Archive for: January 2014

सुभाष चन्द्र लखेड़ा की लघुकथाएं

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

रक्षा शरीर क्रिया एवं सम्बद्ध विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत वैज्ञानि‍क सुभाष चन्‍द्र लखेड़ा के वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों से जुड़े तीस से अधिक शोधपत्र एवं रिपोर्ट प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। एक हजार पांच सौ से अधिक वैज्ञानिक लेख और विविध रचनाएं राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं और वि‍ज्ञान वि‍षयक करीब 140 वर्ताएं आकाशवाणी से प्रसारि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन लघुकथाएं- 

अपनी-अपनी कीमत   

राघवजी इस बार फिर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। वे पिछले चुनाव में हुई अपनी हार के कारणों का विश्‍लेषण कर रहे थे। उन्हें याद आये अपने  क्षेत्र के जाने-माने

लोक कवि ‘जागर’। जागरजी ने उस चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी को अपना समर्थन दिया था। इसकी खास वजह भी थी। राघवजी इस क्षेत्र में मौजूद सभी शराब की दुकानों के मालिक थे और गांधीजी के अनुयायी जागरजी मद्य निषेध के कठोर समर्थक। ऐसे में वे राघवजी का समर्थन कैसे कर सकते थे ? खैर, ऐसा नहीं था कि तब राघवजी ने उनका समर्थन पाने के लिए कोशिश न की थी। वे तो किसी दलाल के माध्यम से जागरजी को  एक लाख रुपये तक देने को तैयार थे, लेकिन जागरजी ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
बहरहाल,  राघवजी के पास तभी उनके एक मित्र सुजान सिंह आये। वे स्थानीय इंटर कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक थे और अभी कोई दो वर्ष पूर्व यहाँ स्थानांतरित होकर आये थे।

राघवजी ने जब सुजान सिंह जी को जागर जी वाली बात बताई, तो थोड़ी देर तक तो वे भी किसी सोच में डूबे दिखे, लेकिन तभी वे खिलखिलाते हुए बोले, ” इस बार जागरजी का समर्थन आपको ही मिलेगा और अगर आपको नहीं भी मिला तो इतना पक्का समझिये कि किसी दूसरे को भी नहीं मिलेगा।”

” लेकिन वह कैसे ? ” राघवजी ने अपनी खुशी को दबाते हुए पूछा।

” बस आपको एक शॉल, श्रीफल और कुछ लोगों के लिए जलपान का प्रबंध करना है। यही कोई पांच-छह हजार खर्च होगा।” सुजान सिंह ने बताया। फिर उन्होंने अपनी इस योजना को सविस्तार राघवजी को समझाया।

एक सप्ताह बाद जागरजी को एक स्थानीय संस्था की ओर से ‘राष्ट्र गौरव सम्मान’ से  सम्मानित किया गया। समारोह में राघवजी के हाथों से उन्हें पुष्प माला पहनाई गई और शॉल एवं श्रीफल भेंट किया गया।
एक लाख रुपये में न बिकने वाले जागरजी को एक शॉल और श्रीफल में खरीदा जा चुका था और खुद जागरजी भी ये न जान पाये कि वे बिक चुके हैं।

उम्मीद

अपनी झुग्गी में लेटा हुआ वह अपने भविष्य के बारे में सोच रहा था। उसे गाँव में किसी रिश्तेदार के द्वारा कहे ये शब्द याद आ रहे थे- मुन्ना, शहर जा रहे हो तो वहाँ

ऐसा काम पकड़ना जिसमें भविष्य सुनहरा हो, भले ही शुरू में पैसे कम मिलते हों।

काफी सोच-विचार के बाद उसने तय किया कि वह चाय बेचने का काम करेगा क्योंकि कल शाम जब वह बगल के मैदान के सामने से गुजर रहा था तो कोई नेता मंच से कह रहा था- उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत चाय बेचने से की थी और देखिये अब वे इस देश के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं।

नजरिया 

सिन्हा साहब उस दिन शाम को पार्क में टहलते हुए मिले। अभी कुछ महीने पहले उनके बेटे की शादी में जाने का अवसर मिला था। कुशलक्षेम के बाद कुछ उदास स्वर में बोले, ” बहू का झुकाव अपने मायके की तरफ इतना अधिक है कि कभी-कभी लगता है कि‍ हमारा लड़का घर जंवाई है।

मैंने सांत्वना देते हुए कहा, ” आप चिंता न करें। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।” फिर मैंने टॉपिक बदलते हुए उनसे उनकी बेटी के बारे में पूछा तो उनके चेहरे की रौनक लौट आई। वे हँसते हुए बोले,” वर्माजी, भगवान ऐसी बेटी सबको दे। शादी हुए पांच साल हो गए हैं, लेकिन जब तक दिन में हमें दो बार फोन न कर ले, उसे चैन नहीं मिलता है।”

सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में परिवेशीय भाषा की भूमिका : महेश चंद्र पुनेठा

shekshik dakhal

शि‍क्षण का माध्यम कौन-सी भाषा हो? इस पर विचार करते हुए हमें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया पर भी साथ-साथ बात करनी होगी। यह माना जाता है कि सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है, आसपास के वातावरण, प्रकृति, चीजों व लोगों से कार्य व भाषा दोनों के माध्यम से संवाद स्थापित करना है। बच्चे सुनने, बोलने, पढ़ने, पूछने, उस पर सोचने, विमर्श करने तथा लिखित रूप से अभिव्यक्त करने से सबसे अधिक सीखते हैं। अर्थ से पहले अवधारणा को ग्रहण करते हैं। ये सब क्रियाएं अपनी परिवेश की भाषा में ही सबसे अच्छी तरह संभव हैं। स्कूल में प्रवेश करते समय बच्चे के पास बहुत सारी अवधारणाएं होती हैं, जो उसकी अपनी परिवेश की भाषा में ही होती हैं। उसका स्कूल में प्रयोग तभी हो सकता है, जबकि वहाँ उसकी परिवेश की भाषा को जगह मिलती है। आपने अनुभव किया होगा कि जब आप पढ़ाते हुए कभी-कभार बच्चों की बोली में उनसे बतियाने लगते हो या उनके घर-गाँव में बोले जाने वाले शब्दों का उच्चारण करते हो तो बच्चों के चेहरे एक अलग-सी आभा से चमक उठते हैं। उनके होंठों में मुस्कान बिखर जाती है। ऐसा लगता है जैसे वे आपके एकदम करीब आ गए हैं। कक्षा में चुप्पा-चुप्पा रहने वाले बच्चे भी अपनी चुप्पी तोड़ बतियाने लगते हैं। उन्हें शि‍क्षक अपने ही बीच का लगने लगता है। विषयवस्तु को वे बहुत जल्दी भी समझ जाते हैं। इससे पता चलता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा की क्या भूमिका है?

जैसा कि राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 कहती है कि ‘‘बच्चों को इस तरह सक्षम बनाया जाना चाहिए कि वे अपना स्वर ढूँढ़ सकें, अपनी उत्सुकता विकसित करें, स्वयं सीखें, सवाल पूछें, चीजों की जाँच-परख करें और अपने अनुभवों को स्कूली जानकारी के साथ जोड़ सकें।’’ यह कब संभव है? जबकि बच्चे के पास अपनी भाषा हो। यदि उसके पास अपनी भाषा ही नहीं है, अर्थात विद्यालय ऐसी भाषा को शि‍क्षण का माध्यम बनाता है, जो बच्चे के परिवेश में मौजूद नहीं है तो बच्चा अपना स्वर कैसे ढूँढ़ पाएगा?  कैसे अपनी उत्सुकता विकसित करेगा और सवाल पूछेगा, कैसे चिंतन-मनन करेगा? यह माना जाता है कि बच्चे उसी वातावरण में सबसे अधिक सीखते हैं, जहाँ उन्हें लगे कि वे महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं। बच्चे को महत्वपूर्ण समझे जाने की शुरुआत उसकी भाषा और अनुभवों को महत्वपूर्ण समझे जाने से होती है। उसकी भाषा से परहेज करने का मतलब है, उसके अनुभवों को नकारना क्योंकि बच्चा अपने अनुभवों को उसी भाषा में सबसे अच्छी तरह से व्यक्त कर सकता है जो उसने अपने परिवेश से सीखी है। यदि बच्चे को उसकी अपनी भाषा के प्रयोग से रोका जाता है तो वह अपने अनुभवों को व्यक्त नहीं कर पाता है। जो एक तरह की तनाव की स्थिति पैदा कर देता है और भय और तनाव सीखने में बाधक होता है। गैर परिवेशीय भाषा बच्चे के लिए बोझ बन जाती है और उसका आनंद जाता रहता है। आज कक्षा को एक ऐसा स्थान माना जाता है जहाँ विवादों को स्वीकार कर उन पर रचनात्मक प्रश्‍न उठाए जाते हैं तथा बच्चा अपने अनुभवों को अपने शि‍क्षकों और साथियों के साथ बाँट सकता है। कक्षा ऐसा स्थान तभी बन सकती है जब बच्चे के पास ऐसी भाषा हो जिसका वह सहज-स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल कर सकता हो।

जहाँ तक भाषा के विकास का सवाल है उसके लिए यह जरूरी माना जाता है कि बच्चे को सुनने-बोलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। जैसा कि हम मातृभाषा सीखने के संदर्भ में भी देखते हैं कि परिवार में बच्चे को भाषा सुनने और बोलने के पर्याप्त अवसर दिये जाते हैं। उससे अधिक से अधिक बात की जाती है। उसे कुछ न कुछ (टूटा-फूटा या आधा-अधूरा ही सही) बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस तरह वह धीरे-धीरे भाषा सहजता से सीख लेता है। जब बच्चे को उसके परिवेश की भाषा में बोलने से रोका जाता है तो इससे कहीं न कहीं उसकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होती है जिसके बिना भाषा का विकास संभव नहीं है। ऐसे बच्चे अपने भावी जीवन में दब्बू और संकोची होते हैं। सीखने में भी चिंतन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और यह एक परीक्षित तथ्य है कि मनुष्‍य हमेशा उसी भाषा में चिंतन करता है जिसे शैशवावस्था में वह सार्वधिक सुनता है, जिसको उसके परिवार और पास-पड़ोस में बोला जाता है, जिसे उसने अपने बड़ों से अनौपचारिक तौर से सीखा है।

