Archive for: March 2015

प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी की उम्मीद जगाता निर्णय : प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘

Pramood Dixit

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डा. डी.वाई. चन्द्रचूड तथा न्यायमूर्ति पी.के.एस. बघेल की खण्डपीठ ने अधिवक्ता सुनीता शर्मा की याचिका स्वीकार करते हुए शिक्षकों से गैर शैक्षिक कार्य लेने पर रोक लगाने सम्बंधी जो निर्णय हाल ही में दिया है, वह प्रारम्भिक शिक्षा की बेहतरी की उम्मीद जगाने वाला है। अब शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों से दूर रहते हुए विद्यालय में नियमित उपस्थित रह कर शैक्षिक गतिविधियों में अपना पूरा समय देते हुए गरीब, किसान, कामगार और मजदूर के बच्चों की आंखों में पलते सपने को साकार करने में अधिकतम योगदान दे सकेंगे, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

एक ओर अब शिक्षक विद्यालयों में जहां ज्यादा समय देते हुए स्वस्थ चित्त और मन से काम कर सकेंगे, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों की यह पुरानी शिकायत भी दूर होगी कि शिक्षक अपने विद्यालयों में कम समय दे पाते हैं और सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई-लिखाई का कोई सकारात्मक माहौल नहीं है। अभी तक शिक्षकों के पास विद्यालय न पहुंचने और न पढ़ाने के दर्जनों कारण थे। मसलन पल्स पोलियो, बाल गणना, पशु गणना, आर्थिक गणना, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण कार्य, राशन कार्ड सत्यापन, विद्यालय भवन निर्माण की जिम्मेदारी के चलते शिक्षक नियमितरूप से पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ अपना काम नहीं कर पा रहे थे। बड़ी संख्या में शिक्षकों का नियमित स्कूल जाना नहीं हो पा रहा था, पर अब वे शायद देश के भविष्य के साथ न्याय कर सकेंगे।

लेकिन बहुत खुश होने की जरूरत भी नहीं है, क्योंकि इन विद्यालयों में पढ़ रहे मासूम बच्चों की आंखों में तैरते कुछ बुनियादी सवालों को अभी भी उत्तरों ही प्रतीक्षा हैं। 6-14 वय वर्ग के प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना राज्य का दायित्व है। यहां मैं अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के आलोक में हाईकोर्ट की खण्डपीठ के निर्णय की पड़ताल करते हुए उन बुनियादी सवालों के सन्दर्भ में प्राथमिक शिक्षा की वास्तविक तस्‍वीर सिलसिलेवार रखते हुए आगे बढूंगा जो हमारा ध्यान खींचते हैं। पहला सवाल यही कि  शिक्षा अधिकार अधिनियम के अनुसार छात्र शिक्षक अनुपात प्राथमिक विद्यालय में 30 पर 1 और जूनियर स्तर विद्यालय में 35 पर 1 होना चाहिए, लेकिन अभी तक धरातल में यह व्यवस्था बनती दिखायी नहीं पड़ रही है। हालांकि, सरकार द्वारा शिक्षक भर्ती बड़ी तेजी से की जा रही है, शिक्षामित्रों का भी द्विवर्षीय विशेष प्रशिक्षण उपरान्त सहायक अध्यापक के रूप में समायोजन किया जा रहा है। लेकिन इन नये भर्ती शिक्षकों से भी स्थिति मे बहुत ज्यादा अंतर आने वाला नहीं है। प्रत्येक शिक्षक के लिए कुर्सी-मेज और बच्चों के लिए बैठने के लिए भी पर्याप्त बैंच, चटाई और चौकी होनी चाहिए। लेकिन वास्तविक चित्र भयावह है। सैकड़ों ऐसे स्कूल हैं, जहां बच्चों के बैठने के लिए बैंच तो दूर टाट-पट्टी भी मयस्सर नहीं है। पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है। प्रत्येक विद्यालय में बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय, खेल का मैदान, पुस्तकालय भी होना चाहिए। अधिकांश विद्यालयों में ये सुविधाएं नहीं हैं। लड़कियों के ‘ड्राप आउट‘ होने का एक सबसे बड़ा कारण यही है कि लड़कियां शौचादि के लिए कहां जायें ? और सबसे बड़ी बात यह कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को विद्यालय से जोड़ने के लिए अब तक क्या प्रयास किये गये हैं कि ऐसे बच्चे भी बिना किसी भेदभाव के प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते हुए स्वयं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ सकें।

जब तक विद्यालयों की उन मूलभूत जरूरतों को पूरा नहीं किया जाता, तब तक ऐसे निर्णय केवल क्षणिक खुशी दे सकते हैं, कोई स्थायी समाधान नहीं। और जब तक वे बुनियादी सवाल हल नहीं हो जाते, तब तक खुशी मनाना बेमानी है, धोखा है और न केवल अपने आपको, बल्कि इन विद्यालयों में अध्ययनरत लाखों-करोड़ो बच्चों की समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने की इच्छा-आकांक्षा पर कुठाराघात भी है।

आज 1 अप्रैल 2015 को जब हम बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिलने की पांचवी वर्षगांठ मना रहे हैं। सम्पूर्ण देश में सैकड़ों सरकारी आयोजन होंगे और विद्यालयों को बेहतर बनाते हुए बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के सरकारी प्रयासें का गुणगान किया जायेगा, स्वयं खुद की पीठ ठोकी जायेगी, लेकिन क्या इन पांच वर्षों में प्राथमिक विद्यालयों में मूलभूत संसाधन जुटाये जा सकें है? आखिर क्यों पूरे उत्‍तर प्रदेश में हजारों विद्यालय शिक्षक के अभाव में बन्द पड़े है जिन्हें जुगाड़ करके अन्य विद्यालयों के शिक्षकों द्वारा संचालित करवाया जा रहा है। ये प्रश्‍न फिलहाल अनुत्तरित ही रहेंगे।

विगत दो दशकों का चित्र सामने रखते हुए चर्चा करूं तो देखने में आता है कि सरकारों ने शिक्षकों को बंधुवा मजदूर मान लिया था और अधिकारपूर्वक तानाशाही तरीके से प्रत्येक सरकारी गैर शैक्षणिक कार्य में शिक्षकों को जोडे़ रखा गया। शिक्षकीय मान-मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा गया और ऐसे-ऐसे कामों को पूरा करने की जिम्मेदारी दी गई जो एक शिक्षक की मर्यादा के नितान्त प्रतिकूल तो थे ही, अपमानजनक भी थे। मुझे याद आ रहा है कि एक बार कानपुर में कुछ वर्षों पूर्व सड़कों में आवारा घूमते सुअरों को पकड़ने की जिम्मेदारी भी शिक्षक-शिक्षिकाओं की दी गई थी। हालांकि  शिक्षक संगठनों के भारी विरोध के चलते शिक्षकों को उस काम से तो छुटकार मिल गया था, पर अन्य गैर शैक्षणिक कार्यों से नहीं। राष्ट्र की भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाले शिक्षक की मर्यादा का इतना क्षरण क्यों हुआ, इस पर भी विचार करना आवश्यक और समीचीन प्रतीत होता है। जब शिक्षा अधिकार अधिनियम में शिक्षकों से केवल आम चुनाव, दस साल में होने वाली जनगणना और राष्ट्रीय आपदा के कार्य करवाने की व्यवस्था है, तो क्यों हर कार्य से शिक्षक को जोड़ दिया जाता है और फिर व्यंग्य किये जाते हैं कि शिक्षक कामचोर और बहानेबाज हैं, उसकी पढ़ने-पढ़ाने में कोई रूचि नहीं है। वहीं शिक्षकों को भी चाहिए कि जब इस पेशे में आ ही गये हैं, हालांकि शिक्षा को पेशा कहना न्यायोचित नहीं होगा, तो पूर्ण ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वह्न करें। मुझे लगता है सरकार को कुछ अन्य नये विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए जो ये कार्य सुगमता के साथ कर सकें। सरकार चाहे तो स्वस्थ सेवानिवृत्त शिक्षकों-कर्मचारियो, शिक्षित बेरोजगारों और गैर सरकारी संगठनों को प्रशिक्षित कर ये काम करवा सकती है। इस प्रकार सरकार के पास एक स्थायी कार्यबल भी हो जायेगा, जिसका उपयोग जरूरत के अनुसार सरकार कर सकती है।

यदि सही अर्थों में हम इस देश की प्राथमिक शिक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो इन प्रश्‍नों के उत्तर हम सबको मिल कर खोजने होंगे। ये प्रश्‍न केवल शिक्षकों से नहीं, अपितु समाज-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से हैं जिन्हें प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख की चिंता है, जिन्हें गरीब मजदूर, दलित, दमित किसान से प्यार है,  हमदर्दी है। अब दिखावे का वक्त नहीं है। यदि हम झुग्गी-झोपड़ी और गिरि-काननवासी के इन नौनिहाल बच्चों की शिक्षा के लिए चिंतित हैं तो हमें इस वंचित समुदाय के उन बच्चों को उनका हक दिलाने के लिए कमर कसनी होगी और हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के प्रकाश में न केवल अपनी राह खोजनी होगी, बल्कि उनके साथ दृढ़ता के साथ खडे़ रहना होगा। इन विद्यालयों में देश के एक बड़े वर्ग के बच्चे पढते हैं, जो किसान, दस्तकार, शिल्पकार, मजदूर, बर्तन बनाने वाले, फेरी-गुमटी लगाने जैसे छोटे-छोटे काम करने वाले है। देश के निर्माण में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनको भी अच्छी शिक्षा पाने और आगे बढ़ने का संवैधानिक अधिकार है।

