Archive for: November 2014

बेराजगारों और भारतीय भाषाओं के पक्ष में एक पुस्तिका : सुधीर सुमन

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सीसैट (सिविल सर्विसेज एप्टिट्यूड टेस्ट) में किए गए बदलावों के खिलाफ कुछ माह पहले ही नौजवानों का असंतोष और गुस्सा भड़का हुआ था। प्रतियोगी नौजवान सड़कों पर उतर पड़े थे और पुलिसिया दमन का स्वाद भी उन्हें चखना पड़ा था। कुछ विद्वानों को यह नौकरशाही में शामिल हो जाने के लिए आतुर हिंदीभाषी प्रतियोगी छात्र-नौजवानों का आंदोलन लग रहा था, तो कुछ के तर्क थे कि सिविल सेवाओं में जाना है, तो अंग्रेजी अच्छी होनी ही चाहिए। अखबारों और सोशल मीडिया में सीसैट के एक प्रश्‍नपत्र में अंगरेजी के हिंदी अनुवाद के दुरूह और अपठनीय नमूने खासे चर्चा में रहे। लेकिन इस आंदोलन ने शिक्षा और रोजगार की नीतियों के बड़े सवालों को भी छेड़ दिया, इस ओर ध्यान दिलाने के लिहाज से मृणालिनी शर्मा की 64 पृष्ठों की पुस्तिका ‘सीसैट: विवाद और विकल्प’ बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें शिक्षा, रोजगार और भाषा के सवाल को जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के बतौर देखा गया है।

इस किताब को पढ़ते हुए पता चलता है कि दौलत सिंह कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर जब 1979 में सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं को प्रवेश मिला, तो परीक्षा अभ्यर्थियों की संख्या 1970 के मुकाबले दस गुनी हो गई यानी एक लाख को पार कर गई।

1989 में गठित सतीशचंद्रा कमेटी ने परीक्षा परिणामों के आधार पर यह आकलन किया कि सामान्य उम्मीदवारों के लगभग बीस प्रतिशत और एस.सी, एस.टी के पचास प्रतिशत इस अवधि में निम्नवर्ग से आए। इस कमेटी ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि इनमें अधिकांश गांवों और कस्बों से आए हैं। यद्यपि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लगभग दर्जन भर राष्ट्रीय परीक्षाओं में एकमात्र सिविल सर्विसेज परीक्षा में ही उम्मीदवारों को अपनी भाषा यानी हिंदी, तमिल, तेलुगु समेत आठवीं अनुसूची में मौजूद भाषाओं में उत्तर लिखने की सुविधा मिली, लेकिन देश के अंग्रेजीदां नौकरशाहों और नेताओं को ये सुविधा भी बर्दास्त नहीं है। 2011 में सीसैट के प्रश्‍ननपत्रों में जो प्रावधान लाए गए, वह न केवल अंगरेजी, बल्कि इंजीनियरिंग, विज्ञान और एम.बी.ए. आदि के छात्रों के लिए ज्यादा फायदेमंद थे। प्रश्‍नों का अंग्रेजी से हिंदी में बेहद कठिन भाषा में अनुवाद का मसला तो है ही, सामान्य ज्ञान का पहला परचा जिसमें इतिहास, भूगोल और राजनीति शास्त्र होता है, उसमें न्यूनतम अर्हता अंक प्रतिशत 15 है और दूसरा परचा जिसमें समझ, तर्कशक्ति और आंकड़ों के विश्‍लेषण के साथ अंगरेजी भी है, उसमें न्यूनतम अर्हता अंक प्रतिशत 35 है।
इस पुस्तिका में आंकड़ों के जरिए दिखाया गया है कि सीसैट लागू होने के बाद भारतीय भाषाओं के माध्यम से अंतिम रूप से चुने जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या पंद्रह-बीस प्रतिशत से घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। लेखिका का निष्कर्ष यह है कि नई परीक्षा प्रणाली अंग्रेजी जानने वाले अमीरों और क्रीमीलेयर के हित में है और गरीब, दलित, आदिवासी और ग्रामीण लोगों के विरोध में है।

