जाती और पिचकारी बेकार हो जाती। हमारी नाकामी पर विरोधी हमें चिढा़ते। हम तरबतर हो जाते, निराश होकर पीछे लौटते। अब हम दूसरी रणनीति का सहारा लेते। उस वक्त तक न तो हमें शिवाजी के छापामार युद्ध शैली का पता था और न ही चे-गुएरा के गुर्रिल्ला रणनीति का। बस अनुभव ने हमें ज्ञानी बना दिया था। हम कुछ जो कमजोर किस्‍म के थे, वे पिचकारी थामे मोर्चा सम्हाले रहते और हमारे बीच के कुछ मुस्टंडे साथी छतों से कूद, छिपकर गली के उस छोर पर पहुंच जाते क्योंकि‍ विरोधी दल का ध्यान तो हम पर रहता। वे उस ओर पहुँच कर उनके रंगों की बाल्टी छीनने लगते। अपनी रंगों की बाल्टी बचने के चक्कर में अब वे लोग पिचकारी नीचे रख कर बाल्टी बचाने लगते, तो हम पैदल सिपाही दौड़ कर आगे बढ़ते और उनकी पिचकारिया फेंक देते। सशस्त्र होली युद्ध अब पिचकारी के बजाय हाथों से लड़ा जाने लगता। रंग की बाल्टियों की छीना-झपटी में दोनों पक्ष तरबतर होते। इस बार विरोधी पक्ष अपने ही पक्के रंगों से पुँता होता, जो हमारी मुस्टंडा-ब्रिगेड का कारनामा होता। अब जब दोनों दल बराबर रंगों से पुत गए और रंग भी बह गए, तो अब क्या गिला शिकवा। दोनों दल आपस में मिलकर हँसने लगते। छीना झपटी में चोट फटाक भी लग जाती, तो उसका सामूहिक इलाज होता! इलाज में आँख में फूंक मारने से लेकर मलाशने और मुंह धोना तक शामिल था। अब सबके घरों में जाकर नमकीन खाते और जिन घरों में गुजिया बनी होतीं, वहाँ पहले पहुंचते।

अंत में दो-तीन बातें बतानी ज़रूरी हैं। हमारी होली यहीं पर ख़त्म नहीं होती। रंगों से पुते जब हम घर पहुंचते तो जो बर्तन हम घर से मांग कर रंग रखने के लिए ले गए थे, उन पर गुर्रिल्ला युद्ध के समय पिल पड़ जाते थे। अब जब हम अपने पिल पड़े बर्तनों को घर लाते, तो हमें यह अंदेशा हो जाता था कि‍ जितने पिल बर्तन पर पड़े हैं, उतने थप्पड़ तो पड़ने ही हैं| हम पहले से ही रोने लगते और एक-दूसरे का नाम बताने लगते। बिना पिटे ही हमारा विलाप कई बार हमें मार से बचा भी लेता था। यह भी नित्य होली कर्म था। इसके अलावा रंग छुड़ाने के लिए नहलाते वक्त जो हमारी घिसाई होती, वह अलग। माँ साबुन घिसती, बीच-बीच में पट-पट मारती भी रहतीं। हमारा क्रंदन पांचवें और सातवें सुर पर रहता। कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि‍ लगभग हर घर से इस तरह की आवाजें आती  रहतीं|

अंत में एक यादगार के तौर पर हज्ज़न चच्चा की याद। यह भी हमारी होली का हिस्सा ही था।

हज्ज़न चच्चा का टब लौटाना भी हमारे लिए समस्या होती, क्योंकि‍ फिर वह काला हो गया होता। हम सब टब लेकर ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते, जहां से हम तो हज्ज़न मियां को देख सकें, पर वह हमें नहीं। वह अपनी दुकान से इधर-उधर जाते ही रहते थे। उस वक्त भी जाते थे (आज मुझे यह भी लगता है कि‍ हज्ज़न चच्चा जानते थे कि‍ हम उनका टब लौटाने के लिए छुप कर बैठे हैं। वह यह भी जानते थे कि‍ टब काला ही होगा। वह जानबूझकर अपनी दुकान से चले जाते थे कि‍ हम टब रख सकें और इज्ज़त से भाग सकें !) हम दौड़ कर उनकी दुकान में काला टब रख कर चम्पत हो जाते। थोड़ी  देर में हमें हज्ज़न चच्चा की ऊंची आवाज सुनाई देती.. ‘‘हरामियो, फिर काला कर दिया टब! अगली बार नहीं दूंगा।’’

हम सब हंसने लगते|

बजट में हुई बड़ी नाइंसाफी : चन्द्रशेखर करगेती

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बल, सरकार ने जगरिये, डंगरिये, मंगलगीत गायक और पुजारियों सहित बोनो को भी समाज कल्याण विभाग के माध्यम से पेंशन का लाभ देकर राज्य के विकास में
एक मील का पत्थर गाड़ दिया है l
बल, कितना अच्छा होता अगर राज्य के मुख्यमंत्री ‪‎हरीश रावत जी इसी बजट सत्र के दौरान राज्य के शराबियों को भी समाज कल्याण विभाग के माध्यम से पेंशन देने का ऐलान कर देते l आपको बात हंसी ठठ्ठे की लग रही होगी लेकिन, यह हैं नहीं। उनका भी हक़ बनता हैं पेंशन पर ! आखिर वे उत्तराखण्ड को सर्वाधिक राजस्व कमवाने वाले जो ठहरे !
स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री भी कह चुके हैं कि राज्य में शराबबंदी नहीं की जा सकती है, क्योंकि वह सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है। अब जिनकी बदौलत से सरकार चल रही हो, जो अपना पेट काट-काटकर सरकार का खर्च चला रहे हों, ऐसे राज्य सेवक वर्ग के लिए क्या स्थायी पेंशन का प्रावधान नहीं होना चाहिए ? आखिर उत्तराखण्ड में उनके साथ ही नाइंसाफी क्यों, उनकी अनदेखी क्यों ?
वर्तमान राज्य सरकार को चाहिए कि वह राज्य आन्दोलनकारियों की तर्ज पर शराबियों का सरकारी चिन्हीकरण करवाये, सरकारी ठेकों से नियमित रूप से शराब खरीद कर पीने वाले राज्य के शराबियों को सरकारी शराबी घोषित क उन्हें भी पेंशन पाने का हकदार माना जाए !
फर्ज करो अगर राज्य भर के शराबियों ने अपना कोई संगठन बना लिया और सत्याग्रह आन्दोलन करने की घोषणा कर दी। उन्‍होंने यह ऐलान कर दिया कि हम राज्य के समस्त शराबी सरकारी शराब का बहिष्कार करते हैं। हम सत्याग्रह के तहत अपनी शराब खुद बनाकर स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए उसे औरो को भी पिलायेंगे और स्वयं भी पीयेंगे, तब क्या होगा ? ऐसे में क्या सरकार के सामने मुश्किल नहीं हो जायेगी? आखिर सरकार बगैर समूह के लोगों की जाय मांगों को बगैर हो हल्ला मचाये मानती क्यों नहीं है ?
बल शराबियों ने अगर हड़ताल कर दी तो सरकार कैसे चल पायेगी और कैसे महानुभावों के लिए 17 लाख वाली गाड़ियां खरीदी जायेंगी, राज्य के कार्मिको को कैसे वेतन मिलेगा, कैसे नए स्कूल-अस्पताल खुलेगे, कैसे नई सड़कें बनेंगी, मुख्यमंत्री सहित अधिकारियों के हवाई दौरों का क्या होगा। बगैर राजस्व प्राप्ति के विकास को अंतिम छोर तक कैसे पहुँचाया जायेगा ? मैं तो कल्पना कर ही सिहर उठा हूँ। पता नहीं सरकार जाने क्यों बेसुध पडी़ है !
बल मुख्यमंत्री जी शराबियों को पेंशन देने के मामले में सोचने-विचारने की ज्यादा जरुरत नहीं है, क्योंकि यदि सरकार राज्य के समस्त शराबियों को पेंशन देने का आदेश जारी कर भी देती है तो इससे राजकोष पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पडे़गा, बल्कि इससे राजस्व में बढ़ोतरी ही होगी l साथ ही राज्य की नारी शक्ति भी सरकार को दुवाएं ही देंगी ! अभी तक शराबियों के घर में क्लेश होने का कारण नारी शक्ति के घर चलाने के खर्चों में कटौती हो जाना मुख्य है, क्योंकि शराबियों द्वारा अपने स्रोतों की जो कमाई परिवार की जरूरतों पर लगानी थी, वह शराब के ठेकों पर खर्च हो जा रही है। पेंश देने से वह खर्च रुक जाएगा, गृहक्लेश के प्रकरणों में भी कमी भी आयेगी। इसका असर राज्य की सुख शान्ति पर भी पडेगा !
जाहिर है पेंशन मिलने पर समस्त शराबी उसे भी शराब पर ही खर्च करेंगे, वे पेंशन को बचत खाते में तो डालने से रहे l इस प्रकार से सरकार का पैसा घूम फिर कर वापस सरकार के खजाने में ही आयेगा, अतिरिक्त में जो आ जायेगा वो अलग से। चुनावी वर्ष में सरकार के इस निर्णय पूरे राज्य में वाह वाही भी होगी, क्योंकि उत्तराखण्ड में जनमत बनाने में तो शराबियों और शराब का विशेष हाथ रही ही है, जो परखी हुई बात है। सरकार के ऐसे निर्णयों से सत्ता वापसी की राह भी और आसान होगी !

