Archive for: December 2014

अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि : नैन्सी पाउलू

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‘लेखक मंच’ प्रकाशन की चौथी पुस्‍तक ‘अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि’ अंग्रेजी पुस्‍तक का अनुवाद है। इसके लेखक नैन्सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन हैं। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्याय ने किया है। बच्‍चों को विज्ञान को लेकर जिज्ञासू बनाने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक की भूमिका यहां दी जा रही है-

‘क्यों?’

एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब देने का प्रयास हम माता-पिता हमेशा से करते आए हैं। यह अच्छी बात है कि बच्चे सवाल पूछते हैं– सीखने का इससे बढिय़ा कोई और तरीका नहीं हो सकता। सभी बच्चों के पास सीखने के दो आश्चर्यजनक स्रोत होते हैं– कल्पनाशीलता और उत्सुकता। माता-पिता के रूप में आप अपने बच्चे की कल्पनाशीलता व उत्सुकता को बढ़ावा देकर उसे सीखने के आनन्द से सराबोर कर सकते हैं।

‘अपने बच्चे को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अभिभावकों के लिए लिखी गई पुस्तक शृंखला की एक कड़ी है, ताकि वे बच्चों की सहज उत्सुकता का जवाब दे सकें। शिक्षण और सीखना महज स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्पन्न होने वाली रहस्यमय गतिविधियाँ नहीं हैं। वे तब भी होती हैं, जब माता-पिता और बच्चे बेहद आसान चीजों को साथ-साथ करते हैं।

उदाहरण के लिए–आप और आपका बच्चा सीखने के लिए किस तरह की गतिविधियाँ कर सकते हैं– धुलने वाले कपड़ों के ढेर से मोजों को उनके जोड़ों के हिसाब से छाँटकर गणित और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं। साथ मिलकर खाना बना सकते हैं, क्योंकि खाना बनाने से गणित और विज्ञान के अलावा अच्छी सेहत की भी सीख मिलती है। एक-दूसरे को कहानियाँ सुना सकते हैं। कहानी सुनाना पढऩे और लिखने का आधार है (इसके अलावा बीते दिनों की कहानियों को ही तो इतिहास कहते हैं)। आप अपने बच्चे के साथ स्टापू खेल सकते हैं। उछल-कूद वाले इन खेलों से बच्चे गिनती सीखते हैं और जीवनपर्यंत अच्छी सेहत का पाठ भी पढ़ते हैं।

बच्चों के साथ मिलकर कुछ करने से आप समझ जाएँगे कि सीखना मनोरंजक और बेहद महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। ऐसा करके आप अपने बच्चे को पढऩे, सीखने और स्कूल में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि

लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन

अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

मूल्‍य(अजिल्‍द) : 40 रुपये

(सजिल्‍द) : 75  रुपये

अमनदीप कौर की तीन कविताएँ

amandeep kaur

हाथ

हाथ होना ही तो

हाथ होना नहीं

कुछ हाथ किसी चेहरे के मोहताज़ नहीं

वो ख़ुद एक मुकम्म्ल शख्सियत हैं

जो भरते हैं रंग क़लम से

बनाते हैं आशियाने

बरतन

वस्त्र

कागज़

माटी में रंग गूँथते, धागा बुनते,

पत्थर पर नक्श उकेरते हैं

उँगलिया महज़ तोहमत ही नहीं लगाती

कुछ उंगलियां दुनियां में यूँ भी हैं

जिन्हें पकड़ कर सभ्यताऐं यहाँ तक पहुंची हैं

ये हाथ कोई आम हाथ नहीं

ये हाथ कामगरों के हाथ हैं …//

वो आँखें

वो आँखें
जिन्होंने
दो क़ौमों की मोहब्बत देखी थी
जिन्होंने
ढोले, माहिये, सम्मियाँ देखे थे
वो आँखें
जिनके दरिया में तैर-तैर कर मुटियरें
राह-ए-मुहब्बत पर रवाँ होती थीं
टोपी, दस्तार, चोटी वाली
वो तमाम आँखें
जिन्होंने
मौलवी से हर्फ़ पढ़े थे
वो आँखें
जिन्होंने
जीती, सकीना, नूरां,सबा, पूरो, तेजी को पींगें झूलते देखा था
वो आँखें
जिन्होंने
जंग-ए-आज़ादी देखी
जिन्होंने
लाशों के टीलों में से लाशें पहचानी थीं
अपने मजहब के लोगों की

वो आँखें
जिन्होंने
ज़मीन पर लकीरें खिंचती देखी थीं
और
देखे थे न जाने कितने
टोबा टेक सिंह
अब
ऐसी चंद जोड़ी आँखें
इस पार रहती हैं
चंद जोड़ी आँखें उस पार
अब सूरत-ए-हाल
ये है कि
अर्सों से अपने साथ रही
आँखों में इन्हें
ख़ौफ़ दिखने लगा है।