और सबसे बड़ा प्रश्न, आजादी के 68 साल बाद भी क्या हम स्कूलों को आनन्दघर बना पायें हैं ? आखिर हमारे विद्यालय इतने दीन-हीन, अनाकर्षक और निर्दय क्यों हैं ? क्या कारण हैं कि घर से विद्यालय के लिए निकला बच्चा विद्यालय न पहुंचकर बाहर की दुनिया में मस्त और व्यस्त हो जाता है। उसके मन में नियमित स्कूल आने की ललक हम क्यों नहीं जगा पा रहे हैं ? समय मिले तो शिक्षा की नीति तय करने वालों को कभी इन प्रश्नों पर भी विचार करना आवश्यक है कि हमारे विद्यालय कैदखाने क्यों बनते जा रहे हैं। क्यों हम हर बच्चे को स्कूल के अपने बनायें खांचें में फिट करना चाहते हैं। हम विद्यालय को ही बच्चें के अनुसार कब बदल पायेंगे। ऐसा रचनात्मक परिवेश का निर्माण कब कर पायेंगे कि बच्चों की कोमल कल्पनाएं जीवन्त होकर नाचें-गायें। वहां उसे अपनेपन का एहसास हो, यह बहुत जरूरी है। क्योंकि सीखना केवल शिक्षकों द्वारा ही नहीं होता, बच्चे एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते हैं। लेकिन यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब हम ऐसा वातावरण बना पायेंगे, उस दिशा में बढेंगे। हमें स्कूल की जड़ता को खत्म कर उसमें गतिशीलता लानी होगी। जहां प्रत्येक बच्चे का आनन्दमय परिवेश में सीखना सम्भव हो सके। वहां बच्चों का मधुर हास्य गूंजे, उनकी किलकारी में चिड़ियों के कलरव का संगीत मिलकर विद्यालय के परिवेश को बच्चों के अनुरूप बना पाये तो तभी इस निर्णय की सार्थकता सिद्ध होगी। और इसके लिए हम सबको कटिबद्ध होना होगा। आखिर यह राष्ट्र के निर्माण का मसला है। शिक्षक की ओर अंगुली उठाने भर से कुछ होने वाला नहीं है। मिलजुल कर प्रयास करने होंगे। समाज को भी देखना होगा कि वह प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए क्या कर सकता है।

दीवार पत्रिका बच्चों के भाषागत विकास में सहायक: कमलेश जोशी

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

लखनऊ : गैर सरकारी शैक्षिक संस्था लोकमित्र एवं आक्सफैम इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से 15 मार्च 2015 को होटल गोमती, लखनऊ में एक शैक्षिक कार्यक्रम ‘स्कूल और शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी में शिक्षकों की पहल’ आयोजित किया गया। अपने तरह के इस पहले कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के सात जिलों- रायबरेली, प्रतापगढ, बाँदा, लखनऊ, मुजफ्फरनगर, बस्ती, फतेहपुर से आये एक सैकड़ा से अधिक शिक्षक/शिक्षिकाओं ने अपने स्कूलों में किये गये शैक्षिक उन्नयन के नवाचारी प्रयासों को साझा करते हुए चित्रो का प्रदर्शन भी किया। इस अवसर पर बाँदा के शिक्षकों ने बच्चों की भाषायी दक्षता के विकास में दीवार पत्रिका की बड़ी भूमिका स्वीकारते हुए दीवार पत्रिका पर काम करते हुए उपजे अपने अनुभव भी बताये और विभिन्न स्कूलों में बच्चों द्वारा बनायी गई दीवार पत्रिकाओं की प्रदर्शनी भी लगाई। दीवार पत्रिकाओं के नाम बहुत प्रेरक एवं उत्साह जगाने वाले थे- जैसे ‘बाल झंकार‘, ‘इन्द्रधनुष‘, ‘बालवाणी‘, ‘बच्चों की बात‘ आदि।

कार्यक्रम में उत्तराखण्ड में कार्यरत तथा दीवार पत्रिका को एक अभियान के रूप में लेने वाले शिक्षक महेश पुनेठा लिखित एवं लेखक मंच प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’ का लोकार्पण भी किया गया। लोकार्पण के बाद वक्ताओं ने इस पुस्तक पर अपने विचार भी व्यक्त किये।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कमलेश जोशी (अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन, ऊधम सिंह नगर में कार्यरत) ने कहा कि दीवार पत्रिका बच्चों की भाषागत विकास में एक सशक्त साधन है। बहुत कम लागत पर तैयार यह बाल पत्रिका बच्चों की रचनात्मकता को प्रकट होने का भरपूर अवसर प्रदान करती है। यह अभिव्यक्ति का सहज, सस्ता एवं सर्व सुलभ साधन है। आगे बोलते हुए जोशी ने कहा कि हर शिक्षक को अपने विद्यालय में बच्चों के साथ दीवार पत्रिका पर काम करते हुए इसे कक्षा शिक्षण में एक संसाधन के रूप में प्रयोग करने की दिशा में सोचना चाहिए। इससे बच्चों में प्रबंधन एवं संपादन कौशल का विकास होता है।

आक्सफैम इंडिया के विनोद सिन्हा ने कहा कि दीवार पत्रिका बच्चों में साहित्यिक अनुराग उत्पन्न कर उनमें न केवल पठन संस्कृति विकसित करती है, अपितु परिवेशीय घटना क्रम को लिखने के लिए प्रेरित भी करती है। इससे बच्चों में अपने आसपास हो रहे सामाजिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक बदलावों को महसूस करने की एक समझ पैदा होती है। लोकमित्र के राजेश कुमार ने कहा कि मुझे इस पुस्तक की तलाश कई दिनों से थी। आज प्रदेश के सात जिलों के नवाचारी शिक्षकों के बीच इस पुस्तक को लोकार्पित करते हुए गर्व का अनुभव कर रहा हूँ। शिक्षा को हम सामाजिक बदलावों के आधार के रूप में देखते हैं। दीवार पत्रिका में बच्चों की सहभागिता से उनमें इस मुहिम को और बल प्रदान करती है।

दीवार पत्रिका अभियान से जुड़े शिक्षक प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ने दीवार पत्रिका की रचना प्रक्रिया, उपयोगिता एवं चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि यह एक हस्तलिखित पत्रिका है, जिसे एक कैलेंडर की तरह दीवार पर लटकाया जा सकता है, जहां से बच्चे आसानी से पढ़ सकें। बच्चों से एकत्र सामग्री यथा कविता, कहानी, चित्र, चुटकुले, विद्यालय एवं गांव के समाचार, पहेलियां, स्कूल की गतिविधियां, पत्र, किसी का साक्षात्कार, संपादकीय, प्रेरक प्रसंग आदि को किसी चार्ट पेपर पर चिपका कर कुछ साज-सज्जा कर दी जाती है। इसे ‘वॉल मैगजीन‘ भी कहा जाता है। यह बच्चों में लेखन क्षमता का विकास करती है। दीवार पत्रिका के माध्यम से हुए सामाजिक बदलावों की चर्चा करते हुए दीक्षित ने आगे कहा कि लोक साहित्य, कला एवं संस्कृति को बचाये रखने में दीवार पत्रिक की बडी़ भूमिका है। इस पर काम करने से बच्चों के अन्दर सामूहिकता, समरसता, नेतृत्व क्षमता आदि मानवीय गुण विकसित होते हैं।

उपस्थित शिक्षकों ने दीवार पत्रिका सम्बंधी प्रश्न भी किये। उस अवसर पर लोकार्पित पुस्तक ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता‘  को बड़ी संख्या में शिक्षकों द्वारा खरीदा गया। कार्यक्रम का संचालन राजेश कुमार ने किया। कार्यक्रम में शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने प्राण फूंके। अनूप शुक्ल ने सबका आभार व्यक्त किया।  प्रवीण त्रिवेदी, अमृत लाल, संजय, रामकिशोर पाण्डेय, क्षमा शर्मा आदि उपस्थित रहे।

प्रस्तुति: प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘ , अतर्रा, जिला बाँदा, उ. प्र.

गौरैया बिन आँगन सूना : प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘

Sparrow.gauriya

आज से एक डेढ़ दशक पूर्व तक हमारे घरों में एक नन्ही प्यारी चिड़िया की खूब आवाजाही हुआ करती थी। वह बच्चों की मीत थी, तो महिलाओं की चिर सखी भी। उसकी चहचहाहट में संगीत के सुरों की मिठास थी और हवा की ताजगी का सुवासित झोंका भी। नित्यप्रति प्रातः उसके कलरव से लोकजीवन को सूर्योदय का संदेश मिलता और वह अपने नेत्र खोल दैनन्दिन जीवनचर्या में सक्रिय हो उठता। विद्याथियों के बस्ते खुलते और किताबें बोलने लगतीं। कोयले से पुती काठ की पाटियों में सफेद खड़िया से सजे अक्षर जीवन्त हो उभरने लगते। बैलों के गले में बंधी घंटियों की रुनझुन के साथ कंधे पर हल रखे किसानों के पग खेतों की ओर चलने को मचल पड़ते और महिलाएं गीत गाती हुई जुट जातीं, द्वार-आँगन बुहारने में। और तभी आँगन में उतर आता कलरव करता चिड़ियों का झुण्ड। उनके चुगने के लिए आँगन और दरवाजे पर बिखेर दिए जाते धान, कोदो, ज्वार, बाजरे और चावल के दाने। रसोई राँधने के लिए अनाज साफ करते समय भी सूप के सामने वे फुदकती रहतीं। सूप से गिरे चावल के दाने चुगतीं चिड़ियाँ लोक से प्रीति के भाव में बँधी निर्भय हो सूप में भी बैठ सहजता से अपना भाग ले जातीं। इतना ही नहीं, वे रसोई में भी निर्बाध आती-जातीं और पके चावल की बटलोई में बैठ करछुल में चिपका भात साधिकार ले उड़तीं। यह प्यारी चिड़िया कोई और नहीं अपनी गौरैया ही थी, हाँ, अपनी घरेलू गौरैया। वह परिवार की एक सदस्य ही थी। जिस आँगन वह न उतरे, वह आँगन लोक का सम्मान खो देता। गौरैया के मानव से इस सम्बंघ के कारण ही लोकधर्मी कवि घाघ से लेकर आधुनिक कवियों तक को गौरैया ने प्रभावित किया है। तभी तो प्रगतिशील कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन‘ कह उठते हैं हैं- ‘मेरे मटमैले आँगन में, फुदक रही प्यारी गौरैया।’ लेकिन वह गौरैया आज घरों एवं खेत-खलिहानों में ज्यादा दिखायी नहीं पड़ती। उसका मनमोहक कलरव अब सुनायी नहीं देता। भौतिकता की चकाचौंध में सुख खोजते भटके मानस ने प्रकृति के साथ जीने के अनिवर्चनीय आनन्द को खो दिया है। तभी तो आज इस गौरैया के जीवन पर संकट आ खड़ा हुआ है। उसके अस्तित्व पर खतरा मड़रा रहा है और हम हैं कि बेसुध सोये पड़े हैं ।

