Archive for: April 2014

लोकतंत्र के लिए खतरा : अनुराग

democracy

लगाता है कि यह लोकसभा चुनाव दूरगामी परिणाम वाले होगा, लेकिन डर इस बात है कि यह चुनाव सकारात्मक चीजों के लिए नहीं, बल्कि नकारात्मक बातों के लिए अधिक याद किया जाएगा। इस चुनाव में कुछ ऐसी कुप्रवृत्तियां पनप चुकी हैं, जो कि लोकतंत्र के लिए घातक साबित होंगी। चुनाव के दौरान एक-दूसरे पर आरोप लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार जिस घटिया स्तर के आरोप लगाए जा रहे हैं, यह चिंताजनक है। इसमें छुटभैय्या नेता ही नहीं, बड़े कहे जाने वाले नेता भी पीछे नहीं हैं। इस पर विरोध होने पर ये नेता अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय कुतर्क कर रहे हैं। दुखद यह है कि पार्टियां या तो चुप्पी साध ले रही हैं या बचाव में उतर रही हैं।

लोकतंत्र में असहमति को भी महत्व दिया जाता है। इस चुनाव में असहमति होने पर लोग उग्र होकर अराजकता पर उतर रहे हैं। गाली-गलौच से लेकर मारपीट व हमले तक किए जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव का समर अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, यह कुप्रवृत्ति तेज होती जा रही है। यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। असहमति को सहन न कर पाना एक तरह की बर्बरता है। यह तानाशाही की शुरुआत है। लोकतंत्र में विरोधी की भी बात सुनकर उसका समाधान करने या उसका तर्क संगत जवाब दिया जाता है, लेकिन अब बाहुबल से मुंह बंद करने पर जोर है। राजनेता टुकड़े-टुकड़े करने, जमीन में गाड़ देने जैसी धमकियां नाम ले-लेकर दे रहे हैं। दूसरी ओर एक ने तो चेता दिया है कि जो उनकी पार्टी के नेता को विरोध करेगा, उसे पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। कोढ़ की खाज यह कि एक नेता ने तो अपनी कौम को सांप्रदायिक होने की सलाह तक दे दी। इससे अराजकता ही बढ़ेगी और जनहित की बातें पीछे रह जाएंगी।

इस बार के चुनाव की यह भी देन है कि नेता ब्रांड बन गए हैं। पार्टियां साम दाम दंड भेद से दूसरी पार्टी के नेताओं की छवि धूमिल करने और अपनी पार्टी के नेताओ की छवि चमकाने में लगी हैं। इसके लिए करोड़ों खर्च कर पीआरओ कंपनियों की मदद ली जा रही है। पहले नेता अपने और अपनी पार्टियों के कामों का उल्लेख कर और भविष्य की योजनाएं (उन पर अमल कितना होता था, यह दूसरी बात है) लेकर लोगों के बीच जाते थे और अब इस पर जोर है कि लोगों के बीच कैसी बॉडी लैंग्वेज हो, कैसे कपड़े हों, जो उन्हें आकर्षित करे। पार्टियां पैसा पानी की तरह बहा रही हैं। इतना पैसा कहां से और कैसे आ रहा है, इसका लेकर सभी गोलमाल जवाब दे रही हैं। नेताओं के भाषणों पर ताली पीटनेवाली आम जनता भी नहीं सोच रही कि आखिर चुनाव बाद इसका बोझ किस पर पड़ेगा? यह समझना मुश्किल नहीं है कि चुनाव के बाद सरकार चाहे जिसकी बने, जनहित में योजनाएं बनेंगी या उनके लाभ का ध्यान रखा जाएगा, जो पैसा लगा रहे हैं!

इस चुनाव को देखकर यह भी लग रहा है कि भारत में अधिनायकवाद का उदय हो चुका है। पार्टी स्तर पर टिकट वितरण और अन्य फैसले लेने में जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी (भले ही ढोंग सही), अब वह भी नहीं हो रहा है। दूसरी पार्टियों पर ‘एक परिवार का शासन’ का आरोप लगाने वाली पार्टियों में भी सामुहिक विचार-विमर्श के बाद निर्णय लेने के बजाय फैसले थोपे जा रहे हैं। विरोध करने वाले या असहमति जताने वाले को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है या उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। जब पार्टी नेताओं की असहमति बर्दाश्त नहीं हो रही है, तो देश में विपक्षी पार्टियों होती हैं और दूसरी विचारधारा के लोग भी, तब?

पार्टियां ये सब इस दावे के साथ कर रही हैं कि उन्हें देश और आम लोगों की चिंता है। इससे उनकी नीयत पर शक और गहराता है, क्‍योंकि‍ देश व जनता का हि‍त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्‍य होता तो, नि‍चले तबके तक भी सुवि‍धाएं पहुंचतीं, उनका जीवन-स्‍तर सुधरता, न कि‍ केवल कुछ मुट्ठी भर लोग लोकतंत्र की मलाई चाट रहे होते।

बल्ली सिंह चीमा की गिरफ्तारी अनुचित : जसम

बल्ली सिंह चीमा

बल्ली सिंह चीमा

नैनीताल :  ऊधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार तथा सुविख्यात शायर बल्ली सिंह चीमा को चुनाव प्रचार के दौरान कथित रूप से धारा 144 तोड़ने के आरोप में प्रशासन द्वारा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा जाना अलोकतांत्रिक और अनुचित है। यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि भाजपा और अन्‍य पार्टियों के अनेक नेता साम्प्रदायिक और भड़काऊ भाषण देने के संगीन आरोपों के बावजूद या तो चुनाव आयोग की नोटिस के बाद या महज आयोग की चेतावनी के बाद खुले घूम रहे हैं, वहीं बल्ली सिंह चीमा को एक निरर्थक से आरोप की बुनियाद पर आचार संहिता की आड़ में गिरफ्तार कर लिया गया। यह चुनाव लड़ने और प्रचार करने के उनके अधिकार पर हमला है।

एक ऐसे समय जब 2014 के लोकसभा चुनाव में पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, करोड़पति और आपराधिक छवि वाले लोग भारी तादाद में चुनाव में अपने धन-बल और बाहु-बल की आज़माइश कर रहे हैं, तब बल्ली सिंह चीमा की गिरफ्तारी एक गहरी विडम्बना की और इशारा करती है, जहां चुनाव आयोग के तमाम लम्बे-चौड़े दावों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के बड़ी पूंजी और आपराधिक तत्वों द्वारा अपहरण की कोशिशें बेरोक-टोक जारी हैं। एक सामान्य नागरिक के लिए चुनाव लड़ना ही असंभव बना दिया जा रहा है।

जन संस्कृति मंच बल्ली सिंह चीमा और उनके साथियों की अविलम्ब रिहाई की मांग करता है और चुनाव आयोग से मांग करता है कि इस मामले में जो अधिकारी दोषी हैं, उन पर आयोग कार्रवाई करे।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह सचिव, जसम द्वारा जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)  

बल्ली सिंह ‘चीमा’ का लिखा हुआ गीत-

मैं अमरीका का पिट्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज बनाएं, मौज उड़ाएं कौन पूछने वाला है

बरगर-पिज़्ज़ा खाना है और शान से जीना-मरना है
ऐसी-तैसी लस्सी की, अब पेप्सी कोला पीना है
डॉलर सबका बाप है और रुपया सबका साला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .

फारेन कपड़े पहनेंगे हम, फ़ौरन खाना खायेंगे
फारेन धुन पर डांस करेंगे, फारेन गाने गायेंगे
एन.आर.आई. बहनोई है, एन.आर.आई. साला है
आजा मिलकर लूट मचाएं कौन देखने वाला है .

गंदा पानी पी लेते हैं, सचमुच भारतवासी हैं
भूखे रहकर जी लेते हैं, सचमुच के सन्यासी हैं
क्या जानें ये भूखे नंगे, क्या गड़बड़ घोटाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

रंग बदलते कम्युनिस्टों को अपने रंग में ढालेंगे
बाकी को आतंकी कहकर किस्सा ख़त्म कर डालेंगे
संसद में हर कामरेड जपता पूँजी की माला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

पर्वत, नदियाँ, जंगल, धरती जो मेरा वो तेरा है
भूखा भारत भूखों का है, शाइनिंग इंडिया मेरा है
पूँजी के इस लोकतंत्र में अपना बोलमबाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

तेरी सेना, मेरी सेना मिलकर ये अभ्यास करें
हक इन्साफ की बात करे जो उसका सत्यानाश करें
एक करार की बात ही क्या सब नाम तेरे कर डाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है .

मैं अमरीका का पिट्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .

मार्केज को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

ESPAÑA GARCÍA MÁRQUEZ

नई दि‍ल्‍ली : 18 अप्रैल 2014 को लातिन अमरीका के अद्भुत किस्सागो गैब्रियल गार्सिया मार्केज ने 87 साल की उम्र में हमसे विदा ली। उनका कथा संसार लातिन अमरीका के देशों के पिछड़े माने जाने वाले समाजों की जिंदगी की समझ के साथ ही इस समाज के दुख-दर्द, हिंसा, असमानता, आवेग और गतिशीलता से पूरी दुनिया को बावस्ता कराता है।

6 मार्च 1927 को कोलम्बिया के छोटे से शहर आर्काटका में जन्मे गैब्रियल खोसे द ला कन्कर्डिया गार्सिया मार्केज का यह शहर 20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया के नक्शे पर भीषण औपनिवेशिक लूट के नाते दिखा। यही शहर और उसके अनुभव बाद में मार्केज के रचना संसार के बीज बने। ‘क्रानिकल्स ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’, ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’, ‘ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क’, ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ आदि मार्केज के नामी गिरामी उपन्यास हैं। वास्तविक घटनाओं को मिथकों के साथ जबर्दस्त ढंग से गूँथ देने की उनकी क्षमता ने उन्हें विश्वस्तर पर ऐसा उपन्यासकार बना दिया जिसके विरोधियों को भी उसका सम्मान करना पड़ता था।

1982 में उनको साहित्य के नोबल सम्मान से नवाजा गया। सम्मान समारोह के मौके को उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध के मंच के रूप में बदल दिया। इस मौके पर बोलते हुए उन्होने न सिर्फ लातिन अमेरिकी जमीन पर अंग्रेजी उपनिवेशवाद की क्रूरताओं का जिक्र किया, बल्कि अमरीका और यूरोप के कॉर्पोरेट घरानों द्वारा इस इलाके में की जा रही लूट और भयानक दमन को भी बेनकाब किया। उन्होने साफ-साफ कहा कि उनकी कहानियाँ गायब हुए लोगों, मौतों और राज्य प्रायोजित नरसंहारों के बारे में हैं जो कॉर्पोरेट हितों के लिए रचे जाते हैं।

मार्केज को याद करते हुए श्रद्धांजलियों में पीली तितलियों, लाल चींटियों, चार साल ग्यारह हफ्ते दो दिन चली बारिश आदि मिथकीय कथातत्त्वों का जिक्र तो काफी हो रहा है, पर उनकी इस शैली के पीछे की असलियत पर निगाह अपेक्षाकृत कम ही टिकती है। मार्केज के सामने एक पूरी ढहा दी गई सभ्यता थी, जिसे उन्होंने भोगा और महसूस किया था। मार्केज के नाना गृहयुद्धों में भाग ले चुके थे और नानी जीवन की ‘असंभव’ किस्म की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शायद इतिहास की अकादमिक व्याख्या की जड़ता से अलग पूरी हकीकत बताने की छटपटाहट ही मार्केज को उस शिल्प तक ले गई जिसे पश्चिमी अकादमिक जन ‘जादुई यथार्थवाद’ कहते हैं। इतिहास की वर्तमान धारणा से पहले अन्य किस्म की अवधारणाएं विभिन्न समाजों में रही आई हैं। मार्केज ने इन धारणाओं को भी अपने बयान के लिए चुना।

लातिन अमरीका की जमीन 20वीं सदी में समाजवाद के नए प्रयोगों के लिए जानी गई। फिदेल कास्त्रो इस आंदोलन के प्रतीक पुरुष बने। ठीक ऐसे ही लातिन अमरीकी देशों की जमीन से पुराने यथार्थवाद को बदलने-विकसित करने वाले ढेरों रचनाकार पैदा हुए, जिनकी अगुवाई मार्केज ने की। संयोग से ज्यादा ही है कि फिदेल, मार्केज के उपन्यासों के पहले कुछ पाठकों में शुमार हैं। दोनों ही वामपंथ की लड़ाइयों को अलग-अलग मोर्चों पर विकसित करने वाले योद्धा हैं। मार्केज की प्रतिबद्धताएं हमेशा ही वामपंथ के साथ रहीं। वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा के वाम आंदोलनों के साथ उनके गहन रिश्ते थे। अनायास नहीं कि उनकी रचनाशीलता के अमरीकी प्रसंशक उनके वामपंथी होने को कभी पचा नहीं पाये।

हम तीसरी दुनिया के लोग औपनिवेशिक विरासत के चक्के तले पिसने को बखूबी समझते हैं, पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही अलग तरह का देशज इतिहास-बोध हमें भी हासिल है, ऐसे में मार्केज अपनों से ज्यादा अपने लगते हैं। एक पूरी सभ्यता का बनना और उसका नष्ट होना हमारे अपने देश-काल में भी धीरे-धीरे घटित होता जा रहा है। हम भी मिथकों के औजार से यथार्थ को और बेहतर तरीके से और संपूर्णता में देख सकते हैं।

आज जब हमारे देश में अमरीकी तर्ज पर ही स्मृतिहीनता और फर्जी इतिहासबोध लादा जा रहा है, तब मार्केज के उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ के आखिर हिस्से के एक वर्णन की याद बेहद प्रासंगिक है। भारी वर्षा के बाद कत्ल कर दिये गए 3000 हड़ताली मजदूरों की स्मृति लोगों के दिमाग से धुल-पुंछ जाती है। अकेले खोसे आर्कादियों सेगुंदो इस बात को याद है और वह लोगों से इस बावत बात करता है पर लोग भूल चुके हैं।

ऐसी स्मृतिहीनता को दर्ज करना और स्मृतिहीन बनाने वाली ताकतों, व्यवस्थाओं, कॉर्पोरेटों के खिलाफ प्रतिरोध रचना ही मार्केज को सही श्रद्धांजलि होगी !

जन संस्कृति मंच दुनिया की जनता के इस दुलारे कथाकार को सलाम करता है।

महंगी होती शिक्षा : अनुराग

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पूरे देश में चुनाव की सरगर्मी है। नेताओं के बयान, राजनीति की जोड़-तोड़ और हार-जीत के आंकड़े सुर्खियों में हैं। ऐसे में कोई भी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दे रहा है। चिंताजनक यह है कि चुनाव के रंग में रंगा मीडिया भी इस ओर विशेष तवज्जो नहीं दे रहा है। निजीकरण के चलते शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। निजी स्कूलवालों की मनमानी ने समस्या और बढ़ा दी है। ऐसा लगने लगा है कि इन पर शासन-प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है और अदालत का भी इन्हें कोई डर नहीं लगता।

निजी स्कूलों द्वारा बेतहाशा फीस वृद्धि और अन्य चार्ज बढ़ाने को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश के कई क्षेत्रों में अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच तनातनी चल रही है। प्रदर्शन और संबंधित अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों से शिकायत के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। शिक्षा के बाजारीकरण से परेशान कई अभिभावक संगठनों ने लोकतंत्र के इस पर्व में सभी पार्टियां का बहिष्कार कि‍या। उन्होंने मतदान के दौरान ‘नोटा’ का इस्तेमाल कि‍या। इसके बाद भी कोई उनकी समस्या का समुचित समाधान निकालने को तैयार नहीं है। हालांकि यह समस्या केवल इस साल की नहीं है। पिछले कई वर्षों से इन दिनों फीस व एनुअल चार्ज में होने वाली वृद्धि को लेकर हंगामा होता है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। चिंताजनक स्थिति यह भी है कि अदालत और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद भी निजी स्कूल हर साल अपनी मनमर्जी कर रहे हैं। ऐसा लगने लगा है कि स्कूल बेलगाम हो गए है और अब इन पर अंकुश लगाना असंभव है।

निजी स्कूलों ने वसूली के लिए इतने तरीके अपना लिए हैं कि अच्छे-अच्छे को नानी याद आ जाए। मसलन- एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल चार्ज, मेडिकल चार्ज, ट्रांसपोर्ट चार्ज (ऑप्शनल), एक्टिविटी चार्ज, लैब फीस, लाइब्रेरी फीस आदि। जब कोई अपने बच्चे का इन निजी स्कूलों में एडमिशन कराता है, तो उसे वर्तमान ही दिखाई देता है यानी तत्कालीन फीस और अन्य खर्चे। बच्चे को बेहतर शिक्षा दिलाने के नाम पर इसकी वह इधर-उधर से ले-देकर व्यवस्था कर लेता है, लेकिन हर साल जब इन खर्चों में 20 से 40 फीसद वृद्धि होती है और स्कूल प्रबंधन अनाप-शनाप अन्य चार्ज करता है तो वह खुद को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा पाता है, जिससे निकलने का रास्ता उसे नहीं सूझता। वह निजी स्कूल की मनमानी से परेशान होकर प्रदर्शन करने को मजबूर हो जाता है। इससे कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होती है। इस सबके बाद होता केवल इतना है कि कोई प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि मध्यस्थता करते हुए हजार-पांच सौ रुपये कम कराकर मामला रफा-तफा करा देता है। समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाता। धरना-प्रदर्शन के बाद अभि‍भावकों को इससे अधिक कुछ नहीं मिल पाता। अभि‍भावक आंदोलन के दौरान बच्चों को स्कूल जाने से रोकते हैं और बच्चों को वहां नहीं पढ़ाने की बात करते हैं, लेकिन बच्चे पढ़ते तो उसी स्कूल में ही हैं। क्या शासन-प्रशासन और इन निजी स्कूलों ने कभी सोचा कि उनके मासूम मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? अपने अभि‍भावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच तू-तू मैं-मैं होती देखकर क्या उनके उनके मन में अध्यापकों को लेकर कोई सम्‍मान की भावना जागेगी? क्या इससे शैक्षिक माहौल खराब नही होता? मुझे तो ज्ञात नहीं है कि पूरी दुनिया में किसी ओर देश में हर साल फीस वृद्धि और एडमिशन को लेकर इस तरह का माहौल बनता हो। क्या एक लोकतांत्रिक देश के लिए यह शर्मनाक स्थिति नहीं है?

