Archive for: August 2015

सरकारी स्कू ल और सरकार : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अद्भुत फैसला सुनाया है कि तमाम राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाने होंगे। यदि यह आदेश कार्यान्वित हो गया तो देश की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं पूरी व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। ‘जाके पांव न फटी विवाई वो क्या जाने पीर पराई’ कोर्ट ने इसी मुहावरे को साकार करते हुए यह निर्णय दिया है। वरना स्कूलों में नकल हो तो सरकार की बला से। बच्चों के सिर पर छत न हो तो कोई असर नहीं। लड़कियों के लिए शौचालय न हो तो इनके चेहरे पर शिकन नहीं, क्योंकि उनके बच्चे तो अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और वहां से फुर्र से उड़ जाएंगे इंग्लैंड, अमेरिका। नेता और अफसर दोनों मौसेरे भाई हैं, कोर्ट की नजरों में। अच्छा हुआ कोर्ट ने दोनों को एक साथ पकड़ा है।

यहां पहले एक अनुभव। सरकार और सरकारी स्कूलों के खिलाफ गुस्से का ऐसा तीखा अनुभव मेरी कल्पना से बाहर था। दिल्ली में पटरी पर सब्जी बेचने वाले को मैंने सुझाव दिया कि वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल कराए। उसका आक्रोशित प्रति प्रश्न था, ‘आपके बच्चे कहां पढ़ते हैं? आप तो सरकारी कर्मचारी हैं फिर सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते। क्या हम नहीं पढ़ा सकते अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में?’ खिसियाने के सिवाय मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। यह है सरकारी व्यवस्था का आलम। यानी जहां जितनी ज्यादा सरकार उतना ही निकम्मापन, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, मुकदमे, जातिवाद, अहंकार। सरकारी कर्मचारियों ने कभी अपनी खोल से बाहर झांकने की कोशिश ही नहीं की। क्यों करें जब सारी सुविधाओं के साथ, नौकरी की सुरक्षा है। तकनीक ने सारी सुविधा दी हैं। तुरंत टाइपिंग, फोटोकॉपी, ई-मेल लेकिन फाइलों की स्पीड और धीमी होती गई। सौ साल में पढ़ने-पढ़ाने के रंग-ढंग सुधरने के बजाय और बिगड़ गए हैं।

अच्छा हो यदि कोर्ट का यह आदेश दूसरे सरकारी कर्मचारियों के संदर्भ में सरकारी अस्पतालों पर भी लागू हो। क्या डॉक्टरों का काम सिर्फ मरीजों को निजी अस्पतालों की तरफ भेजने के लिए ही बचा है। हमारे कई दोस्तों का तर्क है कि सरकारी दक्षता में कोई कमी नहीं है। क्या वाकई? यदि ऐसा है तो फिर क्यों नहीं ये सब इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को मानते? फिर तो इस आदेश से इन सब की बांछें खिल जानी चाहिए। मुंह क्यों लटका रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ाना उन्हें सजा दिखाई दे रही है। आखिर इस दुर्गति तक तुम्हीं ने तो पहुंचाया है।

हर शाख की यही दास्तान है। कभी रेलवे के अपने चार सौ से ज्यादा स्कूल थे। एक से एक अच्छे। आज मुश्किल से सौ स्कूल बचे हैं और वे भी अंतिम सांस गिन रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री मुगलसराय के रेलवे स्कूल में पढ़े थे तो सैकड़ों रक्षा रेलवे के अफसर भी। मसूरी का मशहूर स्कूल ओकग्रोव 1888 में अंग्रेजी सरकार ने रेलवे के अफसरों के लिए बनाया था। आज शायद ही कोई रेल का अफसर वहां पढ़ाता हो अपने बच्चों को। काश! कोर्ट यह आदेश भी दे कि केंद्र सरकार समेत रेलवे के कर्मचारी भी अपने बच्चों को रेलवे के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे तो ये भी रातों रात ठीक हो जाएंगे। आखिर ये शिक्षक और स्कूल भी तो उसी देश के हैं जिसके दिल्ली, मेट्रो, कोंकण रेलवे और बैंक के कर्मचारी। ये भी तो ठीक काम कर रहे हैं। व्यवस्था तभी सुधरेगी जब इसका क्रीमीलेयर सुधरेगा। इसमें सरकारी कर्मचारी और राजनेताओं की अच्छी तादाद है। दुनिया भर में राजा के रसोईयों को अपना बनाया हुआ खाना खुद खाना पड़ता है। हमारे यहां सरकारी कर्मचारी सिर्फ दूसरों के लिए ही बनाते हैं और फिर उतनी ही बेशर्मी से कह देते हैं कि ये शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। क्या कभी आम लोगों की समस्याओं को जानने-समझने की कोशिश उन्होंने की? वे हारकर महंगे स्कूल की तरफ उसी निराशा, गुस्से में जाते हैं जैसे दिल्ली का सब्जी वाला। क्या कभी किसी राजनीतिक पार्टी, ब्राव0161ाण सभा, दलित उद्धारक मंच, आयोग ने यह पूछा कि हमारी सरकार इतनी सुस्त गैर-जिम्मेदार क्यों? क्यों भूलते हो कि सरकार बचेगी तो देश बचेगा और उसी में हम सब। वरना सभी डूबने के कगार पर हैं। दुष्यंत कुमार की गजल की लाइन याद आ रही है- मौत की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं। आरक्षण, संसद, न्यायपालिका के प्रसंग में संविधान की दुहाई देने वालों से भी प्रश्न है कि क्या ऐसी असमान शिक्षा से संविधान की आत्मा का हनन नहीं होता? समान शिक्षा और अपनी भाषा के लिए हम सड़कों पर क्यों नहीं उतरते?

