Archive for: August 2014

ज़ैनुल आबेदीन की जन्मशती आयोजन 23 को

ZAINUL ABEDIN

नई दि‍ल्‍ली : जन संस्कृति मंच ने  भारतीय महाद्वीप के महान कलाकार ज़ैनुल आबेदीन की जन्मशती मनाने का संकल्प लिया है। देश भर के विभिन्न शहरों में चित्र-प्रदर्शनियों, चर्चाओं, सेमिनारों, फिल्म-प्रदर्शन और संगीत के जरिये ज़ैनुल आबेदीन को याद किया जाएगा।

जैनुल आबेदीन के चित्रों से दुनिया ने पहली बार 1943के अकाल की विभीषिका को मानवीय अर्थों में समझा। समझा कि आंकड़ों और सूचनाओं से अलग मनुष्यमात्र के जीवन और उसकी गरिमा के लिए अकाल एक विनाशकारी अनुभव है। लेकिन उनके चित्रों ने सिर्फ इतना ही नहीं बताया। यह भी कि अकाल कोई प्राकृतिक विपत्ति नहीं, बल्कि औपनिवेशि राज की नीतियों और साजिशों का नतीजा था। जैनुल आबेदीन जैसे कलाकारों और कवियों की बदौलत ही हम उस अभूतपूर्व अकाल के असली चेहरे को उस तरह समझ पाए, जिस तरह हम आजकल की अपनी विपत्तियों को टेलिविज़न और इंटरनेट के बावजूद नहीं समझ पाते।

ज़ैनुल आबेदीन के काम से दुनिया और भारत की चित्र-कला परम्परा में एक क्रांति घटित हुई। जैनुल आबेदीन ने चित्रकला को प्रतिरोध के माध्यम के रूप में सशक्त किया। साथ ही,  और साधारण जन के जीवन-संघर्ष की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में भी। उन्होंने अपनी कला के जरिये मजदूरों और किसानों के अनगिनत की आंतरिक तस्वीरें हम तक पहुंचाईं। बांग्ला मुक्ति संघर्ष के दौरान उनकी कला सक्रिय रही और एक नए देश के जन्म के साथ उसने भी एक नया रचनात्मक पुनर्जन्म लिया। बांग्लादेश में उन्हें शिल्पाचार्य कहा गया।

जन्मशती में जैनुल आबेदीन को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आज बाज़ार का विनाशकारी हस्तक्षेप जिस हद तक चित्रकला में बढ़ गया है, उस हद तक और कहीं नहीं। क्योंकि आज यह एक सच्चा खतरा है कि बाज़ार सच्ची और मौलिक कला को कहीं सिरे से गायब न कर दे। इस तरह जन्मशती आयोजन प्रतिरोध की संस्कृति के विस्तार के निमित्त एक महत्वपूर्ण पहलकदमी हो सकती है।

जन्मशती की शुरुआत 23 अगस्त को दिल्ली से होगी। आइटीओ स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में शाम पांच बजे से जैनुल आबेदीन के चित्रों की एक प्रदर्शनी लगाई जायेगी। इस प्रदर्शनी में चुने गए उनके महत्वपूर्ण चित्र होंगे। यह प्रदर्शनी जन संस्कृति मंच द्वारा संयोजित होगी। प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी करेंगे। साथ ही ‘अकाल- वेला में कला, भूख की सियासत और आज की चुनौतियां’  इस विषय पर एक परिचर्चा होगी। इसकी शुरुआत चर्चित चित्रकार-उपन्यासकार अशोक भौमिक के बीज वक्तव्य से होगी। प्रमुख चर्चाकार होंगे- कथाकार महेश दर्पण, फिल्मकार संजय काक, आलोचक आशुतोष कुमार, एक्टिविस्ट प्रोफेसर राधिका मेनन।

अशोक भौमिक की पुस्तक  ‘अकाल की कला और जैनुल आबेदीन’ की लोकप्रस्तुति और उस पर केन्द्रित बातचीत भी कार्यक्रम का हिस्सा है।

जन्मशती के राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए देश भर के विभिन्न प्रगतिशील जनवादी संगठनों को निमंत्रित किया गया है। जो लोग या संगठन इस से जुड़ना चाहें, वे जन्मशती आयोजन के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार से delhijsm@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तिथि- 23/08/2014
समय- शाम पांच बजे
स्थान- गांधी शांति प्रतिष्ठान, आइटीओ के पास, नई दिल्ली

(जन संस्कृति मंच के लिए रामनरेश राम द्वारा जारी)

वॉल मैगजीन ‘Science चाचू’

wall magazine

वसुंधरा : प्रथम साइंस प्रोग्राम की दिल्ली कंटेंट टीम ने 15 अगस्त को जनसत्ता अपार्टमेंट में सिनेमा ऑफ रेजिस्टेंस के संयोजक संजय जोशी के सहयोग से बच्चों की दीवार पत्रिका की वर्कशॉप आयोजि‍त की। वर्कशॉप  20 बच्चों के बाल संपादक मंडल के साथ की गयी। संजय जोशी ने पहले ही बच्चों के साथ मीटिंग कर के उनसे अपनी रचनाएँ लिख कर लाने को कह दिया था। इस वर्कशॉप में मुख्यतया मैगजीन के तकनीकी पक्षों यानी उसके हार्डवेयर और डिजाइन पर बात की गयी।

वर्कशॉप की शुरुआत मैगजीन के नामकरण से की गयी। बच्चों के अलग-अलग समूहों ने लगभग 10 नाम सुझाए। इन नामों पर बच्चों से ही वोटिंग करवाई गयी और सबकी सहमति से एक नाम चुना गया। चूँकि यह मैगजीन बच्चों द्वारा ही बनाई जानी है, इसलिए इसका नाम भी उनके द्वारा ही रखा जाना चाहिए। मैगजीन का नाम रखने में बच्चों ने अच्छी खासी मसक्कत की और काफी क्रिएटिव ख़याल सामने आये। सारे नामों में से सबसे ज्यादा वोट जिसे मिला उसे चुन लिया गया. यह नाम था “Science चाचू ”

