Archive for: June 2015

बिन पुस्तक जीवन ऐसा, बिन खिड़की घर जैसा : आकाश सारस्वत

आकाश सारस्वत

आकाश सारस्वत


बागेश्ववर जि‍ले के गरूड़ में नि‍युक्त खंड शि‍क्षा अधि‍कारी आकाश सारस्वत शि‍क्षा को सहज-सरल बनाने के लि‍ए सक्रि‍य हैं। इसके तहत उन्होंने अपने क्षेत्र में स्थित स्कूलों में पुस्तकालयों को सक्रि‍य कि‍या और पुस्तक संस्कृति‍ को बढ़ावा दि‍या। इसके बहुत अच्छे परि‍णाम सामने आए हैं। उनका आलेख-

शि‍क्षकों और विद्यार्थियों दोनों को ही ज्ञान के स्रोत के लिए, आनंद के लिए पुस्तकालय का उपयोग करने को अभिप्रेरित और प्रशि‍क्षित किया जाना चाहिए। स्कूल पुस्तकालय की कल्पना एक ऐसे बौद्धिक स्थल के रूप में की जानी चाहिए जहां शि‍क्षक, विद्यार्थी और निकटस्थ समुदाय के लोग ज्ञान के गहरे अर्थों और कल्पनाशीलता की तलाश को आएं। किताबों के सूचीकरण और अन्य व्यवस्थाओं को वहां इस प्रकार विकसित किया जाना चाहिए कि बच्चे आत्मनिर्भर पुस्तकालय उपयोगकर्त्ता बन सकें।– एन.सी.एफ.-2005

पुस्तकों का महत्व सार्वकालिक है। पुस्तकों के बिना ज्ञान-विज्ञान की बात करना संभव ही नहीं है। पुस्तकें ही विवेकशील और संवेदनशील नागरिक तैयार करती हैं। अतः पुस्तक व पुस्तकालय व्यक्तित्व विकास हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती जनपद बागेश्वकर के गरूड़ विकासखंड में पदस्थापित होने पर मैंने जब विद्यालयों का भ्रमण किया तो पाया कि पुस्तकों और पुस्तकालयों का प्रयोग न तो अध्यापकों द्वारा और न ही छात्र-छात्राओं द्वारा किया जा रहा है। वे पाठ्यक्रम की पुस्तकों तक ही सीमित हैं। अन्य पुस्तकों के प्रति पूर्ण रूप से उदासीन हैं। जबकि प्रत्येक हाईस्कूल व इंटरमीडिएट विद्यालयों में कम-से-कम तीन सौ से लेकर आठ सौ तक पुस्तकें उपलब्ध थीं, तो प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सौ से तीन सौ तक, लेकिन ये किताबें आलमारी या बॉक्स में बंद थीं। कहीं धूल जमी थी तो कहीं दीमकें उन्हें पढ़ रही थीं। कहीं आलमारी में पड़ी-पड़ी सीलन से खराब हो रही थीं। पुस्तकों की ऐसी दुर्गति देखकर मन बहुत व्यथित हुआ। मैंने निश्चआय किया कि इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ करना होगा। जल्दी ही बातचीत प्रारम्भ की। सभी विद्यालयों के संस्थाध्यक्षों को पुस्तकालय को सुव्यवस्थित करने और बच्चों को वितरित करने के लिए प्रेरित किया। सुझाव दिया कि निष्क्रिा‍य पुस्तकालयों को सक्रिय कर स्वयं भी पढ़ें और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके लिए अध्यापक और विद्यार्थी वितरण पंजिका अलग-अलग तैयार की जाए। साथ ही जहां पर विद्यालयों में अतिरिक्त कक्ष उपलब्ध थे, वहां पर पुस्तकालय कक्ष स्थापित करने का सुझाव दिया। जब भी मैं विद्यालय भ्रमण पर जाता, अवश्यर ही पुस्तकालय का अवलोकन करता और आवश्यबक सुझाव दिया करता। मैंने पाया कि किताबें अब पुस्तकालयों से बाहर निकलने लगी थीं। शि‍क्षक और बच्चे उन्हें घर भी ले जाने लगे। समय पर उन्हें वापस भी किया जाने लगा।

