Archive for: July 2015

पांच सौ अक्षरों में कैद बहस : रोहित धनकर

रोहित धनकर

रोहित धनकर

अप्रैल के महीने में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिए आम जनता को आमंत्रित करने के फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार ने mygov वेबसाइट के जरिये ‘पहली बार आम नागरिक को नीतिनिर्माण के काम में हिस्सेदार बनाने का प्रयास किया है, जो अब तक चंद लोगों तक सीमित था।’ सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि एक लोकतंत्र के भीतर नीतिनिर्माण में लोगों की ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी से ही बेहतर नीतियां बनती हैं। कम से कम सिद्धांत रूप में यह बात सही है।

लेकिन वेबसाइट में लोगों की टिप्पणियों को 500 अक्षरों और चंद पूर्वनिर्धारित मुद्दों तक सीमित कर दिया गया है। इस तरह आंशिक रूप से सेंसर की गयी रायशुमारी से ज्यादा से ज्यादा विखंडित और विरोधाभासी सुझाव ही जनता की ओर से मिल पाएंगे। हालांकि विरोधाभासी दृष्टिकोण स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान हैं, फिर भी उन्हें तर्कपूर्ण व व्यवस्थित किए जाने की जरूरत पड़ती है। दूसरे शब्दों में- अगर उन्हें शिक्षा पर एक व्यापक आधार वाले संवाद के उद्देश्य से एकत्र किया जा रहा है, तो उन्हें सुविचारित तर्क के रूप में प्रकट करना होगा।

दूसरे, महत्वपूर्ण दलीलें 500 अक्षरों के अतिसूक्ष्म दायरे में व्यक्त नहीं की जा सकतीं। 500 शब्दों की सीमा के बारे में कहा जा सकता है कि वेबसाइट पर फाइल अपलोड करने की भी छूट है, पर इस तरह अपलोड की गई फाइलें बहस का हिस्सा नहीं बन पातीं। इस तथ्य को वेबसाइट में मौजूद टिप्पणियों को देखकर भी समझा जा सकता है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि जनता के विचारों को जानने का यह तरीका स्वयं विचारों के विखंडन का पक्षपोषण करता है।

विखंडित विवेक का दौर

मगर यह विखंडित विवेक का दौर है। समाज को इस मान्यता की ओर धकेला जा रहा है कि चिंतन का मतलब विचारों को टुकड़ों में यहां-वहां उछालना भर होता है। वैसे ही जैसे लोग ट्विटर में विचारों को उछालते रहते हैं। विचारों के ये टुकड़े दरअसल किसी खास सन्दर्भ में ही अर्थपूर्ण होते हैं। इस किस्म के विखंडित विचारों से निर्मित संवाद केवल अधपके तर्कों को ही तैयार करता है। वर्तमान सरकार द्वारा कराए जा रहे नीति सम्बन्धी विचार-विमर्श, चाहे इनकी पद्धति की वजह से कहें या फिर समझ की कमी के कारण,महज विचारों के विखंडित और अस्पष्ट बादलों के सामान हैं। यह ट्विटर युग का विवेक है।

हमारी संस्कृति और राज-व्यवस्था की एक सामान्य प्रासंगिक पृष्ठभूमि कहीं नज़र नहीं आती। यह मान लेना गलत होगा कि हम अपनी सांस्कृतिक, सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक ज़रूरतों को एक सा ही समझते/देखते हैं। ट्वीट करने की थोड़ी-बहुत सार्थकता हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर यह एक आधी-अधूरी राय ही है। इससे विचारों के आदान-प्रदान का भ्रम पैदा होता है, मगर विचार करने वाले के वास्तविक तर्क और इरादे छुपे रह जाते हैं। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक सुसंगत तर्क और व्यापक सहमति बनाने के लिए सन्दर्भ बताना बेहद ज़रूरी है।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार नीति (पॉलिसी) एक तरह की दिशा या कार्य को निदेशित करने का सिद्धांत है जिसे किसी संगठन या व्यक्ति ने अपनाया अथवा प्रस्तावित किया हो। इसे विशिष्ट गतिविधियों या क्रियाओं को पैदा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसे किन्हीं खास सुझावों और सिफारिशों की स्वीकार्यता को जांचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

मानव संसाधन मंत्रालय इसके द्वारा नियोजित सिलसिलेवार बहस-मुबाहिसे से शिक्षानीति की ऐसी ही रूपरेखा की उम्मीद कर रहा है। mygov वेबसाइट के मुताबिक मंत्रालय ने वेबसाइट पर जो समूह बनाया है, उसका उद्देश्य ‘समावेशी, सहभागितापूर्ण और समग्र दृष्टिकोण से देश के लिए एक नई शिक्षा नीति तैयार करना है।’ वेबसाइट पर ‘संवाद’ आयोजित करने के अलावा मंत्रालय की एक ‘पूर्व परिभाषित सर्वेक्षण प्रश्नावली’ के माध्यम से राष्ट्रव्यापी परामर्श एकत्र करने की भी योजना है। इसके लिए भी एक समूह का गठन हो चुका है, एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में, हालांकि यह अब तक रहस्यों में घिरा है- जिस जनता से नई नीति पर अपनी राय बताने की अपेक्षा की जा रही है, उसे भी इसके सदस्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

दोषपूर्ण पद्धति

इस प्रकार शिक्षा नीति तैयार करने की पद्धति में कम से कम दो गंभीर समस्याएं हैं। पहली- ट्विटर मार्का विचारों की सही-सही व्याख्या की दरकार होती है। लेकिन यह व्याख्या उसी रहस्यमय समूह के हवाले कर दी गई है, जो एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में बनाया गया है। व्याख्या के लिए एक सामान्य वैचारिक रूपरेखा की जरूरत पड़ती है, जिसके बारे में चुप्पी साध ली गयी है या उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए व्यक्त किए गए विचार पहले से तयशुदा नीतियों को पुष्ट करने के इरादे से तोड़े-मरोड़े जा सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि एक छोटे से पसंदीदा समूह के पूर्व-निर्धारित निर्णयों को एक अप्रभावी जन-संवाद के जरिये सही ठहराया जा सकता है।

दूसरी- सर्वानुमति बनाने के किसी आधारभूत निर्देशक सिद्धांतों के अभाव में इस कवायद का वही नतीजा निकलेगा जिसे शिक्षा के जाने-माने दार्शनिक जॉन व्हाइल ‘एचसीएफ समस्या’ कहते हैं। समूची कवायद से ऐसे अस्पष्ट और अपुष्ट सुझावों का ढेर लग जाएगा, जिनके बीच सामाजिक न्याय और समता के मुद्दे गायब होंगे, क्योंकि इस तरह भिड़ाए गए इन मुद्दों पर कोई आसान सी सहमति उपलब्ध नहीं है। और इस तरह समाज की वास्तविक चिंताएं या तो महत्वहीन हो जाएंगी या सिरे से नदारद होंगी।

इस विचार-विमर्श के प्रयोजन और उद्देश्य को समझने के लिहाज से प्राथमिक शिक्षा के लिए चुने गए 13 प्रकरणों का पाठ बड़ा दिलचस्प है। प्रत्येक प्रकरण का करीब 200 शब्दों में परिचय दिया गया है और साथ में विमर्श के लिए सवालों की एक सूची है। ज्यादातर सवाल इसके संचालन की बारीकियों से जुड़े हैं। नीति से इनका कोई खास संबंध नहीं है।

उदाहरण के लिए, एक सवाल में यह पूछा गया है कि टेक्नोलॉजी का शिक्षकों की वास्तविक मौजूदगी को सुनिश्चित करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। सवाल के गठन से ही स्पष्ट हो जाता है कि मुद्दा यह नहीं कि टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि कैसे इसे इस्तेमाल करना चाहिए। अगर सवाल ‘क्या’ से शुरू होता तो यह शिक्षक की विश्वसनीयता, स्वायत्तता, जिम्मेदारी व सम्मान जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाता। लेकिन ‘कैसे’ जोड़ देने से यह पहले ही तय हो गया कि शिक्षकों की कड़ाई से निगरानी करनी चाहिए और उन्हें दंड का भय दिखाना चाहिए। इसलिए ‘क्या टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए’ जैसा सवाल एक नीति से जुड़ा सवाल बन जाता है, क्योंकि यह सामान्य सिद्धांतों के गिर्द घूमता है, जबकि ‘कैसे’ जुड़ने वाली चर्चा एक तकनीकी सवाल है जिसका नीति से कोई खास ताल्लुक नहीं, बल्कि यह कार्यान्वयन का मसला है। वेबसाइट में ज्यादातर प्रश्न इसी मिजाज़ के हैं।

यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि प्रकरणों के परिचय में ही कई पूर्व निर्धारित नीतियां छुपी हुई हैं। उदाहरण के लिए, स्कूल स्तर पर परीक्षा सुधार वाला प्रकरण कहता है कि ‘परीक्षा सुधार शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को बदल देगा और अधिगम परिणामों में सुधार लाएगा।’ यह विचार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता था कि क्या ‘परीक्षा-उन्मुख सुधार’ सफल हो सकते हैं, अथवा वे ‘परीक्षा के लिए पढ़ाई’ को प्रोत्साहन देंगे और इस तरह समालोचनात्मक तार्किकता के लिए दी जाने वाली शिक्षा का ही बंटाधार कर डालेंगे। परीक्षा का डर क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याओं में एक नहीं है? लेकिन यहां, परीक्षा-उन्मुख सुधार को आस्था के एक तत्व की तरह स्वीकार कर लिया गया है।

