Archive for: December 2015

हिंसक होते बच्चे : अनुराग

child-crime

फर्रुखाबाद के एक गांव में प्राइमरी स्कूल की तीसरी और पहली क्लास के बच्चों में किसी बात को लेकर मारपीट हो गई। तीसरी के छात्र ने पहली के छात्र को प्लास्टिक की बोरी में बंदकर लात-घूंसों से जमकर पीटा। इससे उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। दिल्ली के जामिया नगर में रहने वाली 15 वर्षीय किशोरी घर से 38 लाख रुपये चोरी कर देहरादून घूमने-फिरने के लिए तीन सहेलियों के साथ रफूचक्कर हो गई। दिल्ली के ही एक स्कूल छात्रों के बीच झगड़ा होने पर छठी कक्षा के एक छात्र के साथ उसके छह सहपाठियों ने कुकर्म किया।

पहले इस तरह की घटनाएं कभी-कभी सुनाई देती थीं, लेकिन अब आए दिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। बच्चों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय है। आने वाला समय इन्हीं बच्चों का होगा, तो हम भला कैसे समाज का निर्माण कर रहे है। बच्चों में बढ़ रही इस हिंसक प्रवृत्ति को क्या केवल कठोर सजा देकर रोका जा सकेगा? बिल्कुल नहीं।

बच्चा सबसे अधिक अपने चारों ओर चल रही गतिविधियों और जो बार-बार देख व सुन रहा है, उनसे सीखता है। बच्चे के सबसे नजदीक है, परिवार। जिन परिवारों में पति-पत्नी में आए दिन बात-बात पर तू-तू मैं-मैं होती है या उनमें से किसी में भी चारित्रिक दुर्बलताएं हैं, उनके बच्चों में दुष्प्रवृत्तियां पनपने की आशंकाएं बहुत अधिक रहती हैं। बच्चे के पहले आदर्श उसके मां-बाप होते हैं और वह सबसे अधिक उन्हीं के निकट रहता है। फिर उनका प्रभाव बच्चे पर न पड़े, यह कैसे हो सकता है।

टेलीविजन घर के सदस्य की तरह हो गया है, जिससे बच्चों का सीधा संपर्क रहता है। टेलीविजन पर जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश में पारिवारिकता, सामाजिकता, राजनीतिक विमर्श, मानवीय सरोकार जैसे गुणों का अभाव है। इनकी जगह पारिवारिक षड्यंत्र, अनैतिक संबंध, विवाहेतर संबंध, हिंसा का बोलबाला है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बच्चों के नाम पर प्रसारित होने वाले अधि‍कांश कार्यक्रम भी स्तरीय नहीं हैं। इन कार्यक्रमों में बाल प्रवृत्तियों को विकृत रूप में पेश किया जा रहा है। दिन-रात टेलीविजन देख रहे बच्चों के मनमस्तिष्क पर नि‍श्‍चि‍तरूप से इनका कोई प्रभाव पड़ेगा।

फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्‍या करोड़ों में है, जिनमें बच्चों की भी अच्छी-खासी संख्‍या है। आजकल की फिल्मों में सेक्स और हिंसा का मसाला बहुत अधिक पड़ता है। द्विअर्थी संवाद तो फिल्म के लिए जरूरी जैसे हो गए हैं। कलात्मकता का स्थान हिंसा और नग्नता ने ले लिया है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कुछ तथाकथित कला समीक्षक इस हिंसा और नग्नता का सिनेमा के विकास और प्रगति‍शीलता के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ साल पहले तक शहरों में मुख्‍यधारा की फिल्मों के अलावा सी-ग्रेड फिल्में लगती थीं, जिन्हें लोग चोरी-छिपे देखने जाते थे। उन फिल्मों में बीच-बीच में मिनट-दो मिनट के सेक्स के दृश्य होते थे और इनमें मुख्‍यधारा के कलाकार काम नहीं करते थे। अब उन सी-ग्रेड फि‍ल्‍मों से ज्‍यादा फूहड़ता, अश्‍लीलता और हिंसा तो धारावाहि‍कों में दि‍खाई जा रही है, फि‍ल्‍मों की क्‍या बात करें। आज की फिल्मों के सफल नायक का डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, पत्रकार या वैज्ञानिक न बन पाने का अफसोस नहीं होता, उसकी इच्छा पोर्न फिल्मों में काम करने की होती है। पोर्न फिल्मों के कलाकारों पर चर्चा होती है।