लगातार एक वर्ष तक प्रयास करने पर पाया कि पूरे विकासखंड में प्राथमिक से लेकर इंटरमीडिएट तक के लगभग दो सौ विद्यालयों में पुस्तकालय सक्रिय हो गए। विद्यालय भ्रमण के दौरान मेरी पूरी कोशि‍श रहती है कि अध्यापक व छात्र वितरण पंजिका की समीक्षा की जाए। अध्यापकों को यह अच्छा लगता है कि कोई अधिकारी विद्यालय में आकर केवल उपस्थिति पंजिका या आय-व्यय पंजिका ही नहीं देखता है, बल्कि पुस्तक वितरण पंजिका भी देखता है तथा पुस्तकालय और पुस्तकों के बारे में भी बातें करता है। अधिकाधिक पुस्तकें पढ़ने हेतु अध्यापकों व छात्र-छात्राओं की सराहना की जाती है। इससे पढ़ने-पढ़ाने का बड़ा ही अच्छा वातावरण निर्मित होने लगा है। छात्र-छात्राओं के सामान्य ज्ञान में भी आशातीत वृद्धि होने लगी है। वे न केवल स्कूली परीक्षाओं में अपितु अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बेहतर प्रदर्शन करने लगे हैं। वर्ष-दर-वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में बच्चों की भागीदारी और सफलता दर में भी वृद्धि होने लगी है। साथ ही विद्यालयों के नीरस वातावरण में भी सरसता आने लगी है। अध्यापकों में एक नए उत्साह का संचार हुआ है। नित नवाचार करने को प्रोत्साहित हो रहे हैं। विद्यालयों में उपलब्ध पुस्तकों का अधिकाधिक लाभ होने लगा है।

विद्यालय भ्रमण के दौरान मैंने छात्र-छात्राओं से बात करते हुए यह महसूस किया कि पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़-पढ़कर बच्चे ऊब चुके थे। वे नयापन चाहते थे। अब कहानी-कविता एवं ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों को पढ़ते हुए उन्हें ताजगी महसूस हो रही है। इन पुस्तकों को सभी बच्चे बड़ी रुचि और एकाग्रता के साथ पढ़ने लगे हैं। उनमें वर्णित घटनाओं और तथ्यों को लंबे समय तक याद रखने लगे हैं। बच्चों का आत्मविष्वास बढ़ा है। अपने पाठ्यपुस्तक में दिए गए किसी संदर्भ पुस्तक को पुस्तकालय में जाकर पढ़ने के लिए लेने लगे हैं। पाठ्यक्रम से जुड़ी वि‍षयवस्तु को अधिक व्यापकता और गहराई से जानने के लिए पुस्तकालय का इस्तेमाल करने लगे हैं। पाठ्यपुस्तक से इतर पुस्तकें पढ़ने से बच्चों की भाषायी दक्षता में तो वृद्धि हो ही रही है, साथ ही उनकी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता भी बढ़ी है।

पुस्तकालय सक्रियता का असर समाज के अन्य लोगों पर भी दिखाई दे रहा है। लोग सहयोग के लिए भी आगे आ रहे हैं। इस संदर्भ में यहां मैं राजकीय इंटर कालेज, कौसानी के एक अनुभव को अवश्य साझा करना चाहूंगा। जब मैं इस विद्यालय के भ्रमण में गया तो पाया कि वहां पर पुस्तकालय में लगभग आठ सौ से अधिक पुस्तकें थीं, लेकिन अन्य बहुत सारे विद्यालयों की तरह ही पुस्तकालय सक्रिय स्थिति में नहीं था। मैंने पुस्तकालय की सक्रियता के वि‍षय में विद्यालय के प्रधानाचार्य रमेश चंद्र जोशी जी से व्यापक चर्चा की। श्री जोशी कर्मठ, अनुशासन प्रिय और जिज्ञासु थे। उन्हें मेरी बात पसंद आई। उन्होंने उस पर अमल किया। एक माह पश्चात जब मेरा दुबारा उस विद्यालय जाना हुआ, तो मैंने पाया कि न केवल पुस्तकालय कक्ष की व्यवस्था कर दी थी, बल्कि पुस्तकों में रुचि रखने वाली एक सक्रिय अध्यापिका को प्रभारी व दूसरी अध्यापिका को सह प्रभारी बना दिया था। दोनों अध्यापिकाएं पुस्तकालय को सुव्यवस्थित करने में जुटी थीं। पुस्तकालय सक्रिय होने के मात्र दो वर्षों के भीतर विद्यालय के हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा के परीक्षाफल में आशा से अधिक सफलता प्राप्त हुई। इसी बीच प्रधानाचार्य जोशी जी ने मुझे एक मजेदार घटना के बारे में बताया। जैसा कि यह विद्यालय प्रमुख पर्यटक स्थल कौसानी के राज्य अतिथि गृह के निकट अवस्थित है। एक दिन प्रार्थना सभा चल रही थी। एक पर्यटक सुबह के समय अपनी 16 वर्षीय पुत्री के साथ घूमते-घूमते वहां आ पहुंचे। उन्होंने प्रार्थना सभा के समस्त क्रियाकलापों को देखा। वह प्रभावित हुए। प्रधानाचार्य जोशी जी उन्हें बाद में पुस्तकालय दिखाने ले गए। वह सज्जन पुस्तकालय देखकर इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने तत्काल और अधिक पुस्तकें खरीदने के लिए अपने जेब से दस हजार रुपए निकालकर दे दिए। जोशी जी के बार-बार मना करने के बावजूद वह नहीं माने। थक हार कर जोशी जी को वह धनराशि‍ पकड़नी ही पड़ी।