मैं शिक्षा नीति पर सार्वजनिक बहस की मुखालिफत नहीं कर रहा हूं। न ही मैं शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा किए जाने के विरोध में हूं। एक लोकतांत्रिक देश में शिक्षा नीति पर फैसले लेने के लिए ये दोनों सामान रूप से आवश्यक हैं। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि तयशुदा सवालों और पूर्व-निर्धारित प्रकरणों से गहरे और निष्पक्ष वाद-विवाद की संभावना सीमित हो जाती है।

आज भारतीय शिक्षा तीन दिशाओं से खिंचाव महसूस कर रही है। पहली दिशा, शिक्षा को आर्थिक वृद्धि की जरूरतों के अनुरूप ढालने की वकालत की है। इसमें व्यावहारिक कौशल-निर्माण और पर्याप्त कार्यशक्ति तैयार करने पर जोर दिया जाता है। दूसरी दिशा शिक्षा को लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को हासिल करने की ओर ले जाने की है। इसमें समाज, राजनीति, अर्थतंत्र की आलोचनात्मक समझ बनाने तथा ज्यादा समतामूलक व सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए मूल्यों का ढांचा गढ़ने पर जोर दिया जाता है। तीसरी दिशा, जो दिन पर दिन मजबूत होती जा रही है, शिक्षा को भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के एक खास नजरिये से जोड़ने का दबाव बनाती है। इसका जोर पाठ्यक्रम में हिन्दू नायकों, ग्रंथों और आचरण के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाने पर है। तीनों तरह के खिंचाव समाज और राज्य-व्यवस्था की जरूरतों के अलग-अलग दृष्टिकोणों को रेखांकित करते हैं। उदाहरण के लिए, पहला आर्थिक खिंचाव जहां बिकाऊ कौशलों पर जोर देता है, वहीं राजनीतिक आलोचना और सामाजिक न्याय के मुद्दों की उपेक्षा करता है। इसका परिणाम एक कार्यक्षम किन्तु दब्बू कार्यशक्ति और उपभोक्तावाद के विस्तार के रूप में प्रकट होगा। दूसरी ओर, एकमात्र सामाजिक न्याय के लिए शिक्षा को समर्पित कर देने का परिणाम वही होगा जिसे कोठारी आयोग की रिपोर्ट ‘बेरोजगार स्नातकों की फ़ौज’ कहती है, जो सामाजिक न्याय हासिल करने में भी नाकामयाब होगी। और भारतीय संस्कृति व इतिहास की इकतरफा समझ पर जोर देने का परिणाम समाज में विभाजन और कडुआहट के बीजारोपण के रूप में प्रकट होगा, जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ लोकतंत्र तथा सामाजिक न्याय को भी नष्ट कर डालेगा।

सरकार का ट्विटर मार्का बहस-मुबाहिसे पर जोर यह बताता है कि वह किसी दीर्धकालिक संवाद के पक्ष में नहीं है। पूर्व परिभाषित बिंदुओं और तयशुदा सवालों के जरिए संकीर्ण दायरे में सार्वजानिक बहस को खोलने की रणनीति वास्तविक नीतिगत मुद्दों पर बहस को पहले ही रोक देती है। इस तरह निर्णय कुछ चुनिन्दा हाथों तक सिमट जाते हैं। खुली लोकतांत्रिक बहस का भ्रम पैदा किया गया है, लेकिन असल में जनता का दिमाग छोटे-छोटे मामूली विवरणों में उलझाया जा रहा है।

(रोहित धनकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बंगलुरु में अकादमिक विकास विभाग के प्रोफ़ेसर व निदेशक हैं. साथ ही वह दिगंतर, जयपुर के अकादमिक सलाहकार भी हैं.)

द हिन्दूमें 21 जुलाई 2015 को प्रकाशित लेख का अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

एक नई पहल करते समर्पित शि‍क्षक : हरीश चन्द्र पाण्डे

shekshik dakhal

हम बने बनाये सामान व व्यक्तित्वों को देखने के आदी हो गए हैं। चमचमाते भव्य पैकेटिंग से बाजार के बाजार अटे पड़े हैं और ऐसे ही रंग-रोगन किए करिश्‍माई व्यक्तित्व भी। ऐसा राजनीति, शि‍क्षा, साहित्य, खेल हर जगह है। हमें बने बनाये गांधी, राधाकृष्‍णन, टैगोर, ध्यानचंद, प्रेमचंद, पंत, निराला चाहिए। यानी शीर्ष से कम कुछ नहीं देखना हमें। बनता हुआ नहीं देखना है, बना हुआ देखना है। हमें एक तैयार नाटक से मतलब है, उसके मंच व मंच पीछे की तैयारियों से कोई मतलब नहीं और उसकी रिहर्सल से कोई मतलब नहीं। हमें उस सौवें चोट से मतलब है, जिस पर एक पेड़ गिरा है, उन निन्यानवे चोटों से कोई मतलब नहीं जिन्होंने पेड़ गिराने की पूरी आधार भूमि तैयार की। यह पिसे-पिसाए आटे के रंगीन बैगों का समय है, गेहूं के दानों व उनमें खुदे किसानों के चेहरों का नहीं और न ही मिल में काम करने वाले मजदूरों का। यानी यह तृणमूलता की उपेक्षा का समय है। ऐसे चकाचौंध भरे समय में कहीं किसी कोने में किसी भावी सपने के बीज रोपे जा रहे हों, तो धारा के विपरीत तैरने का सा अहसास होता है।

मैं यहां अपने रूप, साज-सज्जा में साधारण सी दिखती एक पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ के प्रकाशन की बात कर रहा हूं। युवा साहित्यकार महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक के संपादन में उत्तराखंड से निकल रही इस पत्रिका के पीछे समर्पित शि‍क्षकों की एक टोली है। मुखपृष्‍ठ पर लिखी इबारत ‘शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शि‍क्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच’ इसके सरोकारों का संकेत दे देती है। क्या हैं ये शैक्षिक सरोकार, इसका उत्तर यह पत्रिका है। इसकी विषय सामग्री है और इसकी संपादकीय चिंताएं हैं। क्या शि‍क्षा की परंपरागत नीति व शि‍क्षकों का परंपरागत व्यवहार नईं सामाजिक संरचना के अनुरूप अपने को बदल पाया है, अगर पूर्व पद्धति में कुछ ऐसा है जो ठीक नहीं तो उसका विकल्प क्या है, मैं सोचता हूं, यह पत्रिका इस पर विचार ही नहीं करती उसे अध्यापकों के माध्यम से व्यवहृत भी कराती है। एक तरह से यह अध्यापकों की भी पाठशाला है, जिसमें छात्रों में भयमुक्त वातावरण पैदा कर उन्हें पठन-पाठन यात्रा में सहयात्री बनने का एहसास भरना है। यह पत्रिका गमलों में सैद्धांतिक विचारों की पौध उगाने की बजाय जमीन पर पौधारोपण कर रही है। इधर हमारे समाज में नैतिकता का सर्वमुखी क्षरण हुआ है उसमें शि‍क्षा और चिकित्सा के क्षेत्र अग्रणी हैं। ‘गुरु’ और ‘डॉक्टर’ जिन्हें मानव के लिए ईश्‍वरत्व के सबसे निकट माना गया, सर्वाधिक प्रभावित हैं। ऐसे में किसी एक कारण को उत्तरदायी न मानते हुए यह पत्रिका एक नई पहल करती है, जिसमें अध्यापक, छात्र व आम नागरिक की खुली सहभागिता है।

पत्रिका ने फेसबुक पर शैक्षणिक बातचीत चलाकर इसका बहुत ही सकारात्मक पक्ष उजागर किया है, जबकि फेसबुक इस बीच नकारात्मक व कीचड़ उछालू प्रवृत्तियों का भडास गवाक्ष भी बन गया है। ये कुछ लोग हैं, जो छात्रों-शि‍क्षकों के बीच के संबंधों को पुनर्व्याख्यायित करते हुए एक नये नैतिक मनुष्‍य की कल्पना में आज को देख रहे हैं। ये ‘दीवार पत्रिका’ के माध्यम से बच्चों में आत्मविश्‍वास और कल्पनाशीलता जगा रहे हैं। अगर पढ़ाई में फिसड्डी समझा जाने वाला एक छात्र अपने घर की गरीबी के अनुभव को कागज पर सबसे प्रामाणिक निबंध के रूप में उकेर देता है, तो यह बदली हुई विचार पद्धति ही है जो उसके छुपे हुए कौशल को पहचान कर उसके मानसिक रुद्ध द्वार खोलती है। उसमें आत्मविश्‍वास का बीज बोती है। अध्यापकों व छात्रों की पारस्परिकता की जिस दुनिया को यह पत्रिका उठाती है, वह पूरे भारतवर्ष पर लागू होती है। अतः इसके कथ्य की जरूरत केवल हिंदी क्षेत्रों को नहीं है। मैं इस पत्रिका में एक बडे़ भूगोल की नैतिक आहटें सुन रहा हूं। इसने शि‍क्षा पद्धति की नींव को छूने की कोशि‍श की है और बडे़ ही विनत भाव से। शि‍क्षक-छात्र इसमें किसी आदेश के तहत नहीं वरन खुले अंतःकरण से शामिल हो रहे हैं। कुछ विचारशील लोग अपनी लो प्रोफाइल मुद्रा में एक सपने को आकार दे रहे हैं, इसके लिए मैं संपादक मंडल व शैक्षिक दखल टीम को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

