Archive for: February 2016

पाठ्यपुस्तकों की कैद से मुक्त होगी शिक्षा : महेश चंद्र पुनेठा

mahesh punedha

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड खुली किताब परीक्षा प्रणाली को लागू करने पर विचार कर रहा है और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अगले सत्र से इसे लागू करने का निर्णय ले लिया है। इस निर्णय के पीछे क्या तर्क हैं, यह कह पाना तो अभी कठिन है, लेकिन यदि एक सही समझ के साथ ऐसा होता है तो इसे एक प्रगतिशील कदम कहा जाएगा। शिक्षा प्रणाली में किसी भी सुधार की शुरुआत परीक्षा से ही हो सकती है। इससे न केवल रटने और नकल की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी, बल्कि बच्चों को परीक्षा के तनाव से मुक्ति भी मिलेगी। परीक्षा का मतलब पुस्तकीय ज्ञान का मूल्यांकन करना मात्र नहीं रह जाएगा। साथ ही बच्चों में अवलोकन, अन्वेषण, प्रयोग और विश्‍लेषण की क्षमता बढ़ेगी। बच्चा अधिक सृजनशील हो पाएगा। उसकी कल्पनाशक्ति का विकास होगा। सीखने-सिखाने की पद्धति में बदलाव आएगा, क्योंकि खुली किताब परीक्षा प्रणाली का मतलब परीक्षा में ऐसे प्रश्न पूछे जाने से है, जिसके उत्तर सीधे-सीधे पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलते हैं। पाठ्य पुस्तक की भूमिका एक संदर्भ सामग्री की होती है। परीक्षा पुस्तक केंद्रित नहीं रह जाती है। यदि बच्चा पाठ्यपुस्तक की विषयवस्तु को अच्छी तरह समझा न हो तो वह पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने में सफल नहीं हो सकता है। इसमें रूढ़िबद्ध अध्ययन किसी काम नहीं आ सकता है।

शिक्षा में सृजनशीलता के अवसर बढ़ाने के लिए जरूरी है कि उसे पाठ्यपुस्तकों की कैद से मुक्त किया जाए। खुली किताब परीक्षा प्रणाली का मतलब ही है कि शिक्षा को किताबी ज्ञान से बाहर निकालना और ज्ञान सृजन की दिशा में आगे बढ़ाना। जब प्रश्नों के उत्तर सीधे-सीधे पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलेंगे, तो बच्चा उनकी खोज अपने परिवेश में करेगा। इससे परिवेश से जुड़ाव तो होगा ही, साथ ही उसमें खोज की प्रवृत्ति का विकास भी होगा। अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए उसे पुस्तकालय और प्रयोगशाला की शरण में जाना होगा। इससे उसमें अध्ययन की आदत विकसित होगी। वह अवधारणाओं को रटने की अपेक्षा समझने की कोशिश करेगा। इसमें शिक्षक और शिक्षार्थी को अधिक मेहनत करने की जरूरत पडे़गी। शिक्षण के तरीके में भी परिवर्तन देखने में आएगा। शिक्षण का मतलब सूचनाओं का स्थानांतरण मात्र नहीं रह जाएगा, बल्कि समझाने और अनुप्रयोग पर अधिक बल दिया जाएगा। परीक्षा के मायने बदल जाएंगे। परीक्षा याददाश्त क्षमता का मूल्यांकन न होकर बच्चे की तार्किक क्षमता, आलोचनात्मक विवेक, मूलभूत अवधारणाओं की स्पष्टता, परिवेश के प्रति सजगता आदि दक्षताओं और कौशलों के मूल्यांकन में बदल जाएगा। मौजूदा परीक्षा प्रणाली बच्चे की याददाश्त क्षमता का ही अधिक मूल्यांकन करती रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी तथ्य को याद कर लेना मात्र महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका विश्लेषण करते हुए अपने जीवन में अनुप्रयोग करना अधिक महत्वपूर्ण है। बच्चे सिर्फ पढ़ाई गई विषयवस्तु को दोहराएंगे ही नहीं, बल्कि वे सोचने व जो सीख रहे हैं, उसका प्रयोग करने के लिए भी उत्सुक होंगे। अपनी परिस्थिति व जरूरतों का सूक्ष्म पर्यवेक्षण कर सकेंगे। वास्तविक अर्थों में सीखना भी यही है। जीवन के सवालों का हल इसी तरह की शिक्षा से मिल सकते हैं।