नाले पार के इंसान से दिखने वाले

वो जो
इंसानों से दिखने वाले
नाले पार की बस्ती में हैं
सुना है
बरसों पहले किसी ने
आह्वान किया था इन्हें
एक हो जाओ !
हक़ के लिए एक हो जाओ !
तब से अब तक
तमाम सियासतें
सहमी सी हैं
कि कहीं
इक्क्मुट्ठ न हो जायें ये
नाले पार के
इंसानों से दिखने वाले
तमाम सरकारें
झोंक डालतीं हैं
अपना सारा का सारा तंत्र
कि बिखरे
कुचले
अशिक्षित
कुपोषित
हाथ बाँधे इनके सामने
फ़र्माबरदारी करें
बिना हक़ मांगे
अपने स्वाभिमान की
अपनी मेहनत की
लूट का तमाशा देखें
इंसानों से दिखने वाले
नाले पार के ये लोग
तख़्त डोलने लगते हैं
सत्ता के गलियारों में
मात्र सोच भर कर
ग़र
नाले पर के इन
इंसान से दिखने वालों को
वास्तव में यकीं हो गया
कि वो इंसान ही हैं
तो क्या होगा ?…

अनुशासन में शासन : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

दर्द है कि हर रोज रिसने के बावजूद कम नहीं हो रहा। दफ्तर खुलते ही दिल्‍ली स्थित केंद्र के सरकारी कर्मचारी आह भर-भरकर पुराने दिनों को याद करते हैं। क्‍या वो जमाना था, जब कभी भी आओ कभी भी जाओ और कहाँ ये नौ बजे के दफ्तर में नौ से पहले पहुँचना वरना छुट्टी कटेगी और तनख्‍वाह भी। पुराने बाबू बताते हैं कि ऐसा समय पालन तो केंद्र सरकार के कार्यालयों में कभी नहीं देखा गया। सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्‍ध आँकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। जहाँ भी बायोमेट्रिक मशीने लग गई हैं, पिचानवे प्रतिशत कर्मचारी समय पर दफ्तर पहुँच रहे हैं। उन्‍हें मेट्रो की लाइन और दफ्तर की सीढि़यों पर भागते और हॉंफते हुए देखा जा सकता है। अब न बच्‍चों के स्‍कूल का बहाना, न मनमर्जी पड़ोसी को अस्‍पताल में जाकर देखने का नाटक। जो सरकारी कर्मचारी सुबह नौ बजे के दफ्तर में दस बजे अपने घर के आसपास की सड़कों को अपने कुत्‍तों को घुमाते हुए गंदगी फैला रहे होते थे, वे सब रास्‍ते पर आ गये हैं। बड़े साहबों की बड़ी-बड़ी गाडि़याँ साफ करने वाले सफाई कर्मचारी तक तनाव में आ गये हैं। कहते हैं कि अच्‍छे दिन क्‍या आए हर साहब कहता है कि सुबह आठ बजे तक गाड़ी साफ हो जानी चाहिए। लेकिन आँखों ही आँखों में शरारत दिखाता हुआ यह कहने से भी नहीं चूकता कि अब पता चलेगा, जब समय पर दफ्तर पहुँचना पड़ेगा। ‘एक देश लेकिन कानून अलग-अलग। आपको तनख्‍वाह भी ज्‍यादा मिले और समय पर भी नहीं पहुँचना। यह कहाँ का न्‍याय है।’