दीवार पर किताब, सोशल मीडिया में धूम

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

 

चंडीगढ़, 20 जुलाई (ट्रिन्यू)

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का एक समूह अभियान चला रहा है। इसमें बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने की कोशिश की गयी है। यह मुहिम इन दिनों सोशल मीडिया पर छायी हुई है। ‘दीवार पत्रिका : एक अभियान’ नाम से फेसबुक समूह और ब्लॉग भी बनाया गया है। इससे जुड़े लोगों का कहना है कि यह अभियान का ही असर है कि आज प्राथमिक विद्यालयों से लेकर डिग्री कालेज की दीवारों तक में यह हस्तलिखित पत्रिका लटकी देखी जा सकती है।

उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से प्रारम्भ हुए इस अभियान की गूंज वहां के तीन सौ से अधिक विद्यालयों सहित उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पं.बंगाल आदि प्रदेशों के विभिन्न स्कूलों में दीवार पत्रिका निकलने लगी है।

अभियान से जुड़े महेश पुनेठा कहते हैं, ‘बच्चों में रचनात्मक विकास और भाषाई दक्षता को बढ़ावा देने के लिए ‘दीवार पत्रिका’ अपने आप में अनोखा, प्रभावशाली और बेहद कम खर्चीला है। यह एक हस्तलिखित पत्रिका है, जो दीवार पर कलैंडर की तरह लटकायी जाती है।’

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों लेखक मंच प्रकाशन से ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’ नाम से एक किताब का प्रकाशन भी किया है। इसमें बच्चों और इससे जुड़े तमाम लोगों के अनुभव सहेजे गये हैं।

Posted On July – 20 – 2015

 

नई शुरुआत : प्रेमपाल शर्मा

Delhi budget

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इस वर्ष के बजट में जहां केन्‍द्र सरकार ने स्वास्थ्य पर आवंटन को घटाकर कुल जीडीपी के 0.3 प्रतिशत पर पहुंचा दिया हो, वहां आप सरकार द्वारा अपने पहले ही बजट में स्वास्थ्य पर 30 प्रतिशत का आंवटन महत्त्वपूर्ण है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है। असल में एक के बाद एक केन्‍द्र सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले करने में जुटी हैं। विडंबना यह है कि जब राज्य सरकार अपना बजट प्रस्तुत कर रही थी, तो केन्‍द्र सरकार द्वारा नियंत्रित दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ऐसी बहुमंजिला रिहाइशी मकानों की  घोषणा कर रहा था जिनमें उच्च वर्ग के लिए ‘पेंट हाउसों का प्रावधान होगा। आखिर करोड़ों रुपए के इन फ्लैटों को खरीदेगा कौन? ये आम जनता के किस काम के होंगे?

सत्ता संभालते ही चौतरफा विवादों से घिरी दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने इस नगर-राज्य की जनता को एक ऐतिहासिक बजट दिया है। वैकल्पिक राजनीति का पहला कदम। इसे आप का पहला बजट ही कहा जाएगा। पिछले कार्यकाल के 49 दिनों में भी इसने शिक्षा, भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जो शुरुआत की थी, उसमें भी इस नई पार्टी की सोच पूरी तरह स्पष्ट थी।

देखा जाए तो उसी का असर था कि दिल्ली की जनता ने इस नई पार्टी पर यकीन किया और देश की दोनों बड़ी पार्टियों को धूल चटाते हुए इसे ऐतिहासिक जीत दिलाई। वैकल्पिक राजनीति की जिन बातों ने पूरे देश और विशेषकर नौजवान मेधावी मेहनती पीढ़ी का ध्यान खींचा था, उनमें प्रमुख थी- भ्रष्टाचार से मुक्ति, शिक्षा और अन्य महत्त्वपूर्ण मसलों पर जनभागीदारी या हस्तक्षेप। यह बजट आप के घोषणापत्र के अनुरूप ही कहा जा सकता है, विशेषकर दिल्ली की मुख्य समस्याओं शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर।

पहले शिक्षा : आप के घोषणापत्र में शिक्षा सबसे ऊपर रही है। 2013 के चुनाव पूर्व के संकल्प पत्र (घोषणा पत्र नहीं) में पांच साल में पांच सौ सरकारी स्कूल खोलने का संकल्‍प था। यानी कि हर वर्ष सौ स्कूल। वर्ष 2014 के चुनावों में भी उसे फिर दोहराया गया। पार्टी की ईमानदार कोशिश देखिए कि पहले ही बजट में सौ की बजाय दो सौ छत्तीस नए स्कूल खोले जाएंगे। कि‍तना सही सार्थक कदम है। पार्टी जनता के लगातार संपर्क में है विशेषकर गरीबों के। दिल्ली की अस्सी प्रतिशत जनता झुग्गी-झोपडिय़ों, अनियमित कॉलोनियों में रहती है, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। दिल्ली के अमीरों को सस्ती नौकरानियां, नौकर, मजदूर तो चाहिए, लेकिन उन्हें (गरीबों) कोई सुविधा देना बर्दाश्त नहीं है। देश का हर महानगर इसका गवाह है। ऐसे परिदृश्य में देश की भावी पीढ़ी को शिक्षित बनाना शासन की पहली जिम्मेदारी है। आप ने इसीलिए शिक्षा पर खास जोर दिया है। बजट में शिक्षा पर दोगुने से भी ज्यादा आवंटन है। कुल बजट का 24 प्रतिशत। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर भी खास जोर दिया जाएगा। शुरुआत में स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाकर और इनमें खेल आदि की सुविधाएं देकर। स्कूलों की संख्या बढ़ते ही जिन सरकारी स्कूलों में एक-एक कक्षा में सौ से भी अधिक बच्चे होते हैं, उनमें भी सुधार आएगा। यदि बजट की घोषणा के अनुरूप बीस हजार शिक्षकों की भर्ती होती है तो स्तर सुधरते ही दिल्ली में निजी स्कूलों की मनमानी खुद ही समाप्त हो जाएगी।

वैसे, आप सरकार ने निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं- जैसे दाखिले के फार्म को सस्ता करना, डोनेशन पर प्रतिबंध और दंड की व्यवस्था तथा दाखिले में पारदर्शिता। देखना यह है कि भ्रष्ट जंग के आगे इसमें कितनी सफलता मिलती है।

निजी स्कूलों में गरीब तबके के दाखिले के लिए जो पच्चीस प्रतिशत का प्रावधान किया गया था, उसकी गड़बडिय़ां हमारे नीति नियंताओं की आंख खोलने के लिए पर्याप्त हैं। जाने-माने शिक्षाविद प्रोफेसर अनिल सदगोपाल शुरू से ही इसके खिलाफ कहते रहे हैं। बच्चों के स्क्‍ूली स्तर पर ये विभाजन देश की नई पीढ़ी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। ऐसे आरक्षण ने ‘समान शिक्षा के पूरे सपने को धीरे-धीरे खंडित किया है। न उन गरीबों का भला हुआ, न शिक्षा के स्तर में अंतर आया। आप सरकार को आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाकर ऐसे आरक्षणों की समीक्षा करनी चाहिए।

बाहरी दिल्ली में नए आईटीआई बनाना और मौजूदा में सीटें बढ़ाना भी एक अच्छा कदम है। कालेज, विश्वविद्यालय स्तर पर भी बजट में कुछ होना चाहिए, विशेषकर दिल्ली विश्वविद्यालय में सतत चलते विवादों के मद्देनजर। तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का मसला जरूर सुलझ गया है, लेकिन क्रडिट सिस्टम अभी भी विवादित है। आप के बजट में कालेजों में दाखिले की नीति पर भी गौर करने की जरूरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग अस्सी कॉलेज हैं। इस वर्ष के आंकड़ों पर ध्यान दें तो एक सीट के लिए लगभग दस आवेदन आए हैं। हर नौजवान का हक है, देश के अच्छे संस्थानों में पढऩा। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर-पूर्व के कॉलेजों, विश्वविद्यालयों की तबाही का असर दिल्ली पर पड़ रहा है। समस्या के समाधान की तरफ तुरंत एक कदम यह हो सकता है कि सभी कॉलेजों और स्कूलों में दो या तीन पारियां शुरू की जाएं। अभी भी कुछ कालेजों में हैं ही। वैसे भी जब पुणे, नागपुर और दूसरे शहरों तथा कोचिंग संस्थानों में यह संभव है तो विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए दिल्ली में क्यों नहीं है। समस्या बड़ी है तो समाधान भी अलग किस्‍म के खोजे जा सकते हैं। शोध, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, सांस्कृतिक केंद्रों आदि पर इन कॉलेजों में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षा अपनी भाषा-माध्यम में हो इसे स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर लागू करने की जरूरत है। पता नहीं ‘स्वराज’ की बार-बार दुहाई देने के बावजूद इस पक्ष पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री केजरीवाल का ध्यान क्यों नहीं गया। आम आदमी को जरूरत से ज्यादा विदेशी भाषा से भी मुक्ति चाहिए।

