Archive for: February 2014

विज्ञान दिवस का आइना : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

विज्ञान दिवस (28 फरवरी) पर प्रेमपाल शर्मा का आलेख-  

हर वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है, इस प्रति‍ज्ञा को दोहराते हुए कि राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना क्‍यों जरूरी है। यों हिन्दी दिवस, मातृभाषा दिवस, शिक्षा दिवस, शिक्षक दिवस, सद्भावना दिवस सभी एक राष्ट्रीय स्तर पर रीति में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन नरेन्द्र दाभोलकर की स्मृति में भारत सरकार के विज्ञान प्रसार आदि संगठनों द्वारा आई.आई.टी. दिल्ली में 21-22 फरवरी को आयोजित परिसंवाद थोड़ा लीक से हटकर था। अंधविश्ववास और जादू-टोने के खिलाफ लड़ाई में अगस्त 2013 में शहीद हुए नरेन्द्र दाभोलकर के बेटे हामिद दाभोलकर के साथ सभी ने मिलकर संकल्प लिया कि जो कानून महाराष्ट्र में काला जादू और अंधविश्वास के खिलाफ बना है, उसे पूरे राष्ट्र के ‎लिए भी बनाया जाएगा ।

लेकिन हम ऐसे संकल्प कब तक दोहराते रहेंगे? महाराष्ट्र में अंधविश्‍वास के खिलाफ कानून बने तीन महीने हो चुके हैं, और अब तक लगभग चालीस व्यक्तियों के खिलाफ इस कानून के तहत मुकदमे दर्ज हो चुके हैं । यानी एक संदेश फैल रहा है कि धर्म, जादू-टोने के बहाने आप गरीब जनता का शोषण नहीं कर सकते। लेकिन नरेन्द्र दाभोलकर की शहादत और पूरे राष्ट्र को आधुनिक बनाने वाले ऐसे कानून की जरूरत के बावजूद अभी तक दिल्ली क्यों सोई हुई है और क्यों देश के दूसरे राज्य? क्या 28 फरवरी को दिवस मनाने की खानापूरी पर्याप्त है ? क्या यह इस देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का अपमान नहीं है, जिनके लिए वैज्ञानिक चेतना रोजाना की जरूरत में शामिल था  और जिसे वे भूख और गरीबी के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मानते थे। ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में वे बार-बार वैज्ञानिक चेतना की बात करते हैं । कहा जाता है कि 1947 के बाद आजाद हुए लगभग अस्सी देशों में भारत अकेला ऐसा देश है जिसने वैज्ञानिक चेतना को अपने संविधान में शामिल किया । लेकिन जमीन पर तो उस चेतना को आने में अभी मीलों चलना है ।

स्मृतियों में सत्‍तर के दशक की मेरे बचपन की रील तैर रही है । गणेसी लाल पंडित आए दिन सामने वाले घर में बैठे रहते थे। कभी एक बच्चे का हाथ देखते हुए तो कभी दूसरे की पत्री या जन्मकुंडली । वाकई उनके पास ऐसा बहुत काम था। कई बार तो लोगों को इंतजार करना पड़ता, पंडित जी से जन्म पत्री दिखाने को । चमकदार रेशमी कुर्ता, गले में गमछा, चारों तरफ भगतों की भीड़ यानी मौज-ही-मौज। चालीस साल बाद वो बूढ़े जरूर हो गये हैं, लेकिन धंधा उतना ही चमक रहा है। अब तो उसमें भगवती जागरण और सत्संग भी जुड़ गये हैं। अलीगढ़ के एक और गांव में जाना हुआ तो वे बताने लगे कि सोलह गांवों का एक समूह है, जिसमें बारी-बारी से हर शनिवार, रविवार को जागरण होता है और खाना-पीना भी। खाना-पीना कौन करता है  ? यह पूछने पर उन्होंने बताया कि दिल्ली और अन्‍य शहरों में रहनेवाले वे पढ़े-लिखे लोग जो खूब कमाते हैं । वो कमाई रिश्वत या दलाली की । मैं नाराज हुआ तो कहने लगे कि खाली बैठे और क्या करें ? इन सत्संगों में इलाहाबाद, बनारस तक के पं‎ड़ितों को ये बुला लेते हैं और बदले में ये वहां जाते हैं। कभी-कभी भारतीय विश्वविद्यालयों के फरवरी, मार्च में होने वाले सेमिनारों की सी याद दिलाते ।

