Archive for: December 2013

नए साल पर : कमल जोशी

kamal joshi. new year
इस बार मत सोचना
अपने और अपनों के बारे में।
सोचना कुछ
उदास आँखोंवाले भूखे बचपन के बारे में।
खाली हाथ जवानी के बारे में।
जीने, और थोड़ा और बेहतर जीने के
सपने देखनेवाली लड़की के बारे में।
दिन-भर हाड़ तुड़ाती, मेहनत करती
फिर भी भूखी रहती व पिटती औरत के बारे में।
बंधती, बिकती और लुटती नदी के बारे में।
पानी के बारे में, हवा के बारे में, जंगल के बारे में
और गौरय्या के बारे में।

और हाँ! सोचना जरूर,
इन नेताओं के बारे में,
अपने गुस्से के बारे में
अपने निश्चय के बारे में !

मैं कविता के लिए इंतजार करता हूँ : संतोष अलेक्‍स

संतोष अलेक्स

संतोष अलेक्स

द्वि‍भाषी कवि एवं बहुभाषी अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्‍स को अनुवाद एवं सृजनात्‍मक लेखन के माध्‍यम से भारतीय साहित्‍य को दिए गए योगदान के लिए हाल ही में ‘एशियन एडमाइरेबल एचिवर’ की उपलब्धि से नवाजा गया। इस अवसर पर युवा कवि विमलेश त्रिपाठी द्वारा लिया गया साक्षात्‍कार-

आप अनुवादक होने के साथ-साथ कवि भी हैं। अनुवाद और लेखन में किसे आप अधिक निकट महसूस करते हैं ? अनुवाद में कब से कार्यरत हैं और आपकी अनुवाद यात्रा पर संक्षिप्‍त रूप में बताएं

मैं दोनों को महत्‍वपूर्ण समझता हूँ। लेखन सृजन है और अनुवाद पुन: सृजन। लेकिन लेखन की अपेक्षा अनुवाद काफी मुशिकल होता है। अनुवादक का काम स्रोत भाषा में प्रस्‍तुत सामग्री को लक्ष्‍य भाषा में प्रस्‍तुत करना होता है।

मैं पिछले दो दशकों से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हूँ। मैं पाँच भाषाएँ बोलता हूँ और उन भाषाओं में अनुवाद करता हूँ। मैंने शुरुआत मलयालम कहानियों का हिन्‍दी में अनुवाद करते हुए की। फिर कविताएँ और उपन्‍यासों का हिन्‍दी में अनुवाद किया। मलयालम कवियों में  अयप्‍प पणिक्‍कर, ओ एन वी आदि से लेकर युवा कवि पी.ए. अनीश तक की कविताएँ एवं कहानीकारों में एमटी वासुदेवन नायर से लेकर युवा कहानीकार संतोष एचिकानम तक की कहानियों का हिन्‍दी में अनुवाद किया। इस बीच में मलयालम रचनाकारों को अंग्रेजी में भी परिचित करवाया। उसी प्रकार हिन्‍दी के युवा कवियों को मलयालम में परिचित करवाया। तेलुगु के चर्चित कवि के. शिवारेड्डी, एम हैमावती, गरीमल्‍ला नागेश्‍वर राव, शिखामणि आदि को हिन्‍दी में परिचित करवाया। मशहूर अंग्रेजी कवि जयंत महापात्र की कविताओं का हिन्‍दी में अनुवाद किया और हिन्‍दी कवि एंकात श्रीवास्‍तव की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया।

हाल ही में मेरे द्वारा किया गया तमिल कवयित्री सलमा की कविताओं का हिन्‍दी अनुवाद ‘पूर्वग्रह’ में प्रकाशित हुआ। साहित्‍य अकादमी के अनुरोध पर मलयालम के मशहूर उपन्‍यासकार वैकम मुहम्‍मद बशीर के उपन्‍यास का हिन्‍दी अनुवाद ‘दीवारें’ शीर्षक से कि‍या। अब तक मेरी अनुवाद के नौ किताबें हिन्‍दी में एवं एक किताब अंग्रेजी में प्रकाशित है। मेरी अनूदित रचनाओं का प्रकाशन समकालीन भारतीय साहित्‍य, राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी, मध्‍यप्रदेश साहित्‍य अकादमी, भारतीय भाषा परिषद, भारतीय अनुवाद परिषद, भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिकाओं, कादंबिनी, आजकल आदि पत्रिकाओं में हो चुका है।

अनुवाद और रचनात्‍मक लेखन में आपके लिहाज से क्‍या अंतर है ?

जैसा मैंने पहले कहा कि‍ लेखन सृजन है और रचनात्‍मकता पुन: सृजन। रचनात्‍मकता में लेखक आजाद है। वह साहित्‍य की किसी भी विधा पर लिख सकता है। लेखक कहानी या कविता में अपने विचारों को प्रस्‍तुत करता है। अनुवादक उस कहानी या कविता को दूसरी भाषा में प्रस्‍तुत करता है। जहाँ तक कहानी की बात है, अनुवादक को ज्‍यादा मश्‍क्‍कत करने की जरूरत नहीं पडती। लेकिन जब कविता का अनुवाद होता है, तो अनुवादक तनाव में पड़ जाता है। यह इसलिए है कि स्रोत भाषा की कविता को लक्ष्‍य भाषा में प्रस्‍तुत करना आसान नहीं होता।

कभी-कभी मूल भाषा में ही कविता को ठीक तरह से समझ पाना मुशिकल होता है। ऐसे में उसका अनुवाद तो दूर की बात है, कभी-कभी कविताएँ ठीक तरह से खुल नहीं पातीं। ऐसे में मूल लेखक से संपर्क करता हूँ ताकि अर्थ का अनर्थ न हो जाए।

आपने दक्षिण भारत के बहुत सारे लेखकों का अनुवाद हिन्‍दी में किया है। अनुवाद करते समय कौन लेखक आपको अपने बहुत निकट लगा। साथ में यह प्रश्‍न भी कि‍ किस लेखक को अनुवाद करते समय आपको कड़ी मशक्‍कत करनी पड़ी ?