लगभग तीन वर्ष पहले तमिलनाडु के एक नौजवान कलक्टर ने लीक से हटकर एक आदर्श प्रस्तुत किया था। अपनी चार वर्षीय बेटी के दाखिले के लिए वह आम जनता की तरह सरकारी स्कूल की लाइन में लगे थे। किसी ने पहचान लिया और जैसा कि स्वाभाविक था अफरा-तफरी मच गई। कलक्टर साहब का जवाब था- ‘मैं ऐसे ही सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं। मेरे बच्चे भी आम नागरिक की तरह वहीं पढ़ेंगे।’ बताते हैं कि इस घटना के बाद न केवल उस स्कूल, बल्कि तमिलनाडु के अन्य स्कूलों में आश्चर्यजनक सुधार हुए हैं। क्या हंिदूी पट्टी और दूसरे राज्यों में भी बिना कोर्ट के आदेश के कोई ऐसा उदाहरण बनेगा?
निजीकरण की आंधी का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा है। बीस बरस पहले 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में थे। आज केवल 50 प्रतिशत रह गए हैं। इसलिए सरकारी अफसर, नेता और निजी स्कूलों का प्रबंधन हाई कोर्ट के आदेश को हर हाल में चुनौती देंगे। समान शिक्षा के सभी पैरोकारों को राष्ट्रीय स्तर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के पक्ष में तुरंत गोलबंद और सक्रिय होने की जरूरत है।

समान शिक्षा की ओर : अनुराग

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हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा लिए एक फैसले के मुताबिक अब उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों, विधायकों और सांसदों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चीफ सेकट्ररी को निर्देश दिया कि इस फैसले को लागू करने के लिए जो भी आधारभूत जरूरतें हैं, उन्हें जल्द से जल्द पूरा किया जाए। स्कूल अच्छी स्थिति में संचालित होने चाहिए और यह फैसला अगले शैक्षणिक सत्र से अमल में आ जाना चाहिए। प्राथमिक स्कूलों की दयनीय हालत देखते हुए दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया। कोर्ट ने चीफ सेकट्ररी से इस बारे में की गई कार्रवाई के संबंध में छह माह में रिपोर्ट भी मांगी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश यदि किसी कानूनी दांवपेच में नहीं फंसा और इस पर अमल हुआ तो यह समान शिक्षा की दिशा में क्रांतिकारी कदम होगा। इसके बहुत ही सार्थक और दूरगामी परिणाम निकलेंगे।

भले ही हम लोकतंत्र की बात करते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि राजनेता, नौकरशाह और पूंजीपति खुद को आम आदमी से ऊपर की कोई विशिष्ट चीज समझते हैं। जब वे विशिष्ट हैं, तो उनके बच्चे कैसे आम आदमी के बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं। ऐसे में उनके बच्चों के लिए चाहिए विशिष्ट स्कूल। शायद इसी मानसिकता के कारण निजी स्कूलों को जन्म हुआ और इनका विस्तार लगातार हो रहा है। जब असमान शिक्षा लेकर बच्चे आगे बढ़ता है, तो उनमें समानता का भाव कैसे आ सकता है। वह भी भविष्य में जो भी बनता है, अपने को विशेष और आम आदमी को तुच्छा प्राणी समझता है। यह मानसिकता लोकतंत्र की आत्मा को मारने वाली है।

आज देश में कई स्तरीय असमान शिक्षा दी जा रही है। धीरे-धीरे शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है। शिक्षा को लेकर देश की शासक वर्ग की सोच का इससे पता चलता है कि पहली बार केंद्र सरकार ने शिक्षा का बजट ही घटा दिया। देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं, जहां शिक्षकों की बात छोड़िए, मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। हाई कोर्ट के आदेश से शासक वर्ग पर दबाव बनेगा कि वह सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सुधारे और उनकी जरूरतों को पूरा करे। इससे साधनविहीन, निचले पायदान के बच्चों को भी श्रेष्ठ शिक्षा मिल सकेगी।

यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ने नहीं आ रहे हैं, जबकि कोर्ट ने पाया कि खराब स्थिति होने के बावजूद इन स्कूलों में 90 फीसद बच्चे जाते हैं। यह इस बात का संकेत है कि शिक्षा का निजीकरण कर देश के बड़े वर्ग को अशिक्षित बनाए रखने की साजिश हो रही है, ताकि ‘उनकी’ विशिष्टता में आंच न आए। यह बात बिल्कुल सही है कि क्योंकि अधिकारियों, राजनेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, इसलिए उन्हें इन स्कूलों की कोई विशेष चिंता भी नहीं रहती। यदि उनके बच्चे इन स्कूलों में पढ़ेंगे, तो वे मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराएंगे और शिक्षा का स्तर सुधारने का भी हर संभव प्रयास करेंगे। निजी स्कूलों की शिक्षा बहुत महंगी है और शासक वर्ग सरकारी स्कूल खोल नहीं रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि बच्चे के जन्म लेते ही माता-पिता पर उसकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर एक तनाव हावी हो जाता है, जिससे वह बच्चे की पढ़ाई पूरी होने तक छुटकारा नहीं पा पाते। बच्चे को अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए वह कमाई के लिए गलत रास्ते अख्तियार करते हैं या अपनी जरूरतों को भी त्याग देते हैं। और जो यह नहीं कर पाते, वे इस कुंठा में जीते हैं कि अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाए।