लेकिन इसको लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी की जरूरत है। यदि आधी-अधूरी तैयारी के साथ इसे लागू किया जाएगा तो इसका भी कहीं वहीं हश्र न हो जो शिक्षा अधिनियम 2009 के अंतर्गत कक्षा आठ तक फेल न करने की नीति का हो रहा है। इस नीति के लागू करने के पीछे के मंतव्य को न समझ पाने के कारण आज सभी के द्वारा शिक्षा के स्तर में आ रही गिरावट के लिए इस नीति को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह नीति न पढ़ने और पढ़ाने का बहाना भी बनती जा रही है। ध्यातव्य है कि 1986 की नई शिक्षा नीति के बाद भी एक बार सपुस्तकीय परीक्षा प्रणाली को अपनाया गया था। फिर न जाने किन कारणों से एक-दो साल के भीतर ही इसे वापस ले लिया गया। यह बात बिल्कुल सही है कि खुली किताब परीक्षा प्रणाली लागू करने से पहले शिक्षण के तरीकों में आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत है। जब तक पढ़ने-पढ़ाने और मूल्यांकन का तरीका नहीं बदला जाएगा, तो इसके परिणाम और अधिक घातक सिद्ध होंगे। परीक्षा के लिए शिक्षा हो चुके दौर में कहीं यह सोच हावी न हो जाए कि  परीक्षा में जब पुस्तक लेकर ही जाना है तो फिर उसे पढ़ना और पढ़ाना ही क्यों। ऐसा होने पर अब तक बच्चे जो सूचना या जानकारी ग्रहण कर पा रहे हैं, कहीं उससे भी विमुख न हो जाएं।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में सन् 1972 में प्रारम्भ होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश के लगभग आठ सौ सरकारी विद्यालयों में तीन दशकों तक कक्षा 6 से 8 तक में विज्ञान विषय में खुली किताब परीक्षा प्रणाली का प्रयोग किया गया। इसे लागू करने से पहले उसके अनुभवों का अध्ययन करना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस कार्यक्रम में केवल परीक्षा प्रणाली में ही इस प्रयोग को नहीं अपनाया गया, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में भी बदलाव किया गया। बच्चों के लिए नई पाठ्यपुस्तकें और शिक्षकों के लिए शिक्षक निर्देशिकाएं तैयार करवाई गईं। कक्षा के ढांचे को बदला गया। परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किए गए, उसे ऐसा रूप दिया गया जो रटी हुई जानकारी को उगलवाने की बजाय अवधारणात्मक विकास का आकलन रहे। शिक्षक और समुदाय के साथ सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। उनकी इस मान्यता को दृष्टिगत रखना होगा कि स्कूली शिक्षा में किसी एक पक्ष के साथ छेड़छाड़ करने से परिवर्तन नहीं होगा। इसलिए इसे लागू करने से पहले इसको लेकर केवल शिक्षकों की ही नहीं, बल्कि अभिभावकों की सोच को भी बदलना होगा। अन्यथा उसी तरह के प्रश्न खड़े होंगे, जैसे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम के दौरान इस प्रयोग को लेकर किए गए कि यदि किताब सामने है तो परीक्षा किस बात की, परीक्षा में किताब में से जब सवाल नहीं पूछे जाएंगे तो किताब पढ़ाने या उसे साथ ले जाने का क्या फायदा हुआ,, यदि किताब परीक्षा में ले जाने की अनुमति होगी तो भला बच्चे पाठ्यपुस्तक क्यों पढ़े, आदि-आदि।