यह अनुभवजनित सत्य है कि बच्चे की सीखने की गति अपने परिवेश की भाषा में ही सबसे अधिक होती है क्योंकि ऐसे में बच्चे का पूरा ध्यान विषयवस्तु पर होता है। उसे भाषा से नहीं जूझना पड़ता है। बच्चा सुनने और बोलने की भाषायी दक्षता अपने परिवेश से ग्रहण कर चुका होता है। यह भाषा किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ने में भी मददगार होती है। यदि किताबों की भाषा वह नहीं है, जो बच्चे के घर व पास-पड़ोस में बोली जाती है तो बच्चे के स्कूली जीवन और बाहरी जीवन के बीच एक रिक्तता बनी रहती है। बच्चा अपने आसपास के अनुभवों को अपनी कक्षा-कक्ष तक नहीं ले जा पाता है। न किताबी ज्ञान से उसका संबंध जोड़ पाता है। उसे हमेशा यह लगता रहता है कि स्कूली जीवन और घरेलू जीवन एक-दूसरे से अलग हैं, जबकि शि‍क्षा को जीवन से जोड़ने और रुचिकर बनाने के लिए जरूरी है कि इस अंतराल को समाप्त किया जाय। परिवेश से दूर की भाषा शि‍क्षण का माध्यम होने पर उसका प्रभाव बच्चे के बौद्धिक व संज्ञानात्मक विकास पर पड़ता है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह भी माना जाता है कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे अधिक सहायता परिवेषीय भाशा से ही मिलती है। उसमें सोचने और महसूस करने की क्षमता का विकास जल्दी होता है।चिंतनात्मक और सृजनात्मक योग्यता अधिक विकसित होती है। इस संदर्भ में अपने समय के महत्वपूर्ण कवि नरेश सक्सेना को उद्धरित करना चाहूंगा। उनका यह प्रश्‍न महत्वपूर्ण है कि क्या कारण है कि आजाद भारत में एक भी यानी पिछले 67 वर्षों में एक भी विश्‍वस्तरीय खोज या वैज्ञानिक आविष्‍कारक हमारे देश में संभव नहीं हुआ? जिसका वे स्वयं तर्कपूर्ण उत्तर देते हैं- ’’हमारे दिमाग मुक्त नहीं हैं, वे गुलामी की भाषा में जकड़े हुए हैं। हम यह साबित कर चुके हैं कि भारत की कोई भी भाषा इस लायक नहीं है कि विज्ञान, तकनीकी, इंजीनियरिंग या किसी भी विषय की उच्च शि‍क्षा उसमें दी जा सके। हमारे बच्चे यानी मध्यवर्ग के सारे बच्चे इंग्लिश पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं। बचपन से ही रटना शुरू कर देते हैं। वि‍षय को अपनी भाषा में पढ़ना, समझना,  सोचना और प्रश्‍न पूछना…..ज्ञान प्राप्त करने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया से वंचित रह जाते हैं।’’

एक बात और, परिवेशीय भाषा पर बच्चे का अधिक अधिकार होता है। भाषा पर अधिकार होने का सीधा मतलब है कि ‍ज्ञान के अन्य अनुशासनों में आसानी से प्रवेश कर पाना। पढ़ने में अधिक आनंद आना। सामान्यतः यह देखने में आता है जिस बच्चे का भाषा पर अधिकार होता है वह अन्य वि‍षयों को भी जल्दी सीख-समझ जाता है। उसके लिए अवधारणाओं को समझना सरल होता है। फलस्वरूप उसके सीखने की गति अच्छी होती है। इतना ही नहीं ऐसा बच्चा अन्य भाषाओं को भी सरलता से सीख पाता है। गैर-परिवेशीय भाषाओं में इसके विपरीत होता है। परिवेश की भाषा के पक्ष में एक सकारात्मक पहलू यह है कि जब बच्चा स्कूल जाना प्रारम्भ करता है, उस समय उसके पास अपने आसपास के वातावरण तथा प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन से अपने लिए जरूरी शब्दों का एक छोटा-मोटा भंडार होता है जिनका वह आवश्‍यकतानुसार प्रयोग करता है। स्कूल उसके इन शब्दों को आधार बनाकर उसके शब्द भंडार में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है। बच्चों में संवेगों, मानवीय मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्‍टि‍कोण व चारित्रिक गुणों का विकास भी परिवेशीय भाषा में बातचीत से अधिक संभव है। इसलिए जरूरी है कि शि‍क्षण का माध्‍यम बच्चे की परिवेश की भाषा ही होनी चाहिए। कम से कम प्रारम्भिक शि‍क्षा तो उसके परिवेश की भाषा में ही होनी चाहिए।

(‘शैक्षि‍क दखल’, वर्ष-3, अंक-3 का सम्‍पादकीय)

