Archive for: November 2013

आत्मग्लानि की सामाजिकता : मनोज पाण्डेय

मनोज पाण्डेय

मनोज पाण्डेय

कुशीनगर, उत्‍तर प्रदेश के एक गाँव में  03 सितंबर 1976 को जन्‍मे मनोज पाण्‍डेय की ‘इतिहास-बोध’, ‘परिकथा’,’वर्तमान साहित्य’, ‘शैक्षिक दखल’, ‘नया पथ’, ‘क’ आदि पत्र-पत्रिकाओं सहित ‘जनज्वार’, ‘सिताब दियरा’, ‘जनपक्ष’,’पहली बार’ आदि ब्लॉगों में कविताएँ, समीक्षा, लेख आदि रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। मनोज पाण्‍डेय का आलेख-

आत्मग्लानि की गिनती सामान्यतौर पर नकारात्मक रूप में होती है, जबकि यह जरूरी नहीं है कि आत्मग्लानि प्रत्येक स्थिति में नकारात्मक ही हो। यह भाव जिसके भीतर पैदा हुआ, उसके व्‍यक्तित्व में हुए बदलाव से ही इस बात का निर्धारण किया जा सकता है। यदि व्यक्ति अपनी आत्मग्लानि की प्रक्रिया से गुजरने के बाद कमजोर हो जाये या अवसादग्रस्त हो जाये, तो हमें इसे नकारात्मक ही मानना पड़ेगा। इसी तरह सकारात्मक स्थिति तब बनती है, जब आत्मग्लानि की प्रक्रिया के बाद व्यक्ति के भीतर मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था और विश्वास की भावना का संचार होता है। कुछ हद तक हम आत्मग्लानि को भावुकता का चरम भी मान सकते है।

कई अन्य मानसिक स्थितियों की भांति आत्मग्लानि जन्मजात प्रवृति नहीं है। इस मानसिक स्थिति का विकास मानव-समाज के विकास प्रक्रिया से जुड़ कर ही होता है, और इस रूप में यह देश-काल के सापेक्ष ही निर्मित होता है। आज जिन स्थितियों में व्यक्ति आत्मग्लानि का अनुभव करता है, बहुत संभव है कि उन्ही स्थितियों में पहले नहीं अनुभव करता हो और आगे कभी न करे। भूख न लगे रहने के बाद भी व्यक्ति जमकर खा लेता है, तो भी उसको आत्मग्लानि नहीं हो सकती है, जबकि वही आदमी भूखे रहने के बाद भी स्थिति विशेष में दूसरे की भूख को लेकर आत्मग्लानि का शिकार हो सकता है। यह ‘स्थिति विशेष’ निश्चित तौर पर किसी सामाजिक मूल्य को न निभा पाना ही होता है।

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ के प्रस्थान-बिंदु से ही सारे नैतिक और सामाजिक मूल्य-मान्यतायें तय होती रही हैं। नितांत व्यक्तिगत मूल्य के रूप में पहचानी जाने वाली ‘आत्मग्लानि’ भी एक सामाजिक उपादान ही है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर इसकी प्रक्रिया ‘आत्म’ के भीतर ही घटती है, पर इस आत्म का विकास दूसरों की उपस्थिति में ही संम्पन होता है। सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनितिक-आर्थिक आदि स्थितियों के प्रभाव में ‘आत्म’ का वैचारिक-मानसिक-नैतिक व्यवहार तय होता है। समान स्थिति और कारण होने के बाद भी यह आवश्यक नही है कि सभी व्यक्तिओं के भीतर आत्मग्लानि की भावना जन्म ले और अपना प्रभाव दिखाए। यह उस व्यक्ति की वैचारिक-मानसिक-नैतिक व्यवहार में मूल्यों और भावों के प्रति सजगता और विश्वास पर निर्भर होता है।

व्यक्ति पुत्र, पिता, माँ, पुत्री, बहन, पत्नी, दादा, दादी आदि तमाम पारिवारिक रिश्ते नातों के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक स्तरों पर कई भूमिकाओं का पालन-निर्वहन करता रहता है। समय-देश-समाज के हिसाब से हर एक भूमिका के साथ कुछ मान्य विचार, मूल्य, व्यवहार-पद्धति का जुड़ाव रहता है। जब हम अपनी किसी भूमिका को उस रूप में नहीं निभा पाते, जिस रूप में निभाना चाहिए या जिस रूप में निभाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के भीतर आत्मग्लानि की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। रामकथा में दशरथ, कैकेयी को दिए गये वचन को पूरा तो कर देते हैं, पर दूसरी तरफ निर्दोष पुत्र के प्रति एक पिता की सार्थक भूमिका न निभा पाने की आत्मग्लानि के कारण ही प्राण त्याग भी कर देते हैं। यह पारिवारिक जीवन में आत्मग्लानि के कारण घटित होने स्थितियों का एक उदाहरण है। इसी कथा में दशरथ एक बार और आत्मग्लानि की स्थिति से गुजरते दिखाई देते हैं। यह तब होता है, जब उनके हाथों अनजाने में श्रवण कुमार की हत्या हो जाती है। इसके कारण वह दुखी माँ-बाप के शाप को भी ‘ग्रहण’ करते हैं। यह ‘आत्मग्लानि’ की सामाजिक घटना है।

समस्त मानवीय इतिहास में ‘आत्मग्लानि’ के कारण कई परिवर्तन और महान घटनायें हुईं। मानवीय मूल्यों से जुड़े होने पर बहुत दूर तक प्रभावित करने का कारण बनती है। भारतीय इतिहास में इसका बड़ा उदाहरण सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध है। कलिंग युद्ध के पहले तक अशोक बौद्ध नहीं था। युद्ध के बाद अशोक के मन में उपजी आत्मग्लानि की स्थिति का ही परिणाम रहा कि हमें बौद्ध अशोक के महान धर्म-प्रचार के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी आस्था के शिलालेख मिलते हैं। अशोक की आत्मग्लानि की परिघटना भी तत्कालीन समाज में बौद्ध एवं जैन विचारधारा की स्थापित हो चुकी सामाजिक मानसिकता के कारण संभव हो पता है। नहीं तो बहुत संभव है कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ के प्रभाव में युद्ध में मरे गए लोगों के प्रति किसी भी तरह की आत्मग्लानि का भाव अशोक के मन में ना पैदा होता। इसी संदर्भ में हमारा ध्यान isचंगेज खान की ओर जाता है। चंगेज खान बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसके बाद भी दुनिया-भर में उसकी क्रूरता के तमाम चिह्न आज भी प्राप्त होते हैं। यह तथ्य अपने आप में दारूण है कि जहाँ  अशोक आत्मग्लानि के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार करता है, वहीं बौद्ध धर्म मानने वाले परिवार में पला-बढ़ा चंगेज आत्मग्लानि के किनारे भी नहीं जाता दिखता है। स्पष्ट है की आत्मग्लानि की प्रक्रिया में वैचारिक-मानसिक-नैतिक व्यवहार में मूल्यों-विचारों-आदर्शों के प्रति सजगता और विश्वास के आधार को स्वीकार करना पड़ता है। अपनी इसी विशेषता के कारण इस भाव को बाहरी और मोटे तौर पर ‘व्यक्तिगत और आत्मगत’ बताया-माना जाता है।