यह पुस्तिका महज सीसैट पर ही केंद्रित नहीं है, बल्कि शिक्षा, भाषा नीति, स्कूल प्रणाली और प्रशासनिक परीक्षाओं के लेकर बनाए गए आयोगों और समितियों के लोकतांत्रिक फैसलों से गुजरते हुए पाठक को इस सच्चाई के बीच ले जाकर खड़ा कर देती है कि किस तरह आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंगरेजी योग्यता का पर्याय बनी हुई है। सिविल सेवाओं की परीक्षा से अंगरेजी को बाहर नहीं किया गया था, बल्कि भारतीय भाषाओँ को उसके बराबर रखा गया था। लेकिन वह भी बर्दास्त नहीं हुआ, उसे भी खत्म करने की साजिश की गई।

लेखिका का मानना है कि प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंगरेजी की अनिवार्यता ने ही निजी अंगरेजी स्कूलों और कोचिंगों की संख्या को बढ़ावा दिया है। भारतीय इंजीनियरिंग सेवा, वन सेवा, चिकित्सा सेवा, आर्थिक सेवा, प्रबंधन और तकनीकी संस्थानों, विधि विश्वविद्यालयों की समेत अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालयों और कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं तक में अंग्रेजी के वर्चस्व पर यह पुस्तिका बड़े तार्किक तरीके से सवाल उठाती है।

यह पुस्तिका देश के करोड़ों दलित, वंचित, गरीब, आदिवासी और पिछड़ी ग्रामीण पृष्ठभूमि के नौजवानों की बेरोजगारी के प्रति भी संवेदित है। लेखिका ने ठीक ही लिखा है कि नौजवान सिर्फ अधिकारी ही नहीं बनना चाहते, वे किसी तरह एक अदद नौकरी चाहते हैं। लेकिन अब हाल यह है कि कर्मचारी चयन आयोग के तहत जो परीक्षाएं हो रही हैं, वहां सिविल सेवाओं की परीक्षाओं से भी कई गुना ज्यादा अंगरेजी का वर्चस्व कायम हो चुका है। बैंकों की भर्ती में भी अंगरेजी और कंम्प्यूटर की अनिवार्यता है, जिसके कारण ‘पूरा गरीब भारत नौकरियों से बाहर’ होता जा रहा है।

सीसैट में अंगरेजी के समर्थकों के तर्कों का तो जवाब इस पुस्तिका में दिया ही गया है, तमाम संस्थानों में भारतीय भाषाओं में पढ़ाई और परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता के पक्ष में मजबूत तर्क भी इसमें दिए गए हैं।
पुस्तिका में एक जगह बताया गया है कि दुनिया के सबसे समृद्ध विकासशील देशों का शासन, प्रशासन और शिक्षा उसी भाषा में है, जो उनकी जन्मभाषा है। इनमें महज चार की भाषा ही अंगरेजी है। ठीक इसके विपरीत बीस सबसे गरीब देशों में अट्ठारह देशों में प्रशासन की भाषा अंगरेजी है, जो कि वहां के लोगों की जन्मभाषा नहीं है। इसके साथ ही अफ्रीकी देशों में प्रशासन की भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच होने को उनकी दुर्दशा से जोड़ते हुए लेखिका सवाल करती हैं- ‘क्या भारत के ऊपर अंगरेजी लादना उसको और गर्त में भेजना नहीं है?’

