Archive for: September 2014

बहन, फिर आयेंगे तेरे पास : कमल जोशी

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कल ही फेसबुक पर नंदा जात्रा के साथी ने एक फोटो पोस्ट की, लिखा: “इस बहन को हम भूलेंगे नहीं..!” और मैंने भी जवाब दिया भूलेंगे..? क्या हम उसे भूल सकते हैं! एक बार फिर उससे मिलने चलेंगे!
इस बहन से मुलाक़ात की भी एक कहानी है।
हम रात बिताने के लिए किसी जगह की तलाश कर रहे थे। नंदकेसरी से आगे, हमें सड़क से नीचे एक छोटा सा समतल स्थान दिखा। यह रात रुकने के लिए उपयुक्त स्थान था। हमने गाडी़ रोक दी, समतल स्थान के बगल में ऊँचे स्थान पर पठालों की छत वाला मंदिर जैसा स्ट्रक्चर था। यह मैदान मंदिर की सीमा के अन्दर लग रहा था। टैंट लगाने के लिए जगह उपयुक्त तो थी पर मंदिर परिसर में अजनबियों का टेंट लगाना…? गाँव वाले ऑब्जेक्शन तो नहीं करेंगे- हम इस सवाल से झूझने लगे।
किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछने की गरज से हम इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगे। मेरी नज़र सड़क के ऊपर के मकान पर पडी़। मैंने साथियों से कहा की इस घर में रहने वाले लोगों से पूछा जा सकता है। तभी हमने देखा कि‍ उस घर के आँगन से भी एक लड़की हमारी और देख रही है। मैंने उससे पूछा, “भूली, क्या हम इस मैदान में रात रहने के लिए रुक सकते हैं?”
“हाँ, हाँ, रुक सकते हो, पर रहोगे कैसे..!” उसने काउंटर क्वेश्चन किया। हमने गाडी की छत की और इशारा कर उसे बताया, “हमारे पास टैंट हैं. वो लगा लेंगे।”
“लगा लो।” वह बोली, फिर जोड़ा, ”ऊपर घर पर आओ…!”
जिस अधिकार से उस लड़की ने बुलाया तो हमें जाना ही था। हम पांचों यानी मैं, रजनीश, योगेश, ललित और प्रमोद चल दिए उसके घर की ओर। जब तक हम सड़क के ऊपर उसके घर पहुंचते, तब तक उस लड़की ने बाहर आँगन में प्लास्टिक की कुर्सियां लगा दी थीं। हम उन पर पसर गए। तब मुझे याद आया की हमने उस लड़की को शिष्टाचार वाला नमस्ते नहीं की। लेकि‍न इससे पहले हम यह औपचारिकता निभाते उस लड़की ने प्रश्न किया जिसमे उत्तर भी सम्मलित था, “तो आप लोग नंदा राज जात में शामिल हो..?” हम सिर्फ हाँ ही कह सकते थे।
“मैं समझ गयी थी।” वह बोली।
“चाय पियोगे।” उसने पूछा। यात्राओं में इस तरह ऑफर का अपमान नहीं किया जाता। इसलिए पांचों कोरस की तरह बोल पड़े “हाँ..!”