इन सवालों पर भी विचार करना होगा कि क्या हमारे स्कूल इतने साधन संपन्न हैं कि जहां बच्चे अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर सकें और हर विषय में अपनी समझ विकसित कर सके, क्या शिक्षक इतने कुशल हैं कि बच्चों में आवश्यक समझ और कौशल विकसित कर सकें। अभी तक तो स्थिति यह है कि अधिकांश स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं, न पुस्तकालय हैं और न ही प्रयोगशालाएं। न ऐसा माहौल जिसमें बच्चों को कुछ करने की स्वतंत्रता हो ताकि ज्ञान का सृजन कर सकें। अधिकांश विद्यालयों में तो अभी भी शिक्षण की बैकिंग प्रणाली ही चल रही है जिसमें बच्चे के मस्तिष्क में सूचना और जानकारियों को भरने का काम किया जा रहा है। सूचना तथ्य और जानकारियों को ही ज्ञान का पर्याय माना जा रहा है।

बस्ते का बोझ या अंग्रेजी का : प्रेमपाल शर्मा

Baste Ka bojh

बच्चों की परीक्षाएं नजदीक हैं और उनमें बढ़ता तनाव भी। यह वाकई ‘बस्ते का बोझ’ है या इसके दूसरे कारण हैं जैसे अंग्रेजी माध्यम, परीक्षा प्रणाली सहित पूरी क्रूर शिक्षा व्यवस्था और डार्विन के शब्‍दों में कहा जाए तो योग्यतम का जीवित रहने की कश-म-कश उर्फ अंतिम चुनाव। यह चाहे आई.आई.टी., मेडिकल, लॉ, प्रबंधन के अच्छे कॉलेजों में प्रवेश हो या फिर नौकरियां। अकेले कोटा शहर में पिछले एक वर्ष में दो दर्जन से अधिक आत्महत्याओं ने इस बहस को फिर जिंदा कर दिया है कि पढ़ाई का बोझ कैसे कम किया जाए, जिससे हमारी मासूम पीढ़ी ऐसा कोई आत्मघाती कदम न उठाए। वाकई दशको से लगातार रिश्‍ते घाव की तरह बहस जारी है। इधर, दिल्ली सरकार ने शिक्षा में सुघार के लिए कुछ कदम उठाए हैं तो केन्द्र सरकार ने पूर्व केबिनट सचिव टी.एस.आर. सुब्रामणयम की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जो शिक्षा के सभी पहलुओं पर विचार करेगी।

दरअसल वर्ष 1992 में जब से प्रोफेसर यशपाल समिति ने अपनी रिर्पोट में ‘बस्ते का बोझ’ की बात उठाई तब से हर मंच पर हर आदमी को मानों इस मसले पर बोलने का अधिकार मिल गया है। यही वह दौर है जब शिक्षा का जो निजीकरण 1980 के मध्य में शुरू हुआ था उसे गुणवत्ता, आदि के नाम पर बहुत तेजी से बढ़ाया गया। हजारों नुक्स निकाले गए सरकारी स्कूलों में, पाठ्यक्रम में, परीक्षा प्रणाली में और देखते-देखते हर खाली जगह निजी स्कूलों के हवाले होती गयी। कुछ जनसंख्या का दबाव, कुछ ग्लोवलाइजेशन की हवा और शेष सरकारी वित्तीय कारण जिन्हें गिनाते हुए सरकारी स्कूलों से पैर सिकोड़ने का नजरिया कि जहां आजादी के शुरू के दशकों में समान शिक्षा नब्बे प्रतिशत बच्चों को उपलब्ध थी, अब धीरे-धीरे घटकर पचास प्रतिशत के आसपास हो चुकी है। भला हो ग्रामीण भारत का जिसकी बदौलत समानता का यह आंकड़ा कुछ तो तसल्ली देता है। वरना महानगर, शहर, कस्बों का खाता-पीता वर्ग पूरी तरह निजी शिक्षा की तरफ मुड़ गया है। सविधान में समानता, समाजवाद की दुहाई देने वाली हर रंग की सरकार और उसकी संसद का मौन नागरिकों की इस बुनियादी जरूरत पर चिंताजनक है।

