Archive for: October 2013

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे केपी : सुधाकर अदीब

के.पी. सक्सेना

के.पी. सक्सेना

हिन्दी गौरव, पद्मश्री के.पी. सक्सेना ने 31 अक्टूबर 2013 को प्रातः 8.45 बजे इस सरायफ़ानी को आखिरकार अलविदा कहा। उनका महाप्रयाण हिन्दी भाषा एवं साहित्य की आपूरणीय क्षति है और मेरे लिए तो यह व्यक्तिगत क्षति भी है। एक बेहद गंभीर, भावुक, आस्थावान और स्नेहमय व्यक्तित्व का नाम के.पी. सक्सेना। हिन्दी व्यंग्य के अप्रतिम एवं स्वर्णिम हस्ताक्षर का नाम के.पी. सक्सेना। अपनी चटकीली अदायगी में व्यंग्य रचनाओं को पढ़कर बेतरह गुदगुदाने वाले केपी (ये उनके प्रशंसकों का दिया प्यार भरा नाम था) अपने निजी जीवन में उतने ही संजीदा व्यक्ति थे।… भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनन्य पुजारी, रामकथा के मर्मज्ञ विद्वान, दार्शनिक, चिंतक, वैज्ञानिक, उन्हें नजदीक से जानने वाले उन्हें उनकी बहुत-सी ख़ूबियों सहित जानते-बूझते थे।
वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हस्तलिपि फूलों से भी सुंदर। हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले केपी ने अभिव्यक्ति के जितने भी दृश्य और श्रव्य माध्यम हो सकते हैं, सबमें उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। पत्र-पत्रिकाएँ-काव्यमंच-आकाशवाणी-दूरदर्शन और हिन्दी फिल्म जगत, सभी जगह उन्होंने हिन्दी के इस तरह झंडे गाड़े जो किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं। लखनऊ का अदब तो केपी सक्सेना का लोहा मानता ही था, उनकी कलम की मुरीद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री भी हुई, जब अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होने ‘हलचल’, ‘लगान’, ‘स्वदेश’ और ‘जोधा अकबर’ जैसी सफल फिल्मों के खूबसूरत और दमदार संवाद लिखे। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान प्रदान किया और हाल ही में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उन्हें ‘हिन्दी गौरव’ देकर स्वयं गौरवान्वित हुआ। वास्तव में केपी सक्सेना का व्यक्तित्व और कृतित्व किसी भी सम्मान और पुरस्कार से बड़ा था।

… और उर्दू भाषा और अवध की तहज़ीब के तो वह ऐसे विशेषज्ञ कि  ‘बीवी नातियों वाली’ से लेकर नई नवेली दोशीज़ाएँ भी केपी की शीरीं ज़ुबान पर फ़िदा हुए बिना रह ही नहीं सकतीं। तभी तो केपी के दोस्त ‘मिर्ज़ा’ उनसे यूँ ही परेशान थोड़े ही रहते थे।

केपी सर से मेरा प्रथम संपर्क सन 2003 में मेरे तृतीय उपन्यास ‘हमारा क्षितिज’ के लोकार्पण से कुछ दिन पूर्व हुआ। वह मेरे अनुरोध पर फ़ैज़ाबाद में इस उपन्यास के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। इस समारोह में ज़ाहिर है कि केपी हीरो थे और मैं था उनका साइड हीरो। लोकार्पण के बाद सभी दर्शकों ने उनसे उनका कोई व्यंग्य सुनाने कि फ़र्माइश की। केपी ने प्रारम्भ में काफी नानुकुर की और कहा कि वह 20 वर्षों से सार्वजनिक मंचों से व्यंग्य पाठ करना छोड़ चुके हैं। फिर भी हमारे भारी आग्रह पर उन्होने अपना ‘इन्कम टैक्स का छापा पड़ने वाला’ सुप्रसिद्ध व्यंग्य सुनाया अपने चिर-परिचित अंदाज़ में। उनका एक-एक वाक्य और जनता लोट-पोट। क़हक़हों का वह दौर चला कि हँसते हँसते लोगों की आँखों में आँसू आ गए।… अब क्या कहूँ ? उन्हीं महान व्यंग्यकार केपी सक्सेना को मैंने ज़ार ज़ार रोते हुए भी देखा है। मेरा चौथा उपन्यास ‘मम अरण्य’ गत वर्ष 2012 में आया। इस उपन्यास के ‘सीता कि अग्नि परीक्षा’ विषयक प्रसंग को मुझसे सुनकर केपी मेरे समक्ष फूट’फूट कर रोये। तब मैंने कुछ-कुछ जाना उनके भीतर के उस अत्यंत भावुक और गंभीर इंसान को।