वे इस जरूरत पर जोर देती हैं कि ‘छात्रों ने सड़कों पर उतरकर जिस नब्ज पर उंगली रखी है, पूरे देश को उसके संकेत सुनने और समझने की जरूरत हैं।’ ‘हम सबका दायित्व है कि इस मौके को हाथ से न जाने दें, और शिक्षा व रोजगार दोनों के लिए अपनी भाषाओं की ओर लौटें।…यह  लौटना आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक कदम होगा और सही मायने में आजादी का अर्थ भी।’

 

सीसैट: विवाद और विकल्प

(भारतीय भाषाएं Vs अंग्रेजी)
लेखिका: मृणालिनी शर्मा
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433, नीतिखंड-3, इंदिरापुरम्, गाजियाबाद-201014
मूल्य: 30 रुपये

यह पुस्‍तक निम्‍न स्‍थानों पर भी उपलब्‍ध है-

1:पीपीएच बुक शॉप
जी-18, आउटर सर्किल
मेरि‍ना आर्कड, कनाट सर्कस, नई दि‍ल्ली -1

2: पाण्डेय बुक शॉप
एच-169, शॉप नंबर-12, नजदीक पानी की टंकी
सेक्टेर-12, नोएडा-201301

3: व्यावस्थापकीय कार्यालय
जनमत 267, पुराना कटरा,   इलाहाबाद

4: कि‍ताबघर
जीआईजी रोड, पाण्डे गांव
पि‍थौरागढ़- 262501
मोबाइल नं- 9411707450

5: बुक वर्ल्ड
10-ए, एस्ले हॉल (परेड ग्राउंड के पास)
देहरादून, उत्तराखंड

6: Thougths
मुखानी चौराहे के निकट, हल्द्वानी

तीसरा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 23 को

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कुबेर दत्त

नई दि‍ल्‍ली : कुबेर दत्त के निधन के बाद जन संस्कृति मंच ने हर वर्ष उनकी स्मृति में एक व्याख्यान का आयोजन करने का निर्णय लिया था। वर्ष 2012 में ‘मीडिया और साहित्य’ पर वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और वर्ष 2013 में ‘प्रतिरोध की कला’ पर चित्रकार अशोक भौमिक कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान दे चुके हैं। वर्ष 2014 का स्मृति व्याख्यान मशहूर पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और डाक्यूमेंटरी फिल्मकार परंजोय गुहा ठाकुरता ‘मीडिया और मोदी ‘ विषय पर देंगे। कार्यक्रम का आयोजन गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, आईटीओ, नई दिल्ली में 23 नवम्बर 2014 को शाम पांच बजे से होगा।

इस अवसर पर कुबेर दत्त के कविता संग्रह ‘शुचिते ‘ का लोकार्पण भी होगा। ‘शुचिते ‘ दुनिया की सभी बेटियों को समर्पित काव्य पुस्तिका है जिसमे प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी के रेखांकन भी हैं। व्याख्यान की अध्यक्षता चित्रकार अशोक भौमिक करेंगे।

कुबेर दत्त के बारे में:

2 अक्टूबर 2011 को कुबेर दत्त का असामयिक निधन हो गया था। उन्होंने दूरदर्शन के अपने कार्यकाल में हजारों ऐसे साहित्यिक-सांस्कृतिक-वैचारिक कार्यक्रमों का निर्माण किया, जो प्रगतिशील-लोकतांत्रिक मूल्यों और जनता के प्रति एक मीडियाकर्मी और साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी की पक्षधरता और संवेदनशीलता की मिसाल हैं। ‘काल काल आपात’, ‘धरती ने कहा फिर…, ‘केरल प्रवास’, ‘कविता की रंगशाला’, ‘अंतिम शीर्षक’ और ‘इन्हीं शब्दों’ में उनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं। जीवन के आखिरी दस वर्षों में उन्होंने हजारों चित्र बनाए, जिनमें से कई चित्र किताबों और पत्रिकाओं के आवरण पर भी छपे। बेटी के घर में एक दीवार पर उन्होंने एक विशाल चित्र बनाया। उन्होंने आलोचनाएं और दिल छू लेने वाले संस्मरण भी लिखे। वह हरिपाल त्यागी की कला से बहुत प्रभावित थे। उन्हें गुरु मानते थे। चाहे चित्रकला हो या कविताकर्म कुबेर डाइरेक्ट एप्रोच में विश्वास करते थे। विषय से सीधे भिड़ते थे।

