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बाऊचर प्रणाली के खतरे : महेश चंद्र पुनेठा

महेश चंद्र पुनेठा

महेश चंद्र पुनेठा

आज निजी विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाना ‘स्टैटस सिंबल’ बन चुका है। हर एक अभिभावक की कोशि‍श है कि अपने पाल्य को अपने पड़ोसी व नाते-रिश्तेदार और परिचित के बच्चे से बेहतर पब्लिक स्कूल में भेजे या कम-से-कम उस स्कूल में तो भेजे ही जहाँ पड़ोसी का बच्चा पढ़ रहा है। एक होड़-सी मची हुई है। अपनी आर्थिक हैसियत से भी बढ़कर पब्लिक स्कूल खोजे जा रहे हैं। प्रवेश पाने के लिए जुगाड़ लगाया जा रहा है। ऊँची से ऊँची कैपीटिशन फीस देने से पीछे नहीं हट रहे हैं, जबकि कैपिटेशन फीस को आर.टी.ई. के तहत अवैध घोषित कर दिया गया है। पड़ोस का सरकारी स्कूल भले ही कितनी भी अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान कर रहा हो कोई भी अपने बच्चे को वहाँ नहीं भेजना चाहता है। सरकारी स्कूलों में अब केवल वही बच्चे जा रहे हैं जिनके पास पब्लिक स्कूल के रूप में कोई विकल्प नहीं है या जिनके अभिभावकों की वहाँ भेजने की हैसियत नहीं है। लेकिन शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत निजी विद्यालयों के लिए अपनी कुल छात्र संख्या के कम-से-कम पच्चीस प्रतिशत गरीब तबके के बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रवेश देने के प्रावधान के बाद अब इस तबके के बच्चों के लिए भी निजी विद्यालयों के दरवाजे खुल गए हैं। इसके तहत गरीब तबके के उन बच्चों को एक वाऊचर दिया जाएगा जो निजी विद्यालयों में प्रवेश लेंगे। बाऊचर उतनी ही धनराशि का होगा, जितना आज की तिथि में सरकार सरकारी स्कूलों में एक वर्ष में एक बच्चे के ऊपर खर्च कर रही है। ऐसी स्थिति में सरकारी स्कूलों में छात्र नामांकन की दर गिरना स्वाभाविक है।

बाजारवाद, अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते प्रभाव और सरकारी शिक्षा की बदहाली के चलते जहाँ पहले ही सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती जा रही थी, वहाँ निजी विद्यालयों में पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों के आरक्षण ने खुजली में खाज का काम किया है। इससे प्रतिवर्ष बच्चों की नामांकन दर तेजी से गिरने लगी है। कम छात्र संख्या के चलते अनेक स्कूल बंद होने लगे हैं। यही स्थिति रही तो आगामी नौ-दस वर्षों में सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। केवल वहीं सरकारी विद्यालय दिखेंगे जहाँ निजी विद्यालयों की  पहुँच नहीं है। अब नए सरकारी स्कूल खोलने के स्थान पर सरकार द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं को स्कूल खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। निजी विद्यालयों को संचालित करना अब आसान भी हो जाएगा। इसके दो कारण हैं- पहला, दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के न रहने से निजी विद्यालयों को छात्र असानी से मिल जाएंगे और दूसरा, इन पच्चीस प्रतिशत बच्चों के नाम पर मिलने वाली सरकारी धनराशि से वे अपने आधारभूत खर्चे आसानी से निकाल लेंगे। अन्य पिचहत्तर प्रतिशत बच्चों से शुल्क के रूप में मिलने वाली राशि उनका विशुद्ध लाभ होगा। साथ ही पच्चीस प्रतिशत बच्चों के लिए सरकार की ओर से छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन, ड्रेस, पाठ्य पुस्तक आदि के लिए मिलने वाली धनराशि में से कमीशनखोरी अलग होगी।

गरीब-वंचित वर्ग के बच्चों को बाऊचर देकर निजी विद्यालयों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना एक तरह से सरकार द्वारा खुद यह स्वीकार कर लेना है कि निजी विद्यालयों की गुणवत्ता सरकारी विद्यालयों से बेहतर है। कैसी विडंबना है कि जिस सरकार को सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करते हुए समान शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए था जिसके लिए संसद में भी एकाधिक बार संकल्प पारित किया जा चुका है, वही शिक्षा के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह शिक्षा पर वैश्‍वीकरण का प्रभाव है। यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है। लोककल़्याणकारी सरकारें सार्वजनिक शिक्षा से अपना पल्ला झाड़ना चाहती हैं। इसलिए विदेशों में हुए इस तरह के प्रावधानों की असफलता से भी कोई सबक नहीं ले रही हैं। वह दिन दूर नहीं जब सार्वजनिक शिक्षा भारत में नाममात्र के लिए रह जाएगी। जैसा कि शहरी क्षेत्रों में दिखाई भी देने लगा है।