देश भर में बड़े शहरों में परिवहन की समस्या विकराल होती जा रही है। दिल्ली महानगर इस मामले में सबसे आगे है। बजट में दिल्लीवासियों के लिए आने-जाने यानी परिवहन व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग डेढ़ गुना बजट आवंटित है। परिवहन पर (20 प्रतिशत) शिक्षा (24 प्रतिशत) के बाद सबसे ज्यादा खर्च प्रस्तावित है। बसों की संख्या तो बढ़ेगी ही उसमें सुरक्षा के लिए मार्शल की तैनाती भी राजधानी में कानून व्यवस्था को देखते हुए अच्छा कदम है।

लेकिन दिल्ली में आने-जाने की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कुछ मूलभूत कदम उठाने की जरूरत है। परिवहन की समस्या के साथ ही पर्यावरण की समस्या भी जुड़ी है। दिल्ली देश का ऐसा शहर है, जहां सबसे ज्यादा निजी गाडिय़ां हैं। देखना यह होगा कि इन पर कैसे लगाम लगाई जाए। अगर यह नहीं होगा तो ज्यादा बसों का लाना भी निरर्थक साबित होगा। सवाल है कि‍ अगर सडक़ें निजी गाडिय़ों से भरी होंगी तो सार्वजनिक बसें चलेंगी कहां। इसके लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं, उनमें सबसे पहले है मेट्रो और बस सेवाओं का रात देर तक चलाया जाना, उसी तरह जिस तरह मुंबई में महानगरीय रेलें चौबीस घंटे में सिर्फ दो घंटे के लिए बंद होती हैं। इससे सडक़ों पर शाम को पहुंचने का दबाव नहीं रहेगा। मेट्रो के विस्तार के साथ ही उसमें यात्रियों की भीड़ को सीमित रखने के लिए गाडिय़ों की संख्या में वृद्धि जरूरी है। अभी होता यह है कि मेट्रो को चलाने के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारक लाभ है, जो किसी भी सार्वजनिक सेवा का आधार न तो हो सकता है और न ही होना चाहिए। इससे निजी गाडिय़ां चलाने का दबाव नहीं रहेगा और वायु के अलावा ध्वनि प्रदूषण भी कम होगा। बीआरटी व्यवस्था अगर अहमदाबाद में चल सकती है तो दिल्ली में क्यों नहीं चल सकती। निजी गाडिय़ों को सीमित करने और सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा देने का यह एक महत्त्वपूर्ण तरीका है।

दिल्ली की यातायात व्यवस्था को सुधारने का एक बड़ा तरीका यह है कि निजी गाडिय़ों को सम और विषम संख्याओं के आधार पर ही चलने देना। इससे सडक़ पर गाडिय़ों की संख्या आधी हो जाएगी। गाडिय़ों, विशेष कर निजी गाडिय़ों की संख्या को सीमित रखने के और भी दूरगामी उपाय ढूंढे जाने चाहिए।

जहां दिल्ली में प्रवेश करने वाले डीजल के वाहनों पर टैक्स बढ़ाया गया है, वहां डीजल की कार या व्यक्तिगत वाहनों को क्यों मुक्त रखा गया है। कार और विशेषकर बड़ी और लग्जरी कारों पर और टैक्स बढ़ाने की जरूरत है। टीवी व मनोरंजन पर कर बढ़ाना एक उचित कदम है।

बजट का तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए अधिक राशि का आंवटन है। इस वर्ष कुल बजट का 17 प्रतिशत अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निर्धारित किया गया है। इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। दिल्ली जो कि देश की राजधानी है, उसमें स्वास्थ्य की क्या दशा है इसे इसी माह हुई डॉक्टरों की हड़ताल से समझा जा सकता है। इस हड़ताल में डॉक्टरों की मूलत: मांग यह थी कि हस्पतालों में दवाएं, पट्टियां आदि जरूरी चीजों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाया जाए। इसी तरह वे अस्पतालों में संरचनागत व अन्य सुविधाओं की भी मांग कर रहे थे।

राज्य सकार ने इस बजट में लगभग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तीस प्रतिशत वृद्धि करके एक मिसाल कायम की है। यह बात इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार के बजट में कुल सकल घरेलू आय का सिर्फ 0.3 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित किया गया है। मोदी सरकार ने स्वास्थ्य की मद में इस बार लगभग 25 प्रतिशत की कमी की है। इसके पीछे मंशा सरकार की अपनी जिम्मेदारी से बचने के अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी और कॉरपोरेट पूंजी को बढ़ावा देना है, जो कि सिर्फ उसकी सेवा करता है, जिसके पास पैसा हो।

पिछली सभी सरकारें शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य को नजरअंदाज करती रही हैं। बजट में सरकार ने तीन नए अस्पताल तो खोलने की घोषणा की है। ग्यारह अस्पतालों में चार हजार नए बिस्तर भी जोड़े जाएंगे। सबसे अच्छा प्रस्ताव पांच सौ मोहल्ला क्लीनिक खोलने का है। ये ऐसे महत्त्वपूर्ण कदम हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और गरीबों को निजी अस्पतालों द्वारा लूटे जाने से भी बचाएंगे।

वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी कर्तव्य अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन की दिशा तो दुरस्त है, देखना यह है कि इनका कार्यान्वयन कितनी सक्षमता से होता है। क्योंकि छह दशक की हर अच्छी योजना को हमारी जातिवादी भ्रष्ट नौकरशाही और राजनीति के गठजोड़ ने हर बार फेल कर दिया है। अब तो इसमें मुनाफाखोर कारपोरेट जगत भी शामिल है। ऐसे खतरे आम आदमी की सत्ता पर भी लगातार मंडरा रहे हैं।

रोचक, पठनीय और प्रेरक पुस्तक : देवेंद्र मेवाड़ी

Vaigyanikon Ke Rochak Aur Prerak prasang

वरिष्ठ विज्ञान लेखक और वैज्ञानिक श्री सुभाष लखेड़ा लिखित पुस्तक ‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’ इस अर्थ में अपनी तरह की एक अलग पुस्तक है, जो बच्चों से लेकर बड़ी उम्र के जिज्ञासु पाठकों को वैज्ञानिकों के जीवन की रोचक घटनाओं का आनंद तो देती ही है, उन्हें कठिन क्षणों में भी सहज बने रह कर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है। साथ ही, यह आम भ्रम भी तोड़ती है कि वैज्ञानिकों का स्वभाव सामान्य लोगों से कुछ अलग और नीरस होता है। इस भ्रम के पनपने का कारण शायद यह है कि वैज्ञानिक अपने शोध कार्यों में उलझे रहने के कारण सामान्य जन के साथ अधिक घुल-मिल नहीं पाते। लेखक स्वयं एक वैज्ञानिक रहे हैं और उन्होंने वैज्ञानिकों की जीवन-चर्या को करीब से देखा ही नहीं, बल्कि गहराई से महसूस भी किया है इसलिए इस पुस्तक के सभी प्रसंगों के वैज्ञानिक उनकी कलम से पहचाने से लगते हैं।

इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा के बारे में लेखक का कहना है, ‘‘वैज्ञानिक होने के नाते यह स्वाभाविक है कि मेरी दिलचस्पी वैज्ञानिकों से जुड़े ऐसे प्रसंगों में रही, जो रोचक होने के साथ-साथ प्रेरक भी थे।’’ लेखक अनुभव करता है कि महान वैज्ञानिक अपने शोधकार्यों से तो महान होते ही हैं, कुशाग्र बुद्धि होने के कारण उनका हास्य भी अधिक पैना और प्रखर होता है। उनके जीवन की घटनाएं अन्य लोगों को भी जीवन में आगे बढ़ने के लिए नई राह दिखाती है और उनकी हौसला अफजाई करती हैं।

‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’ में श्री सुभाष लखेड़ा ने नामी वैज्ञानिकों के जीवन से जुड़े 123 रोचक तथा प्रेरक प्रसंगों की बानगी पेश की है। इनमें चंद्रशेखर वेंकट रामन, सत्येंद्र नाथ बोस, सतीश धवन, डॉ. आत्माराम, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और दौलत सिंह कोठारी जैसे नामी भारतीय वैज्ञानिक हैं, तो न्यूटन, आइंस्टाइन, विलियम हार्वे, थामस अल्वा एडीसन, माइकेल फैराडे, रदरफोर्ड, मैक्स प्लैंक, बैंजामिन फ्रैंकलिन, कैवेंडिश और सर हम्फ्री डेवी जैसे अनेक वैज्ञानिक शामिल हैं।

