Archive for: July 2014

61, अशोक भौमिक: वीरेन डंगवाल  

चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क

चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क

हमारे प्रि‍य चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क का आज 61वां जन्‍मदि‍न है। इस अवसर पर वरि‍ष्‍ठ कवि‍ वीरेन डंगवाल द्वारा लि‍खी गई कवि‍ता-  

तो हजरत !

इस जवान जोश के बावजूद

आप भी हो चुके 61 के

और कल ही तो नीलाभ प्रकाशन की उस दुछत्‍ती पर

आपके साथ हम भी रचते थे कभी-कभी

अपनी वो वि‍चि‍त्र नृत्‍य नाटि‍कायें

जैसे एक वि‍लक्षण नशे में डूबे हुए,

या आपका वो

 

एक जुनून में डूबकर कवि‍ता पोस्‍टर बनाना

सस्‍ते रंगों और कागज से

खाते हुए बगल के कॉफी हाउस से मंगाये

बड़ा-सांभर, नींबू की चाय के साथ

अभी तक बसी हुई है नाक और आत्‍मा की

वे सुगंधें प्रेम और परि‍वर्तन की चाहत से

लबालब और गर्मजोश।

हिन्दी प्रांतर में तो वह एक नयी सांस्‍कृतिक शुरुआत हो रही थी तब

 

क्‍या उम्‍दा इत्‍तेफाक है

कि‍ इकत्‍तीस जुलाई प्रेमचन्द का

भी जन्‍मदि‍न है, आपसे बार-बार

कहा भी गया होगा

 

आप भी तो रचते हैं

अपने चि‍त्रों और लेखों में

भारतीय जीवन की वे दारुण कथायें

जो पि‍छले कुछ दशकों में

गोया और भी अभि‍शापग्रस्‍त हो गई हैं

बीते इन तीसेक बरसों में

बहुत कुछ बदला है

देश-दुनि‍या में

हमारे इर्द-गि‍र्द और आप-हम में भी।

 

वे ति‍लि‍स्‍मी जि‍न्‍नात-यातुधान-जादूगर

और खतरनाक बौने आपके चि‍त्रों के

स्‍याह ज्‍यामि‍तीय रेखाओं

और कस्‍बों की तंग गलि‍यों से नि‍कलकर

महानगरों-राजधानि‍यों तक नि‍र्बाध आवाजाही कर रहे हैं

अपने मनहूस रंगों को फड़फड़ाते हुए।

 

अब खुद बाल बच्‍चेदार हो रहे हैं

हमारे बेटे-बेटि‍यां जो तब बस

खड़े होना सीखे ही थे,

और आप भी तो अपने टाई-सूट और

बैग को छोड़कर

पूरी तरह कुर्ता-पाजामा की

कलाकार पोशाक पर आ गये हैं।

 

हां, कुछ अब भी नहीं बदला है

मसलन शब्‍दों और भाषा के ि‍लए

आपका पैशन, लोहे के कवच पहना आपका नाजुक भाव जगत

गुस्‍सा, जो कि‍सी मक्‍खी की तरह

आपकी नाक पर कभी भी आ बैठता है

और थोड़ा सा खब्‍तीपन भी जनाब,

आपकी अन्‍यथा मोहब्‍बत से चमकती

आंखों और हंसी में।

मगर वह सब काफी उम्‍दा है, कभी-कभी जरूरी भी

और इन दि‍नों

हथौड़ा-छेनी लेकर कैनवास पर आप

गढ़ रहे हैं एक पथराई दुनि‍या की तस्‍वीरें

जि‍न्‍हें देखकर मन एक साथ

शोक-क्रोध-आशा और प्रतीक्षा से

भर उठता है।

ये कैसी अजीब दुनि‍या है

पत्‍थर के बच्‍चे, पत्‍थर की पतली डोर से

पत्‍थर की पतंगें उड़ा रहे हैं

गली-मोहल्‍लों की अपनी छतों पर

जो जाहि‍र है सबकी सब

पत्‍थरों से बनी हैं।

यो वे परि‍न्‍दे

जो पथराई हुई आंखों से देखते हैं

पथरीले बादलों से भरे आकाश जैसा कुछ

अपने पत्‍थर के डैनो को बमुश्‍कि‍ल फड़फड़ाते

मगर आमादा फि‍र भी

परवाज़ के लि‍ये।

 

हमें आपकी छेनी के लि‍ए खुशी है अशोक,

हमें खुशी है कि‍ आप

महान चि‍त्रकार नहीं हैं

हालांकि‍ बाज़ार आपकी अवहेलना भी नहीं कर सकता

अपने भरपूर अनोखे और सुवि‍चारि‍त कृति‍त्‍व से

ख़ुद के लि‍ए वह जगह बनाई है आपने, और अपनी मेहनत से,

हमें खुशी है कि‍ हमारे समय में आप हैं

हमारे साथ और सम्‍मुख

जन्‍मदि‍न मुबारक हो !