निजी स्कूल वाले फीस आदि में बेतहाशा वृद्धि का कारण टीचरों का बढ़ता वेतन व अन्य सुविधाएं बताते हैं। पहली बात तो यह है कि इसकी भी जांच होनी चाहिए कि कितने निजी स्कूल वास्तव में सरकारी वेतनमान के अनुसार अध्यापकों को वेतन और अन्य सुविधाएं दे रहे हैं। इन स्कूलों में कितने अध्यापक स्थायी और कितने स्थायी हैं। उनकी नियुक्ति में कौन से मापदंड अपनाए जा रहे हैं? सबसे बड़ी बात यह है कि जितने पैसों पर उनसे साइन करवाया जा रहा है, उतने दिए भी जा रहे हैं या सब कुछ कागजों पर ही चल रहा है। जांच में दोषी पाए जाने वाले निजी स्कूलों के खि‍लाफ सख्‍त कार्रवाई की जाए। इसके अलावा यदि निजी स्कूलों की बात सच मान भी ली जाए तो वे केवल एनवुल चार्ज से ही कुल अध्यापकों को देय राशि से दो-ढाई गुणा अधिक वसूल लेते हैं। इसलिए उनके तर्क में कोई दम नहीं दिखाई देता। यह विशुद्ध व्यापार का मामला है।

यह सोचकर भी डर लगाता है कि जिस तेजी से निजी स्कूल विभि‍न्‍न मदों में हर साल वृद्धि कर रहे हैं, उससे आने वाले पांच-सात साल में ही इन स्कूलों में बच्चे को पढ़ाना दो से ढाई गुना महंगा हो जाएगा। तब मध्यम वर्ग के लिए भी इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना लगभग असंभव हो जाएगा। सरकारी स्कूल रहेंगे नहीं और निजी स्कूल में बच्चे पढ़ा नहीं पाएंगे तो फिर क्या आने वाले समय में अधिकांश बच्चे अनपढ़ ही रह जाएंगे! हमारा देश अभी तक पूर्ण साक्षर नहीं हो पाया है। ऐसी विषम स्थिति मे साक्षरता नहीं, असाक्षरता की दर बढ़ेगी।

अगर शिक्षा व्यवस्था को लेकर अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह स्थिति आने ही वाली है। इसलिए निजी स्कूलों की मनमर्जी को रोकने के लिए इस समस्या का स्थायी समाधान खोजना जरूरी है। इसका समाधान निजी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ाना कतई नहीं है। यदि फीस आदि को लेकर निजी स्कूलों पर थोड़ा-बहुत अंकुश लग भी गया तो वे कमाई का कोई रास्ता खोज लेंगे, क्योंकि उनका मुख्‍य मकसद ही मुनाफा कमाना है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाया जाए कि वे जगह-जगह सरकारी स्कूल खोलें। तब कम से कम अभिभावकों के पास विकल्प तो होगा। अभी तो विकल्पहीनता की स्थिति में निजी स्कूलों के सामने घुटने टेकना अभिभावकों को मजबूरी है।

हमारी कॉलोनी के पास पान का खोखा लगाने वाले राजेश से बात हो रही थी। वह बड़ा दुखी था। बोला कि बच्ची को स्कूल में एडमिशन दिलाने में 25 हजार रुपये लग गए और स्कूल भी मामूली। मैंने उससे कहा कि जब नेता वोट मांगने आते हैं, तो उनसे यह क्यों नहीं कहते कि पहले हमारे क्षेत्र में सरकारी स्कूल खोलो, तभी आपको वोट देंगे। लेकिन अफसोस इस बात का है कि इस पर उसने भी चुप्पी साध ली। शायद वह भी कुप्रचार के कारण इस भ्रम में है कि सरकारी स्कूल में उसके बच्चे ज्ञान से वंचित रह जाएंगे, जबकि वह यह नहीं जानता कि गली-गली में खुली शिक्षा की दुकानों से कई गुणा बेहतर शिक्षा सरकारी स्कूलों में दी जाती है। और सरकारी स्कूलों में जो खामि‍यां हैं, उन्हें सरकार दूर करे, न कि निजी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दे। निजी शिक्षा व्यवस्था में तो बच्चों को समान भी नहीं माना जाता, जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए बेहद जरूरी है।

शिक्षा में बदलाव या बदलाव के लिए शिक्षा : महेश चंद्र पुनेठा

mahesh chand punetha

महेश चंद्र पुनेठा

हम एक ऐसे दौर में हैं, जबकि शिक्षा सृजनात्मकता व विवेकशीलता के विकास का मिशन न होकर मुनाफे का धंधा बनती जा रही है। वित्तीय पूँजी और कॉरपोरेट जगत की गिद्ध दृष्टि इसमें लगातार गढ़ती जा रही है। उसे इस क्षेत्र में मुनाफे की असीम संभावना दिखाई दे रही है। भूमंडलीकरण के प्रभाव में आज शिक्षा के उद्देश्य पूरी तरह बदल गए हैं। शिक्षा सृजनोन्मुखी न होकर बाजारोन्मुखी हो गई है। कैसे अधिक से अधिक धनोपार्जन किया जा सके, शिक्षा उसका माध्यम बनती जा रही है। शिक्षा को मात्र नौकरी-चाकरी कर सकने की योग्यता से जोड़कर देखा जा रहा है। कैरियर उसके केंद्र में है। ऊँची से ऊँची नौकरी दिला सकने वाली शिक्षा को ही अच्छी शिक्षा माना जा रहा है। बच्चों को संवेदनशील, सभ्य, सुसंस्कृत, सचेत और जिम्मेदार नागरिक बनाना गौण होता जा रहा है। मानवीय मूल्यों की किसी को कोई चिंता नहीं है। नैतिक मूल्यों की बातें केवल कहने मात्र को हैं। संवेदनशील, स्वतंत्र और पूर्णतर मानव नहीं, बल्‍कि‍ अर्थ मानव बनाना शिक्षा का परम लक्ष्य हो गया है। उसे एक संसाधन के रूप में विकसित किया जा रहा है। एक ऐसा संसाधन जो बाजार के हित में काम कर सके। कॉरपोरेट घरानों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं में संसाधन के रूप में बच्चे को सजाने-संवारने, ठोकने-पीटने तथा काटने-तराशने की जद्दोजहद चल रही है। इस प्रक्रिया में उसके भीतर क्या-क्या क्षरित हो रहा है, इसकी किसी को कोई परवाह नहीं है। उसकी सृजनशीलता की कोई कद्र नहीं है। उसे उपभोक्ता सामग्री तैयार करने वाले एक साधन मात्र के रूप में तैयार किया  जा रहा है। वह बाजार में बिकने वाली वस्तु बन रहा है।

नवउदारवाद के नाम पर सरकारी स्कूल प्रणाली को ध्वस्त करने का षड्यंत्र चल रहा है। लालफीताशाही इस मुहिम को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है। ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि सरकारी शिक्षा तंत्र को इतना बदनाम कर दिया जाय कि उस पर जनता का रहा-थका विश्वास भी जाता रहे ताकि आने वाले समय में सार्वननिक शिक्षा को पूरी तरह से निजी या कॉरपोरेट क्षेत्र के हाथों भी सौंप दिया जाय तो जनता की ओर से कोई विरोध न खड़ा हो सके। शिक्षा में निजी-सार्वजनिक भागीदारी और वाउचर प्रणाली इसकी शुरुआत मानी जा सकती है।

यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है। 86वें संविधान संशोधन के द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा तो प्रदान कर दिया गया है, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गई है। लेकिन प्रश्न उठता है यह कैसी शिक्षा का मूल अधिकार है? कौन सी शिक्षा निःशुल्क देने की बात हो रही है?