जैसे मैंने पहले बताया मैंने तेलुगु, तमिल और मलयालम से हिन्‍दी में अनुवाद किया। वैसे जिन लेखकों का अनुवाद किया वे मेरे पसंद के ही लेखक हैं। मुझे मलयालम के कवि ए. अयप्‍पन, अनवर अली और अनिता तंभी की कविताओं का अनुवाद करने में कठिनाई महसूस हुई।

ए. अयप्‍पन की कविताओं के तेवर को अनुवाद में ला पाना मुशिकल होता है। अनवर अली और अनिता तंभी की कविताओं का भाषागत सौंदर्य अनुवादक के लिए चुनौती भरा होता है।

भारत की विभिन्‍न भाषाओं से हि‍न्‍दी में ढेर सारे अनुवाद हुए हैं, लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद उतना नहीं हुआ। आप इसका क्‍या कारण मानते हैं ? क्‍या आपने हिन्‍दी से दक्ष्‍िाण भारतीय भाषाओं से अनुवाद का कार्य किया है  ?

हाँ, यह सही बात है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं से हिन्‍दी में काफी अनुवाद हुआ है। इसकी एक वजह यह है कि हिन्‍दी देश की राष्‍ट्रभाषा है और देश में सबसे ज्‍यादा बोली और समझी जाती है। इसलिए प्राय हर लेखक अपनी रचनाओं का हिन्‍दी में अनुवाद होते देखना पसंद करेगा। यही नहीं एक बार किसी रचना का अनुवाद हिन्‍दी में हो जाती है, तो हिन्‍दी माध्‍यम से उस रचना का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो जाता है।

जहाँ तक हिन्‍दी रचनाओं का दक्षि‍ण भारतीय भाषाओं में अनुवाद की बात है, अनुवाद तो हो रहे हैं लेकिन पर्याप्‍त मात्रा में नहीं। इसके कई कारण हैं। पहला- अच्‍छे अनुवादकों की कमी। दूसरा- पत्रिकाओं का अभाव जो अनूदित साहित्‍य को प्रकाशित करें। तीसरा- सम्‍पादकों का संकुचित दृष्टिकोण।

हिन्‍दी में लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अनुवाद के लिए स्‍थान रहता है। दक्ष्‍िाण भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पत्रिकाओं की स्थिति भिन्‍न है। जहाँ तक मलयालम की बात है, यहाँ की पत्रिकाएँ अनूदित रचनाओं को कम ही प्रकाशित करती हैं।  यहाँ की ‘मातृभूमि’ पत्रिका हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारतीय भाषाओं की चुनिंदा कहानियों का मलयालम अनुवाद प्रकाशित करती है, विशेषांक के रूप में। इसके अलावा ‘पच्‍च कुदिरा’, ‘साहित्‍य लोकम’, ‘यरलव’ और ‘तोरचा’ जैसी मलयालम पत्रिकाओं में मेरे द्वारा अनूदित हिन्‍दी कवि एकांत श्रीवास्‍तव, बद्रीनारायण, अनामिका आदि की कविताओं का अनुवाद प्रकाशित हुआ है। आमतौर पर मलयालम में पत्रिकाएँ अनुवाद कम ही प्रकाशित करती हैं।

आप अच्‍छे कवि भी हैं। कविता को लेकर आज बहुत सारे सवाल उठाए जा रहें हैं- अच्‍छी कवि‍ता नहीं लिखी जा रही है, जैसे कई सवाल हैं। इसके बारे में आपकी क्‍या राय है ?

कविता तो हमेशा से हाशिए पर रही है। इसलिए इसे अंग्रेजी में नेगलेक्‍टेड जेनेर कहते हैं। मेरी राय में अच्‍छी कविता किसी बिंदू या खास विषय पर नहीं लिखी जाती। अच्‍छी कविता की कोई खास परि‍भाषा नहीं है। यदि कविता पाठक को सोचने में बाध्‍य करे, उसे झकझोरे तो अच्‍छी कविता कही जा सकती है। आज अच्‍छी कविता न लिखने के कई कारण भी हैं। पहला, युवा कवि वरिष्‍ठ कवियों की कविताओं को पढ़ते नहीं है। न ही कविता की यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है- इफ यू वांट टू बीकम ए मास्‍टर रीड यूवर मास्‍टर्स। यही नहीं आज के युवक बहुत जल्‍दी नाम कमाना चाहते हैं। इस चक्‍कर में वे कविता को या रचना को परिपक्‍व होने तक इंतजार नहीं करते। यह बात कविता या रचना के लिए बहुत घातक साबित हो सकती है।

महत्‍वपूर्ण कवि होने के नाते आप कविता के गंभीर पाठक भी हैं। हिन्‍दी ही नहीं दक्षिण के अन्‍य कवियों की कविताओं से आपका गहरा परिचय है। हिन्‍दी में पठनीयता के संकट की बात बार-बार कही जाती है। क्‍या यह संकट तेलुगु, मलयालम एवं अन्‍य दक्षिण भारत की भाषाओं में भी है  ?