भारतीय भाषाएं और प्रशासनिक सेवा : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

हिन्‍दी सहित भारतीय भाषाओं में पढ़नेवाले और अपनी भाषा के बूते देश की सर्वोच्‍च नौकरी प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, विदेश सेवा और केन्‍द्रीय सेवाओं में जाने वाले नौजवानों के लिए एक अच्‍छी खबर दिल्‍ली के गलियारों में गूंज रही है । खबर यह कि 2011 में सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण (सी सेट) में जो अंग्रेजी लाद दी गई थी, और जिसकी व‍जह से भारतीय भाषाओं के बूते चुने जाने वालों की संख्‍या 15-20 प्रतिशत से घटकर 2-3 प्रतिशत तक आ गई थी, सरकार ने उस पर पुनर्विचार करने का मन बना लिया है । यों भारतीय भाषाओं के लिए यह कोई नयी बात नहीं है, लेकिन जब सरकार इतनी संवेदनशून्‍य हो जाए और पिछले तीन वर्ष के दुष्परिणामों को जानने-समझने के बावजूद  अंग्रेजी की पक्षधर बनी रहे, तब नयी सरकार के इस कदम का स्‍वागत किया जाना चाहिए । सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग को पु‍नर्विचार कराने के लिए कहा है और इसके लिए यदि प्रारंभिक परीक्षा की तिथि‍ 20 अगस्‍त से आगे बढ़ानी भी पड़े तो उसके लिए कदम उठाए जाएं।

डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अनुशंसाओं के अनुरूप वर्ष 1979 से सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में उत्‍तर देने की छूट दी गई थी । तभी से वर्ष 2010 तक यह परीक्षा आयोजित होती रही । लेकिन वर्ष 2011 में परीक्षा के पहले चरण में बदलाव किया गया, जिसके परिणामस्‍वरूप जहाँ हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं से प्रारंभिक परीक्षा पास करने वालों की संख्‍या लगभग छह हजार होती थी, वह घटकर 2011 में दो हजार रह गई । अगले दो वर्षों यानी 2012 और 2013 में यह संख्‍या और भी कम हो गई । यहां तक कि हाल ही में घोषित 2014 के परिणाम बताते हैं कि हिन्‍दी माध्‍यम सहित भारतीय भाषाओं में पास होने वालों की संख्‍या घटकर दो से तीन प्रतिशत ही रह गई है यानी कुल 11 सौ से अधिक चुने हुए उम्‍मीदवारों में भारतीय भाषाओं के मात्र 26 बच्‍चे ही पास हुए हैं ।

यों पटना, केरल, मद्रास में भी इसके खिलाफ सुगबुगाहट चल रही थी, लेकिन पिछले दिनों दिल्‍ली में जगह-जगह सी-सेट के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हुए । सिर्फ प्रदर्शन तक ही बात सीमित नहीं रही, पिछले 2-3 वर्षों में कई संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया । एक जनहित याचिका दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय WP(C)  651/2012 अभी भी विचाराधीन है । माननीय उच्‍च न्‍यायालय ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद एक समिति का गठन करने का आदेश दिया । कार्मिक मंत्रालय ने न्‍यायालय के आदेशों का पालन करते हुए मार्च 2014 में एक तीन सदस्‍यीय समिति का गठन भी कर दिया, जिसे एक महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपनी थी । जनहित याचिकाकर्ताओं ने संघ लोकसेवा आयोग और कार्मिक मंत्रालय से यह भी अनुरोध किया कि इस समिति में उन भारतीय भाषाओं के विद्वानों को भी शामिल किया जाए, जो अपनी भाषा का पक्ष रख सकें । जैसा कि अक्‍सर ऐसे मामलों में होता है, समिति की सिफारिशें तो न जाने कब आएंगी और फिर पता नहीं कब न्‍यायालय अंतिम निर्णय तक पहुंचे, लेकिन तब तक तो अपनी भाषाओं में पढ़ने वालों के सपने सूख चुके होंगे । इसी आक्रोश में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के पास कुछ छात्र आमरण अनशन पर भी बैठे ।

संक्षेप में पहले इस विवाद की पृष्‍ठभूमि को जानना बहुत जरूरी है । कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुरूप पहली बार देश की सभी प्रशासनिक सेवाओं आई.ए.एस., विदेश सेवा, रेलवे, रक्षा सभी के लिए एक कॉमन परीक्षा की शुरूआत हुई थी, वर्ष 1979 में । उससे पहले पिछले तीस वर्षों 1947 से 1978 तक उम्र, विषय, साक्षात्‍कार और अलग-अलग सेवा के लिए अलग-अलग प्रणालियां थीं ।कोठारी समिति ने ग्रामीण गरीब बच्‍चों को ध्‍यान में रखते हुए उम्र बढ़ाकार अट्ठाईस वर्ष की । देशभर में परीक्षा के केन्‍द्र बढ़ाए। लेकिन सबसे क्रांतिकारी बात थी आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के माध्‍यम से परीक्षा देने की छूट । उन्‍होंने अंग्रेजी को बाहर नहीं किया था, बस भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के बराबर रखा था । सच्‍चे मायनों में यह था प्रशासन के एक बहुत छोटे से हिस्‍से में लोकतंत्र का प्रवेश । गरीबों का अपनी भाषाओं के बल पर प्रवेश । इसके परिणाम भी बहुत अच्‍छे निकले ।