यह सरकार के लि‍ए ठीक हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चौखा आये जैसा ही है !
पोस्ट इस आशा से सरकार को प्रेषित कि अभी बजट सत्र के दौरान चर्चा के लिए दिन बचे हुए हैं और सरकार तुरत फुरत में विधानसभा में प्रस्ताव ला भी सकती है l इस ग्याडू की बात का यकीन मानिए कि शराबियों को पेंशन देने की सरकार की योजना का विरोध विपक्ष भी नहीं कर पायेगा ! याद हैं ना आपको,
आपने अभी दो दिन पहले सदन में घोषणा करवाई है कि सरकार इस साल में 30 हजार लोगो नयी नौकरी देगी। जब 30 हजार नये लोगो नौकरी दे दी जायेगी तो
उनकी तनख्वाह भी तो सरकार को ही देनी है। राज्य में शराबी सुरक्षित एंव संरक्षित ना हुए तो कर्मचारियों की तनख्वाह कहाँ से आयेगी ?

 ‘स्क्रीन पर स्त्री’ विषय  पर संगोष्ठी आयोजि‍त

Screen Par Stree.hindu college

दिल्ली :  टेलीविजन अपने चरित्रों को पहले लोकप्रिय बनाता है और फिर हमारे वास्तविक जीवन मे उसकी दखल होती है। हम जो वास्तविक जिंदगी मे हैं, वो व्यक्तित्व टेलीविजन बाहर निकालकर लाता है। यह विचार सुपरिचित मीडिया विश्‍लेषक विनीत कुमार ने हिन्दू कालेज की वीमेंस डेवलपमेंट सेल के वार्षिक उत्सव समारोह मे ‘स्‍क्रीन पर स्‍त्री’ विषय  संगोष्ठी में व्यक्त किए।  विषय के टेलीविजन से जुड़े पक्ष पर विनीत कुमार ने कहा कि इस दिल्ली शहर में दर्जनों ऐसी शॉप, शोरूम हैं, जहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है- यहां टीवी सीरियलों की डिजाइन की जूलरी मिलती है। आप चले जाइए कटरा अशर्फी और सिरे से खारिज कीजिए साडियों के डिजाइन, लंहगे के स्टाइल और रंगों को..दूकानदार आपको सीधा जवाब देगा कि आप जिसे नापसंद कर रही हैं, उसे अक्षरा, काकुली, पार्वती, प्रिया भाभी पहनती हैं। कई बार दर्शक खुद ग्राहक की शक्ल में इनकी मांग करते हैं। उन्होंने कहा कि दूसरी तरफ टीवी स्‍क्रीन का पर्दा अपने तमाम स्त्री चरित्रों को अच्छे-बुरे में विभाजित करता है।  कोहेन ने सोप ओपेरा पर गंभीर अध्ययन करते हुए विस्तार से बताया है कि जो अच्छी चरित्र के खाते में होंगी, वो परंपरा, परिवार, मूल्य, संस्कार आदि ( भले ही वो कई स्तरों पर जड़ ही क्यों न हों) बचाने में सक्रिय होंगी, जबकि जो खल चरित्र होंगी, वो प्रगतिशील, पढ़ी-लिखी, कामकाजी, खुद की पहचान के लिए जद्दोजद करती नजर आएंगी अकादमिक-साहित्यिक दुनिया से ये बिल्कुल उलट छवि है।

संगोष्ठी में पक्ष सिनेमा पर बात करते हुए युवा फिल्म आलोचक मिहिर पंड्या  ने बताया  कि हिन्दी सिनेमा हमेशा नायक प्रधान होता है। इसमें नायिका का काम नायक को उत्कर्ष तक पहुँचाना होता है। स्त्री को केन्द्र मे रखकर सिनेमा इतिहास पर बात करते हुए ‘मदर इंडिया’ से इधर की ‘क्‍वीन’  और ‘मसान’  जैसी समसामयिक फिल्मों की चर्चा की। ‘मदर इंडिया’ के क्लाइमेक्स पर बात करते हुए ‘राधा माँ’ को भारत माँ का सुपर इंपोज़ होते हुए बताया, जिसका सीधा संबंध आज़ाद भारत मे प्रेम के मानक को गढ़ना था। 1995 मे आई सुपर हिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे’ को उदारीकरण, भूमंडलीकरण से जोड़कर देखते हुए थम्स अप जैसे उत्पादों को सिनेमा द्वारा संकेतिक रूप से स्वीकारने की बात कही।

संगोष्ठी में मौजूद विद्यार्थियों ने दोनों वक्ताओं से सवाल पूछे। संगोष्ठी के प्रारम्भ में दोनों वक्ताओं का परिचय देते हुए हिंदी विभाग के अध्यापक डॉक्‍टर पल्लव ने कहा कि सिनेमा और टीवी की आलोचना को अकादमिक बहसों की गंभीरता के स्तर पर चिंतन योग्य बनाने में विनीत और मिहिर के लेखन की बड़ी भूमिका है। दोनों अतिथियों, सेल की छात्राओं और डॉ नीलम सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर आयोजन का शुभारम्भ किया। संगोष्ठी में हिन्दू कालेज के अतिरिक्त बाहर के कालेजों से भी अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। अंत में वीमेंस डेवलपमेंट सेल की प्रभारी डॉ रचना सिंह ने सभी का आभार माना।

प्रस्तुति‍: अनुपमा रे
अध्यक्षा, वीमेंस डेवलपमेंट सेल, हिन्दू कालेज, दिल्ली

विषयों की नवीनता और विविधता के कवि : महेश चंद्र पुनेठा

कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी

कवि संतोष चतुर्वेदी

समकालीन कविता में युवा कवि संतोष चतुर्वेदी का नाम एक चिर-परिचित नाम है। पिछले दो दशक से वह कविता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘पहली बार’ और ‘दक्खिन का भी अपना पूरब होता है’। पहले संग्रह की कविताएं जहां मध्यवर्गीय जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं। वहीं दूसरे संग्रह के आते-आते कवि लोक के नजदीक गया है । यह उनकी कविता का विकास और कवि लोकोन्मुखीकरण है। कवि जो कुछ अनुभव करता है, उसे अपने कवित्त विवेक की कसौटी पर कसता है और सहज रूप में व्यक्त करता है। कवि ने लोक के रूप-रंग-गंध-स्वर से कविता का कथ्य और रूप गढ़ा है। लोक की भाषा को कविता की भाषा बनाया है। उन चरित्रों और घटनाओं को कविताओं की अंतर्वस्तु बनाया है, जो हमेशा से उपेक्षा के शिकार रहे हैं, जो बेनाम-बेरंग हैं, लेकिन अपने वजूद को बनाए हुए हैं। उपेक्षित वर्णों और शब्दों तक को उन्होंने नए अर्थ प्रदान किए हैं। उन शब्दों और वर्णों को जो अपने शब्दकोश या वर्णमाला की दुनिया में नहीं अटाते, उन्हें अपनी कविता में पूरे सम्मान के साथ ले आए हैं। जीवन-जगत में उपस्थित हर छोटी से छोटी चीज उनकी कविता में पूरा सम्मान पाती है। एक कविता में वह कहते हैं- ‘सुई की नोक जैसी काया भी/हो सकती है अहम।’ वह पूछते हैं- बनाया जा सकता है क्या कोई भविष्य/उपेक्षित रख कर अपना समय।’ हर एक दिशा, हर एक अक्षर, हर एक अंक, हर एक सेकंड का उनके लिए बहुत महत्व है। जीवन का ‘हाशिया’ उनके आंखों से कभी ओझल नहीं होता है। यह उनकी कविता की ताकत भी है। वह मानते हैं कि हमारे कामयाब होने में हाशिए की हमेशा से अहम् भूमिका रही है। आज मनुष्य सभ्यता की जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसमें पांवों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है, जितनी सिर की। समाज के ऊँचे तबके चाहे उनकी कितनी ही उपेक्षा करें या उनके खिलाफ षड्यंत्र करें, उनके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं- कि जब तक पाँव तभी तक जीवन/बेपाँव रुक जाता है तन/बेपाँव थम जाता है जीवन/और मन भी रूँआसा हो जाता है/बेपाँव हो कर।(दक्खिन का भी पूरब होता है) संतोष केवल दीवारों और छतों को महत्व देने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि खिड़कियों और दरवाजों को भी बराबर महत्व देते हैं। वह जानते हैं कि इनके बिना नहीं बन सकता है कोई भी मुकम्मिल स्वर। वह इस हाशिए की ताकत को पहचानते हैं इसीलिए वह अपनी कविताओं में भीमकाय जहाज के बरक्स एक महीन सुराख और सूरज-चांद के बरक्स एक दीए को रख देते हैं।