विभिन्न धर्मों में आत्मग्लानि को विशेष महत्त्व दिया जाता है। प्रायश्चित, तौबा, कन्फेशन आदि मान्यताओं में लिपटे इस भाव को विभिन्न धर्मों में धार्मिक आस्था के व्यक्तिगत पुनर्स्थापना का साधन माना जाता है। ईसाई धर्म में ‘आत्मग्लानि’ को धार्मिक सिद्धांत के रूप में प्रमुखता से स्थापित किया गया है। बौद्ध धर्म में अंगुलिमाल का किस्सा काफी प्रसिद्ध है। धार्मिक दुनिया में आत्मग्लानि का छद्म भी बड़े काम की चीज होती है। ‘अजामिल’ की कहानी इसी बात का प्रमाण है। बेटे का नाम नारायण रख उसने ‘नारायण’ को झांसा देकर बैकुंठ का टिकट पा लिया था।

राजनितिक जीवन में आत्मग्लानि का मूल्य बड़ी सावधानी से जाचना-परखना पड़ता है। भारतीय राजनीति की बात करें, तो महात्मा गाँधी सार्वजानिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर ‘आत्मग्लानि’ की प्रक्रिया से गुजरने वाले अनूठे राजनितिक है। भारत-पाक विभाजन और सांप्रदायिक दंगों से उपजी आत्मग्लानि का जितना स्पष्ट चित्र हमें गाँधी के जीवन में दिखता है, उतना किसी और के नहीं। ‘सत्य के प्रयोग’ या आत्मकथा में हम जगह-जगह इस बात को पुष्ट होते देख सकते हैं। महात्मा गाँधी ने आत्मग्लानि के भाव को मानसिक निर्बलता के मान्य स्वरूप से पूरी तरह बदलते हुए एक सकारात्मक सोच और ताकत के तौर पर राजनीति में इस्तेमाल किया। कई बार हमारा समाज भी आत्मग्लानि की प्रक्रिया से गुजरता है। जाति-वर्ण की अमानवीय व्यवस्था के बारे में बात करता सभ्य समाज आज इस मानसिकता से गुजरता है। इसी तरह उन तमाम सामाजिक रूढ़ियों के प्रति आत्मग्लानि प्रदर्शित करता है, जो सभ्यता-संस्कृति को पश्‍चगामी बनाने की कोशिश करती हैं।

महात्मा गाँधी के बाद भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शर्म, दायित्व-बोध, सामान्य नैतिकता को धीरे-धीरे किनारे करने का ही प्रयास हुआ है। आजादी के तत्काल बाद से सार्वजनिक-जीवन की पारदर्शिता का क्षरण आरंभ हो गया। परिणामस्वरुप वर्तमान राजनीतिक संदर्भों में आत्मग्लानि को पूरी तरह अनुपयोगी और महत्त्वहीन दर्जा मान लिया गया है। मुख्यधारा की राजनीति में अगर अपवादस्वरूप कोई इस भाव का प्रदर्शन करे तो शायद उसका राजनीतिक जीवन ही खतरे में पड़ जाये। राजनितिक जमात ‘आत्मग्लानि’ से ग्रस्त व्यक्तिव को जल्द-ब-जल्द अपने से अलगा देना चाहता है। इस तथ्य को रोजाना हो रहे घोटालों और राजनीतिक ‘कारनामों’ के उदाहरणों से आसानी से समझा जा सकता है। आम जन के गहरे विश्वास को हमारे राजनीतिकों द्वारा जितनी सहजता से तोडा़ जाता है, वह आपने आप में अचंभित करने वाला है। बेहतर राजनीतिक-सांस्कृतिक वातावरण बनाने का जिन कंधों पर दायित्व है, वे ही अपने दायित्व-बोध को स्वीकार करने की मानसिकता को किनारे किये हुए हैं। इस तरह इस जमात से किसी तरह की ‘आत्मग्लानि’ की उम्मीद नहीं की जा सकती है। विश्व पटल पर जब इराक-पतन की घटना घटती है और उसके बाद अमेरिका का ‘आत्मग्लानि’ से भरा चेहरे के स्थान पर जो भीषण दर्प भरा चेहरा उभर कर आता है, उससे संवेदनशील और  मानवीयता के पक्षधरों के भीतर ही अपने समय को लेकर आत्मग्लानि का अनुभव हो पाता है।

सामाजिक-आर्थिक वर्गीकरण को आधार मानकर वर्तमान समय समाज में ‘आत्मग्लानि’ को समझने का प्रयास किया जाए तो यह सामने आता है कि आज दुनिया के आधिकांश संस्कृति-समाज में उसका मध्यवर्ग इस भाव से सबसे ज्यादा गुजरता होता है। उसकी स्थिति और भूमिका का इसमें सबसे बड़ा योगदान है। निम्न वर्ग की खराब आर्थिक-स्थिति उसका ‘आत्म’ विकसित नहीं होने देती और उच्च वर्ग का ‘आत्म’ गर्व और विश्वास से इतना सराबोर रहता है कि ‘ग्लानि’ का रंग विरले ही चढ़ पाता है। आज के भीषण बाजारवाद और उपभोक्तावादी समय में जिस तरह का सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक वातावरण निर्मित किया जा रहा है, उसमें तमाम मानवीय-नैतिक मूल्य-भाव-आदर्श-विचार आदि के लिए ‘व्यावहारिक’ स्पेस नहीं दिया जा रहा है। इन सभी को नारों में बदल ‘मुनाफे’ के अवसर और साधन के रूप में ही उपयोगी माना जा रहा है। अगर ध्यान दें तो पता चलता है कि केवल सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका और परिवेश से ही अलगाया नहीं जा रहा है, पारिवारिक भूमिका और दायित्व से भी अलग करते जाने का लगातार प्रयास इन ताकतों द्वारा हो रहा है। जब किसी तरह का दायित्व-बोध नहीं विकसित हो पायेगा तो आत्मग्लानि की स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि हम रोजाना खबरों में बेहद अमानवीय सामाजिक-पारिवारिक कृत्यों से रूबरू हो रहे हैं। लगातार अकेला होता जा आज का आदमी केवल अपने आप को बचा लेने के दायित्व को ही अंतिम मानता जा  रहा है।