सच लिखने के लिए लेखक को दुस्साहसी होना चाहिए : पथि‍क

charan singh pathik

कोटा : करौली से पधारे राजस्थान के सुप्रसिद्ध कथाकार चरण सिंह ‘पथिक’ के सम्मान में ‘विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच द्वारा कला-दीर्घा में साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। गोष्ठी में नगर के प्रतिनिधि रचनाकार शामिल हुए।

उपस्थित रचनाकारों के बीच अपने जीवन-अनुभाव व सृजन-प्रक्रिया के बारे में बोलते हुए ‘पथिक’ ने कहा कि उन्होंने अपनी कहानियों में आस-पास के ग्रामीण यथार्थ का चित्रण किया है। उन्होंने कहा कि लिखना उनके लिए एक जुनून की तरह रहा है। लेखन-कर्म उनकी रगों में लहू के तेज उत्ताप की तरह बहता है। उनका मानना है कि सच लिखने के लिए लेखक को मात्र साहसी नहीं, बल्कि दुस्साहसी भी होना चाहिए।

हिंदी-कथा पर केन्द्रित परिचर्चा का प्रारम्भ करते हुए वरिष्ठ कथाकार लता शर्मा ने कहा कि चरण सिंह ‘पथिक’ की प्रारम्भिक कहानियों ने ही उनका ध्यान खींचा। हमें कोई भी रचना पढ़ते समय जानना चाहिए कि उसका मूल स्रोत कहां हैं। पथिक और उनकी कहानियों में कृत्रिम ताना-बाना नही होता, वे सच्चे जीवन के कलाकार हैं। वरिष्ठ कवि अंबिका दत्त ने ‘पथिक’ की कहानियों को विशिष्ट बताते हुए कहा कि वे कहानी को मजबूती से गढ़ते हैं, जूझते हैं और निष्कर्षों तक ले जाते हैं।

शकूर अनवर ने ‘पथिक’ की कहानियों के बारे में बताया कि उनमें ग्रामीण जीवन की नई सच्चाइयां हैं और वे बदलाव की दिशा की ओर संकेत करती हैं। रामनारायण ‘हलधर’ ने बताया कि ‘पथिक’ की कहानियों ने उन्हें बड़े आदर्शों की ओर प्रेरित किया। अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि ‘पथिक’ की कहानियां सहज होते हुए भी समय के जटिल यथार्थ को सामने लाती हैं। ओम नागर मे कहा कि ‘पथिक’ ने जिस ग्रामीण यथार्थ को जिया है, उसकी खूबसूरत अक्कासी भी की है।

परिचर्चा में प्रो. हितेश व्यास ने समाहार प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘पथिक’ की कहानियों में प्रेमचंद के यथार्थ का अनुकरण ही नहीं, अपितु नई जीवन-सच्चाइयों का विस्तार व आलोक भी है। लेखिका कृष्णा कुमारी ने गोष्ठी में अपनी ताज़ा गज़लें सुनाईं। परिचर्चा-गोष्ठी का संचालन ‘विकल्प’ के अध्यक्ष महेन्द्र नेह ने किया।

प्रस्‍तुति‍ : रवि कुमार, रावतभाटा, राजस्थान

नहीं रहा भारतीय कविता का विद्रोही कवि

नामदेव ढसाल

नामदेव ढसाल

विगत 15 फरवरी को मराठी दलित साहित्य के पुरोधा और दलित पैंथर आंदोलन के संस्थापक सदस्य चर्चित कवि नामदेव ढसाल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। वे लम्बे समय से बीमार थे, लेकिन निरन्तर सक्रिय भी थे। नामदेव ढसाल सिर्फ मराठी ही नहीं, बल्कि समूची भारतीय कविता के सबसे बड़े विद्रेाही कवियों में से एक कहे जा सकते हैं और शायद विवादस्पद भी। उन्होंने अपनी धारदार भाषा, नग्न यथार्थवादी काव्य संवेदना और रेडिकल अम्बेडकरवादी राजनीतिक दर्शन के बल पर मराठी कविता के रूप व तेवर को पूरी तरह बदल डाला। दलित रचनाशीलता के इस विद्रोही तेवर ने अन्य भारतीय भाषाओं की कविता को भी गहरे तक प्रभावित किया। हिंदी में दलित साहित्य की उग्रता
और परम्पराओं से विच्छेद के लिए नकार का पुरजोर स्वर मराठी दलित कविता से ही अर्जित की गयी है, जिसके पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नामदेव ढसाल की उपस्थिति रही है।

नामदेव ढसाल का जन्म 15 फरवरी 1949 को पुणे के एक गाँव पुर-कनेरसर में हुआ। उनका बचपन बम्बई के रेडलाइट एरिया गोलपीठा में बीता। गोलपीठा की गलियों में वे जिंदगी की नंगी सच्चाइयों को अपनी आँखों से देखा और उन्हीं के बीच बड़े हुए। महाराष्ट्र की दलित जाति महार में पैदा होने और निर्धनता के कारण उपेक्षा के दंश को उन्होंने कई स्तरों पर झेला। यही उपेक्षा उनके रचनात्मक व राजनीतिक ऊर्जा का स्रेात बनीं। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने अपने पहले कविता संग्रह का नाम ही रखा- गोलपीठा। इस संग्रह में संकलित ‘गोलपीठा’ कविता ने उन दिनों मराठी साहित्य में भूचाल ला दिया था।