कुबेर एक उच्चकोटि के ब्राडकास्टर थे। 37 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 1500 से अधिक साहित्यिक कार्यक्रम बनाए- पत्रिका, सृजन, सरस्वती, फलक जैसे साहित्यिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी कार्यक्रम तैयार किए। उनका विजुअल आर्ट्स का कार्यक्रम ‘कला परिक्रमा’ बहुत लोकप्रिय हुआ। अपने कार्यक्रमों के लिए अधिकतर बार स्क्रिप्ट वे स्वयं लिखते थे और आवाज़ भी देते थे। इन दोनों ही कलाओं में उन्हें महारत हासिल थी। अत्यंत साधारण विजुअल्स को भी अपने सशक्त शब्दों से ऊंचाई पर ले जाते थे। स्क्रिप्ट लिखने में भी उन्हें बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता था। तोल्सतोय, सार्त्र, चेखव, लूशुन, मायकोवस्की, बारान्निकोव, रोरिख, एलिजाबेथ ब्रूनर, एलियास लोन्रोट, चेलिसेव, ओदोनेल स्मेकल, प्रेमचंद, निराला, त्रिलोचन, नागार्जुन, देरिदा, एडवर्ड सईद, ओलिवर टोड, नोम चोमस्की, भगवतीचरण वर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, हंसराज रहबर, महादेवी वर्मा, प्रसाद, बच्चन, शमशेर, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, नामवर सिंह समेत अनेक देशी-विदेशी साहित्यकारों पर उन्होंने कार्यक्रम तैयार किए।

हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान के प्रति कुबेर बहुत सचेत थे। यही कारण है कि उन्होंने आचार्य किशोरी दास वाजपेयी और डा. रामविलास शर्मा पर शोधपूर्ण कार्यक्रम बनाए। आचार्य किशोरी दास वाजपेयी पर बना कार्यक्रम कुबेर के श्रेष्ठ कार्यक्रमों में गिना जाता है। प्रेमचंद पर बना वृत्तचित्र सशक्त दृश्य संयोजन और सटीक शब्द का सुंदर मेल है।

कुबेर दत्त दूरदर्शन के एक बेहद जनप्रिय कार्यक्रम ‘जनवाणी’ के प्रोड्यूसर थे। इस कार्यक्रम में किसी एक मंत्री से जनता सवाल पूछती थी। रिकार्डिंग के दौरान मंत्री की सहायता के लिए संबंधित मंत्रालय का कोई अधिकारी मौजूद नहीं होता था और न ही इसकी इजाजत थी कि सम्पादन के दौरान मंत्री का कोई सहायक या मंत्रालय का अधिकारी मौजूद रहेगा। जिस मंत्री पर कार्यक्रम तैयार होता था, उसकी दूरदर्शन अग्रिम पब्लिसिटी करता था। ‘जनवाणी’ जनता की उन्मुक्त वाणी का स्वायत्त मंच बनता चला गया। अक्षम मंत्रियों को एक्सपोज होना पड़ा। कुछेक सक्षम मंत्री अपने बचाव में सफल रहे, लेकिन अनेक बार सरकार तंत्र के बाबू-राज की पाल खुलती गई। इसके प्रोड्यूसर की छवि को धूमिल करने की साजिश भी की गई। कुबेर दत्त को दो-ढाई वर्ष अनके तरह की यातनाओं से गुजरना पड़ा। सस्पेंशन, तबादला, हार्ट अटैक, मां की मृत्यु, डिपार्टमेंटल इंक्वायरी.. अर्थ कष्ट आदि का सामना करना पड़ा। हालांकि हर जांच में वे पाक-साफ निकले। लेकिन इस बीच जनवाणी प्रसंग में उन्हें काफी संत्रास झेल चुके थे।