यह सवाल पहले के सवाल से मिलता हुआ सवाल है। कविता का पठनीय होना और अच्‍छी कविता अन्‍योन्‍याश्रित है। कविता कई प्रकार की हो सकती है। कभी छोटी कविता, तो कभी लंबी। कभी मात्र बेनेवलेंट एक्‍सप्रेशन होती है।

यह संकट तेलुगु, मलयालम, तमिल, कन्‍नड आदि दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी है। इन भाषाओं में बहुत सारे कवि भी हैं। जब कविता कथ्‍य, शिल्‍प और भाषा की दृष्टि से संतुलित हो, तो कविता पठनीय होती है।

समकालीन कविता की बात करें तो कई आलोचकों का आरोप है कि आजकल फार्मूला के आधार पर कविताएँ लिखी जा रही हैं। आप स्‍वयं को इस आरोप से कितना मुक्‍त मानते हैं ?

समकालीन कविता फार्मूला के आधार पर लिखी जा रही है, मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा ख्‍याल है कि कविता जन्‍म लेती है। आजकल कविताएँ जबरदस्‍ती लिखी जा रही हैं। कविता जब तक पूर्ण रूप नहीं लेती, उसे उतारा नहीं जाना चाहिए। कई बार कविता दूसरे व तीसरे ड्राफ्ट में परिपक्‍व रूप धारण करती है, तो कभी-कभी यह पहली बार ही वांछित रूप प्राप्‍त करती है। मैं कविता के लिए इंतजा़र करता हूँ।

आप मलयालम, हिन्‍दी एवं अंग्रेजी तीनों भाषाओं में कविता लिखते हैं। अपनी कविताओं के बारे में कुछ बताएँ।   

मलयालम में मेरे दो काव्‍य संग्रह प्रकाशित हैं। पहला 2008 में ‘दूरम’ शीर्षक से और दूसरा 2013 में ‘जान निणेक्‍क ओरू गज़ल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। हिन्‍दी में मेरी कविताएँ पिछले चार सालों से प्रकाशित हो रही हैं। मेरा पहला काव्‍य संग्रह ‘पाँव तले की मिट्टी’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है।अंग्रेजी में मैंने बहुत कम कविताएँ लिखी हैं। यह मेरे लि‍ए सौभाग्‍य की बात है कि इनमें कुछ कविताओं का प्रकाशन ‘सनराइस फ्राम द व्‍लू थंडर’, ‘इंडो आस्‍ट्रेलियन एंथोलोजी आफ कंटेपोरेरी पोएट्री : वाइब्रेंट वोएसेस’ आदि अंतरराष्‍ट्रीय काव्‍य संग्रहों में हुआ है।

आपके पहले काव्‍य संग्रह के लिए अग्रिम बधाइयाँ। समकालीन  हिन्‍दी कविता का भविष्‍य क्‍या है। बहुत लोग कहते हैं कि यह दौर गद्य का है। इसके बारे में आपके क्‍या विचार हैं ?

धन्‍यवाद। हिन्‍दी कविता के भविष्‍य के बारे में कुछ कहने की हिम्‍मत मैं नहीं रखता। आज हिन्‍दी में कविता की कोई कमी नहीं है। पहले की अपेक्षा कवियों की संख्‍या ज्‍यादा है।

हाँ, निश्‍चितरूप से यह दौर गद्य का है। आज कविता गद्य में लिखी जाती है। लेकिन दुख की बात है कि गद्य का रूप लेने के कारण कवियों की संख्‍या बढ़ गई है। लोग यह समझने लगे हैं कि खत लिखना आता है, तो कविता भी लिखी जा सकती है। यही नहीं, फेसबुक और ब्‍लॉग के चलते प्रकाशन आसान हो गया है। हर कोई कवि बन गया है। यह भी देखा गया है कि दसेक कविताएँ प्रकाशित होने के बाद युवक काव्‍य संग्रह प्रकाशित कर रहे हैं। यह कविता के लिए खतरा है। इनमें से कितने टिके रहेंगे, यह वक्‍त ही बताएगा।

अनुवाद की दिशा मे आपके भविष्‍य की योजनाएँ क्‍या हैं ? मतलब आप अभी अनुवाद की किन योजनाओं पर काम करे रहे हैं ?

फिलहाल मैं तिब्‍बती कवि तेनसिंग सूंडे की कविताओं का हिन्‍दी में अनुवाद कर रहा हूँ। समकालीन मलयालम कवियों का हिन्‍दी में अनुवाद कर रहा हूँ। हाल ही में केंद्रीय साहित्‍य अकादमी के लिए चर्चित मलयालम उपन्‍यासकार श्री सेतू के उपन्‍यास ‘अडयालंगल’ (प्रतीक) का हिन्‍दी में अनुवाद पूरा किया। युवा हि‍न्‍दी कवि‍यों की कविताओं का मलयालम में अनुवाद करने की योजना भी है।

समकालीन हिंदी कविता की चुनौतियाँ : राजहंस कुमार

राजहंस कुमार

राजहंस कुमार

4 जुलाई 1976 को जन्‍मे राजहंस कुमार के कई आलोचनात्‍मक लेख विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी आलोचना की पुस्‍तक ‘कविता खड़ी बाजार में’ प्रकाशित हो चुकी है। राजहंस कुमार को आलेख-    