साहित्य और संस्कृति में आत्मग्लानि की उपस्थिति कमोबेश हर समाज और हर समय में रही है। संस्कृति निर्माण और संचार में सबसे प्रभावी भूमिका निभाने वाला आधुनिक साथ सिनेमा में तो इस भाव का अच्छे-बुरे  दोनों ढंग से जमकर इस्तेमाल होता रहा है और हो रहा है। विश्व सिनेमा में यह ‘सिटिजन केन’ जैसी फिल्म में उभरा है। हिंदी सिनेमा में ‘गाइड’ फिल्म में। हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की फिल्मों-टीवी धारावाहिकों में तो इस भाव का जमकर व्यवसायिक शोषण देखने को मिलता है। यह स्थिति कभी-कभी अश्लीलता की हद को भी पार कर जाती है। इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि आत्मग्लानि जैसे भाव को संवेदनहीन स्तर पर खींच लाने का काम ऐसे (अप)संस्कृति से भी प्रमुख रूप से हो रहा है।

साहित्य जीवन के सापेक्ष ही नहीं चलता, बल्कि वह उसके बेहतर होने और बनाने के सपने देखने, कल्पना करने और उन्हें संभव बनाने वाले साधनों की खोज भी करता है। इसी लिए हम साहित्य में समस्त मानवीय मूल्यों-आदर्शों-विचारों के प्रति प्रतिबद्धता को ज्यादा प्रभावी पाते हैं। आत्मग्लानि के प्रति हमारा साहित्यिक वर्ग बेहद रचनात्मक रहा है। काल-समय-देश सापेक्ष जीवन-स्थितिओं में इस मानसिकता का अंकन दुनिया की हर भाषा के साहित्य में हमें आसानी से मिल जाता है। लेव ताल्स्तॉय के उपन्यास ‘पुनरुथान’ में इस भाव को शास्त्रीय ऊंचाई मिली हुई है। ‘मध्यवर्ग की इस मानसिक बोध का सबसे प्रमाणिक प्रस्तुति हमें आधुनिक हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के यहाँ मिलाती है। ‘क्लाड इथरली’ सहित कई कहानियों में उभरते आत्मग्लानि के भाव से मध्यवर्ग सामना तक नहीं कर पाता है। ‘ब्रह्म राक्षस’ कविता में इसी पीड़ा से मुक्ति पाने की छपटाहट अपनी पूरी सांद्रता के साथ सामने आती है, जहाँ कवि की व्यक्तिगत आत्मग्लानि है कि ‘मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में/पेटों की आँतों में न्यूनो की पीड़ा है।’ वही व्यापक आत्मग्लानि की स्थिति भी- अब तक क्या किया जीवन क्या जिया, ज्यादा लिया, और दिया बहुत-बहुत कम और मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम!!

संवेदनशीलता के स्तर : बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

संवेदनशीलता होना अर्थात किसी के परेशानी मे कष्ट होना अच्छी बात है, पर कोरी संवेदनशीलता से किसी को लाभ नहीं होता। कोरी सवेदनशीलता से मेरा तात्पर्य है कि किसी की परेशानी में आप कुछ न करें या न पा रहे हों तो भी दुखी बने रहें । आप किसी से जितना जुड़े होते हैं, उतना ही उसका कष्ट बड़ा लगता है, उतने ही आप संवेदनशील होते हैं, परन्तु कहीं कोई दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा या आतंकवाद घटता है तो वह हमारी संवेदनाओं को छूकर निकल जाता है, हम फिर सामान्य हो जाते हैं, और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि हमारी सीमायें हैं जिनके बाहर जाकर हम हरेक की मदद तो कर नहीं सकते। इस दुनिया में रोज़ कुछ अच्छा, कुछ बुरा होता रहता है, सुख-दुख आते-जाते हैं। कुछ लोग ये बात नहीं समझते और कहीं भी कुछ भी ग़लत होता है तो दुखी हो जाते हैं, सामान्य रहने में उन्हें ग्लानि होती है, ऐसी संवेदनशीलता को अतिसंवेदनशीलता कहते हैं, जिसके कारण ऐसे लोगों को चारों ओर निराशा और अंधकार नज़र आने लगता है। यह स्थिति धीरे-धीरे अवसाद (depression) का रूप ले सकती है।

एक  नेक इंसान को उतना ही संवेदनशील होना चाहिये कि वह कष्ट की घड़ी में यथासंभव किसी की मदद करे परन्तु ऐसा करना यदि उनके वश में न हो तो उसके बारे में सोच-सोचकर दुखी या उदास न हो। संवेदनशील इंसान दुर्घटना के समय उपस्थित होगा तो वह मदद करेगा, अनदेखाकर के वहाँ से नहीं जायेगा।

हम जानते हैं कि देश में ग़रीबी है, कुछ लोगों को भूखे सोना पड़ता है, बहुत से बेघर हैं, यही सोच-सोचकर हम दुखी नहीं हो सकते, ख़ुद को जीवन की ख़ुशियों से वंचित नहीं कर सकते क्योंकि ग़रीबी दूर करना हमारे वश में नहीं है। हां, किसी ख़ास अवसर पर किसी ग़रीब की मदद कर सकते हैं, पर इससे उसकी ग़रीबी दूर नही होगी।

अक्सर लोग कहते हैं कि जिस देश में बहुत से लोग एक समय भी भर पेट भोजन नहीं कर पाते फिर भी यहाँ बड़ी धूमधाम से विवाह होते हैं, बड़ी-बड़ी दावतें होती हैं, ये सही नहीं है। खाद्य पदार्थों की बर्बादी तो नहीं होनी चाहिये पर संवेदनशीलता के नाम पर किसी को ख़ुशी मनाने से रोकना भी सही नहीं है। होना यह चाहिये कि ख़ुशी के अवसरों पर लोग स्वेच्छा से कुछ धन किसी स्वयंसेवी संस्था को दान में दे दे । हम यह भी नहीं भूल सकते कि इन बड़ी-बडी शादियों के कारण बहुत से लोग रोटी-रोज़ी भी कमा रहे हैं।