इसके बाद मैगजीन के मास्टहेड को किस तरह बनाया जाय इस पर कुछ बात की गयी और बच्चों ने इसे डिजाइन करना शुरू किया। मैगजीन के शीर्षक को कैसे लिखा जायेगा यह भी बच्चों  ने तय किया और 5-6 डिजाइनों में से से एक को चुना। इसके बाद दो-तीन बच्चों ने स्केच पेन, पेस्टल आदि की मदद से मास्ट हेड को तैयार किया। इस बीच बच्चों के एक समूह ने अखबार के पन्नों को चिपका कर मैगजीन की बॉडी तैयार की और उसमें कॉलम बनाये और  पुराने टूथब्रश से वाटर कलर को स्प्रे कर के उसकी सजावट की। तीसरे समूह ने उसी वक्त संपादकीय लिखा। अंत में बच्चों ने पहले से लिख कर लायी गयी सामग्री को दुबारा ठीक से लिख कर मैगजीन में चिपकाया। बच्चों ने यह भी समझा कि मैगजीन में सामग्री को किस तरह सजाया जाय जिससे उसकी पठनीयता बढ़े। बच्चों को यह बात बताने की कोशिश भी की गयी की हमारी मैगजीन ज्यादा से ज्यादा वेस्ट सामान से बने। सोसाइटी के प्रेसिडेंट ने बच्चों को मैगजीन के लिए स्पेस मुहय्या करवाया जहाँ पर यह मैगजीन लगा दी गयी। बच्चों ने तय किया है कि वे मैगजीन को महीने में एक बार निकालेंगे।

प्रस्‍तुति‍ : वि‍नोद उप्रेती

सी-सैट और अनुवाद की भाषा: प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के विवाद की जड़ मेंअनुवाद की खामियां विशेष रूप से उजागर हुई हैं। जिस परीक्षा के माध्यम से आप देश की सबसे बड़ी नौकरी के लिए लाखों मेधावी नौजवानों के बीच से चुनाव कर रहे हो और उसका परचा ऐसी भाषा में आए जिसे न हिंदी वाले समझ पाएं न अंगरेजी वाले, तो इसे देश का दुर्भाग्य नहीं मानें तो क्या मानें। आजादी के तुरंत बाद के दशकों में एक अधिनियम के तहत यह फैसला किया गया कि अंगरेजी अगले पंद्रह वर्षों तक चलती रहेगी और इन वर्षों में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में ऐसा साहित्य अनूदित किया जाएगा या मौलिक रूप से लिखा जाएगा, जिससे कि उसके बाद भारतीय भाषाओं में काम किया जा सके। लेकिन हुआ उलटा।

शुरू के दो-तीन दशक तक तो राजभाषा और अनुवाद के काम में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वे लोग भी लगे जो जाने-माने साहित्यकार थे, जैसे बच्चन, दिनकर, बालकृष्ण राव, अज्ञेय आदि। खुद प्रेमचंद ने अंगरेजी की कई किताबों के अनुवाद किए जिनमें जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ भी शामिल है। अनुवाद को इन सभी ने उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जितना कि मौलिक लेखन को, और यही कारण है कि उन दिनों के किसी अनुवाद को पढ़ कर कभी लगता नहीं कि आप मूल कृति पढ़ रहे हैं या अनुवाद।

पिछले बीस-तीस वर्षों से ऐसा अनुवाद सामने आ रहा है कि उसे पढ़ने के बजाय आप मूल भाषा में पढ़ना बेहतर समझते हैं। सरकार द्वारा जारी परिपत्रों में तो बार-बार यह कहा ही जाता है कि जहां भी समझने में शक-शुबहा हो, अंगरेजी को प्रामाणिक माना जाए। नतीजा धीरे-धीरे यह हुआ कि सरकारी अनुवाद इतनी लापरवाही से होने लगा जिसका प्रमाण हाल ही में सी-सैट की परीक्षा से उजागर हुआ है, जहां ‘कॉनफिडेंस बिल्डिंग’ का अनुवाद ‘विश्वास भवन’ और ‘लैंड रिफॉर्म’ का ‘आर्थिक सुधार’ किया गया है। और जो भाषा इस्तेमाल की गई है उसे गूगल या कंप्यूटर भले ही समझ ले, कोई हाड़मांस का आदमी नहीं समझ सकता। यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि जब आप परीक्षा भवन में बैठे होते हैं तो आपके पास अटकलें लगाने या मूल प्रश्न से भटकने का समय नहीं होता। संघ लोक सेवा आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने बातचीत के बाद जब यह समस्या स्वीकार करते हुए कहा कि आखिर अच्छे अनुवादक कहां से लाएं तो लगा कि इस समस्या पर पूरे समाज और सरकार को विचार करने की जरूरत है।

सबसे पहली खामी तो शायद अनुवादक या हिंदी अधिकारी की भर्ती प्रक्रिया की है। भर्ती-नियम कहते हैं कि हिंदी अधिकारी या अनुवादक बनने के लिए हिंदी, संस्कृत या अंगरेजी भाषा में एमए होना चाहिए और डिग्री स्तर पर दूसरी भाषा। बात ऊपर से देखने पर ठीक लगती है, लेकिन सारा कबाड़ा इसी नीति ने किया है। कम से कम हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों से जिन्होंने हिंदी में एमए किया है वे सूर, कबीर, तुलसीदास, जायसी को तो जानते-समझते हैं, भाषाओं, बदलते विश्व के आधुनिक ज्ञान, मुहावरों को नहीं समझते, जिनमें रोजाना के जीवन, राजनीति और समाज की जटिलताएं झलकती हैं। इसके दोषी वे नहीं हैं, बल्कि वह पाठ्यक्रम है जिसकी इतिहास, राजनीति शास्त्र, भूगोल या विज्ञान के विषयों में कभी आवाजाही रही ही नहीं।

बेरोजगारी के इस दौर में भी जितनी आसानी से प्रवेश हिंदी अधिकारी या अनुवादक की नौकरी में होता है, उतनी आसानी से देश की किसी दूसरी नौकरी में नहीं। नौकरी में आने के बाद इन्हें फिर शायद ही अच्छे अनुवाद या सरल भाषा में अपनी बात कहने का कोई विधिवत शिक्षण-प्रशिक्षण नियमित अंतराल से दिया जाता हो। इसीलिए आपने अधिकतर मामलों में देखा होगा कि इनके अनुवाद की भाषा कठिन, बोझिल, ज्यादातर मामलों में संस्कृत के शब्दों से लदी हुई या ऐसी टकसाली होती है जिसका बोलचाल की भाषा से दूर-दूर तक कोई संबंध ही नहीं होता।