इसका प्रमाण है- इस परीक्षा के मूल्‍यांकन के लिए समय-समय पर बैठाई गई विभिन्‍न समितियां और उनकी विस्‍तृत रिपोर्ट । इस परीक्षा की पहली मूल्‍यांकन समिति के चेयरमैन थे प्रोफेसर सतीश चन्‍द्र । जाने-माने इतिहासकार और यू.जी.सी. के भूतपूर्व चेयरमैन। समिति ने अपनी रिपोर्ट 1990 में दी । भारतीय लोकतंत्र और नौकरशाही के लिए बड़े सुखद सत्‍य सामने आए । जैसे :-

1. आजादी के बाद पहली बार पहली पीढ़ी के पढ़े हुए नौजवान सीधे इतनी ऊंची प्रशासनिक सेवाओं में शामिल हुए ।

2. पहली बार दलित, आदिवासी पचास प्रतिशत से अधिक अपनी भाषाओं के माध्‍यम से इन सेवाओं में आये ।

3. अनुसूचित जाति के 55 प्रतिशत, जनजाति के 48 प्रतिशत और सामान्‍य उम्‍मीदवारों के 20 प्रतिशत निम्‍न आय वर्ग के थे।

4. समिति ने विशेष रूप से यह बात रेखांकित की कि भारतीय भाषाओं में उत्‍तर देने की पद्धति ठीक है और किसी भाषायी वर्ग के पक्ष में पक्षपात नहीं है ।

संवाद और अभिव्‍यक्ति की जरूरतों के हिसाब से दो सौ नंबर के निबंध का पेपर वर्ष 1993 में जोड़ा गया और कुछ मामूली फेरबदल विषयों के साथ भी किया गया ।

ठीक दस वर्ष बाद वर्ष 2000 में प्रोफेसर योगेन्‍द्र कुमार अलघ की अध्‍यक्षता में फिर एक समिति बनी । इस समिति ने भी सतीश चन्‍द्र समिति की तरह ही भारतीय भाषाओं से चुने अ‍भ्‍यर्थियों को लोकतंत्र का एक सुखद समावेषी पक्ष माना और इसे जारी रखने की सिफारिश की । अलघ समिति को इसके अलावा इस पक्ष पर विचार करने के लिए भी कहा गया था कि कैसे सही विभाग के लिए सही अभ्‍यर्थी उनकी अभिरुचिओं, क्षमताओं के अनुसार चुने जाएं । क्‍या विभागों का बंटवारा उनके प्रशिक्षण के दौरान सामने आई प्रवृत्तियों, अभिव्‍यक्तियों के अनुसार हो ? प्रोफेसर अलघ ने अपनी सिफारिशें वर्ष 2002 में दी थीं ।

2011 में प्रारंभिक परीक्षाओं में बदलाव प्रोफेसर एस.के. खन्‍ना भूतपूर्व वाईस चेयरमैन यू.जी.सी. की सिफारिशों के आधार पर किया गया । उनकी सिफारिशों में अंग्रेजी कैसे हावी हो गई और क्‍यों ? इस पर अभी  भी परदा पड़ा हुआ है । जब डॉक्‍टर कोठारी, सतीश चंद्र, प्रोफेसर अलघ अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं की बराबरी पर बल देते हैं, तो 2011 के पहले चरण में अंग्रेजी क्‍यों ? अफसोस की बात कि सरकार सिर्फ पहले चरण की अंग्रेजी पर ही नहीं रुकी । आपको याद होगा कि 2013 के शुरू में तो संघ लोकसेवा आयोग ने मुख्‍य परीक्षा में भी ऐसे परिवर्तन किये थे, जो कोठारी समिति की सिफारिशों के एकदम उलट थे और भारतीय भाषाओं के पूरी तरह खिलाफ । यह तो अच्‍छा हुआ कि मुख्‍य परीक्षा में परिवर्तन के खिलाफ महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु समेत पूरे देश से आवाज उठी, संसद में भी हंगामा हुआ और मुख्‍य परीक्षा में भारतीय भाषाओं के खिलाफ जो सिफारिशें थीं, वे सरकार को वापिस लेनी पड़ीं । लेकिन प्रारंभिक परीक्षा (सी सैट) में भारतीय भाषाओं के प्रति भेदभाव अभी भी बरकरार है ।