“बैठो फिर, मैं चाय बनाती हूँ।” और वह अन्दर चाय बनाने चली गयी।
जब वह हमें चाय दे रही थी, तभी एक वृद्ध महिला कमरे से बाहर आई। लड़की ने कहा “ये मेरी सास हैं।” हमने उन्हें नमस्ते की और लड़की को भी अब नमस्ते कर पाए।
अपने ग्रुप में सबसे बड़ा होने के नाते ये मेरी जिम्मेदारी थी कि‍ मैं अब अपने साथियों का परिचय कराऊँ। मैंने सबके नाम बताये। लड़की ने कहा कि‍ उसका नाम अनुष्का है। वह छब्बीस-सत्ताइस साल की रही होगी, दुबली पतली। हमने उसकी सास से कहा कि‍ हम रात रहने के लिए जगह ढूँढ़ रहे हैं। मंदिर के मैदान में रुकना चाहते हैं।
“अरे, रात ही रुकना है तो हमारे घर ही रुक जाओ…!” वह लड़की बेबाकी से बोली।
“धन्यवाद, पर हम टेंट लगा कर ही रहेंगे।” हमने कहा।
“खाने का क्या करोगे..?’’ अनुष्का का अगला प्रश्‍न था। हमने उसे बताया कि‍ हमारे पास खाने की व्यवस्था है।
“लकड़ी जला कर खाना पकाओगे।” वह पूरी जानकारी लेने के लिए उतारू थी।
“नहीं, हमारे पास एक छोटा स्टोव है। उस पर बनायेंगे।” हमने कहा।
वह बोली, “पानी का क्या करोगे?’’
अब ये तो अब तक हमने सोचा ही नहीं था। हम कुछ कह पाते, अनुष्का बोल पडी, “नीचे पानी नहीं है। तुम हमारे यहाँ से पानी, बाल्टी और लोटा ले जाओ।”
अंधे को क्या चाहिए दो आँखे..! हम सबने एक साथ सहमति से मुंडी हिला दी।
रहने की व्यवस्था होने के बाद हम निस्फिक्र हो गए थे। अनुष्का और उसकी सास से बातें करने लगे। उसकी सास ने बताया कि‍ इस गाँव का नाम कांडा है। कल उनके घर के बगल से ही राज जात गुजरेगी। और आगे दो किलोमीटर दूर ल्वाणी गाँव के मंदिर में मेला भी लगेगा। अनुष्का का पति ल्वाणी गाँव में दुकान करता है और ससुर ल्वाणी के मंदिर के पुरोहित हैं। अनुष्का के दो बच्चे हैं।
मैं गाँव की इस लड़की के आधुनिक नाम अनुष्का से असमंजस में था (मुझे क्यों असमंजस होना चाहिए था, मुझे ही पता नहीं)। मैंने अनुष्का से उसके मायके के बारे में पूछा।

‘‘मेरा मायका हल्द्वानी में है। मैं वही पैदा हुई, पिताजी भी वहीं थे नौकरी में। अब घर भी बना लिया।” उसने जवाब दिया। यहाँ गढ़वाल के बहुत लोग हल्द्वानी के आसपास बसे हैं। उसका भाई विदेश में है। किसी होटल में नौकरी करता है। उसी के पैसे से हल्द्वानी का मकान बना। अनुष्का बी.ए. तक पढ़ी है। शादी के बाद ही गाँव देखा।
“ तो शादी के बाद हल्द्वानी जैसे शहर से इंटीरियर गाँव में आकर कैसा लगा।” अनुष्का बस मुस्करा भर दी।
उसने हमारे बारे में भी पूछा- कहाँ से आये हो, क्या करते हो। हम कुछ देर तक गपशप मारते रहे। अनुष्का और उसके परिवार के व्यवहार से एसा लगा ही नहीं कि‍ हम अजनबी हैं।
वह बीच-बीच में काम के लिए इधर-उधर भी जा रही थी। हमारी समझ में आ गया कि‍ शायद हम उसके काम करने में डिस्टर्ब कर रहे हैं। हमने इजाज़त ली और पूछा कि‍ पानी की टंकी कहाँ है?