इसी वर्ष 2013 में प्रकाशित अपने पांचवें हिन्दी उपन्यास ‘शाने तारीख़’ कि पाण्डुलिपि भी लेकर उनके पास गया। अब वे बेहद बीमार थे। पर शेरशाह सूरी पर उपन्यास है, जानकार वह बेहद खुश हुए और उन्होने उसके कुछ अंश सुनकर मुझे ढेरों आशीर्वाद दिए। अब वही दुआएँ मेरा सरमाया हैं। 81 वर्ष की उम्र में भी साहित्य जगत के सदाबहार ‘देवानन्द’ के॰पी॰ सक्सेना हमेशा अमर रहेंगे। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।

और बहुत कुछ था जो उन्हें विशिष्ट बनाता था : जसम

rajendra yadav

नई दि‍ल्‍ली : राजेन्द्र यादव ( 28 अगस्त 1929- 28 अक्‍टूबर 2013) अचानक चले गए। उनका जाना असमय इसलिए है कि अपने समवयस्कों के बीच जीवितों में वे ही थे, जो बाद की साहित्यिक पीढ़ियों के बीच भी सबसे जीवंत और विवादास्पद बने रहे। अपने आधा दर्जन उपन्यास और इतने ही कहानी संग्रह, एक कविता-संग्रह और ढेरों आलोचनात्मक लेखों से ही वे साहित्य की दुनिया में एक कद्दावर हैसियत रखते थे, लेकिन और बहुत कुछ था जो उन्हें विशिष्ट बनाता था।

हिन्दुस्तानी समाज में इस उम्र में दुनिया छोड़ देना बहुत हैरत की बात नहीं, लेकिन हैरत और दुःख इसलिए है कि वे बिलकुल तक ज़िंदगी की हरकतों के बीच बने रहे, जमे रहे, अड़े रहे। कोई उनसे सहमत हो या असहमत, उनकी उपस्थिति और उनके साथ संवाद से मुँह नहीं मोड़ सकता था। वे यारों के यार थे, लेकिन जो उनसे मुखालिफ विचार रखते थे, उनके लिए भी वे एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी थे, जिसके बगैर उनसे प्रतिद्वंद्विता रखने वाले साहित्यिक आचार और विचार भी खुद को ‘कुछ कम’ सक्रिय महसूस करते थे।

राजेन्द्र यादव ‘नयी कहानी’ के स्तंभों में तो थे ही, ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादक के नए अवतार में उन्होंने अपने ‘सम्पादकी‍यों’ के ज़रिए 1980 के दशक के मध्य से जिन बहसों को छेड़ा, वे साहित्य और समकालीन समाज के रिश्ते की बेहद महत्वपूर्ण बहसें थीं। बहस चाहे 1857 के मूल्याँकन के बारे में हो, ‘पुरुष की निगाह में स्त्री’ के बारे में हो या फिर हिन्दुस्तानी मुसलमानों के बारे में, वे हरदम ही एक पक्ष थे जिसके बरअक्स अन्य लोगों को बात करना ज़रूरी लगता था। राजेन्द्र यादव बहस उकसाते थे, प्रतिक्रियाएं जगाते थे। इस उद्देश्य के लिए चाहे जितनी सनसनी की जरूरत हो, उन्हें इससे गुरेज़ न था।

राजेन्द्र यादव का आग्रह था कि अस्मितामूलक साहित्य को ही नयी प्रगतिशीलता माना जाए। इसके लिए उन्होंने ‘हंस’ पत्रिका को एक मुखर मंच बनाया। लेकिन प्रतिद्वंद्वी विचारों के लिए जगह की कोई कमी पत्रिका में भरसक नहीं थी। उनके जरिए पिछले ढाई दशकों में ‘हंस’ ने तमाम युवा स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदाय की प्रतिभाओं से हिन्दी जगत को परिचित कराया। इन वर्षों में प्रगतिशील चेतना की तमाम कहानियाँ ‘हंस’ के ज़रिए प्रकाश में आयीं। वे मोटे तौर पर एक उदारवादी, सेक्युलर और लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी की भूमिका जीवनपर्यंत निभाते रहे। ‘कुफ्र’ कहने की आदत उनकी अदा थी जो लोगों को रुचती थी, सहमति या असहमति की बात दीगर है।