उनका जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा। फाइन आर्ट में एक वर्षीय डिप्लोमा करने के बाद जीवन-यापन के लिए टैक्सी ड्राइवर की नौकरी करनी पड़ी, अन्य कई छोटी-मोटी नौकरियाँ उन्होंने कीं।
अम्बेडकरवादी विचारधारा में तो वे स्वाभाविक रूप से दीक्षित हुए ही डॉ. लोहिया से भी वे प्रभावित हुए। लोहिया के समाजवादी विचार से मार्क्सलवाद तक यात्रा उन्होंने की। 70 के दशक के शुरूआती वर्षों में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया नेतृत्व के विपथन व अवसरवाद से निराश होकर तथा नक्सलवादी आन्दोलन की ऊष्मा से प्रभावित होकर उन्होंने सुनील दिघे जैसे कुछेक मित्रों के साथ मिलकर दलित पैंथर आंदोलन की शुरूआत की। जिसका नामकरण अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन की तर्ज पर किया गया। दलित पैंथर भारत में रेडिकल दलित आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस आंदोलन ने दलित उत्पीड़न का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध की रणनीति को अमल में लाया जो पूरे देश में चर्चा का विषय बना।

बाद के दिनों में नामदेव ढसाल खुद वैचारिक-राजनीतिक विभ्रम के शिकार हुए। रेडिकल अम्बेडकरवाद से मुँह मोड़कर उन्होंने जे.पी. के सम्पूर्ण क्रांति‍ का समर्थन किया। यहाँ तक कि वे शिवसेना जैसे उग्र हिंदुत्ववादी संगठन के साथ चले गए। रेडिकल, वाम व लोकतांत्रिक दायरे के लिए उनका यह विपथन निश्चिय ही स्वीकार्य नहीं रहा। अपनी पीढ़ी के बहुतेरे प्रगतिशील-जनवादी तथा अम्बेडकरवादी लेखकों-साहित्यकारों से उनका सम्बन्ध, विष्णु खरे के शब्दों में, ‘समस्यामूलक मित्रवत या भातृवत्’ रहा है।
नामदेव का साहित्यिक व राजनीतिक सक्रियता लगभग साथ-साथ चलती हैं। राजनीतिक क्षेत्र में वे जितने विवादास्पद रहे उससे कहीं ज्यादा विवाद उन्होंने अपनी कविताओं से पैदा किए। अपनी कविताओं में उन्होंने धर्म, आस्था, आजादी, लोकतंत्र जैसे वर्चस्वशाली विचार व संस्थाओं की हिप्पोक्रेसी के खिलाफ अपनी घृणा और आक्रोश को पूरी शिद्दत और प्रतिबद्धता के साथ अभिव्यक्त किया। महाराष्ट्र के सबसे गरीब आदमी के घृणा व नकार की भाषा को उन्होंने मराठी दलित कविता की सर्वमान्य भाषा में तब्दील कर दिया। जैसा कि विष्णु खरे कहते हैं-“उसने गैर-दलित साहित्यिक प्रतिष्ठानों का विवश किया कि उसके जैसी कविता को ही समसामयिक मराठी मुख्यधारा मान लिया जाए। उन्होंने मराठी दलित कविता को अमानवीय जाति-व्यवस्था के खिलाफ याचना व आत्मदया के भाव से बाहर निकालकर कविता को जाति-व्यवस्था के खिलाफ प्रहार के हथियार में तब्दील कर दिया।

उन्होंने साहित्य के सर्वथा पवित्र क्षेत्र से हमेशा से अपवंचित कर दिए गए गंदगी के प्रतीकों, नग्न और जुगुप्साजनक बिंबों-फैंटसियों को कविता में इस्तेमाल किया, क्योंकि वही समाज के एक बडे हिस्से का सच है। उन्होंने विद्रोह के किसी कृत्रिम-बनावटी सौन्दर्यबोध से काम नहीं चलाया, बल्कि हाशिए की सच्चाई को समाज की आँखों में ऊँगली डालकर दिखाने का प्रयत्न किया, इस तरह वे कविता को साहित्य के निषिद्ध क्षेत्र में ले आए। इसने कविता के क्षेत्र में व्यापक तोड़-फोड़ मचायी, जिससे बाद की कविता ने बहुत कुछ सकारात्मक तत्व ग्रहण किए।