एक समय था जब देश में बहस छिड़ी थी कि भारत जैसे ग़रीब देश में रंगीन टी.वी. लाया जाये या नहीं, पर वो लाया गया, और लाना भी चाहिये था क्योंकि समय के साथ चलना ज़रूरी है। मंगलयान भेजने को भी ऐसी ही असंवेदनशीलता का नाम दिया जा रहा है। यदि हम वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं करेंगे तो पिछड़ जायेंगे, कोई भी परीक्षण सफल हो ज़रूरी नहीं है, पर परीक्षण करते रहना, नई खोज करते रहना ज़रूरी है। ऐसा नहीं होता तो अभी हम पाषाण युग में ही जी रहे होते।

अतिसंवेदनशीलता का एक कारण डर भी होता है। किसी भी दुर्घटना को देखकर, किसी को विपत्ति में देखकर मन में विचार आने लगते हैं कि कहीं हमारे साथ या हमारे किसी प्रिय के साथ ऐसा न हो जाये। हमारी व्याकुलता बढ़ने लगती है, ऐसे में व्याकुलता विकार (anxiety disorder) होने की संभावना बढ़ जाती है।

किसी के दुख में संवेदना के दो बोल कहने से उसका दुख भले ही कम न हो, पर सांत्वना मिलती है पर हम उस दुख की चादर को ख़ुद ही ओढ़ लें, ये भी ज़रूरी नहीं है। हमने संवेदना प्रकट की, कुछ मदद कर सकें तो वह भी कर दी, फिर अपने काम में लग गये…. ये कोई नाटक, अभिनय या दिखावा नहीं है, जीने का सही तरीका है, सामान्य व्यवहार है।

अतिसंवेदनशील घर-परिवार में या दफ्तर में किसी भी मामूली-सी बात को मन से लगाकर बैठ जाता है और वह बात उसके दिमाग़ से निकलती ही नहीं, परेशान करती रहती है। बहुत-सी बातों को अनदेखा-अनसुना करके भूल जाने में ही सबकी भलाई होती है, पर अतिसंवेदनशील व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता जिसके कारण वह तनाव में रहता है। इस तनाव के कारण क्रोध बढ़ सकता है, जो मानसिक स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव डालता है। छोटी-छोटी बातें आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाती हैं, यह भी सही नहीं है।

संवेदनहीन व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता है, उसे कोई पसन्द नहीं करता।

संवेदनशीलता का व्यक्ति के व्यवसाय से भी संबंध होता है। हमेशा नहीं, पर जेल और पोलिस के कर्मचारी अपराधियों के संपर्क में आने से संवेदनहीन हो सकते हैं। एक ही व्यक्ति की संवेदनशीलता अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग होती है। कोई पोलिसकर्मी अपने काम के समय अपनी संवेदनशीलता को नियंत्रित कर सकता है। डाक्टर अपनी संवेदनशीलता के कारण किसी भी आकस्मिक चिकित्सा के लिये तत्पर रहते हैं, पर इस संवेदनशीलता के साथ अपने घर नहीं जाते। यदि वो मरीज़ों के दुखों में खुद को डुबो देंगे तो न किसी का इलाज कर पायेंगे न अपना जीवन जी पायेंगे।

व्यक्तित्व के गुण-दोषों का समन्वय जीवन में ठहराव लाता है। कोई व्यक्ति अगर अपनी संवेदनहीनता या अतिसंवेदनशीलता को पहाचानकर उसे सही स्तर पर लाना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है, कोशिश करे कि जब लगे अतिसंवेदनशील हो रहा है तो स्यवं को निर्देश (auto suggestion) दे कि नहीं इस बात पर ध्यान नहीं देना है,  दूसरे कामों में व्यस्त कर ले। संवेदनहीन व्यक्ति अपने को निर्देश (auto suggestion) दे कि किसी को कष्ट में देखेगा तो वह उसकी मदद अवश्य करेगा।

अपनी संवेदनशीलता को व्यक्ति पहचान सके, यह लेख लिखने का यही उद्देश्य है। अपनी संवेदनशीलता को सही स्तर पर लाना इतना सरल भी नहीं है, इसके लिये किसी मनोवैज्ञानिक की मदद ली जा सकती है।

मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के खिलाफ लगातार लड़ते रहे वाल्मीकि

स्मृति सभा में विचार व्यक्त करतीं अनीता भारती। साथ में मैनेजर पांडेय और विमल थोराट।

स्मृति सभा में विचार व्यक्त करतीं अनीता भारती। साथ में मैनेजर पांडेय और विमल थोराट।

नई दिल्ली :  गलदश्रु भावुकता और श्रद्धालुओं की फूल मालाओं से ख़बरदार रहकर ही ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनात्मकता को समझा जा सकता है। मध्यवर्गीय अवसरवाद के खि़ला़फ उनकी कहानियों में जो प्रतिरोध दर्ज हुआ है, उसे देखा जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में 24 नवम्‍बर, 2013 को आयोजित संयुक्‍त स्मृति सभा में ये विचार व्यक्त किये गए।

स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में दलित साहित्य कला केंद्र, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित सभा में प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कबीर, नाभादास, अश्‍वघोष और बुद्ध को याद करते हुए प्रतिरोध की उस साहित्यिक परंपरा को रेखांकित किया, जिसकी बुनियाद पर ओमप्रकाश वाल्मीकि और विशेष तौर पर दलित रचनात्मकता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वाल्मीकि की भाषा को उन्होंने उल्लेखनीय बताया। सभा को कुल 11 वक्ताओं ने संबोधित किया।

अध्यक्षता करते हुए प्रो. विमल थोराट ने वाल्मीकि जी के साथ अपनी सुदीर्घ वैचारिक निकटता को भावपूर्ण शब्दों में याद करते हुए कहा कि जाति व्यवस्था आज भी मौजूद है, अभी बहुत सारे सवाल सुलझे नहीं हैं, सामाजिक क्रांति चाहने वालों के लिए ओमप्रकाश एक जरूरी लेखक थे। उनका लेखन और उनके विचार आगे भी प्रासंगिक रहेंगे। उनसे आंदोलन को मजबूत बनाने का हौसला मिलता है। उन्होंने हर वर्ष वाल्मीकि जी के स्मृति दिवस पर स्मृति सम्मान देने की घोषणा भी की।