समकालीनता क्या है? समकालीन कौन है? अलग-अलग समय में मौजूद होते हुए भी समकालीन हुआ जा सकता हैं या नहीं, जैसी अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए यदि हम इधर की हिन्दी कविता का समकाल तय करना चाहें, तो पिछले पच्चीस-तीस वर्ष की कविता इस दायरे में आ पाएगी। अर्थात समकालीन हिन्दी कविता की चुनौतियों पर बात करने का मतलब पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से एक खास मूड में लिखी जा रही कविता की चुनौतियों पर बात करना है। चुनौतियों की फेहरिस्त लंबी है, दिन-प्रतिदिन और लंबी होती जा रही है। इन चुनौतियों की संख्या, ढूँढ़नेवालों की बौद्धिकता एवम अभिव्यक्त की विलक्षणता के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। उदाहरणस्वरूप कविता की पठनीयता समाप्ति के कगार पर है। मीडिया, मनोरंजन, बाजार व तकनीक उसकी कल्पना और संवेदना को सोख रहे हैं। सोवियत रूस के विघटन के बाद की स्थितियों ने एक ऐसी अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, जो मनुष्य के अनुकूल नहीं हैं, और इसीलिए साहित्य के अनुकूल नहीं है। रचना उत्पाद में परिवर्तित हो गई है और पाठक उपभोक्ता में। एक बड़ा वर्ग- दलित, स्त्री, आदिवासी, अस्मिताबोध के रूप में कविता से अपना लोकतांत्रिक हक नहीं पा रहा। हमारी स्मृति का लोप हो रहा है। परिवार टूट रहा है। सामाजिकता खत्म हो चुकी है। मनुष्य निपट अकेला, कविता निपट अकेली इस ठिठके हुए समय में खड़ी है। अमूमन जब हम ऐसी चुनौतियों पर बात कर रहे होते हैं, तो एक साथ तर्क और भावुकता के उस अतिरेकी ढलान पर चढ़ जाते हैं, जिसकी परिणति ‘आवहूँ सब मिली रोबहूँ भारत भाई। हा-हा भारत दुर्दशा देखी न जाईं’ में ही होती है। जो जितने सुर में और मुद्राओं की विविधता में रोता है, वह कविता का उतना ही सगा और बड़ा आलोचक माना जाता है। पर हाहाकार की इस होड़ में हम कई तथ्य भूल जाते हैं। सबसे पहली बात यह है कि कविता के, खासकर खड़ी बोली में लिखी जाने वाली कविता के सौ सवा सौ वर्षों की आयु में, कभी भी आम जनता एवम कविता का संबंध प्रगाढ़ नहीं रहा। कविता को मिलने वाला पाठक वर्ग हमेशा से कम ही रहा है। मैथलीशरण गुप्त, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध सबकी पठनीयता, लोकप्रियता और स्मरणीयता, जिसे अकसर याद रहने वाली विशेषता कहते है, अकादमीय पाठ्यक्रमों एवम आलोचकीय विश्‍लेषणों के सहारे ही चलती रही है। स्कूलों, विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई जानेवाली कविता एवम साहित्यकार आलोचकों की रुचि के अनुसार पढ़ी और विश्‍लेषित की जाने वाली कविता के अतिरिक्त ऐसी कविताएँ विरल हैं, जो आम जनता या पाठक वर्ग की स्मृति में मौजूद हों। फिर अभी की कविता से ही ऐसी अपेक्षा क्यों? इतिहास साक्षी है कि पूर्व में ऐसी थोड़ी-बहुत कविताएँ जो लोकप्रिय हुईं, उन्‍हें हमारी आलोचना ने कभी मंचीय कविता कहा, तो कभी धीर-गंभीर शास्त्रीय कसौटी पर कसा, और खारिज किया। यदि आम जनता द्वारा पढ़ा जाना, मुख सुख और स्मरणीयता ही काव्य प्रतिमान है, तो ‘मधुशाला’ छायावाद एवम छायावादोत्तर काव्य इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में स्थापित होनी चाहिये, पर ऐसा है नहीं।

दूसरा तथ्य बदलाव से उपजे अन्य दबावों से संबंधित है। यह सच है कि वर्तमान समय में दबाव की शक्ति एवम बदलाव का त्वरण अभूतपूर्व है। पूँजीवाद एवम विविध जनसंचार माध्यमों द्वारा निर्मित ग्लोबल सूचना समाज ने हिन्दी कविता के समक्ष नितांत नवीन रचना अनुभवों को रखा है। कवि की अनुभूति प्रक्रिया रोज-रोज निर्मित होते सत्य एवम धुंधले पड़ते सच से आंदोलित हो रही है। विराट पूँजी एवम मीडिया ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्‍था का निर्माण किया है, जिसे बाजार का नाम दिया गया है। कविता बाजार में खड़ी है। कविता का मनुष्य बाजार में खड़ा है, पर इन सारी परिस्थितियों से उपजे उथल-पुथल का निष्कर्ष वर्तमान समाज के लिए, आलोचना के लिए तो संकटपूर्ण हो सकता है, लेकिन कविता के लिए नहीं, क्योंकि हर समय की सच्‍ची रचनाशीलता इसी उथल-पुथल को अपना उपजीवय बनाती है। यह उथल-पुथल ही कविता का मूल जीव द्रव्य है। ऐसा न होता तो दुनिया की तमाम अच्छी कविता संकटविहीन समय में लिखी गई होती। अकसर कविता के संकट का रोना रोते समय हम भूल जाते हैं कि कविता जीवन का विश्‍लेषण है और आलोचना कविता का। दिक्कत तब पैदा होती है, जब आलोचना कविता की रचना प्रक्रिया से प्रभावित होने लगती है। वह सीधे जीवन, समाज का विश्‍लेषण करने लगती है, और इस विश्‍लेषण में समाज और परिवेश पर तो बात हो जाती है, कविता के अंत जैसे अतिरेकी निष्कर्ष भी निकल आते हैं, लेकिन कविता पर, उसकी बुनियादी चुनौतियों पर बात नहीं हो पाती। जाहिर है, कविता के स्वास्थ्य पर इसका ज्यादा असर नहीं होता। आलोचना के लिए यह जरूर चिंतनीय विषय है। अस्मिता मूलक विमर्शों को भी लगातार इधर की कविता की विशेषता न मानकर, उसका जीव द्रव्य न मानकर उसे चुनौती के रूप में प्रचारित, विश्‍लेषित करना हिन्दी आलोचना के विवेक को ही प्रश्‍नांकित करता है, न कि कविता की न खत्म होने वाली जिजिविषा एवम सच से भी ऊपर उठ जाने वाली निश्छलता को। इसलिए बुनियादी पड़ताल करने पर एक निष्कर्ष बार-बार सामने आने लगता है कि इधर की हिन्दी कविता के लिए प्रचलित अधिकांश चुनौतियाँ उसकी विशिष्टता हैं। यदि इन्हें चुनौती मान भी लिया जाए तो ऐसी चुनौनियाँ हैं, जिन्‍हें रचनाशीलता ने तथ्य बनाकर अपनी आंतरिक संरचना में समा लिया है। और इसे अपनी ताकत के रूप में विकसित किया है। इधर की कविता की इस ताकत का एक उदाहरण बद्रीनारायण की प्रेमपत्रनामक कविता में देखा जा सकता है। समय की क्रूरता एवम नवीन बदलाव के प्रलय को अभिव्यक्त करती कविता कुछ इस प्रकार है-