पहले फिल्मों एक खलनायक और दूसरा नायक होता था, लेकिन अब नायक ही खलनायक है। वह वर्षों पहले फख्र से घोषणा कर चुका है- नायक नहीं खलनायक हूं मैं। वह हिंसक है, छिछोरा है, लंपट है, फूहड़ है, द्विअर्थी संवाद बोलता है, लेकिन फिर भी नायक है। वह हर हाल में अपनी मंजिल (नायिका) पाना चाहता है। वह इसके लिए नायिका को परेशान करता है तथा हर गलत-सही तरीके अपनाता है। और फिर ना-ना करके प्यार तुम्‍हीं से कर बैठे की तर्ज पर नायिका मान जाती है। अब तो आधुनिकता के नाम फिल्मों में नायिका की भूमिका भी सड़क-छाप मवाली जैसे गढ़ी जा रही है।

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विभिन्न उत्पादों के विज्ञापनों की हाल भी जुदा नहीं है। जूते-जुराब से लेकर कंघी तक और पेन से लेकर कार देकर हर विज्ञापन का मकसद है- लड़की या लड़के को रिझाना। क्या दुनिया में यही एक गम बचा है।

राजनीति‍ का हाल भी कोई अच्‍छा नहीं है। हर बार लोकसभा और वि‍धानसभाओं में बड़ी संख्‍या में दागी जनप्रति‍नि‍धि‍ चुनकर आते हैं। इनमें आथिर्क अपराध से लेकर खूनी तथा बलात्‍कार तक के आरोपी होती हैं। लोकसभा और वि‍धानसभाओं में हंगामे आए दि‍न देखने को मि‍लते हैं। नेताओं के बेहूदे बयान और एक-दूसरे के प्रति‍ हलके शब्‍दों को प्रयोग भी उनकी छवि‍ को दागदार ही बनाते हैं।

बच्चों में बड़ रही हिंसक प्रवृत्ति के लिए उन्हें दोष देने के बजाय हमें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे नायक हम उनके लिए गढेंगे, वैसा ही वह खुद को ढाल लेंगे।

इसे हमें स्कूल कहना पड़ता है : अरविंद गुप्ता

अरवि‍ंद गुप्‍ता

अरवि‍ंद गुप्‍ता

यह एक गज़ब के निराले स्कूल की कहानी है, जो सत्तर दशक की शुरुआत में कई साल तक मौज़ूद था। अमेरिका के सबसे चर्चित शिक्षाविद जॉन होल्ट ने अपनी एक किताब में इस स्कूल का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है। एमआईटी के एलन फल्बेल इस वर्णन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस स्कूल में एक साल बिताकर इसके ऊपर पीएच.डी. थीसिस लिख डाली। फिल्मकार पेगी हग्स यहां दो साल रहे और उन्होंने स्कूल पर ‘वी हैव टू कॉल इट अ स्कूल’ नाम से फिल्म बनाई।

फिल्म की शुरुआत में यहां का एक शिक्षक कहता है, ‘चूंकि बच्चों को स्कूल जाना ही पड़ता है और इसलिए हम अगर इसे स्कूल नहीं कहेंगे तो शायद वे यहां नहीं आएंगे।’ लेकिन सिवाय इस बात के कि स्कूल टाइम में बच्चे यहां रहते हैं, यह किसी भी कोण से स्कूल जैसा नहीं है। यहां कुछ भी ‘पढ़ाया’ नहीं जाता। यह एक ऐसी जगह है जहां कोई 85 बच्चे और कुछ बड़े अपने-अपने फितूर में मशगूल रहते हैं। बड़े लोग पारंपरिक अर्थों में शिक्षक नहीं है। न ही किसी के भी पास बी.एड. या इसी तरह की अन्य शिक्षण डिग्री है। लेकिन इस चौड़ी-चकली दुनिया में सालों तक काम करने के बाद उनके पास तरह-तरह के हुनरों का ऐसा खजाना है, जिन्हें बच्चे बेइंतहा पसंद करते हैं।