“चाय के एकदम बाद पानी नहीं पीते।” उसने डांट कर मुझसे कहा। उसे समझ आने लगी थी कि‍ इस आदमी की दाड़ी तो सफ़ेद हो गयी, मगर अकल कम है।
मैंने कहा, “पीने के लिए नहीं, हम अपने गिलास धोना चाहते है।” सामान्य रूप में हम यात्राओं में ऐसा ही करते है। (घर में भी करना चहिये)।
“अरे, ऐसा क्यों, बहन के होते हुए तुम गिलास धोओगे?” उसने रिश्ता जोड़ते हुए टिपिकल जवाब दिया, जैसा की उसे पुरुषवादी समाज ने सिखाया था।
“भाइयों को भी तो काम करना चाहिए, बहन ने चाय पिला दी, भाई बर्तन धो सकते हैं।” मैंने कहा, तो उसने मेरे हाथ से गिलास छीना और अधिकार से बोली, “ज्यादा नाटक मत करना मेरे सामने!” अब हम चुप हो गए।
अब हम कुछ कर नहीं सकते थे। योगेश, जो हम सबसे छोटा है, उसने पानी की बाल्टी उठायी और हम अपने कैम्पिंग स्थल की ओर चले आये। हमारे जाने से पहले अनुष्का ने ताकीद दी, “देवता का स्थान है, गंदा मत करना!”
मैं उसका तात्पर्य समझ गया था, हमारा कैम्पिंग ग्राउंड मंदिर के परिसर में था। अतः उसके आसपास मल-मूत्र त्याग करना वर्जित था। उसे जवाब दिया, ‘‘हमें पता है। हम ध्यान रखेंगे।”
हम वापस लौट कर आये, थके थे। आराम किया। रात घिर आयी तो खाने का इंतज़ाम कर सो गए। उस रात मुझे दमे का अटैक पडा।
मैं सुबह जल्दी उठ गया, अँधेरे में ही। पता था कि‍ सुबह की प्राथमिकतायें अँधेरे में ही निपटा ली जाएं तो बेहतर होगा। वैसे भी दमे की वजह से सोया नहीं था।
रात को ही एक बोतल में पानी भर लिया था। उसे लिया और सड़क में दूर जा कर निपट लिया। लौटा तो साथी भी उठ गये थे। जैसे ही हम केम्पिंग साइट के ऊपर आये तो देखा अनुष्का बाहर खडी़ है। हमें देख कर उसने बुलाया। हम ऊपर गए तो बोली, “भैजी, मैंने तुम लोगों के लिए चाय बनायी है पी लो।” ऐसी बहने कहाँ मिलती हैं!
मैं तो निपट चुका था। हमारे साथी जो चाय पी रहे थे, लालायित नज़रों से शौचालय को देख रहे थे। उनमें से कुछ को बाहर निपटने की आदत नहीं थी। उनकी नज़रों को अनुष्का बहन ने भांप लिया। वो शायद भाइयों की ज़रूरत समझ गयी थी और उन्हें शर्मिन्दा नहीं करना चाहती थी। सो वह खुद ही बोल पडी, “आप लोग यहाँ ही बाथरूम का इस्तेमाल कर लो।” उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि‍ हम में से एक शौचालय पर कब्ज़ा जमा चुका था।
निवृत होकर साथी कैम्प में आ गये। हमने अपना कच्छा-बनियान उठाया और एक किलोमीटर दूर एक रौले में नहाने चले गए। हमारा विचार आज की रात भी यहीं रहने का था और कल कैम्प समेटने वाले थे। दिन में हम ल्वाणी गाँव के मंदिर में जाना चाहते थे, जहाँ शाम को मेला होना था।
तैयार होकर हम ल्वाणी के लिए निकल पड़े। रास्ता अनुष्का के घर के आगे से ही था। जब हम वहां पहुंचे तो देखा एक सज्जन टंकी में कपडे धो रहे हैं। उन्होंने हमारे बारे में पूछा। हमने अपने बारे में बता दि‍या। उन्होंने बताया कि‍ वह पास के ही एक स्कूल के हैड मास्टर हैं। बातचीत में हमने उन्हें यह बताया कि‍ नीचे हम  ने टैंट लगाए हैं। आज रात भी यही रहेंगे। “आप लोग सुबह भी तो यहाँ आये थे, बाथरूम यूज़ कर रहे थे।” उन्‍होंने पूछा। साथियों ने हामी भरी।