लौकिकता पर उनका गहरा विश्वास है। संतोष की नजर में इस जमीन पर कुछ भी नहीं है अलौकिक। इसी लोक से वह अपने कविता के मतलब के खनिज-पत्थर निकाल लेते हैं और वहीं से शब्द लेते हैं। जीवन का खुरदुरापन उन्हें खूब भाता है क्योंकि उनका मानना है कि ‘टहनी पर जहाँ दिखती हैं खुरदुरी गाँठें/वहीं से फूटती हैं नयी राहें/वहीं से निकलती है नयी कईन।’ इसे वह बहुत उम्मीद से देखते हैं।

उनकी एक चर्चित कविता है- ‘मोछू नेटुआ’ जिसमें हम उनकी लोकधर्मिता को व्यापकता में देख सकते हैं। यह कविता संपधरवा पर लिखी गई है जिसमें सांप पकड़ने वालों के बहाने उन तमाम घुमक्कड़ जातियों का जो दर-बदर भटकने को मजबूर हैं, का कठिनाई भरा पूरा जीवन सामने चित्रित हो उठता है। यह अपने समय की हंसमुख दुनिया के उन तमाम उदास चेहरों की दास्तान है, जो अपनी उदासी के लिए जैसे हमेशा से अभिशप्त हैं,  जो तरह-तरह की तरकीबों से भी नहीं जुटा पा रहे हैं। दूसरे टैम का भोजन,जिनके बच्चे नहीं जान पाते बचपन का मतलब तथा जो जीवन जी नहीं, काट रहे हैं। यह एक बहुआयामी कविता है। इस कविता में पर्यावरण की लगातार हो रही क्षति, विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन और मशीनीकरण के चलते परंपरागत पेशों पर मंडरा रहे खतरे की चिंता तो है ही, साथ ही मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट की चिंता भी व्यक्त हुई है। सांप पकड़ने वाले के मंत्र से कविता शुरू होती है और खत्म होती है बेजहर लोगों की तलाश और उनको बचाने की चिंता में ताकि अपने समय की एक सुखद तस्वीर बनाई जा सके। इससे कवि की संवेदना के विस्तार का पता चलता है। कविता में ऐंद्रिक बिंब बहुत तगड़े हैं। लगता है जैसे भरे गलमुच्छों वाला मोछू नेटुआ हमारे सामने उपस्थित हो गया हो। उसकी एक-एक बात और करतब को हम कविता में सुन और देख सकते हैं। पेट की खातिर वह कैसी-कैसी बाजीगरी दिखाने को विवश है, इस दर्द को मार्मिक ढंग से प्रतिबिंबित किया गया है। देखिए न मोछू नेटुआ जिस दिन कोई सांप पकड़ता है उस दिन-‘बहुत दिनों के बाद/उसका पूरा घर जी भर खाता-पीता-सोता’ है। छोटे-छोटे काम करने वालों के प्रति खाते-पीते लोगों के नजरिए और उनकी आशंकाओं को भी इस कविता में व्यंजित किया गया है। संतोष पाठक को संपधरवाओं के इतिहास से ही नहीं परिचित कराते हैं, बल्कि औपनिवेशिक शासन द्वारा तमाम घुमन्तू जातियों को अपराधी घोषित किए जाने से उनके साथ सदियों से होने वाले अमानवीय व्यवहार और इस वर्ग में पैदा हुई चेतना और आक्रोश को भी रेखांकित करते हैं। लेकिन कविता में कहीं-कहीं पर मोछू नेटुआ की बातें जबरदस्ती उसके मुंह में ठूंसी सी भी लगती हैं। इससे बचा जा सकता था। इस कविता में  कवि का इतिहासबोध और मौजूदा राजनीति के प्रति उनका गहरा आक्रोश भी दिखाई देता है। आज के नेता और अधिकारियों पर कविता में तीखी टिप्पणी हैं-दरअसल असली विषधर हैं ये समाज के/अमिट कलंक हैं ये हमारे आज के/जिन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहा कोई तंत्र-मंत्र।’ साथ ही विकल्प की ओर भी संकेत है- ‘अब तो खोजना पड़ेगा हमीं लोगों को/इनसे निपटने के लिए/जमाने के मुताबिक कोई नया ब्रह्मास्त्र।’ यह कविता आमआदमी के पक्ष में खड़ी कविता है। संतोष की छवि एक जनपक्षधर कवि की है, उनकी यह पक्षधरता हमें ‘खाट बीनने वाले’, ‘ओलार’ आदि कविताओं में भी दिखाई देती है। उनकी कविताओं में ’रोशनी वाले मजदूर‘ हैं जिनके कांतिहीन चेहरों के पीछे/बढ़ता जा रहा है अँधेरा…/खुद अँधेरे में नहाकर/वे सिर पर ढो रहे हैं रोशनी। कूड़ा बीनने वाला बच्चा जो अपना बचपन बीन कर रख रहा है बोरे में। वह समय की नब्ज पर सही जगह हाथ रखते हैं- कैसा समय है/कि मोटे और मोटाते जा रहे हैं/…….कमजोर पतराते। इस विषमता को देखते ह ‘ओलार’ कविता में कवि बहुत तीखा प्रश्न खड़ा करता है, जो दुनिया में संतुलन स्थापित करने की जरूरत को बताता है-  ‘यह कैसा समय है भाई/कि मोटे और मोटाते-अघाते जा रहे हैं/कमजोर पतराते जा रहे हैं दिन-ब-दिन/कुछ बैठे हुए हैं पालथी मार कर/और तमाम के कंधे पिरा रहे हैं/कुछ डूबे हैं वैभव-विलास में आकंठ/जबकि तमाम लोगों के सूखते जा रहे हैं कंठ।’ कवि सचेत करता है कि यदि इस अंतर को समाप्त न किया गया तो एक दिन दुनिया ही ओलार हो जाएगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि इक्का हो या दुनिया यदि ओलार हो जाए तो आगे बढ़ना कठिन हो जाता है।

अपने समय और समाज के प्रति सचेत एक कवि शासक-शोषक के इरादों और नीयत को अच्छी तरह पहचानता है। उनके हर कुचक्र और षड्यंत्र की खबर रखता है। उसके पीछे छुपे मंतव्यों को समझता है। पूंजी केंद्रित व्यवस्था से नाभिनालबद्ध सत्ता कैसे सामूहिकता का नष्ट करती है? कैसे हमारी संवेदनशीलता को कुंद कर देती है? कैसे हमसे हमारी पहचान छीन लेती है? ये हमें संतोष की कविताओं में दिखाई देता है। वह जानते हैं उन्हें हमारे एकजुट होने से डर लगता है इसलिए-

वे हमें इतना अकेला कर देना चाहते हैं
कि हमारे पैरों में कोई कांटा चुभे तो हम आह भी न भर पाए
कि अगर कोई हमारे हाथों को अपने हाथों में लेकर सहला
तो भी प्यार की कोई अनुभूति न जगने पाए
कहीं कोई जख्म हो तो भी हमारे चहेरे पर कोई शिकन न आए
हमारी किसी भी खुशी पर न जुट पाए
हमारा कोई सगा संबंधी नाते रिश्तेदार भाई दयाद
उन्होंने लुभावना सपना दिखाया शहर का
और जब अपना गांव गिरान खेती गिरस्थी छोड़-छाड़ कर हम गए शहर
और धीरे-धीरे कम होता चला गया हममें हमारा हम
हमारे पसीने से पुष्ट अनाजों को हमारे बखारों में जाने से रोक कर
उसे भेज दिया सस्ती कीमतों पर मंडियों में
हमारे रग-रग में रची-बसी कहानियों को
करीने से हमारी स्मृति से किया बिलग
इन्होंने नहीं छोड़ा हमारी रामलीलाओं, नौटंकियो
फाग और चैता को
रोचक अंदाज में बताते हैं वे हमें अकेलेपन के फायदे
वे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे पास
जिससे हम बात कर सकें और गाहे-बगाहे अपना दुखड़ा रो सकें
वे कुछ भी नहीं सुनना चाहते हैं, हमारी सलामती के बारे में
वे तो हमारी परछाई तक छीनने पर आमदा हैं
उन्हें डर है कि हम इसमें छुप कर कर सकते हैं गुरिल्ला लड़ाई

(वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं)

’पहली बार‘ संग्रह में एक कविता है- हमारा चुनाव। इस कविता के माध्यम से संतोष हमारे जमाने के नेता और लोकतंत्र की मूलभूत विशेषताओें का काला चिट्ठा खोलते हैं। यह कविता तथाकथित लोकतंत्र में एक नेता बनने की प्रक्रिया को बताती है। पिता के जेब से चोरी से लेकर फिरौती मांगने तक का सफर कैसे अंततः किसी राजनीतिक दल का प्रत्याक्षी बनने तक पहुंचता है, इसका विवरण इस कविता में मिलता है। इस बहाने संतोष हमारी लोकतांत्रिक राजनीति का चेहरा उजागर कर देते हैं। चोरी, डकैती, वसूली, फिरौती, हत्या, बलात्कार जैसे दुर्गुण कैसे उसे न केवल एक काबिल नेता साबित कर देते हैं, बल्कि चुनाव भी जिता देते हैं- जो इन प्रतिमानों पर खरा उतरता है/उसे ही हम चुनते हैं अपना नेता/अब चाहें हम जो भी प्रलाप करें/सच तो यह है/कि उनका कोई भी कसूर नहीं था इसमें। यहां प्रश्न उठता है कि तो क्या वास्तव में इसके लिए आम जनता ही जिम्मेदार है? जैसा कि कवि मानता है। इस कविता को पढ़ते हुए मन में प्रश्न पैदा होते हैं कि क्या इस तंत्र में ऐसी परिस्थतियां हैं, जिसमें कि जनता अपने वोट का सही-सही इस्तेमाल कर सके? क्या उसे ऐसा करने दिया जाता है? क्या जनता को जाति, धर्म, क्षेत्, भाषा की संकीर्णताओें से बाहर निकलने दिया जा रहा है? क्या आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के कोई मायने होते हैं? दरअसल इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की आवश्यकता है। इस यथार्थ के भीतर प्रवेश करके देखने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऊपर से दिखाई देने वाला यथार्थ हमेशा वास्तविक यथार्थ नहीं होता है।