लिटिल न्यू स्कूल नाम का यह स्कूल डेनमार्क के कोपेनहेगन शहर में 1970 दशक के शुरूआती वर्षों में खुला था। डेनिश सरकार अभिभावकों द्वारा चलाये जाने वाले स्कूलों के 85 फ़ीसदी खर्चों को उठाने के लिए जानी जाती है। स्कूल चलाने वाले अभिभावकों को मात्र 15% खर्चा इकट्ठा करना पड़ता है। इस रियायत से यहां कई प्रयोगात्मक स्कूलों को फलने-फूलने का मौका मिलता है। इस स्कूल को शुरू करने वालों ने इससे पहले इसी तरह के कुछ अन्य स्कूलों में पढ़ाया था। इन स्कूलों में से कई बाद में बच्चों के ‘परिणामों’ को लेकर इतने संजीदा हो गए कि सामान्य स्कूलों की राह पर चल निकले। इस बदलाव से निराश चन्द लोगों ने बच्चों के लिए फिर से एक नई जगह बनाने का फैसला लिया।

यह स्कूल एक औद्योगिक इलाके में है और इसके पास कुल मिलाकर एक बड़ा हॉल व दो छोटे कमरे हैं। स्कूल में कोई पाठ्यपुस्तक या पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता। यहां न कोई घंटी बजती है, न पीरियड लगते हैं। न होमवर्क होता है न ही क्लास वर्क। जाहिर है यहां इम्तहान, टेस्ट, जांच या ग्रेड जैसे चीज़ें भी नहीं हैं। बेशक कई दिलचस्प किताबें यहां हैं और एक वर्कशॉप व जिम्नेजियम भी हैं, जहां बच्चे अपने हाथों से कई तरह की चीज़ें बना सकते हैं।

स्कूल के पास किसी भी तरह का विज्ञान सम्बन्धी कोई भारी-भरकम उपकरण नहीं है और न ही यह इस तरह की चीज़ें खरीदना चाहता है। तो यहां बच्चे दिन-भर करते क्या हैं? वे संगीत से शुरुआत करते हैं। कुछ शिक्षक पेशेवर संगीतकार हैं और वे संगीत के प्रति उनके प्रेम को बच्चों के साथ बांटते हैं। सुबह-सुबह करीब घंटे भर तक बच्चे संगीत की स्वर-लहरियों में डूबते-उतराते हैं। उनकी गतिविधियां अत्यंत सहज और लयदार होती हैं।

स्कूल में किताबों का छोटा सा किन्तु शानदार संग्रह है। वर्कशॉप में बढईगीरी के साधारण औज़ार तथा गर्म करने व धातुकर्म के कुछ उपकरण मौज़ूद हैं। इनके पास धातुओं को काटने और जोड़ने के लिए ऑक्सीएसीटिलीन सिलिंडर और एक टॉर्च भी है। साइंस और गणित की कई गुत्थियां यहां हैं, लेकिन गणित की प्रयोगशाला नहीं है। इसी तरह अमेरिका और ब्रिटेन के स्कूलों में ज़रूरी समझा जाने वाला नफील्ड जैसा जाना-माना गतिविधि आधारित साइंस प्रोग्राम भी ये नहीं चलाते। चित्रकारी के लिए अलग से कोई कमरा इनके पास नहीं है, लेकिन चित्रकारी में बच्चों की महारत के प्रमाण यहां-वहां देखे जा सकते हैं। यहां दो हथकरघे और एक सिलाई मशीन भी है। यहां एक मछलियों का तालाब है, जिसमें कोई बच्चा चाहे तो पूरा दिन सुनहरी मछलियों को निहारते हुए बिता सकता है। संगीत कक्षा में एक पियानो, कुछ गिटार और एक शिक्षक का बनाया हुआ बेस फिडल व कुछ ड्रम हैं।