पिछले पांच-दस वर्षों से वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के आयोजनों में कभी-कभी शिरकत करता रहा हूं । हर सेमिनार नेहरू जी के बाजे से ही शुरु होता है और भगवान बुद्ध, कोपरनिक्स, गैलिलियो का नाम लेते हुए नेहरू जी पर ही खत्म। ऐसे ही एक आयोजन में मद्रास आई.आई.टी. के सदानन्द मेनन ने बताया कि वैज्ञानिक चेतना की बढ़ने के बजाय उलटी गिनती शुरू हो गई है। उन्होंने तमिलनाडु के उदाहरण देकर अपनी बात रखी कि द्रविड़ आंदोलन, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ था और पिछले 45 वर्षों से बारी-बारी से द्रविड़ राजनीतिक पार्टियां सत्ता में हैं । पश्चिम बंगाल के तैंतीस वर्षीय वामपंथी शासन से भी ज्यादा । लेकिन मूर्ति पूजा, दैवीय चमत्कार, टोटके, अंधविश्वासों में कोई कमी नहीं आई, बल्कि और बढ़े ही होंगे।  वे मद्रास में बढ़ते जातिवाद से बेहद दु:खी थे । उन्होंने बताया कि चैन्ने आई.आई.टी. की कक्षाओं में बच्चे जातियों के झुंड में बैठते हैं, एक-दसरे का मखोल उड़ाते। क्‍या एम्‍स., जे.एन.यू. सहित लखनऊ, पटना, इलाहाबाद की स्थिति भिन्‍न है? काश ! वैज्ञानिक चेतना बढ़ी होती तो जाति, धर्म की दीवारें कभी की ढह चुकी होतीं। क्या हिन्दू-मुस्लिम, सिख, आदिवासी, दलित, ठाकुर, ब्राह्मण का जीनोम अलग है? क्या इसे खाप पंचायतों को बताने की जरूरत नहीं है ? वे किस नस्लीय शुद्धता की बात करते हैं ? क्या यह इतने अच्छे स्पष्ट वैज्ञानिक संविधान के बावजूद सत्ता और उसकी राजनीति की विफलता नहीं है ? जहां अभी भी लाखों लोग काला जादू, गण्डे-ताबीज के बहाने शोषण के‎ शिकार हो रहे हैं ।

कुछ और रीलें तैर रही हैं। मेरी उम्र रही होगी सात-आठ साल। बड़े भाई को शायद मोतीझरा निकला था। सुबह-शाम एक झाड़-फूंक वाला आता । पता नहीं कैसे बचे। मेरी आंख में मां न जाने किसी ऐसे ही झोलाछाप डॉक्टर की दवा डालती थी, जिसे डालते ही मैं घंटों तड़पता रहता था और आखिर मैंने वो शीशी फेंक दी। मेरी उम्र का मेरा ही सहपाठी कुंवर पाल जामुन के पेड़ से गिरा, टांग टूट गई। गांव के पहलवान ने खपच्‍चा लगा दिया। महीनों बिस्तर पर पड़ा रहा पढ़ाई छूट गई। बच तो गया लेकिन शरीर आज भी टेड़ा-मेड़ा है। वे कहते हैं तो क्या करें ? कौन डॉक्टर है यहां ? और कौन-सा अस्पताल? झाड़ फूंक वाले खपच्‍चा लगाने वाले पहलवान मिल तो जाते हैं। क्या हमने इन पंडित जी, मुल्ला जी, हकीमों का कोई विकल्प इस गरीब जनता को दिया है ?

चालीस वर्ष बाद पिछले हफ्ते फिर गॉंव में था । पड़ोसी रामवीर अपनी पुत्रवधु का इलाज कराकर शायद उज्जैन या इंदौर से लौटा था। हालचाल पूछने पर वह पु‎ड़िया में रखे कुछ पत्थरों को दिखाता है कि ये मंत्र से निकालकर दिए हैं बाबा ने। एक और पड़ोसी श्यामवीर एक और बाबा के कब्जे में है । हर सोमवार को उसके आश्रम की तरफ दौड़ते और बच्चों को भी साथ ले जाते । उत्तर भारत का तो हर घर इन बाबाओं के चंगुल में हैं । प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नर्लीकर का कहना है कि शहरी मध्यवर्ग में तो ज्योतिष, बाबावाद, अंधविश्वास पचास सालों में और पचास गुना बढ़ा है । इसका प्रमाण है कि पहले तो भी शादियां एक पंडित की सलाह से हो जाती थीं, अब तो कंप्यूटर, पंडित, नाड़ी, ग्रह, नक्षत्र तक सब न मिल जाएं, तब तक वे कोई काम नहीं करते । ऊपर से वास्तु और दूसरे प्रपंच ।

ऐसे में क्या हमें विज्ञान दिवस मनाने का हक भी है ?

रचनाकार, रचना और पाठक का संगम

नई दि‍ल्ली : पि‍छले कई वर्षों से हर साल पुस्तक मेले में जाता हूं। वहां जाकर एक अलग ही तरह का आनंद मि‍लता है। अपनी पसंद की कि‍ताबों, कई रचनाकारों और हजारों पाठकों को देखकर मन को खुशी मि‍लती है कि‍ दूरसंचार के माध्यंमों में अभूतपूर्व वि‍कास के बाद भी कि‍ताबों के प्रति‍ लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है। इस एक फायदा यह भी की कि‍ देश के वि‍भि‍न्न हि‍स्सों से आए मि‍त्रों से मुलाकात हो जाती है। इस बार भी कई मि‍त्रों से मि‍लना हुआ। आप भी मि‍लि‍ए-

ramji tiwari aur anurag

रामजी ति‍वारी से मुलाकात।

anurag

प्रगति मैदान में बच्‍चों के हाल में साबू से मिलकर बचपन याद आ गया।

Devendra Mewari aur anurag

विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी के साथ।

kamal joshi aur anurag

चर्चित फोटोग्राफर-लेखक कमल जोशी से मिलना सुखद रहा।

सुधीर शर्मा से मि‍लना प्रेरणादायक है।

सुधीर शर्मा से मि‍लना प्रेरणादायक है।

 