कई बार तो आश्‍चर्य होता है कि अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाले ऐसे कदमों से भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं या उसे कमजोर । संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली दर्जनों परीक्षाओं में सिर्फ प्रशासनिक सेवाओं में अपनी भाषाओं में लिखने की छूट मिली हुई है, लेकिन अंग्रेजीदां अमीरों की आंखों में वह भी किरकिरी बनी हुई है । क्‍या अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले नौजवानों का यह हक नहीं है कि वे प्रथम श्रेणी की नौकरियों जैसे- वन, इंजीनियरिंग, डॉक्‍टरी, सांख्‍ययिकी सेवाओं में अपनी भाषाओं के बूते चुने जाएं ? संघ लोकसेवा आयोग की देखा देखी कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में भी अंग्रेजी उतनी ही हावी है । इन सबका असर पूरे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था पर हो रहा है । जब सरकार की प्रतिष्‍ठि‍त नौकरियों में अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले प्रतिभावान बच्‍चों को नौकरी नहीं मिलेगी तो अपनी भाषाओं में पढ़ेंगे ही क्‍यों ? यही कारण है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी व्‍यवस्‍था मजबूत हो रही है । नयी सरकार आ चुकी है और उसका मुख्यिा भी जन संघर्ष से निकला वह नेता है, जो अपनी भाषा के बूते सत्‍ता में आया है । उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इस विवाद के बहाने न केवल संघ लोकसेवा आयोग, बल्कि केन्‍द्र और राज्‍य बैंक, बीमा, न्‍यायालय में भर्ती करने करने वाली सभी परीक्षाओं के लिए कोठारी समिति की तरह कोई आयोग बने और तुरंत ऐसी व्‍यवस्‍था कायम हो जिससे कि नौजवान सिर्फ अंग्रेजी न जानने के कारण इन नौकरियों से वंचित न हों । नयी सरकार के लिये यह चुनौती भी है और लोकतांत्रिक अवसर भी ।

सलाम ज़ोहरा सहगल

ज़ोहरा सहगल

ज़ोहरा सहगल

नई दि‍ल्‍ली : जोहरा सहगल नहीं रहीं। बीती 10 जुलाई को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। सबकी मौत का एक दिन मुअय्यन है, पर जाने क्यों, उन्हें देख लगता था कि वे हमेशा रहेंगी। उनकी जीवंत, गतिशील और आवेगमय छवि उनके चाहने वालों की आँखों में हमेशा बनी रहेगी।

ज़ोहरा बरतानवी हुकूमत के दौर में 1912 में सहारनपुर में रोहिल्ला पठानों के खानदान में पैदा हुईं। क्वींस कॉलेज लाहौर में शिक्षा पाई। ढर्रे पर चलना उनकी तबीयत को गवारा न था, सो कुछ अलग करने की सोची। मामा सईदुज्जफर खान स्कॉटलैंड में थे। उन्होने ज़ोहरा को नाटक सीखने को बुला लिया। उस जमाने में ज़ोहरा कार से लाहौर से फिलिस्तीन होते हुए मिस्र तक गई। यूरोप पहुँच कर उन्होंने आधुनिक नृत्य का अध्ययन किया। यहीं प्रख्यात नृत्य गुरु उदयशंकर से उनकी मुलाक़ात हुई, बाद में जिनके साथ ज़ोहरा ने काम किया।

उदयशंकर के साथ लंबे समय तक काम करने के दौरान ज़ोहरा, कामेश्वर सहगल से मिलीं। दोनों ने मिलकर नृत्य में जबर्दस्त काम किया। विभाजन के दौरान दोनों बंबई आ गए और ज़ोहरा की जिंदगी का नया दौर शुरू हुआ।

ज़ोहरा ने 1945 में नाटक की दुनिया में कदम रखा और उनका जुड़ाव प्रगतिशील कला-समूहों, पृथ्वी थियेटर और इप्टा से हुआ। इप्टा की फिल्म-प्रस्तुतियों, ‘धरती के लाल’ (ख्वाजा अहमद अब्बास) और ‘नीचा नगर’ (चेतन आनंद) में उन्होंने काम किया। इब्राहिम अलकाजी के नाटक ‘धरती के अंधेरे’ में उन्होंने काम किया। बीच-बीच में वे फिल्मों में नृत्य-निर्देशन भी करती रहीं।

59 में पति की मृत्यु के बाद वे दिल्ली की नाट्य अकादमी की निदेशक बनाई गईं। 62 में अध्ययन के लिए लंदन गईं और वहाँ कई धारावाहिकों और फिल्मों में काम किया। भारत लौटकर उनके व्यक्तित्त्व का एक और पहलू उभरा- उन्होने कई जगह विभिन्न कवियों के काव्य-पाठ की प्रस्तुति दी। फ़ैज़ उनके पसंदीदा शायरों में से एक थे। बाद के दिनों में हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा में उन्हें कई तरह के अभिनय करने का मौका मिला, ‘दिल से’ से लेकर ‘साँवरिया’ तक बीसियों फिल्मों में उन्होने काम किया और अपनी अभिनय प्रतिभा को स्थापित किया। आखिरी दिनों में वे दिल्ली में रह रही थीं। सरकार उन्हें निचले तले का मकान भी उपलब्ध नहीं करा पाई जिसके लिए वे बार-बार दरख्वास्त करती रहीं।