उनके कथा-लेखन की प्रयोगधर्मिता निश्चय ही उल्लेखनीय है, लेकिन पिछले तीन दशकों से ‘मैं’ शैली में बेबाक ढंग से, अंतर्विरोधग्रस्त होने, गलत या सही समझे जाने के खतरों को उठाते हुए बोलना और लिखना उन्हें एक निराली साहित्यिक शख्सियत प्रदान करता है, जिसकी कमी लम्बे समय तक हिन्दी की साहित्यिक दुनिया को खलती रहेगी।

उन्होंने लेखन, सम्पादन के अलावा जीविका के दूसरे साधन नहीं तलाशे। ये हमारी आज की दुनिया में बेहद मुश्किल चुनाव है। जन संस्कृति मंच हिन्दी की इस निराली शख्सियत को अपनी श्रद्धांजलि पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)    

राजेन्द्र यादव के निधन पर जेएनयू में शोक-सभा

भारतीय भाषा केन्द्र द्वारा चर्चित लेखक और ‘हंस’ पत्रिका के संपादक राजेन्‍द्र यादव के नि‍धन पर शोक सभा का आयोजन कि‍या गया। दिल्ली में उनका निधन 28 अक्‍टूबर 2013 को रात में अस्पताल ले जाते वक्‍त हो गया।

29 अगस्त 1929 को आगरा, उत्‍तरप्रदेश में जन्में राजेन्द्र यादव की प्राथमिक शि‍क्षा आगरा में हुई। 1951 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पाकर एम.ए. की उपाधि प्राप्त की थी। बाद में वे कलकत्ता चले गये तथा 1964 में दिल्ली आये। यहाँ आकर वे लंबे समय तक ‘अक्षर प्रकाशन’ चलाते रहे तथा बाद में प्रेमचंद द्वारा प्रकाशि‍त पत्रिका ‘हंस’ का दुबारा प्रकाशन शुरू किया। पिछले 27 वर्षों से वे ‘हंस’ के संपादक थे। उनकी प्रकाशि‍त पुस्तकों में ‘सारा आकाश’, उखड़े हुए लोग, शह और मात’ (उपन्यास), ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ आदि महत्वपूर्ण हैं। स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श के क्षेत्र में उन्होंने हंस के जरिए एक सार्थक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते हिन्दी संकाय उन्हें याद रखेगा।

राजेन्द्र यादव अपने लेखन में विस्तृतफलक के लिए जाने जाते हैं। शब्दों, संदर्भों, मिथकों, प्रतीकों का उपयोग उनके यहाँ पारंपारिक नहीं है,  वे उनके नए अर्थबोध ढूंढ़ते रहते थे। जनवादी आंदोलन को उन्होंने अपना नेतृत्वकारी समर्थन दिया।

वे 2003 से 2005 तक भारतीय भाषा केन्द्र की सलाहकार समिति के सदस्य तक रहे। पिछले वर्ष केन्द्र ने ‘हमारे समय का साहित्य’ पर उनके व्याख्यान का आयोजन किया था। उनके निधन से हिन्दी साहित्य और संकाय के लिए अपूर्णीय क्षति हुई है। यह सभा राजेन्द्र यादव के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है तथा उनके परिवारजनों एवं मित्रों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करती है।

इस शोक सभा में भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. रामबक्ष, प्रोफेसर वीर भारत तलवार, डॉ. देवेन्द्र चौबे, डॉ रामचन्द्र, डा. गंगासहाय मीणा और बड़ी संख्या में विभाग के विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित थे।

(भारतीय भाषा केन्द्र की ओर से जारी)