बाजार में तरह-तरह की गुणवत्ता वाली शिक्षा की दुकानें सजी हैं। एक छोर तमाम संसाधनों से विहीन और बदहाल शिक्षण संस्थाएं हैं, जहाँ शिक्षक भी पर्याप्त नहीं हैं तो दूसरे छोर पर समस्त संसाधनों से लैस, हाइटैक और महंगी शिक्षण संस्थाएं हैं जिनका अपना-अलग माध्यम और पाठ्यक्रम है। केवल सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं को ही लें तो उसमें एक ओर जहाँ वैकल्पिक शिक्षा केंद्र या शिक्षा घर जैसी व्यवस्थाएं हैं तो दूसरी ओर केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय या मॉडल स्कूलों जैसी विशेषकोटि की शिक्षण संस्थाएं हैं। शिक्षा अधिनियम 2009 में ही

चार तरह के विद्यालयों की बात की गई है। इस अधिनियम में यह तय कर दिया गया है कि बच्चे को ऐसी ही शिक्षा का मौलिक अधिकार होगा जिसे राज्य कानूनन निर्धारित करेगा। इस तरह वह शिक्षा शिक्षाघरों या वैकल्पिक शिक्षा केंद्रों में दी जाने वाली शिक्षा भी हो सकती है जिसमें एक ऐसा पैरा-टीचर बच्चों को शिक्षा देता है जिसके पास न अपेक्षित शैक्षिक योग्यता होती है और न ही प्रशिक्षण योग्यता।

जहाँ तक वाऊचर देने का सवाल है, वह भी उतने ही धनराशि का होगा जितना आज की तिथि में सरकार सरकारी स्कूलों में एक वर्ष में एक बच्चे के ऊपर खर्च कर रही है। समझा जा सकता है कि उस वाऊचर से शिक्षा के बाजार में कैसी और कौन-सी शिक्षा खरीदी जा सकती है? यह कैसी शिक्षा के चयन की स्वतंत्रता है? यह कैसा मूलअधिकार है, जिसके मूल में ही असमानता छुपी हुई है और कैसी निःशुल्क शिक्षा, जिसमें निजी विद्यालयों को लूट की पूरी छूट दी गई है। निःशुल्क शिक्षा तो तब मानी जाती जब सरकार अमीर-गरीब सभी बच्चों के लिए समान एवं सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था करती। यहाँ तो अलग-अलग वर्गों तथा अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा है। आज शिक्षा केवल दोहरी ही नहीं, बल्कि बहुपरती है जो बाजार की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित है।

ऐसी स्थिति में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है कि शिक्षा में बदलाव हो या बदलाव के लिए शिक्षा हो? बदलाव हो तो क्यों हो? किस के हित में हो? शिक्षा में बदलाव की जहाँ तक बात है, उसके लिए तो ठीक है कुछ नया-नया करते रहिए, उसमें बदलाव दिखाई देता रहेगा। जैसा कि हो भी रहा है। पर जहाँ बदलाव के लिए शिक्षा की बात है, यह एक व्यापक एवं गम्भीर सवाल है। जब हम बदलाव के लिए शिक्षा की बात करते हैं, तो कुछ-कुछ नया करते रहने से बात नहीं बनेगी। उसके लिए अपने समय और समाज के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रश्नों पर समग्रता से विचार करना होगा, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था इन सबसे अलग नहीं है, उनका ही एक अंग है। इसलिए शिक्षा को इस सबसे काटकर नहीं देखा जा सकता है। यदि ऐसा किया जाएगा तो हासिल कुछ नहीं होगा। यथास्थिति बनी रहेगी। उन तमाम प्रश्नों पर विचार करना होगा जो शिक्षा में आ रहे मौजूदा परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार हैं। उन कारकों को समझना होगा जो पूरी व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं। संचालित करने वालों के मंसूबों को समझना होगा। सत्ता और शिक्षा के अंतर्संबंधों की पड़ताल करनी होगी। सत्ता के मूल चरित्र को समझना होगा। वैश्विक राजनीति की गति को पकड़ना पड़ेगा। इन सबको समझे बिना शिक्षा में बदलाव तथा शिक्षा से बदलाव की बात करना बेमानी होगी।

ऐसे में आज शिक्षा पर समग्रता के साथ चिंतन और हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। उसके एक पक्ष विशेष में ध्यान देकर वस्तुस्थिति में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। शिक्षा बदलाव की वाहक तभी बन सकती है, जब शिक्षा के सैद्धांतिक, व्यवहारिक, नीतिगत व क्रियान्वयन के क्षेत्र में एक साथ काम किया जाए। उसके स्थानीय और वैश्विक स्वरूप को समझा जाए। एक शिक्षक के लिए आज जितनी आवश्यकता कक्षा-कक्ष या स्कूल स्तर पर ईमानदारी से काम करने की है, शिक्षा के सैद्धांतिक पक्ष को जानने-समझने और आत्मसात करने की है, उतनी ही राज्य की नीतियों को समझने और हस्तक्षेप करने की भी। यदि शिक्षा के सैद्धांतिक पक्ष की समझ गहरी एवं स्पष्ट नहीं होगी तो नीतियां कितनी ही सही हों, उनकी कितनी ही ईमानदारी से लागू किया जाय परिणाम अपेक्षानुकूल नहीं प्राप्त हो सकते। दूसरी ओर, सैंद्धांतिक समझदारी और कार्य के प्रति ईमानदारी कितनी ही उच्चकोटि की हो, यदि सरकारी नीतियां या व्यवस्था कार्य करने के अनुकूल न हों तो तब भी इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते। ऐसा अक्सर देखने में भी आता है कि ऐसे बहुत सारे शिक्षक हैं जिनकी शिक्षा संबंधी सैंद्धान्तिक समझदारी बहुत गहरी रही है तथा अपने दायित्व के प्रति उनकी ईमानदारी और समर्पण भी कहीं से कम नहीं रहा है, बावजूद इसके नीतिगत या व्यवस्थागत खामियों के चलते वे बहुत कुछ नहीं कर पाते हैं। अंततः अपने आशानुकूल न कर पाने के कारण कुंठित एवं निराश हो जाते हैं। उनकी सृजनशीलता धरी की धरी रह जाती है।

ऐसे में बच्चों को कैसे सृजनशील और विवेकशील बनाया जाय? यह शिक्षा से जुड़े हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक चुनौती है। इसलिए सृजनशीलता के मार्ग में जो बाधाएं हैं, उनको शिक्षकों को न केवल समझना होगा बल्कि संगठित होकर उसके खिलाफ संघर्ष करना होगा। यह भी सृजनशीलता का ही एक अंग है। सृजनात्मकता का प्रस्थान बिंदु है- सम्यक शिक्षा के बारे में समझ विकसित करना। सरकार अपने लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से बच रही है इसलिए शिक्षकों के साथ समाज के हर व्यक्ति को हस्तक्षेप करना होगा तथा समान शिक्षा के लिए सरकार पर दखल बनाने की आवश्यकता है। शिक्षा में बदलाव कर ही काम नहीं चलेगा, बल्कि बदलाव के लिए शिक्षा को माध्यम बनाना जरूरी है।

अथ चुनाव गीता : शंभू राणा

maaf karna he pita.shambhu rana

चुनावी समर में पढि‍ए शंभू राणा का व्‍यंग्‍य। आप भी अर्जुन सिंह की तरह राजनीति‍ के सर्वज्ञाता हो जाओगे-

खुली जीप में सवार नेता ने उसे सुनने आए और लाए गए जनसमुदाय को दूर से देखा। रामलीला मैदान इस छोर से उस छोर तक ठसाठस भरा था। सर-ही-सर नजर आते थे। नेता और पार्टी आलाकमान अपार भीड़ देख कर अत्यन्त हर्षित हुए। नेता बहुत देर तक मंत्र-मुग्ध-सा भीड़ को निहारता रहा। फिर उसने अपने पहलू में खड़े आलाकमान से यूँ कहा- “सर, मंच पर जाकर भाषण देने से पहले मैं जरा जनसमुदाय को ध्यान से देखना चाहता हूँ, जायजा लेना चाहता हूँ। इससे मुझे स्थिति का सही आकलन करने तथा इस निर्णायक मानी जा रही सभा को सम्बोधित करने में मदद मिलेगी। प्लीज…”

आलाकमान के निर्देश पर ड्राइवर ने जीप को ऐसी जगह पर ला खड़ा किया, जहाँ से मजमे को ब-गौर देखा जा सकता था। लो भई, देखो, क्या देखना चाहते हो!- कहा आलाकमान ने।

सांसद का चुनाव लड़ रहे अर्जुन सिंह ने जीप में खडे़-खड़े देखना शुरू कर दिया भीड़ को।

उसने देखा मंच के करीब बैठी अपने मोहल्ले की महिलाओं को, जिन्हें वह भाभी, चाची, तायी और दादी आदि कह कर बुलाता था। उसे दिखाई दिए वे मास्साब, जिन्होंने उसे पढ़ाया था। अपने दूधवाले, पानवाले और अखबारवाले को भी देखा उसने। वहीं हसीन पेंटर भी खड़ा था, जिसने एक बार उसे खून दिया था और कॉफी पिये बगैर ही अस्पताल से गायब हो गया था। दीपा आंटी को भी वह देख रहा था जिन्होंने उसे एक बार अपनी बेटी के साथ बदतमीजी करने पर वहीं सड़क पर तमाचा जड़ दिया था, लेकिन शिकायत लेकर घर नहीं आयीं। नेता की माँ वहाँ मौजूद थी और बच्ची को गोद में लिये उसकी पत्नी थी। और…

अर्जुन सिंह के चेहरे पर एकाएक मायूसी की बदली छा गई। उसका आत्मविश्वास जाता रहा। उसने आलाकमान की ओर पनाह माँगने वाली निगाहों से देखा।

‘‘क्या हुआ? तुम्हारी तबियत तो ठीक है?’’ आलाकमान ने उसके चेहरे का रंग बदलते देख कर पूछा।

‘‘कुछ नहीं सर, मेरी तबियत ठीक है पर…।’’

‘‘पर क्या?’’ उन्होंने सावधानीवश जीप में लगा माइक ऑफ कर दिया, ‘‘क्या बात है?’’