पुस्तकालय सक्रिय करने से एक अच्छी बात यह भी हुई है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में जहां बहुत कम संख्या में अध्यापक तैनात हैं, कभी-कभी जब कोई अध्यापक अवकाश में होता है तो उस कक्षा के बच्चों को पढ़ने हेतु पुस्तकें दे दी जातीं, तो वे शांतिपूर्वक उन पुस्तकों को पढ़ते रहते हैं। बच्चों में स्वाध्याय की प्रवृति पैदा हो रही है। पहले इन स्कूलों के अध्यापकों में एक डर था कि बच्चों को किताबें देने पर कहीं किताब फट या खो गई तो उन्हें किताब की कीमत भरनी पड़ेगी। मैंने बातचीत के द्वारा उनके इस डर को दूर किया जिसका परिणाम यह हुआ कि किताबें बेझिक बच्चों के हाथों में जाने लगीं। वे खाली वादनों में भी पुस्तकालय से किताबें लेकर पढ़ने लगे।

अपने इस अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि पुस्तकों का कोई भी विकल्प नहीं है। सरकारी शि‍क्षा व्यवस्था को सृदृढ़ बनाने हेतु सभी विद्यालयों में पुस्तकालयों को सक्रिय करना अति आवश्य।क ही नहीं अनिवार्य है, क्योंकि आज भी समाज की अंतिम पंक्ति का बालक मात्र सरकारी विद्यालयों में ही मिलता है। मेरा प्रयास है कि अगले चरण में प्रत्येक विद्यालय में पुस्तकालय को किताबों से समृद्ध किया जाए और कपकोट तथा गरूड़, दोनों विकासखंडों में एक-एक सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना की जाए। इसके लिए मैं जनप्रतिनिधियों से बातचीत कर रहा हूं कि वे पुस्तकालयों में पुस्तकें उपलब्ध करवाने में सहयोग करें। समाज के प्रबुद्ध लोगों से भी पुस्तकें दान करने की अपील करूंगा। स्कूलों में ही नहीं, स्कूलों से बाहर भी हमें पढ़ने-लिखने का वातावरण निर्माण करना है। मेरा दृढ़ विश्वांस है कि लोग पढ़ते हैं, उन तक अच्छा साहित्य पहुंचाने की जरूरत भर है।

(शैक्षि‍क दखल के जुलाई 2015 अंक से साभार)

परीक्षाओं के घोटाले : प्रेमपाल शर्मा

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शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब देश में चल रही परीक्षाओं को लेकर कोई न कोई घोटाला सामने न आता हो। पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निग के कई पेपर एक के बाद एक लीक हुए। ठीक इसी वक्त मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में हुई धांधली का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने है, जिसने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले के बारे में पूरा देश जानता है कि कैसे वर्षो से मेडिकल कॉलेजों की सीटें भरी जाती थीं। बेईमानी की एक से एक युक्तियां सामने आ रही हैं। कभी पर्चा लीक होता है तो कभी उत्तर पुस्तिका खाली छोड़ दी जाती है, ताकि इन्हें मनमर्जी तरीके से भरकर धांधली कराई जा सके।

दो वर्ष पहले एम्स और चंडीगढ़ की डॉक्टरी की स्नातकोत्तर परीक्षा में ब्लूटूथ और आइटी के नए औजारों के प्रयोग के मामले सामने आए थे। आखिर यह सब कब तक होता रहेगा? नई पीढ़ी की आस्था शिक्षण, शोध, मेहनत, नैतिकता जैसे शब्दों पर कैसे टिकेगी? क्या दुनिया भर में सम्मान पाने वाले भारतीय युवा परीक्षाओं में होने वाले ऐसे घोटालों के चलते अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर अपेक्षित सम्मान हासिल कर पाएंगे? क्या इतने बड़े देश का युवा संसाधन इस छोटी सी समस्या के आगे असहाय हो चुका है? अब वक्त आ गया है जब केंद्र सरकार सख्त से सख्त कानून बनाकर हस्तक्षेप करे।

शिक्षा भले ही राज्यों की समवर्ती सूची का विषय हो, लेकिन यदि उससे पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था चौपट हो रही है तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रलय हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता। पिछले दिनों दसवीं, बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं में बिहार, उत्तर प्रदेश की तस्वीरें आपने देखी होंगी कि कैसे पूरा तंत्र नकल और धांधली में लिप्त था। अफसोस की बात यह है कि देश के कुछ राजनेता तक वोट की खातिर शिक्षा की इन बुराइयों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर बार मीडिया अपनी भूमिका निभाता है, पूरे षड्यंत्र पर अंगुली उठाता है, लेकिन शासन के कान पर जूं नहीं रेंगती। दंभ में डूबे लोग छाती ठोककर खुलेआम नकल का वादा करते हैं। शायद इसी के चलते पिछले दस वर्षो में भारतीय शिक्षा संस्थान दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पहले दो सौ संस्थानों की सूची में जगह बना पाने में नाकाम रहे हैं।