उर्दू या बोलचाल की हिंदुस्तानी से दूरी भी इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाती है। पुरानी पीढ़ी के संस्कृत के मारे प्रशिक्षक राजभाषा के नाम पर ऐसा करने पर इनकी और पीठ थपथपाते हैं। इस कमी को पूरा किया जा सकता है बशर्ते कि आप लगातार उस साहित्य और पत्रिकाओं के संपर्क में रहें। पिछले कई दशकों के अनुभव के बाद कहा जा सकता है कि सरकार के हिंदी विभागों में काम करने वाले ज्यादातर कर्मचारी नौकरी में आने के बाद पढ़ने-लिखने से शायद ही कोई संबंध रखते हों और यही कारण है कि धीरे-धीरे उनके पास शब्द भंडार और सरल शब्दों का क्षय होता जाता है।

सवाल उठता है कि आखिर वे हिंदी की किताब क्यों पढ़ें और क्यों अपनी भाषा को सरल, बोधगम्य, पठनीय बनाएं? पहले तो उनको सरकारी मशीनरी का हर विभाग देखता ही ऐसे नजरिए से है कि जैसे वे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों। जिन सरकारी बाबुओं को दूर-दूर तक अंगरेजी नहीं आती वे भी हिंदी विभाग में काम करने वालों को एक अस्पृश्य नजरिए से देखते हैं।

यानी ऐसा विभाग जो खुशामद करते हुए काम कराता हो, सितंबर के महीने में जो उपहार बांट कर भीड़ जुटाता हो- क्या उसके आला अफसरों ने भी इस ओर कभी ध्यान दिया, कभी अनुवाद को बेहतर करने की सोची। और क्या दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले ये तथाकथित अंगरेजीदां छोटे-छोटे काम, आवेदनों के जवाब, टिप्पणी आदि हिंदी में नहीं कर सकते? साठ वर्ष के बाद या राजभाषा अधिनियम की पंद्रह वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद क्या हमें हिंदी में काम करने के योग्य नहीं हो जाना चाहिए था?

इसीलिए एक शीघ्र उपाय अनुवादकों की गुणवत्ता बेहतर करने का यह है कि उनकी भर्ती के नियम बदले जाएं। हिंदी अनुवादकों की भर्ती एक परीक्षा के माध्यम से होती है और जब प्रतियोगी परीक्षा ले ही रहे हैं तो उसमें किसी भी विषय में डिग्री या स्नातकोत्तर ही पर्याप्त माना जाए,किसी भाषा विशेष में स्नातक या स्नातकोत्तर होना नहीं। क्या सिविल सेवा परीक्षा समेत कर्मचारी चयन आयोग, बैंक आदि की ज्यादातर परीक्षाओं में केवल ग्रेजुएट डिग्री पर्याप्त नहीं मानी जाती? इससे भाषा-ज्ञान रखने वाले वे भी चुने जा सकते हैं जिन्होंने हिंदी माध्यम से राजनीति शास्त्र, इतिहास या विज्ञान विषयक कोई भी पढ़ाई पूरी की है। इसका उलटा भी कि अंगरेजी माध्यम से पढ़े जाने वाले वे नौजवान भी इसमें चुने जा सकते हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी रही हो। भाषाओं से इतर योग्यता रखने वालों को विषयों का बेहतर ज्ञान होने के कारण अनुवाद में वे गलतियां नहीं आएंगी, जो संघ लोक सेवा आयोग की सीसैट परीक्षा से उजागर हुई हैं।

दूसरे भारतीय भाषा भाषी हिंदी अनुवादकों में शामिल हो पाएं तो सबसे अच्छा रहे। उन्हें परीक्षा में रियायत देकर भी राजभाषा विभागों में नौकरी देनी चाहिए। इससे वह पाप भी धुलेगा, जो हिंदी भाषियों ने त्रिभाषा सूत्र को धोखा देकर दक्षिण की कोई भाषा न सीख कर किया है। क्या भारतीय भाषाओं की एकता राष्ट्रीय एकता के समतुल्य नहीं है।

अनुवाद की चक्कियों के बीच पिसते राजभाषा हिंदी के कर्मचारियों को शायद ही कभी समकालीन साहित्य पढ़ने की फुरसत मिलती हो। एक पुस्तक चयन समिति के दौरान कुछ विवाद बढ़ने पर एक हिंदी अधिकारी ने सफाई दी ‘मुझे क्या पता कौन-सी किताब अच्छी है या बुरी। मैंने तो पिछले पंद्रह साल से कोई नई किताब नहीं पढ़ी। अनुवाद से फुरसत मिले तब न।’ आश्चर्यजनक पक्ष यह है कि ऐसे अधिकारी न पढ़ने के बावजूद आखिर पुस्तक चयन समिति में क्यों बने रहना चाहते हैं?

एक और अधिकारी का दर्द उभर कर सामने आया। पहले तो अनुवाद से फुरसत नहीं मिलती, उसके बाद संसदीय समितियों के साठ-सत्तर पेजों के ब्योरे, फॉर्म, अनुलग्नक, प्रपत्र। कितने कंप्यूटर खरीदे गए, उसमें कितने द्विभाषी थे? कितने कर्मचारी हैं, कितनों को प्रबोध, प्रवीण का ज्ञान है, कितने पत्र ‘क’ क्षेत्र को गए, कितने ‘ख’ क्षेत्र को और कितने विज्ञापन अंगरेजी में गए, कितने दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में? और फिर उन्हें लगातार यह डर रहता है कि संसदीय समिति इन आंकड़ों को जोड़ कर देखने पर कोई गलती न निकाल दे। यानी कि उन्हें राजभाषा का गणित और समितियों को खुश रखने का बीजगणित तो सिखाया जाता है, भाषा को सहज, लोकप्रिय बनाने का बुनियादी पक्ष नहीं।