“आप लोगों को यहाँ परेशानी हो रही है। आप यहाँ से 12 किलोमीटर दूर स्कूल में चले जाओ। वहाँ पानी और बाथरूम दोनों हैं।” उन्होंने सुझाव दिया।

“ हमें कोई परेशानी नहीं। यहाँ अच्छा लग रहा है।” रजनीश ने जवाब दिया।
वह फिर भी वो हमें स्कूल में जाने के लिए जोर देने लगे। इस पर मैने कहा, “सवाल परेशानी का नहीं, रात को यहाँ पास में फल्दिया गांव में राज जात आयेगी। हम उसके साथ ही हैं। पैदल ही चल रहे हैं। बस टैंट का सामान लेकर गाडी़ में आए थे।” पर वह काफी देर तक हमें समझाते रहे कि‍ हमें वहां जाना चाहिए। “फायदे में रहोगे।’’ उन्होंने जोड़ा। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ यह व्यक्ति क्यों हमें यहां से आगे भेजने पर क्‍यों उतारू है। जब उसने अंत में कहा कि‍ ‘पानी कम पड़ जाएगा’ तो हम समझे। दरअसल हैड मास्टर साहब अनुष्का बहन के किराएदार थे। उन्हें लगा कि‍ हम नहाना-धोना भी यहीं कर रहे हैं, तो पानी ख़त्‍म हो जाएगा और उन्‍हें परेशानी होगी।  इसीलिए वह चाहते थे कि‍ हम यहाँ से दफ़ा हो जाएं। जब वे ज्यादा जिद करने लगे तो योगेश, जो हम में सबसे छोटा है, बोला, “अरे भाई, यहाँ जब हमारी अनुष्का बहन का घर है, तो हम आगे क्यों जाएं?” वह चुप हो गए। जब मैंने खुलासा किया कि‍ हम नहाने रौले में गए तो वह कुछ शांत हो गए। अब उन्हें पानी ख़त्‍म होने का डर नहीं था। हमें अनुष्का बहन के विशाल हृदय का भान हुआ। निश्‍चछ प्रेम का भी।
ल्वाणी से लौट कर हम आये तथा कैम्प में रबर शीट फैला कर सो गए। चार बजे के आसपास मैंने देखा की मैदान के दूसरे छोर से अनुष्का आ रही है। उसकी पीठ पर घास का बड़ा गठ्ठर है। वह पास आयी तो मैंने कहा, “घास लेकर आ रही है भुल्ली!!” उसने हामी भरी, गठ्ठर पैरापिट पर रखा। मैंने देखा, उसके पास दाथी नहीं है। मुझे लगा कि‍ वह कहीं छोड़ तो नहीं आयी। उससे पूछा, “तुम्हारी दाथी कहाँ है?” वह बोली, “मुझे घास काटना नहीं आता। मेरी सास काटती है और मैं उठा कर लाती हूँ। शादी से पहले हल्द्वानी शहर में रही, तो वहां घास काटने का सवाल ही नहीं था। शादी के बाद यहाँ आयी, तो अब यह करना ही पड़ता है, पशु हैं घर पर। एक-दो बार घास काटने की कोशिश की, तो हाथ ही काट लिया। मेरी सास अच्छी है। वह अब घास काट देती हैं और मैं उठा कर ले आती हूँ।” फिर उसने उंगली दिखाई, और जोड़ा, “आज भे उंगली काट ली मैंने।” उसकी उंगली से खून बह रहा था। कटी उंगली दिखाने के बाद उसने मुट्ठी बंद कर ली। मैं तुरंत बैंडऐड ले आया तथा उसकी उंगली में लगा दिया। वह हंसने लगी और कहा, ‘‘यह तो रोज होता है।”