यूरोप, एशिया, अमेरिका, अफ्रीका, न्यूजीलैण्ड और आस्टेलिया में पायी जाने वाली घरेलू गौरैया की विश्व में छह प्रजातियों की पहचान हुई है। नगरों, कस्बों, गाँव, खेत-खलिहान में मिलने वाली गौरैया को ‘हाउस स्पैरो‘ कहा जाता है। एक आकलन के अनुसार विश्‍व में पाये जाने वाले पक्षियों में गौरैया की संख्या सर्वाधिक है। हल्के भूरे-सफेद रंग के पंखों, भूरी चोंच और पीले पैरों वाली 25-30 ग्राम वजनी झुण्ड में रहने वाली इस चिड़िया को लगभग हर तरह की जलवायु पसंद है। एक समय में तीन बच्चे/अण्डे होते हैं। भोजन की तलाश में गौरेया प्रतिदिन दो-तीन मील का चक्कर काटती है। अनाज के दाने, घास के बीज, छोटे कीड़े इनका प्रिय भोजन है, लेकिन रोटियों के टुकड़े, ब्रेड भी ये चाव से खा लेती हैं।

तथाकथित विकास और प्रकृति के अत्यधिक दोहन-शोषण ने घरेलू गौरैया के प्राकृतिक आवास को छिन्न-भिन्न कर दिया है। बहुमंजिली इमारतों के निर्माण और जंगलों की कटान से इसे घोसले बनाने को उपयुक्त स्थान नहीं मिल पा रहा। शहरी कॉलोनियों में पेड़ दिखते नहीं, छायादार निरापद जगह नहीं बची, जहाँ वह अपने नीड़ का निर्माण कर सके। सुपर मार्केट-मॉल संस्कृति के कारण घर-परिवारों में पैकेटबन्द अनाज और अन्य भोजन सामग्री आने से चुगने को दाने मिलना दूभर हो गया। मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगों ने इनकी प्रजनन क्षमता को कम कर दिया है। इस कारण इनके अण्डे पूर्णरूप से निषेचित नहीं हो पाते हैं और अण्डों से अविकसित बच्चों का जन्म हो रहा है। इन तरंगों नें उनकी दिशाशोधन प्रणाली को विकृत कर दिया है। फलतः यह बेजुबान पक्षी अपने राहों से भटक रहा है। शहरों में बिजली के तारों के जाल में अकसर उलझ कर प्राण गवाँ बैठता है। चील, बाज, कौवा, कुत्ता, सियार, साँप जैसे प्राकृतिक दुश्मन इसके अण्डों और चूजों को खा जाते हैं। बच्चे भी गौरैया और इसके छोटे बच्चों को पकड़ लेते हैं और इनके पंखों पर रंग लगा देते हैं, जिसके कारण इन्हे उडान भरने में खासी परेशानी होती है। बच्चे इनके पैरों में धागा बाँध देते हैं, जिस कारण धीरे-धीरे वहाँ से पैर कमजोर होकर टूट जाता है, अन्ततः वह मर जाती है। किसानों द्वारा रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से अन्न, जल और मिट्टी प्रदूषित हुई है। कीड़ों के मर जाने से फसलें भले ही सुरक्षित हुईं हों, लेकिन इसने गौरैया के प्राकृतिक आहार कीड़ों को उनसे छीन लिया है। बच्चे च्यूगंम खाकर जहाँ कहीं भी फेक देते हैं और चिड़िया इसे कोई खाद्य पदार्थ समझ कर ज्यों ही चुगती है, तो उसकी चोंच चिपक जाती है और छटपटाकर प्राण त्याग देती है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ताप के कारण भी गौरैया अपने आप को कमजोर महसूस कर रही है। भोजन एवं जल की कमी, घोंसला बनाने के लिए उचित स्थान न मिल पाने के कारणों से पिछले दो दशकों से इनकी संख्या में लगातार भारी गिरावट देखने में आ रही है। भारत ही नहीं वरन सम्पूण विश्व में विभिन्न अनुसंधानों से प्राप्त निष्कर्ष बताते हैं कि इनकी संख्या में 70-80 प्रतिशत की कमी हुई है। पौधों और पशु-पक्षियों के संरक्षण के लिए सन 1963 में गठित अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (पनबद) ने भी घरेलू गौरैया की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे ‘लाल सूची‘ में रखते हुए संकटग्रस्त पक्षी घोषित किया है। ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बडर्स‘ ने भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में वर्षों तक अध्‍ययन कर गौरैया को बचाये जाने के उपाय खोजने पर बल दिया है। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी में इनकी संख्या बहुत तेजी से घटी है। नीदरलैण्ड ने तो इसे ‘दुर्लभ प्रताति की श्रेणी‘ में रखकर बचाने का संकल्प दिखाया है। मो. दिलावर ने भारत में गौरैया के संरक्षण व सम्वर्धन के लिए ‘राइज फार द स्पैरोज‘ अर्थात ‘गौरैया के लिए जागो‘ अभियान चलाया। इन सब प्रयासों के चलते 20 मार्च 2010 को अन्तरराष्टीय स्तर पर पहली बार ‘विश्व गौरैया दिवस‘ मनाया गया और दिल्ली राज्य सरकार ने 15 अगस्त 2010 को गौरैया को दिल्ली का ‘राज्य पक्षी’ घोषित किया। भारतीय डाक विभाग ने 9 जुलाई 2010 को 5 रुपये मूल्य का डाक टिकट जारी किया। गौरैया पर अमेरिका, कनाडा और बाँग्लादेश ने भी विभिन्न मूल्य वर्ग के डाक टिकट जारी किए हैं। वर्ल्‍ड वाइड फंड ऑफ नेचर के द्वारा 2014 में घरेलू गौरैया बचाओ अभियान के अन्तर्गत डाक विभाग ने गौरैया के चित्र का विशेष आवरण जारी कर गौरैया बचाओ मुहिम में जन सामान्य की सक्रिय भागीदारी की इच्छा व्यक्त की थी।

गौरैया को बचाने के लिए हम सभी को आगे आना होगा। अभियानों और गोष्ठियों से जागरूकता लाई जा सकती है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत ठोस कदम उठाने की है। हमे सामूहिक जिम्मेदारी निभानी होगी। अपने घरों और पास-पड़ोस में छायादार वृक्ष लगाने होंगे। प्लाई, गत्तों के टुकड़ों से घोसलें बनाकर दीवारों में टाँग कर उन्हें वहाँ आने का आमंत्रण देना होगा। छतों पर बर्तनों में पानी रखकर और अनाज के दाने बिखेर कर हम इसका साथ पा सकते हैं। अगर हम अभी नहीं चेते तो गिद्ध की भाँति गौरैया को भी खो देंगे। यह हमारा दायित्व है कि हम पुरखों से प्राप्त इस पक्षी को आगामी पीढ़ी के हाथों में सौपते हुए सर उठाकर कह सकें कि हमने से इसे मरने नहीं दिया। तो आज ही शुरू करें कल कहीं बहुत देर न हो जाए।

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण से साभार) 

हिंदी साहित्य के कर्णधारों से कुछ प्रश्‍न : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

पेशे से भारतीय प्रशासनिक सेवा में वरिष्‍ठ पद, शिक्षा से इंजीनियर मगर शौक से हिंदी साहित्‍य के पढ़ाकू मित्र ने अचानक प्रश्‍न उछाला कि क्‍या हिंदी में कहानी, उपन्‍यास खत्‍म हो रहे हैं ? इससे पहले कि मैं इस प्रश्‍न को पूरी तरह समझता, संभलता उसने जोड़ा कि मैं पिछले कुछ वर्षों से कोई उपन्‍यास पूरा नहीं पढ़ पाया। लेता हूँ, शुरू करता हूँ, पन्‍ने दर पन्‍ने पढ़ने की कोशिश करता हूँ, लेकिन पूरा करने से पहले ही हताश हो जाता हूँ। धीरे-धीरे अब हिंदी उपन्यास और कहानी की भी तरफ बढ़ने का मन नहीं करता। ऐसे कैसे हिंदी बचेगी? लौट-लौट कर वही प्रेमचंद की कहानियों में आनंद मिला है। मेरे बच्‍चे को भी, मेरी मां को भी। कुछ करना चाहिए हिंदी के लेखकों को।

ये बातें उसने हाल ही में पुस्‍तक मेले के दौरान कही थीं। क्‍या मैं भी इन बातों को दूसरे कान से बाहर निकल जाने दूँ या इस दर्द के सत्‍य या अर्धसत्य को जानने, समझने की कोशिश करूं। पुस्‍तक मेले में वाकई प्रेमचंद चारों तरफ थे। राजकमल, वाणी, हिंद, सामयिक, नयी किताब, लेखक मंच से लेकर शायद सौ से ज्‍यादा हिंदी के प्रकाशकों ने प्रेमचंद की किताबें नये से नये क्‍लेवर में छापी हैं। और उससे बड़ा सत्‍य यह कि इनकी कीमत हिंदी के धुरंदर लेखक की किताबों की तुलना में चौथाई से भी कम। शायद इसका अर्थशास्‍त्र बहुत सरल है। प्रेमचंद जब हजारों, लाखों में बिकते हैं तो कीमत भी कम।

