Archive for: June 2014

कलाकार का दायित्व है कला को लोगों तक ले जाना : अशोक भौमिक

AshokBhaumik_exhibition

कोलकाता : मूसलाधार बारिश के बीच कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी कैंपस के विवेकानंद हॉल के बाहर बरामदे  में मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक के 23 चित्रों की प्रदर्शनी और फिर दुपहर में ‘भारतीय चित्रकला में प्रगतिशील प्रवर्तियों’ पर उनका व्याख्यान हुआ।

मौका था आपातकाल को आज के समय में याद करने का। आपातकाल के दौरान अशोक भौमिक उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ शहर में थे। उन्ही दिनों वे मशहूर हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ को भी समझ रहे थे। मुक्तिबोध की  ‘अँधेरे में’  और  अन्य कविताओं के प्रभाव में बनाये गए इन चित्रों में पिकासो के गुएर्निका और गया के चित्रों जैसा प्रभाव दिखता है। प्रदर्शनी में सम्मिलित सभी बारह चित्र 1980 के दशक में बनाये गए हैं।

प्रदर्शनी का आयोजन प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के कोलकाता चैप्टर और जन संस्कृति मंच के कला समूह ‘जन कला समूह’ ने संयुक्त रूप से किया। प्रदर्शनी के उद्घाटन के पूर्व अशोक भौमिक का परिचय देते हुए प्रतिरोध का सिनेमा के कोलकाता चैप्टर की संयोजक कस्तूरी ने कहा कि अशोक जी कला और राजनीति के बीच सम्बन्ध बनाने वाले आज के समय के विरले कलाकार हैं। प्रदर्शनी का उद्घाटन गण संस्कृति परिषद से जुड़े गीतकार, गायक और संगीतकार नितीश राय ने कि‍या। उन्‍होंने अशोक जी द्वारा प्रगतिशील भारतीय चित्रकारों की पहचान और उनको आम लोगों तक पहुंचाने के महत्वपूर्ण प्रयास की भूरि सराहना की और हिंदी के साहित्य समाज में उनके योगदान को कोलकाता के चित्रकार खालिद चौधरी सरीखा बताया। इस मौके पर दिल्ली से प्रदर्शनी में शामिल प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने प्रगतिशील छात्र संघ (अब आइसा) के साथ इलाहाबाद में अशोक भौमिक द्वारा रोपे गए सांस्कृतिक राजनैतिक माहौल के महत्व  को रेखांकित किया और हिंदी प्रदेश में उनके द्वारा  शुरू किये गए कविता पोस्टर आंदोलन  और नई तरह की कैलीग्राफी के जनक का श्रेय भी दिया। इस मौके पर अशोक जी ने उपस्थित दर्शकों को अपने प्रत्येक चित्र के संदर्भों के बारे में विस्तार से परिचित भी करवाया।

आज के दिन का दूसरा ख़ास आयोजन था अशोक भौमिक द्वारा भारतीय चित्रकला में प्रगतिशील तत्वों की पहचान पर बहुत ही तैयारी के साथ आम लोगों को चित्रकला की बारीकियों और राजनीति से परिचित करना। अपनी बात को समझने के लिए उन्होंने पूरे व्याख्यान को कई उपशीर्षकों और विश्व चित्रकला के नमूनों की स्लाइड द्वारा समझाने की कोशिश की। इस क्रम में उन्होंने एक ख़ास बात कही कि “आज चित्रकारों का दायित्व है कि आम जन तक चित्रकला को ले जाएं।”