लोकतांत्रिक मूल्यों को मानने वाले देश के लिए क्या यह आदर्श स्थिति है कि उसका नागरिक बच्चों की पढ़ाई के लिए इतना आक्रांत रहे कि तनावमुक्त जीवन भी न जी पाए। लचर सरकारी शिक्षा व्यवस्था केवल उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं है। कमोबेश पूरे देश का यही हाल है। हाई कोर्ट ने अच्छा अवसर दिया है। इसको ध्यान में रखकर देश अच्छी और समान शिक्षा की ओर ठोस कदम बढ़ाए।

बच्चों के बीच : अनुराग

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पि‍छले दि‍नों बच्‍चों से मि‍लने का सुअवसर मि‍ला। हुआ यह कि‍ ट्रि‍ब्‍यून मॉडल स्‍कूल, चंडीगढ़ में हि‍न्‍दी सप्‍ताह (3 से 8 अगस्‍त) के अर्न्‍तगत 4-5 अगस्‍त को दो दि‍वसीय पुस्‍तक मेले का आयोजन कि‍या गया। पुस्‍तक मेले की आयोजि‍त करने की जि‍म्‍मेदारी लेखक मंच प्रकाशन को सौंपी गई। मैंने लेखक मंच से प्रकाशि‍त पुस्‍तकों के अलावा नेशनल बुक ट्रस्‍ट, एकलव्‍य और प्रथम से कुछ कि‍ताबें ले लीं। कुछ कि‍ताबें ट्रांसपोर्ट से चंडीगढ़ भि‍जवा दी थीं। ये कि‍ताबें स्‍कूल को आयोजन से तीन-चार दि‍न पहले ही मि‍ल गई थीं। मंगलवार और बुधवार को पुस्‍तक मेला था। यह सभी आयोजन स्‍कूल में हिंदी की वि‍भागाध्‍यक्ष रजनी जी की देखरेख में हो रहा था। मैंने उनसे कहा कि‍ वह चाहें तो सोमवार को भी बच्‍चों को कि‍ताबें उपलब्‍ध करा सकती हैं। ऐसे में बच्‍चों को कि‍ताबें देखने-खरीदने के लि‍ए तीन दि‍न मि‍ल जाएंगे। यह वि‍चार उन्‍हें पसंद आया और सोमवार को ही कि‍ताबें प्रदर्शित कर दी गईं। इस तरह से पुस्‍तक मेला दो दि‍वसीय की बजाय तीन दि‍वसीय हो गया।  lekhakmanch.book fair 1

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मंगलवार सुबह करीब सवा नौ बजे मैं अपने मि‍त्र केवल ति‍वारी जी के साथ उनके घर से स्‍कूल पहुंच गया। स्‍कूल की शानदार इमारात, खुली जगह और खूब हरि‍याली देखकर मन प्रसन्‍न हो गया। मैं सोचने लगा कि‍ सरदार दयालसिंह मजीठि‍या की दूरदर्शिता की दाद देनी होगी कि‍ करीब 135 साल पहले समाज को शि‍क्षि‍त करने के लि‍ए उन्‍होंने जगह-जगह स्‍कूल-कॉलेज खोले और इनके संचालन की जि‍म्‍मेदारी lekhakmanch.book fair 3lekhakmanch.book fair 4lekhakmanch.book fair 5कि‍सी प्रबंधन समि‍ति‍ या अपने परि‍वार के सदस्‍यों को सौंपने की बजाय ट्रस्‍ट बनाए।

प्राधानाचार्या श्रीमती वंदना सक्‍सेना जी से संक्षि‍प्‍त मुलाकात हुई। काफी वि‍न्रम और जुनूनी लगीं।

पुस्‍तक मेला पुस्‍तकालय में आयोजि‍त कि‍या गया था। वहां पुस्‍तकालय अध्‍यक्ष के अलावा और भी एक-दो अध्‍यापि‍काएं मौजूद थीं। सोमवार को हुई कि‍ताबों की बि‍क्री का हि‍साब-कि‍ताब बडे़ ही सलीके से बनाया हुआ था।

स्‍कूल में आठवी, सातवीं और छठी के बीच हिंदी भाषण प्रति‍योगि‍ता का आयोजन कि‍या गया था। इस प्रति‍योगि‍ता के तीन नि‍र्णायकों में से एक की जि‍म्‍मेदारी मुझे भी सौंप दी गई। मंच का संचालन दो बच्‍चों ने बि‍ल्‍कुल प्रोफशनल्‍स अंदाज में कि‍या। प्रति‍योगि‍ता में बच्‍चों ने आत्‍मवि‍श्‍वास के साथ अपनी बात बडे़ ही तार्किक ढंग से रखी। यह सब देखकर अच्‍छा लगा। स्‍कूलों में पाठ्यपुस्‍तकों की पढ़ाई के अलावा इस तरह की गति‍वि‍धयां बेहद जरूरी हैं।

प्रति‍योगि‍ता में अनीश, मुस्‍कान राणा व शि‍वांश को प्रथम, आँचल, गुलि‍स्‍तान व महक को द्वि‍तीय और इशान व प्रेरणा को सांत्‍वना पुरस्‍कार मि‍ला।

ऐसे आत्‍मवि‍श्‍वासी बच्‍चों से भला मैं क्‍या कहता। मैंने सि‍र्फ इतना कहा कि‍ वे अपने आत्‍मवि‍श्‍वास को कायम रखें। जीवन का जो भी लक्ष्‍य नि‍र्धारि‍त कि‍या है, उसकी तैयारी अभी से शुरू कर दें। आपके लक्ष्‍य और माता-पि‍ता की आपको लेकर इच्‍छाएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में अपने माता-पि‍ता के साथ बैठ अपनी रुचि‍ और क्षमताएं बताएंगे, तो अवश्‍य ही इसका समाधान नि‍कल जाएगा।