क्या परीक्षा आयोजित कराने के लिए भी विदेशी कंपनियों को लगाने की जरूरत है? क्या इंजीनियरिंग, डॉक्टरी या दूसरी परीक्षाओं में रोज-रोज बढ़ती ऐसी घटनाएं नकल और बेईमानी की इन्हीं प्रवृत्तियों का विस्तार नही हैं? जिस तरह नकल के बूते दसवीं, बारहवीं की परीक्षाएं ऐसे लोग उत्तीर्ण करते हैं, लगभग वैसे ही तौर-तरीकों को वे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आजमाते हैं। व्यवस्था की कमजोरी यही है कि इनमें लिप्त अपराधियों को कड़ा दंड नहीं मिलता, वरना पिछले दशकों में ऐसी घटनाओं की बाढ़ नहीं आती। बहुत दिन नहीं बीते, जब प्रबंधन के सर्वोच्च संस्थान आइआइएम में दाखिले के लिए होने वाली कैट परीक्षा में भी धांधली का मामला सामने आया था। अपराधी था, नालंदा का रंजीत सिंह डॉन। वह ऐसे ही घोटाले से डॉक्टर बना था, लेकिन बैंक, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी समेत सभी परीक्षाओं में धांधली बिल्कुल समाजवादी अंदाज में करता था। बाद में वह पकड़ा तो गया, लेकिन यदि उसे ऐसा दंड दिया जाता जिससे पूरे देश में संदेश जाता तो ऐसे कामों को दोबारा करने की हिम्मत शायद ही कोई अन्य जुटा पाता।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला शिक्षकों की भर्ती घोटाले के मामले में एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के साथ सजा भुगत रहे हैं, लेकिन अपराधियों में न्याय व्यवस्था ऐसा भय नहीं पैदा कर पाई कि ये फिर से ऐसी जुर्रत न करें। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने ऐसा समाज बनाया है जहां नकल, चोरी, धांधली जैसी वारदातों को अपराध ही नहीं माना जाता हो। पिछले वर्ष कुछ शब्दों की चोरी के आरोप में भारतीय मूल के प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार फरीद जकारिया को अमेरिका की टाइम पत्रिका ने तुरंत तलब किया और संतुष्ट होने तक उनके सभी लेखों के प्रकाशन-प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया था। दुनिया भर के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों में ऐसे सॉफ्टवेयर हैं जहां शोध आदि में एक शब्द भी चोरी नहीं कर सकते हैं। एक ओर हमारे विश्वविद्यालय हैं जहां पूरे के पूरे शोध प्रबंध ही उड़ा लिए जाते हैं। पिछले दिनों उत्तर पूर्व के एक फर्जी विश्वविद्यालय द्वारा एक वर्ष में तीन सौ से ज्यादा पीएचडी डिग्री देने की खबर तो शायद दुनिया भर के शोध इतिहास में अनोखी है। और तो और दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले उपकुलपति भी वनस्पति शास्त्र के एक शोधपत्र के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के सामने सफाई दे रहे हैं।

पिछले दिनों ऐसी ही एक खबर आई कि दक्षिण भारत में एक न्यायाधीश नकल करते पकड़े गए। उस खबर को भी जनता नहीं भूली होगी जब दिल्ली में बैठे एक पुलिस अधिकारी की पत्नी ने बिना बिहार गए ही एमए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। ऐसे मामलों पर कुछ दिन या कहिए कुछ घंटे ही शोर मचता है। क्या येन-केन डिग्री हासिल करना ही शिक्षा का मकसद रह गया है और जब शीर्ष पर बैठे कर्णधार भी उसमें लिप्त हों तो अव्यवस्था के अंधेरे की कल्पना की जा सकती है। दिल्ली के एक मंत्री की डिग्रियों का मामला भी इसी कड़ी का उदाहरण है। संघ लोक सेवा आयोग, आइआइटी जैसी एकाध परीक्षा जरूर उम्मीद जगाती हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी का जिस तेजी से विस्तार हो रहा है और ठग जितने चुस्त-दुरुस्त हैं, व्यवस्था को भी उतनी चुस्ती से उसका मुकाबला करना होगा। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कड़े से कड़े दंड की व्यवस्था। एक और महत्वपूर्ण पक्ष पर विचार करने की जरूरत है और वह है आखिर बार-बार इतनी परीक्षाएं क्यों? दिल्ली या दूसरे विश्वविद्यालय ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाते कि स्नातकोत्तर या दूसरे पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा के आधार पर हो और स्नातक में बारहवीं बोर्ड के आधार पर। तमिलनाडु सरकार इंजीनियरिंग में दाखिले तमिलनाडु बोर्ड की परीक्षा के आधार पर कर रही है और परिणाम बहुत अच्छे रहे हैं। ऐसा ही और जगह भी होना चाहिए।