भारतीय चित्रकला में प्रगतिशील तत्वों की खोज तक पहुचने से पहले उन्होंने विस्तार से कई खंड में अपनी बात रखी। पहले खंड को उन्होंने शीर्षक दिया ‘अपने जड़ की तलाश करती आधुनिक भारतीय चित्रकला’। इसमें उन्होंने निष्कर्ष दिया कि तथाकथित आधुनिक चित्रकला की  शुरुआत और ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिण्टल आर्ट’ के गठन को साथ-साथ रखकर देखना होगा। इस दौर के विभिन्न चित्रकारों यथा अवीन्द्रनाथ ठाकुर, असित हालदार, नन्दलाल बोस, राजा रवि वर्मा, हेमेन्द्र मजूमदार के विभिन्न चित्रों के द्वारा उन्होंने प्रमाणित किया कि हमारी शुरुआती चित्रकला नारी शरीर, राजा-रानी और  धर्म की खोज तक सीमित थी। इस सन्दर्भ में नन्दलाल बोस के चित्र ‘सती’ के संदर्भ में सिस्टर निवेदिता का यह कहना कि “भारतीय नारी का आदर्श सती होना है” भारतीय चित्रकला के शुरुआती विकास पर सटीक टिप्पणी है।

थोड़ा विषयांतर करते हुए दर्शकों को एक चित्र के कालजयी बनने के कारणों की मीमांसा करते हुए उन्होंने विश्व चित्रकला के खजाने से गोया का चित्र ‘फेसिंग द फायरिंग स्क्वाड : द  थर्ड ऑफ़ मे 1808’, पिकासो के 1951 के चित्र ‘मेस्सेकर इन कोरिया’ की  चर्चा की।

इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ‘ विपरीत समय में कला’ खंड में अमरीकी चित्रकार जॉन सिंगर सार्जेंट द्वारा ब्रिटेन के लिए बनाये चित्र ‘गैस्सड’ की  चर्चा करते हुए बताया कि कैसे जर्मनी द्वारा युद्ध के समय गैस के बेजा इस्तेमाल पर बनाया गया चित्र आज एक बड़े युद्धविरोधी चित्र के रूप में हमारे पास रह जाता है। इसी कर्म में उन्होंने जॉर्ज क्लाउसन के चित्र ‘ youth mourning ‘ और  पिकासो के गुएर्निका की चर्चा की। अशोक भौमिक के लिए 1936 आते-आते पिकासो द्वारा गुएर्निका रचते हुए अपने फॉर्म को तोड़कर नए फॉर्म का सृजन करना बहुत महत्वपूर्ण है।

इन सन्दर्भों के बाद वे ‘भारतीय चित्रकला के नए अवतार पर’ विस्तार से बोले।  इस खंड को उन्होंने भारतीय चित्रकला का नया चेहरा कहा। अशोक जी के लिए आजादी के बाद दिल्ली का नए कला बाजार के रूप में बदलना एक महत्वपूर्ण घटना है। उनके अनुमान के अनुसार ऐसा संभवतया विभिन्न देशों के दूतावासों के कारण भारतीय चित्रकला की खरीद के कारण पनपे नए बाजार की वजह से संभव हुआ। इस दौर में पुराना पी ए जी भी बदला। उनके अनुसार इस तथाकथित पीपुल्स आर्ट ग्रुप ने एक तरफ तो पिकासो की अंधाधुंध अनुकृति तैयार की, दूसरे तंत्र कला का विकास किया।

सूजा के चित्रो का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पिकासो की  तरह फॉर्म को भंजित करने का कोई कारण सूजा के पास न था, इसलिए उनके चित्रों का वो महत्व भी नहीं  है।

भारतीय चित्रकला के नए अवतार को उन्होंने जी आर संतोष, रज़ा और  सोहन क़ादरी के कई एक जैसे चित्रों द्वारा प्रमाणित किया कि कैसे वे तंत्र के बल निरंतर दुहराव रच रहे थे और नए विषयों और लोगों से एकदम दूर थे।