इसके बाद दो बजे तक बच्‍चों का लायब्रेरी में कि‍ताबों को लेकर आना-जाना लगा रहा। अगले दि‍न भी यही स्‍थि‍ति‍ रही।

यह देखकर बेहद अच्‍छा लगा कि‍ छोटी कक्षाओं के बच्‍चे कि‍ताबों में अधि‍क रुचि‍ ले रहे हैं। बड़ी कक्षाओं के बच्‍चों ने कोई खास रुचि‍ नहीं दि‍खाई। इसके दो-तीन कारण मेरी समझ में आ रहे हैं। पहला- कॅरि‍यर का दबाव। उन्‍हें लगता होगा कि‍ अब हमें पाठ्यक्रम की या प्रति‍योगि‍ताओं से जुड़ी कि‍ताबें ही पढ़नी चाहि‍ए। दूसरा- जब बचपन से ही पुस्‍तक संस्‍कृति‍ से दूर रहे, तो अचानक पुस्‍तकों से प्रेम कैसे जाग सकता है। तीसरा- उनकी प्राथमि‍कताएं। बचपन से हुए पालन-पोषण के कारण उनकी प्राथमि‍कता कि‍ताब की बजाय बर्गर, पि‍ज्‍जा, चाकलेट, कोल्‍ड ड्रिंक आदि‍ हो।

इस दौरान कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जि‍नका उल्‍लेख करना जरूरी लगता है।

एक बच्‍ची दस रुपये वाली कि‍ताब खरीद ढूंढ़ रही थी। मैंने पूछा कि‍ फि‍ल्‍म देखने जाती हो? उसने ‘हां’ में सि‍र हि‍ला दि‍या। मैंने फि‍र पूछा कि‍ टि‍कट कि‍तने कहा है? सौ रुपये का? उसने कहा कि‍ नहीं, दो सौ रुपये का। मैंने मुस्‍कराते हुए कहा कि‍ फि‍ल्‍म दि‍खाने के लि‍ए पापा से जि‍द कर सकती हो। कि‍ताबें दि‍लाने की जि‍द नहीं कर सकती! वह भी मुस्‍करा दी और कि‍ताब देखने लगी।

बुधवार यानी 5 अगस्‍त को सातवीं के एक छात्र ने कथाकार शेखर जोशी का कहानी संग्रह और एक अन्‍य कि‍ताब पसंद की। उसके पास पैसे नहीं थे। उसका आग्रह था कि‍ उसे ये कि‍ताबें दे दी जाएं और वह पैसे कल दे देगा। मैडम से इस बारे में पूछा, तो उन्‍होंने मना कर दि‍या। उनका कहना था कि‍ महंगी कि‍ताबें हैं। कल इसके पैरेंटस आब्‍जेक्‍शन उठा सकते हैं। बात तर्क संगत थी। बच्‍चे को समझाया कि‍ कल हम लोग चले जाएंगे, इसलि‍ए आपको कि‍ताब देना मुश्‍कि‍ल है। वह चला गया। करीब बीस-पच्‍चीस मि‍नट बाद वह फि‍र से आया। इस बारे उसके पास सौ रुपये थे। उसने कहा कि‍ शेखर जोशी का कहानी संग्रह तो दे ही दो। हमें थोड़ा आश्‍चर्य भी हुआ कि‍ यह बच्‍चा शेखर जोशी का कहानी संग्रह ले जा रहा है। उससे पूछा, तो उसने कहा कि‍ वह शेखर जोशी की कहानि‍यां पढ़ना चाहता है। इसलि‍ए उनकी कि‍ताब खरीद रहा है।

वि‍ज्ञान की अध्‍यापि‍का नि‍धि‍ जी मंगलवार को ही कुछ कि‍ताब छांटकर अलग रख गई थीं। साथ ही हि‍दायत दे गई थीं कि‍ ये कि‍ताबें कि‍सी और को न दी जाएं। इन्‍हें वह ले लेंगी। अगले दि‍न यानी बुधवार को उन्‍होंने कुछ और कि‍ताबें लीं। उन्‍होंने बताया कि‍ उनके नाती-पोते गर्मियों की छुट्टि‍यों में उनके पास आते हैं। ये कि‍ताबें उन्‍हीं के लि‍ए ली हैं। उन्‍होंने एक कि‍ताब खरीदी जि‍से छोटे बच्‍चे पढ़ नहीं सकते थे। केवल जी ने कहा कि‍ यह कि‍ताब तो बच्‍चे अभी पढ़ नहीं पाएंगे। वह हंस कर बोली कि‍ उनकी मम्‍मी तो पढ़ेगी।

आशा मैडम पंद्रह-बीस बच्‍चों को लेकर आईं। उन्‍होंने बच्‍चों से अपनी पसंद की कि‍ताब छांटने के लि‍ए कहा और साथ ही हि‍दायत दे दी कि‍ कोई कि‍ताब बीस रुपये से अधि‍क कीमत की न हो। बच्‍चों ने कि‍ताबें पसंद कीं। आशा जी ने बच्‍चों और कि‍ताबों का नाम नोट कर उन्‍हें कक्षा में भेज दि‍या। एक-दो बच्‍चों ने महंगी कि‍ताबें पसंद की थीं, उन्‍हें आशा जी ने सूची से हटा दि‍या। उन्‍होंने कि‍ताबों का भुगतान कर दि‍या।