युवा अभि‍षेक पुनेठा से मि‍लकर मन आश्‍वस्‍त हुआ।

युवा अभि‍षेक पुनेठा से मि‍लकर मन आश्‍वस्‍त हुआ।

 

 

 

 

 

 

abhinav upadhyay, ashutosh aur anurag

पत्रकार अभिनव उपाध्‍याय और आशुतोष से भी गपशप हो गई।

Tomoko Kikuchi anu anurag

जापानी लेखि‍का-अनुवादक तोमोको किकुची से मिलकरअच्‍छा लगा।

ashima kumari aur anurag

युवा लेखिका आशिमा कुमारी के साथ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चि‍त्रकार कुॅवर रवीन्‍द्र से मि‍लना उपलब्‍धि‍ रही।

चि‍त्रकार कुॅवर रवीन्‍द्र से मि‍लना उपलब्‍धि‍ रही।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अरुणाभ सौरभ और दि‍नकर कुमार से संक्षि‍प्‍त मुलाकात ही हो पाई।

अरुणाभ सौरभ और दि‍नकर कुमार से संक्षि‍प्‍त मुलाकात ही हो पाई।

साहित्य के पथ पर ‘बनास जन’ : राजेश कुमार

Banaas Jan 7

भारत के पश्‍चिमी भाग के मरूस्थल प्रान्त में बहने वाली एक नदी का नाम है ‘बनास’। और इसी नाम से साहित्य-संस्कृति की बूँद-बूँद का संचयन करती चलती है पत्रिाका ‘बनास-जन’। इसके अंक-7, जनवरी-मार्च, 2014 में 16 शीर्षकों के अन्तर्गत- आत्मकथ्य, कविताएँ, शोध लेख, पुस्तक समीक्षा, कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, साक्षात्कार आदि प्रस्तुत किये गए है। कुल मिलाकर साहित्य की प्रत्येक विधा के ऊपर इसमें उनके चाहने वालों के लिए कुछ-न-कुछ है।

‘हमसफरनामा’ में संस्मरण रखा गया है। ‘हमसफर’ का अर्थ है ‘जो साथ चले’ यानी जीवन पथ पर साथ निभाने वाले, इसमें अजित कुमार का निर्मला जैन पर संस्मरण है। ‘समीक्षायन’ शीर्षक के अन्तर्गत ग्यारह पुस्तक समीक्षाएं हैं।

‘बनास जन’ के इस अंक में लाल्टू द्वारा लिखित पहला ही लेख ‘आत्मकथ्य एवं कविताएँ’ पढ़ते-पढ़ते जब उनकी कविताओं से गुजरते हैं, तो ‘कितने भरपूर सायादार पेड़, कितनी शोर मचाती नदियाँ, अंधेरी रातों के कितने चाँद-सितारे, कितनी खुशबू भरे रंगीन-सादा फूलों’ से होकर पाठक गुजरता है, कहना कठिन है। इन कविताओं में ‘थोड़ी देर ईश्वर’ नामक कविता में भावनाएँ अपने श्रेष्ठ रूप में उठती चलती है- ‘‘सूक्ष्म कविता बन तुम्हारे खून में घुलता/अंततः तुम्हारे दिल को छूता… यह तुमसे दूर होने की थकान है… यह ब्राह्मांड की तकलीफ है।’’ इसी प्रकार पत्रिका के इस अंक में छपी दोनों कहानियाँ- प्रज्ञा की ‘बरबाद’ नहीं आबाद’ ओर पुंज प्रकाश की ‘फूलचन बाबू सोना हगेंगे।’ अपने कथ्य को व्यंजित करती कहानियाँ हैं। जहाँ पहली कहानी में मेहनती सुनीता का जीवन संघर्ष बयाँ किया गया है, जिसमें कमाल की हिम्मत, जीजिविषा और मानवीयता से भरा मन है, यह एक दलित जाति की स्त्री का विमर्श भी है। तो दूसरी कहानी में फूलचन बाबू का अवसाद में रूपान्तरित होता जीवन बयान है।