अपनी कविता ‘मेरी प्रिय कविता’ में वे कहते हैं-
“मुझे नहीं बसाना है अलग से स्वतंत्र द्वीप
फिर मेरी कविता, तू चलती रह सामान्य ढंग से
आदमी के साथ ऊंगली पकड़ कर,
मुट्ठी-भर लोगों के सांस्कृतिक एकाधिपत्य से किया
मैंने जिन्दगी भर द्वेष
द्वेष किया मैंने अभिजनों से, त्रिमितिय सघनता पर बल देते हुए,
नहीं रंगे मैंने चित्र जिन्दगी के।
सामान्य मनुष्यों के साथ, उनके षडविकारों से प्रेम करता रहा,
प्रेम करता रहा मैं, पशुओं से, कीड़ों और चीटियों से भी,
मैंने अनुभव किए हैं, सभी संक्रामक और छुतही रोग-बिमारियां
चकमा देने वाली हवा को मैंने सहज ही रखा है अपने नियंत्रण में
सत्य-असत्य के संघर्ष में खो नहीं दिया मैंने खुद को
मेरी भीतरी आवाज, मेरा सचमुच का रंग, मेरे सचमुच के शब्द
मैंने जीने को रंगों से नहीं, संवेदनाओं के कैनवस पर रंगा है।”

उनके कुल ग्यारह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- गोलपीठा (1972),
मूर्खम्हातान्याने डोंगर हलवले (1975), आमच्या इतिहासतील एक अपरिहार्य पात्र: प्रियदर्शिनी(1976), तुही यत्ता कंची (1981), ढोल(1983), गांडू बगीचा(1986) या सत्तेत जीव रमत नाही, मी मारले सूर्याच्या रथाचे घोडे सात, तुझे वोट धरून चाललो आहे, इसके अलावा उन्होंने उपन्यास, नाटक जैसे विधाओं में लेखन किया। वे पद्मश्री सम्मान से भी नवाजे गए, अन्य कई पुरस्कार भी उन्हें मिले।

नामदेव ढसाल उत्तर अम्बेडकर समय के उन दलित बुद्धिजीवियों में शुमार हैं, जिन्होंने दलित चेतना को नए संदर्भों में देखा-परखा और एक स्तर तक उसका नेतृत्व भी किया। बाद के दिनों का उनका राजनीतिक विपथन उनके भीतर के बेचैन अनास्था की अभिव्यक्ति है या ‘अपना पुराना क्षितिज लांघने की उनकी कोशिश’ इसका विश्लेषण भविष्य में होना ही चाहिए।
हम उनकी स्मृति को सलाम करते हैं।

( जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, सह सचिव, जसम द्वारा जारी)

पहली अध्यापिका : आशिमा

आशिमा

आशिमा

आजादी से पूर्व गुलाम भारत में आजादी के लिए लड़ना एक बहुत ही कठिन काम रहा था। इसी आजादी को पाने के लिए हमारे कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान तक गवाई। लेकिन यह भी मानने वाली बात है कि ठीक उसी समय भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की स्थिति, दलितों के प्रति अन्याय, समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियाँ ऐसे कड़वे सच थे, जिनसे लड़ना सबसे ज्यादा कठिन और जरूरी था। लगभग सभी स्वतंत्रता सेनानियों की लड़ाई इन सब से भी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति का मतलब था- अंग्रेजों के वर्चस्व से लड़ना, लेकिन तमाम भारतीय समाज की कुरीतियों से लड़ने का मतलब था- खुद अपनों से भी लड़ना जिसमें और ज्यादा संघर्ष इन लोगों के आड़े आकर खड़ा होता था। यही वह समय था जब फूले दंपति; (महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्रीबाई फूले) ने अपना महत्वपूर्ण व अतुलनीय योगदान समाज की इन कुरीतियों, महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति जैसी चीजों को खत्म करने में लगा दिया।

सावित्रीबाई फूले देश के पहले महिला स्कूल की पहली महिला अध्यापिका थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। उन्होंने अपने पति के सहयोग से देश में पहली बार महिला शिक्षा की नींव रखी। यह उन्नीसवी सदी की शुरुआत का वही समय था, जब देश में जाति आधारित भेदभाव का पूरा जोर था, छुआछूत चरम पर थी, उससे भी बढ़कर महिलाओं का समाज में कोई इंसानी अस्तित्व कभी नहीं समझा जाता था। एक समय जब देश में सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध जोरों पर था, सावित्रीबाई विधवा पुनर्विवाह सभा का आयोजन करती थीं, जिसमें नारी संबंधी समस्याओं का समाधान भी किया जाता था। सावित्री बाई एक दलित परिवार से आने वाली महिला थीं और उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने इस अतुलनीय योगदान से जातीय भेदभाव समर्थक रूढ़िवादी व पुरुषवादी समाज को सीधी चुनौती दी। देश की महिलाओं को शिक्षित करने के पहले प्रयास में महात्मा फूले ने अपने खेत के आम के पेड़ के नीचे स्कूल शूरू किया। इसमें सगुणाबाई क्षीरसागर, सावित्रीबाई फूले विद्यार्थी थीं। उन्होंने खेत की मि‍ट्टी में टहनियों की कलम बनाकर शिक्षा लेना प्रारम्‍भ किया। एक शिक्षित महिला होने की वजह से उस समय धर्म और जाति के कई ठेकेदारों ने उन्हें कई प्रकार की गालियाँ दीं, धार्मिक मूल्य भ्रष्ट करने वाली कहा, उनपर लांछन लगाए गए, उनपर गोबर और पत्थर तक फेंका गया। लेकिन सावित्रीबाई व ज्योतिबा फूले ने शूद्र एवं महिला की मुक्ति के प्रयास के क्षेत्र में अपनी रखी नींव को हिलने नहीं दिया और अपने प्रयास जारी रखे। सावित्रीबाई ने 1853 में बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, इसमें कई विधवाओं की प्रसूति हुई।

