Archive for: March 2014

रचनाकार समस्‍याओं के समाधान की कोशिश करें

पुस्‍तक का वि‍मोचन करते (बाएं से) संजीव, दि‍नेश कुमार शुक्‍ल, प्रेमपाल शर्मा, अरुण चंद्र राया और अनुराग।

‘शि‍क्षा, भाषा और प्रशासन’ का वि‍मोचन करते (बाएं से) संजीव, दि‍नेश कुमार शुक्‍ल, प्रेमपाल शर्मा, अरुण चंद्र राय और अनुराग।

नई दिल्ली: एक लेखक होने के लिए सिर्फ लिखना ही नहीं, बल्कि समाज के सरोकारों से जुड़कर उसकी समस्याओं के समाधान की कोशिश करना भी है। यह बात गांधी शांति प्रतिष्ठान,  नई दिल्ली में पुस्तकों के विमोचन के दौरान आयोजित गोष्ठी में सामने आई। मैत्री स्टडी सर्किल के तत्‍वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में संजीव के उपन्यास ‘अहेर‘ का लोकार्पण वरिष्‍ठ कवि दिनेश कुमार शुक्‍ल, प्रेमपाल शर्मा के कथा संग्रह ‘मेरी प्रिय कथाएं’ का लोकार्पण वरिष्‍ठ आलोचक सुशील सिद्धार्थ और अनुराग के साथ प्रेमपाल शर्मा के साक्षात्कार की पुस्तक ‘शिक्षा, भाषा और प्रशासन’ का लोकार्पण बांग्‍ला लेखिका अमृता बेरा ने किया।

दिनेश कुमार शुक्‍ल ने ‘अहेर’ में अवधी के शब्‍दों के रचनात्‍मक इस्‍तेमाल पर खुशी जाहिर की। साथ ही उसमें उठाए गए जाति, धर्म और असमानताओं के जुझते संघर्ष की भी चर्चा की।

आलोचक विवेक मिश्र ने कहा कि ‘अहेर’ में इतनी उपकथाएं हैं कि उनके आधार पर कई उपन्‍यास लिखे जा सकते हैं। प्रेमपाल शर्मा ने संजीव के कथाकर्म की तारीफ करते हुए उन्‍हें मौजूदा पीढ़ी का सर्वश्रेष्‍ठ कथाकार बताया। उन्‍होंने कहा कि संजीव के विराट कथा संसार में पूरे देश के गरीब आदिवासियों की आवाज सुनी जा सकती है।

प्रेमपाल शर्मा के कहानी संग्रह ‘मेरी प्रिय कथाएं’ पर बोलते हुए दिनेश कुमार शुक्‍ल ने प्रेमपाल शर्मा को मध्‍यम वर्ग की मानसिकता के पाखंड को विध्‍वंस करने वाला अप्रति‍म कथाकार बताया। उन्‍होंने इस पर चिंता जाहिर की इतनी अच्‍छी कहानियां लिखने वाला चुप कैसे हो गया। हालांकि उन्‍होंने इस पर खुशी जाहिर की कि उनका लेखन समाज के दूसरे पक्षों से ज्‍यादा बेहतर ढंग से सक्रिय है।

वरि‍ष्‍ठ आलोचक सुशील सिद्धार्थ ने प्रेमपाल शर्मा की कहानियों और साक्षात्‍कार को जोड़ते हुए कहा कि या तो कहानी ऐसे लिखें वरना अन्‍य मसले भी महत्‍वपूर्ण है, बल्‍कि कहानियों से ज्‍यादा। उन्‍होंने कुछ युवा लेखकों के लेखन पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि वे कहानी क्‍यों और किसके लिए लिख रहे हैं।

युवा आलोचक दिनेश कुमार ने कहा कि मध्यम वर्ग की सबसे तीखी आलोचना मुक्तिबोध ने की है। इसके बाद मध्यम वर्ग की घनघोर आलोचना प्रेमपाल शर्मा के साहित्य में देखने को मिलती है। वह अपनी रचनाओं से इस वर्ग की पाखंडता,  क्रूरता, स्वार्थीपन को उजागर करते हैं।