सरिता शर्मा का यात्रा-वृतांत ‘मुखर पत्थरों और गूँजते मंदिरों में भटकता मन’ ओडिसा प्रान्त की सैर पाठक को घर बैठे ही करा देता है। भुवनेश्‍वर, पुरी, कोणार्क आदि के बारे में ऐसे स्पन्दन युक्त चित्र यहाँ लेखिका द्वारा खींच दिये गए हैं कि राहे निगाह हर बिम्ब मानों उतर आया हो स्वयं के अनुभव के भू-भाग पर। इस यात्रा वृतान्त के शीर्षक में ही लेखिका का कवि और यायावर होना हमें प्राप्त हो जाता है, ‘मुखर पत्थरों’ पत्थर कब बोलें होंगे, जब लेखिका ने उनसे बात की होगी- के उनका गुफ्रतगू ए अंदाज है वो, के हर संगे दर भी उससे बात करता है।’ ‘गूँजते मंदिरों’ और ‘भटकता मन’ इन तीन शब्द युग्मों से बुना गया शीर्षक ही अपने आप में एक हायकू कविता है। लेख के भीतर जाने का दरवाजा खोले तो ओडिसा के मंदिर उनका शिल्प, मूर्तियों का निर्माण कौशल, उनका इतिहास सबका एक बॉयस्कोप दिखता है। और साथ ही लेखिका का वो भटकता मन भी जो पूरे लेख में मशाल थामे चल रहा है।

‘बनास जन’ के इस अंक में अक्षय कुमार का लेख सूक्ष्म सम्वेदनाओं के शाब्दिक मूर्तिकार और शब्दों को वैचारिकता में जड़ कर कविता के असर में बल उत्पन्न करने वाले ए.के. रामानुजन (1929-1993) आधुनिक भारतीय अंग्रेज़ी कवि के बारे में है जिसमें उनकी छः कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है। इस अंक में अजेय, विवेक निराला, देवयानी, स्नेहमयी चौधरी, श्याम कश्यप की कविताएँ ली गई हैं। देवयानी की ‘उम्मीद’ कविता छोटी और असरदार लगी- ‘उम्मीद की आखिरी बूंद कहीं न थी/तभी मेंने देखा/बच्चे की आँख में।’

‘हम अहले सफा मर्दूदे हरम’ नामक लेख में हिमांशु पंड्या आलमशाह खान की कहानियों की एक अच्छी आलोचना पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं। लेख में उसकी चौकन्नी नज़र आलमशाह की कहानियों में खिंची उस सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को दिखती चलती है जिसके चलते उन कहानियों का मनुष्य सामाजिक पददलितता की ढलान पर लुढकता जाता है और किस तरह एक पूरे आदमी को खरोंच-खरोंचकर आध कर दिया गया है। दिलीप शाक्य की ग़ज़लें पढ़ते हुए मन को अपने पास ठहरा लेती है। हबीब कैफी की भी तीन ग़ज़ले अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।

कृष्णदत्त शर्मा का ‘काव्य की रचना प्रक्रिया एक ज्ञानवर्धक लेख है और इसी प्रकार शंभुनाथ का ‘साम्राज्यवाद, वैश्वीकरण और राष्ट्रीय पुनर्जागरण तथा गरिमा श्रीवास्तव का ‘सीमोन द बोउवार’ अथवा ध्वल जयसवाल का ‘जनक्षेत्र की अवधरणा, कृष्ण कुमार पासवान का ‘फोर्ट विलियम कालेज और अमिता पाण्डेय का ‘रघुवीर सहाय की कहानियों में शिल्प प्रविधियाँ के ऊपर लिखे तीनों शोध लेख भी इसी ज्ञानवर्धन के क्षेत्र में रख सकते हैं।

बनास विशेष में बसंत त्रिपाठी द्वारा लिखित ‘मेरे पिता एक प्रवासी उडि़या मज़दूर की जीवन गाथा है। और सबसे अन्त में ‘पेनड्राइव समय कविता पर रमाकान्त राय की टिप्पणी है। समीक्षायन में पुस्तक समीक्षाएँ है। इन ग्यारह लेखों की समीक्षित पुस्तकों में हर विधा की पुस्तके है। इनमें निरंजन देव शर्मा के लेख में कविता संग्रह केन्‍द्र में है, तो वहीं राम विनय शर्मा के लेख में विस्थापन की समस्या पर शैलेय का लघु उपन्यास ‘हलफनामा। ‘यात्राओं का आनन्द’ नामक लेख में राधेश्‍याम ने यात्राओं से संबंधित चार पुस्तकों की समीक्षाएं की हैं। इसी प्रकार अन्य लेखों का भी चाहे वह इंदु कुमारी का कथाकार अमरकान्त केन्‍द्रि‍त पुस्तक की समीक्षा ‘ठेठ ढंग का सिद्ध कथाकार हो, दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा लिखा लेख हो या पफर गणपत तेली, अम्‍बि‍का, निशांत, रामविनय शर्मा, प्रतीक सिंह व गजेन्‍द्र मीणा आदि के लेख सब अपना महत्त्व रखते हैं। पत्रिका के अंक में कहीं-कहीं प्रूफ की गुंजाइश अब भी शेष है।

समीक्षित पत्रिका- बनास जन
जनवरी-मार्च, 2014,  अंक-7, वर्ष-3
सम्पादक– पल्लव
75रुपये, 100रुपये (डाक से मंगाने के लि‍ए)

पता : 393, डी.डी.ए., ब्लॉ‍क सी एण्‍ड डी
कनि‍ष्क अपार्टमेंट, शालीमार बाग, दि‍ल्ली-110088
दूरभाष : 011-27498876
ईमेल- banaasjan@gmail.com