इसके पहले बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि मिथकों की फिसलन भरी राह के प्रति वाल्मीकि जी की रचनात्मक सचेतनता बेहद महत्वपूर्ण है। ईश्वरवाद और आस्तिकता से उनका घोर विरोध था। वे उन्मादी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के विरोधी थे। उन्होंने ओमप्रकाश जी की अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर रचनावली प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया। ‘घुसपैठिए’ समेत वाल्मीकि की तीन कहानियों पर अपनी बात को केंद्रित करते हुए जेएनयू के शोध छात्र मार्तण्ड प्रगल्भ ने कहा कि मध्यवर्गीय दलित अधिकारी ‘घुसपैठिए’ के अंतरद्वद्व और मेडिकल के दलित छात्र की आत्महत्या के बीच इस कहानी को जिस तरह रचा गया है, वह मध्यवर्गीय विरोधवादी नैतिकता के खिलाफ लेखक के असंतोष की दास्तान बन जाती है। व्यक्ति और लेखक के विचार में अंतर भी हो सकता है, और कई बार रचना का अर्थ लेखक की घोषित मंशा से ‘स्वतंत्र’ भी हो सकता है। मार्तण्ड के मुताबिक, वाल्मीकि की कहानियों को जातिगत उत्पीड़न के सिंगिल फ्रेम में रखकर देखने के बजाय हमें हिंदी की अपनी आलोचनात्मक दृष्टि का विकास करना चाहिए और ओमप्रकाश जी की उस कथात्मक अंतदृष्टि को पहचानना चाहिए जो मध्यवर्गीय दलित व्यक्तिवाद के खिलाफ निरंतर संघर्षरत रही है।

प्रो. चमनलाल ने वाल्मीकि की कहानियों में अभिव्यक्त यथार्थ के स्वरूप की अर्थ गांभीर्य को रेखांकित करते हुए उन्हें सच्चा यथार्थवादी लेखक बताया। प्रो. तुलसीराम ने कहा कि हिंदी की रचनाओं में दलित पात्रों के लुम्पेनाइजेशन के विरोध में वाल्मीकि ने जिस साहस से लगातार संघर्ष किया, वह स्मरणीय है। इस प्रसंग में उन्होंने प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी को याद किया। उन्होंने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि मानते थे कि दलित साहित्य को साहित्यिक मूल्य के बजाय जीवन मूल्य की कसौटी पर देखना चाहिए।
स्मृति सभा में डॉ. रामचंद्र ने कहा कि उन्होंने सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं लिखा है, बल्कि पूरे समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखा है।

कवि-कथाकार अनीता भारती ने कहा कि उन्होंने समता और बंधुत्व के सपनों के साथ लिखा और अत्याचार व प्रताड़ना से लड़ने के लिए प्रेरित किया।

चित्रकार सवि सावरकर ने कहा कि उन्हें सिर्फ अंबेडकर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, उनकी परंपरा बुद्ध और अश्वघोष से जुड़ती है। कवि जयप्रकाश लीलवान, दिलीप कटारिया और प्रो. एसएन मालाकार ने भी सभा को संबोधित किया। सभा के अंत में एक मिनट का मौन रखा गया।

 

(सुधीर सुमन की ओर से जारी)

किताब और बच्‍चे : अनुराग

children book fair

बाल पुस्तंक मेले में किताबें पसंद करते बच्चे ।

अकसर यह बात कही जाती है कि बच्चे पाठ्यपुस्तकों के अलावा और कोई किताब पढऩा नहीं चाहते हैं, और अमूमन अभिभावक भी बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से इतर साहित्य, विज्ञान, कला, रंगमंच आदि विभिन्न विषयों से संबंधित किताबें खरीदकर नहीं देते। नीतिखंड-तीन, इंदिरापुरम, गाजियाबाद के सेंट्रल पार्क में रेजिस्टेंस कैफे, जन संस्कृति मंच और जेसी बोस विज्ञान संस्थान की ओर से 18 नवंबर, 2013 को एक ‘बाल पुस्तक मेले’ का आयोजन किया गया। इसमें बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया और अपनी रुचि की किताबें खरीदीं।

मेला केवल पांच-छह घंटे के लिए लगाया गया था। इसके बावजूद करीब डेढ़ सौ बच्चे और उनके अभिवाभक आए। कुछ बच्चों ने किताबें खरीदने के अलावा वहां बैठकर पढ़ीं भी। बच्चों के उत्साह को देखकर कहीं से भी नहीं लगा कि उन्हें किताबें पसंद नहीं और वे किताबों से नफरत करते हैं, बल्कि इससे इस धारण को बल मिला कि बच्चों और किताबों के बीच की दूरी मिटाने के लिए बड़ी संख्या में इस तरह के आयोजन करने की जरूरत है।

पुस्तक मेले में एक करीब छह साल का बच्चा किताब को पकड़े जोर-जोर से हंस रहा था। पन्ने पलटते जाता और हंसता जाता। उसकी हंसी और व्यवहार से सभी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो गया। पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा कि कौन-सी क्लास में पढ़ते हो। उसने जवाब दिया कि फस्र्ट में। उससे पूछा गया कि पढ़ना आता है। उसने ‘न’ में सिर हिला दिया और फिर से पन्ने पलटते हुए हंसने लगा।

गौर किया कि वह पन्ने पलटते हुए उनमें बने चित्रों को देखकर कहानी बना रहा है। पन्ना पलटते जाता और कहानी आगे बढ़ती जाती। किताब में क्या लिखा है, उससे उसे कोई मतलब नहीं था। पंद्रह-बीस पेज की उस किताब को पूरी करने के साथ ही उसने अपनी कहानी भी पूरी कर ली। क्या इस घटना को देखकर अब भी यही कहा जाए कि बच्चों की पढऩे में कोई रुचि नहीं है। वास्तविकता यह है कि किताबें बच्चों को कल्पना के अनोखे संसार में ले जाती हैं। वे जहां जाना चाहते हैं, बिना किसी प्रतिबंध के जाते हैं। वे जो करना चाहते हैं, बिना किसी रोक-टोक के करते हैं। कहने का मतलब यह है कि किताबें बच्चे को कल्पनाशील बनाती हैं, और कोई भी मौलिक काम करने के लिए कल्पनाशीलता पहली शर्त है। शिक्षा और अन्यबातें बाद कीं।

