Archive for: January 2015

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

अतीत से लेकर वर्तमान तक की एक सैर : महेश चंद्र पुनेठा

Daxin bharat Me Solah Dinयात्राएं हमारे जीवनानुभव को समृद्ध करती हैं। नई ताजगी और स्फूर्ति से भरती हैं। आदमी का नजरिया विस्तृत करती हैं। अनेक पूर्वाग्रहों और धारणाओं को तोड़ती हैं। यांत्रिकता और एकरसता को भंग करती हैं। युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक के शब्दों में कहें, तो- ‘यात्रा हमारी जानकारी का ही विस्तार नहीं करती है, बल्कि हमारे भीतर की ग्रहण करने की शक्ति के बारे में हमें बताती है। इसमें हमें वर्तमान की ही खबर नहीं होती, वरन अतीत से भी रू-ब-रू होते हैं। शायद इसलिए यात्रा हमें न सिर्फ वर्तमान से अतीत की ओर ले जाती है, बल्कि अतीत से वर्तमान की ओर आने की तमीज भी सिखाती है।’ इसलिए यात्राओं के लिए हमें समय निकालना ही चाहिए, लेकिन जहां जीवन की तमाम आपाधापी के बीच यात्रा हर आदमी के लिए संभव नहीं होती है, वहीं मुझ जैसे यात्राभीरू चाहकर भी यात्रा में नहीं जा सकते हैं। ऐसे में यात्रा वृत्तांत यात्रा न कर पाने की कमी को कुछ हद तक पूरी करते हैं। हमें उन जगहों से परिचित कराते हैं, जहां हम सशरीर नहीं पहुंच पाते हैं। हिंदी साहित्य में यात्रा वृत्तांतों की एक लंबी परम्परा रही है। सद्य प्रकाशित ‘दक्षिण भारत में सोलह दिन’ नामक यात्रा वृत्तांत इस परम्परा का विकास है, जिसके लेखक हैं हिंदी के युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक।