क्‍या जनता की चेतना, समझ, स्थिति वही बनी हुई है, जो प्रेमचंद के समय में थी ? यदि ऐसा है तो आजादी के बाद जिन सत्‍ताधारी दलों को आप देश के बेढंगे विकास के लिये जिम्‍मेदार ठहराते हैं, साहित्‍य-संस्‍कृति के पक्ष के लिए तो उन लेखकों को भी आगे बढ़कर जिम्‍मेदारी लेनी चाहिये, जो सारे पुरस्‍कार, उपाधियों को लेकर गदगद होते रहे हैं। बचे हुए सरकारी समितियों से रंगाखुश तो पत्रकार, संपादक सरकारी विज्ञापन की आस में। हिंदी का सर्वनाश इसीलिये सबसे ज्‍यादा हिंदी राज्‍यों में हुआ ।

बीस-तीस वर्ष पहले कविता के बारे में भी ऐसी ही शंकाएं उठती थीं, ऐसे ही आम पाठक की तरफ से। हमने नहीं सुनी। यह कहकर कि आधुनिक बोध, विश्‍व संवेदना, नये मुहावरे, बिंब, लघु मानव, चेतना कहकर अपनी कविता को सही बताते रहे और प्रश्‍न उछालने वालों को लताड़ते भी रहे। देखते-देखते अब कोई ऐसा भी नहीं बचा जो प्रश्‍न भी उठाए और लताड़ खाने के लिए भी बचा हो। कवियों से इसकी तहकीकात कर सकते हैं। पिछले कुछ सालों के अनुभव बताते हैं कि हिंदी के स्‍टॉलों पर सैंकड़ों हिंदी के लेखक तो मिलते हैं, पाठक नहीं।

एक और तीखा प्रश्‍न इस मेले में एक लेखक मित्र ने उछाला कि क्‍या हम प्रकाशकों के लिए लिखते हैं? और क्‍या उनके धंधों के प्रचार-प्रसार के लिए यहां आते हैं, विमोचन करते-कराते हैं या हिंदी भाषी पाठक जनता के प्रति भी हमारी कोई जबावदेही है? जबावदेही है तो गरीब हिंदी का आम आदमी यहां से गायब क्‍यों है? मुझे गांव के कुछ बिम्‍ब कौंध रहे हैं। गेहूं की फसल कटने पर शाम को मजदूरों को एक छोटा-सा गट्ठर दे दिया जाता था। इसकी बालियों से गेहूँ मजदूर घर जाकर निकाल लेंगे, मजदूरी के रूप में। ऐसा ही होता था कोल्‍हू चलने पर। गुड़ की भेली दे देना। क्‍या लेखकों की स्थिति भी ऐसे ही मजदूरों की नहीं हो गई जो प्रकाशक से मात्र बीस-तीस प्रतियां लेकर ही मग्‍न हो जाते हैं और फिर अगला उपन्‍यास, कहानी, कविता लेकर हाजिर। वाकई हिंदी की दुनिया में यह दौर प्रकाशकों और संपादकों का स्‍वर्ण युग है। संपादकों के पास भी लम्‍बी-लम्‍बी लाइनें और प्रकाशकों के पास भी उतनी। जिस पर निगाह पड़ जाए, वही निहाल।

विकास कुमार जैसा पाठक तो पुस्‍तक मेले से जा चुका है, लेकिन प्रश्‍न अभी भी मेरे सामने लटका हुआ है कि आखिर यह कहानी खत्‍म क्‍यों हुई? जिसे हम लेखक कहते हैं, वह शुद्ध दिल्‍ली जैसे महानगरों का ऐसा बैक्‍टीरिया या वायरस है जिसने संवेदनशीलता, देश की समस्‍या, उसके यथा‍र्थ, गरीबी, भाषा सबके प्रति वैसा ही प्रतिरोधी तंत्र बना लिया है, जैसा मच्‍छरों ने डी.टी.टी. या दूसरे कीटनाशकों के खिलाफ जिंदा रहने के लिए। दिल्‍ली के स्‍कूलों में हिंदी न पढ़ाई जाए, उनकी बला से। स्‍कूलों में दाखिले की समस्‍या हो, उनकी बला से। किसानों की आत्‍महत्‍या से उनका मतलब सिर्फ दिल्‍ली में कभी-कभी सेमीनार करना है और वह भी किसी राजनीति के तहत। और वैसे ही ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ के मुहावरे में यदि हिंदी के लेखक का बिजुका या चित्र बनाया जाना चाहिए यानी कि भाषण हिंदी में शेष जीवन, घर, बच्‍चों, किताबों, दफ्तर में अंग्रेजी। यहां छुरी को बगल में छिपाने की भी जरूरत अब नहीं रही। अंग्रेजी की छुरी को तो आप सरेआम लिये घूमते फिर रहे हैं, भारतीय भाषाओं और उनके बोलने वालों का गला काटने के लिए ।

शायद हमें आत्‍मविश्‍लेषण की जरूरत है। फार्म के स्‍तर पर भी बदलना होगा और चेतना के स्‍तर पर भी । क्‍या दिल्‍ली में ‘आप‘ पार्टी ने जैसे साठ साल से राज कर रहे अजगरों को नींद से जगाया है, क्‍या हिंदी साहित्‍य के कर्णधारों, लेखकों, चिंतकों, स्‍वयंसिद्ध शलाका पुरुषों को भी ऐसे पाठक के प्रश्‍नों से जगने की जरूरत नहीं है? वरना हिंदी की कहानी खत्‍म होने में ज्‍यादा समय नहीं बचा हैे।

दसवां गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल 21 से

SomethingLikeAar

नई दिल्ली : दसवां गोरखपुर फिल्मी फेस्टिवल गोकुल अतिथि भवन , सिविललाइंस,, गोरखपुर में 21 से 23 मार्च तक आयोजित किया जाएगा। यह फिल्मक समारोह जन चित्रकार चित्तप्रसाद, का. गोविन्द पानसरे और अविजित रॉय की याद को समर्पित है।

पहला दिन
शनिवार मार्च 21 , 2015

उदघाटन सत्र
शाम4से 5.30

शाम 5.30 से5.45
चायपान

शाम 5.45 से 7.15
नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा

श्रम और विस्थापन पर केन्द्रित दस्तावेजी फिल्म ‘श्रमजीवी एक्सप्रेस’ का प्रीमियर प्रदर्शन
70 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन
फ़िल्म के निर्देशक तरुण भारतीय के साथ बातचीत

शाम 7.15से 9
नया भारतीय सिनेमा
मराठी फ़ीचर फ़िल्म फैनड्री का प्रदर्शन
104 मिनट/ मराठी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2013 / निर्देशक: नागराज मंजुले

दूसरा दिन
रविवार 22 मार्च 2015

बच्चों का समय
सुबह 10 से 12

सिनेमा – सिनेमा
प्रोफ़ेसर बीरेंन दास शर्मा द्वारा सिनेमा की कहानी बताती एक विशेष प्रस्तुति
60 मिनट / दृश्यों और ध्वनियों के साथ

सुबह 11 से 11.45
संजय मट्टू के साथ कहानी –किस्से

दुपहर12 से 2

नया भारतीय सिनेमा
भोजपुरी फीचर फ़िल्म : नया पता
95 मिनट/ भोजपुरीऔर हिंदी ,अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ/ रंगीन/ 2014

फिल्म के निर्देशक पवन श्रीवास्तव और अभिनेता अभिषेक शर्मा के साथ दर्शकों की बातचीत

दुपहर 2 से 2.30
लंच ब्रेक

दुपहर 2.30 से 3.45

छतीसगढ़ मुक्ति मोर्चा द्वारा स्थापित शहीद अस्पताल का बयान करती दस्तावेजी फिल्म पहली आवाज़ का प्रदर्शन
52 मिनट / हिंदी/ रंगीन/ 2014
फ़िल्म के निर्देशक अजय टी जी के साथ बातचीत

दुपहर3.45 से 4

ब्रेक

दुपहर4से शाम5.15

पैनलचर्चा: मीडिया और सिनेमा में लोकतंत्र और सेंसरशिप
इसपैनलचर्चा मेंसंजय काक , नकुल सिंह साहनी, तरुणभारतीय, अजय टी जी , बिक्रमजित गुप्ता, पवनकुमारश्रीवास्तव और पंकज श्रीवास्तव भाग लेंगे .
संचालन: मनोज सिंह

शाम5.15 से 5.30
ब्रेक

शाम5.30 से 6.30

प्रगतिशीललेखकों के आन्दोलन पर समन हबीब और संजय मट्टू की पाठ्य –प्रस्तुति ‘आसमां हिलता है जब गाते हैं हम’
50मिनट / हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी साथ में तस्वीरें और संगीत
संगीत संकलन : अमित मिश्र

समन हबीब और संजय मटू के साथ बातचीत

शाम6.30 से 8.30

नयाभारतीय सिनेमा
बांग्ला फीचर फ़िल्म अचल
93 मिनट / बांगला, अंगरेजी सब टाईटल्स के साथ / 2012/ निर्देशक: बिक्रमजितगुप्ता
निर्देशक बिक्रमजित गुप्ता के साथ बातचीत

तीसरा दिन
सोमवार, 23मार्च 2015

सुबह 10.30 से 11.45 बजे

क्लासिक दस्तावेज़ी सिनेमा
राज –समाज, जनस्वास्थ्य, वर्ग और जेंडरकी पड़ताल करती दस्तावेजी फिल्म ‘समथिंग लाइक अ वार ’का प्रदर्शन
52 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 1991/ निर्देशक: दीपा धनराज

फ़िल्मके बाद फेस्टिवल टीम का दर्शकों के साथ संवाद

सुबह 11.45 से दुपहर1.45

नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा

विभाजन के बाद केपंजाब की दलित और सूफी रिश्तों की पड़ताल करती अजय भारद्वाज की दस्तावेजी फ़िल्म ‘मिलांगे बाबे रतन ते मेले ते’
95 मिनट / पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंगरेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2012/ निर्देशक: अजय भारद्वाज