कुछ लोगों को प्रथम दृष्ट्या यह कदम सरकारी शिक्षा की गिरती गुणवत्ता का समाधान और जनहितकारी लग सकता है। यह भी लग सकता है कि सरकार गरीब बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहती है। जैसा कि बहुत सारे गैर-सरकारी संगठन और निजीकरण-उदारीकरण के समर्थक प्रचारित-प्रसारित भी कर रहे हैं, लेकिन यह तात्कालिक प्रत्यक्षीकरण और सतही समझदारी है। उस दिन की कल्पना की जाय जिस दिन सरकारी विद्यालय पूरी तरह बंद हो जाएंगे तब पच्चीस प्रतिशत से अधिक गरीब बच्चों का क्या होगा? अत्यधिक गरीब बच्चों को तो निजी विद्यालयों में प्रवेश मिल जाएगा, औसत गरीब बच्चों का क्या होगा? तब क्या उन्हें महंगी शिक्षा को खरीदने के लिए विवश या स्कूलों से बाहर नहीं होना पड़ेगा? क्या तब निजी विद्यालयों की मनमानी और अधिक नहीं बढ़ जाएगी? निजी विद्यालयों की मनमानी से जब आज साधन संपन्न तबका भी त्रस्त है तो इन गरीब लोगों की क्या बिसात? इस स्थिति का सबसे अधिक खामियाजा आदिवासी, अनुसूचित जाति-जनजाति तथा अल्पसंख्यक वर्ग के उन बच्चों को भुगतना पड़ेगा जिनके अभिभावकों में आज भी शिक्षा के प्रति गहरी उदासीनता दिखाई देती है। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में सबसे अधिक संख्या इन जाति तथा वर्ग के बच्चों की ही है।

एक और आशंका जिस के कुछ-कुछ लक्षण दिखने लगे है- इस बात की क्या गारंटी है कि निजी विद्यालयों में इन पच्चीस प्रतिशत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पाएगी? जो विद्यालय इन्हें प्रवेश देने पर ही नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं, तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं और गरीब बच्चों को लेकर अनेक आग्रहों-पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। यह मानते हैं कि गरीब-वंचित दबके बच्चों के आने से उनके स्कूलों का शैक्षिक माहौल खराब हो जाएगा। क्या आशा की जा सकती है कि इन बच्चों के साथ वहाँ अनुकूल व्यवहार किया जाएगा? अभी तक के अनुभवों से पता चला है कि इन गरीब बच्चों की ओर कक्षा में कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। इनकी एक अलग कैटेगरी बना दी गई है। इससे बच्चे न केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हो रहे हैं, बल्कि एक नए तरह के भेदभाव के शिकार भी हो रहे हैं। जिस समावेशित शिक्षा की बात की जा रही थी वह केवल सैद्धांतिक सिद्ध हो रही है। साथ ही एक नई समस्या माध्यम भाषा के चलते पैदा हो रही है। इन बच्चों के घर में अंग्रेजी का बिल्कुल इस्तेमाल न होने के कारण शिक्षण माध्यम का अंग्रेजी होना एक नई जटिलता पैदा कर रहा है। अपनी परिवेश की भाषा के माध्यम से सरकारी स्कूलों में ये बच्चे जो थोड़ा बहुत सीखते भी कहीं उससे भी वंचित न हो जाएं ?

एक सवाल और पैदा होता है कि इन बच्चों की फीस और पाठ्य सामग्री के खर्चे तो सरकार वहन करेगी, लेकिन निजी विद्यालयों में तो समय-समय पर इसके अलावा भी अनेक शुल्क वसूल किए जाते हैं, तमाम तरह के तामझाम किए जाते हैं, उनका क्या होगा ? जब ये बच्चे उन शुल्कों को अदा नहीं कर पाएंगे फलस्वरूप अन्य बच्चों की तरह सुविधाओं का लाभ नहीं ले पाएंगे तो क्या इन बच्चों में हीनताबोध नहीं पैदा होगा? ये कुंठा के शिकार नहीं होंगे? इन प्रश्नों पर समय रहते विचार किए जाने की आवश्यकता है।

इस दृष्टि से आने वाला समय गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए चुनौती भरा है। जैसा कि आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि शिक्षा के अधिकार कानून के नाम पर उनसे शिक्षा का अधिकार छीन न लिया जाय। यह दुखद है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के उक्त प्रावधान के परिणामों पर न संसद में उस समय गंभीरता से विचार किया गया, जब यह कानून पारित किया जा रहा था और न ही आज कहीं कोई बहस या सुनवाई है, जब देश एक नई सरकार को चुनने की राह पर है। कैसी विडंबना है कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कहीं कोई चर्चा ही नहीं है। यहाँ तक कि शिक्षा का मुद्दा देश के बड़े दलों के चुनाव घोषणा पत्रों से ही गायब है।