अकेले टेक्नोलॉजी नहीं है स्कूलों की बीमारी का इलाज : केंटारो टोयामा

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सन 2013 के बसंत में मैंने एक महीने तक अपनी सुबहें लेकसाइड स्कूल में बिताईं। यह सिआटल का एक प्राइवेट स्कूल है, जहां प्रशांत उत्तरपश्‍चि‍म में रहने वाले भद्रलोक के बच्चे पढ़ते हैं। लाल ईंटों से बना स्कूल का आलीशान परिसर किसी आईवी लीग कॉलेज जैसा भव्य दिखाई देता है और इसकी फीस भी उन्हीं जैसी है। इस स्कूल में गिल गेट्स ने पढ़ा है और यहां अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट के अफसरों के बच्चे पढ़ने आते हैं। जाहिर है, स्कूल में टेक्नोलॉजी की कोई कमी नहीं- शिक्षक स्कूल के इन्टरनेट पर एसाइनमेंट्स पोस्ट करते हैं;  ई-मेल से कक्षाओं को निर्देश देते हैं;  और हर बच्चा लैपटॉप (अनिवार्यतः) और स्मार्टफोन (अनिवार्य नहीं) लेकर स्कूल पहुंचता है।

इस पसमंजर में इनके माता-पिता क्या रुख रहता है, जब वे सोचते हैं कि उनके बच्चों को थोड़ी और खुराक की जरूरत है? मैं यहां एक वैकल्पिक शिक्षक के तौर पर गया था और मुझे कई स्तर के बच्चों की मदद करनी थी। इनमें से कुछ कैलकुलस ऑनर्स करना चाहते थे। ये मेहनती छात्र थे लेकिन उन्हें महज एक शाबासी देने वाले की जरूरत थी, क्योंकि वे कठिन सवालों पर काम कर रहे थे। भारी शिक्षणेत्तर गतिविधियों के बोझ से दबे कुछ अन्य छात्र ज्यामिति और बीजगणित के साथ जूझ रहे थे। मैं इसके लिए आवश्यक सामग्री के चयन और उनके असाइनमेंट्स में उन्हें मदद करता था। एक अन्य समूह को किसी ख़ास मदद की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस थोड़ा-बहुत उकसाना पड़ता था ताकि समय पर अपना होमवर्क पूरा कर लें। इतनी विविधता के बावजूद छात्रों में एक बात समान थी- उनके माता-पिता अतिरिक्त पढ़ाई के लिए खुलकर पैसा खर्च कर रहे थे।

मैंने जो कुछ पढ़ाया वह गणित की वेबसाइट्स और खान एकेडमी के फ्री वीडियोज में उपलब्ध था। इतना ही नहीं, हर छात्र को पूरे वक्त इन्टरनेट सेवा मिलती थी। इतनी सारी टेक्नोलॉजी और 9:1 के शानदार शिक्षक-छात्र अनुपात के बावजूद वहां के अभिभावक चाहते थे कि उनके नौनिहालों को किसी वयस्क की ओर से थोड़े और मार्गदर्शन की जरूरत है।

लेकसाइड स्कूल के अभिभावक टेक्नोलॉजी के बजाय बड़ों के मूल्यवान मार्गदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने के मामले में अकेले नहीं हैं। दूसरे पढ़े-लिखे पेशेवर अभिभावक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। सिलिकन वैली के अधिकारी अपने बच्चों को वालड्राफ़ स्कूल में पढ़ाते हैं। इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध है। स्टीव जॉब्स ने एक बार स्वीकार किया था कि ‘वह अपने बच्चों को आई-पैड नहीं देते। घर पर बच्चे कितनी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करेंगे, हमने इसकी सीमा तय की हुई है।’

ये माता-पिता टेक्नोलॉजी विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनके काम के देखते हुए उन्हें डिजिटल धर्म का समर्पित प्रचारक कहा जा सकता है। लेकिन वे स्पष्टतः इस बात में विश्वास नहीं करते कि ज्यादा मशीनें इस्तेमाल कर लेने से शिक्षा अच्छी हो जाती है। उनकी इस समझ की पीछे आखिर राज क्या है?