फ़िल्म के बाद फेस्टिवल टीम का दर्शकों के साथ संवाद

लंच
दुपहर1.45 से 2.15

दुपहर2.15 से3.15 बजे तक

पड़ोस का सिनेमा : नेपाल के सिनेमाई और सांस्कृतिक परिद्रश्य पर एक प्रस्तुति

काठमांडू के मार्किस्मलर्निंग सेंटर के संयोजक बिक्कील स्थापित द्वारा नेपाली सिनेमा और सांस्कृतिक परिद्रश्य पर दस्तावेजी फिल्म और फ़ीचर फिल्मों के चुने हुए अंशों की प्रस्तुति

दुपहर3.15 से 4

नया भारतीय सिनेमा

मध्यवर्गीय भारतीय समाज की पड़ताल करती लघु फ़ीचर फ़िल्म हमारे घर
31 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / 2014/ निर्देशक: किसलय

शाम4 से 4.30
चायपान

शाम 4.30 से 5.15

नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा
पंजाबी दस्तावेज़ी फ़िल्म सेवा
27 मिनट / पंजाबी, हिदी , अंग्रेजीसब टाइटल्स के साथ/ 2013/ निर्देशक: दलजीत अमी
फ़िल्म के निर्देशक दलजीत अमी के साथ बातचीत

शाम 5.15से रात 8
नयाभारतीय दस्तावेजी सिनेमा

नकुल सिंह साहनी की दस्तावेजी फ़िल्म ‘ मुज्ज़फरनगर बाकी है’ के बहाने भारतीय राजनीति, साम्प्रदायिकता और नए अर्थतंत्र की पड़ताल
136 मिनट / हिदी अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2015
फ़िल्मके निर्देशक नकुल सिंह साहनी के साथ बातचीत

शाम 8 से रात 8.30
समापन समारोह के बहाने प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के दसवें वर्ष में प्रवेश करने पर चर्चा

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के दसवें वर्ष में प्रवेश करने के बहाने सिनेमा और समाज पर खुली बातचीत और दसवें गोरखपुरफ़िल्म फेस्टिवल का समापन समारोह।

पुस्‍तक मेले में नयी किताबें : प्रेमपाल शर्मा

शब्‍द, विचार किताबों की दुनिया से मुहब्‍बत करने वालों के लिए पुस्‍तक मेला सबसे बड़ा पर्व होता है । किसी ने यों ही नहीं कहा कि ‘पुस्‍तक दुनिया का सबसे बड़ा आविष्‍कार है ।’ थोड़ा ठहरकर सोचें तो पुस्‍तक की यात्रा दुनिया भर में सभ्‍यता की यात्रा है। उसके रूप जरूर बदल रहे हैं। कभी ताड़-पत्र पर, फिर कागजों पर और आने वालों दिनों में इलेक्‍ट्रानिक उपकरणों पर जिन्‍हें आगे बढ़ना है, उन्‍हें शब्‍द से गुजरना ही पड़ेगा। नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने इसी को ध्‍यान में रखते हुए जो पुस्‍तक मेला पहले दो वर्ष में एक बार होता था, अब उसे प्रतिवर्ष कर दिया है। समय भी फरवरी का महीना बहुत अच्‍छा चुना है। यों तो ज्ञान-विज्ञान की हजारों नयी किताबें आई हैं, लेकिन कुछ किताबों पर ध्‍यान अटकता है।

Vaigyanikon Ke Rochak Aur Prerak prasang

‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’ सुभाष चन्‍द्र लखेड़ा की ऐसी ही अच्‍छी किताब है। इस पुस्‍तक में दुनिया भर के वैज्ञानिकों की रोजाना की जिन्‍दगी के ऐसे प्रसंग हैं, जिन्‍हें पढ़कर हर बच्‍चा उनके काम को भी जानना चाहेगा। आइंस्‍टाइन और न्‍यूटन का नाम तो आपने सुना ही होगा, लेकिन आइंस्‍टाइन प्रसिद्ध भौतिकीविद वैज्ञानिक नील्‍स बोर के कमरे में कैसे तंबाकू चुराने आए थे, यह बहुत कम लोगों को पता है। तंबाकू या सिगरेट पीना कोई अच्‍छी बात नहीं है, लेकिन इन प्रसंगों के बहाने सिर्फ इस बात को बताया जा रहा है कि बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी अपनी रोजाना की जिन्‍दगी में पहले एक सामान्‍य नागरिक है, उसके बाद कुछ और। डॉ. दौलत सिंह कोठारी का जितना आभार प्रकट ‍किया जाए, उतना कम है। अपनी भाषाओं से भारत सरकार की सर्वोच्‍च नौकरियों में प्रवेश का मामला हो अथवा समान शिक्षा की बात। वे बड़े भौतिक शास्‍त्री भी थे, शिक्षा शास्‍त्री भी और नीति नियंता भी । उन्‍हें एक आयोजन में बुलाया गया। ज्‍यों ही वे प्रवेश द्वार पर पहुंचे, तो उन्‍होंने देखा कि कुछ लोगों के ‘रिबन बैज’ छोटे और कुछ के बड़े हैं। उन्‍होंने तुरंत आगाह किया कि हमें मनुष्‍य मनुष्‍य के बीच ऐसे फर्क नहीं करने चाहिए। अपने विभाग के सबसे नीचे पायदान के कर्मचारि‍यों के साथ भी उनके बराबरी के किस्‍से मशहूर रहे हैं। लेखक सुभाष चन्‍द्र लखेड़ा एक मशहूर विज्ञान लेखक हैं, जिन्‍होंने विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने में महत्‍वपूर्ण काम किया। ये प्रसंग ‘आविष्‍कार’ नाम की पत्रिका में लगातार छपे हैं और अब पुस्‍तक रूप में एक साथ देखना और संतोष देता है। सी.वी.रमण, सत्‍येन्‍द्र नाथ बोस, मैक्‍स प्‍लांक, थामस अल्‍वा एडिशन, सर हम्‍फ्री डेरी से लेकर डॉ. आत्‍माराम, अब्‍दुल कलाम आदि। लगभग 75 वैज्ञानिकों के रोचक प्रसंग इस पुस्‍तक में हैं।

apne bachche ko den vigyan drishti

बच्‍चों के अंदर वैज्ञानिक दृष्टि जगाना, प्रश्‍न पूछना और स्‍वयं उत्‍तर की जिज्ञासा जगाना ही सच्‍ची शिक्षा कही जा सकती है। ‘अपने बच्‍चों को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ ऐसे ही छोटे-छोटे मगर बड़े संदेश की किताब है। नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन की इस किताब का ‍हिंदी अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने किया है। मात्र 45 पृष्‍ठों की इस किताब में बहुत छोटे-छोटे ऐसे प्रयोग शामिल किये गये हैं, जो बच्‍चों की दुनिया बदल सकते हैं। लेखक की नजरों में विज्ञान का पहला पाठ जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना, उसकी वजह जानना और फिर उन अनुभवों को बांटना और सवाल पूछना है। इसीलिए लेखक के शब्‍दों में ‘विज्ञान की शुरूआत सबसे पहले होती है घर से। इसलिए यह पुस्‍तक जितनी बच्‍चों और शिक्षकों के लिए जरूरी है, उतनी ही माता-पिता और अभिभावकों के लिए।’ बतौर भूमिका माता-पिता के रूप में आप अपने बच्‍चों के प्रश्‍नों का जवाब देकर उसे सीखने के आनंद से सराबोर कर सकते हैं। खेल-खेल में गणित और विज्ञान सि‍खा सकते हैं और साथ ही अच्‍छी सेहत की ‍शिक्षा भी।

इतनी ही महत्‍वपूर्ण किताब है शिक्षक महेश चन्‍द्र पुनेठा की ‘दीवार पत्रिका और रचनात्‍मकता’। महेश चन्‍द्र पुनेठा एक शिक्षक के अलावा जाने-माने लेखक भी हैं और शिक्षा पर केंद्रित एक पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ का संपादन भी करते हैं। ‘दीवार पत्रिका : एक अभियान’ नाम से उनका एक ब्‍लॉग भी है। हिंदी में शायद यह पहली किताब होगी जो विस्‍तार से ‘दीवार पत्रिका’ के पूरे विचार को सामने रखती है। पुस्‍तक में छोटे-छोटे पांच खंड हैं। पत्रिका के साथ लेखक के अनुभव, कार्यशाला, बच्‍चों के अनुभव,

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

दीवार पत्रिका चलाने वाले संपादकों से बातचीत तथा शिक्षक साथियों के अनुभव इस किताब में हैं। वैसे तो पुस्‍तक का एक-एक शब्‍द महत्‍वपूर्ण है, लेकिन शिक्षकों के अनुभवों को जरूर पढ़ा जाना चाहिए। प्रमोद दीक्षित (बांदा), चिंतामणि जोशी, राजेश जोशी (पिथौरागढ़), रेखा चमोली (उत्‍तरकाशी) ने बहुत विस्‍तार से अपने अनुभवों को बांटा है। पुस्‍तक में राजेश उत्‍साही की भूमिका भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। उनकी बात पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए जो उन्होंने अपनी प्रसिद्ध बाल पत्रिका ‘चकमक’ के अनुभवों से लिखी है कि दीवार पत्रिका में बच्‍चों की चीजों को बिना संपादन के छापा जाना चाहिए, उनकी हस्‍तलिपि में हो तो और भी अच्‍छा है। क्‍योंकि बच्‍चे अपनी हस्‍तलिपि को देखकर और ज्‍यादा प्रसन्‍न होते हैं। पुस्‍तक में शामिल सभी अनुभव यही कहते हैं कि दीवार पत्रिका हर स्‍कूल की एक नियमित गतिविधि बने और यह भी कि यह बच्‍चों की स्‍वैच्छिक गतिविधि को किसी आदेश से परिचालित न हो। लेखक मंच प्रकाशन ने इन सभी किताबों को बहुत सुरुचि से छापा है

पुस्‍तक : ‘वैज्ञानिकों के रोचक और प्रेरक प्रसंग’
लेखक : सुभाष चन्‍द्र लखेड़ा
मूल्‍य : 80 रुपये (अजिल्‍द), 150 रुपये (सजिल्‍द)