प्रेत आएगा
किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा।
चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा
जुआरी प्रेमपत्र पर दाँव लगाएगा
ऋषि आएँगे तो दान में माँगेंगे प्रेमपत्र
बारिश आएगी तो
प्रेमपत्र को ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेमपत्र
बंदिशे प्रेमपत्र पर ही लगायी जाएंगी
साँप आएगा तो डँसेगा प्रेमपत्र
झींगुर आएंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र
कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे।
प्रलय के दिनों में
सप्‍तर्षि, मछली और मनु
सब वेद बचाएंगे
कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र
कोई रोम बचाएगा
कोई मदीना
कोई चाँदी बचाएगा कोई सोना
मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊँगा तुम्हारा प्रेमपत्र।

स्पष्ट है कि पूरी कविता वर्तमान समय का रूपक प्रलय के रूप में रचती दिखती है। मनुष्यता की सबसे आदिम, कोमल, सुंदर और अनिवार्य थाती है प्रेम और उसकी प्रस्तावना प्रेमपत्र। बदले समय का सबसे बड़ा शिकार भी वही है। इसलिए कविता में और समाज में हर कोई प्रेमपत्र के पीछे ही पड़ा है। ऋषि से लेकर चोर तक, बारिश से लेकर अग्नि तक, कीड़े से लेकर साँप तक सभी प्रेम के ही दुश्मन बने बैठे हैं। आशंका यह भी है कि बदलाव के इस बवंडर में बौद्धि‍कों एवम सक्षम लोगों की भूमिका भी पक्षपातपूर्ण ही रहेगी, इसलिए सप्तर्षि, मछली, मनु भी अपने-अपने गढ़ों को ही बचाएँगे। ऐसे में अकेला कवि प्रेमपत्र को, भविष्य के सुंदरतम पक्ष को कैसे बचा पाएगा! कविता जितनी निस्सहाय-नाटकीयता में खत्म होती है, उतनी ही मजबूती से संकट की भयावहता को सामने रख जाती है। नितांत निजी और व्यक्तिगत निस्सहायता निपट अकेलासामूहिक निस्सहायता में तब्दील हो जाता है।

निपट अकेला कवि अचानक से बचाने की सारी मिथकीय शक्तियाँ अर्जित कर लेता है। प्रेमपत्र का अर्थ विस्तार हो जाता है। वह प्रेमपत्र से ज्यादा मनुष्य के अंतःकरण का स्पेस बन जाता है, जहाँ प्रेम जैसी अनेकानेक कोमल संवेदनाएँ छिपी होती हैं, और कविता में मिथकीय विखंडन के साथ गंभीर दार्शनिक फूको का विचार कंस्ट्रक्ट होने लगता है कि हमारा समय फौलादी शिकंजो में जकड़े उन बुद्धिजीवियों का समय है, जिनके पास बुद्धि तो है पर आत्मा, विवेक, संवेदनाशीलता का नामोनिशान नहीं है। इसलिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेमपत्र को बचाने के बदले वे रोम, मदीना, चाँदी और सोना बचाने में लगे हैं। निश्चित रूप से कविता गंभीर और व्यवस्थित विश्‍लेषण की मांग करती है। इसमें कोई संशय नहीं कि इधर की हिन्दी कविता का रचनासंसार ऐसी उत्कृष्ट कविताओं से भरा पड़ा है। यदि सच्चे अर्थो में नए के प्रति पूर्वग्रहों को छोड़कर,  इनकी तुलना पूर्व की श्रेष्ठ कृतियों से की जाए तो ये कहीं से कमतर नहीं बैठेंगी। जरूरत है, एक बार हम पूर्व की कविताओं को ही बार-बार पुनर्मूल्यांकित करना छोड़ अभी की कविता का मूल्यांकन करके देखें।