आखिर हम आयोग या समितियॉं बनाते क्यों हैं? क्यों देश की जनता को झांसा दिया जाता है? दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बने शिक्षा-आयोग वर्ष 1964-66 की सिर्फ दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को दोहराना यहां पर्याप्त रहेगा। पहली-सभी के लिये समान शिक्षा हो और दूसरी-न केवल स्कूली शिक्षा बल्कि उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषओं के माध्यम से दी जाए। यानी कि रोग के लक्षण कोठारी जैसे शिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासक ने साठ के दशक में ही बहुत अच्छी तरह पहचान लिए थे, संसद ने विचार भी किया लेकिन पतनाला वहीं गिरा। देखा जाए तो ‘बस्ते का बोझ’ बढ़ने की शुरुआत भी तभी होती है। निजी स्कूलों को मुनाफे के लिए पहले अपना व्यवसाय, धंधा देखते हैं, बाद में कुछ और। और धंधे के लिए सबसे मुफीद लगी अंग्रेजी। केवल विषय के रूप में ही नहीं नब्बे के इस दशक में पहले उसे छठी की बजाय प्राइमरी कक्षाओं से पढ़ाने की बात आगे बढ़ी और फिर 21वीं सदी शुरू होते-होते प्राइमरी में भी एक विषय के बजाय अंग्रेजी ने माध्यम भाषा की जगह ले ली। अंग्रेजी का मोह सैम पित्रोदा और उसके बांकुरों ने ज्ञान आयोग, जैसे मोहक नारो में लपेटकर ऐसा प्रचारित किया कि सरकारी स्कूल बंजर होते गए। दिल्ली जैसे शहर में भी सरकार और नौकरशाह इस भाषा में बात करने लगे कि सरकारी स्कूलों के बंद करने से इतने अरब-खरब मिल जाएंगे और अध्यापकों की तनख्वाह और दूसरे खर्च कम होंगे सो अलग। गलती पूरी तरह उनकी भी नहीं थी। सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूल, उसके अध्यापकों की हालत ही ऐसा कर दी कि जनसंख्या के इतने दबाव के बावजूद वहॉं बच्चों ने आना बंद कर दिया। आज भी 99 प्रतिशत बच्चे गरीब, मजदूर समुदायों के ही इन स्कूलों में पढ़ते हैं।

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समान शिक्षा के पक्ष में जो निर्णय दिया है, क्या उसे दिल्ली सरकार को भी नहीं मानना चाहिए? याद दिला दें कि इस निर्णय के अनुसार सभी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और प्रशासन से जुड़े हर नागरिक को अपने बच्‍चे सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य बनाया जाए। अभी तक तो इस मुद्दे पर चौतरफा चुप्पी है। संसद तो चलती ही बंद होने के लिए है।

‘बस्ते के बोझ’ की बुनियाद में शिक्षा का यही अंध, अनैतिक, अनि‍यं‍त्रि‍त  निजीकरण है। अंग्रेजी के साथ-साथ निजी स्कूलों ने मध्यवर्ग की सुरसा इच्छाओं को भापते हुए यह होड़ भी पैदा की कि हमारे यहां इतने विषय ज्यादा पढ़ाए जाते हैं। किसी ने जर्मनी, फ्रैंच के आवरण में विदेशी नौकरियों का लालच दिया तो दूसरे नुक्कड़ स्कूलों ने जापानी, चीनी का। इन देशों के दूतावासों ने अपनी-अपनी संस्कृति, भाषा के राष्‍ट्रीय एजेंडा को बढ़ाते हुए भी बड़ी भूमिका निभाई या कई आज भी निभा रहे हैं। जर्मन भाषा के पक्ष में जर्मनी की प्रमुख का हाल ही में दिल्ली दौरा और नयी सरकार के साथ तालमेल उसी की कड़ी है। केवल इतना ही नहीं जिन विषयों को पढ़ाने की बच्चे की उम्र, समझ के लिए जरूरत ही नहीं है, उनको भी बच्चे के बस्ते में ठूंस दिया गया है। दुहरा फायदा- बच्चों के अभिभावकों से और पैसा वसूल। और ऊपर से ये आतंक, लालच कि हमारा स्कूल क्यों सबसे अच्छा है। बिल्कुल फिटजी, नारायण, बंसल जैसी उन कोंचिग संस्थाओं की तर्ज पर कि यदि आप आई.आई.टी. या दूसरी राष्‍ट्रीय परीक्षाओं में सफल होना चाहते हो तो बारहवीं की बजाय नवीं कक्षा से ही इन किताबों पर जुट जाइए। उपर से कुछ और भी कराटे, एबेकस, शतरंज या मंहगे खेलों का दबाव। इसमें सबसे ज्यादा कसूरवार हैं तो यह अमीर अंग्रेजीदां वर्ग जो खुद स्कूलों में जाकर यह शिकायत करता है कि आप बच्चों को होमवर्क कम देते हैं। पड़ोस का स्कूल तो इतनी मेहनत कराता है। स्कूल प्रबंधन को और क्या चाहिए। वे दो किताबें और लगा देते हैं। अफसोस कि कई बार पूरे साल इन किताबों को खोलने की फुरसत भी बच्चो को नहीं मिलती।