पुस्‍तक : ‘अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि’
लेखक : नैन्‍सी पाउलू, मार्गेरी मार्टिन
हिंदी अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय
मूल्‍य : 40 रुपये (अजिल्‍द), 75 रुपये (सजिल्‍द)

पुस्‍तक : ‘दीवार पत्रिका और रचनात्‍मकता’
लेखक : महेश चन्‍द्र पुनेठा
मूल्‍य : 80 रुपये (अजिल्‍द), 150 रुपये (सजिल्‍द)

सभी पुस्‍तकों के प्रकाशक-
लेखक मंच प्रकाशन
433, नीति खंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201014
मोबाइल नंबर-9871344533

वाम सांस्कृतिक आंदोलन के योद्धा थे जितेंद्र रघुवंशी : जसम

jitender raghuvanshi

आगरा : अभी लोगों के शरीर से होली का रंग छूट भी नहीं पाया था कि देश के तमाम तरक्कीपसंद संस्कृतिप्रेमियों का कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी से  हमेशा के लिए साथ छूट गया। 63 वर्ष की उम्र में 7 मार्च की सुबह ही उनका स्वाइन फ्लू के कारण दिल्ली  स्थित सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। पिछले साल ही जून माह में आगरा विश्वविद्यालय के के.एम.इन्स्टीट्यूट के विदेशी भाषा विभाग प्रमुख के पद से 30 साल की सेवा के उपरांत उन्होंने अवकाश प्राप्त किया था। अभी वे लिखने-पढ़ने और हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के विकास को लेकर कई योजनाओं पर काम कर रहे थे। उनके निधन की खबर से देश भर के साहित्य-कला प्रेमी लोकतान्त्रिक जमात को जबर्दस्त आघात लगा है। वे अपने पीछे पत्नी, पुत्री और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार छोडकर हमेशा के लिए हमसे विदा हो गए।

13 सितंबर 1951 को आगरा में पैदा हुए जितेंद्र रघुवंशी की शिक्षा-दीक्षा आगरा में ही हुई। यहीं के. एम. इंस्टीट्यूट से हिन्दी से परास्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने अनुवाद और रूसी भाषा में डिप्लोमा भी किया। बाद में लेनिनग्राद विश्वविद्यालय (सेंट पीटर्सबर्ग) से रूसी भाषा में एम.ए. किया। उन्होंने तुलनात्मक साहित्य में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। पिता राजेन्द्र रघुवंशी और माँ अरुणा रघुवंशी के सानिध्य में प्रगतिशील साहित्य संस्कृति के साथ बचपन से ही उनका संपर्क हो गया था। पिता राजेन्द्र रघुवंशी इप्टा आंदोलन के सूत्रधारों में से एक थे। कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी आजीवन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। थियेटर को उन्होंने अपने सांस्कृतिक कर्म के बतौर स्वीकार किया। 1968 से इप्टा के नाटकों में अभिनय, लेखन, निर्देशन आदि के क्षेत्र में वे सक्रिय हुए। एम.एस. सथ्यू द्वारा निर्देशित देश विभाजन पर आधारित बेहद महत्त्वपूर्ण फिल्म ‘गरम हवा’ में उन्होंने अभिनय किया। राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ पर बनी फिल्म के निर्माण में सहयोग दिया। ग्लैमर की दुनिया  में वे  बहुत आसानी से जा सकते थे, पर उसके बजाय उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के निर्माण के प्रति जाहिर की। अभी वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तरप्रदेश के अध्यक्ष थे।

जितेंद्र जी का मुख्य कार्यक्षेत्र भले ही नाटक और थियेटर रहा हो, पर मूलतः वे एक कहानीकार थे। आजादी आंदोलन के प्रमुख कम्युनिस्ट कार्यकर्ता राम सिंह के जीवन पर आधारित उनकी एक कहानी काफी चर्चित हुई थी। इसके अलावा ‘लाल सूरज’, ‘लाल टेलीफोन’ जैसी कहानियों के शीर्षक इस बात के गवाह हैं कि वे लाल रंग को चहुँओर फैलते देखना चाहते थे। उनके द्वारा लिखे कुछ प्रमुख नाटक ‘बिजुके’, ‘जागते रहो’ और ‘टोकियो का बाजार’ है। अभी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व आकाशवाणी आगरा से उनकी एक कहानी का प्रसारण किया गया था और आगरा महोत्सव के दौरान 23 फरवरी को प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाट्यप्रस्तुति ‘रंग सरोवर’ का मंचन हुआ था। इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि मृत्यु के ठीक पहले तक वे किस तरह प्रतिबद्ध और सक्रिय थे। आगरा में किसी भी प्रगतिशील सांस्कृतिक आयोजन की संकल्पना उनको शामिल किए बगैर नामुमकिन थी। वे युवाओं के लिए एक सच्चे रहनुमा थे। 2012 में आगरा में हुए रामविलास शर्मा जन्मशती आयोजन समिति के सलाहकार के रूप में उनके अनुभव का लाभ इस शहर को प्राप्त हुआ। हर साल होने वाले आगरा महोत्सव के सांस्कृतिक समिति के वे स्थाई सदस्य थे। इसके अलावा शहीद भगत सिंह स्मारक समिति,  नागरी प्रचारिणी सभा,  आगरा,  बज़्मे नजीर,  यादगारे आगरा, प्रगतिशील लेखक संघ आदि से भी उनका जुड़ाव रहा। आगरा में वे हर साल वसंत के महीने में नजीर मेले का आयोजन कराते थे और हर गर्मी में बच्चों के लिए करीब एक माह की नाट्यकार्यशाला नियमित तौर पर कराते थे। 1990 के बाद देश के भीतर सांप्रदायिक राजनीति के उभार के दिनों में उनके भीतर का कुशल संगठनकर्ता अपने पूरे तेज के साथ निखर कर सामने आया। इप्टा द्वारा इसी दौर में कबीर यात्रा, वामिक जौनपुरी सांस्कृतिक यात्रा, आगरा से दिल्ली तक नजीर सद्भावना यात्रा, लखनऊ से अयोध्या तक जन-जागरण यात्रा आदि का आयोजन किया गया। उनका वैचारिक निर्देशन और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि ही इस पूरी योजना के केंद्र में थी।

वे लेखक संगठनों की स्वायत्तता, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक संगठनों की जरूरत और भूमिका को नया आयाम देने वाले चिंतक भी थे। लेखकों की आपेक्षिक स्वायत्तता के हामी होने के बावजूद वे यह मानते थे कि ‘‘अब यह तो उसे (लेखक को ) ही तय करना है कि वह नितांत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है या सामाजिक स्वतन्त्रता। सामाजिक स्वतन्त्रता की जंग सामूहिक रूप से ही लड़ी जा सकती है। सामूहिकता के लिए संगठन अनिवार्य है। अब संगठन का न्यूनतम अनुशासन तो मानना ही होगा। ऐसे लेखक तो हैं और रहेंगे, जिन्हें एक समय के बाद लगता है कि उनका आकार संगठन से बड़ा है। वे अपनी ‘स्वतन्त्रता’ का उपयोग करें, लेकिन अपने अतीत को न गरियाएँ।’’ वैचारिक भिन्नता का सम्मान करते हुए भी सांस्कृतिक कार्यवाहियों के लिए एकता का रास्ता तलाश लेने वाले ऐसे कुशल संगठनकर्ता की आकस्मिक मृत्यु से हिन्दी क्षेत्र में वाम सांस्कृतिक आंदोलन को ऐसी क्षति हुई है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। वे आखिरी दम तक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी सांस्कृतिक योद्धा रहे। विचारधारात्मक दृढ़ता और समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष भारत का स्वप्न देखते हुए वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए जो जमीन छोडकर कॉ. जितेंद्र रघुवंशी चले गए हैं, उस पर नए दौर में नई फसल की तैयारी ही उनके प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच एक सच्चे कम्युनिस्ट, क्रांतिकारी संगठनकर्ता और सांस्कृतिक आंदोलन के मजबूत योद्धा को क्रांतिकारी सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय सहसचिव प्रेमशंकर द्वारा जारी)

मनोहर चमोली ‘मनु’ की डायरी

Manohar Chamoli 'manu'

1 अगस्‍त 1973 को पलाम, टिहरी गढ़वाल, उत्‍तराखंड में जन्‍मे मनोहर चमोली ‘मनु’ की रचनाएं देश भर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्‍होंने उत्‍तराखंड की विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम से जुड़ी कई पुस्‍तकों के लेखन-संपादन में योगदान दिया है। वह नियमित रूप से डायरी लिखते हैं। इसमें उन्‍होंने शिक्षा और बच्‍चों से जुड़े हुए कई गंभीर सवाल खडे़ किए हैं। उनकी डायरी के कुछ अंश-

3 जुलाई 2010 :  जुलाई का महीना पढ़ाई का महीना माना जाता है। बच्चों पर काम का दबाव बढ़ जाता है। पर बच्चों की सुध किसे है? हर कोई काम-पर-काम देने पर आमादा है। क्या जरूरी है कि बच्चे प्रश्‍न-अभ्यास करके कल ही लाएं। आज जो पाठ पढ़ाया गया है तो आज ही वे हर विषय के पाठों का अभ्यास कैसे कर लें? ये तो कोई बात नहीं। मगर शिक्षक भी क्या करें। अधिकारी या जांच मुआयना वाले भी तो बच्चों की कॉपी ही देखते हैं। काम ठीक-ठाक है तो बढ़िया, काम कॉपी पर नहीं है तो बच्चा भी नकारा है और शिक्षक भी नकारा। मेरी राय में तो पढ़ाया गया पाठ बच्चे के समझ में आ जाना चाहिए। बच्चे ने पाठ से क्या सीखा। बच्चे को अनुभव क्या हुआ। ये महत्वपूर्ण है, न कि बच्चे ने कॉपी पर सारे प्रश्‍नों का हल किया है या नहीं, ये जांचना।

10 जुलाई 2010 :  ये हास्यास्पद है। नई शिक्षण विधियों में और नए तौर-तरीकों में भी अब ये माना जाता है कि आप बच्चे को लेख सुंदर बनाने पर अनावश्यक जोर न दें। हर बच्चे का लेख मोती जैसा आकर्षक और सुंदर हो ही नहीं सकता। चाहे कितना जोर लगा लें। पर ये क्या जरूरी है कि जिसका लेख बहुत सुंदर हो, वह शैक्षिक स्तर पर पर भी बेहद अच्छा होगा। क्या जिसका लेख अच्छा नहीं है, वो पिछड़ा होगा? लेख स्पष्ट पढ़ा जा रहा है, तो ठीक है न। बच्चों की कॉपी पर बार-बार लेख सुधारने की चेतावनी देने से क्या होगा। क्या बच्चा सिर पर पांव रखकर लेख सुधारेगा? कॉपी को लाल-काला करने से क्या होगा? क्या हर शिक्षक का लेख सुंदर है?