कुछ व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र करना भी जरूरी लगता है। वर्ष 1979 की सिविल सेवा परीक्षा समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के क्रम में मैंने एक बैंक में एक हिंदी अधिकारी पद के लिए भी आवेदन कर दिया, और लिखित में पास भी हो गया। साक्षात्कार के समय उन्होंने पेच लगाया कि आप हिंदी में स्नातकोत्तर तो हैं, लेकिन बीए में आपके पास विज्ञान था- न हिंदी थी न अंगरेजी। मैंने समझाने की कोशिश भी की कि बीएससी अंगरेजी माध्यम में था, जिसे अंगरेजी के एक विषय से बेहतर नहीं तो बराबर माना जा सकता है। लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि उनके भर्ती-नियमों में यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कितना किसी को अनुवाद और भाषा का कितना ज्ञान है, महत्त्वपूर्ण यह है कि आवेदक ने उन विषयों में डिग्री ली है या नहीं।

एक दशक पहले मंत्रालय में निदेशक, राजभाषा के पद पर प्रतिनियुक्ति से आवेदन मांगे गए थे। एक आवेदनकर्ता विज्ञान और हिंदी दोनों में स्नातकोत्तर था। लेकिन उसे साक्षात्कार के लिए इसलिए नहीं बुलाया गया कि डिग्री स्तर के विषयों में हिंदी या अंगरेजी का उल्लेख नहीं है। क्या अंगरेजी माध्यम से विज्ञान पढ़ना अंगरेजी विषय की पूर्ति नहीं करता? इन नियमों में अपेक्षित परिवर्तन किया जाए तो विज्ञान या हिंदीतर दूसरे विषयों को पढ़ कर आने वाले मौजूदा अनुवादकों से कहीं अच्छे साबित होंगे।

आखिरी बात कि अनुवाद के सहारे कब तक? कम से कम दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के पंचानबे प्रतिशत कर्मचारी-अधिकारी हिंदी जानते हैं। संसदीय समितियां भी यहीं हैं और राजभाषा के सर्वोच्च कार्यालय भी। क्यों ये अपनी बात फाइलों पर अपनी भाषा में कहने में हिचकते हैं। इसकी शुरुआत शीर्ष अधिकारियों से करनी होगी। हिंदी माध्यम से चुने गए अधिकारियों का तो यह थोड़ा-बहुत नैतिक दायित्व बनता ही है कि जिस भाषा के बूते वे इन प्रतिष्ठित सेवाओं में आए हैं, उसमें कुछ काम भी किया जाए और राजभाषा विभाग का बोझ कुछ हल्का करें। पर कई बार ये दूसरों से बेहतर अंगरेजी लिखने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। इसका प्रमाण मिला दक्षिण भारत के एक सरकारी कार्यालय में। हिंदी प्रेमी दक्षिण भारतीयों का कहना था कि यहां उत्तर प्रदेश, बिहार से बड़ी संख्या में अधिकारी तैनात हैं। हम चाहते थे कि इनके साथ रह कर हमारी हिंदी ठीक हो जाएगी, क्योंकि हमें भी दिल्ली या दूसरे हिंदी क्षेत्रों में जाना होता है। उन्होंने अफसोस के साथ बताया कि उत्तर के ये अधिकारी तो अंगरेजी सुधारने में लगे रहते हैं।

सीसैट विवाद ने अनुवाद की खामियों की ओर पूरे देश का ध्यान खींचा है, लेकिन अगर हम इस समस्या का समाधान चाहते हैं तो हमें भर्ती-नियमों और योग्यता आदि के प्रावधानों में तुरंत बदलाव करने होंगे। जहां तक स्थायी समाधान का प्रश्न है, जब तक स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा अपनी भाषाओं में नहीं दी जाएगी, इस समस्या का पूरा हल संभव नहीं होगा।

दीवार पत्रिका की ‘कल्‍पना’ : हिमांशु बसेड़ा

दीवार पत्रि‍का तैयार करते बच्चे।

दीवार पत्रि‍का तैयार करते बच्चे।

मैं जब पहले दिन स्कूल (रा.इ.का.देवलथल) आया और घूमते-घूमते हाल में देखा कि‍ दीवार पर एक लंबा चार्ट लटका है। उसमें कविता,कहानी,पहेली आदि हाथ से लिखकर चिपकाई गई हैं। मैं समझ नहीं पाया कि यह क्या है?दूसरे दिन सुबह थोड़ी जल्दी आकर इन्हें पढ़ने लगा। फिर महेश पुनेठा सर ने कक्षा में बताया कि यह एक दीवार पत्रिका है, जो स्कूल के बच्चों द्वारा ही बनाई जाती है। इसमें बच्चों द्वारा खुद लिखी या ढूँढ़ी गई सामग्री चिपकाई जाती है। जो अच्छी रचना करता है, उसी को इसमें स्थान मिलता है और उसका नाम भी लिखा जाता है। तुम भी अपनी मौलिक रचनाएं संपादक मंडल को दे सकते हो। मैं घर जाकर रचना तैयार करने में लग गया। मैं भी सोचने लगा कि कितना अच्छा होगा जब मेरी रचना छपेगी। लेकिन मेरी रचना नहीं छपी। दूसरों की रचना पढ़कर सोचता कि क्या कभी मेरी भी रचना छपेगी। रचना के नीचे रचनाकारों का नाम पढ़कर सोचता कि वे कितने होनहार हैं,उनका नाम दीवार पत्रिका में है। क्या कभी मेरी रचना भी संपादक मंडल को प्रभावित करेगी?मेरी रचना के साथ क्या कभी मेरा नाम भी छपेगा?दीवार पत्रिका पढ़ते हुए देखता कि‍ उसमें संपादक,उप संपादक तथा संपादक मंडल के साथियों के नाम छपे होते। मैं सोचता ये भी तो हमारे स्कूल के ही छात्र हैं। मैं सर से पूछना चाहता कि मैं भी इसका सदस्य बन चाहता हूँ,इसके लिए क्या करूँ?डर के कारण पूछ नहीं पाता।