अपने व्याख्यान में मेट्रो आर्ट खंड के जरिये उन्होंने चित्रकला के बहाने हो रहे बेतुके संस्थापनों पर तीखी टिप्पणी की। विशेषतौर पर सुबोध गुप्ता के काम के जरिये उन्होंने समझाने के कोशिश की कैसे कला बाजार के नियमों से संचालित हो रही है, जब कला भाव सम्प्रेषित करने की बजाय चमक और विशालता के खेल में फंस गयी। इसलिए अब सुबोध गुप्ता बोतल के शक्ल में Absolute Vodka रच रहे हैं, 1 किलो सोने का बटखरा बनाकर उसे कला का दर्जा दे रहे हैं और ठुकराल और टागरा गोल्ड फ्लेक रच रहे हैं। उन्होंने बहुत अफ़सोस के साथ यह स्वीकारा कि चित्रकला में जितनी बड़ी संख्या में मूर्खों का वास है, उतना कहीं नहीं। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से आप चित्रकला को खरीद सकते हैं, हालांकि आप आज भी कविता और गद्य को नही खरीद सकते।

अपने व्याख्यान के आखिरी खंड को अशोक भौमिक ने अकाल की कला’ पर केंद्रित किया।  इस खंड के जरिये वे दर्शकों को भारतीय चित्रकला के सच्चे प्रगतिशील तत्वों तक ले जा सके। इस खंड में उन्होंने ज़ैनुल आबेदीन की  अकाल श्रृंखला, सुधीर खास्तीगर के वुड कट, रामकिंकर, गोबर्धन आश और अतुल बसु के दुर्भिक्ष के चित्रों के साथ-साथ कमरुल हसन, गोपेन राय, सोमनाथ होड़, देबब्रत मुखोपाध्याय के कामों से परिचित करवाया। उनके लिए चित्तप्रसाद सही मायनो में भारतीय चित्रकार थे, जो बंगाल के अकाल से शुरू करके, तेभागा कृषक आंदोलन, बिरसा मुंडा, कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के दुर्भिक्ष के साथ-साथ कश्मीर की लड़ाकू जनता तक के चित्र बना रहे थे। 1931 में रवीन्द्रनाथ द्वारा आम आदमी को चित्रकला में जगह देने का सिलसिला के के हेब्बार, बी प्रभा, एन एस बेंद्रे से चलता हुआ सादेकैन और कमरुल हसन तक जाता है।

अशोक जी  के अनुसार इसी चेतना की  वजह से विभाजन के बाद ढाका जाने पर ज़ैनुल आबेदीन शासकों की परवाह न करते हुए भी मूर्ति शिल्प की शिक्षा और लड़कियों के लिए कला की शिक्षा को अपने द्वारा स्थापित आर्ट कालेज में शुरू कर सके और समय आने पर याह्या खां जैसे शक्तिशाली शासक के खिलाफ ‘ऐसे जानवरों की हत्या करनी होगी’ वाला उद्घोष करता पोस्टर बना सके।

अशोक जी के व्याख्यान के बाद दर्शकों ने सवाल पूछे। कई दर्शकों ने यह सहज प्रश्न  किया कि जिन प्रगतिशील कला के सच्चे वारिसों की पहचान अशोक भौमिक कमरुल हसन तक कर पाते हैं, क्या उसकी निरंतरता आज के मेट्रो आर्ट के जमाने में भी वे खोज पा  रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि निश्चय ही मेरे संपर्क में तमाम नए युवा चित्रकार हैं, जो अपनी चित्रकला को माल बनने में बदलने से रोक सके हैं और उसपर एक नयी चर्चा जल्द ही वे पेश करेंगे। इस मौके दर्शकों द्वारा कलाकार का जन प्रिय होना और मेट्रो आर्ट सम्बन्धी कई जिज्ञासाओं का भी अशोक जी ने विस्तार से जवाब दिया। व्याख्यान का संचालन प्रतिरोध का सिनेमा की कोलकाता चैप्टर की संयोजक कस्तूरी ने किया।       ,