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पिछला पूरा दशक मैंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एजुकेशनल टेक्नोलॉजी को डिजाइन करने, समझने और पढ़ाने में बिताया। भारत के बंगलुरु शहर में मैंने एक पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) के साथ एक से ज्यादा माउस जोड़कर छात्र की अन्योन्य क्रिया बढ़ाने सम्बंधी एक प्रयोग किया। युगांडा के ग्रामीण इलाके में जब बच्चे एक अंगुली से शिकारी की तरह टाइपिंग का गेम खेलते तो मुझे घबराहट होने लगती। सिआटल, वाशिंगटन में किशोरावस्था से कम आयु के बच्चों की कंप्यूटर साक्षरता की कक्षा में मुझे टेक्नोलॉजी से पैदा होने वाले भटकाव से जूझना पड़ा। इस सभी प्रोजेक्ट्स में मुझे इकलौता और आसान पैटर्न दिखाई दिया। मैं इसे टेक्नोलॉजी का ‘विस्तारण नियम’ (लॉ ऑफ़ एम्प्लीफिकेशन) कहता हूं- टेक्नोलॉजी का प्राथमिक प्रभाव इंसानी ताकत के विस्तार के रूप में प्रकट होता है। इसलिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद शैक्षिक धारकता (पेडागॉजिकल कैपेसिटी) में इजाफा कर देती है।

विस्तारण एक स्पष्ट विचार प्रतीत होता है- यह इतना भर कहता है कि टेक्नोलॉजी के औजार से इंसानी ताकत को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अगर यह इतना स्पष्ट है तो इसके इतने गहन परिणाम होने चाहिए, जो आम तौर पर नजरअंदाज नहीं किये जा सकते। मसलन विस्तारण के मुताबिक़ शैक्षिक टेक्नोलॉजी के बड़े पैमाने पर उपयोग के बहुत कम सकारात्मक परिणाम आये हैं। किन्हीं चुनिन्दा नमूनों को लें, कुछ स्कूल अच्छा कर रहे पाए गए तो कुछ बहुत बेकार। कुछ मामलों में कंप्यूटर शामिल करना फायदेमंद साबित हुआ (पायलट अध्ययन में जिन्हें दिखाया गया है), लेकिन कमजोर स्कूलों के मामलों में इसने उन्हें अपने मुख्य उद्देश्य से ही भटका दिया। कुल मिलाकर परिणाम शून्य ही निकला।

एक अपेक्षाकृत बड़ी समस्या यह है कि स्कूल प्रशासक शिक्षक प्रशिक्षण के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन नहीं करते। जब शिक्षक को ही नहीं पता कि डिजिटल उपकरणों को कैसे शामिल करना है तो टेक्नोलॉजी के जरिये धारकता के विस्तारण की ख़ास गुंजाइश नहीं रह जाती। जब एक प्राइवेट कंपनी मुनाफा कमाने में नाकामयाब होने लगती है तो कोई यह उम्मीद नहीं करता कि अत्याधुनिक डाटा सेंटर, ज्यादा उत्पादन दिलाने वाले सॉफ्टवेयर और सभी कर्मचारियों को नए लैपटॉप देकर परिस्थितियों को उलटा जा सकता है।

और स्कूल के बाहर जो कंप्यूटर हैं, उनका क्या? क्या होता है जब बच्चों को डिजिटल उपकरणों से सीखने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है, जैसा कि टेक्नोलॉजी के बहुत से पैरोकार नसीहत देते हैं? यहां टेक्नोलॉजी बच्चों की प्रवृत्तियों का विस्तार करती है। यकीनन बच्चों में सीखने, खेलने और बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा होती है। लेकिन उनमें खेलते हुए खुद को भटका देने की भी स्वाभाविक इच्छा होती है। डिजिटल टेक्नोलॉजी इन दोनों इच्छाओं को विस्तार देती है। इन दोनों का संतुलन बिंदु हर बच्चे में अलग-अलग होता है लेकिन कुल मिलाकर अगर किसी किस्म का वयस्क मार्गदर्शन न हो तो भटकने की प्रवृत्ति प्रभावी हो जाती है। ठीक ऐसे ही निष्कर्ष अर्थशास्त्री रॉबर्ट फैर्ली और जोनाथन रॉबिन्सन को अपने शोध से हासिल हुए। कैलिफोर्निया के कुछ बच्चों को लैपटॉप देकर किए गए शोध में उन्होंने पाया- जिन बच्चों को लैपटॉप दिए गए थे, श्रेणी, कक्षा-स्तरीय परीक्षा परिणाम, उपस्थिति और अनुशासन जैसे तमाम शैक्षिक मानकों पर उनके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने लैपटॉप का इस्तेमाल सोशल मिडिया और वीडियो गेम्स के लिए ज़रूर किया। यानी, अगर आप उन्हें बहु-उपयोगी टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराते हैं, जिसका इस्तेमाल शिक्षा और मनोरंजन, दोनों के लिए किया जा सकता है, तो बच्चे मनोरंजन को ही चुनेंगे। टेक्नोलॉजी खुद बच्चों के रुझान को नहीं बदल सकती, यह उसका विस्तार भर करती है।