इन बहुरंगी प्रेरक प्रसंगों में कहीं उच्च कोटि का हास्य झलकता है तो कहीं तीखे तंज के तेवर दिखाई देते हैं। कई प्रसंग मार्गदर्शन का प्रकाश दिखाते हैं। किसी प्रसंग में वैज्ञानिक के व्यक्तिगत स्वभाव की झलकी मिलती है तो किसी अन्य प्रसंग में वैज्ञानिक की साफगोई और स्वाभिमान भी दिखाई देता है। जैसे- पुस्तक के पहले ही प्रसंग में रंगून में सहायक लेखा महानिदेशक चंद्रशेखर वेंकट रामन से उनका घमंडी अंग्रेज लेखा महानिदेशक चेहरे के सामने फाइल झुलाते हुए कहता है,  ‘‘रामन, जो लाल स्याही की दवात तुम्हारे सामने मेज पर पड़ी है, अगर मैं कहूं कि यह काली स्याही है तो तुम्हें यहीं कहना होगा कि हां, यह काली स्याही है श्रीमान।’’

लेकिन, स्वाभिमानी रामन शांति से उत्तर देते हैं, ‘‘यदि आप ऐसा कहेंगे तो मैं सिर्फ यही कहूंगा कि या तो आप अंधे हैं या पागल अथवा दोनों।’’

इसी तरह जब एक व्यक्ति प्रोफेसर सत्येन्द्र नाथ बोस से अगले दिन एक संगोष्ठी की अध्यक्षता करने के लिए अनुरोध करता है तो वे अपने सहज स्वभाव से उत्तर देते हैं, ”कल आपके यहां जिस समय संगोष्ठी है, मुझे यहां अपने इन मित्रों के साथ कैरम खेलना है। बच्चों के साथ खेलने से अधिक आनंद मुझे और किसी भी कार्य में नहीं आता है।“

एक रोचक प्रसंग में हंगरी के प्रसिद्ध गणितज्ञ पॉल अर्डोस एक बार एक सेमीनार में किसी गणितज्ञ से मिले तो उन्होंने पूछा, ”आप कहां से पधारे हैं?“ गणितज्ञ ने कहा कि वह वेनकुवर से आए हैं। अर्डोस ने तपाक से पूछा, ”तब तो आप मेरे घनिष्ठ मित्र इलियट मैंडेलसन को अवश्य जानते होंगे?’’ ‘‘क्यों नहीं,’’ गणितज्ञ ने कहा, ‘‘मैं ही इलियट मैंडेलसन हूं।’’

लेखक ने अमेरिकी गणितज्ञ और खगोलविद नारबर्ट वाइनर के भुलक्कड़पने का भी एक रोचक किस्सा दिया है। उन्हें घर बदल कर परिवार के साथ कैंब्रिज से न्यूटन शहर जाना था। लेकिन, काम की व्यस्तता के कारण उन्होंने पत्नी से कहा कि वे लोग चले जाएं, वे स्वयं शाम को वहां पहुंच जाएंगे। पत्नी ने न्यूटन शहर में नए घर का पता एक पर्ची में लिख कर उनकी जेब में डाल दिया। वाइनर ने दिन में किसी समय गणित की एक समस्या उस पर्ची पर हल की और संतुष्ट न होने पर पर्ची फाड़ कर फैंक दी। आदतन शाम को वे घर पहुंचे तो याद आया कि उन्हें तो कहीं जाना था। उन्होंने वहां खड़ी एक छोटी लड़की से पूछा, ”बेटी मैं नारबर्ट वाइनर हूं। सामने के घर में रहता हूं। मुझे कहीं जाना था, लेकिन भूल गया हूं। क्या तुम्हें पता है, इस घर के लोग कहां गए हैं?“

बच्ची ने कहा, ”हां पापा, मम्मी को पता था आप भूल जाएंगे। इसलिए वे मुझे यहां छोड़ गई हैं। चलिए, हमें न्यूटन शहर जाना है।“

वैज्ञानिक खोज करते हैं लेकिन रसायन विज्ञानी सर हम्फ्री डेवी से जब पूछा गया कि वे अपनी किस खोज को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, तो उनका जवाब था, ”माइकेल फैराडे!’’ दुनिया जानती है कि हम्फ्री डेवी प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकेल फैराडे के मेंटर थे और उन्होंने फैराडे को आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रेरित किया। दूसरी ओर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जब प्रोफेसर नील रत्न धर ने देखा कि उनका अत्यंत मेधावी शिष्य आत्माराम भोजनालय का खर्च नहीं दे सकता और अपने लिए खाना खुद बनाता है, तो उसे कुछ रुपए देकर वे बोले, ‘‘ये रुपए छात्रावास के भोजनालय के लिए हैं। तुम्हारी फाइनल परीक्षाएं निकट हैं। अब तुम अपने लिए भोजन नहीं बनाना और अपना सारा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाना।“

एक और प्रसंग में पैना मगर छिपा हुआ व्यंग्य दिखाई देता है: एक समारोह में एक भौतिक विज्ञानी बार-बार अपनी डायरी में कुछ नोट करता जा रहा था। आइंस्टाइन ने जब उस वैज्ञानिक से इस बारे में पूछा तो उसने कहा, ”जैसे ही मेरे मस्तिष्क में कोई नया विचार आता है, मैं उसे तत्काल नोट कर लेता हूं। शायद आप भी ऐसा करना चाहेंगे।’’

आइंस्टाइन ने उदास लहजे में कहा, ”मुझे ऐसा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज तक मेरे मस्तिष्क में सिर्फ दो या तीन ही नए विचार आए हैं।“

‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’ पुस्तक में लेखक ने ऐसे ही विविध प्रसंगों का वर्णन किया है जो बालकों और किशोरों से लेकर बडे़ पाठकों के मन को गुदगुदाएंगे और उन्हें प्रेरणा भी देंगे। इस रोचक, पठनीय और प्रेरक पुस्तक के लेखक श्री सुभाष लखेड़ा और प्रकाशक ‘लेखक मंच प्रकाशन’, गाजियाबाद’ को हार्दिक बधाई।

पुस्तक: ‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’

लेखक: सुभाष चंद्र लखेड़ा

प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन,

433, नीतिखंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद – 201014

पहला संस्करणः 2015

पृष्ठः 100

मूल्य: अजिल्द: 80 रुपये

सजिल्द: 150 रुपए

(आवि‍ष्‍कार, जुलाई 2015 से साभार)

कथा कही एक प्राचीन मूर्ति ने : अशोक भौमि‍क

परमार युगीन गणेश मूर्ति !

परमार युगीन गणेश मूर्ति !

 

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘अ’ )

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘अ’ )

पूरे विश्व में मूर्ति कला का एक लम्बा इतिहास हैं। भारतीय महादेश की कला पर बातें, प्रायः चित्रकला तक ही केंद्रित रहती है, पर इस महादेश में मूर्ति कला की अत्यंत विकसित एवं सम्बृद्ध परंपरा रही हैं। हज़ारों वर्षों की भारतीय मूर्तिकला परंपरा में हमें जो सबसे ज्यादा चमकृत करता है, वो है मूर्तिकारों की रचनाशीलता और साहस! जहाँ एक और यह सच हैं कि भारतीय मूर्तिकला का विकास काफी हद तक धार्मिक प्रतिमाओं की रचना के साथ ही हुआ है, वहीं हमें इन अनाम मूर्तिकारों की रचनाओं में धार्मिक विधि-निषेधों से हट कर, प्रयोग करने का साहस भी दिखता है।
ऐसी ही एक मूर्ति है, दसवीं सदी में बनी परमार युगीन गणेश मूर्ति (देखें चित्र) ! इस मूर्ति के बारे में विस्तार से जानने के पहले, हमें यह जानना जरूरी होगा कि मूर्ति निर्माण में मुख्यतः दो प्रकार के तकनीकों का सहारा लिया जाता है। एक अनुवृद्धि या जोड़ना (addition ) और दूसरा, व्यवकलन या घटाना (subtraction)। इसे हम यूँ भी समझ सकते हैं कि जहाँ मूर्ति बनाने की सामग्री (जैसे मिट्टी, प्लास्टर आदि) को, एक तह के ऊपर दूसरे तहों को चढ़ा कर मूर्ति को बनाया जाता है, उसे अनुवृद्धि या जोड़ना (addition ) कहा जाता है। वहीं जब पत्थर या लकड़ी के कुंदे को तराश कर मूर्ति का निर्माण किया जाता है, उस तकनीक को व्यवकलन या घटाना (subtraction) कहते हैं। इन दोनों तकनीकों से हम यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि पत्थर या लकड़ी को तराशने में कहीं कोई गलती हो जाये तो उसे सुधारने की प्रायः कोई गुंजाइश नहीं होती। पर अगर मिट्टी या प्लास्टर से मूर्ति बनाते समय ऐसी गलती हो तो हम इच्छानुसार उस गलती को सहज ही सुधार भी सकते हैं।
इस प्रकार यदि देखा जाये तो मूर्ति कला में यदि अपनी गलती सुधारनी हो तो ‘ घटाना ‘, ‘जोड़ने’ से कहीं ज्यादा मुश्किल ही नहीं होता, बल्कि अधिकांश अवसरों पर यह असंभव सा होता हैं।
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विक्रम विश्वविद्यालय के संग्रहालय में दसवीं सदी की इस गणेश की मूर्ति को शिल्प की दृष्टि से परमार युग का माना जाता हैं। पर इन सब विवरणों से हट कर यदि हम इस मूर्ति को गौर से देखें तो यह मूर्ति अपने में छिपाए हुए दिलचस्प तथ्यों को एक-एक कर हमारे सामने खोलती है। इस मूर्ति को देखने से यह समझने में देर नहीं होती कि इसकी संरचना आम गणेश की प्रतिमाओं से काफी भिन्न होते हुए भी यह निस्संदेह गणेश की ही मूर्ति है। मूर्ति को गौर से देखने से, हमारी नज़र सबसे पहले इसके अस्वाभाविक छोटी सूँड पर रुकती है (देखे चित्र ‘अ’ ) । दरअसल, इस मूर्ति के बनते समय या बाद में इस मूर्ति की सूँड किसी कारण से टूट गई थी । अपने मूल स्वरूप में सूँड का एक अंश मूर्ति के पेट से जुड़ा हुआ था।