बाद में केवल जी ने बताया कि‍ इन बच्‍चों के पास पैसे नहीं थे, लेकि‍न कि‍ताब लेना चाहते थे। मैडम ने अपने रि‍स्‍क पर बच्‍चों को कि‍ताबें दि‍लवा दीं कि‍ कल घर से पैसे लेकर आएंगे। हो तो यह भी यह सकता है कि‍ कि‍सी बच्‍चे के माता-पि‍ता पैसे न दें।

बच्‍चों के साथ हुई इस मुलाकात से यह नि‍ष्‍कर्ष आसानी से नि‍काला जा सकता है कि‍ बच्‍चों में पाठ्यक्रम से इतर वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों की कि‍ताबें पढ़ने की चाह है। हमें बच्‍चों के बीच कि‍ताबों को लेकर जाना होगा, ताकि‍ उनकी यह रुचि‍ बनी रहे। अन्‍यथा यह होगा कि‍ अच्‍छी और मनपसंद कि‍ताबें नहीं मि‍लने से वे इस ओर से वि‍मुख हो जाएंगे और उनकी प्राथमि‍कता बदल जाएगी, जो कि‍ आजकल हो भी रहा है।

उच्च शिक्षा की भाषा : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharmaभला हो इस देश के अखबारों का जिन्होंने यह खबर मुख्य पृष्ठ पर छापी कि देश के एक प्रमुख शिक्षण संस्थान आइआइटी, रुड़की में पहले वर्ष में 72 छात्र फेल हो गए हैं। कोर्ट-कचहरी में मुकदमेबाजी के बाद संस्थान ने एक और मौका देने का तो फैसला कर लिया है, लेकिन कुछ प्रश्नों का जवाब पूरी शिक्षा व्यवस्था और राजनीति नहीं दे पा रही। अखबारों से छनकर जो तथ्य आ रहे हैं, उनसे साफ जाहिर है कि पढ़ाई का अंग्रेजी माहौल इनकी असफलता का सबसे प्रमुख कारण है। इस खबर पर विशेषकर अंग्रेजी मीडिया क्यों चुप रहा? फिर जब संसद चल रही हो तो वहां इस पर बहस क्यों नहीं उठी? कहां गए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी भाषा राज्यों की आवाजें? हिंदी को सबसे ज्यादा धोखा दे रहे हैं, तो हिंदी प्रांत। रुड़की आज भले ही उत्तराखंड में हो, कल तक उत्तर प्रदेश में ही था। क्या इस घटना पर इन राज्यों की विधानसभाओं में बात उठेगी? भाषा के मुद्दे पर तो कतई नहीं उठेगी। बहिष्कार होगा तो फेल हुए छात्रों की जाति के मुद्दे पर जो पूरे विमर्श को ही न केवल पटरी से उतार देगा, बल्कि उसे विरूपित भी कर देगा। दिल्ली के एम्स के मामले में भी यही हुआ था। पांच बरस पहले डॉक्टरी पढ़ रहे अनिल मीणा ने आत्महत्या के साथ यह पत्र छोड़ा था कि मुझे अंग्रेजी न आने की वजह से कुछ भी समझ में नहीं आता। यहां का पूरा माहौल अंग्रेजीदॉ है। मैं आखिर क्या करूं? भारतीय राजनीति ने शिक्षा के इतने संवेदनशील मुद्दे को भी जाति की भेंट चढ़ा दिया।

शायद ही दुनिया के किसी देश में ऐसी मेधावी पीढ़ी ऐसे मसलों पर मजबूर होकर आत्महत्या की तरफ बढ़ती हो। तीन साल पहले लखनऊ की एक छात्र ने भी अंग्रेजी न जानने के कारण ऐसा ही कदम उठाया था। फेल हुए ये अधिकांश छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। बारहवीं तक विज्ञान, गणित, सभी उस कुछ हिंदी माध्यम में पढ़ा, जो उनके लिए संभव थी। मेहनत और प्रतिभा के बूते आइआइटी में चुने गए। वे सब एक स्वर से कह रहे हैं कि आइआइटी में हमारी सबसे बड़ी समस्या सिर्फ अंग्रेजी है। प्रोफेसर अंग्रेजी में पढ़ाते हैं, किताबें अमेरिकी लेखकों की। हमारे आसपास के ज्यादातर बच्चे सिर्फ अंग्रेजी में प्रश्न करते और बोलते हैं। ऐसे माहौल में हम प्रश्न पूछने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते। धीरे-धीरे क्लास में आने का भी मन नहीं करता। नतीजा यह हुआ कि पिछड़ते चले गए। रुड़की का संस्थान बाकी देश के अन्य संस्थाओं की तरह कितने भी तर्क दे कि इनकी मदद से लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं, सीनियर छात्रों में से कुछ मेंटर के रूप में मदद करते हैं या कि अंग्रेजी सिखाने के विशेष इंतजाम किए गए हैं, लेकिन ये ज्यादातर बातें थोथी और कागजी हैं। सिर्फ भाषा की ही बात की जाए तो जो बच्चे सीमित सुविधाओं में अपनी भाषा में पढ़कर यहां तक पहुंचे हैं, उनसे रातों-रात आप ऐसी फर्राटेदार अंग्रेजी की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं और क्यों? क्या कोई भी दो-चार महीनों में अंग्रेजी सीख सकता है? हमारे संस्थानों को तुरंत अंग्रेजी के इस माहौल को बदलने की जरूरत है वरना देश की सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं का गला घोंटने में देर नहीं लगेगी।