कम ही लोगों को पता होगा कि महिला आंदोलन से उनकी एकजुटता थी। एक बार उन्होंने ‘अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन’ के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता भी की थी। मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब ने ज़ोहरा सहगल को याद करते हुए कहा कि ‘वह अपनी शर्तों पर जीने वाली महिला थीं।’ वे एक ऐसी महिला थीं, जिन्होंने अपने लिए जिंदगी चुनी, दुनिया से भिड़ते हुए अपना खुद का रास्ता बनाया। शायद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ऐसा ही कुछ देखा-महसूस किया होगा, जब उन्होने ज़ोहरा को ‘भारत की इजाडोरा डंकन’ कहा था।

ज़ोहरा सहगल नहीं रहीं, पर रूढ़ियों से भिड़ते हुए आधुनिक रास्ते पर चलने की उनकी जीवन-कथा हमेशा रहेगी। चिरयुवा ज़ोहरा सहगल अपने आखिरी दिनों में भी वैसी ही रहीं- जीवन से आवेग से दमकती हुईं!
जन संस्कृति मंच उन्हें आखिरी सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

प्रख्यात अम्बेडकरवादी आलोचक तेज सिंह को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली : हिंदी के प्रख्यात आलोचक और अंबेडकरवादी साहित्य के मूर्धन्य प्रवक्ता तथा ‘अपेक्षा’ त्रैमासिक पत्रिका के संपादक तेज सिंह का 15 जुलाई 2014 को शाम लगभग 3 बजे हृदय गति रुक जाने के कारण नि‍धन हो गया। तेज सिंह का जन्म दिल्ली के घोंडली में 13 जुलाई 1946 में हुआ था। उन्होने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया। उनकी कृतियों में नागार्जुन का कथा-साहित्य (1993,  आलोचना),  राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास (2000,  आलोचना),  आज का दलित साहित्य (2000,  आलोचना),  उत्तरशती की हिन्दी कहानी (2006, आलोचना), दलित समाज और संस्कृति (2007), अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र(2009, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा (2010,  आलोचना),  अम्बेडकरवादी साहित्य ही क्यों? (2011), डॉ. अम्बेडकर और धम्म-दीक्षा (2011), अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध (2011),  प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति(2011),  अम्बेडकरवादी विचारधारा : इतिहास और दर्शन (2012) आदि ने अस्मिता विमर्श के पृथकतावादी और शुद्धतावादी भावधारा के विपरीत दलित आंदोलन को एक नया और गतिमान वैज्ञानिक आवेग दिया। कृतियों के शीर्षक ही अपने आप में इस बात की ताईद करते हैं कि उनकी गति समाजशास्त्रीय आलोचना के साथ-साथ साहित्य के विचारधारात्मक और दार्शनिक पक्ष तक अपना विस्तार पाती थी। उन्होंने आज का समय (2002, दलित कवियों की कविताओं का संकलन),  उग्र की ज़ब्तशुदा कहानियाँ (2004), सबद बिबेकी कबीर (2004), अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज (2009),  प्रेमचंद की रंगभूमि : एक विवाद- एक संवाद (2008),  अम्बेडकरवादी कहानी:रचना और सृष्टि (2009), अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन (2010) आदि पुस्तकों का संपादन भी किया। वे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे।

हिंदी के दलित विमर्श मे चली तमाम बहसों मे सीधे शामिल होकर और उनको गति देकर उन्होंने समाज को एक प्रगतिशील मानवीय दिशा मे सोचने को प्रेरित किया। अस्मितावाद के खतरों को भाँपते हुए ही दलित साहित्य को उन्होंने अंबेडकरवादी साहित्य के बतौर प्रस्तावित किया था। तेज सिंह ऐसे लेखक थे, जिनका संघर्ष भारतीय समाज के तथाकथित उच्च जातियों मे व्याप्त ब्राह्मणवाद से तो था ही, साथ ही दलित जातियों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारों और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी वे लगातार संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने कथा आलोचना को अंबेडकरवादी दृष्टि से समृद्ध कर अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

समाज में व्याप्त जातिवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और लैंगिक पूर्वाग्रह के खिलाफ संघर्ष का हमारा संकल्प ही हमारे प्रिय आलोचक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। तेज सिंह को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी)  

मधुकर सिंह को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : प्रगतिशील जनवादी धारा के मशहूर कथाकार मधुकर सिंह 15 जुलाई को अपराह्न पौने चार बजे हमारे बीच नहीं रहे। आरा जिले के धरहरा गाँव स्थित अपने निवासस्थान पर उन्होंने अंतिम साँसें लीं। विगत पांच-छह वर्षों से मधुकर सिंह अस्वस्थ थे, उन पर पैरालाइसिस का आघात हुआ था। लेकिन अस्वस्थता की स्थिति में भी उन्होंने आखिरी सांस तक लेखन कार्य जारी रखा। सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक बदलाव के लिए संघर्षरत लोगों के लिए वे हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे।