उनकी जीवन संगिनी कमलिनी दत्त ने लिखा है कि कुबेर की विचारधारा के प्रति निष्ठा उनके सभी कार्यकलापों का दिशानिर्देश करती थी। वे इस हद तक निडर थे जिस हद तक किसी सरकारी कर्मचारी के लिए होना संभव नहीं था। आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों के विरुद्ध अपने कार्यक्रमों में लिखते थे और स्वयं बोलते भी थे। जनवाणी प्रसंग उनके इसी निडर स्वभाव की परिणति है। वरवर राव, गदर जैसे क्रांतिकारियों के साथ बातचीत प्रसारित करने से भी कुबेर डरे नहीं। वे इस संबंध में स्पष्ट विचार रखते थे कि कार्यक्रम दर्शकों के लिए बनता है, सरकार या अधिकारियों के लिए नहीं।

‘जनवाणी’ के प्रसारण के 25 साल पूरा होने पर आयोजित एक आयोजन में कुबेर दत्त ने कहा था- ”गंदी राजनीति में कुछ भी हो सकता था, आज हो भी रहा है। आज तो पेड न्यूज का जमाना है, लेकिन ये गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, पराड़कर, सप्रे, भगतसिंह जैसे संपादकों-पत्रकारों का भी देश है…। सच और जनहित की रक्षा करने वाले पत्रकार-लेखक-प्रसारक पहले भी थे, आज भी हैं और रहेंगे। उन्हें बाहरी-भीतरी दबाव और खतरे, पहले भी झेलने पड़े, आज भी झेलने पड़े रहे हैं, लेकिन राह तो यही है। और कोई विकल्प नहीं है।”

प्रतिभा गोटीवाले  की पांच कविताएँ 

Pratibha gotiwale

अंतरिक्ष

अंतरिक्ष में घूमती पृथ्वी

पृथ्वी पर

एक छोटा-सा घर…

मेरा…

घर में… फिर अंतरिक्ष…!

उड़ान

आसमान से बरसते

विश्‍वास के साथ,

उड़ान का

हौंसला लिए

उगते हैं पंख

उनके भी  …

और फड़फड़ा कर

भरते हैं उड़ान

इन्ही हवाओं में

बस ज़रा…

छूकर तो देखो

ये हरी भरी हवाएँ

उड़ाने हैं… पेड़ों की।

प्रायद्वीप 

अनुशासन ,

संस्कार

और मर्यादाएँ

घिरी हुई

तीन दिशाओं से

अजब सी पहेली हैं !!

स्त्री.हैं या …प्रायद्वीप !!!

(प्रायद्वीप- तीन ओर से पानी से घिरा भू-भाग)

संतुलन

सुनो….

तुम्हें याद हैं?