मैंने चार-पांच बैंडऐड उसे पकड़ते हुए उससे कहा, “आज तेरे भाई हैं यहाँ, तो दवाई लगा ही ले।” उसने अपना गठ्ठर उठाया और कहा, ‘‘भैजी, चाय पीनी है तो ऊपर आ जाओ।” बार-बार उसके पास जाकर उसका काम बढा़ना अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए चाय पीने नहीं गया। बैठा सोचता रहा कि‍ लड़कियों की जिन्दगी भी क्या है? अपना घर भी अपना नहीं, हल्द्वानी में पढ़ी-लिखी, शहर के अन्दाज सीखे और शादी के बाद अब इस बीहड़ गांव में रह रही है! अगर लड़कों को शादी के बाद इस तरह के परिवर्तन करने पड़े तो क्या वे कर पायेंगे? मन जाने क्यों दुखी-सा हुआ।
शाम को हम नंदा राज जात की अगवानी के लिए फल्दिया गाँव गए और वहीं रास्ते के एक गांव के भंडारे में खाना खाया। सुबह उठे तो देखा सड़क पर चहल-पहल है। पता चला कि‍ गाँव वाले यात्रियों के खाने के लिए भंडारा कर रहे हैं। सडक के किनारे खम्बे गाड़ रहे है, बल्कि वे हमारे जागने का इंतज़ार कर रहे थे। जहां पर उन्हें खम्बा गाड़ना था, वहां पर हमारी गाडी़ खडी़ थी। रजनीश ने गाडी़ खिसका कर जगह बनायी। पता चला की खाने की तैयारी अनुष्का के बरामदे में हो रही है।
हमने अपने टैंट समेटे और सामान बाँध कर आठ बजे के आसपास गाडी़ में लाद दिया। एक साथी उसे आगे ले जाने वाला था और हम पैदल जात के साथ आने वाले थे।
अनुष्का से विदा लेने का वक्त आ गया था। रास्ता उसके घर की आगे से जाता था। हम सब उससे मिलने उसके घर गए, विदाई लेने। जैसे ही हम घर के बरामदे में पहुंचे तो देखा अनुष्का औरतों के साथ काम कर रही है। हमें आता देख वह खडी हुए और औरतों से हमारा परिचय कराया, ‘‘ये मेरे भाई हैं!” हम सच में गदगद हो गए। जाने क्यों मेरा सीना फूल गया। शायद इतनी काबिल और अच्छी बहन पाने पर।
हम अपने साथे कुछ बिस्कुट और चोकलेट लाये थे, अनुष्का को दिए। उसने बिस्कुट लेने से मना किया और कहा कि‍ आप को जरूरत पड़ेगी। हमने जबरदस्‍ती उसे बिस्कुट पकडा़ए। फिर हमने कहा, “हम जा रहे हैं। विदा लेने आए हैं।”
“बहन के घर से बिना खाए कैसे जाओगे?” अनुष्का ने डांटा। फिर मेरे पिठ्ठू को छीन कर उतार लिया।
‘इंतज़ार करो थोड़ी देर’ कह कर औरतें जहां काम कर रही थीं, चली गयी। वहां उसने बड़ी कडा़ई से छोटी कड़ाई में तेल निकाला। बड़ी कड़ाई में पूरी बनाने में देर लगानी थी। हमारे लिए छोटी कड़ाई में पूरी तलने लगी। एक औरत हमें चाय दे गयी। थोड़ी ही देर में अनुष्का ने हमारे सामने पूरियों का ढेर लगा दिया और साथ में चने भी। हमने जम कर पूरियां भकोसी। अनुष्का बीच-बीच में कहती रही, “पेट भर कर खाओ, पैदल चलना है चढ़ाई में।” पूरियों में अनुष्का के स्नेह का स्वाद भी था।
अब हमें जाना ही था। विदा लेते वक्त मैं उसको गले लगाने से रोक नहीं पाया। “भाइयो, आते रहना इस बहन के पास।” अनुष्का ने अनुरोध किया.. हमें प्रोमिस करनी ही थी।
पैदल रास्ते में मैं दूर तक उस मकान को देखता रहा, जहां हमारी एक बहन रहती है, जिसकी एक उंगली में पट्टी बंधी थी।

भक्ति काव्य में अनुराग मनुष्य व समाज के प्रति : डॉ. सिंह

Dr. Deepak Sinha Memorial Lecture