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यह जानना कि अमेरिकी शिक्षा को किन बीमारियों ने जकड़ा हुआ है, मुसीबतों के पिटारे को खोलने जैसा है। यह मुसीबत बचपन की गरीबी से जुड़ी हो सकती है या संसाधनों से जूझ रहे स्कूल डिस्ट्रिक्ट की। संभव है शिक्षकों के खराब वेतनमान से इसका संबंध हो या फिर प्राइवेट स्कूलों में जाने की होड़ से। सच्चाई इनमें से कई के मिले-जुले असर में भी निहित हो सकती है, मगर कंप्यूटरों की कमी में तो कतई नहीं। यहां तक कि टेक्नोलॉजी के झंडाबरदार भी नहीं कहते कि अमेरिकी शिक्षा टेक्नोलॉजी की कमी के कारण पतन की ओर जा रही है।

अमेरिका में शिक्षा के बारे में ज्यादातर विमर्श दूसरे देशों से तुलना से पैदा होता है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट (पीसा) ने 2012 के अपने नतीजों में अमेरिकी छात्रों को गणित में 27वें और रीडिंग में 17वें स्थान पर रखा था। लेकिन समग्र तौर पर भले ही अमरीकी बच्चे पिछड़ते दिखाई पड़ रहे हों, मजबूत बच्चे कतई पीछे  नहीं हैं। उदाहरण के लिए वार्षिक इंटरनेशनल मैथ ओलंपियाड में, जहां प्रत्येक देश अपने बेहतरीन 6 बच्चों को बेहद मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिए भेजता है, अमेरिका लगातार तीन शीर्ष देशों में जगह बनाए हुए है।

लेकिन जैसा कि पीसा के आंकड़े बताते हैं, इसमें शानदार प्रदर्शन करने वाले देश सिर्फ अमीरों के ही नहीं, बल्कि हर बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा का इंतजाम करते हैं। दुर्भाग्य से इस मामले में अगर दुनिया के 33 अमीर देशों से तुलना करें तो अमेरिका का रिकॉर्ड बहुत खराब है। 15 वर्ष तक के बच्चों के नामांकन के मामले में यह तीसरा सबसे कम नामांकन वाला देश है (करीब 20 प्रतिशत अमेरिकी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)। और स्कूल असमानता के लिहाज से अमेरिका सबसे बुरा प्रदर्शन करने वालों में 9वें स्थान पर हैं- यहां अमीर और गरीब बच्चों के बीच प्राप्तांकों में भारी अंतर दिखाई देता है। हर कोई जानता है कि हमारे स्कूल असमान हैं। पर कम लोग स्वीकार करते हैं कि स्कूलों के बीच असमानता असल में वैश्विक स्तर पर हमारे खराब प्रदर्शन का कारण है।

अगर शैक्षिक असमानता ही अहम मुद्दा है तो डिजिटल टेक्नोलॉजी के जखीरे खड़े कर देने से स्थितियां नहीं बदलने वालीं। टेक्नोलॉजी प्रदत्त विस्तारण का यह संभवतः सबसे कम समझा गया पहलू है। एक कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी शिक्षामंत्री अर्ने डंकन ने शिक्षा में टेक्नोलॉजी के उपयोग को बढ़ाने (45 गुना टेक्नोलॉजी और शिक्षक मात्र 25 गुना) की वकालत करते हुए कहा, ‘टेक्नोलॉजी उन गरीबों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण छात्रों के लिए बरबरी के अवसर पैदा करती है, जिनके पास घर में लैपटॉप या आईफोन नहीं हैं’, लेकिन यह सोच एक खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं; यह भ्रामक है और गलत दिशा में ले जाता है। टेक्नोलॉजी संपत्ति व उपलब्धियों में पहले से मौजूद असमानता को और ज्यादा बढ़ा देती है। ज्यादा शब्दभण्डार वाले बच्चे विकीपीडिया से ज्यादा हासिल करते हैं। वीडियो गेम्स मानसिक रूप से कमजोर बच्चों में भटकाव को बढ़ा देते हैं। अमीर माता-पिता अपने बच्चों के लिए डिजिटल प्रणालियों की प्रोग्रामिंग सिखाने वाला ट्यूटर लगा सकते है, जबकि दूसरे बच्चे इन प्रणालियों को महज चलाना भर सीख रहे होते हैं। स्कूल में टेक्नोलॉजी पहुंच के लिहाज से बराबरी से खेलने के मौके पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसे मौके खिलाड़ी के कौशल में कोई इजाफा नहीं करते। शिक्षा के लिहाज से यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यूनिवर्सिटी ऑफ कलिफोर्निया, इरविन में प्रोफेसर और एजुकेशनल टेक्नोलॉजी क्षेत्र के शीर्ष दिग्गजों में शुमार मार्क वार्शौर कहते हैं, ‘स्कूलों में सूचना एवं संचार टेक्नोलॉजी के प्रवेश से असमानता के मौजूदा रूपों का ही विस्तार होता है।’

अगर टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम कर रहे अभिभावक अपने बच्चों के मामले में सही हैं, तो अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को चाहिए कि वह टेक्नोलॉजी को बढ़ाने के बजाय जरूरतमंद बच्चों के लिए अच्छे शिक्षकों के इंतजाम पर ज्यादा ध्यान दे। नजारा बेशक डरावना और चुनौतीपूर्ण है, मगर शैक्षिक अवसरों में असमानता की बीमारी को टेक्नोलॉजी की तगड़ी खुराक से दुरुस्त नहीं किया जा सकता। मुंह बाए खड़ी सामाजिक-आर्थिक खाई को लक्ष्य किए बिना टेक्नोलॉजी खुद ब खुद इसे पाट नहीं सकती, उलटे यह इसे और चौड़ा कर देगी।

(यह लेख केंटारो टोयामा की आने वाली पुस्तक ‘गीक हैरेसी: रेसक्यूइंग सोशिअल चेंज फ्रॉम द कल्ट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ से लिया गया है.)