‘शिक्षा, भाषा और प्रशासन’  पर बोलते हुए अनुराग ने इस पर चिंता व्यक्‍त की है कि शिक्षा तेजी से निजी हाथों को सौंपी जा रही है। इस कारण लगातार महंगी होती जा रही है। आने वाले कुछ वर्षों में स्थिति यह हो जाएगी कि गरीब और निम्न तबके की ही नहीं,  मध्यम वर्ग की पहुंच से भी शिक्षा दूर हो जाएगी। इस भयावह स्थिति को रोकने के लिए सभी को एकजुट होकर विरोध करना होगा। इसके अलावा समाज में भ्रष्‍टाचार सहि‍त जो अन्‍य सामाजि‍क बुराइयां का मूल कारण सही शि‍क्षा का अभाव है। जि‍स तरह की नींव पडे़गी, उसी तरह बच्‍चे का वि‍कास होगा। इसलि‍ए प्रारंभि‍क शि‍क्षा पर वि‍शेषतौर से ध्‍यान देने की जरूरत है।

उपेंद्र सत्‍यार्थी ने बताया कि‍ एक दि‍न मैंने क्‍लास में बच्‍चों से पूछा कि‍ शि‍क्षा का उद्देश्‍य क्‍या है, तो एक ने कहा कि‍ पैसे कमाना। दूसरे बच्‍चे ने जवाब दि‍या कि‍ अच्‍छा इंसान बनना। पहले का कहना था कि‍ कोई भी काम पैसे के बि‍ना नहीं हो सकता। पढ़ भी तब रहे, जब हमारे पास पैसे हैं। दूसरे से मैंने उसके जवाब के बारे में पूछा तो उसने कहा कि‍ कि‍ताब में पढ़ा था इसलि‍ए यह जवाब दे दि‍या। अन्‍यथा पहले वाले की ही बात सही है। सभी कामों के लि‍ए पैसा जरूरी है। उन्‍होंने कहा कि‍ साक्षात्‍कार की इस पुस्‍तक में पहला सवाल ही यही है कि‍ शि‍क्षा का मूल उद्देश्‍य क्‍या है ? शि‍क्षा और भाषा से जुडे़ कई सवालों का प्रेमपाल शर्मा ने तर्कसंगत जवाब दि‍ए। यह कि‍ताब शि‍क्षकों और अभि‍भावकों के लि‍ए बेहद उपयोगी है।

कार्यक्रम का संचालन कथाकार विवेक मिश्रा ने किया। धन्‍यवाद ज्ञापन अरुण चन्‍द्र राय ने दिया। इस अवसर पर प्रेमचंद सहजवाला, शालिनी गर्ग, आशिमा कुमारी,  सुरेंद कुमार आदि उपस्‍थि‍त थे।

प्रस्‍तुति‍ : आशि‍मा कुमारी 

खेलें कहाँ : मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

शि‍क्षा जगत से जुडे़ युवा लेखक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने वि‍द्यालयी शिक्षा के लि‍ए प्रचुर मात्रा में लेखन और संपादन कि‍या है। इसके अलावा उनकी कहानी, कविता, नाटक, व्यंग्य, समीक्षा आदि‍ वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हुए हैं। उनकी बाल कहानि‍यों का मराठी में अनुवाद हुआ है। उनकी बाल कहानी-

दिव्या ने स्कूल बैग कंधे से उतारा और सीधे दरवाजे की ओर जाने लगी। उसकी मम्मी ने पीछे से टोकते हुए पूछा, ‘‘दिव्या ! कहां जा रही हो। पहले कपड़े बदलो। मुंह हाथ धो लो। कुछ खा-पी लो। तब जाना।’’

लेकिन दिव्या ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। दिव्या की मम्मी भी पीछे-पीछे चल दी। नजदीक ही कॉलोनी का पार्क था। कॉलोनी के कुछ बच्चे पार्क के बाहर खड़े थे। दिव्या उन बच्चों के साथ खड़ी थी। दिव्या की मम्मी हैरान थी कि आखिर बात क्या है। दिव्या ने आज से पहले कभी ऐसा नहीं किया था। वह स्कूल से आती है तो सबसे पहले अपने बैग से वो सारी कॉपी-किताबें निकालती है, जिनमें उसे होमवर्क करना होता है। फिर वह कपड़े बदलती है। मुंह-हाथ धोकर इत्मीनान से कुछ खाती है। स्कूल की रोचक बातें भी बताती है। होमवर्क निपटाने के बाद ही खेलने जाती है, लेकिन आज तो उसने घर आते ही बैग पटका और सीधे पार्क की ओर आ गई।

‘‘जरा सुनूं तो आखिर ये बच्चे आपस में क्या बात कर रहे हैं?’’ दिव्या की मम्मी पार्क के कोने में चुपचाप खड़ी हो गई और सावधानी से बच्चों की बातें सुनने लगीं। दिव्या के अलावा कॉलोनी के बच्चों में श्रेया, आकांक्षा, चिक्की, अभय, अनुभव और आदित्य भी खड़े थे। अभय जोर से बोला, ‘‘घर के अंदर तो खेलने का सवाल ही नहीं होता। कॉलानी में भी सब हमें टोकते रहते हैं। एक पार्क ही तो है जहां हम खेलते हैं।’’ अब दिव्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘पार्क का ताला तोड़ देते हैं।’’

श्रेया ने कहा, ‘‘उससे क्या होगा? ताला तो दूसरा आ जाएगा।’’

चिक्की ने पूछा, ‘‘फिर क्या करें? यूं ही खड़े रहें क्या?’’ तभी किसी की नजर दिव्या की मम्मी पर पड़ गई। वे सब चुप हो गए। दिव्या की मम्मी भी उनके झुण्ड में शामिल हो गई।

‘‘ये सब क्या है? दिव्या क्या हुआ?’’ दिव्या की मम्मी ने नाराज़गी से पूछा। तब तक श्रेया और अनुभव की मम्मी भी वहां आ गईं। दिव्या को छोड़कर बाकी सभी अपने स्कूल बैग के साथ वहां खड़े थे। श्रेया की मम्मी दूर से ही चिल्लाई, ‘‘श्रेया। स्कूल की छुट्टी हुए आधा घंटा हो गया है। तू यहां क्या कर रही है?’’

श्रेया ने जैसे कुछ सुना ही नहीं था। वह दिव्या की मम्मी से बोली-‘‘आंटी। ये पार्क में ताला किसने लगाया? सुबह तो नहीं था। हम सब ताला देखकर यहां रुके हैं।’’

श्रेया की बात पर ध्यान न देते हुए अनुभव की मम्मी लगभग चीखी, ‘‘ताला लग गया तो कौन-सा आफत आ गई। तुम बच्चों को सीधे पहले घर आना चाहिए। मैं तो घबरा ही गई कि आज बच्चे अब तक घर क्यों नहीं आए। चल अनुभव। तू घर चल पहले। तूझे घर में बताती हूं।’’

दिव्या की मम्मी ने हस्तक्षेप किया, ‘‘एक मिनट भाभी। ज़रा मैं भी तो सुनूं ये बच्चे आपस में खुसर-पुसर कर क्यों रहे हैं। वाकई! पार्क में ताला तो लगा है।’’

अब तक चिक्की की मम्मी भी आ गई थी। चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘मैं बताती हूं। आज सुबह ही कॉलोनी के शर्मा अंकल ने यहां ताला लगाया है। अब कॉलोनी वाले जगह-जगह पर अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते हैं। सड़क तक गाडि़या निकालने में सभी को दिक्कत होती है। शर्मा अंकल कह रहे थे कि सन्डे को सभी कालोनी वालों की मीटिंग होगी। अब सब अपनी गाडि़या पार्क के अंदर खड़ी करेंगे।’’

दिव्या बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तो आंटी फिर हम खेलेंगे कहां? पार्क तो खेलने के लिए है।’’

अभय बोला, ‘‘घर में खेलने की मनाही है। सड़क में जाने नहीं देते। कॉलोनी में खेलो तो सब कहते हैं शोर मत करो। ले-दे कर एक पार्क बचा था तो उसमें ताला लगा दिया। किसी ने हमसे पूछा भी नहीं। आज तो मन्डे है। सन्डे तो दूर है। तब तक हम खेलेंगे नहीं क्या? अब हम कहां जाएंगे?’’

चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘तो जरूरी है कि तुम खेलो। घर में रहो। घर के अंदर खेलने वाले खेल खेलो। पढ़ाई करो।’’

चिक्की मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘क्या मम्मी। आपको तो हमे सपोर्ट करना चाहिए। महीने में आपकी एक किटी पार्टी घर में क्या होती है आप कितनी परेशान हो जाती हो। चार दिन से तैयारी में लग जाती हो। घर के अंदर कौन से खेल खेलूंगी मैं। किसके साथ? आप मेरे दोस्तों को तो घर में आने भी नहीं देती।’’

यह सुनकर चिक्की की मम्मी सकपका गई। दिव्या भी चुप नही रही। वह बोली, ‘‘शर्मा अंकल अपने आप को क्या समझते हैं। हम यहां से तब तक नहीं जाएंगे जब तक पार्क का ताला नहीं खुलता है।’’

दिव्या की मम्मी ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘चुप! ऐसा नहीं कहते।’’

‘‘जब बड़ों ने फैसला ले ही लिया है। तो तुम कौन होते हो उस पर बाते बनाने वाले। चल आकांक्षा यहां से।’’ आकांक्षा की मम्मी ने कहा।

आकांक्षा ने कहा, ‘‘मम्मी एक मिनट। हम बच्चों की स्कूल बस सड़क के बाहर खड़ी रहती है। कॉलोनी के अंदर नहीं आती। गाडि़यां भी तो सड़क पर खड़ी हो सकती हैं। पार्क के अंदर क्यों? हम बच्चों की तो कोई गाड़ी नहीं है। बड़ों की समस्या है तो बड़े जानें। हमें हमारा पार्क खाली चाहिए।’’

दादा-दादी जैसे कई हैं, जो सुबह-शाम इस पार्क में टहलते हैं। उनका क्या होगा। क्या वे हर रोज शर्मा अंकल से ताला खुलवाएंगे?’’ अब आदित्य ने जोर से कहा।

तभी शर्मा अंकल वहां आ गए। वह मुस्कराते हुए बोले, ‘‘क्या हो रहा है यहां? मेरे खिलाफ क्या-क्या बोल रहे हो तुम बच्चे लोग? ज़रा मैं भी तो सुनूं।’’

दिव्या की मम्मी बोली, ‘‘नमस्ते भाई साहब। ये बच्चे पार्क को लेकर परेशान हैं? इनका कहना है कि हम कहां खेलेंगे?’’

शर्मा अंकल पार्क के गेट की ओर बढ़ चुके थे। उन्होंने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘ये लो। मेरे बच्चों ने अपने प्रिंसिपल सर से मेरे आफिस फोन तक कर दिया। यही नहीं, आज जब मैं उन्हें लेने स्कूल गया तो वे मेरे साथ मेरी कार में आए ही नहीं। उनका कहना है कि वे आज के बाद मेरी कार पर ही नहीं बैठेंगे। सॉरी बच्चों। हम बड़े भी कई बार बच्चों जैसी हरकत कर डालते हैं। पार्किंग के लिए हम कुछ ओर सोचेंगे। पार्क में ताला कभी नहीं लगेगा। बस।’’

बच्चे ताली बजाने लगे। लेकिन दिव्या ने कहा, ‘‘बच्चों जैसी हरकत से आप क्या कहना चाहते हैं अंकल?’’

शर्मा अंकल झेंप गए। फिर मुस्कराते हुए बोले, ‘‘यही कि जैसे आप सब अपना सारा काम छोड़कर भरी दुपहरी में यहां खड़े हैं। यह बातें तो शाम को भी हो सकती थी। मुझे भी तो ऑफिस से यहां आना पड़ा। मुझे भी तो मेरे बच्चों ने यही कहा कि जब तक पार्क का ताला नहीं खुलेगा, वे न खाना खाएंगे न ही होमवर्क करेंगे। अब तुम सबसे पहले एक काम करो। मेरे घर जाओ और मेरे बच्चों को बताओ कि ताला खुल गया है। ये लो ताला और चाबी।’’

दिव्या ताला-चाबी पर झपटी और सारे के सारे बच्चे शर्मा अंकल के घर की ओर दौड़ पड़े। बच्चों की मम्मी एक-दूसरे के मुंह ताक रही थीं।

सांस्‍कृतिक विलाप : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

प्रेमपाल शर्मा

क्‍या रोने और विलाप को भी संस्‍कृति के खाँचे में फिट किया जा सकता है? यदि अभी तक नहीं किया तो कम-से-कम स्‍कूल, कॉलेजों में सांस्‍कृतिक कार्यक्रम के नाम पर होने वाले आयोजन के लिए तो एक नयी श्रेणी बनानी ही पड़ेगी। मैं पश्‍चि‍मी उत्‍तर प्रदेश का रहने वाला हूं । इसलिए कुछ जड़ों का मोह, कुछ हवाई ढंग से ही सही जमीनी यथार्थ को जानने की ललक या कहिए कि दिल्‍ली के बंद सेमीनारों से बाहर निकलने की बेचैनी, इसलिए जब भी बुलावा आता है तो मैं तुरंत स्‍कूल-कॉलेजों के स्‍थापना दिवस, वार्षिक दिवस के नाम पर होने वाले इन कार्यक्रमों में चल देता हूं । हर बार की तरह शुरुआत एक जैसी। यदि समय दस बजे का है, तो कार्यक्रम की हलचल घंटे दो घंटे बाद ही शुरू होगी। कारण आप तो पहुँच गये (उनकी नजरों में फालतू होंगे), लेकिन आप अकेले मुख्‍य अतिथि नहीं हैं- क्षेत्र के एम.पी., एम.एल.ए. विशि‍ष्ट अतिथि हैं, तो जिले का कलैक्‍टर, एस.पी., शिक्षा अधिकारी स्‍कूल-कॉलेज का चेयरमैन भी अपनी-अपनी हैसियत से वहाँ पहुँचेंगे और भारत की महान सांस्‍कृतिक, राजनीतिक परम्‍परा के अनुसार जिसकी हैसियत सबसे ज्‍यादा है, वही सबसे बाद में पहुँचेगा।

चलो, जैसे-तैसे चीखते फिल्‍मी गानों के शोरगुल के बीच कार्यक्रम शुरू होता है । लेकिन पूरे माहौल में समाई हिन्‍दी के बीच अचानक यह मिमियाती-सी अंग्रेजी की आवाज कहाँ से आ गई ? बावजूद इसके कि नौजवान विद्यार्थी ने इस अवसर पर अंग्रेजी बोलने का खूब अभ्‍यास किया है, फिर भी फाँक नजर आ ही रही है । जो दिल्‍ली के जितना नजदीक है, अंग्रेजी का रंग उतना ही चटक। ग्रेटर नोएडा के स्‍कूल की दीवारों पर जो भी ब्रह्म वाक्‍य लिखे थे, वे सब अंग्रेजी में थे- कक्षाओं के अंदर भी और बाहर भी। मानो वहाँ के जाट, गुर्जर और उनके बच्‍चे हिन्‍दी तो जानते ही नहीं! दरअसल दीवारों पर लिखी इन्‍हीं इबारतों से तो पैसे वसूले जाते हैं और नि:संदेह इसमें पूरी व्‍यवस्‍था शामिल है। जिन स्‍कूलों में देवनागरी में भी लिखे हैं, इनकी दूसरी प्रिय भाषा संस्‍कृत है । तपो न दानम ज्ञानम न शीलम, विधा ददाति विनयम जैसे आदर्शों से लदी हुई । इस क्षेत्र की विनयशीलता का परिचय तो दिल्‍ली में पुलिस या बस कंडैक्‍टर के जबान खोलते ही लग जाता है ।

चलिए संस्‍कृति के असली नाटक को देखते हैं। शीर्षक ‘मॉं तुझे सलाम’। मंच पर भव्‍य तिरंगा झंडा लिये एक विद्यार्थी खड़ा है- सेना की वर्दी में। उसके आसपास दोनों ओर पाँच-पाँच और बंदूकें लिये सैनिक। माँ भारती के रूप में पीछे सफेद साड़ी पहने एक छात्रा। फिल्‍मी गाना शुरू होता है ‘मॉं तुझे सलाम’। बीच-बीच में वन्‍दे मातरम् और गुस्‍से में बन्‍दूक हिलाते विद्यार्थी। जोश, आक्रोश और रोष से ऐसा लबालब माहौल कि बस अभी किसी पड़ोसी देश को फतह कर डालेंगे। अचानक मंच पर आतंकवादियों का प्रवेश होता है। सभी के चेहरों पर दाडि़याँ। मानो आतंकवादी बिना दाड़ी का हो ही नहीं सकता। गोलियों की आवाजें। धड़ाम-धड़ाम गिरते अदाकार लेकिन लहू-लूहान होने के बावजूद तिरंगा झंडा थामे हाथ। भारत माता की विधवा का आकर झंडा थामना, आंसू, हुंकार, ललकार । तालियों की गड़गड़ाहट । भारत माता की जय । माइक पर एक आदमी आता है । क्‍या जोश आया ? हमारा देश वीरों का देश है। एक बार और तालियां।

आप फिर इन बच्‍चों को दोष देंगे। क्‍या इन स्‍कूलों में जो राष्‍ट्रभक्ति सिखाई जा रही है, उसमें और 26 जनवरी के बहाने होने वाले प्रदर्शन की मूल भावना एक ही नहीं है ? इन स्‍कूलों में राष्‍ट्रवाद के इन नाटकों के अलावा शायद ही कभी कुछ और देखने को मिले । काश पाकिस्‍तान, चीन से दोस्‍ती हो जाये तो क्‍या तो होगा इनके इन नाटकों का और इनके सेना, पुलिस में लाखों खपने वाले वीर बालकों का । अगला सीन– कजरारे, कजरारे गाना माइक पर चल रहा है और डांस स्‍टेज पर। सभाग्रह राष्‍ट्रभक्ति के जोश के तुरंत बाद रोमांस के मूड में। दूसरा गाना, तीसरा गाना…..। आगे बढ़ते हैं। क्‍या हर टेलीविजन, मीडिया में ऐसे ही गानों का अभ्‍यास नहीं हो रहा? सा रे गा मा, लिटिल मास्‍टर, डांस इंडिया डांस, नच वलिये, वुगी-वुगी आदि-आदि । दो छोर हैं दिन-रात मीडिया में चलने वाले कार्यक्रमों के। या तो चौखटे तोड़ती त्रिकोणीय प्रेम कहानियां, कारपोरेट, भ्रष्‍टाचार के षड्यंत्र या फिर जय हनुमान, हर-हर महादेव । जो देख रहे हैं वही तो अपनी जिन्‍दगी में उतार रहे हैं ये बच्‍चे। मुझे याद नहीं कि दस-बीस सालों में इन स्‍कूलों में कभी गलती से भी प्रेमचंद, प्रसाद, सेठ गोविन्‍द दास या किसी और साहित्‍यकार की झलक मिली हो। क्‍या बंगाल में कोई कार्यक्रम बिना रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के संगीत या नाटक के संभव है?

शुरुआत हर कार्यक्रम की बिल्‍कुल एक जैसी। फिल्‍मी धुन पर मारपीट कर फिट किये गये कुछ शब्‍द जिसमें बीच-बीच में! स्‍वागतम, अहो हमारे भाग्‍य, धन्‍य है यह भूमि‍, मां शारदा आदि आते रहते हैं कुछ शब्‍द अतिथियों की इतनी पलटन के लिए भी। आपकी इजाजत मिल गई; दिल की कली खिल गई। कार्यक्रम शुरू होने के पहले ही मन अन्‍दर ही अन्‍दर विलाप करता है कि निराला समेत न जाने कितने हिन्‍दी कवियों ने सरस्‍वती वंदना या स्‍वागत गीत लिखे हैं। क्‍या यह हरित प्रदेश नाम का क्षेत्र सांस्‍कृतिक रूप से इतना बंजर हो चुका है कि इन हजारों स्‍कूलों में कोई ढंग का स्‍वागत गीत भी नहीं है? लगता है, हर स्‍कूल के प्रबंधक, प्रिंसिपल या उसके परिवार में जो भी तुकबंदी कर ले वही उनके स्‍कूल का गीत बन गया है। निरंतर बढ़ते ऐसे सांस्‍कृतिक विलाप या शून्‍यता के पीछे भी वही शिक्षा है। इस शून्‍य को और बड़े ब्‍लैक होल में बदल रहा है अंग्रेजी का जबरन पढ़ने, पढ़ाने का मोह। इससे स्‍कूलों का धंधा तो ठीक-ठाक चल रहा है, अगर कोई इसे देखकर रोए तो रोया करे।

सांस्‍कृतिक कार्यक्रम के बीचों-बीच चाय नाश्‍ते के स्‍वयंसेवक अतिथियों की मेज के सामने मंडराते रहते हैं । इस अंदाज में कि वे अपने काम कर रहे हैं, हम अपना। एक सीन भूले नहीं भूलता। स्‍कूल प्रबंधक और दूसरी खाप पंचायत के सदस्‍य बगल में बैठे थे। स्‍टेज पर गाना चल रहा था- मेरे फोटो को चिपका ले फेवीकोल से। एक घूंघट काढ़े महिला प्रवेश करती है। हमारे सामने चाय, बिस्‍कुट की प्‍लेट लिये। शायद खाप पंचायतों में से ही किसी की बहू होगी। एक तरफ घूंघट और दूसरी तरफ मंच पर आधुनिक मुम्‍बई डांस।

सांस्‍कृतिक शून्‍यता की एक और झलक। अंतिम सीन- इन सभी जगहों पर आपको स्‍कूल का नाम लिखा एक त्रिशूल नुमा मोमेटो दिया जाता है। जब घर में इनकी अति‍ हो गई तो मैंने एक आयोजक को सुझाव दिया कि बुके और मोमेटो की बजाये कोई प्रेमचंद, रवीन्‍द्रनाथ टेगौर की किताब दें तो अच्‍छा रहेगा। वे कुछ समझे, कुछ नहीं। दो दिन बाद फोन आया- सर! कौन सी क्‍लास की किताब चाहिये? अगली बार इस आग्रह के खमियाजे में मुझे एक बड़ी रामायण पकड़ा दी। क्‍या मेरे इस रोने को आप कुछ अदब के साथ सांस्‍कृतिक विलाप नहीं कह सकते ?

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें

अनुप्रि‍या

अनुप्रि‍या

सुपौल, बिहार में जन्‍मीं अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल आदि‍ पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी चार बाल कवि‍तायें-

मुस्कान पुरानी

होठों पर आ जाये फिर से
वो मुस्कान पुरानी
भीगा मन बहता जाए
वो बचपन की  शैतानी

पगडंडी की दौड़ हो
या छुक-छुक वो रेल
झगड़ा छोटी बात पर
मीठी-मीठी   मेल

झूला आम की डाल का
नीम की ठंडी छाँव
नटखट सी  नादानियाँ
अपनेपन सा गाँव

कच्चे-पक्के  बेर की
खट्टी -मीठी चाह
थाम के वो परछाईयाँ
चल दूँ फिर उस राह।

नींद

चँदा बादल संग खेलता
शोर मचाते तारे
तू भी सो जा कहती मम्मा
सो गए अब तो सारे

आसमान ने ओढ़ लिया है
काला सा क्यूँ रंग
नींद बाँटती सबको देखो
सपने रंग-बिरंग

ऊँघ रहे हैं परदे-खिड़की
तकिया और रजाई
सोने चला मैं भी अब तो
नींद मुझे भी आई।

जन्मदिन

आजा चंदा तू  संग मेरे
खा ले हलवा पूरी
करनी है तुमसे मुझको
बातें बहुत जरूरी

पापा लाए कई किताबें
मम्मी गुड़िया प्यारी
और भैया ने जन्मदिन की
कर ली हर तैयारी

आकर देखो जरा यहाँ
है कितना हंगामा
अब न देर करो तुम बस
आ जाओ न मामा।

किस्सा

मुनिया सुना रही है किस्सा
मुन्ना सुनता ध्यान से
एक कबूतर उड़कर आया
बनिए की दुकान से

उसके पंजे में था थैला
और थैले में दाने
रखकर थैला भूल गया वो
किसके घर में जाने

चल मम्मी से लेकर चावल
उसको दे दें थोड़े
हाथ पकड़ कर एक दूजे का
मुनिया मुन्ना  दौड़े।