किताबें शिक्षक की भूमिका भी निभाती हैं। वे बच्चे को घर बैठे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराती हैं। उन्हें हिमालय पर लेकर जाती है और अमरीका व फ्रांस भी। अंतरिक्ष की सैर कराती हैं, तो समुद्र की गहराई में गोता भी लगवाती हैं। किताबें तो इतनी अच्छी दोस्त हैं कि कभी लड़ती-झगड़ती भी नहीं।

मेले का एक और उदाहरण। एक बच्चा आया और उसने एक किताब उठाकर पूछा कि यह कितने की है? बताया कि दस रुपये की। इससे सस्ती नहीं है? उसने अगला सवाल किया। हां है, चार रुपये की। इससे सस्ती भी है क्या? इससे कम कीमत की कोई किताब थी नहीं। वह मायूस हो गया। उससे कहा कि वह अपनी मम्मी-पापा से किताब दिलाने के लिए कहे। वह बोला कि पापा मना कर देंगे। उसे समझाया कि आप और भी बहुत-सी चीजें दिलाने के लिए पापा से जिद करते होंगे। जब आपको किताब पढऩा अच्छा लगता है, तो इसके लिए भी पापा से कहो। बात उसकी समझ में आ गई और वह पापा को बुलाने चला गया।

अपनी पसंद-नापसंद बच्चों पर थोपनी नहीं चाहिए, और न ही पहले से ही कोई धारणा बनाने की जरूरत है। बच्चों को किताबों से दोस्ती करने दें। निश्चित तौर से इससे बच्चों की बौद्धक क्षमता तो बढ़ेगी ही, साथ ही एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनने में भी मदद मिलेगी।

बड़ों ने भी ली पुस्त‍क खरीदने में रुचि।

बड़ों ने भी ली पुस्त‍क खरीदने में रुचि।

 फोटो : विनोद उप्रेती

ओमप्रकाश वाल्मीकि को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

ओमप्रकाश वाल्मीकि

ओमप्रकाश वाल्मीकि

नयी दिल्ली : हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार, क्रांतिकारी चिन्तक और ‘जूठन’ जैसी विश्‍वप्रसिद्ध आत्मकथा के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे। उनका इस तरह असमय चले जाना लोकतान्त्रिक मूल्यों और सामाजिक बदलाव के प्रति प्रतिबद्ध भारतीय साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका जन्म 30 जून 1950 को मुजफ्फरनगर जिले (उत्तर प्रदेश) के बरला गाँव में हुआ था। वे कुछ वर्षों से कैंसर से संघर्ष कर रहे थे। उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो गयी थी। उनके गुर्दे में स्टैंड पड़ी हुई थी जिसको छह महीने बाद निकाल देना होता है। चिकित्सकों का कहना था कि प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण अभी आपरेशन नहीं किया जा सकता है। दिल्ली में इलाज के बाद भी स्थिति ठीक न होने पर उनके परिजन उन्हें देहरादून के मैक्स हस्पताल ले आए, जहाँ 17 नवम्बर 2013 को सुबह अस्पताल में ही उनका निधन हो गया। जूठन के अलावा सलाम, घुसपैठिये, अब और नहीं, सफाई देवता, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र और दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ, ‘सदियों का संताप’ और ‘बस बहुत हो चुका’ उनकी मानीखेज किताबें है।

सामाजिक भेदभाव, उत्पीडन और आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्षरत साहित्यिक-सांस्कृतिक धाराओं और सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने एक सच्चे साथी को खो दिया है। दलित जीवन का जो हृदयविदारक और बेचैन कर देनेवाला यथार्थ उनके लेखन के जरिए हिंदी साहित्य में आया, उसके बगैर हिंदी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य प्रगतिशील-जनवादी नहीं हो सकता। ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचना, आलोचना और चिंतन का न केवल हिंदी साहित्य, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए स्थाई महत्त्व है। उन्होंने भारतीय साहित्य को लोकतान्त्रिक, जनपक्षधर, यथार्थवादी और समाजोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और लैंगिक विभेद के खिलाफ थे और मानव मुक्ति के लिए संघर्षरत थे।

वाल्मीकि जी ने दलित साहित्य की जरूरत, उसकी शक्ति और उसके अंतर्विरोधों को भी उजागर किया। वर्ण व्यवस्था, सामंतवाद और पूंजीवाद जिन भी तौर तरीकों से मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव और शोषण-उत्पीडन की प्रवृतियों को बरक़रार रखने की कोशिश करता है, उनका विरोध करते हुए कमजोरों, मजलूमों, दलित-वंचितों की एकता बनाने के प्रति वे हमेशा चिंतित रहे। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ में जब स्कूली छात्र ओमप्रकाश जानवर के खाल की गठरी लेकर सिर से पाँव तक गंदगी और कपड़ों पर खून के धब्बे लिए पहुंचता है तो माँ रो पड़ती हैं। और बड़ी भाभी कहती हैं कि ‘इनसे ये न कराओ…भूखे रह लेंगे….इन्हें इस गंदगी में ना घसीटो!’ अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि ‘मैं उस गंदगी से बाहर निकल आया हूँ, लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं।’  ‘जूठन’ ही नहीं, बल्कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की तमाम रचनाएँ अमानवीय सामाजिक-आर्थिक माहौल में जीवन जी रहे लोगों की मुक्ति की फ़िक्र से जुडी हुई हैं और जिस दलित सौंदर्यशास्त्र की वे मांग करते हैं, उसका भी मकसद उसी से संबद्ध है। जन संस्कृति मंच दलित-वंचित तबकों की मुक्ति के उनके सपनों और संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए उन्हीं के शब्दों को याद करते हुए उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि देता है-
‘मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर
खोद लिया है संघर्ष
जहां आंसुओं का सैलाब नहीं
विद्रोह की चिंगारी फूटेगी
जलती झोपड़ी से उठते धुंवे में
तनी मुट्ठियाँ
नया इतिहास रचेंगी।’

(जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय सहसचिव सुधीर सुमन द्वारा जारी)

भारतीय संस्कृति स्कूल (केवल अंग्रेजी माध्यम)