मधुकर सिंह फणीश्वरनाथ रेणु के बाद हिंदी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से थे, जिन्होंने आजीवन न केवल ग्रामीण समाज को केंद्र बनाकर लिखा, बल्कि वहां चल रहे राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के संघर्षों को भी शिद्दत के साथ दर्ज किया। उन्होंने भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन को स्वाधीनता आंदोलन की निरंतरता में देखा और अपनी रचनाओं में इसे चिह्नित किया कि जब 1947 के बाद भी सामाजिक विषमता और उत्पीड़न खत्म नहीं हुआ और शासकवर्ग का दमनकारी चरित्र नहीं बदला, तो फिर से आजादी की एक नई लड़ाई भोजपुर में शुरू हुई। नक्सलबाड़ी विद्रोह ने उसे आवेग प्रदान किया। मधुकर सिंह के साहित्य का बहुलांश भोजपुर के मेहनतकश किसानों, खेत मजदूरों, भूमिहीनों, मेहनतकश औरतों और गरीब, दलित-वंचितों के क्रांतिकारी आंदोलन की आंच से रचा गया। सामंती-वर्णवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति के लिहाज से मधुकर सिंह की रचनाएं बेहद महत्व रखती हैं। स्त्री की मुक्ति के सवाल को मधुकर सिंह ने दलित मुक्ति से अभिन्न रूप से जोड़कर देखा। दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों की सामाजिक मुक्ति का संघर्ष इनके कथा साहित्य में जमीन के आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ रहा है। सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर मौजूद मेहनतकशों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-समन्वय के किसी रास्ते से संभव नहीं है, मधुकर सिंह की कहानियां बार-बार इस समझ को सामने लाती हैं।

मधुकर सिंह

मधुकर सिंह

2 जनवरी 1934 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर में जन्मे मधुकर सिंह ने जीवन के आठ दशक का ज्यादातर समय बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से सटे अपने गांव धरहरा में गुजारा। सोनभद्र की राधा, सबसे बड़ा छल, सीताराम नमस्कार, जंगली सुअर, मनबोध बाबू, उत्तरगाथा, बदनाम, बेमतलब जिंदगियां, अग्‍नि‍ देवी, धर्मपुर की बहू, अर्जुन जिंदा है, सहदेव राम का इस्तीफा, मेरे गांव के लोग, कथा कहो कुंती माई, समकाल, बाजत अनहद ढोल, बेनीमाधो तिवारी की पतोह, जगदीश कभी नहीं मरते समेत उन्नीस उपन्यास और पूरा सन्नाटा, भाई का जख्म, अगनु कापड़, पहला पाठ, असाढ़ का पहला दिन, हरिजन सेवक, पहली मुक्ति, माइकल जैक्सन की टोपी, पाठशाला समेत उनके ग्यारह कहानी संग्रह और प्रतिनिधि कहानियों के कुछ संग्रह भी प्रकाशित हैं। लाखो, सुबह के लिए, बाबू जी का पासबुक, कुतुब बाजार आदि उनके चर्चित नाटक हैं। ‘रुक जा बदरा’ नामक उनका एक गीत संग्रह भी प्रकाशित है। उनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन भी हुए हैं। वे जन नाट्य संस्था युवानीति के संस्थापकों में से थे। मधुकर सिंह ने कुछ कहानी संकलनों का संपादन भी किया। बच्चों के लिए भी दर्जनों उपन्यास और कहानियां उन्होंने लिखी। उनकी रचनाओं के तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, उडि़या, बांग्ला, चीनी, जापानी, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद हो चुके हैं। उन्होंने ‘इस बार’ पत्रिका के अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। हमेशा प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े रहे कथाकार मधुकर सिंह जन संस्कृति मंच की स्थापना के समय से ही इसके साथ थे। उन्होंने जसम के राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारिणी के सदस्य बतौर अपनी जिम्मेवारियां निभाईं और लंबे समय तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, फणीश्वरनाथ रेण पुरस्कार, कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार समेत उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले। पिछले ही साल आरा में उन्हें जन संस्कृति सम्मान से सम्मानित किया गया था और उनके साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन किया गया था।

जन संस्कृति मंच जनता के संघर्षों के हमसफर, साथी और अपने अत्यंत प्रिय लेखक मधुकर सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

(जसम के केन्द्रीय कार्यकारिणी की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