कुछ कदम तुरंत उठाने की जरूरत है और यहां हम दक्षिण के तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों से भी सीख सकते हैं। पहले वर्ष में ऐसी सभी संस्थानों में अंग्रेजी और प्रांतीय भाषा पर विशेष ध्यान दिया जाए। भाषा ज्ञान सिर्फ साहित्य पढ़ने के लिए आवश्यक नहीं होता। गणित, भौतिकी, इंजीनियरिंग जैसे विषयों को भी तो किसी-न-किसी भाषा के माध्यम से ही पढ़ना, समझना होता है। इसलिए दोनों भाषाओं की समझ से इन छात्रों की रचनात्मकता बेहतर निखर कर आएगी। दुर्भाग्य से देश के सभी संस्थानों में भाषा शिक्षण को दूसरे-तीसरे दर्जे का भी महत्व नहीं मिल रहा और इसीलिए यह हमारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष बन रहा है। सारी रचनात्मकता, अन्वेषण समझ को चौपट करता हुआ। पिछले दिनों लगातार इस बात को रेखांकित किया जाता रहा है कि हमारे इन उच्च संस्थानों के छात्र देश, समाज और उनकी समस्याओं से कटे हुए हैं। कौन जिम्मेदार हैं? आपके कॉलेज, स्कूल की भाषा ही उसे धीरे-धीरे दूर कर देती है। केवल देश की भाषा की इन प्रतिभाओं को उन समस्याओं और उनके समाधान से जोड़ेगी जिनके लिए ये करोड़ों के संस्थान बनाए गए हैं। कम-से-कम विदेशों की तरफ भागने और इनकी अंग्रेजी के लिए तो भारत की गरीब जनता टैक्स नहीं दे रही। शिक्षा, भाषा की उपेक्षा से ये प्रश्न इतना जटिल रूप ले चुके हैं कि संस्थान अंग्रेजी पढ़ाए या इंजीनियरिंग? हमारे शिक्षण संस्थानों के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। एक तरफ क्लास में क्षमता से अधिक संख्या, प्रयोगशालाओं की कमी, लगभग सभी प्रमुख संस्थानों में पचास प्रतिशत फैकल्टी की कमी और ऊपर से रोज-रोज बढ़ते राजनीतिक दबाव। क्या यह अचानक है कि संस्थानों को सक्षम प्रोफेसर नहीं मिल रहे। क्यों वह नई पीढ़ी जो आइआइटी में पढ़ने, दाखिले को तो जमीन-आसमान एक कर देती है, वहां उसे शिक्षक बनना मंजूर नहीं है। प्रोफेसरों की तनख्वाह इतनी कम भी नहीं है। कौन इन्हें देश से भाग जाने के पंख लगा रहा है?

भाषा के मसले पर केंद्र की नई सरकार ने उम्मीद जगाई है। देश की सर्वोच्च नौकरियों में जाने के लिए सिविल सेवा परीक्षा में जिस अंग्रेजी ने 2011 में भारतीय भाषाओं के देश के गरीबों को लगभग बाहर कर दिया था, 2014 के परिणाम भारतीय भाषाओं के पक्ष में गए हैं। हिंदी लेखकों, प्राध्यापकों और नौकरशाहों की चुप्पी के बावजूद छात्रों का पिछले वर्ष का आंदोलन बेकार नहीं गया, लेकिन अभी उसे कई मंजिलें पार करनी हैं। शिक्षण संस्थानों में अपनी भाषा में पढ़ाई की शुरुआत इसमें सबसे लंबी छलांग होगी।

कछुए के कान : आशुतोष उपाध्‍याय

Ashutosh Upadhyayहमारे मोहल्ले में इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मंचन के लिए बच्चों ने मुझसे नाटक की मांग की। कुछ मिला नहीं तो मैंने उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार इब्ने इंशा द्वारा किये गए पंचतंत्र की कहानियों के पाठांतर पर हाथ आजमाने का प्रयास किया। खरगोश और कछुए की दौड़ की जानी-पहचानी कहानी का विरूपित संस्करण ‘कछुए के कान’ नाम से नाटक के रूप में पेश है। इस बच्चों के साथ किया जा सकता है। अगर आप इसका मंचन अपने साइंस सेंटर या किसी स्कूल में करते हैं तो अनुभव साझा करना न भूलें।– लेखक

दृश्य 1

मंच पर दो सूत्रधार प्रवेश करते हैंएक के हाथ में डफली है और दूसरा बाजा बजा रहा है

सूत्रधार-1 :    (डफली बजाते हुए) सुनो-सुनो-सुनो… बच्चा लोग सुनो और बड़ा लोग सुनो… आधे लोग सुनो और पूरे लोग सुनो… इधर से सुना अब उधर से सुनो…

सूत्रधार-2     : (शत्रुध्न सिन्हा की तरह) खामोश..! आपको सुनाते हैं एक कहानी! जिसे सुनाती थी हमारी नानी!!

लेकिन माफ करना भाइयो और बहनो, हमने की है थोड़ी मनमानी!!

सूत्रधार-1 :    ये है कछुए और खरगोश की कहानी… बड़ी पुरानी.. मगर जानी-पहचानी!

लेकिन आपने जो सुनी वो नकली थी… हम जो सुनाएंगे वो असली है.. 100% देसी घी जितनी!!