एक बात और, अकसर हम इधर की कविता और कवियों का मूल्यांकन करते वक्त पूर्व की कविता और उसकी विशिष्टताओं से तुलना करते हैं। इस तुलना में अमूमन अद्भुत किस्म का सरलीकरण देखने को मिलता है। इधर की कोई भी कविता और कवि उठाकर उसे सीधे निराला, मुक्तिबोध्, प्रसाद के समक्ष रख दिया जाता है। कविता के साथ यह आलोचनात्मक न्याय नहीं है। हम सब जानते हैं कि भक्तिकालीन कविता हो या रीतिकालीन, आधुनिक प्रगतिवादी कविता हो या नयी कविता सारे कालखंडों में उतनी ही कविता नहीं लिखी गईं, जितना हम जानते-पढ़ते है। आलोचना और इतिहास ने कविता के प्रवाह में से गाद को किनारे लगाने का काम हमेशा से किया है। छायावाद में सिर्फ पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी ही नहीं लिख रहे थे, और छायावाद की सभी कविताएँ ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘कामायनी’ नहीं हैं। हजारों ऐसी कविताएँ और कवि इतिहास की गाद में छिपे पड़े हैं। इसलिए न्याय यह होगा कि तुलना से पहले हम इधर की कविता के पंत, प्रसाद, निराला को ढूँढे़, ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘कामायनी’ को ढूँढे़, फिर तुलना करें। तुलना करने में इस बात का भी अवश्य ख्याल रखा जाना चाहिए कि आज की कविता की भावभूमि, जनता की चित्तवृत्ति पहले की कविता से नितांत अलग है। इसलिए कविता के प्रतिमान भी अलग-अलग हो सकते हैं।

मेरी नजर में समकालीन कविता की वास्तविक चुनौती और कमजोरी समय और परिवेश की नहीं, बल्कि उसके पाठ-आस्वाद विश्‍लेषण की है। इधर की कविता पाठ के बाद आस्वाद के स्तर पर संतुष्ट करती है, वह पाठक को अंदर तक छूती है, बल्कि कई बार वह पिछली सारी कविताओं से ज्यादा अपनी लगती है, पर यही आस्वाद हमें दूसरों तक पहुँचाने में परेशानी होती है। जिस रचनाशीलता से हम अभिभूत हो रहे होते हैं, उसकी आस्वाद प्रक्रिया में किसी अन्य को शामिल नहीं कर पाते क्यों? वजहों को बता पाना कठिन है। पर इतना तय है कि वर्तमान आलोचना जगत चुनौतियों के छद्म में,  इस पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहा। वह मध्यकालीन कविताओं, प्रगतिवादी कविताओं पर नई कविता पर अभी भी आलोचकीय कसरत करने को तैयार है। वह अभी भी तुलसी को वर्णवादी, कबीर को क्रांतिकारी, प्रसाद को राष्ट्रवादी,  मुक्तिबोध् को मार्क्सवादी साबित करने की रस्साकशी में जुटा है, पर पिछले पच्चीस-तीस वर्ष में फल-फूल रही वर्तमान रचनात्मकता पर गंभीरता से विचार करने को तैयार नहीं है। यह अपेक्षा समझ में नहीं आती। जहाँ तक वजहों का प्रश्‍न है, मुझे ऐसा लगता है कि अभी की कविता में भाषायी अवरोध नहीं है। उसमें एक भी शब्द ऐसा नहीं है, जिससे पाठक परिचित न हो। वह सामान्य भाषा में लिखा गया ध्वनि काव्य है। मध्यकाल, रीतिकाल, छायावाद लगभग सारी पूर्व की कविता में हम शब्दों का अर्थ समझाकर, अलंकार, रस के सौंदर्य को समझाकर या फिर कविता के नए प्रतिमानों को बताकर ही कविता की जादुई शक्ति का एहसास करा देते हैं। हम पाठ-विश्‍लेषण की प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं। और मान लेते हैं कि भावक हमारी आस्वाद प्रक्रिया में शामिल हो गया, क्योंकि वहाँ विश्‍लेषण अपनी सगुणता लिए होता है। पर अभी की कविता के साथ ऐसा नहीं है। हमारे पास कविता के सगुण विश्‍लेषण हेतु कोई औजार नहीं है। वर्तमान की आलोचना समय की चुनौतियों को तो ढूँढ़-ढूँढ़ कर जुटा रही है किंतु कविता के विश्‍लेषण हेतु नए प्रतिमान नहीं दे रही। वर्तमान आलोचना की यह अक्षमता समझ में नहीं आती।

इसलिए मेरी समझ में फिर से स्पष्ट कर दूँ कि अभी लिखी जा रही कविता किसी भी अर्थ में पूर्व की कविताओं से कमजोर नहीं है। जरूरत है- कविता पर बात करने की न कि इसकी चुनौतियों पर नूरा-कुश्ती करने की। जरूरत है- वरचुअल सरहदों की लड़ाई छोड़ कविता की आंतरिक कमजोरियों की पहचान करने की। स्वयं कविता ने इसे बखूबी पहचाना है, कोमल हृदय भावकों से भी वास्तविक चुनौतियों को पहचानने की अपेक्षा है –

चढ़ने का घोड़ा बदलो
लड़ने की तलवार
निशाने पर का दुश्मन बदलो
लड़ाई का मैदान
नहीं तो बीच मैदान में मारे जाओगे सुकोमल बाबू!