दोनों ने मिलकर सत्य-शोधक समाज की स्थापना की, इस संस्था को खूब कामयाबी मिली, और सावित्री बाई फूले इस संस्था की मुख्य अध्यापिका के रूप में नियुक्त हुईं। 1851 में दोनों ने पुणे में लड़कियों का दूसरा स्कूल खोला, इसके साथ ही 1852 में लड़कियों का ही तीसरा स्कूल खोला। सत्य-शोधक समाज ने 1876 व 1879 के दौरान हुए अकाल में अन्नसत्र चलाने शुरू किए। इस प्रयास के जरिये आश्रम में रहने वाले बच्चों के भोजन का बंदोबस्त किया जाता था।

1890 में महात्मा ज्योतिबा फूले की मृत्यु हो गई। सावित्रीबाई फूले ने अपना बचा हुआ जीवन इन सभी कार्यों को पूरा करने में लगा दिया। सावित्रीबाई की मृत्यु 1897 में प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई।

एक महान स्त्री का सम्‍पूर्ण जीवन महिलाओं की शिक्षा व उनके हक की लड़ाई में बीत गया। विडंबना यह है कि आज भी देश में जहाँ जातीय भेदभाव चरम पर है, वहीं महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की स्थिति वैसी की वैसी बनी हुई है। जहाँ महिला लिंग अनुपात परेशान करने वाला है, वहीं उनकी समाज में हैसियत व शिक्षा के अवसरों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ हैं। महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है। हर रोज बदलावों की बातें तो की जाती हैं, महिलाओं के हक के लिए प्रयास करना, योजनाएँ बनाना आज भी जारी है, लेकिन सच्चाई के धरातल पर अब भी तस्वीर परेशान करने वाली ही है। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आज भी पुरुष प्रधान समाज में औरतों का पालन पोषण व शिक्षा सिर्फ इसी तरह से की जाती है ताकि उनकी शादी हो जाये। महात्मा फूले भी एक पति थे, जिन्होंने अपनी पत्‍नि‍ को पढ़ाने से लेकर उनके हर संघर्ष में साथ दिया। ऐसा आदर्श आज के आधुनिक समाज में बहुत कम पतियों में देखने को मिलता है, क्योंकि पुरुषवादी वर्चस्व अपनी गहरी जड़ें छोड़ने को तैयार नहीं है।

एक महिला का सम्‍पूर्ण जीवन इन्हीं जड़ों से लड़ाई को लड़ने में लग जाता है, लेकिन आगे आने वाली पीढ़ियाँ फिर भी सबक नहीं लेतीं, इससे ज्यादा दुखद बात कोई और नहीं हो सकती। फूले दंपति समाज के लिए ऐसे प्रेरणा स्त्रोत हैं, जिनसे स्त्री और पुरुष दोनों को सीख लेने की जरूरत है। महात्मा फूले एक महान पुरुष, जिन्होंने स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति को समझा और उनके हक के लिए संघर्ष किया, साथ ही उसी संघर्ष में प्रयासरत अपनी पत्नि का भी भरपूर सहयोग किया। सावित्री बाई फूले, जिन्होंने देश की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव हासिल किया। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि यदि आज देश की महिलाओं को कलम पकड़ने की आजादी है तो उसकी नींव बरसों पहले सावित्रीबाई फूले ने ही रखी थी। उनका यह योगदान हमेशा याद रखा जाना चाहिए।

राजनीति का ककहरा : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

बहुत रोचक खेल है राजनीति। कभी साँसों को तेज-तेज चलाने वाला खेल, तो अगले ही पल कभी गला भींचता। इधर फूँक-फूँक कर कदम रखते हुए कुछ नवीनता के मोह या स्वाद बदलने की खातिर कुछ दिन पहले मैं उस गली में टहल रहा था, जिसे लोकतंत्र का जश्‍न कहते हैं। ‘अजी क्यों दें इनको वोट! इनसे पूछो कि तुम हमारे लिए क्या करोगे, क्या दोगे! हम इनकी बातों में नहीं आने वाले।’ ये सज्जन भारत सरकार से सेवानिवृत्त हुए हैं। मोटी पेंशन लेते हैं। कथाकार चंद्रकिरन सोनरिक्सा के शब्दों में, उस सरकारी जाति के हैं जिसे नौकरी, यानी सेवानिवृत्ति तक मुफ्तखोरी और फिर पेंशन की सुविधा मिली हुई है। दिल्ली में अच्छे बंगले में रहते हैं। बगल में सुंदर पार्क। इन्हें फिर भी कुछ चाहिए। मतलब इनसे बच कर चंपारण के गाँव या छत्तीसगढ़ के आदिवासियों तक कुछ नहीं पहुँचना चाहिए!