बचपन की वो लंगड़ी रेस

अपना एक एक पैर

साथ बाँधकर

दौड़ना होता था

एक-दूसरे का संतुलन

बनाते हुए।

ज़रूरी था जीतने के लिये

एक-दूसरे को संभाल लेना।

मुझे लगता हैं

हम आज भी

उसी खेल में हैं,

हमारे पैर आज भी

साथ बँधे हैं

न मेरे बिना

तुम आगे बढ़ पाओगे

न तुम्हारे बिना मैं रुक पाऊँगी

इसलिए आओ

फिर हाथ थामो

और ले चलो साथ मुझे

मेरी तमाम ख़ामियों

और कमज़ोरियों के साथ

या थम जाओ

यही… पास मेरे

अपने  सारे क्षोभ और क्रोध समेत

कि संतुलन ज़रूरी हैं

हमारे मिलने के लिये…

विस्तार

दो दूर जाती हुई

आकाशगंगाओं के बीच

विस्तृत होता जाता है… अंतरिक्ष

तुम कहते हो ब्रह्माण्‍ड का विस्तार

मैं कहती हूँ दूरियों का…।

प्रस्तुति -नित्यानंद गायेन

प्रशांत विप्लवी की कविताएँ

prashant viplavi

कुंवारी लडकियाँ

कुंवारी लडकियाँ…
गिनती हैं पिता के माथे की शिकन
और फिर गिनती हैं अपनी उम्र
हाथ के उँगलियों पर कई बार
हर बार चूक समझकर
दुहराने लगती हैं अपनी ही गिनती
माँ से पूछती हैं अपने जन्म की सही तारीख
और दर्ज कर लेती हैं एक और अनचाहा सच
हमउम्र सहेलियां जब लौट आती हैं मायके
तो घनघना उठता है उसका फोन
और वो चहक कर पूछती है हाल
नव-विवाहिता एक सांस में
बोलती हैं ढेर सारा झूठ
और लडकियाँ देखने लगती हैं
उस झूठ से भी बड़ा कोई स्वप्न
देर रात माँ-बाप की फुसफुसाहट पर
पाते रहती हैं अपना कान
बगुले-सी लपक लेती हैं
बाप की चिंता और माँ की चुप्पी
मन मसोस कर पूछती हैं
छोटे भाई से आज की तारीख
फिर बैठ जाती है खोलकर अपनी ही डिग्रियां
कुछ पुरानी धूमिल तस्वीरें
जो झांक रही होती हैं
स्कूल/कॉलेज के परिचय-पत्र से
कुछ चिट्ठियां कच्चे हाथों से लिखी गईं
अपनी ही प्रवासी सहेलियों की
कुछ ग्रीटिंग्स, कुछ अबूझ चिट
पलटते-पलटते पहुँच जाती हैं
अपने ही सुन्दर अतीत के दिनों में
देखती हैं वैवाहिक रेखा का स्थान अपनी हथेली पर
रेखाओं की तीक्ष्णता को खरोंच कर
आश्वस्त होती हैं…
फिर खुली आँखों में पड़ी रहती हैं बिस्तर पर घंटों
हर सुबह इस उम्मीद में उठती हैं
कि पिता मांग ले उससे उसी की कोई अच्छी-सी तस्वीर
माँ हिदायत दे कि लगाया करे हल्दी चेहरे पर कभी-कभी
भाई जिद करे “दीदी अब तो बुन दो एक स्वेटर”
लगने लगे मजलिश पडोसी औरतों की
प्यारी लगने लगे चिढा़ने वाली बुढिया भी
कुंवारी लडकियाँ इन दिनों
कई-कई स्वप्न देखती हैं
हर स्वप्न झूठा भी नहीं होता
कुछ स्वप्न झूठ से भी सुन्दर होते हैं
कुछ स्वप्न..निरा स्वप्न की तरह रहता है कायम
स्वप्न का टूटना
एक घरौंदे के टूटने-सा नहीं होता है
एक उफनती नदी के बाँध के टूटने-सा होता है
जहाँ लडकियाँ बहा देती हैं अपनी सारी उम्मीदें
ताकि उम्मीद बची रहे नदी में
और नदी बची रहे उम्मीदों में

यात्रा

यात्रा के लिए निकल पड़ना ..
मेरे लिए किसी घटना में दर्ज होने जैसा नहीं है
मेरे साथ कुछ सामान
जो शायद मुझसे भी ज्यादा अभ्यस्त हैं
घर के किसी कोने में पड़े रहते हैं
एक नई यात्रा के इंतज़ार में
एक आदमी जो मेरे अन्दर है
उसकी देह गंध पाकर
प्रतीक्षारत सामान कुलबुलाने लगता है
कभी बेमन से
कभी उत्साह से
कभी कौतूहल से
मैं बढ़ जाता हूँ सामान को कंधे पर डाले
एक यात्रा पर
एक घर…अपने तमाम आपत्तियों के बावजूद
वहीँ टिका रहता है
कि मेरा लौट आने का उसका भरोसा
मेरे अपनों से ज्यादा है
लेकिन मेरे अपने मेरे लौट आने तक
घर में एक बेचैन यात्रा पर होते हैं
लौट आना या नहीं लौटने जैसा कोई भी प्रमाण
सिर्फ आश्वस्त होने के लिए होता है
लेकिन घर तब भी वहीँ टिका होता है
अपने तमाम आपत्तियों के साथ