प्रस्तुति : संजय जोशी

परिवर्तन जरूरी हैं मगर… : एम. पुनेठा

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आजादी के बाद के भारतीय शिक्षा दर्शन को व्यवहार में उतारने में भले ही कितनी ही कमियां रही हों या अभी वह केवल सद्इच्छा मात्र रहा हो, लेकिन उसके सैद्धान्तिक पक्ष के बारे में यह मानना ही पड़ेगा कि वह हमेशा धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, आधुनिक मूल्यों की पक्षधर रहा है। शिक्षा संबंधी दस्तावजों तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में हमेशा एक ऐसे भारत का निर्माण करने का संकल्प व्यक्त किया गया, जो बहुलतावादी समाज का सम्मान करे। इस बात पर जोर दिया गया कि शिक्षा को उन मूल्यों को प्रसारित करने में सक्षम होना चाहिए, जो शांति, मानवता और सांस्कृतिक-विविधता वाले समाज में सहिष्णुता पोषित करे। देश की विविधता की उपेक्षा न करते हुए शिक्षा को राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाए। सामाजिक न्याय और समानता के मूल्यों पर आधारित समाज बनाकर बच्चों को समावेशी स्कूली माहौल उपलब्ध कराए। दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों-महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता पैदा करे। बच्चे के भीतर धर्माधंता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व क्षमता विकसित करे। ऐसा मानस तैयार किया जाए जो हर पुराने को इसलिए न नकारे कि वह पुराना है और हर नए को इसलिए न स्वीकारे कि वह नया है, बल्कि उसका निष्पक्ष रूप से विश्लेषण करे। सभी बच्चों में सभी के प्रति चाहे वे किसी भी धर्म के हों, समान आदरभाव पोषित करे।