खैर, एक जगह उम्मीदवार के पहुँचने में थोड़ी देर थी। मगर लोग बर्छी-भाले पैना कर रहे थे। तलवारें चमक रही थीं। एक-एक कर लोग कुछ ऐंठते हुए-से जुट रहे थे। ‘वोट माँगते वक्त कैसे हाथ जोड़े आते हैं! फिर पता नहीं चलेगा।’ बीच-बीच में यह वाक्य उछल रहा था। उम्मीदवार आया। चेहरा उड़ा हुआ। गला बैठा हुआ, फिर भी बोला, मनुहार की। राजनीति में पहली बार कूदने की थकान साफ थी। देखते-देखते लहूलुहान कर दिया बेचारे को वोटरों ने। कश्मीर पर क्या करोगे, औरतों की सुरक्षा कैसे होगी और कैसे होंगे बिजली के दाम कम! बाप रे बाप! इतना हिसाब-किताब कि दिल टूटने लगा!

पिछले महीने ही किसी तारीख को गेट पर भंडारा चल रहा था। फिर भंडारा! कुछ दिन पहले ऐसे ही एक कीर्तन के आयोजन के खिलाफ मैंने शिकायत की थी। लेकिन इस भंडारे पर गुस्सा पी गया और आगे बढ़ कर प्रसाद खाया। मौका था वहाँ जमा भीड़ के बीच जाकर पार्टी का प्रचार करने का। जनता के बीच राजनीति करनी है, तो उनकी हाँ में हाँ मिलानी होगी। वह वैज्ञानिक है या अवैज्ञानिक। मन में द्वंद्व उभरता है कि क्या समझौतावाद की तरफ बढ़ रहे हो, वाकई! याद आया कि पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की दौड़ में ओबामा के गले में हनुमान का ताबीज लटका हुआ था। सूरज की अगली किरणों के साथ फिर हिम्मत जुटाई। मतदाता के दरवाजे पर खड़े हैं- ‘इस बार वोट उसको देना। हम मकान नंबर छियानबे में रहते हैं।’ जवाब मिला कि जी, आपको कहने की जरूरत नहीं। हम भी देंगे और इनसे भी दिलवाएंगे। हम तो चाहते हैं कि पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर राजनीति में आएँ। फिर क्यों नहीं आते?

सिंगापुर के प्रधानमंत्री लीकुआन अपनी ग्रंथाकार जीवनी ‘थर्ड वर्ल्ड टू फर्स्ट’ में लिखते हैं कि सिंगापुर को करिश्माई मुल्क बनाने में मैंने अपने देश के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, इंजीनियर, डॉक्टरों को राजनीति में आने के लिए फुसलाया, प्रेरित किया। सबसे अच्छे दिमाग आखिर राजनीति से दूर क्यों रहें! शुरू में इन्हें लाने में मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि इनके मिजाज में लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनने-समझने का धैर्य नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे देश-विदेश में पढ़ी इन प्रतिभाओं के जुड़ने से सिंगापुर की राजनीति भी बदल गई और शासन भी। आज हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में शामिल हैं। एयरलाइंस से लेकर शिक्षा, प्रशासन, अर्थव्यवस्था- सभी क्षेत्र में।

लेकिन हमारे देश के लोकतंत्र में इनकी भागीदारी न नेता चाहते हैं, न दल। तथाकथित बुद्धिजीवी लेखक भी नहीं। नेता क्यों अपने वंश की जड़ों पर मट्ठा डालें और बुद्धिजीवी चालाक लोमड़ी की तरह हैं। आजादी भी तो रहती है, मनमर्जी सत्ता की तरफ जुड़ने या उसे छोड़ने की! मालपुए पूरे, मेहनत थोड़ी-बहुत! वह भी वातानुकूलित ड्राइंगरूम या सेमिनारों में। जब जिसे चाहें, कठघरे में खड़ा कर दें कागजों में। शायद इसीलिए बुद्धिजीवियों और लेखकों को कागजी शेर भी कहा जाता है। हिंदी पट्टी पर तो यह पूरी तरह लागू होती है। इसीलिए राजनेताओं ने इन्हें गिनना ही बंद कर दिया है। खैर! हर समाज में सबकी तरह इन्हें भी रहने का हक है।

मेरे पड़ोसी का बेटा हमारी पार्टी के साथ था। उसे मतदान केंद्र एजेंट बनना था। पता नहीं क्या हुआ कि उसके बाद न उसके पिता दिखाई दिए, न बेटा। नए लोगों के नाम-पते से मेरी डायरी भरती जा रही है। इतने लोगों से मिलना कि दिमाग का आयतन छोटा पड़ जाए या फूट जाए! अपने आसपास के पड़ोसियों को पहली बार जान रहा हूँ। जिस दो कुत्ते वाले पड़ोसी से मैं अब तक नहीं बोला था, उस दिन उसके कुत्ते को मैंने पुचकारा और रोक कर उसका हाल-चाल पूछा! जिस सज्जन के दिल का इलाज हुए तीन महीने हो चुके हैं, उनका दर्द जानने की फुर्सत मुझे अब मिली थी। वाकई राजनीति सिर्फ तोड़ती ही नहीं, जोड़ती भी है! भले ही मतलब की खातिर!