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘ब’ )

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘ब’ )

 

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘द’ )

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘द’ )

चित्र ‘ब’ में, सूँड के टूटने से, पेट पर बने अर्ध चंद्राकार चिन्ह को न केवल साफ़ देखा जा सकता है, बल्कि सूँड का आकार और उसके मुड़ने की दिशा का भी पता चलता है। टूटने के बाद सूँड का शेष बचा हिस्सा शायद पूरे सूँड का एक चौथाई हिस्से से भी कम ही रह गया होगा, जिसे मूर्तिकार ने बहुत खूबसूरती से तराश कर मोड़ दिया है। इस प्रयास में उसे सूँड के आकार को नुकीला करना पड़ा। मूर्ति के दोनों दांतों को, गले के बारह दानों या मोतियों के हार, हाथ के ऊपरी हिस्से के कंगनों को, गणेश के पेट और कंधों को जिस सफाई के साथ तराशा गया है, वह सफाई मूर्ति के दूसरे हिस्सों में गैर हाज़िर है। इस मूर्ति का यह एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष है। संभव है कि मूर्ति के सूँड के टूटने के बाद किसी दूसरे मूर्तिकार ने इसकी पुनर्रचना की, और जो, ऊपर दिए गए तथ्य के आधार पर मूल मूर्तिकार से कम निपुण मूर्तिकार रहा होगा।
पर बावजूद इसके, यह स्पष्ट है कि दूसरा मूर्तिकार एक बेहद रचनाशील और साहसिक कलाकार था, क्योंकि उसने-

1. मूर्ति के शेष बचे सूँड के हिस्से को बखूबी तराश कर एक नया रूप दिया था।
2. कोहनी तक अपने स्वाभाविक बनावट के चलते यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि मूर्ति के दोनों हाथों का, मूर्ति के अन्य हिस्सों के साथ सामंजस्य बनाये रखने के लिए हाथों को कोहनियों तक सीमित कर कोहनियों से ही हथेलियाँ बना दी गयी हैं (देखें चित्र ‘द’)।
3. मूर्ति के दोनों हाथ टूट गए थे, या फिर मूर्ति के विभिन्न अंगों में समानता लाने के उद्देश्य से उन्हें तोड़ कर, पुनर्रचना की गयी है, इसके बारे में अनुमान लगाना अर्थहीन है। यहाँ सबसे गौरतलब है कि‍ मूर्तिकार का कोहनी के हिस्से को तराश कर हथेलियों का रूप देना !
4. इसी समानता को हासिल करने के उद्देश्य से, सूँड और हाथों के साथ-साथ मूर्तिकार ने कानों और पैरों (देखें चित्र ‘ स’) की भी पुनर्रचना की। और इस प्रकार मूल मूर्ति को एक सर्वथा नया रूप दिया (देखें चित्र ‘ इ ‘)। क्योंकि, यह शायद अस्वभाविक ही लगता, अगर इतनी छोटी सूँड वाले गणेश के हाथ और पैर लम्बे (या समूचे) होते।
5. यहाँ इस मूर्ति को हम संरचना की दृष्टि से दो हिस्सों में बाँट सकते हैं। मूर्ति के उन अंगों (सीना, पेट और सर) और अलंकारों (माला और बाजूबंद) को रख सकते हैं, जहाँ हमें स्वाभाविक और यथार्थवादी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है। वहीं मूर्ति के अन्य अंगों में (कान, सूँड, हाथों और पैरों) हमें एक दूसरे प्रकार की संरचना दिखती है, जहाँ सभी के आकारों को छोटा किया गया है, जो यथार्थवादी या स्वाभाविक नहीं लगते। इस मूर्ति का महत्व इसीलिए है, क्योंकि यहाँ हम दो विभिन्न प्रकार की संरचनाओं को, एक ही साथ एक ही मूर्ति में उपस्थित पाते हैं, पर बावजूद इसके हमें इन दोनों के बीच सामंजस्य ( harmony) की कमी नहीं खटकती।
6. हम यहाँ एक बार यह भूल जाये कि यह मूर्ति गणेश की है, या वे जो गणेश की मूर्ति के बारे में नहीं जानते, यह मूर्ति कहीं से टूटी या अपूर्ण या अस्वाभाविक नहीं लगती है, बल्कि अपने आप में हम इसे एक नायब कृति के रूप में पाते हैं। एक मूर्तिकार के कुछ नया रचने के साहस के चलते, यह मूर्ति भारतीय मूर्ति कला का एक विरल उदाहरण है। साथ ही यह उस समाज को भी महान बनता है, जिसकी कला चेतना इतनी विकसित थी कि इस रूप में भी मूर्ति को ग्रहण करने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई। वास्तव में यह उस समाज द्वारा मूर्तिकार के साहसिक प्रयोग की स्वीकृति भी है।

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘स’ )

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘स’ )

 

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र  ‘इ’ )

परमार युगीन गणेश मूर्ति (चित्र ‘इ’ )

लोक का आलोक- पहाड़ से

kunwar ravindra

अपनी एकल चित्र एवं कविता-पोस्टर प्रदर्शनी में चित्रकार कुंवर रवीन्द्र।

एक

साहित्य की परिवर्तनकारी भूमिका पर चिन्तन-मनन एवं समकालीन कविता, कहानी एवं आलोचना पर गम्भीर चर्चा-परिचर्चा के उद्देश्य से देश के विभिन्न हिस्सों से प्रतिष्ठित कवियों, कथाकारों, आलोचकों व चित्रकारों का एक सप्ताह के लिए निजी संसाधनों से पिथौरागढ़ में जुटना, ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर पहाड़ की लोक संस्कृति और जीवन संघर्ष से अवगत होना तथा लोक जीवन तथा संस्कृति में आ रहे परिवर्तनों का अध्ययन करना सीमान्त पिथौरागढ़ के लिए तो एक ऐतिहासिक अवसर था ही, साहित्यकारों की लोक प्रतिबद्धता का भी अनूठा उदाहरण था। स्थानीय साहित्यकारों के ‘उत्तराखण्ड लोकतांत्रिक साहित्य-संस्कृति मंच, पिथौरागढ़’ की इस आयोजन के साथ उक्त से इतर भी एक सोच थी कि स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों से संवाद का अवसर मिलेगा, विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकार यहां के अनुभवों को लेकर लौटेंगे तो उन्हें अपनी रचनाओं में दर्ज करेंगे जिससे हमारे अंचल की नैसर्गिक सुषमा एवं सांस्कृतिक सम्पन्नता को पर्यटन के मानचित्र में एक नई पहचान मिल पाएगी और स्थानीय साहित्यकार संगठित होकर भविष्य में जनपद में बेहतर साहित्यिक वातावरण सृजित कर सकेंगे। सुखद है कि आयोजन की सफलता के साथ ही इस सोच की सार्थकता भी दिखाई देने लगी है। 08 जून 2015 को 11.00 बजे पहाड़ी स्थापत्य कला में निर्मित ‘बाखली’ के वृहद् कक्ष में सात दिनी लोक-विमर्श शिविर का आरंभ 17,000 से अधिक चित्रों को अपनी तूलिका से सजा चुके चर्चित चित्रकार कुंवर रवीन्द्र की एकल चित्र एवं कविता-पोस्टर प्रदर्शनी के साथ होना अपने आप में एक रोमांचित करने वाला अनुभव था। उद्घाटन अवसर पर जैसे ही स्थानीय किसान मोहन चन्द्र उप्रेती के हाथ में रिबन काटने के लिए कैंची दी गई और स्थानीय चित्रकार ललित कापड़ी ने किसान के हाथ को सहारा दिया तो लोक-विमर्श लिखे लिफाफे का मजमून सबके लिए खुलता चला गया। ‘बाखली’ में 60 चित्रों से सजी जगमगाती चित्र वीथिका साहित्यकारों के साथ ही नगरवासियों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनी रही। 08 से 13 जून तक इसे देखने के लिए भीड़ जुटी रही। कला-साहित्य प्रेमियों, प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथियों के साथ ही माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थी समूहों एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी प्रदर्शनी का अवलोकन किया। धूमिल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, शील, मान बहादुर सिंह, केशव तिवारी, नवनीत पांडे, महेश पुनेठा, रेखा चमोली सहित हिन्दी के तमाम कवियों के कैनवास पर जीवन के विविध रंग बिखेरते शब्दों की तपिश सभी के अंतस तक पहुँच रही थी। शील की कविता ‘फिरंगी चले गए’ का पोस्टर हो या मान बहादुर सिंह की पंक्तियां- उनकी जिद वेद है/बाइबिल और कुरान है/उनकी जिद गोला और बारूद है; महेश पुनेठा कह रहे हों- ‘जिस वक्त में/कुचले जा रहे हैं फूल/मसली जा रही हैं कलियां/उजाड़े जा रहे हैं वन कानन/वे विमर्श कर रहे हैं/फूलों के रंग- रूप पर’ या फिर धूमिल की ‘अंतर’ हो-‘कोई पहाड़/संगीन की नोक से बड़ा नहीं है/और कोई आंख छोटी नहीं है समुद्र से/यह केवल हमारी प्रतीक्षाओं का अंतर है/जो कभी हमें लोहे या कभी लहरों से जोड़ता है’-सहज ही दिल-दिमाग-दृष्टि पकड़ रहे थे। लोग बरबस ठहर रहे थे। सोच रहे थे। चित्रों में प्रदर्शित स्याह-धूसर रंग पर बातें कर रहे थे। इनमें उन्हें जीवन का संघर्ष दिख रहा था, सो ये चित्र लोगों को उदास कतई नहीं कर रहे थे। बाद में डॉ. जीवन सिंह ने कुछ चित्रों की काली पृष्ठभूमि को उद्धृत करते हुये अपने ब्याख्यान में कहा कि हमारे जीवन में अंदर तक पुत चुका काला रंग वास्तव में चिन्ता का विषय बन चुका है। फतेहपुर से आये साहित्यकार प्रेमनन्दन का कहना था कि कुंवर रवीन्द्र के कविता-पोस्टर, कविता की प्रभावशीलता को बहुगुणित कर देते हैं। शब्दों में निहित ताप जब कैनवास पर रंगों को तपाता है, तो मानो कविता में बिम्ब खिल-खिल उठते हैं और उनकी तपिश महसूस की जा सकती है। चित्र प्रदर्शनी ने स्थानीय मीडिया का ध्यान भी बखूबी आकृष्ट किया। जहां एक ओर इलेक्ट्रानिक मीडिया के विजयवर्धन, मंकेश पंत आदि रवीन्द्र जी से संवाद करते देखे गये तो अमर उजाला ने लिखा- यह प्रदर्शनी कला और कविता को जोड़ने का प्रयास है जो लोगों को सच्चाई का बोध कराती है। दैनिक जागरण के अनुसार प्रदर्शनी कलात्मक एवं सृजनात्मक दोनों पक्षों को आवाज देने में सफल रही और दैनिक हिन्दुस्तान ने इस प्रदर्शनी को साहित्य के विद्यार्थियों के लिए बेहद उपयोगी बताया।