सूत्रधार-2 :    बड़ी पुरानी बात है। बहुत-बहुत पुरानी…. जब धरती में इंसान का राज नहीं था।

सूत्रधार-1 :    इंसान भी बाकी जानवरों के साथ जंगल में रहता था।

सूत्रधार-2 :    यह कहानी हमारे परदादा के परदादा के परदादा परदादा…

सूत्रधार-1 :    इतने परदादा कि बोलते-बोलते सुबह हो जाय… तो उस परदादा ने अपने परदादा से सुनी थी।

सूत्रधार-2 :    और उसके पहले जाने कितने परदादाओं ने सुनी और सुनाई थी।

दर्शक    : अबे कहानी सुनाओगे या परदादाओं का हिसाब-किताब करते रहोगे?

दोनों सूत्रधार :  खामोश….! (मुस्कराकर) सुनाते हैं भाई, सुनाते हैं।

सूत्रधार-1 :    एक जंगल में दो दोस्त रहते थे। पहला खरगोश और दूसरा कछुआ। आपको तो पता ही है?

सूत्रधार-2 :    दोनों में एक बार रेस हुई। दौड़ाक खरगोश काफी आगे निकल गया। कछुए की चाल देख उसने सोचा क्यों न थोड़ा सुस्ता लूं। और जब वह रास्ते में बैठा तो उसे नींद आ गई। वैसे आप इस किस्से को जानते ही हैं!

सूत्रधार-1 :    कछुआ धीरे-धीरे लगातार चलता रहा। रास्ते में उसने खरगोश को सोते हुए देखा। मगर उसे उठाया नहीं, बस चुपचाप चलता रहा और आखिर में रेस जीत गया। आप कहोगे ये कहानी तो सुनी-सुनाई है। नहीं जनाब हमारी कहानी तो अब शुरू होती है।

सूत्रधार-2 :    दौड़ में हार जाने से खरगोशों की इज्ज़त पर दाग़ लग गया। उनके बच्चे इस दाग़ को धोने के सपने देखते थे। फिर बच्चों के बच्चों ने यह सपना देखा। आखिर वह दिन आया, जब खरगोशों को इस दाग़ से छुटकारा मिल गया।

दृश्य 2

मंच में एक खरगोश और एक कछुआ अलसाए से बैठे हुए हैं उनके चेहरे पर बोरियत छाई हुई है

खरगोश : कच्छप दादा, कुछ मजा नहीं आ रहा। अजी बोर हो रहे हैं। चल कोई गेम खेलते हैं।

कुछ टैम कटे, कुछ बोझ घटे। कड़वी यादों से कुछ ध्यान हटे।

कछुआ   :    देखो हमको फिर से दौड़ने को मत बोलना। भूल तो नहीं गए? हमारे दादाजी, तुम्हारे दादाजी को हराए थे! बोलो हराए कि नहीं? तुम खरगोश दौड़ते तेज हो मगर हम कछुओं की खोपड़ी ज्यादा तेज दौड़ती है।

खरगोश : ठीक है ठीक है। ज्यादा स्याणा मत बन। बड़ा आया टोकड़िया में खोपड़िया देने वाला! एक बार फिर क्यों नहीं दौड़ लेता? मिल्क का मिल्क और वाटर का वाटर हो जाएगा।

कछुआ  : लगता है अपनी बेजती खराब किए बिना मानोगे नहीं। चलो दौड़ लेते हैं.. मगर इस बार शरत लगानी पड़ेगी।

खरगोश :    कैसी शर्त?

कछुआ   :    जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट लेगा। (अपने आप सेइस बार हम इसके लंबेलंबे कान अपनी बैठक में सजाएंगे बेटा ऐसी सुस्ती फैलाएंगे कि जन्नत में बैठे तुम्हारे दादाजी भी खर्राटे लेने लगेंगे)

खरगोश : मंज़ूर है। (अपने आप सेकछुए के बच्चे! तेरे कान तो गए इस बार मैं नींद उड़ाने वाली बूटी खाकर दौडूंगा!).

दृश्य 3

खरगोश और कछुआ दौड़ की लाइन पर खड़े हैं एक आदमी उन्हें दौड़ाने की तैयारी कर रहा है

आदमी के हाथ में एक बड़ा सा चाकू है

आदमी   :    भाइयो और बहनो! आपको यह जानकार खुशी होगी, आपके जंगल में, खरगोश और कछुए की मशहूर दौड़, फिर से होने जा रही है। वही दौड़ जिसके किस्से आपने बचपन में सुने थे। लेकिन अबकी बार, इस दौड़ में एक शर्त जोड़ दी गई है। जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट कर अपने घर ले जाएगा।

तो श्रीमान खरगोश और कछुआ… अपनी-अपनी जगह पर पहुंचो। और दौड़ने के लिए तैयार हो जाओ.. ओके?

रेडी… वन… टू… थ्री… गो…!

दोनों दौड़ते हैं लेकिन इस बार खरगोश बिना पीछे देखे दौड़ता रहता है और जल्दी ही मंज़िल पर पहुंच जाता है

मंज़िल पर आदमी दोनों का इंतज़ार कर रहा है

खरगोश : हुर्रे! इंसान चाचा, मैं जीत गया। मैंने खरगोशों का इतिहास बदल दिया। आप अपना चाकू तेज कर लो, कछुआ आता ही होगा। उसके कान लक्कड़ में टांगकर अपनी बैठक में सजाऊंगा।

आदमी और खरगोश कछुए की राह देखते हैं लेकिन उसका दूरदूर तक पता नहीं है दोनों थककर सो जाते हैं

दृश्य 4

मंज़िल पर एक नया आदमी और खरगोश बैठे हैं तभी दूर से कछुआ आता दिखाई पड़ता है

दोनों चौकन्ने हो जाते हैं

कछुआ   :    (बूढ़ों की आवाज में) अरे बच्चो, सुनो तो… तुमने एक आदमी या खरगोश को यहां देखा था?