स्कूल बहुत साधन संपन्न नहीं है। किसी भी परम्‍परागत स्कूल में पाए जाने वाले सामान की तुलना में यहां आपको कुछ कम भी चीज़ें दिखाई देंगी। लेकिन जो कुछ भी है, वह बच्चों के इस्तेमाल के लिए है। किताब या किसी सामान को हासिल करने के लिए उन्हें किसी कर्मकांड से होकर नहीं गुज़रना पड़ता है।

स्कूल में सामान की कमी का एकमात्र कारण यही है कि स्कूल की सामर्थ्य खरीद पाने की नहीं है। मगर बच्चे दूसरी संस्थाओं से ज़रूरी सामान उधार लेने के माममें में पूरी तरह समर्थ हैं।

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)​

गंभीर सवालों में शिक्षा : प्रेमपाल शर्मा

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कोटा और दूसरे शहरों में आत्महत्या की खबरों को हत्या कहना ज्यादा सही होगा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी खबर या घटना पर देश के पुरस्कृत लेखक, बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया न दी, न देंगे। इससे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्या हो सकता है, जब बच्चे कुछ आरोपित सपनों को पूरा न कर पाने की हताशा में मां-बाप, समाज, दोस्तों की टेढ़ी, व्यंग्य भरी नजरों से भयभीत अपनी ही जान दे देते हैं। बरसों से यह हो रहा है। मगर इस साल तो अति ही हो गई है। अभी तक अकेले कोटा शहर में दो दर्जन आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। मान कर चलिए कि इससे कई गुना ज्यादा होंगे। दूसरे शहरों में भी और जिन्हें लोकलाज से छिपाया भी जाता रहता है। आखिर दोष किसका है? बच्चों का तो कतई नहीं। वे तो कच्चे मिट्टी हैं जैसा ढालोगे, पकाओगे वैसा ही वे बनेंगे। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गई पर्चियां दिल दहलाने वाली हैं। ‘यदि मम्मी सेलेक्शन नहीं हुआ तो किसी से नजरें नहीं मिला पाऊंगी। मैं चाहती थी कि आप मुझ पर गर्व करें।’ एक और पर्ची की इबारत, ‘मां मैं बहुत प्रेशर में था। पापा के पैसे भी बर्बाद हुए। मैं मजबूर हूं।’ कोई और देश होता तो पूरा समाज तंत्र सड़कों पर उतर आता।

बीस बरस पहले लंदन के नजदीक एक बच्चे की स्कूल में लाश मिली थी तो हफ्तों अखबारों में यह मौत सुर्खियों में रही थी। यहां पसरी चुप्पी बताती है कि हम सब इन आत्महत्याओं के दोषी हैं। उन्हें उकसाते हैं। दुनिया के सामने हमारे सारे बड़बोले राजनेता इस बात पर तो इतराते हैं कि दुनिया की सबसे नौजवान आबादी भारत में है, लेकिन क्या इन नौजवानों के सपनों को कोई जगह व्यवस्था दे पा रही है? न पढ़ने के लिए पर्याप्त मेडिकल कॉलेज, न अच्छे इंजीनियरिंग या दूसरे शोध संस्थान। आइआइटी जैसे संस्थान कुछ ब्रांड बन गए हैं, लेकिन चौदह लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हजार। वह भी पिछले कुछ वर्षो में बढ़ी हैं। फिर शेष कहां जाएंगे? दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा। बचे हुए कॉलेजों में फीस तो पूरी मगर न शिक्षक, न कोई पढ़ने की सुविधा। क्यों राज्य दर राज्य सरकारें इतनी नाकारा बन चुकी हैं जो इन कालेजों को ठीक नहीं कर सकतीं, स्कूल तक नहीं चला सकतीं। क्यों कोटा की इन आत्महत्याओं में नब्बे प्रतिशत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों से ही हैं? दबाव या अपराध मां-बाप का।