पिता

झुर्रियों से निर्मित पिता
जब मुस्कुराते
दर्द एक कोने फंसा ही रहता

जैसे स्वाद छोड़ता
ओठ के कोने में दबा तम्बाकू
का होना न होना

माथे पर चिंताओं की शिकन
पसीनों को लरजने से रोकती
जैसे कातर मेढ
रोकता है बारिश का पानी

पीठ पर पसीने से बनी
संघर्ष की तस्वीर
जैसे बुरे समय में दिख जाता है
बंगाली तांत्रिक का इश्तेहार भी

पिता का चुपचाप पड़े रहना खाट पर
और ताकते रहना सीलन भरी छत
दुह्स्वप्न का थककर बैठ जाना
जैसे डर टूटता है मन में किसी रोज़

उनके फटे तलवे की रगड़ चप्पल पर
उम्मीद पाले हुए किसी अनावश्यक संगीत का
जैसे दुनिया खिलाफ है
और पिता गा रहे हैं अपना ही गीत

झुर्रियों से निर्मित पिता
जब भी लेते हैं एक दीर्घनि‍श्‍वास
हम मुस्कुराते हैं
जैसे उन्हें किसी दुरूह यात्रा से निवृति मिली हो…

सर्वज्ञानी

हवा का रुख बता देता है
थोड़ी-सी धूल उड़ाकर
आसमान का नब्ज़ टटोल लेता है
बादलों की बेचैनी देखकर
गीली हुई थी कब धरती
मिट्टी की सोंधी महक से जान लेता है
दरख्तों से लिपटकर जो बता दे
उम्र ..खोखलापन और उसकी जात
मैना के चोंच पर पिली धारी से बता दे
नर-मादा का भेद
हैरान है, सर्वज्ञाता को पता नहीं चलता
मंडी का भाव क्या है?

बेटी जब फ्राक की गोद में अनाज नहीं उठाती
वो निकल पड़ता है सुयोग्य वर की खोज में
मुखिया जब बिठा लेता है पास प्यार से
उसे उस रात किसी भी करवट नींद नहीं आती
बैंक का मनीजर पूछता है जब उसका हाल
वो कर्ज जल्द चुकता करने की बात करता है
हैरान है, सर्वज्ञ को पता नहीं चलता
कब वो अपने आलू का चिप्स खरीदता है

बेटे के साइकि‍ल में डालता है तेल
बीबी को दिखाता है बेटे के यूनिफॉर्म की मैल
सोचता है आने वाले पवनी के बारे में
बीबी से कहता है लोन माफ़ हो गया

बेचन से पूछता है दिल्ली का हाल
शायद नौकड़ी बचा ले खेत
खेत के मचान पर लौटकर
महीनों को गिनता है उँगलियों पर कई-कई बार
बेटे के हाँक पर जगाता है खुद को
बेटे के कंधे से नापता है अपना कंधा
शेक्सपियर की वो कविता
जो पसंदीदा रही उसको ‘ए लवर्स कम्प्लेंट’
बेटे से सुनना चाहता है
घुप्प अँधेरे में भी
वो गिन रहा गॉंव की पसलियाँ
लम्बी कवितायें
अभी और बांकी है
जैसे सन्नाटा बचा है कुत्तों के पास
बिल्कुल महफूज
जुगनू प्रार्थना कर रहे हैं अच्छी फसल की
कोई उल्का अचानक गिरा हो
वहीं उसी आसमान में कहीं
बंद आँखों से लहलहाता खेत मांगता है
कुछ भी हो–
इस फसल तक इंतज़ार करते हैं
उम्मीद एक हाथ की तरह है
जो टिका है बेटे के कंधे पर
दिल्ली के दुह्स्वप्न से निकलकर
घुसता है घर के अन्दर
अंतिम निर्णय सुनाकर
देखता है पत्नी का चेहरा
उसकी आँखें ख़ुशी से लहलहाई ऐसे
जैसे गेहूं की सुनहरी बाली