हमेशा प्रासंगिक रहेंगे अमरकांत : जसम

अमरकांत

अमरकांत

नई दि‍ल्‍ली : कल 17 फरवरी को सुबह 9:30 बजे हिंदी के महान कथाकार अमरकांत ने जिंदगी की अंतिम सांसें लीं। वे 88 साल के थे। एफ-6, पंचपुष्प अपार्टमेंट, अशोक नगर, इलाहाबाद स्थित उनके आवास पर शोक व्यक्त करने वाले साहित्यकारों और आम नागरिकों का तांता लगा रहा। आज दोपहर बाद उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

अमरकांत अपनी सादगी, सहजता और आत्मीय-स्नेहिल व्यवहार के लिए हमेशा याद आएंगे। अभावों, बीमारियों और उपेक्षाओं के बावजूद उनके व्यक्तित्व की सरलता हमेशा बनी रही और उन्होंने अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया।

अमरकांत स्वांतत्र्योत्तर भारत के जटिल यथार्थ और बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के जीवन व्यापार और उसमें निर्मित हो रहे किरदारों को अत्यंत सहजता से पेश करने वाले कथाकार रहे हैं। प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी कथा-परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया और नई कहानी आंदोलन के दौर में भी वे उन्हीं साहित्यिक मूल्यों के साथ रहे। जो लोग प्रेमचंद से छुटकारा पाने को ही हिंदी कहानी की अग्रगति और नएपन की पहचान बता रहे थे, अमरकांत उनके साथ नहीं थे। जीवन जगत से ली गई नवीन उपमाएं, जनपदीय मुहावरे, खरी चलती हुई जुबान, कथन-भंगिमा, गहन सामाजिक संवेदनशीलता और गहरी मनोवैज्ञानिक समझ उनकी रचनाओं की खासियत रही है। उनकी रचनाओं की सीधी सपाट बुनावट के भीतर गहरे अर्थसंदर्भ, समाज और देश की दशा-दिशा और उसके भविष्य के अत्यंत यथार्थपरक मूल्यांकन और संकेत मिलते हैं। इसके साथ-साथ समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक भी उनकी रचनाओं में घुलामिला नजर आता है।

‘जिंदगी और जोंक’, ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘मित्र मिलन और अन्य कहानियां’, ‘दुख-सुख कथा’, ‘कुहासा’, ‘एक धनी व्यक्ति का बयान’, ‘कलाप्रेमी’, जांच और बच्चे’ अमरकांत के प्रमुख कहानी संग्रह हैं। अगर उनकी सारी कहानियों को छोड़ भी दिया जाए, तो सिर्फ ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘जिंदगी और जोंक’ और ‘हत्यारे’ जैसी कहानियां ही उन्हें दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष खडा़ करने में समर्थ हैं। अमरकांत ने ‘सूखा पत्ता’, ‘आकाश पक्षी’, ‘विदा की रात’, ‘लहरें’, ‘कंटीली राह के फूल’, ‘सुन्नर पांडे की पतोहू’, ‘काले उजले दिन’, ‘बीच की दीवार’, ‘ग्राम सेविका’, ‘इन्हीं हथियारों से’ इत्यादि उपन्यासों की भी रचना की।

आलोचक रविभूषण ने ठीक ही लिखा है कि ‘जिंदगी और जोंक’ का रजुआ ‘कफन’ के घीसू-माधो का सगा-संबंधी दिखाई पड़ता है। रजुआ की जिंदगी पशु की है। स्वतंत्र भारत का वह पात्र भारत की स्वतंत्रता पर प्रश्न-चिह्न है।’ रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू, ‘इन्हीं हथियारों से’ की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मरणीय और विश्वसनीय किरदारों के जरिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह हिंदी कथा-साहित्य की बेमिसाल उपलब्धि है। खासकर भारतीय मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग की खामियों और खूबियों को उन्होंने बड़े ही विश्वसनीय तरीके से अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। यही वह वर्ग है जो प्रशासनतंत्र, नौकरशाही और शासकवर्गीय राजनीति की अगली कतार में रहता रहा है, इसकी संवेदनहीनता, मक्कारी, अवसरवाद और मूल्यहीनता किसी जनविरोधी व्यवस्था के लिए किस कदर मददगार हो सकती है, साठ के दशक में लिखी गई अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ में इसके बड़े स्पष्ट संकेत देती है। अभी दिसंबर 2013 में ही जनसंस्कृति मंच, कथा समूह के पहले कथामंच आयोजन में इस कहानी पर काफी विस्तार से चर्चा हुई थी। आज जिस तरह एक हत्यारे का देश में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर गुणगान चल रहा है और उसे मध्यवर्ग का नायक बनाया जा रहा है, उसके संदर्भ से देखें तो यह कहानी मानो ऐसे हत्यारों के निर्माण की प्रक्रिया की शिनाख्त करती है। गौर करने की बात यह है कि अमरकांत इस चिंतित करने वाले यथार्थ के समक्ष वैचारिक-सैद्धांतिक रूप से समर्पण करने वाले लेखक नहीं हैं। विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर उनका जीवन एक प्रतिबद्ध प्रगतिशील लेखक का जीवन था। 1942 के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखे गए उनके उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ का एक अदना-सा पात्र कहता है- ‘बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धांत सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धांत जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं।’ अमरकांत का जीवन और रचनाकर्म खुद इसकी तस्दीक करता है।