आजाद भारत के शिक्षा दर्शन के उक्त मूल्य क्यों नहीं प्राप्त किए जा सके, यह लंबी बहस का विषय है। इसके पीछे अनेक किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आज देश का राजनीतिक परिदृश्य बदलने के बाद एक दूसरा बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा हुआ है कि सैद्धांतिक रूप में ही सही क्या उक्त मूल्य आगे भी हमारे शिक्षा दर्शन के आधार बने रहेंगे? नई सरकार जिस राजनीतिक-सांस्कृतिक दर्शन से प्रेरणा ग्रहण करती है, क्या वहाँ इन आदर्शों के लिए कोई स्थान है?
नई सरकार बनते ही आर.एस.एस. से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और शिक्षा बचाओ आंदोलन जैसे संगठन जिस तरह सक्रिय हुए हैं और शिक्षा में बड़े परिवर्तन की बात करने लगे हैं, वह अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा है। ये वहीं संगठन हैं जो तर्क के ऊपर आस्था को रखते हैं। तार्किकता और विवेकशीलता पर इनका कोई विश्वास नहीं है। इनके लिए संस्कृति और धर्म में कोई अंतर नहीं है तथा संस्कृति एक रूढ़ि है। धार्मिक पुस्तकों को ये इतिहास की पुस्तकों की जगह रखते हैं। उनमें लिखी हर बात को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करते हैं। इनके लिए सूचनाओं का पुलिंदा ही ज्ञान है। ये संगठन ‘भावनाओं को चोट पहुँचाने’ के नाम पर किसी भी सत्य को प्रकट करने से रोकने की बात करते हैं। इसके लिए वे कानूनी और गैर-कानूनी किसी भी तरह के उपाय अपनाने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। तोड़-फोड़, आगजनी, मारपीट से इन्हें कोई परहेज नहीं है। स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाना इन्हें बिल्कुल सहन नहीं होता है, जबकि प्रश्न ही हैं जो हमें नए सत्य तक पहुँचाते हैं। असहमति के लिए इनके यहाँ कोई जगह नहीं है। इसके पीछे उनका उद्देश्य एक खास तरह का समाज निर्मित करना रहा है, जिसमें एक खास धर्म-संस्कृति का वर्चस्व स्थापित हो। इन संगठनों की समझदारी में बहुत सारे अंतर्विरोध भी दिखाई देते हैं। एक ओर वे इस बात का सुझाव देते हैं कि चुनाव आयोग की तर्ज पर शिक्षा आयोग जैसी संस्था बनाई जाये, जो प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की देखभाल करे और जिस पर वित्त उपलब्ध कराने के अलावा सरकार का कोई हस्तक्षेप न हो। दूसरी ओर नई सरकार ने ठीक से अपना कामकाज भी नहीं संभाला कि‍ ये शिक्षा में संपूर्ण परिवर्तन की उतावली दिखाने लगे हैं। यदि वे शिक्षा के लिए स्वायत्त संस्था की जरूरत महसूस करते हैं तो फिर यह उतावली क्यों? फिर यह भी विचार करने की बात है कि क्या शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय को किसी ऐसी संस्था को सौंपा जा सकता है, जो जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं है? क्या शिक्षा कोई गैर-राजनीतिक सवाल है जिस पर देश की सर्वोच्च संस्था में बहस किए बिना कोई नीति बनाई जानी चाहिए?
शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन होने चाहिए यह जरूरी है। इससे भला कौन इंकार कर सकता है। पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक में समय के अनुसार परिवर्तन करने अनिवार्य होते हैं । समाज में आ रहे परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में इनमें परिवर्तन करना जरूरी भी है, ताकि समय के साथ कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ा जा सके। इसी उद्देश्य से हर पाँच वर्ष बाद राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में पुनरावलोकन की बात भी स्वीकार की गई है। लेकिन जब परिवर्तन शिक्षा को एक खास रंग में ढालने के लिए किए जाए तो चिंता होनी स्वाभाविक है।
पर इस बात का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए कि कोई भी परिवर्तन भारतीय समाज के बहुलतावादी स्वरूप को नष्ट करने वाला नहीं होना चाहिए। इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि भारत एक बहुभाषी, बहुधर्मी, बहुसंस्कृति वाला देश है और उसका यह स्वरूप नष्ट नहीं होनी चाहिए। भारत की संस्कृति सामासिक है। इसे बनाए रखना देश के हित में है। इसमें बाहरी-भीतरी दोनों प्रभाव हैं जो एक राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण करते हैं। देश के किसी भी धार्मिक-जातीय-भाषायी समूह को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उनके सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है तथा उन पर एक खास तरीके की संस्कृति थोपी जा रही है, क्योंकि यह उनके भीतर असुरक्षा भाव पैदा करता है। इतिहास को इतिहास की तरीके से ही लिखा जाना चाहिए, तथ्यों के साथ छेड़छाड़ या मनमानी व्याख्या करना खतरनाक है। राजनीतिक गोलबंदी के लिए इतिहास को अपने मनमाफिक गढ़ना सही प्रवृत्ति नहीं है। यह समझना जरूरी है कि धार्मिक ग्रंथ इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं, लेकिन इतिहास नहीं हो सकते हैं। इतिहास में ऐसे तथ्यों को तूल नहीं दिया जाना चाहिए जो देश की एकता-अखंडता को कमजोर करते हों। अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करते हों। जीवन के विविध क्षेत्रों में भारत के योगदान को अवश्य रेखांकित किया जाना चाहिए, पर झूठे महिमामंडन से बचना चाहिए। पाश्चात्य का अंधानुकरण बिल्कुल नहीं होना चाहिए और आधुनिकता का आधार भारतीयता होनी चाहिए, पर पाश्चात्य ज्ञान और विचार का नकार भी अच्छी बात नहीं है। अतीत से ताकत ग्रहण की जाये, लेकिन उससे चिपका न जाये। ऐसी बातों से जिससे अपने देश का गौरव बड़े भला उससे किसे आपत्ति हो सकती है पर झूठी शान में जीना भी कोई समझदारी नहीं है। धर्म और आध्यात्म के नाम पर अंधविश्वास और कर्मकांडों को पाठ्यपुस्तकों में जगह न दी जाये। भारतीय परम्परा और सामाजिक चेतना को व्यापकता में लिया जाये। भारतीयता हिंदुत्व का पर्याय न बन जाये। परिवर्तन समाज की बेहतरी के लिए हो न कि राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति के लिए। मनुष्य और मनुष्य के बीच प्रेम, आपसी सहयोग और सौहार्द में वृद्धि उसके केंद्र में हो।समावेशिता भारतीय शिक्षा दर्शन की विशेषता है जिसे बनाए रखा जाना चाहिए। यदि इन बातों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा में परिवर्तन किए जाते हैं तो उसका सभी स्वागत करेंगे।