निरीक्षण में सामान्य ज्ञान के प्रश्‍न ही क्यों : रमेश चंद्र जोशी

shekshik dakhal

शि‍क्षा के विकास में माता-पिता, परिवार, आसपास का वातावरण, विद्यालय, शि‍क्षक, समाज सभी का योगदान होता है। यह अलग बात है कि शि‍क्षक सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। उसी के हाथ में बच्चों का भविष्‍य होता है, वह जैसा चाहे उन्हें वैसा बना सकता है। किसी भी चीज के अनुकूलन के लिए उसका परिवेश भी अनुकूल होना चाहिए। विद्यालय को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए और उसकी देखभाल के लिए अधिकारी नियुक्‍त होते हैं, जो समय-समय पर विद्यालयों का अनुश्रवण करते हैं। उनका यह भी दायित्व होता है कि विद्यालय के सामने आने वाली सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान करें ताकि शि‍क्षण कार्य प्रभावशाली तरीके से संचालित किया जा सके। विद्यालय की कमियों को फोकस करते हुए उन्हें दूर करवाना भी उनका कार्य है। विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण किस प्रकार का है, बच्चे विद्यालय में कैसा महसूस करते हैं, कक्षा-कक्ष प्रक्रिया बच्चों के अनुकूल है या नहीं, छात्रों की रुचियों का ध्यान रखा जा रहा है या नहीं, विद्यालय में बच्चे बोझिल वातावरण तो महसूस नहीं कर रहे हैं आदि बातों को गहराई से जानना भी उनका कार्य है। अर्थात बच्चे के मनोविज्ञान की परख तथा अध्यापकों की मनःस्थिति दोनों का ज्ञान होना निरीक्षण के लिए अनिवार्य है।

आज शैक्षिक गुणवत्ता को बढ़ाने में क्या निरीक्षण सहायक हो रहे हैं? यह प्रश्‍न बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। विद्यालयों का अवलोकन इसीलिए किया जाना चाहिए कि इससे शि‍क्षा की गुणवत्ता में वृद्धि हो, विद्यालयों को और अधिक समर्थन मिले, विद्यालयों की समस्याओं का त्वरित समाधान हो और पठन-पाठन के लिए उपयुक्‍त वातावरण का निर्माण हो सके। परन्तु व्यवहार में ऐसा कम ही देखने को मिलता है। सब कुछ आनन-फानन में सम्पादित किया जाता है। हम लोग कागजी आँकड़ों में अधिक विश्‍वास करते हैं, अभिलेखीकरण से ही कार्य का आँकलन करते हैं, शैक्षिक सम्प्राप्ति से अधिक महत्व कायदे-कानूनों को देते हैं।

विद्यालय का निरीक्षण कार्य कोई भौतिक कार्य का निरीक्षण करना नहीं है कि इतने समय में इतना कार्य हुआ कि नहीं। इसमें तो बच्चों की सम्प्राप्ति के स्तर को आँकना है। इसके लिए कोई भौतिक उपकरण भी नहीं हैं कि आसानी से मापा जा सके। इसके उपकरण तो विद्यालय का परिवेश है, वहाँ के बच्चे हैं, वहाँ के संसाधन हैं। औपचारिकता मात्र से निरीक्षण प्रभावी नहीं हो सकता है, भय पैदा करने से बच्चों की गुणवत्ता नहीं बढ़ने वाली। आवश्‍यकता इस बात की है कि विद्यालयों को अनुसमर्थन दिया जाए, उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए, शि‍क्षा और शि‍क्षण पर विस्तृत बातचीत की जाए, शैक्षिक मुद्दों पर शि‍क्षकों तथा बच्चों के साथ चर्चा-परिचर्चा की जाए, बच्चों से उनकी अभिरुचियों, आवश्‍यकताओं तथा पसन्द की बात की जाए। निरीक्षण का आश्‍य विद्यालय में जाकर पंजिकाओं का अवलोकन करना मात्र नहीं है, किसी छात्र से सामान्य ज्ञान के एक-दो प्रश्‍न पूछना भी निरीक्षण नहीं है, बल्कि निरीक्षण में वे सब बातें सम्मिलित हैं जिनसे छात्र-छात्राओं में वे अपेक्षित परिवर्तन हों, जिन्हें उनमें होना चाहिए।

किसी बच्चे से किसी वि‍षय में दो-चार प्रश्‍न पूछ लेने से उसका आँकलन नहीं किया जा सकता है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि कोई भी व्यक्‍ति‍ एकदम से किसी नए परिवेश में समायोजन नहीं कर सकता। यह बात बच्चों के लिए भी लागू होती है। जब सम्बन्धित शि‍क्षक से इतर कोई नया व्यक्‍ति‍ अचानक से कक्षा में प्रवेश करता है तो स्वाभाविक है, उस कक्षा-कक्ष का वातावरण बदल जाता है। भौतिक वातावरण परिवर्तित होने से मानसिक स्थिति भी बदलती है। ऐसे में इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता कि बच्चे स्वयं को असहज महसूस करते होंगे। ऐसे में अचानक उनसे कोई प्रश्‍न पूछने पर हो सकता है कि जानते हुए भी बच्चा उसका उत्तर नहीं दे पाए। यह स्थिति बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। एक तरफ जहाँ उसे अफसोस होता है कि जानते हुए भी वह इसका उत्तर नहीं दे पाया, दूसरी ओर इससे शि‍क्षक भी बच्चे के प्रति नाराजगी जाहिर करते हैं।