एक दिन पर्यावरण पर एक कविता लिखी। उसे सर को दे दिया। मैं सोच रहा था, कहाँ छपेगी मेरी कविता? लेकिन जब दीवार पत्रिका का अगला अंक निकला तो उसमें मेरी रचना थी। मैं बहुत खुश हुआ। मन ही मन तय किया कि अब जब भी दीवार पत्रिका आएगी, उसमें मेरी एक न एक रचना जरूर होगी। सर ने एक बार पानी पर लेख लिखने के लिए कहा और कहा कि‍ अच्छे लेख को अवश्य दीवार पत्रिका में जगह देंगे। मैंने भी लिखा, लेकिन सर को ज्यादा प्रभावशाली नहीं लगा, अच्छा जरूर लगा।

मैं जब भी पुस्तकालय में किताब लेने या जमा करने जाता तो देखता कि संपादक मंडल पत्रिका बनाने में लगा है। मैं सोचता कि काश! मैं भी इसको बनाने में अपना सहयोग दे पाता। जब मैं और मेरा दोस्त प्रेम प्रकाश पांडेय पुस्तकालय में जाते तो एक-दूसरे से कहते कि सर से कहें कि हम भी दीवार पत्रिका बना सकते हैं? लेकिन डर के मारे बात मन में ही रह जाती थी।

एक दिन हमने पुस्तकालय की सफाई की। उन दिनों बहुत दिनों से दीवार पत्रिका का कोई नया अंक नहीं निकला था। हम आपस में दीवार पत्रिका के बारे में बात कर रहे थे। हम एक-दूसरे से कह रहे थे कि सर से पूछें ? मैंने डर-डरकर कहा,‘‘सर आजकल दीवार पत्रिका नहीं बन रही है?क्या हम बना सकते हैं?’’ सर ने बहुत खुश होकर कहा,‘‘अरे वाह! यह तो बहुत ही अच्छी बात है। मैं तो ऐसा चाह ही रहा हूँ।’’ सर ने हमें दो चार्ट और अन्य सामग्री दी। उन्होंने कहा,‘‘यदि तुम अपनी नई पत्रिका बनाने चाहते हो तो उसका कोई नाम भी सोचिए।’’हमने अनेक नाम बोले। सर ने कहा,‘‘नाम ऐसा होना चाहिए जो आपकी भावनाओं व उद्देश्य को व्यक्त करे।’’ मैंने सोचकर ‘कल्पना’ नाम बताया। सर ने पूछा,‘‘बताओ, इस नाम से क्या भावना व्यक्त होती है।’’ मैंने बताया कि‍ इसमें बच्चों की कल्पनाओं को स्थान मिलेगा। रचना अपने आप में बच्चों के मन की कल्पनाएं तो हैं। सर ने कहा, ठीक है। अच्छा है। यही नाम लिखो। हमने दो चार्टों को चिपकाया। इसकी विधि इस प्रकार है- पहले हमें दो चार्ट चाहिए। यह ध्यान रखना होता है कि चार्ट थोड़े मोटे होने चाहिए जिससे वह एकाएक फटें नहीं। उन्हें मेज में रख दें। दोनों चार्टों को 6-7 सेमी मोड़कर चिपका दें। उन्हें सूखने का वक्त दिया जाय। तब तक दीवार पत्रिका का नाम लिखने के लिए किसी दूसरे चार्ट में से 12 सेमी चौड़ी एक पट्टी काट ली जाय। जिसमें पटरी,पेंसिल की सहायता से नाम लिखकर उसमें मनचाहा रंग भर दो। किनारों पर काला बार्डर लगा दो ताकि अच्छा लगे। उसके दोनों कोनों में बची जगह पर कोई चित्र बना दीजिए। उसे चिपकाए गए चार्टों के सबसे ऊपर चिपका दीजिए। अब जो सामग्री एकत्र हुई है उसे चिपकाना शुरू कीजिए। सबसे ऊपर संपादकीय चिपकेगी। नीचे कविता,कहानी,पहेली,चुटकुले,क्षेत्रीय समाचार तथा अन्य रचनाएं चिपकाएं। जब सारी रचनाएं चिपक जाएं,हर रचना के चारों ओर मोटी स्केज या मार्कर से बार्डर बना दीजिए। चार्टों को उल्टा कीजिए और जहाँ पर दो चार्ट एक-दूसरे से मिलाए गए हैं, वहाँ टेप चिपका दीजिए। ऊपर और नीचे भी टेप लगा दें ताकि पत्रिका फटने न पाए। एक पतली लकड़ी ऊपर-नीचे दोनों सिरों पर सपोर्ट के लिए टेप से लगा दीजिए जिससे पत्रिका मुड़ने से बच जाएगी। चार्ट के ऊपरी सिरे के ठीक बीच में दो छेद कीजिए जिसमें टैग डाल दीजिए जिसकी सहायता से उसे दीवार में कील पर लटका दीजिए। हो गई दीवार पत्रिका तैयार।

इस विधि से ही हमने पहली बार दीवार पत्रिका तैयार की। तीन दिन में तैयार हो जाती, लेकिन एक दिन पुनेठा सर के अवकाश में होने के कारण चौथे दिन तैयार हो पाई। इसके लिए हमने ओवर टाईम दिया। खाली वादनों में काम किया। जिस दिन दीवार पत्रिका को लटकाया गया, उस दिन दिल में बहुत खुशी हुई। पहला अंक निकालने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हमारे पास रचनाएं कम थीं। हमें काटना-चिपकाना अच्छी तरह नहीं आता था। चिपकाते समय कभी-कभी दूरी अधिक हो जाती थी। फिर उसे भरना पड़ता था। पत्रिका के शीर्षक में रंग बहुत अच्छे नहीं लगे।

दीवार पत्रिका को बनाते हुए हमें कई जानकारियां मिलती रहती हैं। अच्छी रचना प्रकाशित करने के लिए उन्हें पढ़ना पड़ता है जिससे उनकी अच्छी बातें ग्रहण हो जाती हैं। हमारा सामान्य ज्ञान बढ़ता है। पहेलियों को पढ़ते हुए सोच-समझ में वृद्धि होती है। इसको बनाने में हमारा समय बर्बाद नहीं होता है, बल्कि उसका सदुपयोग हो जाता है। पढ़ने के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है। दीवार पत्रिका में सभी का सहयोग रहता है। बच्चे अपनी-अपनी रचनाएं देते हैं।