लेकिन इस सबकी नौबत आई क्‍यों? हर व्‍यवस्था के कुछ नियम कानून होते हैं जिसमें समय की पाबंदी भी एक महत्‍वपूर्ण बात है। जब सरकार तनख्‍वाह पूरी देती है, आपकी सुख-सुविधाओं का पूरा ध्‍यान रखती है, आपके लिए अस्‍पताल हैं, स्‍कूल हैं, घूमने की आजादी और छठे वेतन आयोग के बाद तो यह भी नहीं कह सकते कि आपका शोषण हो रहा है तो फिर लापरवाही, कामचोरी, खून में कैसे आई? क्‍या सरकारी कर्मचारी ने कभी सोचा कि उसी के घर में जो बैंक में नौकरी कर रहा है, वह समय पर पहुँचता है और कई घंटे ज्‍यादा काम करता है। जो प्राइवेट नौकरी में हैं, वे देसी फैक्‍ट्री हो या विदेशी कम्‍पनी उसे कभी देर से दफ्तर पहुँचते नहीं देखा और इन सबको तनख्‍वाह भी केन्‍द्र सरकार के कर्मचारी से कम ही मिलती है, तो यदि अब दफ्तर में समय पर पहुँचना भी पड़ रहा है तो यह हाय-हाय क्‍यों? क्‍या इस देश की व्‍यवस्‍था के डूबने का एकमात्र कारण केन्‍द्र, राज्‍य सरकार के कर्मचारियों में एक लापरवाही का भाव जिम्‍मेदार नहीं है? आप कोई भी संस्‍था देख लीजिए। सरकारी स्‍कूल क्‍यों डूबे? आप पाएँगे कि पचास फीसदी शिक्षक या तो गायब हैं या किसी बहाने छुट्टी पर हैं। विश्‍वविद्यालयों का तो कहना ही क्‍या। वहाँ तो उपस्थिति दर्ज कराने की भी आजादी नहीं है और न विश्‍वविद्यालयी अनुशासन में कोई ऐसा हिसाब-किताब रखा जाता कि आप कब आए और कब गये। विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर कहते हैं कि हम तो चौबीसों घंटे ड्यूटी पर होते हैं, क्‍योंकि हम उन बातों को सोचते और पढ़ते रहते हैं, जो हमें विश्‍वविद्यालय में पढ़ानी हैं। क्‍या खूबसूरत जवाब है। फिर जे.एन.यू., दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों से कोई पूछे कि अपने ज्ञान को कभी कुछ शोध पत्रों में भी छपवाएं। कम से कम दिल्‍ली में तो यह नहीं दिखता। दशकों से ऐसा चल रहा है और नतीजा वही हुआ जो होना था। सरकारी स्‍कूल भी डूबे और विश्‍वविद्यालय भी। पिछले कई वर्षों से हमारे ज्‍यादातर शिक्षण संस्‍थान गुणवत्‍ता के नाम पर और नीचे ही गिर रहे हैं।

बहरहाल सरकार के इस कदम की तारीफ की जानी चाहिए। क्‍योंकि लोकतंत्र का तकाजा है कि सरकारी संस्‍थाएँ लोक की उम्‍मीदों पर खरी उतरें। कल्‍पना कीजिएगा कि आप अपने किसी परिचित को लेकर अस्‍पताल पहुँचते हैं और अगर डॉक्‍टर और नर्स न हों, अस्‍पताल में गंदगी फैली हुई हो तो क्‍या आप बर्दास्‍त कर पाएँगे? आप जो टैक्‍स सरकार को देते हैं आप तुरंत उसका हिसाब मागेंगे। आप बैंक में जाएँ और ताला बंद मिले तो क्‍या माथा नहीं पीट लेंगे। राज्‍य का पहला काम जनता के प्रति जवाबदेही होना है और ऐसे कदमों से सरकारी कर्मचारी की जवाबदेही बढ़ेगी। आज यदि केन्‍द्र सरकार में ऐसा हो रहा है और जो निरंतर सफलता की तरफ बढ़ रहा है, तो निश्चित रूप से कल मेरठ, आगरा, पटना, इलाहाबाद की सभी संस्‍थाएँ वे चाहे अस्‍पताल हों या जिलाधीश का कार्यालय या थाना कोतवाली, पटवारी, सेल्‍स टैक्‍स, बिजली सभी पर इसका असर होगा। देशभक्ति सिर्फ सीमाओं पर लड़ने या ललकारने, हुँकारने का नाम नहीं है। पूरी निष्‍ठा से अपना काम करना भी सबसे बड़ी देशभक्ति और समय की जरूरत है।

नयी व्‍यवस्‍था में यदि कोई कमी है तो यह कि समय पर पहुँचे तो पहुँचे कैसे। केंद्रीय सचिवालय के मेट्रो स्‍टेशन पर शाम को एक-एक घंटे तक मेट्रो का इंतजार करना पड़ रहा है। क्‍योंकि ऐसा कभी सोचा ही नहीं गया कि एक साथ हजारों लोग दफ्तर छोड़ेंगे। ये तो गनीमत है कि दिल्‍ली मेट्रो की वजह से यह समय पालन संभव भी हो पाया वरना त्राहि-त्राहि मच जाती। दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं पर दोहरी मार पड़ी है। हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था में उन्‍हें घर पर भी सब कुछ देखना पड़ रहा है और दफ्तर में मिली पुरानी रियायत भी गायब। अब तो वे खुद कह रही हैं कि चाइल्‍ड केयर लीव हमें भले ही न दो लेकिन आने-जाने के लिए या तो सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे कि हम समय पर पहुँच पाएँ या हमें कुछ छूट मिलनी चाहिए।

लेकिन सरकारी कर्मचारी के दुख का अंत नजर नहीं आ रहा। इस हफ्ते रिटायरमेंट की उम्र साठ से अट्ठावन की खबर ने उन्हें और मायूस कर दिया है। कहाँ तो वे बासठ की उम्र के सपने ले रहे थे और कहाँ वक्‍त से पहले जाना हो सकता है। हालाँकि नये समय के पालन को देखते हुए पहली बार सरकारी कर्मचारी स्‍वैच्छिक अवकाश उर्फ वी.आर. की सोच रहे हैं।