बच्चा अपने परिवेश से अधिक जुड़ा रहता है, उसे वह चीज ज्यादा अपनी लगती है जो उसके करीब होती है, उसके सम्बन्ध में बातचीत करना उसे अच्छा लगता है। उसके घर-परिवार से सम्बन्धित बातें, उसके आसपास विद्यमान वस्तुओं के बारे में यदि वार्तालाप किया जाए तो हम बच्चों को अपने करीब पाते हैं और इसी वातावरण में हम थोड़ा बहुत उसका आँकलन कर सकते हैं। इसी वातावरण का प्रभाव है कि बच्चा जितनी बातें अपने घर में बिना संकोच के स्वाभाविक रूप से करता है, उतनी बातें विद्यालय में नहीं करता। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि हम बच्चों के जितने करीब जाते हैं, उनके बारे में उतना ही अधिक जान सकते हैं। उनके अन्दर की झिझक दूर करने के लिए उनके व्यक्‍ति‍गत जीवन के बारे में बातें करके उन्हें विश्‍वास में लाना पहले जरूरी है। अवसरों की पर्याप्त उपलब्धता न होने से या किसी अन्य कारण से बच्चों के अन्दर कई जानकारियाँ सिमट कर रह जाती हैं, वे चाहते हुए भी बाहर नहीं निकल पातीं।

यद्यपि यह बात अपने आप में सही है कि अधिकारियों के पास इतना समय नहीं कि वे बच्चे के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकें, पर बच्चों के समीप जितना भी वे समय निकालें, बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए उनका परीक्षण करें। अभिलेखों, फाइलों के निरीक्षण की अपेक्षा विद्यालय के शैक्षिक वातावरण को बनाने हेतु अधिक प्रयास करें। मूर्त रूप से बच्चा ज्यादा सीखता है, वह अपने ग्राम प्रधान के बारे हो सकता है बहुत कुछ जानता हो, पर प्रधानमंत्री के बारे में नहीं जानता हो और हम जबरदस्ती उसे प्रधानमंत्री के बारे में ही पूछते हैं और उसे इस रूप में जलील करते हैं कि इसे तो प्रधानमंत्री का नाम तक नहीं पता। यदि बच्चे को प्रधानमंत्री का नाम नहीं पता तो इसका यह मतलब नहीं निकाला जाने चाहिए कि इसे कुछ नहीं आता या इसी प्रकार के दो-चार प्रश्‍नों से उसके बारे में धारणा बना लेना उचित नहीं है। इस प्रकार अमूर्त बस्तुओं के बारे में पूछकर हम कक्षा के वातावरण को न केवल बोझिल बनाते हैं, अपितु शि‍क्षा को भी बच्चे के लिए कठिन बना रहे होते हैं, बच्चे के मस्तिष्‍क में परोक्ष रूप से यह धारणा बना रहे होते हैं कि शि‍क्षा प्राप्त करना तो बहुत ही कठिन कार्य है। ये बातें शि‍क्षक तथा अधिकारी दोनों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं कि वे शि‍क्षा को सहज रूप से बच्चे को प्रदान करें और बच्चे को स्वाभाविक रूप से विकसित होने के अवसर प्रदान करें।

शि‍क्षक द्वारा बच्चों को अपेक्षानुरूप कार्य कराया जा रहा है, बच्चों को अभिव्यक्‍ति‍ के पर्याप्त अवसर दिये जाते हैं, बच्चों में रचनात्मकता का विकास हो रहा है, शि‍क्षण के अतिरिक्‍त बच्चों में बहुआयामी व्यक्तित्व विकसित हो रहा है आदि की जानकारी के लिए बच्चों को समझना अधिक जरूरी है। यह आवश्‍यक नहीं कि अभिलेख अच्छे हैं तो बच्चों का शैक्षिक स्तर भी अनुकूल होगा। साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि शि‍क्षा का तात्पर्य केवल जानकारी होने से नहीं है। जरूरी नहीं कि किसी वि‍षय में सभी बच्चे एक-सी योग्यता रखते हों, अपनी-अपनी रुचि के अनुसार बच्चों में अलग-अलग विषय में अलग-अलग योग्यता हो सकती है।

और एक बात यह कि डंडा लेकर हाँकने की परम्परा का पूर्णतः परित्याग करना चाहिए। शि‍क्षा एक संवेदनशील मुद्दा है जिसे डंडे के बल पर सुधारा नहीं जा सकता। इसके लिए शि‍क्षक के अन्दर जहाँ छात्र को जानने और समझने की शक्‍ति‍ होनी चाहिए, वहीं छात्र में विद्यमान गुणों को परिष्‍कृत करते हुए उनमें निखार लाने की स्वाभाविक क्षमता होनी चाहिए और यदि किसी में यह नहीं है तो अधिकारी को इसकी पहचान करते हुए उसे इस लायक बनाने हेतु पहल करनी होगी ताकि शि‍क्षा में जिस गुणवत्ता को हम सभी सुबह-शाम बस रटते रहते हैं, उसे अमलीजामा पहनाया जा सके।

(‘शैक्षि‍क दखल’, जुलाई 2014 से साभार)