जब हमने पहला अंक निकाला तो कुछ बच्चों ने उसे फाड़ दिया। दूसरे दिन कुछ पुराने अंक भी फाड़ दिए। हमको समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह फाड़ने वाला कौन है और क्यों फाड़ रहा है? हमने पता लगाने की कोशिश की, लेकिन फाड़ने वाले का पता नहीं चला। उन्होंने हमारे विश्वास,मेहनत,लगन को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वे हमारे हौंसले को नहीं फाड़ पाए। हम दीवार पत्रिका निरंतर निकालते रहे। आज भी यह सिलसिला जारी है। अब कोई फाड़ भी नहीं रहा है।

इस वर्ष नए सत्र के शुरू में दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला भी हुई जिसमें कक्षा नौ और दस के बच्चों ने भाग लिया। इस कार्यशाला का मकसद रचना तैयार कर दीवार पत्रिका बनाना था। यह कार्यशाला दस दिन चली। इसमें दीवार पत्रिका कैसे बनाई जाती है?हम अपनी रचनाओं को कैसे बेहतर बना सकते हैं?पहेलियां कैसे बनाई जाती हैं?बिंब,रूपक,कल्पना आदि का रचना में क्या महत्व है?कविता,कहानी कैसे बनाई जाती हैं?आदि बातें सीखने को मिलीं। इसका लाभ यह हुआ कि अब अधिकतर बच्चे अपने खाली समय को बर्बाद नहीं करते हैं। कुछ न कुछ मौलिक रचने में लगे रहते हैं। पुस्तकालय में आकर अध्ययन करते हैं। इस कार्यशाला का असर इस बार की दीवार पत्रिका में भी देखा जा सकता है। यह अंक पिछले पाँच अंकों से बेहतर बना है। इस अंक में अधिक स्तम्भ तो हैं ही, साथ ही मौलिकता भी है। हमारी कोशिश है कि हर अगला अंक बेहतर से बेहतर हो।

(हिमांशु बसेड़ा रा.इ.का.देवलथल, पिथौरागढ़ में कक्षा दस के छात्र और दीवार पत्रि‍का ‘कल्पना’ के संपादक हैं।)

भाषा एवं साहित्य-शि‍क्षण की सही पद्धति क्या है : कपि‍लेश भोज

कपि‍लेश भोज

कपि‍लेश भोज

वर्तमान में हमारे यहाँ प्राथमिक से लेकर स्नातक एवं स्नातकोत्तर तक की कक्षाओं में भाषा एवं साहित्य-शिक्षण की जो पद्धति प्रचलित है, उसका परिणाम इस रूप में दिखाई देता है कि वर्षों तक एकाधिक भाषाओं और उनमें रचित साहित्य का अध्ययन करने के बावजूद विद्यार्थी अपनी विद्यालयी या महाविद्यालयी शिक्षा पूरी करके जब बाहर निकलते हैं, तो आमतौर पर उनमें से अधिकांश अपनी सीखी हुई भाषाओं में रचे गए या रचे जा रहे साहित्य का न तो गंभीरतापूर्वक पठन-पाठन जारी रखते हैं और न उनमें उसके प्रति कोई जिज्ञासा या उत्सुकता रहती है।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है और इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ?

इस मुद्दे पर चर्चा करने से भी पहले यह जानना जरूरी है कि किसी भी भाषा और उसमें रची गई या रची जा रही उत्कृष्ट कृतियों का अध्ययन जारी रखने की आवश्यकता क्या है ? … अतः पहले इसे ही समझ लें।

यह तो सभी जानते हैं कि भाषा का आविष्कार मनुष्य का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार है। जब से मनुष्य ने पैरों के बल खड़ा होना सीखा और उसके हाथ श्रम करने के लिए पूर्णतः मुक्त हुए तो इसी प्रक्रिया में सामूहिक श्रम के जरिए भौतिक वस्तुओं के उत्पादन, चिन्तन, बुद्धि के विकास और भाषा के सृजन की दीर्घकालिक अनवरत यात्रा भी प्रारंभ हुई। श्रम, सृजन और विकास की इस दीर्घकालिक यात्रा के ही परिणामस्वरूप सुविकसित भाषा और मौखिक व लिखित साहित्य अस्तित्व में आए। अतः भाषा और साहित्य मनुष्य के संघर्ष, सृजन, विकास और संचित अनुभवों का एक ऐसा कोष है, जिससे ठीक ढंग से परिचित हुए बगैर हम मानव-जाति और मानव-समाज के विकास को नहीं समझ सकते। अतः भाषा केवल भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने तथा परस्पर संवाद का माध्यम ही नहीं है, बल्कि वह अपने में मनुष्य के इतिहास और उसकी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सृजनात्मक आदि समस्त गतिविधियों को समाहित किए रहती है।

असल में भाषा और साहित्य-शिक्षण की प्रचलित वर्तमान पद्धति का मूल संकट ही यह है कि अधिकांश शिक्षक भाषा को केवल अभिव्यक्ति और संवाद के माध्यम के रूप में देखते और समझते हैं और यहीं से अनेक गड़बड़ियाँ शुरू होती हैं। भाषा और साहित्य की बुनियादी अवधारणा से अनभिज्ञता का सीधा प्रभाव उनकी शिक्षण-पद्धति पर पड़ता है।

भाषा और साहित्य की बुनियादी अवधारणा की साफ समझ न होने का परिणाम शिक्षकों की शिक्षण-पद्धति में प्रमुखतः दो रूपों में दृष्टिगोचर होता है। पहला यह कि सबसे पहले वे भाषाओं को महत्वपूर्ण और अमहत्वपूर्ण इन दो खानों में बाँट कर देखने की अवैज्ञानिक और पक्षपातपूर्ण सोच के खुद तो शिकार होते ही है, विद्यार्थियों में भी इस सोच को फैला देते है। हमारे देश में अँगरेजी भाषा के प्रति लगातार बढ़ते अंध मोह और यहाँ के जनगण की विभिन्न भाषाओं के प्रति हीन भावना को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।… दूसरा यह कि भाषा और साहित्य का शिक्षण जीवन से काट कर इस नीरस ढंग से किया जाता है कि विद्यार्थी न तो भाषा के सौन्दर्य और साहित्य में पुनर्सृजित जीवन-जगत की छवि को ठीक ढंग से समझ पाता है और न ही उसके सहारे जीवन-जगत के विविध आयामों को और गहराई से जानने की दिशा में आगे बढ़ पाता है।