दिल्ली : कुछ विद्वान पूरा का पूरा भक्ति काव्य आधुनिकता के साँचे में ‘कन्वर्ट’ कर देना चाहते हैं, जबकि भक्ति काव्य की विशेषता यह है कि उसमें आधुनिक भाव बोध से मेल वालीं बहुत सारी बाते हैं, पर सारा का सारा भक्‍ति‍काल आधुनिक नहीं हो सकता, किसी भी रूप में नहीं। सुपरिचित आलोचक डॉ. जीवन सिंह ने ‘भक्ति कविता की प्रासंगिकता’ विषय पर व्याख्यान में कहा कि  भक्‍ति‍काल की विशेषता संगीत, कला और स्थापत्य को भी मज़बूत विरासत देने में है। वह केवल भजन-कीर्तन नहीं है, उसने इन कलाओं-स्थापत्यों को पुनः संस्कारित किया, और इसी काल में शास्त्रीय संगीत श्रेष्ठ ध्रुपद को नयी ऊंचाई मिली। डॉ. सिंह हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भक्ति काव्य में जो अनुराग है, वह मनुष्य और मानव समाज के प्रति है, ईश्वर के प्रति अनुराग भाव की भूमिका अपेक्षतया कम है। भाषा के सवाल पर उन्होंने कहा कि मौलिकता सदैव अपनी भाषा में विकसित होती है और आश्चर्य नहीं कि भक्ति काल के कवियों का मुख्य अलंकार ‘सहजयोक्ति’ है। तुलसीदास की कविताओं को याद करते हुए उन्होंने कहा कि कविता में जब कवि का त्रास व्यक्त होता है, तब वह सचाई के बेहद करीब चली जाती है। उन्होंने आगे कहा कि‍ तुलसी का शास्त्रीय ज्ञान उनके जीवन-बोध में बाधा की तरह है, शास्त्र-सम्मत बात करने के चक्कर में उनकी जीवनानुभव की अभिव्यक्ति बाधित हो जाती है। उन्होंने वेद और लोक मार्ग के भेद को बताते हुए कहा कि वेद के मार्ग पर जाने पर ही तुलसीदास की कविता पर सवाल खड़े होते हैं। आखिर में उन्होंने सूरदास की सामाजिक क्रांतिकारिता को सूरसागर के केवल पाँच पदों के सहारे खोलने की बेजोड़ कोशिश की।

व्याख्यान की अध्यक्षता कर रहे दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य गोपेश्‍वर सिंह ने भक्ति काव्य की शक्ति को रेखांकित करते हुए कहा कि गांधीजी आधुनिक भारत में भक्ति साहित्य के राजनीतिक भाष्य हैं। उन्होंने कहा कि भक्ति काव्य स्वार्थ के धरातल से उठाकर मनुष्य को उदात्त बनाता है। आचरण के द्वैत से रहित भक्ति कविता को प्रो. सिंह ने नयी मनुष्यता की प्रस्तावना करने वाला साहित्य बताया। उन्होंने कहा कि विश्‍व भर में अकेली भक्ति कविता है, जिसे ईश्वर की वाणी का दर्जा दिया गया और इस ऊंचाई पर वह कोरी धार्मिकता से रहित हो जाती है।

इससे पहले हिन्दू कालेज के डॉ. रामेश्‍वर राय ने दीपक सिन्हा को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वे ऐसे अध्यापक थे, जो अध्यापन कर्म को गहरी निष्ठा से देखते थे। विभाग के प्रभारी डॉ. पल्लव ने अतिथियों का स्वागत किया। संयोजन प्राची तिवारी ने किया तथा मीडिया प्रभारी रंजीत कुमार यादव ने वक्ताओं का परिचय दिया। आयोजन में विभाग के अध्यापक और बड़ी संख्या में विद्यार्थी-शोधार्थी उपस्थित थे। इस अवसर पर सभा द्वारा लगाईं गई लघु पत्रिकाओं की प्रदर्शनी का विद्यार्थियों ने उत्साह से अवलोकन किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर