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सरकारी स्कूल में पढ़ाने का सार्थक कदम : अनुराग

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राजधानी दि‍ल्‍ली के मटि‍याला वि‍धानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक गुलाब सिंह ने अपने छोटे बेटे का पब्लिक स्कूल से नाम कटाकर उसका दाखिला
सरकारी स्कूल में करवा दि‍या है। स्थानांतरण प्रमाण-पत्र नहीं मिल पाने के कारण वह निजी स्कूल में पढ़ रहे अपने बड़े बेटे का दाखिला सरकारी स्कूल में नहीं करवाया सके। वह 10वीं कक्षा का छात्र है।अगले वर्ष उसका दाखिला भी सरकारी स्कूल में करवा दिया जाएगा।

ऐसे समय में जब शि‍क्षा का नि‍जीकरण तेजी से हो रहा है और उच्‍च ही नहीं, मध्‍य और नि‍म्‍न वर्ग भी सरकारी स्‍कूलों की अपेक्षा घर-घर दुकान की तरह खुले तथाकथि‍त पब्‍लि‍क स्‍कूलों को प्राथमिकता दे रहा है, वि‍धायक गुलाब सिंह का अपने बच्‍चों को पब्‍लि‍क स्‍कूल से सरकारी स्‍कूल में पढ़ाने का फैसला साहसि‍क और प्रशसंनीय है।

वि‍धायक बेटे के सरकारी स्‍कूल में पढ़ने से उस स्‍कूल की शि‍क्षा और प्राशसि‍नक व्‍यवस्‍था पर सकारात्‍मक असर पडे़गा। इसका लाभ उस स्‍कूल में पढ़ रहे अन्‍य बच्‍चों को भी प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से मि‍लेगा। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍थि‍ति‍ है कि‍ नौकरशाहों, सरकारी कर्मचारि‍यों, सम्‍पन्‍न लोगों और मध्‍यवर्ग ने भी अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ाना बंद कर दि‍या है। सि‍फारि‍श कराएंगे, मोटा डोनेशन और हर महीने अच्‍छी-खासी फीस देंगे, बीच-बीच में स्‍कूल को चढ़ावा चढ़ाते रहेंगे और
इस सबका रोना भी रोएंगे, लेकि‍न बच्‍चे के लि‍ए स्‍कूल चाहि‍ए ऐसा, जि‍सके नाम के आगे पब्‍लि‍क स्‍कूल, कांवेंट स्‍कूल जैसे शब्‍द जुडे़ हों। उस स्‍कूल में क्‍या पढ़ाया जाता है और कितने योग्‍य अध्‍यापक उस स्‍कूल में हैं, इससे उसे कोई खास मतलब नहीं होता। अभिभावकों ने मान लिया
है कि पब्‍लिक या कांवेट शब्‍द ऐसे ही अच्‍छे स्‍कूल की गारंटी हैं, जैसे सामना खरीदने में आइएसआइ चिह्न का होना। हमारी इसी मानसि‍कता ने सरकार को मौका दे दि‍या है कि‍ वह सरकारी स्‍कूल नहीं खोल रही है और जो खुले हैं, उन्‍हें या बंद कि‍या जा रहा है या पीपीपी मॉडल के नाम नि‍जी हाथों को सौंपा जा रहा है। ऐसे में और सरकारी स्‍कूल खोलने की बात करना भी बेईमानी है।

हर साल की तरह आजकल इस बार फि‍र कई स्‍कूलों में फीस और एनुअल चार्ज में बेतहाशा वृद्धि‍ के खि‍लाफ अभि‍भावकों का आंदोलन चल रहा है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, शासन-प्रशासन से गुहार लग रहे है, कुछ ने न्‍यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है और कई जगह तो स्‍कूल प्रबंधन और अभि‍भावकों के बीच झड़प भी हो चुकी है, लेकि‍न इस सबका परि‍णाम क्‍या नि‍कलेगा? बहुत हुआ तो फीस व एनुअल चार्ज में दो-चार प्रतिशत की कमी और मामला रफादफा। अब तो हर साल यह सब एक रस्‍म अदायगी जैसा होना लगा है। शायद ये निजी स्‍कूल वाले भी इसके लिए तैयार रहते हैं। इसलिए वे पहले ही तीस-चालीस प्रतिशत तक बढ़ोत्‍तरी कर देते हैं। ऐसे में पांच-सात प्रतिशत कम करने पर भी उन पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

इस समस्‍या का स्‍थाई समाधान शिक्षा के सरकारीकरण में ही है। सरकार स्‍कूल खोले, उनमें व्‍यवस्‍थागत खामियां दूर करे और अध्‍यापकों को गैरसरकारी कार्यों में न लगाए। शिक्षकों को अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। स्‍कूलों में शिक्षा के स्‍तर सुधार होगा तो अभिभावक भी इस ओर कदम बढ़ाएंगे। बकौल उत्‍तराखंड के बागेश्‍वर जिले के गरुड खंड के खंड शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्‍वत उनके खंड के स्‍कूलों में सभी शिक्षकों सहयोग से शिक्षा का स्‍तर बेहतर हुआ है। इसका परिणाम है कि कई अभिभावकों ने अपने बच्‍चों का निजी स्‍कूलों से निकालकर सरकारी स्‍कूलों में एडमिशन कराया है। यह अनुभव बहुत कुछ कहता है।

अभिभावकों को इसके लिए आगे आना होगा। कल्‍पना कीजिए कि किसी मंत्री, सचिव, आइएएस अधिकारी या किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति का बच्‍चा सरकारी स्‍कूल में पढ़ता है। वह अपने पिता को स्‍कूल की शिक्षा और वहां की कमियों के बारे में बताता है तो उसका तुरंत और प्रभावशाली ढंग से समाधान होगा।

विधायक गुलाब सिंह का कथन महत्‍वपूर्ण है कि नेता लोगों के बीच बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उस पर खुद अमल नहीं करते। यहां नेताओं के साथ ही अन्‍य लोगों को शामिल कर लिया जाए तो स्‍थिति यही है। विधायक गुलाब सिंह ने तो एक शानदार पहल की है। हम न जाने कब इस ओर कदम बढ़ाएंगे।