चुनाव और भाषा : प्रेमपाल शर्मा

 

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

लोकतंत्र का उत्‍सव यानी कि हाल ही में संपन्‍न हुए 2014 के चुनाव । जब दुनिया की सबसे बड़ी करोड़ों की आबादी की भागेदारी होगी तो उसकी व्‍याख्‍याएं भी अनगिनत होंगी। इन चुनावों में अपनी भाषा यानी हिन्‍दी का करिश्‍मा भी देखने लायक था। पहले से ही प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित और अंतत: सफल हुए नरेन्‍द्र मोदी की सफलता का सेहरा क्‍या इनके व्‍यक्तित्‍व और भाषण कला को नहीं जाता? और यह भाषण देश के कोने-कोने में उन्‍होंने किस भाषा में दिया ? हिन्‍दी-हिन्‍दुस्‍तानी में। वे केरल के तट पर हों या कभी घोर हिन्‍दी विरोधी रहे तमिलनाडू में। बंगाल, आसाम से लेकर पंजाब तक वही हिन्‍दी रही। हिन्‍दी भाषी राज्‍यों में तो हिन्‍दी में बोलना ही था। भारतीय जनता पार्टी का नेता चुने जाने के बाद हिन्‍दी भाषा की वही चमक उनके संसद के केन्‍द्रीय कक्ष के भाषण में भी झलक रही थी। चाहे कृपा शब्‍द के भावार्थ बताने हों या दर्जनों मुहावरे ‘सोने पर सुहागा’ का इस्‍तेमाल जिस सहजता से किया, देश का प्रधानमंत्री बनाने की भूमिका में इस देश की भाषा ने उनका पूरा साथ दिया। इस अनुभव से शिक्षा और भाषा नीति में सबक लेने की जरूरत है। अगर आप जनता से जुड़े हैं, उनके सरोकारों से जुड़े हैं, उनके दु:ख दर्द को समझते हैं तो उसकी सर्वश्रेष्‍ठ अभिव्‍यक्ति उन्‍हीं की भाषा में हो सकती है। और अंग्रेजी न बोलने पर कैसा अपराधबोध ? अंग्रेजी के दर्जनों चैनलों के अंग्रेजीदॉं पत्रकारों को खुद बात करने के लिए हिन्‍दी में उतरना पड़ा । इससे इन चैनलों की टीआरपी बढ़ी ही होगी कम नहीं हुई।