इन सब चक्कियों के बीच आखिर पिसा कौन? मासूम बच्चे और बच्चियों जिनकी आत्महत्या की खबरें शिक्षा व्यवस्था की पूरी दुनिया को हिलाने के लिये पर्याप्त हैं। प्रोफेसर यशपाल के ही शब्‍दों में आई.आई.टी. आदि में न चुने जाने वाले तो पूरी उम्र हार महसूस करते ही है, जो चुने भी जाते हैं वे भी बहुत एकांकी व्यक्तित्व होते हैं।

हिन्दी पट्टी के बुद्धिजीवी, पत्रकार, प्रोफेसर यहां और भी बडे़ अपराधी के रूप में उभरते हैं। वे पुरस्कारों, अकादमियों, विश्‍वविद्यालयों, कॉलेजों के पद की राजनीति में तो दशकों से लिप्त हैं, स्कूलों-कॉलेजों में अपनी भाषा के पक्ष में वे आजतक न सामने आए न अपनी भाषा के पक्षधर उन आंदोलनों के साथ खड़े होते। क्या कभी ऐसे मुद्दों पर मेरे सवेदनशील, सहिष्णु, सेकुलर या धरम संस्कृति के ध्वज–रक्षकों ने कोई आन्दोलन किया? शायद वे ज्यादा समझदार हैं कि अंग्रेजी और इसी भारी बस्ते की बदौलत उनकी संततियां इस देश और उसकी समस्याओं से मुक्ति पाकर विदेश में चुपचाप जाकर बस सकती हैं।

अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धीरे-धीरे सब कुछ नष्‍ट कर रही है। उत्तराखंड के हल्द्वानी और उत्तरप्रदेश के मेरठ में रहने वाले आठवीं क्लास के अमीर बच्चे कहते हैं कि‍ अंकल हिंदी लिखना बहुत मुस्किल है। यह कहते हुए उनके चेहरे पर कोई संकोच नहीं है। हो भी क्यों ? वाकई उनका कोई अपराध नहीं है। अब पहली क्लास से ही अंग्रेजी माध्यम भाषा के रूप में महानगरो के बाद इन छोटे नगरों, कस्बों तक पहुँच चुकी है।

हमारे समाज में शिक्षा की उलटवासियों भी अजीब हैं। साठ-सत्तर की उम्र छूता हुआ हर नागरिक अपने बचपन में पढ़ने के आनन्द, अपनी भाषा, आजादी पर खूब मगन होता है, लेकिन अपने आसपास इसकी रक्षा के लिए लड़ने को कतई तैयार नहीं है। क्या इन सबको पूरा व्यवस्था सहित इस अपराध से मुक्त किया जा सकता है?

याद कीजिए, जितनी वकालत ज्ञान आयोग अंग्रेजी के लिए कर रहा था, उसी रफ्तार से भारत के शीर्ष संस्थान आई.आई.टी. समेत दुनिया के नक्‍शे पर अपनी साख खोते जा रहे हैं। कारण-विदेषी भाषा में पढ़ाई, प्रशासन में हर रचनात्मकता को खत्म कर देती है। गांधी, टालस्टाय, न्यूगी से लेकर दुनिया भर के शिक्षाविद बार-बार यह कहते रहे हैं। लेकिन सिर्फ भारत में बहस को बस्ते के बहाने किसी और दिशा में मोड़ दिया है। भारतीय राजनीति का तो यह अपराध है ही।