अतः किसी भी भाषा के अध्ययन का मतलब केवल कामचलाऊ मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति-कौशल अर्जित करना ही नहीं, बल्कि उसे अर्जित करते हुए उसके व्यापक उपयोग में दक्षता हासिल करना होता है। आशय यह कि किसी भाषा को बोलने-लिखने और समझने में कुशलता अर्जित करने के पश्चात उस भाषा में रचित उत्कृष्ट साहित्य के अनमोल खजाने से परिचित होना और अपने जीवनानुभवों व विचारों को मौखिक व लिखित दोनों रूपों में अधिकाधिक स्पष्ट और रोचक ढंग से व्यक्त करने का कौशल विकसित करना ही किसी भाषा को सीखने की असली उपयोगिता या सार्थकता है। इस प्रक्रिया में ही मनुष्य आत्मिक समृद्धि प्राप्त करता है। इसीलिए किसी भाषा और उसमें लिखी गई उत्कृष्ट रचनाओं के शिक्षण के दौरान भाषा और साहित्य-शिक्षण के इस मूलभूत उद्देश्य को ध्यान में रखना जरूरी होता है।

भाषा और साहित्य के अध्ययन के मूलभूत उद्देश्य से सम्बन्धित इस अवधारणात्मक पृष्ठभूमि की चर्चा के बाद अब हम उस पद्धति की छानबीन कर सकते हैं, जो हमारे प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भाषा-साहित्य-शिक्षण में अपनाई जा रही है।

हमारे सरकारी स्कूल-कॉलेज हों या गैर-सरकारी, सब जगह पाठ्य-पुस्तकों के पाठों के प्रश्नोत्तरों को रटते हुए भाषा को सीखने की एक जैसी ही एकरस प्रक्रिया अपनाई जाती है। पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक के विद्यार्थी पाठ्य-पुस्तकों के घेरे में ही घूमते रहते हैं और शिक्षक भी उन्हें उन्हीं तक सीमित रखते हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी की पाठ्य-पुस्तकों में संकलित गद्य व पद्य की विभिन्न विधाओं की जो रचनाएँ जिस ढंग से पढ़ाई जाती हैं, उसका एकमात्र उद्देश्य परीक्षा में पाठों से सम्बन्धित प्रश्नों को शुद्ध भाषा में सही-सही लिख पाने में सफल होना होता है।… सारी मशक्कत इसी बात के लिए की जाती है और यह सिलसिला पहली कक्षा से शुरू होकर उच्च कक्षाओं तक चलता रहता है। जाहिर है,  इस तरह की परीक्षा-पद्धति में पाठों पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देते समय विद्यार्थी पाठों की अन्तर्वस्तु को कितना समझ पाया है, इसकी ठीक-ठीक परख संभव नहीं हो पाती। अतः इस तरह की शिक्षण व परीक्षा-पद्धति के चलते विद्यार्थी पाठ्य-पुस्तकों के पाठों से बाहर निकलकर विविधता भरे पुस्तक-संसार में प्रवेश करके मानव-जाति द्वारा संचित ज्ञान को आत्मसात करने और उसके आलोक में जीवन-जगत को समझने की दिशा में प्रेरित व गतिमान नहीं हो पाता।

इसी जड़ शिक्षण व परीक्षा-पद्धति का ही परिणाम यह हुआ है कि हमारे स्कूल-कॉलेजों में पाठ्य-पुस्तकों के अलावा अन्य पुस्तकों के पठन-पाठन और उन पर चर्चा की गतिविधि एकदम बन्द है। और पाठ्य-पुस्तकों में संकलित रचनाओं को पढ़ाने का जो तरीका अपनाया जाता है, वह भी पूर्णतः जड़ता से ग्रस्त है। अध्यापन की इस जड़ता भरी पद्धति के प्रति सजग होना और सही पद्धति को समझना व अपनाना बेहद जरूरी है।

हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी की पाठ्य-पुस्तकों में संकलित गद्य एवं पद्य की रचनाओं को पढ़ाते समय शिक्षकों का सारा जोर शब्दार्थ, व्याख्या और रचनाओं पर आधारित निश्चित प्रश्नों के निश्चित उत्तरों को जानने और उन्हें याद करवाने पर रहता है। किसी कविता या गद्य की किसी भी विधा की रचना को पढ़ाते समय शब्दार्थ, व्याख्या और प्रश्नोत्तर से अवगत होना पाठ की बोधगम्यता के लिए जरूरी तो होता है, लेकिन यह शुरुआती चरण होता है और बात यहाँ पर समाप्त नहीं, बल्कि यहाँ से शुरू होती है।… पद्य और गद्य की रचनाओं की अन्तर्वस्तु जीवन-जगत की जिन छवियों को प्रस्तुत करती है, शिक्षण के दौरान अगर विद्यार्थी को उनकी ठीक से प्रतीति कराई जा सके तो वह पढ़ी जा रही रचनाओं के सार को ग्रहण करते हुए व्यापक जीवन-जगत को जानने-समझने की दिशा में सक्रिय हो जाता है।

भाषा और साहित्य-शिक्षण की सही पद्धति क्या है, आइए इसे एक-दो उदाहरणों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं।