मैं…मैं… इस सभा को सम्बोधित नहीं कर सकता सर।

क्या कह रहे हो? दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा? क्यों किये कराये पर पानी फेर दे रहे हो? क्या इसीलिये दिल्ली से बुलाया तुमने मुझे? जानते हो न कि यह सीट हमारे लिये कितनी महत्वपूर्ण है? हमें हर हाल में यह सीट चाहिये। देखो, हजारों की भीड़ जमा है, मीडिया के लोग यहाँ हैं। तुम्हारी इस हरकत से देश में क्या सन्देश जायेगा? क्यों तुम पार्टी की फजीहत करवाने पर तुले बैठे हो! पागल मत बनो। माहौल हमारे पक्ष में है। जीत पक्की है। सभा तो तुम्हें सम्बोधित करनी ही पडे़गी। आलाकमान ने अर्जुन सिंह को समझाने की कोशिश की।

मगऱ…मगर…सर…अर्जुन सिंह हकलाने लगा। मैं कैसे सम्बोधित करूँ सभा को?… किस मुँह से दूँ वह भाषण जो हमने हफ्तों की मगजमारी के बाद खासतौर से इस मौके के लिये तैयार करवाया है, क्योंकि उसका अधिकांश तो झूठ है, मनगढ़ंत है। मैं कैसे ऐसी निराधार बातें कहूँ इन लोगों के सामने, किस मुँह से? यहाँ मेरे लिये पराया और अनजान कौन है? सभी तो मेरे मोहल्ले के लोग हैं, मेरे शहर के। इस छोटे से शहर में कौन ऐसा है जिसे मैं नहीं जानता, स्वयं मैं यहाँ किसके लिये अपरिचित हूँ? यहाँ मौजूद हर आदमी या तो मेरा दोस्त है, रिश्तेदार है या परिचित। इस भीड़ में मुझे एक भी ऐसा शख्स नजर नहीं आ रहा जिसके साथ मेरे कम से कम हाय-हलो के सम्बन्ध न हों।

जिन बातों की स्वयं कल तक इन लोगों के साथ खिल्ली उड़ाया करता था, आज कैसे उन्हीं बातों का पक्ष लूँ और लोगों को समझाऊँ? आखिर कौन-सी ऐसी अनोखी बात मेरे पास कहने को है कि जिसके आधार पर मैं वोट माँगूँ? कैसे कह दूँ कि मैं आपके वास्ते चाँद तोड़ कर ला दूँगा? विपक्षी झूठे हैं, बेईमान हैं, गलतबयानी करते हैं! पिछली आधी सदी से जनता को लूटते आये हैं। इन्होंने अपनी आइन्दा की सात पीढ़ियों के लिये कमा कर रख छोड़ा है। यह लुटेरों की जमात है। इनके धोखे में मत आइये। बस, अब और नहीं। मुझे एक मौका दीजिये। सिर्फ एक मौका। यकीन करिये मैं और मेरी पार्टी ही सच्ची, ईमानदार और दूध की धुली है। यकीन जानिये मैं आपको चाँद-तारे तोड़ कर ला दूँगा। आप खुशहाल हो जायेंगे। हमारा शहर गुलजार हो जायेगा। चारों ओर बहारें होंगी, हर दिन त्योहार सरीखा…

जरा आप ही मुझे बताइयेगा सर कि मैं किस मुँह से प्रतिपक्षियों पर यह आरोप लगाऊँ कि़…कि… मसलन शिक्षा व्यवस्था चौपट कर दी इन्होंने, उसका कोई स्तर नहीं रह गया़, जबकि मैं खुद नकल से पास हुआ। नम्बर बढ़ाने के लिये अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया। राजनीतिक प्रभाव के बूते ही विश्वविद्यालय में अपनी बीवी को नौकरी दिलवायी़… तो मैं कैसे कह दूँ इन बातों को? उधर उस कोने में देखिये, लाठी के सहारे जो बुजुर्ग खडे़ हैं, वह मेरे टीचर रहे हैं। इन्होंने एक बार मुझे क्लास में चरस पीते हुए पकड़ा और पीटते हुए प्रिंसिपल के कमरे की ओर ले गये। प्रिंसिपल बड़े सख्त आदमी थे। चरस शब्द सुनते ही आगबबूला हो गये। नाम काटने को रजिस्टर मँगवा लिया। तब यही मास्साब थे जिन्होंने मुझे आड़ में कर लिया और अड़ गये कि मेरे रहते नाम नहीं कटेगा बच्चे का। समाज में एक लफंगा पैदा करने का दोष में अपने सर पर नहीं लूँगा…

हालांकि वो बात अलग है कि मैं पता नहीं क्यों नहीं सुधरा! इस नुक्ते से कभी चीजों को देखा ही।

अगर सोच पाता इस तरह तो आज यह धर्मसंकट उत्पन्न ही क्यों होता? राजनीति में ही जाना था तो किसी ढंग की पार्टी में गया होता, जो आम जनता के मुद्दों पर लड़ती, उनकी आवाज बनती। जात-पात और मजहब जिसके लिये बेमानी होते। माना कि आजकल कोई ऐसी पार्टी ढूँढ़ पाना मुश्किल है। तो क्या, मैं निर्दलीय की हैसियत से चुनाव लड़ लेता। नक्कारखाने में तूती की आवाज ही सही। शायद विषयान्तर हो गया।

तो सर, इन कब्र में पाँव लटकाये बैठे मास्साब से नजरें मिला कर मैं कैसे शिक्षा व्यवस्था को गाली दूँ? हालाँकि इस सबका सम्बन्ध शिक्षा व्यवस्था से उतना नहीं, पर शिक्षा व्यवस्था को गरियाने से पहले मेरे लिये लाजिम है कि मैं एक आदर्श विद्यार्थी होता। व्यवस्था के बहाने विरोधियों को कोसने का कोई मतलब नहीं। पब्लिक सब समझती है।

यहाँ डाँ. पन्त अपनी डाँ. पत्नी के साथ बैठे हैं, मैं देख पा रहा हूँ। उनकी मौजूदगी में क्योंकर मैं विपक्षियों पर दुश्‍चरित्रता का इल्जाम लगा दूँ? जबकि मैं स्वयं कितनी ही लड़कियों को डाँ. पन्त के जच्चा-बच्चा केन्द्र में भेजता रहा हूँ। यहाँ कम से कम दर्जन भर ऐसी लड़कियों को भी मैं देख रहा हूँ जिनसे मेरे ताल्लुकात न सिर्फ शादी से पहले थे, बल्कि अब भी बने हुए हैं। मेरी पत्नी दो-तीन दफे मुझे रंगे हाथों पकड़ चुकी है। इन सबसे नजरें मिला कर कैसे मैं विरोधियों के चरित्र पर कीचड़ उछालूँ? एक ने भी व्यंग्य से मुस्कुराकर मेरी तरफ देख लिया तो आप समझते हैं कि मारे घबराहट के मेरा पेशाब नहीं निकल जायेगा।

लोग मन ही मन हँसेंगे नहीं मेरी बातों पर? मुझे दोगला कहेंगे, गालियां देंगे। सुरक्षा हटा दी जाय तो लोग मुझे जुतियाने से भी बाज नहीं आयेंगे।

मैं यह सब नहीं कर सकता। नहीं…नहीं कैसे झूठ बोलूँ? कथनी और करनी में इतना बड़ा विरोधाभास… ना, मुझसे नहीं हो पाएगा सर। यह तो सरासर पाप है। ऐसा करके मुझे रातों को नींद नहीं आयेगी। मैं पागल हो जाऊँगा।