 17 जुलाई 2010 :  कक्षा-कक्ष में बैठक व्यवस्था के भी कई मायने हैं। बुनियादी शिक्षा से ही बच्चों को लड़का-लड़की के भेद के साथ बिठाया जाता है। क्या जरूरी है कि हम उन्हें अलग-अलग बिठाएं। छात्र-छात्राओं में बहुत सारी अनर्गल बातें इसलिए भी होती हैं कि उन्हें दूर-दूर बिठाया जाता है। यदि वे मिल-जुल कर बैठते हैं तो क्या भद्दी बातें वे कर पाएंगे। हम क्यों नहीं समझते जिस परिवार में सिर्फ दो ही लड़के हों, या दोनों ही लड़कियां हों या एक लड़का-एक लड़की हों तो बेहतर विकास किसका होगा। जाहिर है, जहां एक लड़का-एक लड़की है। तो फिर हम स्कूल की बैठक व्यवस्था को क्यों नहीं ठीक रखते। प्रार्थना सभा में भी ऐसा ही होता है। आखिर क्यों?

24 जुलाई 2010 :  मैंने कक्षा 9 की बैठक व्यवस्था में मेधावी, कम मेधावी और साधारण छात्रों को मिला-जुला कर बिठाया ताकि समूह में वे आपस में सहयोग से तेजी से सीखें। लेकिन दो दिन बाद वे अपनी इच्छानुसार पहले की स्थिति में बैठ गए। मैंने समझाया कि आखिर कुछ कारण ही रहा होगा कि मैंने ऐसा किया। मुझे अच्छा नहीं लगा कि आप लोगों ने अपनी दोस्ती, पसंद-नापसंद के हिसाब से अपनी सीटें बदल लीं। जबकि कक्षा में हम सब एक-दूसरे के दोस्त हैं, भाई हैं, बहिन हैं। यहां तक कि हम एक-दूसरे के शिक्षक भी हैं। हम एक-दूसरे से सीखते हैं और एक-दूसरे को सीखाते भी हैं।

31 जुलाई 2010 : आज अचानक कुछ पन्ने उलटे। कुछ अंश पढ़कर अच्छा लगा। लेकिन कुछ अंश पढ़कर मुझे यह भी लगा कि मैं आत्ममुग्धता में आकर अपने बारे में ही लिखने लगा हूं। पहले ही दिन तो यह सोचा था कि स्कूल बाल जीवन और बच्चों से जुड़कर जो कुछ अनुभव होंगे, उन्हें ही साझा करूंगा। लेकिन यह क्या? मैं तो अपना ही विवरण लिखने लगा। सोचा कि टाइप करते हटा दूं। फिर सोचा यह तो अपनी कमजोरी छिपाना भी तो होगा? अब आगे से ध्यान रखूंगा। यहां तक पढ़ते-पढ़ते पाठक को भी तो पता चले कि मेरी मनःस्थिति में अपने लिए क्या सोच है। मेरी समझ क्या है। आज इतना ही। विद्यालय से जुड़ी गतिविधियां बहुत कुछ सिखाती हैं। लेकिन जो कुछ सिखाती है, हम उसका उपयोग रोजमर्रा की कक्षा में क्यों नहीं कर पाते?

30 जुलाई 2010 : आज अपराह्न हमारे प्रधानाचार्य कार्यमुक्त हो गए। पाबौ स्थित बिडौली कॉलेज के लिए। मुक्त रूप से उनका विश्लेषण किया जाए तो अनुशासन प्रिय थे। मगर ऐसा अनुशासन जिससे वे खुद न बंधे हों तो? कक्षा-कक्ष में पढ़ाई होनी चाहिए। मगर जब उन्हें किसी शिक्षक से बात करनी हो या गप्पे लड़ाने का मन हो तो फिर कोई वादन क्या कोई क्लास क्या। दरअसल मैंने महसूस किया है कि बी.एड. की योग्यता एक अलग महत्व रखती है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक राज्य सभा और लोक सभा सांसद में अंतर हो जाता है। यहां मैंने महसूस किया है कि जो अच्छा शिक्षक है, उसे किसी डिग्री की क्या आवश्यकता? जो अच्छा शिक्षक नहीं है, वह चाहे कितने प्रशिक्षण ले ले, कक्षा में बेहतर नवाचार नहीं कर सकता।

01 अगस्त 2010 : मैं परंपरागत शिक्षण को आज के संदर्भ में खारिज करता हूं। शु़द्ध उच्चारण की अनिवार्यता बुनियादी विद्यालयों में तो कतई नहीं होनी चाहिए। बच्चे स्थानीयता को छोड़ कर एकल स्वर लेकर आगे बढ़ेंगे तो सांस्कृतिक विविधता कहां रह जाएगी। हम आज किसी भी व्यक्ति को उसकी बोली-भाषा से ही पहचान पाते हैं कि ये जरूर उस क्षेत्र का है। इसके पीछे कारण है कि उसके संवाद में क्षेत्र की बोली-भाषा का पुट साफ झलकता है। मातृभाषा की उपेक्षा करना, उसे नजर अंदाज करने का कार्य हमारे स्कूल कर रहे हैं। हम ज्यादा जोर शुद्ध उच्चारण पर देते हैं। स्थानीय बोली-भाषा का कोई शब्द किसी बच्चे ने कह दिया तो उसका उपहास उड़ाते हैं। हम शिक्षकों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

3 अगस्त 2010 : कक्षा 9 में एक बालक बहुत शरारती था। अधिकांश शिक्षक उसे कक्षा 9 में रोकने के लिए सहमत थे। मैंने कहा भी कि यदि वो अपनी मेहनत से पास हो रहा है तो हम भला उसे कैसे रोक सकते हैं। बहरहाल सालाना परीक्षा में अपनी उदण्डता और शरारत के चलते भी उसने मेहनत की और अच्छे अंकों से पास हुआ। मैंने पूर्व में भी उसे कई बार समझाया। शिक्षा का महत्व बताया। एक दिन तो प्रार्थना स्थल पर ही वो साथी शिक्षक से उलझ पड़ा। शिक्षक ने उसे भगा दिया। गाली-गलोज करता हुआ वह फिर कभी स्कूल नहीं आया। प्रधानाचार्य भी उसे ढीठ की संज्ञा दे चुके थे। बहरहाल कक्षा दस में प्रवेश के बाद भी वो कई दिनों तक स्कूल नहीं आया। कक्षाध्यापक ने उसका नाम काट दिया। कई दिनों बाद पुनःप्रवेश की बाबत उसके अभिभावक आए। सभी शिक्षक इस पक्ष में नहीं थे कि उसे प्रवेश दिया जाए। अनुशासनहीनता के चलते उसकी टी.सी. काट दी गई। मैं कक्षा में था। अजीब सा लगा। पर क्या करता। एक दिन वही छात्र पौड़ी मिला। उसने पौड़ी के कॉलेज में प्रवेश ले लिया। अब स्कूल आते-जाते वह मिल जाता है। मुझे तो वह नमस्ते करता है पर बाकि शिक्षकों को वह नमस्ते नहीं करता। मैंने महसूस किया है कि बच्चे हमारे व्यवहार को याद रखते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते। वे समझदार होने पर आपका आकलन कर ही लेते हैं। हम शिक्षक हैं, कोई तानाशाह नहीं।

20 अगस्त 2010  : बागेश्वर में स्कूल के पीछे मलबा आ जाने से 18 बच्चे काल कवलित हो गए। यह हादसा 17 अगस्त को हुआ। यह हादसा कहीं भी हो सकता है। किसी के साथ भी हो सकता है। अब सरकार चेती है कि विद्यालयी भवनों के लिए इतनी राशि उपलब्ध करायी जाएगी। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ ये राज्य के दायित्व होते हैं। मगर आज की सरकारें ये तीनों चीजे़ मुहैया कराने में असमर्थ हैं। कुछ जागरूक संस्थाओं और शिक्षाविदों ने भूखरहित भोजन का अधिकार आंदोलन चलाया। आज बुनियादी स्कूलों में मीड डे मील चल रहा है। इसे हाई स्कूल स्तर नहीं, इण्टर स्तर तक चलाया जाना चाहिए। बहरहाल, बच्चों की मौत पर तीन दिन का राज्य शोक मनाया गया। कई शिक्षकों को संवेदनाओं की चिंता नहीं, उन्हें तो यूं ही बैठे-ठाले अवकाश मिल गया। श्रद्धांजलि के छूटते ही छुट्टी की खुशी मास्टरों के चेहरे में साफ दिख रही थी। बच्चों की क्या कहें, बच्चे तो बच्चे हैं, छुट्टी का घंटा बजते ही बच्चे तो खुश होंगे ही।