और यह हाल ही के दिनों में पहली बार नहीं हुआ। पिछले दिनों दिल्‍ली के चुनावों के वक्‍त एक नयी पार्टी ‘आप’ के नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और योगेन्‍द्र यादव की भी सर्वश्रेष्‍ठ चमक एक अच्‍छी हिन्‍दुस्‍तानी भाषा में अपनी बात कहना था। आपको याद होगा अरविंद केजरीवाल का लहजा कि जी ‘मेरी क्‍या औकात है’ या ऐसी ही दूसरी सहजता से कही हुई बातें। उतने ही आत्‍मविश्‍वास से। अंग्रेजी के तथाकथित पत्रकार प्रश्‍न अंग्रेजी में करते थे लेकिन थोड़ी ही देर में हिन्‍दी में जवाब मिलने पर खुद हिन्‍दी में उतर आते थे। आप पार्टी का तो संकल्‍प पत्र ही हिन्‍दी में बना और योगेन्‍द्र यादव ने उपस्थित अंग्रेजी के मशहूर पत्रकारों को बताया कि अंग्रेजी अनुवाद में समय लगेगा। जनता की जिन समस्‍याओं को हम एक शिद्दत से समझते हैं और उनके समाधान की तलाश करते हैं उसके लिए अपनी भाषा से ज्‍यादा सहज और प्रभावी दूसरी भाषा कैसे हो सकती है?  तमिलनाडू में यही तमिल का जलवा डीएमके के मुखिया करुणानिधि का है और यही बंगाल में ममता बनर्जी के बंगला में बोलने का। इनमें से किसी को अच्‍छी अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन इनकी अपनी भाषा की ताकत ने इनको जन नेता बनाया है। बिल्‍कुल यही बात उत्‍तरप्रदेश और बिहार के नेता मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू यादव, नीतिश कुमार पर भी लागू होती है। वक्‍त आ गया है कि अब ये सभी नेता अंग्रेजी बोलने की कोशिश भी नहीं करें, क्‍योंकि उस कोशिश से एक गलत संदेश जाता है । आप सबने अखबारों में पढ़ा होगा कि तमिलनाडू के एक और केन्‍द्रीय मंत्री रहे अलागिरि सिर्फ तमिल जानते हैं। यहां प्रश्‍न भाषा के मामले में किसी अडि़यल और कडि़यल रवैया का नहीं, इस बात को रेखांकित करना है कि जनता की भाषा को अगर आप नजर अंदाज करेंगे तो उसके परिणम अच्‍छे नहीं होंगे ।

आपको याद होगा पिछली सरकार के एक वरिष्‍ठ नेता की अपनी ही पार्टी के एक और महत्‍वपूर्ण नेता के बारे में टिप्‍पणी कि‍ यह अंग्रेजी उनकी लिखी हुई नहीं हो सकती क्‍योंकि वे दिल्‍ली के रामजस कॉ‍लेज में पढ़े हैं और रामजस में पढ़ने वालों को अंग्रेजी नहीं आती । वह यह बताना चाहते थे कि वे दिल्‍ली के सैंट स्‍टीफन के पढ़े हुए हैं इसलिए मेरे जैसा तीसमारखॉं कोई नहीं । इस चुनाव ने इन सभी तीसमारखाओं को पानी पिला दिया । कम से कम भाषा के मसले पर ।

नये प्रधानमंत्री की ताकत उनकी भाषा सामर्थ्‍य से और सौ गुना बढ़ गई है। यह भी सच है कि यह भाषा उन्‍होंने अपने जीवन के कई रास्‍तों से गुजरते हुए सीखी है । आपको पता ही है कि इस देश की ज्‍यादातर जनता हिन्‍दी बोलती, समझती है तो निश्चित रूप से एक गुजराती होने के बावजूद इस देश को समझने के लिए उनके भाषायी औजार अपने प्रतिद्वंदियों से कई गुना बेहतर और प्रभावी हैं। दोहराने की जरूरत नहीं देश की जनता की इसी भाषा की ताकत से मोहनदास जैसा व्‍यक्ति आगे चलकर महात्‍मा गांधी बना । उन्‍होंने इंग्‍लैंड में पढ़ाई के बावजूद 1909 में ‘हिन्‍द स्‍वराज’ गुजराती में लिखी थी और अपनी आत्‍मकथा ‘सत्‍य के प्रयोग’ भी । अंग्रेजी उन्‍होंने उतनी ही सीखी जिसे सिर्फ काम चलाऊ कहा जा सकता है, लेकि‍न देश पर जो जादू चला वह उनकी हिन्‍दुस्‍तानी में बोली हुई बातों का ।

उम्‍मीद की जानी चाहिए कि नयी सत्‍ता में भारतीय भाषाएं इसी सहजता से अपना स्थान या अपना हक पाएंगी ।