सोलह दिनों की यह यात्रा दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा शहरों में की गई। ये शहर हैं- चेन्नई, काँचीपुरम, महाबलीपुरम, पाँडिचेरी, चिदम्बरम, तंजौर, तिरुच्ची, कन्याकुमारी, शुचीन्द्रम, नेडुमगाड, तिरूअनंतपुरम, कोच्चि, मैसूर तथा बैंगलूर। इन स्थानों पर लेखक अधिकतर मंदिरों के दर्शन करने गया, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी धार्मिक आस्था से प्रेरित होकर इस यात्रा में गया था। जैसा कि वह स्वयं कहते हैं- ‘हमारे लिए यह यात्रा पुण्य कमाने से ज्यादा दक्षिण के इतिहास, जीवन तथा संस्कृति से रू-ब-रू होने का माध्यम थी। तीनों चीजों को जानने के लिए मंदिरों से बढिय़ा कौन-सी जगह हो सकती है?’ इसलिए यह यात्रा वृत्तांत इन स्थानों के ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थलों का वर्णन ही नहीं करता है, बल्कि वहां की भाषा, संस्कृति और सामाजिक व्यवहार से भी हमें परिचित करता है। लेखक ने जो देखा और जैसा देखा उस पर अपनी बेवाक प्रतिक्रिया तो व्यक्त की है, साथ ही विभिन्न स्थानों की ऐतिहासिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी संक्षेप में अवगत कराने की सफल कोशिश की गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि हम भी लेखक के साथ-साथ उन स्थानों की यात्रा कर रहे हैं। बहुत सहज-सरल शैली में गहरी रसात्मकता के साथ यह वर्णन किया गया है। यह किताब कथा का सा आनंद देती है। लेखक छोटे-छोटे प्रसंगों को किस्सागोई के अंदाज में बहुत रोचकता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करता जाता है। लेखक के भीतर और बाहर दोनों के दर्शन इस वृत्तांत में होते हैं। लेखक का पूरा व्यक्तित्व और सोच सामने उभर आती है। जैसे एक स्थान पर वह दक्षिण भारतीयों के संस्कृति एवं आधुनिकता के समन्वय के बारे में बात करते हुए आधुनिकता के बारे में कहते हैं-‘आधुनिकता का संबंध पहनावे, भाषा तथा फैशन से नहीं होता है, उसका असर हमारी सोच तथा व्यवहार में भी पडऩा चाहिए। अगर व्यक्ति सहृदय, मानवीय तथा बड़ी सोच वाला नहीं है, तो वह कितना ही समृद्ध क्यों न हो जाए, उसके द्वारा लपेटे हुए बाहरी तामझाम का कोई अर्थ नहीं रह जाता।’ इसी तरह वह ‘अरविंद की भावभूमि में’ अरविंद दर्शन को याद करते हुए आध्यामिता के बारे में कहते हैं कि ‘आध्यामिकता व्यक्ति के अन्तर्जगत, जीवन की अनिश्चिंता, विडंबना तथा अंतर्विरोधों से जुड़े सवालों के उत्तर तलाशने की कोशिश करती है। आध्यामिकता तेजी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। देखते ही देखते आध्यात्मिक गुरुओं के अनुयायिओं और उनके साम्राज्य में आशातीत वृद्धि हो जाती है। लेकिन एक सवाल मुझे लगातार सोचने को मजबूर करता है कि बहुत जल्दी हर नई आध्यात्मिक धारा एक सम्प्रदाय में बदल जाती है। उस सम्प्रदाय के लोग अपने सोचने के तरीके को सब से श्रेष्ठ घोषित करने में लग जाते हैं। समाज को उसके बारे में पता नहीं चल पाता। जिस प्रकार साहित्य, सिनेमा, संगीत तथा कला किसी भी व्यक्ति के पास बेरोक-टोक पहुंचकर उसे अपना बना लेते हैं, वैसा आध्यात्मिकता के साथ नहीं होता। उस धारा के प्रतिनिधि दावा करते हैं कि इसे समझने के लिए तुम्हें हमारी शरण में आना होगा, हमारा शिष्य बनना होगा। शायद यही आध्यात्मिकता की सीमा भी है। वरना इतने गुरुओं तथा शिष्यों के होने के बावजूद, वे अपने समय को प्रभावित क्यों नहीं कर पाते हैं?’ वहां के मंदिरों में उमडऩे वाली भीड़ को देखकर लेखक के मन में बड़ा महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है जो तमाम धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए विचारणीय है- ‘मंदिर-तीर्थस्थानों में तिल रखने की जगह नहीं मिलती, लेकिन शायद ही धर्म इनके व्यवहार को प्रभावित करता हो? यह सबसे बड़ी विडंबना है। यही लोग ऑफिस में जाकर घूस लेते हैं, घर में जाकर मानसिक तथा शारीरिक हिंसा करते हैं। थोड़ी-सी बात में आपा खोकर लडऩे-मरने को तैयार हो जाते हैं। यह सवाल किसी एक धर्म का नहीं, सभी धर्मों को माननेवालों के जीवन में यह फांक दिखाई देती है।’

यह वृत्तांत दक्षिण की पुरानी यादों से शुरू किया गया है, जब पहली बार लेखक ऑटोमोबाइल कंपनी टीवीएस में नौकरी के दौरान एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने एक माह के लिए मदुरै गया था। इस यात्रा वृत्तांत की खासियत है कि दक्षिण भारत का वर्णन करते हुए लेखक को बार-बार अपना उत्तराखंड याद हो आता है। विशेषकर वहां के लोगों के आचार-व्यवहार के संदर्भ में। दिनेश कर्नाटक मानते हैं कि भाषा तथा संस्कृति के मामले में कुछ स्थूल भेद होने के बावजूद संस्कृति की आधारभूमि एक ही है, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है।