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

समान शिक्षा की ओर: अनुराग

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पिछले दिनों पटना में आयोजित एक सम्मेलन में सात साल के बच्चे कुमार राज ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर जोरदार ढंग से जो बातें कहीं, वे चर्चा में रहीं। उसने कहा, ‘दो तरह की शिक्षा व्यवस्था है, अमीरों के लिए अलग, जिनके बच्चे नामी प्राइवेट स्कूलों में पढऩे जाते हैं और गरीबों के लिए अलग, जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढऩे जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों में शिक्षा का घोर अभाव है। आखिर क्या कारण है कि कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील यहाँ तक कि उस स्कूल के शिक्षक भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहते? यही वजह है कि हम बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं।’

इस खबर का प्रचार-प्रसार करने वालों की टोन ऐसी थी, कि मानों शिक्षा को लेकर यह चिंताजनक स्थिति केवल बिहार में है, जबकि देशभर में शिक्षा व्यवस्था का कमो बेश यही हाल है। कुमार राज की बात सौ फीसद सही है। सोचने की बात यह है कि जब सात साल के बच्चे को समझ में आ रहा है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब हो (या की जा रही है) रही है और देश में कई तरह ही शिक्षा दी जा रही है, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, शिक्षामंत्रियों और बुद्धिजीवियों को यह बात क्यों समझ में नहीं आ रही है! या वे जानकर भी अनजान बन रहे है! या उनके लिए समान शिक्षा का मुद्दा गैरजरूरी है! क्या वे भी आम आदमी के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश में शामिल है! क्या वे चाहते हैं कि बच्चे में शिक्षा के दौरान असमानता के बीच बोए जाएँ! फिर समाज में समानता और समरसता की बात करने का क्या तुक है!

केंद्र की सरकारें हों या राज्यों की, सभी सरकारी शिक्षा व्यवस्था से हाथ खींच रही हैं। तथाकथित आंकड़ों और रिपोर्टों से यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था बेकार है, लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ाने नहीं चाहते हैं और निजी स्कूलों में बच्चों को प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा है। ये बातें कुछ हद तक सही हैं, लेकिन खराब सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही से सरकारें बच सकती हैं? आजादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी स्कूलों मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, पर्याप्त संख्या में अध्यापक नहीं हैं, उनसे वर्ष भर कई गैरशैक्षणिक कार्य कराएँ जाते हैं, तो इन सबके लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। इन सबके लिए भी अध्यापक जिम्मेदार हैं? कुछ आर्थिक रूप से सम्पन्न और मध्यम वर्गीय लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाने चाहते हैं, तो देश केवल इन लोगों का है। गरीब और साधनहीन लोगों के बच्चों की शिक्षा का क्या होगा?

कुमार राज ने अपने भाषण आगे जो बातें कहीं थी, वे भी गौरतलब हैं। उसने कहा कि ‘बड़ा होकर संयोग से इस देश का प्रधानमंत्री बन गया, तो सबसे पहले पूरे देश के प्राइवेट स्कूलों को बंद करवा दूंगा ताकि सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में एक साथ पढ़े सकें। चाहे वह डॉक्टर का बच्चा हो या किसान का। चाहे वह इंजीनियर का बच्चा हो या मजदूर का। तभी इस देश में समान शिक्षा लागू होगी।’

जब सात साल के बच्चे को समझ आ रही हैं कि देश में कैसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, तो देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों को यह सीधी-सादी बात क्यों नहीं समझ में आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चे की बातें सुनकर बिहार के मुख्यमंत्री के गर्दन उठाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन क्या असमान शिक्षा हम सबके लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है। यह क्या केवल बिहार का मामला है?

कुमार राज का सुझाव बिल्कुल सही है कि अगर लोग अपने गांव के स्कूलों की निगरानी करें, तो शिक्षा

के हालात में बड़ा सुधार होगा। इस छोटे बच्चे की सीख के बाद भी क्या अभी किसी और बात का इंतजार करने की जरूरत है? अगर हम अभी भी सचेत नहीं हुए, तो चिडिय़ा खेत चुग जाएगी और हम सिर पीटते ही रह जाएँगे।