नयी दिल्ली: सोसायटी ऑफ इंडियन पब्लिशर्स, आथर्स एंड आर्टिस्ट्स (सिपा) की ओर ‘पठन रुचि का विकास कैसे हो’ पर इंडिया इंटरनेशनल कौंसिल एनेक्स में 15 नवम्‍बर 2013 को संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रख्यात कवि एवं साहित्यकार अशोक चक्रधर ने कहा कि टीवी और मोबाइल संस्कृति ने सभ्य और सुसंस्कृति समाज को प्रभावित किया है। आज हमारे युवा अधिकांश समय मोबाइल पर चैटिंग और सर्फिंग करते रहते हैं। प्राइम टाइम पर घरों में लोग टीवी से चिपके रहते हैं। इससे तात्कालिक मनोरंजन तो जरूर होता है, पर लाभ कुछ नहीं होता। इस कारण लोगों में पढ़ने की रुचि कम हुई है।

कथाकार प्रेमपाल शर्मा ने सौ साल पहले की एक ऐतिहासिक घटना का हवाला देते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद की पुस्तक ‘सोजे वतन’ जब बाजार में आयी तो अंग्रेज सरकार ने उस पर रोक लगा दी। मामला कोर्ट में पहुँचा और मजिस्ट्रेट ने प्रेमचंद से पूछा, ‘कितनी प्रतियाँ प्रकाशित हुई हैं?’ जवाब में मुंशी प्रेमचंद ने कहा, ‘ज़नाब, 1000 प्रतियाँ छापी हैं, जिनमें से 750 बिक चुकी हैं।’ तब मजिस्ट्रेट ने बाकी बची प्रतियों को कोर्ट में जमा करने का आदेश दिया। शर्मा ने स्पष्ट किया कि सौ साल से भी अधिक समय पहले प्रकाशित होने वाली पुस्‍तक की प्रतियों की संख्या 1000 होती थी। वर्तमान में जनसंख्या को देखते हुए इसकी संख्या लाखों में होनी चाहिए, लेकिन अब इनकी संख्या मुश्किल से 200-300 तक पहुँच गयी है। इसके पीछे सरकार की दोषपूर्ण नीति भी कम जिम्मेदार नहीं है। आज सरकारी कार्यालयों में गार्ड की भरती तक के लिए निकलने वाले विज्ञापनों में भी अंग्रेजी ज्ञान अनिवार्य होता है। पढ़ने-लिखने में रुचि कम होने से महानगरों में रहने वाले किशोरों का हिन्दी में हाथ बहुत तंग होता जा रहा है।

हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने अपने चुटीले अंदाज में एक घटना का उल्लेख किया,  ‘मैंने हाल ही में एक स्कूल का बोर्ड पढ़ा, जो इस तरह लिखा गया था- भारतीय संस्कृति स्कूल (केवल अंग्रेजी माध्यम)। अर्थात् ऐसा स्कूल जिसमें हमारे नौनिहालों को हिन्दी से दूर रखा जाएगा। दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे स्कूलों का ही बोल-बाला है और लोग ऊँची कीमत अदा करके अपने बच्चों को यहाँ भेजते हैं। उन्‍होंने कहा कि हमारे देश और समाज ने कुछ इसी तरह की सोच अपना ली है, मानो हिन्दी की स्थिति पिछड़ी हुई हो। अगर प्रगति करनी है तो हम सभी को इस सोच से आगे निकलना होगा।

डायमंड पॉकेट बुक्स के नरेंद्र वर्मा ने कहा कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार में राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। हिन्दी-भाषी स्कूलों में दसवीं कक्षा तक हिन्दी विषय को अनिवार्य किया जाना जरूरी है। प्रत्येक शहरों और गाँव में पुस्तकालय होने चाहिए, जहाँ बैठकर विद्यार्थी ज्ञान-विज्ञान और साहित्य की पुस्तकें और पत्रिकायें पढ़ सकें। इससे पूर्व हिन्द पॉकेट बुक्स के शेखर मल्होत्रा ने वक्ताओं और आंगतुकों का स्वागत किया।

समारोह का समापन हास्य कवि संगोष्‍ठी के साथ हुआ। इस अवसर पर अशोक चक्रधर, सुरेंद्र शर्मा के साथ महेश गर्ग ‘बेधड़क’  ने अपनी कविताएँ सुनाईं।

इंदिरापुरम में बाल पुस्तक मेला 17 को

book fair

गाजियाबाद : रेसिस्टेंस कैफे, जन संस्कृति मंच और जेसी बोस विज्ञान संस्थान की ओर से 17 नवम्‍बर 2013 को सेंट्रल पार्क, नीतिखंड-3 , इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद में सुबह 10  से अन्धेरा होने तक बाल पुस्‍तक मेले का आयोजन किया जा रहा है।

मुख्य आकर्षण-

> बच्चों और बड़ों के लिए कम कीमत वाली आकर्षक किताबें 10 प्रतिशत की छूट के साथ
> प्रोफेशनल कलाकारों द्वारा बच्चों के लिए कहानी पाठ
> बच्चों के चित्रों की प्रदर्शनी

संपर्क : सौरभ कुमार, संयोजक, रेसिस्टेंस कैफे, 91-8130568120
: भूमिका, संयोजक, जेसी बोस विज्ञान संस्थान, 91-9871344533

बाल साहित्यकार हरिकृष्ण देवसरे का निधन

harikrishna-devsare.

हरिकृष्ण देवसरे

गाजियाबाद: सुप्रसिद्ध बाल-साहित्यकार हरिकृष्ण देवसरे का 14 नवम्‍बर, 2013 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 75 साल के थे।

मध्य प्रदेश के नागोद में नौ मार्च 1938 को जन्‍में देवसरे को बाल साहित्य में योगदान के लिए साल 2011 में साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।. अपने जीवन काल में उन्होंने तीन सौ से ज्यादा पुस्तकें लिखीं।

देवसरे देश के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाल साहित्य में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की थी। उन्हें दर्जनों पुरस्‍कार, सम्मान और प्रशस्ति पत्र मिले। कई किताबों का अनुवाद किया। अपने लेखन में प्रयोग धर्मिता के लिए मशहूर देवसरे ने आधुनिक संदर्भ में राजाओं और रानियों तथा परियों की कहानियों की प्रासंगिकता के सवाल पर बहस शुरू की थी। बाल साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान (2001) और हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान (2004) सहित कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया।