उत्तराखण्ड के विद्यालयों में पढ़ाई जा रही कक्षा-11 की हिन्दी पाठ्य- पुस्तक ‘आरोह’ में प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय का एक संस्मरण संकलित किया गया है- ‘अपू के साथ ढाई साल’।… अब इसे पढ़ाने की परम्परागत जड़ पद्धति यह है कि इस पाठ का वाचन कर दिया जाए और इसमें प्रयुक्त कठिन शब्दों के शब्दार्थ समझाते हुए प्रश्नोत्तर तैयार करवा दिए जाएँ। और बस इसके साथ ही पाठ समाप्त। अधिकांश शिक्षक आमतौर पर यही पद्धति अपनाते हैं।… यदि इसी पाठ को पढ़ाने की सही पद्धति अपनाई जाए तो उसका तरीका इससे भिन्न होगा। वह तरीका यह होगा कि इस संस्मरण के वाचन, कठिन शब्दों व प्रसंगों के अर्थ और उनकी व्याख्या तथा अभ्यासार्थ प्रश्नोत्तरों से गुजरने  के पश्चात प्रसिद्ध बांग्ला कथाकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘ पथेर पांचाली’ पर आधारित इसी नाम की सत्यजित राय की उस फिल्म को देखने-दिखाने की व्यवस्था करनी होगी, जिसकी निर्माण-प्रक्रिया का जिक्र इस संस्मरण में किया गया है। साथ ही, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के विस्तृत जीवन-वृत्तांत और उनके उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ को भी पढ़ना होगा। इतना ही नहीं, उपन्यास में बंगाल के ग्रामीण जीवन  का जैसा चित्रण किया गया है, वह ग्रामीण जीवन आज किस स्थिति में है इसे जानने के लिए भी खोजबीन करनी होगी।… तो इस प्रकार तय किया जाता है, रचना से जीवन तक का सफर… और ऐसा कर पाना ही सही और सार्थक शिक्षण- पद्धति का मूल उद्देश्य होता है।

अब जमीनी हकीकत को देखें।….. हो यह रहा है कि विद्यालयों में अन्य पाठों के साथ-साथ यह संस्मरण लगातार ‘पढ़ाया’ जा रहा है और विद्यार्थी हर वर्ष परीक्षा में इससे सम्बन्धित निश्चित प्रश्नोत्तरों के सुनिश्चित उत्तर लिखकर अच्छे अंक प्राप्त करते चले जा रहे हैं, लेकिन विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ को पढ़ने या इस पर आधारित सत्यजित राय की फिल्म देखने और उस पर चर्चा करने के सम्बन्ध में सोचने की फुर्सत किसे है ? …. शायद अपवादस्वरूप कुछ ही ऐसे विद्यालय होंगे, जहाँ के पुस्तकालयों में ‘पथेर पांचाली’ उपन्यास का हिन्दी अनुवाद उपलब्ध होगा ताकि विद्यार्थी अवकाश के दिनों में उसे पढ़ सकें या उसे उलट-पुलट कर देखने के बाद भविष्य में कभी पढ़ने का मन बना सकें।

इसी प्रकार कक्षा-11 की ही पाठ्य-पुस्तक में संकलित दुष्यन्त कुमार की गज़ल ‘साये में धूप’ को पढ़ाते हुए यदि विद्यार्थियों में ‘कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए/ कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’ इस शेर में व्यक्त वस्तुस्थिति के कारणों और उसके समाधान की उत्सुकता उत्पन्न न की जा सके तो वह पढ़ाना निरर्थक है।

यह एक कटु सच्चाई है कि हमारी मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी भाषाओं और उनके साहित्य की जिस ढंग से पढ़ाई करवाई जा रही है और उसके बाद शिक्षक बनने के लिए जिस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसे पूरा करके जो विद्यालयों में भाषा-शिक्षक बनकर पढ़ा रहे हैं उनमें से अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर अधिकांश को भाषा और साहित्य के महत्व व मर्म की बुनियादी समझ ही नहीं होती। यही कारण है कि वे न तो स्वयं साहित्य की श्रेष्ठ प्राचीन एवं अर्वाचीन कृतियाँ पढ़ते हैं और न अपने विद्यार्थियों को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर पाते हैं। ऐसे शिक्षकों से पढ़े हुए विद्यार्थी अपने बाद के जीवन में साहित्य ही नहीं पुस्तक मात्र से दूर रहें तो यह आश्चर्य ही बात नहीं।

यहाँ भाषा-शिक्षण से ही सम्बन्धित ‘उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ के एक अवैज्ञानिक और निहायत मूर्खतापूर्ण निर्णय का जिक्र करना भी जरूरी लगता है। …

‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (एनसीईआरटी) द्वारा हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिएट में हिन्दी के अन्तर्गत हिन्दी की दो-दो पाठ्य-पुस्तकें निर्धारित की गई हैं। लेकिन ‘उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ के निर्देशानुसार इन कक्षाओं में हिन्दी के अन्तर्गत एक-एक संस्कृत पाठ्य-पुस्तक अतिरिक्त रूप से पढ़ाई जा रही है। अब पाठ्य- पुस्तक निर्धारक विद्वानों को कैसे समझाया जाए कि हिन्दी के अन्तर्गत संस्कृत पढ़ाने का कोई औचित्य या लाभ नहीं है, क्योंकि ये दोनों सर्वथा अलग-अलग भाषाएँ हैं। अतः दोनों भाषाओं को पृथक-पृथक पढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन अजीबोगरीब स्थिति यह है कि उत्तराखण्ड के विद्यार्थी हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की कक्षाओं में हिन्दी विषय के अन्तर्गत संस्कृत की पुस्तक भी पढ़ने के लिए मजबूर हैं।

निष्कर्षतः भाषा और साहित्य-शिक्षण की सही पद्धति लागू करने के लिए सर्वप्रथम तो उसकी अवधारणात्मक समझ होना बेहद जरूरी है और फिर भाषा और साहित्य-शिक्षण की समुचित विधि को सीखना आवश्यक है। इनके अलावा जिस एक और साधन की अपरिहार्य आवश्यकता होती है वह है एक समृद्ध पुस्तकालय।… चिन्ताजनक बात यह है कि हमारे स्कूल-कॉलेज इन तीनों ही चीजों से वंचित हैं। नतीजा हमारे सामने है- भाषा और साहित्य की बुनियादी समझ और उनकी महान उपलब्धियों को आत्मसात कर सकने की क्षमता से रहित शिक्षक और विद्यार्थी।

इस भयावह जड़तापूर्ण वातावरण के बीच स्कूल-कॉलेजों में जो थोड़े जागरूक शिक्षक मौजूद हैं, उनके सामने यह चुनौती है कि वे इस स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्नशील हों।