नौंवे दशक के बाद की भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच सांप्रदायिकता भी है। इसने भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित किया। एक जनपक्षधर कवि इससे भला विचलित हुए बिना कैसे रह सकता है। सांप्रदायिकता की राजनीति करने वालों की चालों को कवि खूब समझता है। कवि को पता है इन ताकतों द्वारा लोगों को जोड़ने के नाम पर कैसे तोड़ने की राजनीति की जाती रही है। ’गुजरात-2002‘ कविता में कवि लिखता है- नियम,  नाटक और हकीकत में/वे इतना घालमेल कर देना चाहते हैं/कि समझ न पाए/कोई कुछ भी। अपने सुनहले अतीत की बातें करके वे लोगों को बरगलाने का प्रयास करते हैं, पर कवि अपील करता है कि- ‘अतीत में न लौट कर/अतीत से सबक लेने की आवश्यकता है।’ अच्छी बात है लोग कवि की इस बात को समझ रहे हैं और-‘जारी है एक सतत विरोध/हार न मानने वाला।’ कवि ’अयोध्या-2003‘ के माध्यम से साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम को बताता है अयोध्या जो-कभी रही होगी राम की राजधानी/आज बची है/जनपद से भी छोटे प्रारूप में….यह बेबाक राय थी अयोध्या के उस राम के बारे में/जो खयाल रखते थे/कदम-कदम पर मर्यादा का/लेकिन अब हर जगह उद्दंडता पसर रही है/लोगों को अब वही अयोध्या/बुरी तरह अखर रही है।’ कवि सांप्रदायिकता की इस राजनीति का प्रतिरोध कुछ इस तरह से करता है- ‘हम न उतरे उस जमीन पर/जिस पर बहुत नाज था कभी राम को।’ लेकिन हमें यह भी मानना होगा कि प्रतिरोध का यह तरीका पर्याप्त नहीं है। सांकेतिक प्रतिरोध से काम नहीं चलने वाला है। सांप्रदायिक ताकतें जिस तरह दिन-प्रतिदिन मजबूत होती जा रही हैं, संगठित और सक्रिय प्रतिरोध ही उसका एकमात्र उपाय है।

एक कविता की सबसे बड़ी भूमिका मानवीय मूल्यों के पक्ष में वातावरण तैयार करना होता है, क्योंकि यह काम कविता ही सबसे अच्छी तरह कर सकती है। एक अच्छा कवि हमेशा मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा रहता है। संतोष भी इसके अपवाद नहीं हैं। क्षीण होती आदमियत की चिंता उनके काव्य-सृजन के केंद्र में है। आदमी-आदमी के बीच कम होते ऐतबार समय में ये कविताएं ‘अंधकार के वर्चस्व से लड़ते-भिड़ते बचा लेती हैं आंख भर नींद और सुबह जैसी उम्मीद’। कवि की नजर में जो समय चल रहा है, वह भी बहुत अच्छा नहीं है और जो बीत गया, वह भी बहुत अच्छा नहीं था- इस बीतती सदी के पास/याद करने को बची है /अभी भी उदास रातें/बलात्कार से सनी लड़कियां/ठूंठ धरती पर/दुनिया का कूड़ा ढोते बच्चे/बढ़ते जा रहे हैं आगे।’ इसलिए-सदी सिर झुका कर/छुपा रही है मुँह।…..रिश्ते अब ढोए जाते हैं ….कलम की धार/नहीं हुई है कभी भी कुंद/ अन्याय के प्रतिकार में/बोल रही है अभी भी/तुम्हारे खून की हरेक बूँद। …विचारों के पंख होते हैं/मौत को चकमा दे/जो पहुँच जाते हैं/आम विचारों में। ….आदमी खुद एक जटिल समय है/जिसे परखने में हर दम/परेशान रहा समय। इन कविताओं में आज के समय का सच है जिसमें सबसे ज्यादा शोर वही करते हैं, जो कुछ करते धरते नहीं, जो सबसे अधिक नैतिकता की बातें करते हैं, वही सबसे अधिक अनैतिक हैं। इस विपर्यय को संतोष ने अपनी कविता ’जो किसी काम के नहीं होते‘ में बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वास्तव में आज ऐसी स्थिति पैदा हो गई है- ‘अच्छे लोग कुछ बोल नहीं पाते/निकल नहीं पाते घर से/गलत लोग सड़कों मैदानों में जाकर/अधिकारपूर्ण भाषण देते हैं/और आस-पास मजमा जुटाते हैं/जो किसी काम के नहीं होते/वे देश की सरकार चलाते हैं।’ सटीक टिप्पणी है यह आज के राजनीतिज्ञों पर। यह बात बिल्कुल सही है- ‘आज हालात यह है कि असली आवाज वाले टापते हैं/नकली आवाज वाले/भीड़ जुटाते हैं।’ ऐसे में संतोष की कविताएं प्रेम, सच्चाई, ईमानदारी, प्रतिरोध जैसे शाश्वत मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हैं। उनकी कविताओं में कवि की दुनिया का बेहतरीन इंसान बनने की आकांक्षा व्यक्त होती है। निश्चित रूप प्रेम ही वह भाव है जो व्यक्ति को बेहतरीन इंसान बनाता है। कवि मानता है कि प्रेम ही है जिसने बचाया है दुनिया को- ‘सरसों के फूलों जैसा ताजा प्रेम/और प्रेम की गरमाहट/सर्द हवाओं और पृथ्वी की परिक्रमाओं के साथ/बचाये हुए है दुनियावी बुनियाद।’ कवि का विश्वास है कि- ‘अकेला प्रेम/कितना बदल देता है/दुनिया को।’ ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है इतिहास। संतोष का मानना है- ‘एक-दूसरे से जूझ रहे है/जब सब/प्रतियोगी संसार में/कवि लिख रहे हैं/प्रेम कविताएं/धरती के भरोसे के लिए।’ इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि की प्रेम में गहरी आस्था है। यह आस्था बनी भी रहनी चाहिए क्योंकि प्रेम ही है जिसके चलते तमाम विसंगति-विडंबना एवं क्र्रूरता के बावजूद इस दुनिया की सुंदरता बनी हुई है। दुनिया रहने लायक बची हुई है। यह प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के बीच का न होकर हर प्राणी मात्र के बीच का है। संतोष अपनी एक कविता में सच्चाई के प्रति लोगों के नजरिए को व्यक्त करते हैं। कैसी त्रासदी है, सच्चाई आज चादर की तरह देखी जा रही है। दरअसल सच्चाई को इस तरह देखना बताता है कि  मानवीय मूल्य आज कैसे वस्तु की तरह हो गए हैं जिनका मनुष्य अपनी जरूरत के लिए इस्तेमाल कर काम निकलने पर परे धर देते हैं। पुराना पड़ गया है सच्चाई का मॉडल-‘धराऊ कपड़े की तरह पहन लेते हैं लोग/रिश्तेदारियों में जाते समय।’ यह मूल्यों के अवमूल्यन पर कवि की चिंता है। कवि कहता है-‘सच बोलना अब बिल्कुल मना है/जो बोलेगा वह ठिठुरेगा/सड़क के किनारे पागलों की तरह/लोग चिढाएंगे उसे/फेंकेंगे पत्थर।’ पर ऐसा केवल आज ही नहीं  सच बोलने के हमेशा से ये खतरे रहे हैं। किसी भी काल में सच बोलना सुरक्षित नहीं रहा है। पर यह भी सत्य है कि लोग फिर भी सच बोलते रहे। उसकी एवज में बड़े से बड़े खतरे उठाते रहे हैं। भले ही ऐसे लोग किसी भी काल में बहुत कम रहे हैं।