हाल ही में दिल्ली के कुछ शिक्षकों और बच्चों से बातचीत में भी इस बात की पुष्टि हुई। जहां सरकारी स्कूल के बच्चों ने बस्ते के बोझ की शिकायत उतने मुखर शब्‍दों में नहीं की, जितनी महंगे निजी, अंग्रेजीदां स्कूल के बच्चों ने। जाहिर है निजी स्कूलों ने अपनी कमीज ज्यादा सफेद चमकाने और बताने की होड़ में सरकारी स्कूलों के मुकाबले बस्ते का बोझ बिना किसी तर्क के ज्यादा बढ़ाया है। सबसे अच्छा पक्ष लगा सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का, एक स्वर से यह कहना कि पाठ्यक्रम कतई ज्यादा नहीं है। पूरे वर्ष में हम मजे से इसे पूरा कर सकते हैं। बशर्ते कि हमारा साठ प्रतिशत समय दूसरे फालतू कामों जैसे- मतदाता सूची सोलह तरह के वजीफे के हिसाब-किताब, जनगणना, बच्चों के बैंक में खाते खुलवाने जैसे कामों में न लगाया जाए। बस्ते के बोझ में अंग्रेजी बोलना, पढ़ने पर अतिरिक्त जोर देना इन शिक्षकों सरकारी बच्चों को भी ज्यादा तनाव में ला रहा है।

निजी स्कूलों की होड़ा-होड़ी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी अच्छी अंग्रेजी बोलने के लिए ब्रिटेन की एक संस्था के साथ करार हुआ है। क्या कभी भारतीय भाषाओं, हिन्दी समेत के लिए भी सत्ता को कोई चिंता हुई। अफसोस कि बस्ते के बोझ में इन पहलुओं को हर सरकार नजर अंदाज कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सुब्रामण्‍यम समिति शिक्षा में अपनी भाषाओं के पक्ष को जरूर रेखांकित करेगी। वर्ष 2014 में ‘संघ लोक सेवा आयोग’ की सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त प्रवेश के विरोध में पूर्व केबिनेट सचिव ने खुलकर भारतीय भाषाओं की वकालत की थी।

‘बस्ते के बोझ’ को लेकर दिल्ली की नयी सरकार भी संवेदनशील लगती है। सरकारी स्कूलों को बढ़ाना, उनमें सुविधाओं को दुरस्त करना तथा शिक्षकों के पढ़ाने के अलावा दिए जाने काम को कम करने से निश्चित रूप से बेहत्तर माहौल बनेगा। अभिरुचि, क्षमता के हिसाब से कई किस्म के व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे- होटल, खेल, नाटक, फ़िल्म, बढ़ईगिरी, भवन निर्माण, इलेक्‍ट्रीशियन, साहित्य की शुरुआत भी बस्ते के बोझ को अतंतः कम ही करेगी। प्रोजेक्ट, ट्यूशन आदि के बहाने निजी स्कूलों की उन अतिरिक्त, अवैज्ञानिक किताबों पर जरूर लगाम लगाने की जरूरत है। हां, पाठ्यक्रम को कम करने में भी समीक्षा में जरूर धैर्य से काम लेना होगा। सभी कक्षाओं में विषय की निरंतरता, समझ के सोपान और राष्‍ट्रीय-अन्तराष्‍ट्रीय स्तरों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। यह बहुत जल्दबाजी में नहीं हो सकता। पूरी पढ़ाई में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पढ़ने के आनंद को बच्चों में जगाये रखना होना चाहिए। परीक्षा पद्धतियों में सी.बी.एस.ई. और एन.सी.ई.आर.टी. ने मिलकर कुछ अच्छे कदम उठाए हैं।

एक विकल्प हर स्कूल में ऐसे पुस्कालयों को बढ़ाना भी है जहां विविध विषयों की किताबें, सी.डी. उपलब्ध हों और बच्चे मनमर्जी वहां बैठ सकें। सारा ज्ञान बच्चे के बस्ते में ही भारतीय समाज क्यों ठूंसना चाहता है? जबकि मुहावरा सब को पता है कि मूर्खों का ही बस्ता सबसे ज्यादा भारी होता है।

क्या इसका उल्टा भी उतना ही सच नहीं है?