जब इंजीनियरिंग की डिग्री में पूछ सिर्फ आइआइटी, एनआइटी की बची है तो बच्चे के कानों पर स्कूल के दिनों से ही गूंजने लगते हैं ये शब्द। सपनों, महत्वाकांक्षाओं, गर्वीले भविष्य से धकेले जाते ये बच्चे पहुंच तो गए कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में, लेकिन क्या उस माहौल में रातों-रात फिट हो जाना इतना आसान है? ये मानवीय आत्माएं हैं, निर्जीव रोबोट नहीं। हर कोशिश के बावजूद हजारों बच्चे हताश, निराश, एकाकीपन के कुएं की तरफ बढ़ते जाते हैं।

एक अनुमान के अनुसार मेडिकल, इंजीनियरों की कोचिंग ले रहे लगभग बीस प्रतिशत बच्चे पढ़ाई से हटकर इन व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं। दिन-रात वही गणित, भौतिक, रसायन के फॉर्मूले रटते-रटते मानसिक रोगी भी कई बच्चे हो चुके हैं।

यहां शिक्षाविद प्रोफेसर यशपाल की वर्ष 1992 की रिपोर्ट की बातें याद आती हैं। ‘जो बच्चे नहीं चुने जा पाते वे तो पूरी उम्र के लिए कुंठित होते ही हैं, चुने जाने वाले भी इस रटंत पद्वति के चलते बहुत अच्छा नहीं कर पाते। इसका हल पूरी शिक्षा व्यवस्था में ढूंढ़ना होगा और तुरंत। आइआइटी की परीक्षा में पिछले दस बरस में दसियों बार अनगिनत परिवर्तन किए गए हैं। कभी दो चरण कभी तीन, कभी आब्जेक्टिव पर जोर तो कभी 12वीं के नंबरों पर। शिक्षा व्यवस्था में जितने डॉक्टर उतनी तरह की दवाइयां, ऑपरेशन, सर्जरी। मंत्री या तो वे हैं जो हॉवर्ड और कैंब्रिज में पढ़े हैं या वे जो जाति, धर्म के आंकड़ों को ही बांच सकते हैं। आश्चर्य है कि ये दोनों ही पक्ष चुप्पी साधे हैं। नतीजा-न कोचिंग कम हुई, न दूर-दूर के गांवों, कस्बों से कोचिंग के मक्का-मदीना की तरफ बढ़ता पलायन। बढ़ती आत्महत्याओं से भी शिक्षा के नियंताओं के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, क्योंकि इससे वोटों की फसल पर कोई असर नहीं होगा।

गनीमत है कि इन्होंने इन आत्महत्याओं में जाति और धर्म की गिनती नहीं की। इससे भी बुरा पक्ष है देश के इन शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह। दुनिया भर से मिल रही रिपोर्ट बता रही है कि ये शीर्ष संस्थान लगातार पिछड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक पत्रकार का कहना था कि आखिर क्या कारण है कि इन शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, अन्वेषण और रचनात्मकता निरंतर ह्रास पर है। पिछले वर्ष आइआइटी रुड़की में पहले ही वर्ष में सत्तर छात्रों का फेल होना क्या बताता है? अंग्रेजी का कहर तो है ही, रटंत शिक्षा की सीमाएं भी साफ हैं। फिर भी इनमें पहुंचने की उतावली या हताशा में आत्महत्याएं?

प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में वे बुनियादी परिवर्तन लाने होंगे जो बच्चों को इतना मजबूत बनाएं कि जीवन में किसी एक-दो परीक्षाओं में पास-फेल होना कोई मायने नहीं रखता। डार्विन, आइंस्टीन से लेकर प्रेमचंद, मंटो की वे जीवनियां पढ़ाई जाएं जिनसे ये जान सकें कि स्कूल या प्रतियोगिता में कुछ नंबरों के कम-ज्यादा होने से खास फर्क नहीं पड़ता। और बच्चों से ज्यादा जरूरी है उनके मां-बाप, स्कूल के टीचरों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर क्यों इन लाड़लों की कुर्बानी देने पर तुले हुए हो। दुनिया भर के शिक्षाविद उस शिक्षा के हिमायती रहे हैं जहां बच्चा मस्ती से पढ़े स्कूल आए, न कि स्कूल और इन कोचिंग संस्थानों की कैद में हताश हो। यूरोप, अमेरिका आदि ने शिक्षा व्यवस्था की इस चूहा दौड़ से बचने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और इसका फायदा पूरे समाज को मिल रहा है। लेकिन हमारे यहां तो सामाजिक न्याय और विकास के नाम पर वे बातें जारी हैं जिन पर 15वीं सदी भी शरमा जाए।