मैं अगर जीत भी गया तो शर्म से सर नहीं उठा पाऊँगा। खुद को गुनहगार महसूस करूँगा। मेरी आत्मा कलपती रहेगी। मुझे ऐसा पद नहीं चाहिये सर, जो झूठ बोलकर और दूसरों की चारित्रिक हत्या करके मिलता हो। झूठ किसके खिलाफ और हत्या भी किनकी! अपने ही लोगों की जिनके साथ मेरे संबंध बडे़ ही दोस्ताना हैं। जिन्होंने मेरे साथ सदा ही नेकी की, मुझे गले लगाया, मेरी छोटी-मोटी गलतियों को नजरअंदाज किया। यह सभी मेरे भाई-बन्द हैं। सभी के साथ मैं किसी न किसी रिश्ते की डोर से बंधा हूँ। इनसे झूठ बोलने, गाली देने और इन्हें बेवकूफ बनाने की मैं सोच भी कैसे सकता हूँ। नहीं सर, माफ कीजिये, मुझसे यह सब नहीं हो पायेगा। मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता। आप कोई दूसरा उम्मीदवार खड़ा कर लीजिये या किसी को सशर्त समर्थन दे दीजिये़। भाड़ में गया पद और ऐश्वर्य। मुझे नहीं चाहिये। मैं मूंगफली बेच लूंगा।

देखिये सर, मारे घबराहट के मेरे माथे पर पसीना आ गया है, टांगें काँप रही हैं। मेरे लिये खड़े रह पाना मुश्किल हो रहा है। मेरी जबान नशे में धुत्त शराबी की तरह लडखड़ा रही है। हाथों में माइक फिसला जा रहा है। पार्टी मैनीफेस्टो की प्रतियाँ मुझे बोझ लग रही हैं। सर, माफ कीजिये मैं अब और खड़ा नहीं रह सकता। मैं बैठूंगा… पानी… और यह कह कर अर्जुन सिंह वहीं धम से सर थाम कर बैठ गया। माइक और मैनीकैस्टो की प्रतियाँ उसके हाथों से निकल कर आलाकमान के कदमों में बिखर गयीं।

ठा.  अर्जुन सिंह को यूँ व्यवहार करता देख आलाकमान कई पल उसे हैरान-परेशान से देखते रहे। उसका रवैय्या उनकी समझ में नहीं आया। गुस्सा भी उस पर बड़ा आया। बल्कि उनका तो जी चाहा कि कस कर दो ठोकरें अर्जुन सिंह की पसलियों में जमायें और जीप से उतर कर चलते बनें। पर क्या करते, मजबूर थे। सीट निकालनी थी, चुनाव थे। ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते थे। तैश में आकर सार्वजनिक रूप से ऐसा कर पाना संभव नहीं था। खासतौर पर चुनाव के समय जबकि बकौल कहावत, बड़े-बड़े तुर्रमखां गधे को बाप कहते संकोच नहीं करते, विनम्रता में पानी से पतले हुए जाते हैं और नमस्कार कहने में इतना झुकते हैं कि ख्वामखां धोखा हो जाता है, कि नेताजी एक अच्छे जिमनास्ट भी हैं।

आलाकमान ने गंभीरता से सोचा सारी स्थिति पर। फिर अर्जुन सिंह को राहे रास्ते पर लाने की गरज से यूँ बोले- अर्जुन सिंह, मेरे प्यारे! मुझे देखो, मैं उम्र में तुमसे कितना बड़ा हूँ, कितना अनुभवी हूँ। मेरे बाल यूँ ही धूप मे सफेद नहीं हुए हैं। तुम मेरे बेटे की तरह हो, तुमसे जो भी कुछ कहूँगा, उसमें तुम्हारा ही हित निहित होगा। ऐसा विश्वास जानो। इसलिये कहता हूँ कि उठो और इस चुनावी समर में अपना रोल प्ले करो।

इस तरह का भावुकता एवं अव्यवहारिकता पूर्ण व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता। क्यों अपनी जग हंसायी करवाते हो। देख बेटा, तू जिनके वास्ते इतना कलप रहा है, शर्म और संकोच से मरा जा रहा, वे लोग सच पूछ तो इस लायक हैं ही नहीं। जो पहले से ही दुखी हैं बल्कि दुख और अभाव झेलने के लिये ही मृत्युलोक में आये हैं, यही सब उनका भाग्य है, तू क्यों उनके लिये दुखी होता है। दुख मत कर, इसे नशीली वस्तु की भांति त्याज्य जान। क्योंकि यह संक्रामक होता है। एक समय बाद दूसरों के दुख में दुखी होने वाले को अजीब-सा सुख मिलने लगता है। अपने धावों से पपड़ियां उखाड़ने का-सा सुख। और लोग ऐसे व्यक्ति को झाड़ में चढ़ा देते हैं कि दुखियों, अभावग्रस्तों की आवाज है, गरीबों का मसीहा है। वगैरा वगैरा। जबानी जमाखर्च के तमगे खूब मिलते हैं, पर पेट नहीं भरता।

तू ऐसों के लि‍ये क्यों दुख करता है! तेरी यह सोच मेरी समझ से परे है। एक राजनीजिज्ञ होकर भी तेरे खून में यह कवियों की-सी संवेदना कहाँ से घुस आयी? यह मेरे पॉलिटिकल कैरियर का सबसे अनोखा केस है। तेरी बातों ने मेरी खोपड़ी चकरा दी है। तेरा सोचना और यूं व्यवहार करना भदेस है, अशोभनीय है क्योंकि तू एक राजनीतिज्ञ है, बेटा।

तुम ऐसा क्यों समझते हो अर्जुन सिंह कि तुम ही पहली बार यह सब कर रहे हो! यह तो होता आया हैं। तुम से पहले भी, तुम्हारे समय में भी और जबकि तुम-हम नहीं रहेंगे मौजूद इस जहानेफानी में, रहेगा तब भी जारी यह तौर, यह तरीका। यह तर्जेसियासत क्योंकि चली आ रही है आदि काल से, इसलिये तुम क्यों नहीं समझते इस छोटी-सी बात को कि तुम मात्र परंपरा का ही निर्वाह कर रहे हो। परंपराओं से मुंह मोड़ना पाप है, न कि‍ उन पर चलते रहना। परंपराएँ हमने नहीं बनायीं। पाप अगर लगता भी है तो बनाने वालों को लगेगा।

पब्लिक के वास्ते इतना और इस नुक्‍ते से क्यों सोचना? देखो, इनके नौनिहाल मिट्टी में लोटते हैं, दु:ख-बीमारी में दवा नहीं पाते, यह जनता कीचड़-सा पानी पीती है। दिसम्बर-जनवरी में फुटपाथों पर सोती है। भर पेट भोजन इनके लिये एक अय्याशी है। फिर भी इन्हें न पीलिया होता है, न हैजा। जाडे़ में ये लोग जमते नहीं और गर्मी भी इन्हें गला नहीं पाती। हर साल बाढ़ और सूखे से भी मिटती नहीं है इनकी हस्ती। बड़ी सख्त जान है यह पब्लिक प्यारे। बिना शिकायत के जिये चली जाती है और इलेक्शन के वक्त वादों के एवज बच्चों की तरह खुश होकर वोट देने को मचल उठती है, जानती है कि कुछ नहीं बदलेगा। उसे यूँ ही घुट-घुट कर जीना है और फिर एक दिन बेगोरो-कफन मर जाना है। मगर फिर भी़… तो क्यों तुम इनके वास्ते शोकाकुल होते हो, क्यों स्वयं अपने दुख का कारण बनते हो?

चुनाव जीतने के लाभ बाद में कहूँगा, पहले बिना कुछ किये चुनाव हार जाने के फायदों का श्रवण करो। खुदा-न-ख्वास्ता तुम चुनाव हार गये तो भी हर प्रकार से फायदे में ही रहोगे। दस लोग तुम्हें पहचानने लगेंगे। अफसर तुम्हें खड़े-खडे यूँ ही आम जनता की तरह नहीं टरका देंगे। कुर्सी पेश करेंगे, चाय मंगवायेंगे और तुम्हारे काम बआसानी हो जाया करेंगे। सत्ता पक्ष के बराबर तो नहीं, पर फिर भी काफी ठेके आदि तुम्हें मिल ही जायेंगे वगैरा-वगैरा।

और अगर जीत गये तो कहने ही क्या! उसका तो आनन्द ही अलग है, ब्रह्मानंद सहोदर हैं। उसका स्वाद तुमने अभी चखा ही कहाँ। तुम्हें पद, सम्मान, कीर्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। दुनिया से विदा होओगे जब तुम्हारा सीना खाली होगा ख्वाहिशों से। सोचो, कितनी बड़ी बात है। वर्ना ज्यादातर लोग हजारों अधूरी तमन्नायें लिये-लिये मर जाते हैं। इसलिये उठो और सभा के समक्ष विशेषतौर से तैयार भाषण थोड़ा और नमक-मिर्च लगाकर पढ़ो। यकीन जानो तुम कतई पाप के भागीदार नहीं होओगे।