दोनों     : अंधे हो क्या? क्या हम आदमी और खरगोश नहीं लगते?

कछुआ   :    माफ करना! हम आप दोनों की बात नहीं कर रहे। वे दोनों हमारे पुराने दोस्त हैं।

आदमी  : कछुआ अंकल, वो तो हमारे दादाजी थे। आपका इन्तजार करते-करते दोनों मर गए।

खरगोश :    उनके मरने की बाद हमारे डैडी यहां बैठे-बैठे बुढ़ा गए।

आदमी : मरते वक्त उन्होंने हम दोनों को यहां बिठाया और कहा कि कछुआ आए तो उसके कान काट लेना।

खरगोश : हम यहां तुम्हारे कान काटने के लिए बैठे हैं। लाओ अपने कान बाहर निकालो।

कछुआ   :    अरे नहीं! हम अपने कान नहीं कटवाएंगे…!

आदमी आगे बढ़कर कछुए के कान काटने की कोशिश करता है

कछुआ अपने कान छुपाता है और अपने कवच में जा छुपता है

आदमी   :    अरे ये तो अपने कवच में छुप गया। (कछुए की पीठ ठोकता है) सुनो कच्छप महाराज! बाहर निकलो। हम तीन पीढ़ियों से तुम्हारे कानों की राह देख रहे हैं।

खरगोश : जाने दो चाचा, वर्ना इसके इन्तजार में हमारी ज़िंदगी भी यहीं बीत जाएगी।

आदमी सहमति में सर हिलाता है मंच पर सारे पात्र आते हैं कछुआ कवच में छुपा वहीं पड़ा रहता है

सारे पात्र :    अब पता चला कछुए अपने कान क्यों नहीं दिखाते! क्या आपने देखे हैं कछुए के कान?

एक रचनात्माक प्रयास : एस. सिंह

Deewar Patrika Aur Rachnatmaktaटीवी, इंटरनेट की दुनिया में खोए किशोरों के लिए ऐसा क्या किया जाए कि उनका ध्यान उधर से बंटे और वे कुछ रचनात्मकता की ओर मुड़ें। दरअसल, आभासी दुनिया में वे इतने गहरे पैठ गए हैं कि अपने अभिभावकों, गुरुजनों और मित्रों से भी बातचीत करने के लिए सोशल साइट्स चैटिंग का सहारा लेते हैं। किशोरों की इस खेप के लिए महेश चन्द्र पुनेठा की किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’ एक बढ़िया प्रयास है। कवर देखते ही मन में पहला प्रश्न उठता है कि दीवार पत्रिका है क्या चीज? किशोरों के लिए अपने विचारों, भावनाओं, सूचनाओं को संप्रेषित करने और आपसी संवाद का यह एक सशक्त और सस्ता माध्यम है।
दरअसल, महेश चन्द्र पुनेठा अध्यापन का कार्य करते हैं। उन्होंने शिक्षण प्रशिक्षण के दौरान जो स्वयं अनुभव किया है, उसे ही शब्द दिए हैं। प्रशिक्षण पैकेज में उन्हें एक चीज जो अत्यधिक पसंद आई- वह थी प्रतिदिन एक प्रतिभागी द्वारा बाल अखबार तैयार कर प्रस्तुत करना। प्रशिक्षण से लौटने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने प्राथमिक विद्यालय, कुंजनपुर में अपने सीखे गए पाठ को अप्लाई किया। दीवार पत्रिका के लिए सिर्फ किशोरों को सादे कागज पर अपनी कहानियां, कविताएं या कुछ अपने अनोखे अनुभवों को लिखकर दीवार पर टंगे बहुत बड़े चार्ट पेपर पर चिपकाना होता है। लेखक का यह प्रयोग इतना जबर्दस्त था कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों ने इसे अपनाया और अपने यहां दीवार पत्रिका की शुरुआत की।
किशोरों के मन में कई सारे नए विचार प्रतिपल आते रहते हैं। अगर उन्हें इन विचारों को शब्द रूप देने को कहा जाए, तो उनकी ऊर्जा सकारात्मक दिशा की ओर खर्च होने लगेगी। इसके लिए दीवार पत्रिका से बेहतर विकल्प उनके लिए नहीं है। पढ़ाई के दिनों में कविता-कहानियां लिखना लेखक बनने की पहली सीढ़ी होती है। लेखन जैसे रचनात्मक कार्यो से न सिर्फ सूचनाएं संप्रेषित होती हैं, बल्कि उनका आपस में संवाद और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। लेखक ने कुल 110 पन्नों में पूरी किताब को समेटा है। दीवार पत्रिका के साथ अपने अनुभवों से उन्होंने शुरुआत की है। आगे की विषय सूची में निर्माण कार्यशाला, बच्चों के अनुभव, संपादकों से बातचीत, शिक्षक साथियों के अनुभवों को उन्होंने स्थान दिया है। अभिभावक यदि चाहते हैं कि उनके बच्चे आभासी दुनिया में उलझने की बजाय किस्से-कहानियों और किताबों की दुनिया की ओर लौटें, तो उन्हें यह किताब लाकर दें। मूल्य भी कम है।

पुस्तक : दीवार पत्रिका और रचनात्मकता
लेखक : महेश चन्द्र पुनेठा
प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन,
433, नीतिखंड-3, इंदिरापुरम
गाजियाबाद-201014
मूल्य : 80 रुपये (अजिल्‍द)

: 150 रुपये (सजिल्‍द)