कोई उत्तर भारतीय दक्षिण भारत की यात्रा करे और भाषा का सवाल उसके मन में पैदा न हो, ऐसा नहीं हो सकता। दिनेश कर्नाटक भी उसके अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक संवेदनशील शिक्षक व लेखक होने के नाते यह सवाल उनके मन में बार-बार और बड़ी शिद्दत से उठता है और भाषा को लेकर उनकी एक स्पष्ट राय उभर कर सामने आती है। भाषा विमर्श को अच्छा खास स्थान इस पुस्तक में मिला है। दिनेश कर्नाटक तमिलनाडु में हिंदी विरोध के पीछे के राजनीतिक कारणों तथा दक्षिण भारतीयों के मन में हिंदी के भय के कारणों को रेखांकित करते हैं और यह मानते हैं कि ‘उस समय के नेतृत्व द्वारा भाषा के मसले को बड़े दृष्टिकोण के साथ नहीं निपटा गया। कुछ लोगों द्वारा राष्ट्रीय एकता के लिए ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तानी’ को अनिवार्य माने जाने की भूल की जा रही थी। यह माना जा रहा था कि स्थानीयताएं देश की एकता के मार्ग में बाधा हैं।’ वास्तव में यही दृष्टिकोण भारतीय भाषाओं को हाशिए में धकेलने और अंग्रेजी को इतना अधिक प्रभावशाली बनाने का कारण बना। इसी के चलते आज भाषा की यह पूरी लड़ाई अंग्रेजी बनाम हिंदी की लड़ाई बनकर रह गई है, जबकि हिंदी की तरह अन्य भारतीय भाषाएं भी अंग्रेजी के चलते आज उपेक्षित होती जा रही हैं। दिनेश कर्नाटक का यह तर्क बिल्कुल सही है कि ‘अंग्रेजी के सामने भारतीय भाषाओं की दुर्गत होती जा रही है। अंग्रेजी वर्चस्व, सत्ता तथा सफलता की भाषा बनी हुई है। मजे की बात यह है कि अंग्रेजी के इस वर्चस्व से सभी भारतीय भाषाओं के लोग उबरना चाहते हैं, लेकिन वे इस गलतफहमी से आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं कि हिंदी के बजाय उन्हें अंग्रेजी से कम खतरा है।’ दिनेश कर्नाटक त्रिभाषा फार्मूले को भाषा के सवाल का सबसे अच्छा समाधान मानते हैं। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। वह इस बात से सहमत हैं कि हमें भारत की एक भाषा के रूप में अंग्रेजी को स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन बराबरी के तौर पर। अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं का कद एक समान होना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना है कि ‘हर राज्य की राजभाषा को वहां के हर स्कूल की पढ़ाई का माध्यम होना चाहिए। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि पढ़ाई के माध्यम के रूप में।’ इस यात्रा वृत्तांत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है।

इसके अलावा यह पुस्तक बाजार और पूंजीवाद के चलते हमारे आचार-व्यवहार में आ रहे परिवर्तनों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है। बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव ने दक्षिण हो या उत्तर, गांव हों या शहर, सभी जगह आदमी के आचरण और सोच को बदला है। शिक्षा तक को इसने अपनी जरूरत के अनुसार बदल दिया है।

कुल मिलाकर समीक्ष्य पुस्तक यात्रा के बहाने जीवन के विविध आयामों को छूती है और खट्टी-मीठी अनेक वास्तविकताओं से पाठक का परिचय कराती है। अतीत से वर्तमान तक की सैर कराती है। सबसे बड़ी बात मुझ जैसे यात्राभीरू व्यक्ति को भी यात्रा के लिए प्रेरित करती है। प्रस्तुत पुस्तक की ये पंक्तियां झकझारे जाती हैं- ‘दूरी का ख्याल एक तरह की मानसिक बाधा है। देखा जाए, तो न कुछ दूर होता है और न कुछ पास। कई बार हम पास की जगह से दूर हो सकते हैं, जबकि दूर की जगह से नजदीक।’

पुस्तक : दक्षिण भारत के सोलह दिन(यात्रा वृत्तांत)
लेखक : दिनेश कर्नाटक

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

पुस्तक का मूल्य (अजि‍ल्द ) : 120 रुपये
(सजि‍ल्द) : 300 रुपये

यह किताब निम्न जगहों पर उपलब्ध है-

1:पीपीएच बुक शॉप
जी-18, आउटर सर्किल
मेरि‍ना आर्कड, कनाट सर्कस, नई दि‍ल्ली -1
2: पाण्डेय बुक शॉप
एच-169, शॉप नंबर-12, नजदीक पानी की टंकी
सेक्टेर-12, नोएडा-201301
3: कि‍ताबघर
जीआईजी रोड, पाण्डे गांव
पि‍थौरागढ़- 262501
मोबाइल नं- 9411707450
4: बुक वर्ल्ड
10-ए, एस्ले हॉल (परेड ग्राउंड के पास)
देहरादून, उत्तराखंड5: Thougths
मुखानी चौराहे के निकट, हल्द्वानी