मोहल्लेवालों, रिश्तेदारो और यार-दोस्तों का लिहाज मत करो। शर्म और संकोच का त्याग करो। यह जो तात्कालिक तौर पर (पता नहीं क्यों) तुम्हारे भीतर एक किस्म का वैराग्य-सा उत्पन्न हो गया है, इसे तर्क की कसौटी पर परखो। भावुकता में मत बहो। जिस प्रकार बलात्कार की शिकार महिला से भरी अदालत में वकील बहस की आड़ में बलात्कार करता है, उसी तरह निर्दयतापूर्वक अपने आप से तर्क करो। तुम देखोगे कि तुम्हारी बातें कितनी हास्यास्पद हैं।

सोचो कि जब तुम जीत जाओंगे तो तुम्हारे क्या ठाठ होंगे। दुनिया की हर अय्याशी तुम्हारे कदमों में होगी। याद करो जब तुम राजधानी आये थे और मेरे सरकारी अवास में ठहरे थे, मैंने अपनी व्यस्तताओं के बावजूद तुम्हारे कैसे ऐश करवाये थे। अपने किये की तारीफ करना ठीक नहीं। तुम्हे याद तो होगा। उस मात्र पन्द्रह दिनों के वक्त को याद करो और हिसाब लगाओ कि पाँच साल में कितने पखवाड़े होते हैं! चुनाव के समय जो थोड़ी-बहुत मेहनत करनी पड़ती है उसे मत देखो, उसके फलों पर नजर रखो, क्योंकि तुम एक मेहनतकश वर्ग के नहीं, बल्कि उस वर्ग द्वारा किये गये श्रम से उत्पन्न मलाई चाट जाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि हो। इसलिये सिर्फ मलाई पर गिद्ध दृष्टि जमाये रखो। मेहनत करना दूर उसके बारे में सोचो भी मत। मात्र फलों के बारे में सोचो। इससे तुम्हें सभा को संबोधित करने की प्रेरणा मिलेगी।

फिर एक समय ऐसा भी आयेगा तुम्हारे कैरियर में कि जब यह नाम मात्र की मेहनत भी तुम्हें नहीं करनी पडे़गी। तुम निर्विवाद चुन लिये जाओगे। धनबल और बाहुबल के योग से या ऐसे पदों पर बिठा दिये जाओगे जिन्हें जनता नहीं चुनती। तब तुम कर्म बंधन सहित बाकी सभी किस्म के बंधनों से मुक्त हो जाओगे। इसी को ज्ञानियों ने परमपद की अवस्था कहा है।

इस अवस्था तक पहुँचने के लिये आवश्यक है कि तुम्हें पब्लिक का हानि-लाभ, जीवन-मरण, भूख-कुपोषण, लाचारी-बेकारी तथा शोषण आदि कुछ भी न व्यापता हो। यह एक उच्च स्थिति है जो कडे़ और निरंतर अभ्यास से कठिन होने के बावजूद संभव है। क्यों नहीं तुम अभी से यह एक्सरसाइज शुरू कर देते।

और तुमने अभी भाषण न देने के जो कारण कहे, वह कोई कारण नहीं, कोई मुद्दा नहीं। तुम्हें हो क्या गया अर्जुन सिंह मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। मसलन तुम जिक्र कर रहे थे डॉ. पंत के प्रसूति गृह का तो मेरे भोले भाई, जरा मुझे यह तो समझा दो कि आज के जमाने में लोग जच्चा-बच्चा केन्द्र खोलते क्यों हैं? तुम्हें क्या लगता है कि वहाँ डॉक्टरों के रूप में फरिश्ते बसते हैं! जिन्हें प्राणी मात्र की सेवा और जीवन बचाने की शपथ दिलवायी जाती है, तुम क्या सोचते हो कि मात्र सामान्य जच्चगी करवा के डॉक्टर साहबन और उनका स्टाफ रोटी खा लेगा। अवैध गर्भपात नहीं होंगे और सामान्य जच्चगी को अगर सिजेरियन केस नहीं बनाया जायेगा तो कैसे चलेगा भैया। ऐसा अगर न करें तो पढ़ाई में जो पैसा लगा वही वसूल नहीं कर पायेंगे अपने पूरे कैरियर में। क्या फायदा! छोड़ो प्राइवेट क्लीनिकों की बात, सरकारी अस्पतालों में तक यहीं सच होता है। तुम्हें पता होना चाहिये, एक बच्ची के बाप हो। कोई जरूरत नहीं किसी डॉक्टर से शर्माने की, क्योंकि तुम उन्हें केस न दो तो उनका क्लीनिक कितने दिन चल पायेगा।

विवाहेतर संबंधों की तुमने अच्छी कही। तुम्हारी इस बात पर हसूँ कि रोऊँ ?  ऐसी बातों पर सोच कर अगर वक्त जाया करोगे तो कर ली तुमने राजनीति।

देखो, प्राचीन पुस्तकों में ज्यादातर बातें परस्पर विरोधाभासी हैं। मसलन भाई लोग औरत को सौ बेटों की माँ होने का आशीर्वाद देते हैं और पुरुष से कहते हैं कि बेटा, तू जाकर इन्द्रिय निग्रह कर, जितेन्द्रिय बन! भैया मेरे, यह किस लोक की बायलॉजी पढ़ा रहे हो? अरे यार कार्य कारण के नियम का तो कुछ ख्याल करो!  लेकिन पुरुष इस चक्कर में न तब फँसा, न आज आता है। देवताओं तक ने यह बात नहीं मानी। हाँ, पुरुष ने स्त्री पर उल्टा जरूर लागू कर दिया इसे। और अच्छा हुआ कि औरत ने इसे मान लिया और फिर धीरे-धीरे यह उसका स्वभाव बन गया। वर्ना सोचो तुम्हारी बीवी तुम्हें रंगे हाथों पकड़ चुकी है, फिर भी उसने बदला लेने के लिये वही सब नहीं किया जो तुम कर रहे थे या तुम्हारे मुँह पर थूक कर चली नहीं गयी… तुम गधे हो अर्जुन सिंह। ऐसी बातों का जिक्र किया जाता है कहीं। मैंने सुनाये तुम्हें कभी ऐसे किस्से! एक बात गाँठ बाँध लो, कत्ल के बाद लाश के पहलू में खंजर भूल कर भी मत भूल आना। वर्ना पश्चिम के एक राष्ट्राध्यक्ष की तरह न सिर्फ भारी बदनामी होगी, बल्कि मोटी रकम भी हाथ से जायेगी। जो पकड़ा गया उसी को चोर कहकर दौड़ाने की परंपरा अति प्राचीन है। अनदेखा चोर पितरों की श्रेणी में आता है।

अपनी पहुँच और प्रभाव का इस्तेमाल व्यक्‍ति‍गत हितों के लिये करने में भला गलत क्या है, सुनूँ तो जरा। तुम्हारी पत्नी तुम्हारे प्रभाव के चलते नौकरी पा गई तो इसमें सर पीटने की क्या बात है! राजधानी तक जिसकी पहुँच है, ऐसा व्यक्ति नौकरी अपनी बीवी को नहीं तो क्या मोहल्ले की गरीब विधवा को दिलवायेगा? बर्तन कौन मलेगा तुम्हारे घर मैं? घर फूँक तमाशा देखने वालों के लिये राजनीति नहीं है। ऐसे लोगों को मेरा मशवरा है कि जाकर चीटियों को बूरा खिलायें या मछलियों को चारा चुगायें।

स्वस्थ होने के बाद मरीज डॉक्टर के पास क्यों जायेगा रे! राजनीति में अगर ऊँचे जाना है तो पब्लिक को घोड़ा समझो और खुद को सवार। यह एक अत्यंत सरल किंतु गोपनीय विधि है, एकाग्र हो कर सुनो। एक लंबा बाँस लेकर उसके अगले सिरे पर आश्वासन रूपी घास बाँध लो। अब घोड़े पर सवार होकर घास को भूखे घोड़े की नाक के दो फुट आगे लहराओ। घोड़ा घास की और लपकेगा। डंडा तुम्हारे हाथ में है, घास की दूरी घोड़े को मुँह से दो फुट बनाये रखो। घोड़ा घास की उम्मीद में दौड़ा चला जायेगा़। घास लगे न भूसा, मुफ्त की सवारी। खड़ी चढ़ाई में भी गाड़ी न्यूट्रल में चढ़ जाती है इस विधि से!

नियम, कानून, व्यवस्था के लिये तुम क्यों मरे जा रहे हो। तुम्हारा कहीं काम अटका पड़ा है या कोई दिक्कत है तो बताओ! अरे अर्जुन सिंह, अनाड़ी की बंदूक! गोली बंदूक की नाल से निकलती है, बट से नहीं। कानून बनाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि होकर तुम उससे डरते हो! अपने आपमें एक लतीफा हो तुम भी। कानून शासितों की चमड़ी से बनाया जाता है और उन्हीं पर फटकारा जाता है। ताकि पब्लिक हद में रहे, क्यू न तोडे़… अब तुम ही कहो कि जो कोड़ा हाथ में लेकर कोडे़ से डरे वह बेवकूफों का सरदार हुआ कि नहीं?