मानवीय मूल्यों को बचाने में हमारे आपसी रिश्तों की अहम् भूमिका रही है। कुछ ऐसे रिश्ते हैं जो मानवीयता की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं। माँ भी एक ऐसा ही रिश्ता है। यह कविता का शाश्वत विषय रहा है। ’माँ ‘पर संतोष ने भी कुछ कविताएं लिखी हैं जिनमें माँ के प्रति कवि की आत्मीयता तो व्यक्त होती ही है माँ के बहाने औरत का पूरा संघर्ष और त्याग भी सामने आता है। उनके पहले संग्रह में संकलित ‘माँ’ कविता एक विधवा स्त्री के संघर्ष को बारीकी से चित्रित करती है। कविता की पहली पंक्ति ही माँ के प्रति असीम श्रद्धा से भरी हुई है-खुशगवार है मौसम/उसके पास माँ जो है।’ सचमुच दुनिया में माँ से बढ़कर कोई दूसरा रिश्ता नहीं हो सकता है। माँ परिवार के लिए रीढ़ के समान है। माँ का त्याग देखिए-आँखों में नींद की जगह/जीवन की अगली लड़ाई/लड़ने की लालिमा है/माँ के पास/माँ की साँसों से/जीवन पाती है हवा/कुछ भी नहीं रख पाती/वह अपने लिए/सबकी सलामती के लिए/रहती है वह निराहार।’ कवि बिल्कुल ठीक कहता है-‘सब कुछ संभव है/बस असंभव है माँ की कोई प्रतिलिपि/जिसके पास माँ है/वह दुनिया का सबसे खुशगवार प्राणी है।’ माँ ही है जो मकान के एक ढाँचे को घर में तब्दील करती है।उसमें आत्मीयता और सुरक्षा का संचार करती है। लेकिन विडंबना देखिए उसका ही अपना कोई घर नहीं होता है। संतोष के दूसरे संग्रह की कविता ‘माँ का घर’ में यह विडंबना व्यक्त होती है। माँ के अलावा पिता को याद करते हुए भी उनके यहां कुछ कविताएं हैं। कवि पिता को हमेशा अपने बीच महसूस करता है और रिश्तों की गरमाहट हम  उनकी कविताओं में अनुभव करते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं की संतोष सार्वजनिक संवेदना के साथ-साथ निजी संवेदना के कवि भी हैं।

संतोष की कविताओं में हमें यत्र-तत्र प्रकृति और पर्यावरण चेतना भी दृष्टिगोचर होती है। जिस तरह लगातार अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियों की प्रजातियां खत्म होती जा रही हैं, पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है और जहरीली होती जा रही है दुनिया, उसे देखते हुए वह प्रश्न करते हैं-‘गायब करते-करते सारे जीवों को वनस्पतियों को/क्या कायम रख पाएगा आदमी/धरती के अपने इस ठिकाने पर खुद को सही सलामत।’ पहले संग्रह में ’बरगद‘ एक लंबी कविता है जिसमें प्रकृति के माध्यम से जीवन की हलचल दिखाने की कोशिश की गई है। कवि इस हलचल का बड़ी सूक्ष्मता से चित्रण करता है। एक पेड़ निखालिस पेड़ नहीं होता उसके चारों ओर जीवन गुंथा होता है। इसलिए एक पेड़ का कटना मात्र एक पेड़ का कटना नहीं है बल्कि जीवन का रूकना है। प्रकृति और मनुष्य का अन्योन्याश्रित संबंध इस कविता में देखा जा सकता है। इस कविता में प्रकृति और प्रौद्योगिकी  विकास के बीच के द्वंद्व को दिखाने की भी अच्छी कोशिश की गई है। कैसा विकसित तंत्र है जिसने मानव को उसकी प्रकृति और जीवन की क्रियाशीलता से बेदखल कर दिया है। यह विकसित तंत्र मानव जीवन को सरल तो कर सकता है,उसे तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध भी करा सकता है लेकिन-‘इस विकसित तंत्र में/नहीं खोजा सकता है वह उपाय/जिसमें एक भरे-पूरे जीवन को/रोपा जा सके साबूत/भर दी जाए पत्तों में/टहाटह हरियाली/टाँक दी जाए उस पर सुबह की ओस।’ तकनीकी युग पर सटीक व्यंग्य है यह कविता। प्रौद्योगिकी को लेकर एक और कविता है संग्रह मंे-’सारी खूबियों के बावजूद‘। इस कविता में कवि कंप्यूटर को केंद्रित करते हुए इस ओर ध्यान खींचता है – बचपन में दुनिया का नक्शा देखकर /जितना छोटा समझे थे हम/ठीक उतना ही छोटा बना दिया है/दुनिया को इसने।लेकिन-इतनी तेज गणना करने वाला/यह मषीनी बक्सा/अपनी सारी खूबियों के बावजूद वैसे भी/कितना मोहताज रहता है/आदमी की उंगलियों का। यह कविता कहती है-प्रौद्योगिकी कितना ही उन्नति कर ले पर वह आदमी की अहमियत को समाप्त नहीं कर सकती है न ही प्रकृति को पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर सकती है। यह बात सही भी है तमाम तकनीकी प्रगति के बावजूद-‘इस जमाने मंे भी अकाल है/बाढ़ है,भूकंप है ,ज्वार है।’ विकास, प्रोद्यौगिकी और प्रकृति के बीच संतुलन बनाकर चलना ही इस वक्त की जरूरत है। प्रकारांतर से संतोष की कविताएं इसी बात पर बल देती हैं।

संतोष की कविताओं में हमें चारों ओर फैले अंधकार के खिलाफ लड़ने की इच्छा और उम्मीद की किरणें दिखाई देती हैं-‘लाजिमी है अब/जहालतों से दो-दो हाथ करने/हाथों को मुट्ठी बनाने/और उसे उठाने का/घासों का आँधियों में न उड़ना/उम्मीदें हैं/अभी भी बहुत कुछ/अपने जमाने से।’ कवि आह्वाहन करता है- हमें पूरी करनी है वसीयत/अपने उन पुरखोें की/जिन्होंने रचा अपना वितान/तमाम विरोधों के बावजूद। उनका विश्वास इन पंक्तियों में झलकता है-‘तुम्हारा भोर का सपना/सच होगा सारोवीवा/जरूर एक दिन।’ ये सारी बातें मिलकर संतोष चतुर्वेदी की कविता में अपने समय और समाज का एक कोलाज बनाती हैं, जिसमें अलग-अलग कोणों से कभी चटख तो कभी धूसर रंगों में जीवन दिखाई देता है,कभी आशा तो कभी उदासी प्रकट होती है। उनके यहाँ कुछ बातें विशेष रूप से फोकस हुई हैं जैसे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार,मूल्यों का अवमूल्यन, राजनीति का अपराधीकरण, अमानवीय होती दुनिया आदि। कवि इस बात से बहुत परेशान है कि चीजें अपने मूल स्वभाव को छोड़ रही हैं। जिसको जो काम करना चाहिए था उसे न कर वह किसी और ही कार्य-व्यापार में लगा है। सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है। जिस आग को चूल्हे में होना था वह रिहायशी इलाकों में चहलकदमी कर रही है। जिन बच्चों को गिनती सीखनी चाहिए थी वे बंदूकें चला रहे हैं। दरअसल यह आज के दौर के हर संवेदनशील व्यक्ति की चिंता है।उसको इस बात का डर है कि-‘कहीं ऐसा न हो/कि मैं भी उसी तंत्र का हिस्सा बन जाऊँ/जिससे लड़ने का जज्बा जुटाता रहता हूँ अभी/हर पल हर छिन।’ कवि का यह डर तथा उसका यह परेशान होना बताता है कि कवि अपने समाज के प्रति कितना चिंतित है। अपने भीतर के इंसान को बचाए रखने के लिए कितना सचेत है। निश्चित रूप से एक कवि को यह प्रयास आजन्म करते रहना चाहिए क्योंकि यदि एक कवि के भीतर इंसान नहीं है तो उसकी कविता लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कविता लिखना खुद की चौकसी करते रहना भी है। हम देखते हैं जिन कवियों ने कविता को इस रूप में बरता है वही कालजयी कविता  लिख पाए हैं।

विषयों की नवीनता और विविधता संतोष के कवि की सबसे बड़ी विशेषता है। वह कविता के लिए नए-नए विषय ढूढ़ लाते हैं। ‘दशमलव’,‘ पेनड्राइव समय’,‘ड.’,‘ओलार’, ‘अंधा मोड़’,‘विषम संख्याएं’,‘प्रश्न चिन्ह’ आदि ऐसे विषय हैं जिन पर मैंने पहली बार उनके यहां ही कविता पढ़ीं। इनमें एक ओर कुछ पेनड्राइव की तरह एकदम आधुनिक विषय हैं तो दूसरी ओर दशमलव जैसे बहुत प्राचीन विषय हैं। वह कुछ संज्ञाओं तथा क्रियाओं को भी नए अंदाज में देखते हैं। वह चाहे झुकना हो, सच्चाई हो या फिर दूरियां। दूरी किसी को भी अच्छी नहीं लगती है पर संतोष का कवि मन कुछ इस तरह से देखता है-‘दूरियों में बची रहती हैं स्मृतियां/दूरियों में बचे रहते हैं संबंध/दूरियां भर देती हैं गहरे जख्मों को/गजब की क्षमता होती है इनमें जुड़ने की/कुछ फासले बचाए रखते हैं/हमारे रिश्तों की लचक को/कुछ दूरियां और संजीदा बना देती है/प्यार को।’ इन विविध विषयों पर बात करते हुए अक्सर वह बहकते हुए नून-तेल-लकड़ी की बात पर आ जाते हैं जो एक जनपक्षधर कवि के लिए स्वाभाविक है,वह कहीं की भी और कोई भी बात करे जनता के दुःख-दर्द उसे भुलाए नहीं भूलते। कवि का इस तरह बहकना भी अच्छा लगता है लेकिन कुछ कविताओं में तो यह बहक संभल जाती है पर कुछ  में अनसंभली रह जाती है और वहां कविता बिखर जाती है।कभी-कभी अनावश्यक खिंच भी जाती हैं। ऐसी कविताएं सारतत्व तक नहीं  ले जा पाती बल्कि छाया प्रतीति बनकर रह जाती हैं। यह हर कवि के साथ होता है। आशा की जानी चाहिए काव्य विवेक की परिपक्वता के साथ-साथ यह कमजोरी भी दूर हो जाएगी।