कार्यशाला को संबोधि‍त करते डॉ. जीवन सिंह।

कार्यशाला को संबोधि‍त करते डॉ. जीवन सिंह।

वरिष्ठ श्रमजीवी पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल की अध्यक्षता एवं स्थानीय कवि चिन्तामणि जोशी के संचालन में सम्पन्न द्वितीय सत्र में कवि-आलोचक महेश चन्द्र पुनेठा ने शिविर में प्रतिभाग कर रहे साहित्यकारों का साहित्यिक परिचय देते हुए शिविर की रूपरेखा प्रस्तुत की। हमीरपुर से आये युवा कवि-समीक्षक अनिल अविश्रान्त ने महानगर केन्द्रित छद्म साहित्यिक गतिविधियों एवं साहित्यकारों के नैतिक अवमूल्यन को साहित्य द्वारा परिवर्तनकारी भूमिका न निभा सकने का कारण बताया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता अलवर से आये वरिष्ठ आलोचक डॉ. जीवन सिंह का ‘‘साहित्य की परिवर्तनकारी भूमिका’’ पर लगभग सवा घंटे का व्याख्यान बहुत उपयोगी एवं जानकारीपरक रहा। उन्होंने कहा- सत्ता(राजा) के प्रभाव में रचे गए साहित्य ने सदैव साहित्यकार को ही नहीं, समाज को भी पीछे धकेला है। इससे समाज स्वजीवी के बजाय परोपजीवी बना है। जो साहित्यकार जीवन के जितना पास रहेगा, जिन्दगी की जितनी अधिक चिन्ता करेगा, वह उतना ही बड़ा साहित्यकार बनेगा। मुक्तिबोध को याद करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी कविता को फैलना जरूरी है। कबीर और तुलसी के सृजन से उन्होंने साहित्य की परिवर्तनकारी भूमिका के विविध स्वरूपों को स्पष्ट किया। साहित्यकारों एवं मसिजीवियों से उन्होंने अपेक्षा की कि उन्हें अपने प्रति निरंतर असुविधाजनक प्रश्न उठाने चाहिए। पढ़ा-लिखा वर्ग परिवर्तनकारी भूमिका में हो, न कि लुटेरी। संवाद प्रक्रिया में वरिष्ठ आलोचक ने युवा रचनाकारों दिनेश चन्द्र भट्ट, आशा सौन, विनोद उप्रेती आदि की शंकाओं का समाधान करते हुए कहा कि यदि सामाजिक समानता, स्वतंत्रता एवं मूल्यों को केन्द्र में रखकर साहित्य सृजन किया जाए तो वह परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है। अध्यक्षीय संबोधन में बद्रीदत्त कसनियाल ने आदमी और आदमी के बीच भेद पैदा करने वाली सृजन धारा की कठोर निन्दा की। उन्होंने कहा कि जिन साहित्यकारों को हमारी भावी पीढ़ी अपने पाठ्यक्रम में पढ़ती-समझती है, उन्हें अचानक अपने मूल्य परिवर्तित कर सत्ता से बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त करते देखना बहुत दुखद होता है। रचनाकार का जीवन एवं रचनाकर्म ऐसा हो कि अध्येता उसे लीक से हटकर देखें।

दो

9 जून को प्रातः विभिन्न प्रांतों से आए 19 साहित्यकारों के दल का राजकीय इण्टर कालेज देवलथल पहुँचने पर बाराबीसी उत्थान समिति, स्थानीय जनता तथा विद्यार्थियों द्वारा उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया। परिचयादि संक्षिप्त औपचारिकताओं के पश्चात् साहित्यकारों ने रचना प्रक्रिया पर बच्चों के साथ विस्तार से चर्चा-परिचर्चा की एवं उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया। भोजन के उपरांत साहित्यकारों ने आस-पास के गाँवों का भ्रमण कर ग्रामीणों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने ग्राम्य जीवन, रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति-परंपरा आदि को नजदीक से जानने-समझने का प्रयास किया। एक विवाह समारोह में पारंपरिक छलिया लोक नृत्य का आनन्द लिया। हल-बैल, खेत-बटिया, हिसालू-किरमोड़ा, धारा-नौला-डिग्गी से साक्षात्कार किया।

तीन

10 जून को आचार्य उमाशंकर सिंह परमार ने लोक के आलोक में प्रथम सत्र की भूमिका प्रस्तुत की और ‘साहित्य की लोकधर्मी चेतना’ पर डॉ. जीवन सिंह का व्याख्यान हुआ। श्री सिंह ने स्पष्ट किया कि लोकधर्मी चेतना के साथ सृजित साहित्य जीवन के बहुत बड़े और विस्तृत फलक पर अंकित साहित्य है। रीति कविता एक सिमटी-सिकुड़ी दुनिया की कविता है, जबकि उससे ठीक पहले की भक्ति कविता में केवल राजा का ही नहीं, प्रजा का जीवन भी उतनी ही महिमा और महत्व के साथ चित्रित है। उन्होंपने संस्कृति को संवारने में पहाड़ों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पहाड़ ही नदियों के जनक हैं और नदियों के परितः ही साहित्य, संस्कृति व सभ्यता विकसित हुई है। द्वितीय सत्र में रमेश भट्ट की अध्यक्षता एवं मृदुला शुक्ला के संचालन में केशव तिवारी, महेश पुनेठा, प्रेम नंदन, चिन्तामणि जोशी, मृदुला शुक्ला, रश्मि भारद्वाज, कुंवर रवीन्द्र, अनिल अविश्रांत, जनार्दन उप्रेती, नवनीत पांडे, आशा सौन, जयमाला देवलाल एवं प्रकाश जोशी ने अपनी पांच-पांच कविताओं का पाठ किया। राजकुमार राकेश की अध्यक्षता में तृतीय सत्र में कविताओं की समीक्षा की गई। डॉ. जीवन सिंह ने समीक्षा सत्र का प्रारंभ करते हुए कहा कि ज्यादातर कविताएं सामान्य जमीन पर लिखीं गई हैं। कवि की अपनी विशिष्ट जमीन होनी चाहिए। आलोचक आपकी कविता में जिन्दगी को तौलता है। आज के कवि कविता के डिक्शन पर कम मेहनत करते हैं। निराला का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिसको कवित्त छंद का अभ्यास होगा, वह ही मुक्त छंद में रचना कर सकता है। अजीत प्रियदर्शी, उमाशंकर परमार एवं संदीप मील ने भी पढ़ी गई कविताओं की अलग-अलग समीक्षा प्रस्तुत की। अजीत प्रियदर्शी का मत था- ‘आज कविता एक खास तरह के फॉर्मेट में जकड़ गई है। लगभग एक जैसी भाषा, एक जैसा शिल्प और उस पर विषय की एकरूपता सब कुछ एक कर देती है। यही कारण है कि हर कविता पहले की कविता का दोहराव नजर आती है।