मानव मुक्ति के संघर्षों के प्रति अमरकांत की आस्था कभी कम नहीं हुई। ‘इन्ही हथियारों से’ का ही एक पात्र सुरंजन शास्त्री अपने भाषण में कहता है- ‘आप इसे आजादी की आंधी कहिए, गांधी की आंधी कहिए, बुढ़िया आंधी काहिए, महा आंधी काहिए, मनुष्य के इतिहास की यह सुपरिचित आंधी है। हाँ, यह प्राचीनतम आँधी है। मानव इतिहास में यह अक्सर आई है। जहां गुलामी है, जहां जुल्म है, अन्याय है, तानाशाही है, वहां बार-बार  है। मुक्ति की आँधी है यह। यह कभी फ्रांस में आयी, कभी रूस में। अन्य देशों में भी वह आ चुकी है। 1857 में भी हमारे देश में आयी थी…आगे बढिए़, आजादी की महा-आँधी आने का गंगा हुलसकर स्वागत कर रही है, तरंगित हो रही है और चिरैय्या ढोल बजा रही है, क्योंकि यह गुलामी को मिटाकर आजाद, शोषणहीन समाज बनाने का संकल्प लेकर आ रही है।’ उपन्यास में तो ये पंक्तियाँ एक खास सन्दर्भ में हैं, लेकिन अमरकांत के कथाकार ने सारी उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के तुमुल में इतिहास की मुक्ति की आँधियों में यकीन कभी नहीं खोया।

चर्चा, आयोजन, प्रायोजन से दूर रहे अमरकांत को बीमारी, पत्रकार जीवन की अनिश्चितताएं, पैसे की तंगी और उनके रचनाकार की साहित्य-प्रतिष्ठान द्वारा उपेक्षा तोड़ न सकी। 16 की उम्र में पढ़ाई छोड़ 1942 के ‘भारत छोडो आन्दोलन’ में कूद पड़ने वाले अमरकांत ने संघर्ष की राह कभी छोड़ी ही नहीं।

अमरकांत जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भगमलपुर नामक गांव में 01 जुलाई 1925 को हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन समाप्त होने के बाद उन्होंने बलिया से इंटर किया और बीए के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय आ गए। उन्होंने आगरा से लेखन और पत्रकारिता के अपने सफर की शुरुआत की थी। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली ‘मनोरमा’ के संपादन से वे लंबे समय तक जुड़े रहे। ‘सैनिक’ और ‘माया’ में भी उन्होंने कार्य किया। लगभग चालीस वर्षों तक कई पत्रिकाओं में लेखन-संपादन करने के पश्चात कई वर्षों से स्वतंत्र रूप से लेखन और ‘बहाव’ नामक अपनी पत्रिका का संपादन कर रहे थे। ‘कुछ यादें और बातें’ और ‘दोस्ती’ नाम से उनकी संस्मरणों की भी दो पुस्तके प्रकाशित हैं। अमरकांत हिंदी के उन गिने-चुने कथाकारों में से हैं, जिन्होंने बच्चों के लिए भी साहित्य की रचना की। ऐसी पुस्तकों में ‘दो हिम्मती बच्चे’, ‘बानर सेना’, ‘नेउर भाई’, ‘खूंटा में दाल है’, ‘सुग्गी चाची का गांव’, ‘झगरू लाल का फैसला’, ‘बाबू का फैसला’, ‘एक स्त्री का सफर’ आदि प्रमुख हैं।

‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास के लिए अमरकांत जी को 2007 में साहित्य अकादमी और समग्र लेखन के लिए 2009 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। व्यास सम्मान, पहल सम्मान, जन संस्कृति सम्मान, यशपाल पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार समेत कई पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिले। उनके छोटे बेटे अरविंद और बहू रीता की बहुत बड़ी भूमिका रही कि उन्होंने अपनी स्वतंत्र जिंदगी छोड़कर हिंदी समाज के इतने अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच लंबे समय तक भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा। अमरकांत जी अपने साहित्य और साहित्य व विचार के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के कारण हमारे लिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। उन्हें जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

चि‍त्र : संजय जोशी

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

वि‍श्‍व पुस्‍तक मेले में ‘शि‍क्षा, भाषा और प्रशासन’

shiksha, bhasha aur prashasan

लेखक-वि‍चारक प्रेमपाल शर्मा से लंबी बातचीत पर आधारि‍त पुस्‍तक ‘शि‍क्षा, भाषा और प्रशासन’ (कीमत – 50 रुपये (पेपर बेक),  हार्ड कॉपी -100 रुपये) प्रगति‍ मैदान, नई दि‍ल्‍ली में 15 से 23 फरवरी तक आयोजि‍त हो रहे वि‍श्‍व पुस्‍तक मेले में नि‍म्‍न स्‍टॉलों पर उपलब्‍ध रहेगी-

1: हल नंबर-18, स्‍टॉल नंबर-8 (सामयि‍क प्रकाशन)

2: हाल नंबर- 18, स्‍टॉल नंबर- 23 (हिंद पाकेट बुक्‍स)

3: हाल नंबर-18, स्‍टॉल नंबर-113 (एकलव्‍य)

4: हाल नंबर-07, स्‍टाल नंबर-53 (एकलव्‍य)

 

‘शि‍क्षा, भाषा और प्रशासन’ के कुछ अंश-

हमारी शिक्षा एक अच्छा नागरिक बनाने के बजाय सिर्फ कुछ कक्षाएँ पास करने का जरिया-भर है, अपने आसपास के जीवन से सीखने की बातों से एकदम दूर। उन्हें पाँच-छह महाद्वीपों के बारे में बताया व रटाया जाता है। दुनिया के बड़े-बड़े महासागरों के नाम पता होते हैं, लेकिन उनकी स्कूली शिक्षा में न अपने जिले का नक्शा आता है, न उनकी नदियाँ, तालाब, नहरें, प्राचीन इमारतें, इतिहास, भूगोल, जंगल, पेड़। अब तो उनसे उनकी भाषा, बोली भी छीनी जा रही है और जैसे-तैसे पहले से ही रटंतू पाठ्यक्रम के साथ अंग्रेजी और रटाई जा रही है। जो पीढ़ी तैयार हो रही है, विशेषकर भारत के संदर्भ में, वह शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही खारिज कर रही है।

*******

कौन संतुष्ट हो सकता है ऐसी शिक्षा से जो करोड़ों बेरोजगार पैदा कर रही हो? लाखों इंजीनियर डिग्री लेकर निकल रहे हैं हर वर्ष, लेकिन यह इंजीनियर शब्द का भी अपमान है। न इन्हें कील ठोकनी आती है, न बिजली का तार लगाना। उतना भी नहीं, जितना किसी कामगार मिस्त्री के बच्चे अपने धंधे से सीख लेते हैं। काम करनेवालों का जितना अपमान इस देश में है, उतना कहीं नहीं होता होगा। शिक्षा में काम और काम में शिक्षा का थोड़ा भी ध्यान रखा जाता तो हम इतने इकहरे नागरिक नहीं बनाते, जिन्हें मशीन, फ्रिज की तो छोड़ो, कपड़े धोने, सब्जी काटने, सफाई करने, बटन लगाने जैसे अपने शरीर के काम भी नहीं आते।

*******

हमारे यहाँ प्राथमिक शिक्षा जैसा सबसे गंभीर कार्य सबसे अधिक नाकारा, अपरिपक्व हाथों तथा पद्धतियों के हवाले कर दिया गया है। नतीजतन हर कोई अपने ‘छौनों’ के लिए किसी सुरक्षित पब्लिक स्कूल की तलाश करने लगा है, बल्कि इसके लिए वह विदेशों की तरफ भी भागने लगा है। लेकिन इतना पैसा खर्च करने के बाद भी जो पीढ़ी तैयार हो रही है, वह विध्वंसक दिशाहीनता की शिकार है, और अनपढ़ बेचारे तो हैं ही अभिशप्त इक्कीसवीं सदी की दुनिया में निरक्षरता की सबसे बड़ी गठरी ढोने के लिए।

*******

अमेरिका, कनाडा में लगभग 90 प्रतिशत शिक्षा बराबर है। चाहे गवर्नर हो या टैक्सी ड्राइवर, उनके बच्चे लगभग एक ही तरह के स्कूल में पढ़ रहे हैं। दसेक साल पहले की बात है- कनाडा में एक दिन लोग अचानक सड़कों पर आ गए। इसका कारण यह था कि तब तक जो 99 प्रतिशत शिक्षा समान थी, उसके कुछ अंश का सरकार निजीकरण करने जा रही थी। लोग सड़कों पर आ गए कि हम ऐसा नहीं होने देंगे। क्या हमारे यहाँ कभी शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ ऐसी कोई आवाज उठी है? नहीं। उल्टे मध्यवर्ग कई कारणों से निजीकरण को बढ़ावा दे रहा है।

*******

बच्चे की रचनात्मकता निश्चित रूप से कम हो रही है। दुनिया-भर के सर्वेक्षण कम-से-कम भारतीय विद्यार्थियों के बारे में तो यही कह रहे हैं। बार-बार कहने की जरूरत नहीं कि रटंत को हतोत्साहित किया जाए। नंबरों की चूहा-दौड़ ही जिंदगी में सब कुछ नहीं है और सबसे बुनियादी बात यह है कि स्कूल ‘समानता’ की शिक्षा दें और गरीब, अमीर सभी के बच्चे एक ही छत के नीचे पढ़ें।

*******

यूरोपीय और अमेरिकी शैक्षिक जगत विषय चुनने की सुविधा खूब देता है। आइंस्टाइन क्लर्क थे, लेकिन उन्हें किसी ने भौतिकी में जाने से नहीं रोका और न पादरी मेंडल को आनुवांशिकी में प्रयोग करने से। प्रसिद्ध लेखक और मैनेजमेंट-गुरु गुरुचरणदास ने कुछ वर्ष पहले लिखा था कि वे यूरोप पढऩे गए थे रसायनशास्त्र। मन नहीं लगा तो लॉ में चले गए और वहाँ भी मन नहीं रमा तो प्रबंधन में। वाकई शिक्षा इसी आजादी का नाम है। वह सर्वश्रेष्ठ रूप में तभी फले-फूलेगी, जब उसे मन से करने की आजादी हो, ‘पापा के कहने’ की गुलामी न हो।

*******

बस्ते के बोझ और परीक्षा के तनाव की बात तो बार-बार की जाती है, लेकिन विदेशी भाषा के बोझ की नहीं। क्या कोई ऐसा सरकारी-गैरसरकारी सर्वेक्षण हुआ है, जो अंग्रेजी के आतंक का खुलासा कर सके? भारतीय बच्चों में अस्सी प्रतिशत शिक्षा का तनाव अंग्रेजी या विदेशी भाषा का है, लेकिन इस पक्ष पर एक भयानक चुप्पी है। ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, इतिहास आदि सब कूड़ेदान में, सबसे महत्वपूर्ण है अंग्रेजी। ठीक मैकाले के अनुमान पर, बल्कि उससे भी चार कदम आगे।

*******

बार-बार इस बात की दुहाई दी जाती है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। अरे भाई, अगर ऐसा है, तो फिर चीन, जापान, जर्मनी, रूस अंग्र्रेजी के बजाय अपनी-अपनी भाषाएँ पढ़-पढ़ाकर ज्ञान-विज्ञान में आगे कैसे बढ़ गए? इसका उत्तर है कि भाषा-विशेष और ज्ञान-विज्ञान का कोई संबंध नहीं होता। संबंध समझ का होता है और समझ बनती है शुरू के वर्षों में अपनी भाषा में पढऩे-लिखने से।

*******

सरकारी स्कूल उतने खराब नहीं हुए, जितना उन्हें बताया जा रहा है। उनके खिलाफ  प्रचार की भी एक राजनीति है। राजनीति यह है कि केंद्र और राज्य दोनों जगहों की सत्ताएँ विश्व बैंक, अमेरिका आदि के विभिन्न दबावों में निजी-प्राइवेट स्कूलों को बढ़ाना चाहती हैं। या कहिए कि निजीकरण को जब हर क्षेत्र में बढ़ाया जा रहा है, तो शिक्षा में क्यों नहीं? प्राइवेट स्कूल तभी बढ़ेंगे, जब सरकारी स्कूलों की बदनामी होगी। बदनामी होगी तो निजी स्कूल और खुलेंगे और ये निजी स्कूल राजनीतिक पार्टियों के कारिंदों के हाथों में जाएँगे। आप किसी भी देशी-विदेशी एजेंसी से सर्वे करा लीजिए, शायद ही निजी स्कूलों का मालिक शिक्षा के द्वारा समाज को बदलने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में आया हो।

‘शि‍क्षा, भाषा और प्रशासन’ प्रकाशि‍त

shiksha, bhasha aur prashasan

कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता की कि‍ताबें पाठकों तक पहुँचाने के मकसद से ‘लेखक मंच’ प्रकाशन शुरू कि‍या गया है। इसके तहत कहानी, कविता, संस्मरण, लेख के अलावा सिनेमा, रंगमंच, कला, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों की भी श्रेष्ठ कि‍ताबें प्रकाशित करने की योजना है। प्रकाशन शुरू करने का मकसद यह भी है कि‍ अनुवाद के माध्यम से भारत की अन्य भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ साहित्य से हिन्दी के पाठकों का परिचय कराया जाए।

हम यह भी चाहते हैं कि‍ लेखकों को उनकी पुस्तकों पर यथासंभव मानदेय/रायल्टी दी जाए और पूरी पारदर्शिता बरती जाए।

मित्रो, आपको जानकर खुशी होगी कि‍ ‘लेखक मंच’ की पहली पुस्तक ‘शिक्षा, भाषा और प्रशासन’ प्रकाशित हो गई है। इसमें शिक्षा का उद्देश्य क्या है? वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सही है या नहीं? अपनी भाषा में शिक्षा देने के क्या लाभ हैं? शिक्षा के निजीकरण से क्या नुकसान हैं? शिक्षा और समाज में अंग्रेजी का वर्चस्व क्यों तेजी से बढ़ रहा है? क्या इसका कोई हल है? आदि भाषा, शिक्षा और समाज से जुड़े सवालों पर कथाकार-विचारक प्रेमपाल शर्मा से लम्बी बातचीत की गई है।

88 पेज की इस पुस्तक का मूल्य 50 रुपये (पेपरबैक्स) और 100 रुपये (हाईबाउंड) रखा गया है।

पुस्तक मंगाने का पता-
लेखक मंच प्रकाशन, 433, नीति‍खंड-तीन इंदि‍रापुरम, गाजि‍याबाद पि‍न-201014 उत्त र प्रदेश मोबाइल- 09871344533