संतोष शब्दकोशीय भाषा का नहीं क्रियाशील जीवन से शब्द चुनते हैं। शारीरिक श्रम में लगे लोगों के मुंह से निकलने वाले शब्दों को पूरे सम्मान के साथ अपनी कविता में प्रतिष्ठित करते हैं। उनकी कविता शब्दकोशीय शब्दों की मुहताज नहीं है खुद ही अपनी भाषा गढ़ लेती। इसी सामर्थ्य के चलते ‘भभकना’ जैसी क्रिया उनकी कविता की अंतर्वस्तु बन जाती है और अंधेरे के खिलाफ बिगुल बजाती हुई रोशनी को सही रास्ते में चलने को सचेत करती है। लालटेन का यह भभकना उन्हें उसका रोष लगता है जिसे वह उसकी बोली में व्यक्त करते हैं। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र बिल्कुल सही कहते हैं कि संतोष की भाषा में अवधी तथा भोजपुरी दोनों के रंग यत्र-तत्र बिखरे हैं।….जो ऐसे कवि हैं जो अनेक बोलियों से जीवन रस-ग्रहण कर अपनी भाषा को सींचते हैं।

अच्छी बात यह है कि संतोष अपने लिखे से अभी संतुष्ट नहीं है,वह यह मानते हैं-‘कि लिखने के बाद भी लिखना है उन्हें/अभी बहुत कुछ/बिखरा हुआ-छूटा हुआ/चलता हुआ-रुका हुआ/अपना समय।’ कवि की इच्छा रही है कि-‘लिखना है सब कुछ/पोर-पोर में छिपा अंजोर/चांदनी में गुम रातें घनघोर/चहुंओर बिखरी हुई/रिश्तों की डोर/लिखना है सब छूटा-फटका/नये अनुभव से होकर आना है/बार-बार।’ आशा की जानी चाहिए कि संतोष कुमार चतुर्वेदी की नये अनुभवों से होकर आने की यह इच्छा हमेशा बने रहेगी क्योंकि अनुभव ही हैं जो कवि के कथ्य और शिल्प में नवीनता और मौलिकता लाते हैं। साथ ही यह आशा भी की जानी चाहिए कि उनके आगे की काव्य-यात्रा अधिक संष्लिष्टता, द्वंद्वात्मकता एवं सुसंगति लिये हुए होगी तथा समाज के हाशिए की आवाज अधिक व्यापकता और गहराई से स्थान पा पाएगी।

अन्नपूर्णा टिकुली : कमल जोशी

tikuli.kamal joshi

उसकी आँखें गहरी भूरी थी, चमकील। और जब वो एकटक देखती थी मानो सम्मोहन कर रही हों….! स्वाभाविक था कि मुझ जैसा कमजोर प्राणी उसके सम्मोहन में फंस जाए! मैं भी हिम्मत कर उसे एकटक देखता रहा फिर मैंने नजरें झुका लीं! उसके सम्मोहन का ताब ज्यादा नहीं सह सकता था। थोड़ा साथ चले। उसकी चाल में ठसक थी। मानो वो जानती हो की साथ चलने वाला ये नराधम उस पर फिदा है। मैंने नाम पूछा ! वो चुप रही पर उसके साथी ने बताय, ‘‘ टिकुली!’’

नाम अजीब था पर उसके अनुरूप था। ‘‘इसके माथे पर टिका है जन्मजात, इसलिए इसे टिकुली नाम दिया।’’ एक्सप्लेनेश की जरूरत नहीं थी। मैं सहमत हो गय। पर टिकुली से आँख नहीं चुरा पाया।

बात शुरू की जाए।

अपने अभियान में हम बधियाकोट पहुंचे थे। कर्मी गाँव की सभा से हमारे साथ मोइन भी हो लिया था। हमने नोटिस किया की जब हम पहाड़ के हाल और अपनी यात्रा के बारे में बातचीत कर रहे थे, तो एक युवक चुपचाप आकर हमारे बीच आकर बैठ गया था। वह गाँव ही नहीं,  आसपास का रहने वाला भी नहीं लग रहा था। सभा के बाद हमनें उसका परिचय चाहा तो उसने अपना नाम मोईन बताय। वह रायबरेली के आसपास का रहने वाला है। पिता शायद किसी सरकारी नौकरी में हैं। उससे बातें हुई तो वो बोला उसने गांवों को जानने के हमारे अभियान के बारे में अखबारों में पढ़ा और उत्तराखंड के गांवों के बारे में समझ बढाने के लिए अभियान में शामिल होना चाहता है। वह किसी विदेशी बैंक में कार्य कर रहा था, पर वहाँ का वातावरण तथा ‘थकी’  हुई लाइफ स्टाइल उसे पसंद नहीं आई। अब उसने आईएएस की परीक्षा दी है और अपने कार्य क्षेत्र चॉइस के रूप में उत्तराखंड लिखा है। अपने कार्य क्षेत्र के रूप में जिस क्षेत्र का चुनाव उसने किया है, उसके गांवों के बारे में जानने के लिए ही हमारे अभियान में शामिल होना चाहता है। उसकी बात सुन कर अच्छा लगा। पर हमारा भी एक संकट था। अभियान के बारे में सुनकर इतने लोग शामिल हो गए थे कि‍ रहना और खाना मैनेज करना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए तय हुआ था कि अभियान दल को दो हिस्सों में बाँट लिया जाए, जिससे जिस किसी भी गाँव में अभियान दल जाए, वहाँ के निवासियों को उनके खाने व रहने की व्यवस्था करने में ज्यादा परेशानी ना हो। ये ही हमारी यात्रा का नियम था। जिस गाँव में जाए, वहाँ के निवासियों से संवाद करें और उन्हें यात्रा का आशय बताएं। गाँव के बारे में जानकारी लें। गाँव वाले क्या कहते है, क्या उनकी समझ है, इस पर चर्चा करें। तब ही गाँव वाले हमें स्वीकारेंगे और हमारे खाने और रहने में भागीदारी करेंगे। इससे न केवल हमारी समझदारी बढेगी, बल्कि गाँव वाले भी हमें आम पर्यटक या सरकारी कर्मचारी नहीं समझेंगे और ज्यादा खुल कर चर्चा करेंगे। मोईन को सम्मालित करना ही था। एक भावी प्रशासनिक अधिकारी अगर गांवों का  फर्स्ट हैण्ड अनुभव लेना चाहता था, तो उसे हम मना नहीं कर सकते थे। हमने दल को विभाजित किया। पुराने लोग मुख्य अभियान पथ की और चले तथा दूसरे दल को सोंग गाँव के रास्ते से भेजा गया। इस निर्देश के साथ कि‍ वे लोग हमें तीन दिन बाद मुख्य मार्ग पर मिलें। मोईन हमारे दल के साथ रहा क्योंकि‍ वह हम पुराने लोगों से बातचीत करना चाहता था।

कर्मी से बधियाकोट का रास्ता खतरनाक था। पिंडर नदी ने आपदा के समय पुल ही नहीं, सड़क भी बहा दी थी। इन सड़कों की सुध लेनेवाला कोई नहीं था। पिंडर पर एक लकड़ी के लठ्ठों से बना पुल था- हिलता हुआ.. मानो नदी के बहाव में झूम रहा हो। पिट्ठू लेकर पार करने में हवा खराब हुई। हमें तो एक बार ही पार करना था। स्कूली बच्चे भी दिन में दो बार इस पुल से गुजरते होंगे। मां-बाप का दिल तो हलक तक आ ही जाता होगा बच्चों को इसे पार करता देख कर।

बधियाकोट में हमारे आने की खबर थी। पंचायत घर में हमारे रहने की व्यवस्था थी। बधियाकोट में भी लोगों से मुलाकात और चर्चा हुई। कहने को तो भराड़ी से, जो पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक का मुख्य पडाव है, बदियाकोट के समीप तक सड़क है, पर उसकी इतनी हालत खराब है की गाड़ियां चल नहीं सकतीं। इलिए बरसात के आने से पहले बधियाकोट के दुकानदार चार माह का सामान जमा कर लेते हैं। और ये सिर्फ सक्षम दूकानदार ही कर सकते हैं। भराड़ी से बधियाकोट सामान खच्चरों में लाया जाता है और एक क्विंटल लाने के लिए 800 रुपया भाडा है।  ‘‘सामान सस्ता नहीं मिलता,’’ एक चिंतित वृद्ध ने कह, ‘‘जाने सड़क कब बनेगी।’’ सड़क की उपयोगिता उसके लिए सिर्फ यात्रा के लिए ही नहीं थी, बल्कि महंगाई के समय में जीवन-यात्रा चलाने के लिए भी थी।