25 अगस्त 2010 :  स्कूल हो या घर। शिक्षक, अभिभावक और समाज भी बच्चों में प्रतियोगिता की होड़ जगा रहे हैं। ऐसी प्रतियोगिता, जिससे हर बच्चा अव्वल आना चाहता है। प्रथम तो एक ही रहेगा। फिर पीछे रहने वालों के हाथ में लगती है,  मायूसी। ऐसी मायूसी जो उन्हें कुण्ठित करती है। गलत मनोभाव जगाती है। इससे यही बच्चे समाज में असामाजिक काम करने लगते हैं। ‘मैं’ का भाव जो बच्चों में तेजी से गहराता जा रहा है, उसके लिए हम शिक्षक भी तो जिम्मेदार हैं। हर कोई सौ फीसदी अंक क्यों लाए? हर कोई प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्यों आए। तीसरा खुद को दूसरे से और दूसरा खुद को पहले से कमतर आंकता है। शीर्ष पर न रहने का दुख उसे लंबे समय तक व्यथित करता है।

26 अगस्त 2010 : हम शिक्षक ऐसा क्यों करते हैं कि जो बच्चे हमारी कक्षा पास कर बड़ी कक्षा में चले जाते हैं तो हम उन्हें नजरअंदाज करने लग जाते हैं। हमारा व्यवहार ऐसा हो जाता है कि अब हमारा आप लोगों से कोई मतलब नहीं। बच्चे इस व्यवहार को बड़ी हैरानी से महसूस करते हैं। हमारी उदासीनता अच्छी नहीं। ये क्या बात हुई कि हम जिन कक्षाओं को नहीं पढ़ाते तो उन कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे हमारे नहीं हैं। ये व्यवहार हमें कहां ले जाएगा, यह बात दूसरी है। मगर बच्चे ऐसे व्यवहार से कहां पहुंचेंगे,  इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

28 अगस्त 2010 : जजों को नकल करते पकड़ा गया। क्या होगा इनका, जिनके हाथ पर न्याय करने की जिम्मेदारी दी गई है, वे ही नकल करके अव्वल आना चाहते हैं। अब बताइए, हम स्कूलों में बच्चों को परीक्षा में, कक्षा में अपना-अपना करने की घुट्टी पिलाते हैं। बच्चे नकल की प्रवृत्ति कहां से सीखते हैं? नकल करने का भाव ही क्यों आता है? क्या ऐसा तो नहीं कि परीक्षा और मूल्यांकन ही दोषपूर्ण है। या परीक्षार्थी का आत्मविश्वास कमजोर है। पर ये जज जिनका आत्मविश्वास बड़े-बड़े अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए होना चाहिए, बेकसूर को बाइज्जत बरी का निर्णय देने का विश्वास इन जजों में होना चाहिए, ये नकलची हैं। उफ क्या होगा। भावी पीढ़ी क्या करेगी। क्या दिशा लेकर ये नौनिहाल नागरिक बनेंगे?

29 अगस्त 2010 : कक्षा में बच्चे नजरें झुकाएं रहते हैं। शिक्षकों से नजरें नहीं मिलाते। क्या यह ठीक है? सब जगह नहीं होता तो बहुत जगह होता ही है। उस पर शिक्षकों का तुर्रा यह है कि यह संस्कार है। बच्चे हैं शिक्षकों से कैसे नजर मिलाएंगे।

30 अगस्त 2010 : संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए खण्ड विकास स्तरीय प्रतियोगिता में निणार्यकों में मैं भी रहा। आशुभाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता, समूह गान, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, नृत्य एवं नाटक प्रतियोगिता आदि। पौड़ी नगर और उसके आस-पास के विद्यालयों ने प्रतिभाग किया। मैंने साफ महसूस किया कि नगर के विद्यालयों के बच्चों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी। वे हर चीज से खुद को परिपूर्ण किये हुए थे। वहीं ग्रामीण विद्यालयों के बच्चे स्कूली गणवेश में ही अपनी प्रस्तुतियां दे रहे थे। उनके चेहरे में पूर्व से ही झिझक, अपने को कमतर समझ लेने का भाव पहले से ही था। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश निर्णायक भी प्रदर्शन में बच्चों की आत्माभिव्यक्ति को कम और बाहरी दिखावे को ही महत्वपूर्ण मान रहे थे। एक शिक्षक तो नृत्य नाटिका और नृत्य गीत को एक ही चीज बताने पर तुले हुए थे। कुल मिलाकर इन प्रतियोगिताओं का मकसद भी बच्चों में और हीन भावना जगाने के साथ अव्वल आने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद की भावना को जमाने का रहता है। पूर्व से चली आ रही इस प्रकार की अस्वस्थ प्रतियोगिताओं को बंद किया जाना चाहिए। आखिर 15-20 विद्यालयों को बुलाकर उनमें से अव्वल टीमों को छांटने का जो तरीका है यह बच्चों में प्रतिस्पर्धा की जगह नकल, हथकण्डे और दूसरों को कमतर आंकने का भाव ज्यादा जगाता है।

31 अगस्त 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कालेज में संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता के आयोजन में निर्णायक की भूमिका में था। वाद-विवाद, आशुभाषण, सामान्य ज्ञान, नृत्य, समूह गान और नाटक गतिविधियों में थे। ठीक है, कुछ अव्वल आते हैं। कुछ को छोड़कर बाकि पीछे ही रह जाते हैं। उनमें मायूसी, हताशा, निराशा, कुण्ठा नहीं रह जाती। आखिर श्रेष्ठ को सर्वश्रेष्ठ बनाने की दौड़ में ही तो इन प्रतियोगिताओं को देखा जाता है। हम स्कूल में मेधावी छात्रों को ही इन प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करवाते हैं। वे अन्य विद्यालयों से होड़ करते हैं। ऐसे खण्ड स्तर पर, जनपद स्तर पर, राज्य स्तर पर और अखिल भारतीय स्तर पर होड़ मची रहती है। अंत में प्रथम, द्वितीय, और तृतीय का चयन होता है। कुछ सांत्वना पुरस्कार। आखिर इन सबका क्या मतलब है। यह कहना कि जो पीछे रह गए वो कल आगे आएंगे। जो सिर्फ दर्शक रहे, वे कल प्रतिभाग करेंगे। आखिर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है? नहीं। मुझे तो लगता है कि ऐसी प्रतियोगिताएं हों, जो हमें सहभागिता, सामुदायिकता, सहयोग, प्रेरणा और प्रेम का पाठ पढ़ाए। जरा टटोलिए खुद को क्या ऐसा होता है?

3 सितंबर : 5 सितंबर को शिक्षक दिवस है। मैं तो संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में जीजीआईसी में व्यस्त रहा। कल पांच दिन बाद स्कूल जाना है। लेकिन सुना है कि 5 को संडे है तो 4 को ही शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। ये क्या बात हुई ?

4 सितंबर 2010 : कल रात से बारिश लगी है। आज सुबह का ही स्कूल रहा। बहरहाल। बच्चों को शिक्षक दिवस मनाने की बात कही तो वे 10 मिनट की तैयारी में ही शुरू हो गए। आज कई शिक्षक नहीं थे। मगर जो भी थे, बच्चों ने हर किसी शिक्षक की नकल की। हमारे आचरण, आदत की नकल की। अन्य बच्चों ने पहचाना कि अमुक शिक्षक की नकल की जा रही है। बच्चों ने हमारे हाव-भाव को, हमारी आदतों को और हमारे द्वारा अक्सर दोहराए जाने वाले वक्तव्यों को अभिनय में शामिल किया। जिससे अन्यों ने पहचाना कि अमुक की नकल की जा रही है। अच्छा लगा और एक बात समझ में आई कि बच्चे कक्षा-कक्ष में छोटी-छोटी बातों को बड़ी गंभीरता से सुनते-समझते हैं। हमें बच्चों को हलके ढंग से नहीं लेना चाहिए।

9 सितंबर 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कॉलेज पौड़ी संस्कृत अकादमी हरिद्वार द्वारा आयोजित जनपदीय संस्कृत छात्र प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। अत्यधिक बारिश और भूस्खलन के कारण कई ब्लॉक तो आ ही नहीं पाए। खैर 1 बजे शुरू हुआ। मैं निर्णायक सदस्य के रूप में था। आशु भाषण में। बच्चों ने अच्छा किया। एक बालिका अपने विचार दिए गए विषय पर नहीं रख सकी। रो पड़ी। मैंने उसका हौसला बढ़ाया। फिर भी वह संयत नहीं हो पाई। बाद में मैंने उसे बुलाया। समझाया। कहा-‘‘ये प्रतियोगिताएं हर किसी को अव्वल नहीं बनाती। तुमने प्रतिभाग किया यह बड़ी बात है। मगर जीवन के संघर्ष और प्रतियोगिता में तुम अव्वल रहोगी। मेरा विश्वास है।’’ यह कहने पर वो फफक-फफक कर रो पड़ी। फिर जाकर उसे कुछ आराम-सा मिला। ये प्रतियोगिता मेधावी छात्रों को ओर अलग-थलग कर देती है, सामान्य बच्चों से। ऐसी प्रतियोगिता क्यों नहीं हो सकती, जिसमें अधिक से अधिक बच्चों का प्रतिभाग हो सके।

25 सितंबर 2010 : आजकल गढ़देवा के 60 वर्ष पूर्ण हो जाने के अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन पर काम कर रहे हैं। राजकीय बालिका इंटर कालेज में। आज एक बालिका मेरे पास आई। कहने लगी-‘‘सर। मैं भाषण प्रतियोगिता में थी। मैं जनपद स्तर की प्रतियोगिता में कोई स्थान प्राप्त नहीं कर सकी। मुझे मैडम ने डांटा-भला बुरा कहा। अब मैं आगे से कभी कोई प्रतियोगिता में शामिल नहीं होंगी।’’ मैंने समझाया। मगर वह रोने लगी। हालांकि बाद में वह समझ गई और मान गई कि प्रतियोगिताओं में शिरकत करना भी एक तरह से बड़ी उपलब्धि है। पर क्या ऐसा मैडम को करना चाहिए था। हम शिक्षक ही बच्चों में अव्वल आने की दौड़ करवाते हैं। पिछड़ने पर उन्हें डांटते हैं। वे हमारी बातों को गहराई से लेते हैं। शायद जीवन भर भूलते भी नहीं। हमें ऐसा करना चाहिए? नहीं न?