लिजलिजा जहर

चंपा के मन में कई प्रश्न हैं
अपनी पहली माहवारी पर

वो मिटाना चाहती है अपने मन का घिन्न

देह के अंदर का ये मैल
उसके मन में आ बैठा है

माँ, खटिया पर पड़ी-पड़ी कुहरते हुए पूछती है
उसके चेहरे पर सरकते पसीनों के बारे में
उसके अस्वाभाविक चाल के बारे में

मगर सोचती है चंपा
और सिहर उठती है

एक बार फिर चुप रह जाना होगा उसे
कौंधते प्रश्नों को सुलाकर
ये लिजलिजा-सा जहर
उसने देखे हैं कई बार- फटती आँखों से
बिलबिलाई थी
जब चाचा ने मुँह पर हाथ रख दिया
माँ पूछती रही थी तब भी
टॉफी और गुड़ियों के बारे में
तपते बुखार में कब सो गई थी
बड़बड़ाते हुए…

आज उसे घिन आ रही है अपने पर
चाचा पर
माँ पर
टॉफी पर
गुड़िया पर
उसे सबकुछ लिजलिजा जहर जैसा लग रहा है

भूत-प्रेत/गुनी-ओझा 

(एक अवलोकन सामाजिक विवेक से )
चार साल के वैवाहिक जीवन में
नैयकी को दौड़ा पड़ा पूरे सात बार
ओझा– गुनी सब उम्र-दराज
हार गया नैयकी के भूत से
मगर मंतरिया जानता है देह-गंध
ब्रह्म-डाकिनी और चुरैल का

देह सूंघ के कुछ देर तो चुप रहा
फिर कलाई को आहिस्ते से दबाकर
मिलाया आँख-से-आँख
भयानक आंच से डरा
एक लम्बी सांस छोड़कर जाहिर किया
ऐसा-वैसा नहीं बड़का पीपर वाली ब्रह्म-डाकिनी है
नैयकी आश्वस्त हुई
मंतरिया के आँखों की लाली देख
पक्का इलाज़ इसी के पास है

(एक अवलोकन कवि के विवेक से )
हर रात जब भी संजोती कोई रंगीन ख्वाब
पिटती और रोकर गुजार देती रात
नवेली दुल्हन की टीस
और पियक्कड़ दूल्हा
दोनों बिछावन के दो तरफ

बंधन में बंधी लड़की
बनाती है योजना ..
बाल खुलते ही
सुर्ख लाल हो जाती है आँखें
भवें तन जाती है
और घृणा से भर उठता है मन
पहले आहट पर गुर्राई
कलाई पकड़ते ही चिल्लाई
उठा-पटक में पियक्कड़ था बिल्कुल नीचे
बैठ उसके छाती चीखती रही
तृष्णा और अतृप्त देह की चीत्कार से
गूंज उठा पूरा मुहल्ला
किसी चुरैल का साया है
या है ब्रह्म-डाकिनी की ये डाक

उस रात …
बेसुध सोई नवेली
और पियक्कड़ रतजगा बैठा
सेवता रहा
देह का उत्पीडन तो खत्म हुआ चुड़ैल की
मगर यौवन के प्यास में
तड़पती रही नवेली कई-कई रात

मन्तरिया का स्नेहिल स्पर्श
जगा गई है एक क्षीण उम्मीद
गाँव की सहमति है
कई-कई रात कटे मन्तरिया संग अकेले
तब जायेगी ब्रह्म-डाकिनी
मगर उसकी आस्था जाग उठी है बुझते रिश्ते पर
रोई लिपटकर पति से
इस दुर्गन्ध से मुक्ति लो जल्दी
वर्ना जायेगी नहीं ब्रह्म-डाकिनी

फिर उस रात के बाद
न मन्तरिया आया ..न ब्रह्म-डाकिनी
न महकी शराब की गंध
न उठा कोई कायर हाथ
कोख में पैर पटक रही है
कोई नई प्राणी बार-बार //