बधियाकोट के अधिकाँश स्वस्थ्य पुरुष ‘यारसा गम्बू’ याने कीड़ा जड़ी की खोज में शम्भू बुग्ग्याल की और गए हुए थे। यारसा गम्बू की कितनी कीमत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि कई दुकानदार भी दुकानें बंद कर यारसा गम्बू को ढूंढ़ रहे थे।

रात में हम में से कुछ के पेट खराब हो गए थे! कहीं गंदा पानी पी लिया था। सुबह जब निकलते वक्त उनकी हालत देखी तो ये तय हुआ की उनकी पीठ के पिट्ठू खच्चर के मार्फत अगले पडा़व था पहुंचाए जाएं। इसी बहाने हम जो बाकी थे उन्होंने तय किया की हम भी अपने पिट्ठू हलके कर लें और कुछ सामान खच्चर में लाद दें। हमें समदर गांव जाना था। खच्चर वाले की खोज हुई। पता चला की जिस गाँव हम जाने वाले हैं, उसी गाँव का खच्चर वाला वापस जाने वाला है। वह सस्ते में हमारा सामान गाँव तक पहुँचा देगा। खच्चर वाले खीम सिंह से मुलाकात हुई। उसने कहा की किराया तो 500 रुपये बनता है, पर आप लोग मेरे गाँव ही जा रहे हो तो 300 रूपये दे देना। हम तैयार हो गए। लम्बी पैदल यात्रा में एक दिन के लिए ही सामान ढोने से निजात पाने का सुख वो ही समझ सकता है, जो इस तरह की यात्राओं में गया हो।

एक खच्चर में हमारा सामान बाँधा गया। खीम सिंह के साथ एक अन्य साथी, खिलाफ सिंह भी अपने खच्चर के साथ था जिसमें गाँव के लिए असबाब बंधा था। बधियाकोट से समदर जाने के लिए विनायक की कड़ी चढ़ाई है। हम लगे बाटे। विनायक के रास्ते में ही टिकुली पर ध्यान दिया। विनायक यानी दर्रे पर पहुँच कर जीभर कर टिकुली को देखने के बाद ही उसका नाम पूछने की हिम्मत आई। खीम सिंह ने बताया की उसका नाम टिकुली है। टिकुली खुद अपना नाम बताने में शर्मा नहीं रही थी। वह दर असल मेरी भाषा में बात नहीं कर सकती थी। हमारा सामान टिकुली ही ढो रही थी। ताम्बे के रंग की इस खच्चरी के माथे पर एक सफेद रंग का प्रकृतिक जन्मजात टीका था। इसलिए उसका नाम टिकुली रखा गया था। टिकुली से मुलाकात की कहानी ये थी। और जब मैंने खिलाफ सिंह से उसके खच्चर का नाम पूछा तो उसने हंसते हुए बताया की उसके खच्चर का नाम गुड्डू है।

खीम सिंह, जिसने हमें कुछ देर गाँव वालों से बाते करते सुना था, हमसे हमारे बारे में और यात्रा के बारे में पूछने लगा। हमने बताया कि‍ हम ये यात्रा गाँव के असली हाल जानने के लिए कर रहे हैं और गाँव वालों पर ही निर्भर हैं। जब हम सब बात कर चुके तो उसने बताया की बीस साल पहले 1994 में भी वो हम लोगों से मिला था। फिर उसने आमंत्रण दिया की आप लोग स्कूल में सो जाना तथा खाने का इन्तजाम अपने घर में वह करेगा। हम उस पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, तो उससे कहा की गाँव में मिल-जुल कर व्यवस्था कर लेंगे। पर वह जिद पर अड़ गया कि‍ खाना तो उसके घर ही होगा। हमें हामी भरनी ही पड़ी।

शम्भू गाड पार कर ही हम समदर गांव पहुंच सकते थे। शम्भू गाड पर भी लकड़ी का बेहद खतरनाक पुल था। हिलने वाला..हमने वह भी डर-डर कर पार किया। पर टिकुली और गुड्डू ने तो ऐसे पार किया जैसे- ये उनके लिए कोई बात ही न हो। टिकुली को देखा एक बार तो ऐसा लगा कि‍ मुझे डर-डरकर पुल पार करता देख हंस रही है। पर इस बात को मैंने दिल पर नहीं लिया।

समदर गाँव की शुरुआत पर ही नदी के किनारे चा-पांच घराट बने हुए हैं। और उनमें इतना पानी है कि‍ साल भर चलते रहते हैं। जब समदर में प्रवेश किया तो बिजली नहीं थी। उसी वक्त लगा कि‍ इन घराटों से बिजली बनाने की व्यवस्था हो, तो समदर में कभी बिजली का संकट न हो और दिन में बिजली से कोई कुटीर उद्योग चलाया जा सकता है। पर बड़े बांधों से कमीशन खाने वाले हमारे नीति नियंता. इतना ‘छोटा’ क्यों सोचेंगे भला!

हमने गाँव के स्कूल में डेरा डाला। गाँव के कुछ लोग मिल गए थे। बातचीत हुई। खीम सिंह ने स्वयं ही सबको बता दिया कि यात्रियों को खाना वह ही खिलाएगा। अब हमारे कहने की कोई गुंजाइश कहाँ रह गयी थी। थोड़ी देर में बच्चे आए। उनके हाथ में झाड़ू था। उन्होंने बरामदा साफकर दिया। हमने अपना सामान फैला दिया। थोड़ी देर में खिलाफ सिंह लदाफदा आया और कुछ दरियां और कम्बल हमारे लिए बिछा दिए। पर थोड़ी देर में ही मौसम गड़बड़ होने लगा। खीम सिंह ने स्कूल मास्साब की खोज की कि‍ वह हमारे लिए कमरा खोलें। पता चला कि‍ मास्साब दो दिन की छुट्टी पर हैं, इसलिए स्कूल बंद है और चाबी भी वह ले गए। खीम सिंग को चिंता हो गयी कि कहीं हम रात को बारिश से परेशान न हों। उसने पहले की तरह ही निर्णय लिया और एलान कर दिया कि छह के छह यात्री उसके घर पर रहेंगे। हम कुछ रियेक्ट कर पाते उससे पहले ही खीम सिह दरियां उठा कर अपने घर की ओर चल दिया। हम भी पालतू पशु की तरह उसके पीछे चल दिए।

खीम सिंह घर में हमारे ठहराने का सन्देश पहले ही भिजवा चुका था। हम उसके घर पहुंचे ही थे कि‍ गर्म चाय हमारे लिए हाजिर थी। उसकी पत्नी और दो लडकियां हमारे लिए इंतजाम में जुट गईं। मकान पहाड़ी स्टाइल का पत्थर का बना था। फर्श पर मिटटी की पुताई थी। जमीन पर दरी में हमने अपने स्लीपिंग बैग बिछा लिए। खीम सिंह की पत्नी ने नमस्कार किया। नाम पूछा तो उसने अपना नाम साबेत्री बताया। सावित्री ही होगा, पर गाँव में यही उच्चारण चलता है। बेटी हेमा बड़ी थी। वह खाने का इन्तजाम करने लग गई। आश्चर्य यह था कि‍ बिना पूर्व सूचना के अचानक छह लोगो के घर आने पर भी वह महिला बिलकुल सामान्य थी।  हंस-हंस कर हमसे बात कर रही थी। क्या हम शहरी लोग,  जिनके पास संसाधन हैं भी,  अचानक छह मेहमानों को अपने घर लाने की हिम्मत कर सकते हैं ? और अगर ले भी आएं तो वह बिरले ही होंगे कि‍ खाना बनाने की जिम्मेदारी वाले इस तरह खुश रहें। यही तो असली भारत है। गाँव है, जिससे मानवीयता जिंदा है।

हमने मट्ठे की मांग भी कर दी थी। बिटिया गाँव से मट्ठे का जुगाड़ करने चली गयी। रात को हरी सब्जी,  हरा नमक मिला मट्ठा और कोदे की रोटी खायी गयी। क्या स्वाद था। रात को जब हमने खीम सिंह को खच्चर के किराए के तय से ज्यादा पैसे देने चाहे तो उसने सिर्फ तीन सौ रुपये ही लिए।

साबेत्री बोली, ‘‘ये तीन सौ तो टिकुली की कमाई है। उसे तो हम ले ही रहे हैं, ज्यादा क्यों लें। मेहमानदारी तो हमारा फर्ज ठहरा।’’

इस बीच खीम सिंह के बहन जानकी भी आ गयी, जो इसी गाँव में रहती है। रात को हमने खिलाफ सिंह, साबेत्री, खीम सिंह और हेमा से पहाड़ी गीत सुने। बहन जानकी ने भी हमारे साथ गीत वगैरह गाए। जानकी दी जब हमारे बारे में सुना कि‍ हम गाँव वालों पर निर्भर हैं, तो बोली, ‘‘सुबह खाली पेट मत जाना। सुबह का नाश्ता मैं कराऊंगी।’’ हम इन लोगों की जिंदादिली पर अवाक थे और दरियादिली पर भी।