2007 न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भी उन्होंने भाग लिया था। उन्हें पहले वात्सल्य पुरस्कार से भी नवाजा गया था। देवसरे करीब 22 साल तक आकाशवाणी से जुड़े रहे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद पराग पत्रिका का संपादन किया था। उन्‍होंने धारावाहिकों, टेलीफिल्मों और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित कार्यक्रमों के लिए कहानी भी लिखी। कई अंतरराष्ट्रीय और चर्चित कृतियों का अनुवाद का भी श्रेय उन्हें जाता है।

अनवर सुहैल की कविताएं

 अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

1-

बताया जा रहा हमें
समझाया जा रहा हमें
कि हम हैं कितने महत्वपूर्ण

लोकतंत्र के इस महा-पर्व में
कितनी महती भूमिका है हमारी

ईवीएम के पटल पर
हमारी एक ऊँगली के
ज़रा से दबाव से
बदल सकती है उनकी किस्मत

कि हमें ही लिखनी है
किस्मत उनकी
इसका मतलब
हम भगवान हो गए…

वे बड़ी उम्मीदें लेकर
आते हमारे दरवाज़े
उनके चेहरे पर
तैरती रहती है एक याचक-सी
क्षुद्र दीनता…
वो झिझकते हैं
सकुचाते हैं
गिड़गिडाते हैं
रिरियाते हैं
एकदम मासूम और मजबूर दिखने का
सफल अभिनय करते हैं

हम उनके फरेब को समझते हैं
और एक दिन उनकी झोली में
डाल आते हैं…
एक अदद वोट…

फिर उसके बाद वे कृतघ्न भक्त
अपने भाग्य-निर्माताओं को
अपने भगवानों को
भूल जाते हैं….

2-

उनकी न सुनो तो
पिनक जाते हैं वो

उनको न पढो तो
रहता है खतरा
अनपढ़-गंवार कहलाने का

नज़र-अंदाज़ करो
तो चिढ़ जाते हैं वो

बार-बार तोड़ते हैं नाते
बार-बार जोड़ते हैं रिश्ते

और उनकी इस अदा से
झुंझला गए जब लोग
तो एक दिन
वो छितरा कर
पड़ गए अलग-थलग
रहने को अभिशप्त
उनकी अपनी चिडचिड़ी दुनिया में…

3-

उन अधखुली
ख्वाबीदा आँखों ने
बेशुमार सपने बुने

सूखी भुरभरी रेत के
घरौंदे बनाए

चांदनी के रेशों से
परदे टाँगे

सूरज की सेंक से
पकाई रोटियाँ

आँखें खोल उसने
कभी देखना न चाहा
उसकी लोलुपता
उसकी ऐठन
उसकी भूख

शायद
वो चाहती नहीं थी
ख्वाब में मिलावट
उसे तसल्ली है
कि उसने ख्वाब तो पूरी
ईमानदारी से देखा

बेशक
वो ख्वाब में डूबने के दिन थे
उसे ख़ुशी है
कि उन ख़्वाबों के सहारे
काट लेगी वो
ज़िन्दगी के चार दिन…

4-

वो मुझे याद करता है
वो मेरी सलामती की
दिन-रात दुआएँ करता है
बिना कुछ पाने की लालसा पाले
वो सिर्फ सिर्फ देना ही जानता है
उसे खोने में सुकून मिलता है
और हद ये कि वो कोई फ़रिश्ता नही
बल्कि एक इंसान है
हसरतों, चाहतों, उम्मीदों से भरपूर…

उसे मालूम है मैंने
बसा ली है एक अलग दुनिया
उसके बगैर जीने की मैंने
सीख ली है कला…

वो मुझमें घुला-मिला है इतना
कि उसका उजला रंग और मेरा
धुंधला मटियाला स्वरूप एकरस है

मैं उसे भूलना चाहता हूँ
जबकि उसकी यादें मेरी ताकत हैं
ये एक कडवी हकीकत है
यदि वो न होता तो
मेरी आँखें तरस जातीं
खुशनुमा ख्वाब देखने के लिए

और ख्वाब के बिना कैसा जीवन…
इंसान और मशीन में यही तो फर्क है……

5-

जिनके पास पद-प्रतिष्ठा
धन-दौलत, रुआब-रुतबा
है कलम-कलाम का हुनर
अदब-आदाब उनके चूमे कदम
और उन्हें मिलती ढेरों शोहरत…

लिखना-पढ़ना कबीराई करना
फकीरी के लक्षण हुआ करते थे
शबो-रोज़ की उलझनों से निपटना
बेजुबानों की जुबान बनना
धन्यवाद-हीन जाने कितने ही ऐसे
जाने-अनजाने काम कर जाना

तभी कोई खुद को कहला सकता था
कि जिम्मेदारियों के बोझ से दबा
वह एक लेखक है हिंदी का
कि देश-काल की सीमाओं से परे
वह एक विश्‍व-नागरिक है
लिंग-नस्ल भेद वो मानता नहीं है
जात-पात-धर्म वो जानता नहीं ही

बिना किसी लालच के
नोन-तेल-कपडे का जुगाड़ करते-करते
असुविधाओं को झेलकर हंसते-हंसते
लिख रहा लगातार पन्ने-दर-पन्ने
प्रकाशक के पास अपने स्टार लेखक हैं
सम्पादक के पास पूर्व स्वीकृत रचनायें अटी पड़ी हैं

लिख-लिख के पन्ने सहेजे-सहेजे
वो लिखे जा रहा है…
लिखता चला जा रहां है…

इतनी सस्ती नही थी आज़ादी : नित्यानंद गायेन

नित्यानंद गायेन

नित्यानंद गायेन

क्रांति तो दूर की बात है
आज तो वे याद भी नही करना चाहते हैं
आज़ादी की जंग में
शहीद किसी भी क्रांतिकारी को
मंगल पाण्डेय
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु
या अशफाक़उल्ला और चंद्रशेखर की
संघर्षगाथा
इस माटी का धरोहर है
बिरसा मुंडा , मातुनगिनी हाजरा और खुदीराम
कितनो को याद है आज ?
यह सूची लम्बी है
गदर पार्टी का इतिहास
कब पढ़ा हमने ?
इतनी सस्ती नही थी
आज़ादी जो आज हम समझ रहे हैं
यह कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास है
इसे पढ़ना मतलब
संघर्ष और यातनाओं से रू-ब-रू होना है
मतलब हमारा जिन्दा रहना है।