इतिहास की किस किताब में लिखा है कि कानून बनाने वालों पर उन्हीं का बनाया लागू हुआ? भूख से बेहाल होकर रोटी का टुकड़ा चुराने वाले को पुलिस भले ही पोटा के तहत उल्टा लटका दें पर करोड़ों डकार जाने वाले राजनेता का पुलिस क्या कर लेगी? मीडिया में मौजूद कुछ सिरफिरों ने अगर ज्यादा ही हल्ला मचाया, मामला तूल पकड़ गया तो भी क्या होना है! ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि बंगले पर जाकर प्रतीकात्मक गिरफ्तारी के बाद वहीं पर जमानत दे दी जायेगी। केस की सुनवायी अगर हुई तो इतनी लंबी होगी कि फैसला होने तक नेताजी की तस्वीर में माला टँग चुकी होगी।

अर्जुन सिंह अपलक, मुँह फाड़े और सम्मोहित सा एकटक आलाकमान को देखता रहा।

लाओ पानी की बोतल दो। गला सूख गया तुम्हें समझाते-समझाते। और यूँ बेवकूफ की तरह मुँह खोल कर मत बैठो, देखते नहीं मक्खियाँ कितनी घूम रहीं हैं यहाँ। क्या कुछ और पूछना चाहते हो? आलाकमान ने रुक कर पानी पिया।

नहीं-नहीं है श्‍वेत वस्त्रधारी। पूछने को अब बाकी ही क्या रहा! मैं जानता हूँ कि आप अनंत काल तक बोलते रह सकते हैं। परन्तु मैं सब समझ गया, क्योंकि एकदम ही जड़ बुद्धि तो मैं भी नहीं हूँ। आपने जिस तरह मुझे ब्रीफ किया उससे मुझे बिजली का नंगा तार छू जाने की सी अनुभूति हो रही है। समझ नहीं पा रहा हूँ कि अपने जजबात हँस के व्यक्‍त करूं कि रो कर! मेरी सारी इंद्रियाँ चैतन्य हो उठी हैं।

मैं तो आपको एक राजनीतिज्ञ ही समझता था, आप तो सर्वज्ञ हैं। जिस तरह आपने मेरी शंका का समाधान किया वह अद्भुत है। कोई दूसरा तत्वज्ञानी इन विषयों पर बोलना शुरू करता तो अठारह-उन्नीस दिन से पहले क्या ही चुप होता। आपने अठारह मिनट बमुश्किल लिये! मेरे ज्ञान की फ्लॉपी छलछला उठी है। एक भी शब्द अगर आप और बोले तो मेरे दिलो-दिमाग से सब कुछ डिलीट हो जायेगा। मेरा नाम तक मुझे याद नहीं रह जायेगा। नहीं सर, मुझे कह लेने दीजिये कि मैं संपूर्ण जगत ही आप में समाया हुआ महसूस कर रहा है। आप मार्शल आर्ट में ब्रूस ली है, पोल वॉल्ट में सर्गेई बुबका,  हॉकी में ध्यानचंद, फुटबॉल में पेले, क्रिकेट में ब्रेडमैऩ… लोकगायकों में तीजन बाई और शास्त्रीय गायकों में कुमार गंधर्व भी आप ही हैं।

राजनीति में अपनी मिसाल आप हैं… उफ! अर्जुन सिंह को शब्द कम पड़ गये और उसने आला कमान के पैर पकड़ लिये।

चलो अच्छा हुआ। तुम्हारा अज्ञानताजनित मोह दूर हो गया। अब तुम विदाउट एनी हैजिटेशन न सिर्फ सभा को संबोधित करोगे, बल्कि इलैक्शन जीत कर भी दिखाओगे।

आलाकमान मोबाइल पर कॉल गर्ल रैकेट चलाने वाले एक आला अफसर को एस.एम.एस. करते हुए प्रसन्नतापूर्वक बोले, चलो, अब मंच पर चलें। भीड़ को बिठाये रखने के चक्कर में तुम्हारा छुटभय्या उल्टा-सीधा बकने लगा है।

(‘माफ करना हे पि‍ता’ से साभार)

पुस्‍तक – माफ करना हे पि‍ता

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शिक्षा मुद्दा क्यों नहीं : अनुराग

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लोकसभा चुनाव का समर शिखर पर है। देश की हर छोटी-बड़ी पार्टी तरह-तरह के लोकलुभावन वादों और बड़े-बड़े इरादों के साथ मतदाताओं के बीच में हैं। राजनेता मंचों से एक-दूसरे पर आरोप लगाने के साथ ही तरह-तरह के वादे कर रहे हैं, लेकिन शिक्षा पर चुप्पी साधे हुए हैं। किसी के भी मुख्‍य एजेंडे में नहीं है कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी चाहिए और किस तरह का ढांचा तैयार किया जाए। व्यवस्था में जो खामियां हैं, उन्हें कैसे दूर किया जाए और कैसे समान शिक्षा की ओर बढ़ सकते हैं। शिक्षा को लेकर कि‍सी भी राजनीति‍क दल के भीतर न तो चर्चा है और न आम जनता के बीच कोई चुनावी मुद्दा है। हमारे तमाम बुद्धिजीवी भी देश-विदेश के न जाने किन-किन मुद्दों को उछाल रहे हैं, लेकिन शिक्षा पर वे भी बात नहीं कर रहे हैं!

निजीकरण की सुनामी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने में तुली है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं रही कि ग्लोबलाइजेशन के नाम पर राजनीतिक पार्टियां देश की विभिन्न व्यवस्थाओं और संस्थाओं में नि‍जीकरण को बढ़ा रही हैं। सरकारी शिक्षा व्यवस्था भी इनमें एक है। सरकारी स्कूलों को बदनाम किया जा रहा है, नई स्कूल खोले नहीं जा रहे हैं और जहां खुले भी उन्हें बंद किया जा रहा है। पीपीपी मॉडल अर्थात सार्वजनि‍क-नि‍जी सहभागि‍ता के चोर दरवाजे से शि‍क्षण संस्‍थान व्यावसायिक घरानों को सौंपा जा रहे हैं। इससे शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और कुल मिलाकर यह एक धंधा बन गई है। इसलिए जो लोग इस क्षेत्र में आ रहे हैं, वे किसी सामाजिक सरोकार के लिए नहीं, बल्कि मोटी कमाई के लिए आ रहे हैं। कोढ़ की खाज यह कि इस देश के उच्च वर्ग के देखा-देखी मध्य वर्ग के लिए भी स्कूल स्टेटस सिंबल बन गए हैं। उसे भी सरकारी स्कूलों में खामियां और निजी स्कूलों में ज्ञान-विज्ञान नजर आ रहा है। इसलिए वह अपनी आर्थिक स्थिति से भी अधिक महंगे निजी स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाता है, और यहीं से भ्रष्टाचार की भी नींव पड़ जाती है। आर्थिक संसाधन कम हैं। सरकारी स्कूल हैं नहीं। ऐसे में कमजोर आर्थिक स्‍थि‍ति‍ के बावजूद बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूलों की शरण में जाना मजबूरी हो जाती है। जाहि‍र है, आर्थिक संसाधन पूरे करने का एक ही जारिया है- जैसे भी हो अधि‍काधि‍क पैसा कमाओ या बनाओ। जब बच्चा हर महीने फीस के लिए और हर साल वार्षिक चार्ज के लिए पिता को जद्दोजहद करते हुए देखता है तो उसके मन में क्या बातें घर करेंगी, यह समझा जा सकता है। दूसरी ओर असमान शिक्षा छुटपन से ही वर्ग की रेखा खींच देती है। बड़े होने पर यह रेखा मिटने के बजाय और बड़ी हो जाती है।

यह बात बार-बार कही जाती है कि बच्चे के जीवन की नींव बचपन यानी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही पड़ जाती है। जैसी शिक्षा वह पाता है और जैसे माहौल में रहता है, बच्‍चा वैसा ही बनता है। गली-गली में खुले निजी स्कूलों में पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रबंधन की मनमर्जी पर नि‍र्भर करती है। कौन-सी किताबें पाठ्यक्रम में लगेंगी, शिक्षकों की नियुक्ति, स्कूल में बच्चों को एडमिशन देने का मापदंड, स्कूल की फीस व वार्षिक चार्ज आदि के लिए स्कूल प्रबंधन कौन-से तौर-तरीके अपनाते हैं, समझना मुश्किल है। ऐसे में इन स्कूलों में कैसी शिक्षा बच्चों को मिल रही है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इतना सब होने के बाद भी शिक्षा का चुनाव में मुद्दा न बनना बेचैनी उत्पन्न करता है। ऐसा लगता है कि समाज में समानता और भ्रष्‍टाचार को दूर करना आदि मुद्दे राजनेताओं के लिए लोगों को भ्रमि‍त करने के लिए नारे मात्र हैं। चिंताजनक यह भी है कि आम लोगों की राजनीति करने का दावा करने वाली पार्टियां और बुद्धिजीवी भी शिक्षा के मुद्दे पर मौन हैं।