सुबह जल्दी जाना था। सुबह पांच बजे ही दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो जानकी बहन खड़ी थी। ये बताने कि‍ नाश्ता तैयार है। वह सुबह तीन बजे ही उठ गई थी, हमारे लिए नाश्ता बनाने। उसने बेटी के साथ मिल कर आलू के गुटके और पूरी बनाई थी। हमें छक कर खिलाया और बची हुई बाँध दी रास्ते के लिए।

सुबह विदा हुए तो खीमा, उसका परिवार जानकी दी का परिवार, साबेत्री हमें विदा कर रहे थे। मैंने साबेत्री के साथ टिकुली की फोटो खींची। सच में टिकुली की कमाई से खीमा-साबेत्री के परिवार ने हमें खिलाया था। टिकुली मुझे अन्नपूर्णा जैसी लग रही थी…! मैंने उसे गले लगा लिया।

मास्‍टर जी के बच्चे : प्रेमपाल शर्मा  

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मेरे एक संबंधी शिक्षक रहे हैं। एक सफल शिक्षक, क्‍योंकि उनके पास लगातार ट्यूशनों की भीड़ लगी रहती है। इस बुढा़पे में आज भी उन्‍हें दूसरी-तीसरी पीढ़ी अंग्रेजी के ट्यूशन के लिए खोजते-खोजते आ जाती है। उनकी बेटी ‘स्‍टार अप’ पर एक किताब पढ़ रही थी। पहले तो उन्‍होंने उस पुस्‍तक को उल्‍टा–पुलटा फिर सूंघते हुए बोले, ‘तुम इस किताब को क्‍यों पढ़ रही हो।’ बेटी ने उत्‍साह और संकोच दोनों भावों से उनका प्रश्‍न छुआ और बताने लगी। लेकिन पिता ने सरेआम उत्‍तर को एक तरफ झटक दिया, ‘अरे भाई, क्‍या फायदा ऐसी किताबों का। अपना भी दिमाग खराब करो, दूसरों का भी’

बेटी भी तुनक गई और तनकर बोली, तो क्‍या रामायण बांचें? बाबूजी हमें आपने बचपन में रामायण न पकडा़यी होती, तो हम भी कहीं कलक्‍टर बनते। जब देखो, तब रामायण। पढ़ने में ठीक होने का एक और खामियाजा भुगतना पडा़ कि जिस रिश्‍तेदार, पडोसी के घर अखंड रामायण होती, ‘जा बेटी, रामायण पढ़ो जाकर! बस लाउडस्‍पीकर के आगे पढ़े जा रहे हैं, रामायण की चौपाइयां। घास खोदने की रफ्तार से और जब भी स्‍कूल का होमवर्क लेकर बैठो या कुछ पढ़ो तो मम्‍मी का हुक्‍म कि कहीं पढ़कर कलक्‍टर नहीं बनोगी। लो इन भाइयों को पकड़। ऐसी छोटी उम्र में ही दो-दो भाइयों को संभाला, फिर ऐसे घरों में ब्‍याह। बेटी रुआंसी होकर यकायक चुप हो गई, मेरे दसवीं में कितने अच्‍छे नम्‍बर थे।

यह संवाद भारतीय समाज विशेषकर हिन्‍दी भाषी राज्‍यों की कई परतें खोलता है। चलो थोड़ी देर के लिए सदियों से बदस्‍तूर जारी लड़की के साथ भेदभाव को नजरअंदाज कर सिर्फ पढ़ने के आयतन के संदर्भ में विचार करते हैं। उन दिनों पुस्‍तक मेला चल रहा था। मैनें मास्‍टर जी से पूछा, ‘क्‍या कभी पुस्‍तक मेले गए?’ उन्‍होंने लगभग अनसुना करने की कोशिश की। बुजुर्ग भारतीय को ऐसी कई आजा़दी, कई सहूलियतें मिल जाती हैं कि वह कब क्‍या देखे, क्‍या सुने और कौन सी सब्‍जी में उसे स्‍वाद आए। मैनें फिर कुरेदा तो झटककर बोले, ‘नहीं, हम कभी नहीं गए।’ शायद जो नहीं कहा वह यह कि इतने बड़े परिवार, पांच बच्‍चों के बीच हमें पुस्‍तक मेला जैसी बातों के लिए कभी कहां फुरसत थी। आज़ादी के बाद की एक-दो पीढि़यां निरंतर अपने दुखों का ब्‍यान करते–करते स्‍वर्ग सिधार रही हैं। यह हकीकत जरूर है, लेकिन पूरा देश ही गरीब था। ‘लेकिन आप तो बारहवीं तक के बच्‍चों को पढा़ते थ। वे बच्‍चे तो जाते होंग। आप उनको तो पुस्‍तक मेले के बारे में बताते होंगे? मैंने और कुरेदा। ‘नहीं, हमें नहीं पता’। वह उठकर चले गए।

पुस्‍तक, पुस्‍तक मेला, शिक्षा के संदर्भ में एक शि‍क्षक और मां-बाप का यही गड़मड चेहरा है। दिल्‍ली जैसे शहर में पचास वर्ष बिताने के बाद मास्‍टर जी का किताबों, शिक्षा के बारे में आज भी कोई बुनियादी अंतर नहीं आया है। लड़कियों के प्रति चाहे बचपन में उनका रवैया हो या आज। सिर्फ उसे पढो़ जो पाठयक्रम में हो। रटते रहो, घोटते रहो ओर विद्यार्थियों के अच्‍छे नम्‍बर पर साल के अंत में खुशी का भ्रम। ट्यूशन में इसलिए ऐसे शिक्षक ज्‍यादा सफल रहे, जो नाक की सीध में सिर्फ पाठयक्रम के प्रश्‍नों की ही बात करें। ऐसे मां-बापों की भी कमी नहीं जो पाठयक्रम से इतर कोई किताब बच्‍चों को छूने भी नहीं देते। लेकिन बच्‍चों में न पढ़ने को दोष हर समय उनकी जुबान पर रहता है।

मैंने उनकी बेटियों और बेटों से एक साथ पूछा कि क्‍या कभी मास्‍टरजी ने आपको ऐसी किताब का नाम बताया या उसके बारे में बताया जो जरूर पढ़नी चाहिए। पांचों चेहरों पर सपाट चुप्‍पी थी। सभी एक से सांचे में ढले थे या तो उन्‍होंने सिर्फ कोर्स की किताबें पढ़ी थीं या फिर कोई धर्म ग्रंथ। पूरे हिन्‍दी समाज हिन्‍दू, मुस्लिम सहित सभी का सोच इसी से मिलता-जुलता है। मैंने उन पांचों से जो चालीस से पचपन की उम्र के घेरे में तो होंगे ही, अगला प्रश्‍न किय कि ‘आप अपने बच्‍चों को रामायण और कोर्स की किताब छोड़कर कौन सी किताब का नाम सुझाएंगे।’ कहने की जरूरत नहीं फिर उनमें से किसी के पास कोई जवाब नहीं था यानी दो-तीन पीढियां दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान की किताबों से बंचित, बंजर। इस बात की भी पुष्टि कि यदि आप चाहते हैं कि बच्‍चे पढे़ं तो आपका भी कुछ दायित्व है।

पढ़ने-पढाने के संदर्भ में स्‍कूल के साथ मां-बाप, समाज, रिश्‍तेदार सभी की भूमिका पर यहां प्रश्‍न उठता है। न शिक्षक पढ़ने, ज्ञान के संस्‍कार दे रहा है न मां-बाप। जिन्‍हें वे संस्‍कारों का नाम देते हैं, वह हैं मंदिर-मस्जिदों की परिक्रमा। यह वही समाज है जो आजादी के बाद सरेआम कहता रहा है कि लड़के की तनख्‍वाह तो इतनी है, लेकिन ऊपरी आमदनी बहुत है, कि उसके घर तो काम करने वाले अरदली हैं और वह जब चाहे दफ्तर जाए न जाए यानी निक्‍कमेपन, बईमानी, भ्रष्‍टाचार की साक्षात प्रति मूर्ति। वंशवादी राजनीति और नवजात लोकतंत्र के नाम पर यही होना था और इसलिए ऐसी शिक्षा व्‍यवस्‍था गढ़ी गई, जो आज भी यथा स्थितिवादी है।

ग्‍लोबलाइजेशन का इतना तो आभार कि सरकारी नौकरियों का चौखटा ही नहीं तड़क रहा, मोबाइल, मीडिया, सूचना तकनीक की खिड़कियों से ऐसी रोशनी भी आ रही है जो प्रौढ़ महिलाओं को अपने मां-बाप से प्रश्‍न प्रतिप्रश्‍न करने की हिम्‍मत भी दे रही है और नई पीढ़ी को अपने ‘स्‍टार्ट-अप’ से विश्‍व बाजार की खोज भी करवा रही है। नि:संदेह इस चेतना को शिक्षा के माध्‍यम से पूरे देश में जल्‍दी से जल्‍दी फैलाने की जरूरत है –विशेषकर धार्मिक उन्‍मादी वक्‍त में।