मैं और मेरा रचना संसार : रमेश तैलंग

रमेश तैलंग

रमेश तैलंग

वयस्क एवं बालोपयोगी साहित्य की अनेक विधाओं में रचनारत रहने  के बावजूद मैं मूलतः कवि ही हूँ, और बच्चों के लिए लिखना हमेशा से  मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है, क्योंकि चैतन्य रूप से मैं यह मानता हूँ कि –

शुभ, सुंदर, जो कुछ भी प्रभु ने रचा हुआ है,
बच्चों की दुनिया में ही बस बचा हुआ है।

मध्यप्रदेश में एक छोटा-सा जिला है टीकमगढ़, जहाँ मेरा जन्म हुआ। दस्तावेजी तिथि दो जून 1946, पर माँ का कहना है कि वास्तविक  तिथि आषाढ़ शुक्ल दशमी विक्रम संवत 2004 तदनुसार 28 जून, 1947 है। ‘टीकम’ कृष्ण के अनेक नामों में से एक है और उन्हीं के नाम से बसाया गया टीकमगढ़, बुंदेलखंड अंचल का एक प्रमुख हिस्सा रहा है, जहां बुन्देली बोली एवं लोकसंस्कृति का विशिष्ट प्रभाव है। साहित्यिक संस्कारों की भी महत्वपूर्ण भूमि रहा है यह जनपद। भक्तिकालीन महाकवि केशवदास  की कर्मस्थली ओरछा भी यहीं स्थित है।

इसी जनपद का एक और रमणीय स्थान है– कुंडेश्‍वर; महादेव शिव और वाणासुर की पौराणिक कथाओं से जुडी़ पवित्र भूमि। अपने समय के प्रख्यात पत्रकार सर्वश्री बनारसीदास चतुर्वेदी, कृष्णलाल गुप्त, गाँधीवादी लेखक यशपाल जैन सभी का कुंडेश्‍वर से सघन आत्मीय सम्बन्ध रहा है। ‘मधुकर’ जैसी प्रख्यात पत्रिका प्रकाशित होती रही है यहाँ से, और लोकयात्री देवेन्द्र सत्यार्थी की यादगार कहानी ‘इकन्नी’ की तो वह  कथाभूमि ही है।

बहरहाल, इसी टीकमगढ़ में मेरी स्नातकीय स्तर तक शिक्षा-दीक्षा हुई और इसी टीकमगढ़ में मेरी बालकविता का पहला पुष्प भी खिला– 1965 के आस-पास बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका ‘पराग’ में मेरे ‘दो सांध्य गीत’ तथा ‘दो सुबह के गीत’ प्रकाशित हुए। डबल स्प्रेड पृष्ठों पर प्रख्यात छायाकार विद्यावृत की रंगीन पारदर्शियों के साथ। इनमें एक बालगीत की पृष्ठभूमि एक नन्ही-सी बच्ची की व्यस्त दिनचर्या का तोतली भाषा में चित्रण था-

‘अले, छुबह हो गई/आंगन बुहाल लूं/मम्मी के कमले की तीदें थमाल लूं/ कपले ये धूल भले/मैले हैं यहाँ पले/ताय भी बनाना है/पानी भी लाना है/पप्पू की छल्ट फटी/दो तांके दाल लूँ/कलना है दूध गलम /फिल लाऊं टोस्ट नलम/कल के ये पले हुए आलू उबाल लूँ/आ गया ‘पलाग’ नया/ताम छभी भूल गया/छम्पादक दादा के नये हालचाल लूँ/अले, छुबह हो गई।’

तोतली भाषा में बाल कविता लिखने का मेरा यह कोई अनन्य प्रयास नहीं था। आपको स्मरण होगी कि पंडित श्रीधर पाठक की यह क्लासिक बालकविता- ‘बाबा आज देल छे आये..ऊं..ऊं चिज्जी क्यूं न लाये..।’ मेरी बालकविता ‘अले, छुबह हो गई’ इसी परंपरा का हिस्सा मानी जा सकती है। पर मैं चाहूँ भी तो अब ऐसी बालकविता नहीं लिख सकता। ऐसा कभी-कभी ही होता है, जब आपकी कलम से अनायास ही कोई ऐसी रचना निकल जाती है, जो हिंदी बाल-साहित्य के प्रखर आलोचक डॉ. प्रकाश मनु के शब्दों में कहूँ, तो आपकी ‘सिग्नेचर ट्यून’ बन जाती है।

सन 1973 से लेकर सन 2001 यानी 28 वर्षों तक मैं हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह, नई दिल्ली में गैर-पत्रकार पदों पर कार्यरत रहा, जिस दौरान मैं स्नातकोत्तर पढ़ाई करने के साथ-साथ रचनारत भी रहा। यह मेरा सौभाग्य है कि कम मात्रा में लिखकर भी मेरी रचनाओं को देश की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में जगह मिलती रही, और उनसे मुझे एक बालसाहित्यकार के रूप में पहचान मिली। अब तक मेरे 8 बाल कविता संग्रह आ चुके हैं, जिनमें से कुछ पुरस्कृत हुए हैं। इन्हीं में से एक ‘मेरे प्रिय बाल गीत’ है, जिसे इस वर्ष साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी बालसाहित्य पुरस्कार के लिए चुना  गया है।

भारत की सर्वोच्च गरिमामयी साहित्यिक संस्था केंद्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत होना किसी भी रचनाकार के लिए हर्ष एवं गौरव का विषय होता है, और बिना किसी ‘मॉडेस्टी’ के कहूँ तो मुझे, मेरे परिजनों तथा प्रियजनों को भी इस उपलब्धि पर बहुत अधिक हर्ष हुआ है। हालांकि मुझे दिल्ली हिंदी अकादेमी तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र बाल साहित्य पुरस्कार सहित और भी अनेक पुरस्कार मिले हैं, पर यह अकेला ऐसा गरिमामय पुरस्कार है जो मेरी कृति पर अयाचित एवं अकस्मात् प्राप्त हुआ है।