साहित्य लोगों को सहिष्णु बनाता है: उदय प्रकाश

 

Uday Prakash

कार्यक्रम में विचार व्‍यक्‍त करते कथाकार उदय प्रकाश।

दिल्ली : साहित्य सिर्फ कहानी नहीं कहता है, वह  लोगों को सहिष्णु और संवेदनशील बनाता है। हो सकता है कि सहिष्णु बनाने की यह  प्रक्रिया बहुत ही छोटे स्तर पर हो, और हो सकता है कि यह सिर्फ वैयक्तिक स्तर पर हो। ये विचार चर्चित लेखक उदय प्रकाश ने व्यक्त किए। वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एल्युमनी एसोसिएशन का 21 नवंबर 2015 को तीसरा सालान व्याख्यान दे रहे थे। एल्युमनी एसोसिएशन ऑफ जेएनयू के इस आयोजन में उन्होंने साहित्य की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि साहित्य अपने समय की अर्थव्यवस्था को भी समझाता है, हालांकि उसके समझाने का तरीका अलग होता है। उपन्यास की अवधारणा पर जोर देते हुए उदय प्रकाश ने कहा कि यूरोप में भले ही उपन्यास की अवधारणा मध्यवर्ग से जुडी़ हुई हो, लेकिन एशियाई देशों में यह किसानी अर्थव्यवस्था को अभिव्यक्त करने वाली विधा है। उन्होंने अपने लेखन के संदर्भ से कहा कि साहित्य उन परिस्थितियों को पहचानता है, जिनमें व्यक्ति जीवनयापन करता है।

अपने व्याख्यान में उदय प्रकाश ने वर्तमान समय में लेखक की असुरक्षा के प्रसंग पर कहा की आज हमारी भाषा में लेखक का हिस्सा कम हो गया है। यह चिन्ताजनक स्थिति है और इसी के कारण समाज में लेखक के हालात पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता है। असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मैंने सबसे पहले पुरस्कार लौटाया था इसलिए मुझे सबसे ज़्यादा यह पूछा जाता है कि आपातकाल के दौरान मैंने क्या किया? उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौर में मैं 20-22 साल का था, अवार्ड तो था ही नहीं, लेकिन आपातकाल के विरोध के कारण उन्हें सागर विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा था। अपने जेएनय़ू के दिनों को याद करते हुए उन्होंने यहाँ के अंतरानुशासनात्मक अध्ययन की प्रशंसा की और कहा कि उस समय जेएनयू में औपचारिकताएँ नहीं होती थीं।

कार्यक्रम के प्रारंभ में एसोसिएशन के अध्यक्ष देवेन्द्र चौबे ने कहा की उदय प्रकाश कहानी कहने की शैली में तो अनूठे हैं ही, साथ ही, उनके कथा संसार की संवेदना इतनी व्यापक है कि समाज का कोई तबका उससे नहीं छुटता है। उन्होंने एसोसिएशन की गतिविधियों की जानकारी देते हुए कहा कि जेएनयू सिर्फ डिग्री नहीं देता है, बल्कि समाज से जुड़े हुए लेखक और बौद्धिक भी देता है, उदय प्रकाश ऐसे ही लेखक और बुद्धिजीवी हैं। एसोसिएशन के उपाध्याक्ष्य राजेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उदय प्रकाश के साहित्य की प्रासंगिता पर जोर देते हुए कहा कि आज के समय में उदय प्रकाश जैसे लेखकों का दायित्व और महत्व बढ़ जाता है। व्याख्यान के बाद हुई परिचर्चा में मणीन्द्र नाथ ठाकुर, दुर्गाप्रसाद गुप्त, अखलाक आहन, जैनेन्द्र कुमार, प्रणव कुमार, मीता नारायण, उदय शंकर, अनीसुर रहमान सहित कई लोगों ने भाग लिया।

प्रस्‍तुति- गणपत तेली