चार

11 जून का प्रथम सत्र वरिष्ठ कथाकार राजकुमार राकेश की अध्यक्षता में कथा साहित्य पर चर्चा-परिचर्चा का रहा। आउटलुक पत्रिका के भूपेन सिंह इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। राजकुमार राकेश के उपन्यास ‘कन्दील’ पर चर्चा की गई। अजीत प्रियदर्शी ने कहा- ‘कन्दील आजाद हिन्दुस्तान की दर्दनाक गाथा है।’ शिवेन्द्र और संदीप मील ने बहुत प्रभावशाली ढंग से अपनी-अपनी कहानियों का पाठ किया। संवादों के माध्यम से कहानी के पात्रों का लोक जीवन एक बारगी शिविर में सजीव हो उठा। अजीत प्रियदर्शी, उमाशंकर परमार एवं राजकुमार राकेश ने पढ़ी गई कहानियों पर परिचर्चा की। अजीत प्रियदर्शी ने कहा- संदीप मील की कहानियां डायलैक्टिक नजरिए से व्यवस्था का मूल्यांकन हैं। ये फिरकापरस्ती के खिलाफ संदेश देती हैं। राजकुमार राकेश ने कहा- संदीप मील की कहानियों को आवारा पूंजी व सत्ता के गठजोड़ से तथा साम्प्रदायिक एजेण्डे से जोड़कर देखा जाना चाहिए। द्वितीय सत्र में महेश पुनेठा के संचालन में दीवार पत्रिका अभियान पर चर्चा हुई। उन्होंयने बच्चों की रचनात्मकता को मंच देने एवं उनकी भाषायी दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से विद्यालयों में प्रारंभ किए गए नवाचारी दीवार पत्रिका अभियान की जानकारी साहित्यकारों को दी। असिस्टेंट प्रोफेसर विधांशु कुमार के साथ साहित्यकारों ने विद्यार्थियों द्वारा तैयार दीवार पत्रिकाओं का अवलोकन किया। दीवार पत्रिका पर साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं अभियान को ऊर्जा प्रदान करने वाली हैं। बांदा से आए नारायण दास ने कहा- ‘दीवार पत्रिका में अपने क्षेत्र की संस्कृति पर बच्चों का लेखन बहुत प्रभावित करता है।’ दिल्ली की रश्मि भारद्वाज ने इसे रचनात्मकता के विकास के लिए बेहतरीन प्रयास बताया, तो फतेहपुर से पधारे प्रेमनंदन ने लिखा- ‘दीवार पत्रिका बच्चों को सृजनशील, संवेदनशील, कर्मठ एवं जिम्मेदार बनाने का एक सार्थक प्रयास है।’ हमीरपुर डिग्री कालेज के असिस्टेंट प्रोफेसर अनिल अविश्रांत अपनी प्रतिक्रिया में लिखते हैं कि यह कार्य विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम से इतर भी बहुत कुछ पढ़ने-समझने का अवसर प्रदान करता है। बीकानेर के नवनीत पांडे ने दीवार पत्रिका अभियान को आज के कठिन समय में बहुत जरूरी और प्रासंगिक बताया। उल्लेखनीय है कि विद्यालयों में दीवार पत्रिका के नवाचार को वर्ष 2013 में पिथौरागढ़ जनपद के नवाचारी शिक्षकों चिन्तामणि जोशी, राजीव जोशी, योगेश पांडेय ने शिक्षक एवं ‘शैक्षिक दखल’ के संपादक महेश चन्द्र पुनेठा के मार्ग निर्देशन में एक अभियान के रूप में प्रारंभ किया था। वर्तमान में यह अभियान सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में प्रसार पाते हुए देश के विविध हिस्सों से होते हुए मलेशिया तक जा पहुँचा है। प्रशिक्षण संस्थानों, महाविद्यालयों सहित लगभग 500 विद्यालयों से नियमित दीवार पत्रिकाएं निकल रही हैं। महेश चन्द्र पुनेठा द्वारा लिखित एवं लेखक मंच प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक ‘दीवार पत्रिका एवं रचनात्मकता’ के आने के बाद इस अभियान में सहज ग्राह्यता एवं गतिशीलता आई है। इस शिविर के माध्यम से चूंकि साहित्यकार भी इस अभियान में शामिल हो रहे हैं, आशा की जा सकती है कि‍ दीवारें साहित्यकारों की नई पीढी को तैयार करेंगी।

पांच

11 जून की रात भोजनोपरांत 11.00 बजे बाद साहित्यकार साथियों द्वारा रंगमंच से जुड़े कवि नवनीत की कविताओं पर परिचर्चा शायद उस सपने की तरह थी, जिसे हम नींद में तो नहीं देखते, पर जो हमें सोने भी नहीं देता। बहरहाल 12 जून को प्रातः तड़के ही साहित्यकारों का दल शैक्षिक दखल के साथी राजीव जोशी के मार्गदर्शन में मुनस्यारी की ओर रवाना हो गया। इस यात्रा में जहां एक ओर साहित्यकारों को हर मोड़ पर पहाड़ के समृद्ध प्राकृतिक सौन्दर्य से दो-चार होने का अवसर मिला, वहीं मुनस्यारी पहुँचने पर उन्हें स्थानीय लोक कलाकारों से संवाद एवं लोक गीतों का आनन्द उठाने का अवसर भी प्राप्त हुआ। मुन्स्यारी में साहित्यकारों ने शेर सिंह पांगती के ट्रायबल हैरीटेज म्यूजियम पहुँचकर जोहार-मुनस्यार की लोक संस्कृति पर विस्तृत जानकारी एकत्र की एवं सायंकालीन सत्र मंं जोहार लोक कला एवं भाषा पर परिचर्चा की।

छः

शिविर के समापन दिवस 13 जून को साहित्यकारों ने मुनस्यारी से पिथौरागढ़ पहुँचकर स्थानीय मिशन इण्टर कॉलेज में दोपहर 1.00 बजे से 3.00 बजे तक अपने अनुभवों पर आधारित दीवार पत्रिकाएं लोक-विमर्श- 1 , 2 एवं 3 तैयार कीं, जो कि लोक-विमर्श: 1 के महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में संरक्षित की जाएंगी। लोक-विमर्श-1 का समापन सत्र सायं 4.00 बजे से स्थानीय जिला पंचायत सभागार में सम्पन्न हुआ। जनकवि जनार्दन उप्रेती एवं उमाशंकर परमार के संचालन में रात्रि 9.00 बजे तक चली काव्य संध्या में 30 कवियों ने कविताओं के माध्यम से अपने-अपने लोक के रंग बिखेर कर श्रोताओं को आनन्दित किया। कवियों ने तमाम सामाजिक विसंगतियों एवं कुरीतियों पर भी तंज कसे। वरिष्ठ कवियों केशव तिवारी, नवनीत पांडे, महेश पुनेठा के साथ कुंवर रवीन्द्र, मृदुला शुक्ला, रश्मि भारद्वाज प्रेम नन्दन, प्रद्युम्न कुमार, चिन्तामणि जोशी, गिरीश पांडेय ‘प्रतीक’, आशा सौन, अनिल कार्की, प्रमोद श्रोत्रिय, प्रकाश जोशी ‘शूल’, विक्रम नेगी ने हिन्दी कविताएं पढ़ीं, तो जनार्दन उप्रेती ‘जन्नू दा’ व प्रकाश चन्द्र पुनेठा ने कुमांऊनी कविताओं एवं नवीन गुमनाम, प्रो. आशुतोष, बी.एल. रोशन ने गजल से समां बांधा। समापन सत्र के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कहानीकार राजकुमार राकेश ने लोक-विमर्श शिविर को सफल बताते हुए उत्तराखण्ड लोकतांत्रिक साहित्य-संस्कृति मंच पिथौरागढ़ का आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि यह लोक-विमर्श यात्रा रचनाकारों एवं समाज के लिए भविष्य में मील का पत्थर साबित होगी। मंच के संयोजक जनार्दन उप्रेती ने शिविर की सफलता में सहयोग के लिए नगर के साहित्य प्रेमी नागरिकों, मीडिया तथा सभी सहयोगियों के प्रति आभार ज्ञापित किया। अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ कवयित्री डॉ. आनन्दी जोशी ने अतिथि साहित्यकारों के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि कवि महेश पुनेठा के समन्वयन में सभी के सहयोग से सृजन यात्रा चल पड़ी है, जो अनवरत चलती रहेगी और वरिष्ठ साहित्यकारों के सान्निध्य में नवोदित रचनाकारों का शिल्प और उनकी कला भी विकसित होती रहेगी। संवाद बनाये रखने एवं पुनः मिलने के संकल्प के साथ यह एक शुरूआत थी- उस यात्रा की- जिसमें अनवरत तलाशा जाएगा- लोक का आलोक….. Deewar Patrika
प्रस्तुति‍ :
चिन्तामणि जोशी, संयोजक सचिव, उत्तराखण्ड लोकतांत्रिक साहित्य-संस्कृति मंच, पिथौरागढ