पर पुरस्कार आपको सिर्फ हर्ष में ही सहभागी नहीं बनाते, वे हर्ष के साथ-साथ आपको एक महत जिम्मेदारी भी सौंपते हैं और वह जिम्मेदारी है– अपने सृजनात्मक अवदान में छोटी लकीर से बड़ी लकीर खींचने की जिम्मेदारी। मात्र पुरस्कृत होने से कोई कृति बड़ी या सर्वस्वीकृत नहीं हो जाती। सर्वस्वीकृत तो वह अपने पाठकों के बल पर ही होती है। पाठकों के अलावा थोड़ी-बहुत स्वीकृति या पहचान उसे समीक्षकों द्वारा भी मिल जाती है, बशर्ते कि उस कृति की समीक्षा करने वाले समीक्षक सही अर्थों में सम+ईक्षा से संपन्न हो।

विगत चालीस वर्षों के अपने साहित्यिक सफ़र पर नज़र डालूँ तो मुझे लगता है कि मैं सिर्फ कछुए की गति से ही आगे बढ़ा हूँ और मेरा साहित्यिक अवदान शून्य के बराबर है। लेकिन जिस तरह आत्ममुग्धता और आत्मदंभ आपको पथभृष्ट करते हैं, उसी तरह आत्महीनता भी आपको अवसाद से भर देती है। इसलिए मैं कोशिश करता हूँ कि इन दोनों अतियों से बच सकूं।

बालकविता में विषय, शिल्प और बिम्बों के स्तर पर मैंने कुछ प्रयोग करने का खतरा निरंतर मोल लिया है। हो सकता है कि बालकविता में बिम्बों की बात करना आपको अटपटा-सा लगे, क्योंकि अनेक सुधीजनों की दृष्टि में वह वयस्कों की कविता में ही शोभा देते हैं। पर क्षमा करें, थोड़ी-बहुत अराजकता मेरे स्वभाव में रही है, कम-से-कम बालकविता की रचना के क्षेत्र में। इसीलिये न तो मैंने अपनी बालकविताओं को वय के हिसाब से विभाजित करने का प्रयास किया है, और न ही उन्हें किसी विशेष साँचे में ढालने की कोशिश की है। कहीं वे शिशुओं के लिए उपयुक्त हैं तो कहीं किशोरों के लिए। विविधता की दृष्टि से मेरी बालकविताओं में आपको ‘एक चपाती’, ‘निक्का पैसा’, ‘सोनमछरिया’ जैसे कथागीत भी देखने को मिलेंगे, तो दूसरी और ‘टिन्नी जी’, ‘ढपलू जी’, या ‘छुटकू मटक गए’, जैसे नटखट गीत भी मिल जाएँगे। बच्चों के कार्यकलाप, उनकी शिकायतें, उनकी आकांक्षाएं अपनी बाल कविताओं में अभिव्यक्त करना मुझे सबसे ज्यादा प्रिय रहा है। माँ के मुंह से लोरी तो सभी सुनते हैं, पर बच्चे के मुंह से लोरी का सुनना आपको अजीब लग सकता है पर मैंने एक ऐसा प्रयास  किया है- ‘रात हो गई, तू भी सो जा/मेरे साथ किताब मेरी..बिछा दिया है बिस्तर तेरा, बस्ते के अन्दर देखो/लगा दिया है कलर बॉक्स का तकिया भी सुंदर देखो/मुंहफुल्ली, अब तो खुश हो जा, मेरे साथ किताब मेरी!’

मैं ढाबे का छोटू हूं’ या ‘पापा की तनख्वाह में घर भर के सपने’ जैसी बाल कविताओं में मैंने बाल-श्रम और अभिभावकों की आर्थिक मुश्किलों को विषय बनाया है। कहीं-कहीं पर्यावरण या प्रदूषण की चुनौतियों की बात भी आ गई है। कुल मिलाकर देखा जाय तो मैं बच्चों के संसार का जितना बड़ा वितान है, उसे समेटने की भरपूर कोशिश करता हूं और अब यह बाल-पाठकों तथा सुधी समीक्षकों के ऊपर निर्भर करता है कि उन्हें मेरी कोशिशों में कितनी सफलता नज़र आती है।

अच्छी बाल कविता क्या है, ऐसे सवाल जब बच्चे मुझसे पूछते हैं, तो मेरे पास सच पूछो तो कोई जवाब देते नहीं बनता। यह तो गूंगे का गुड है…स्वाद चखे जो बस वो ही जाने..पर सहजता की दृष्टि से मैंने उनके लिए कुछ पंक्तियां लिखीं– ‘आओ हम भी प्यारी-प्यारी कविता एक बनाएं/जोड़ें तुक, शब्दों की माला सुंदर एक सजाएं/नहीं चाहिए भारी-भरकम, नहीं चाहिए मोटी/हम छोटे-छोटे बच्चों की कविता भी हो छोटी/जिसे सीखना पड़े किसी से, क्या वह भी कविता है/जिसे स्वयं आ जाए गाना/वह अच्छी कविता है।’

विश्व के अनेक हिस्सों में युद्ध की विभीषिका तथा अनेक प्रकार से हो रहे  बालशोषण के चक्रव्यूह में फंसे बच्चों की पीडाएं मुझे अकसर विचलित करती हैं पर एक अदीब, एक लेखक, एक कवि अलख जगाने के अलावा कर भी क्या सकता है। बच्चों के मन की बात मैं अपने शब्दों में इस प्रकार ही कह सकता हूँ– ‘न तो बन्दूक की, न ही बारूद की, कल की दुनिया हमको चाहिए नए रंगरूप की/जिसमें न पाठ पढ़ाया जाए नफरत का/जिसमें न राज चलाया जाए दहशत का/जिसमें सच्चाई की जीत हो, और हार झूठ की।’

(साहित्‍य अकादमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार 2013 समारोह में दिए गए वक्‍तव्‍य का संपादित अंश )