थि‍येटर ने मुझे बेहतर डॉक्‍टर बनाया : मोहन आगाशे

मोहन आगाशे

मोहन आगाशे

एक कलाकार और मनोविश्‍लेषक होने के नाते यह बात मैंने बहुत शिद्दत से महसूस की है कि सिनेमा दिमागी स्वास्थ्य के बारे में लोगों का नजरिया बदलने का सशक्त माध्यम है। यह मेरी खुशकिस्मती है कि सिनेमा और चिकित्सा की दुनिया के फासलों को मिटाने में मुझे कामयाबी मिली। एक कलाकार के तौर पर मुझे सत्यजीत रे, मीरा नायर, श्याम बेनेगल की फिल्मों में दर्शकों ने काफी सराहा। विजय तेंदुलकर के नाटक ′घासीराम कोतवाल′ में ′नाना फड़नवीस′ के किरदार में लोगों ने मुझे इस कदर पसंद किया कि असल जिंदगी में भी वे मुझे उस पात्र से अलग करके नहीं देख पाते थे। यह सोचकर मुझे सुकून मिलता है कि अभिनय के साथ-साथ मैं समाज सेवा के काम भी कर सका। महाराष्ट्र सरकार में सलाहकार के तौर पर मैंने महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल हेल्थ की नींव रखी और महाराष्ट्र में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का पुनर्गठन किया। 1993 में भूकंप की त्रासदी का शिकार हुए लातूर में पीड़ितों को मानसिक रूप से सामान्य बनाने के लिए भी मैंने प्रयास किए। मेरा मानना है कि सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि कई अहम बातें समझाने के लिए सिनेमा का प्रयोग किया जा सकता है। पिछले कुछ सालों में ′ए ब्यूटीफुल माइंड′ और ′तारे जमीं पर′ जैसी फिल्मों के जरिए दिमागी बीमारी और व्यवहार संबंधी विषयों को बड़ी संजीदगी से उठाया गया है। कुछ साल पहले का एक ऐसा ही अनुभव मैं बताना चाहता हूं, तब मैं पुणे के कुछ स्कूलों में डिस्लेक्सिया और बच्चों की सीखने संबंधी परेशानियों पर बात करने गया था। मगर वहाँ मौजूद टीचरों और बच्चों ने साफ कहा कि ऐसी कोई परेशानी होती ही नहीं है। वहा के टीचरों का नजरिया यह था कि बच्चे को पढ़ने में कोई परेशानी है तो उसके साथ अनुशासन और थोड़ी कड़ाई से पेश आएँ, तब बच्चा ध्यान देगा और सारी परेशानी खत्म। बाद में ′तारे जमीं पर′ जैसी फिल्म देखकर लोगों को डिस्लेक्सिया की परेशानी से जूझ रहे बच्चों की समस्या समझ में आई। इसके बाद बहुत से टीचर और प्रोफेसर मेरे पास यह पूछने के लिए आए कि वे स्वयं इस समस्या से कैसे पार पा सकते हैं। यानी जो बात मौखिक या लिखित रूप से समझ नहीं आती, उसे सिनेमा की भाषा में संवेदनशील तरीके से लोगों को समझाया जा सकता है।

आज के दौर की पढ़ाई सिर्फ किताबी ज्ञान में पारंगत बच्चों को ही होशियार मानती है। इस स्थिति में ऐसे बहुत से तेज-तर्रार बच्चों को नकार दिया जाता है, जो चित्र या आवाज की भाषा बखूबी समझते हैं। मनोरंजन के साथ शिक्षा देने वाली फिल्मों का विकल्प हमारे पास उपलब्ध है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसमें कितनी रुचि लेते हैं। सच कहूँ तो मेरे अंदर के कलाकार ने मुझे मनोचिकित्सक के तौर पर बेहतर बनाया है। मरीजों के अनुभव सुनने पर मैं उनकी परेशानी सही संदर्भों में समझ पाता हूँ। बौद्धिक रूप से तेज होने और मरीजों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ समझना दो अलग-अलग बाते हैं। थियेटर की अहमियत समझने के कारण ही मैंने जर्मन ′ग्रिप्स′ थियेटर को भारत लाने का फैसला किया। बच्चों के थियेटर में बड़ों की दुनिया लाने के ग्रिप्स के तरीके ने मुझे आकर्षित किया। आमतौर पर ऐसा परियों, दानव और जादूगरों की दुनिया में ही किया जाता है। ज्यादातर माँ-बाप बच्चों को बड़ों की दुनिया से अलग रखते हैं ताकि उन्हें दुनिया की गलत चीजों से दूर रख सकें। बच्चों को बड़ों की दुनिया से रूबरू कराने का एक अच्छा माध्यम है बच्चों का थियेटर। इसमें मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को सीख भी मिलती है।

(अमर उजाला, 13 अक्‍टूबर से साभार)

कॉरपोरेट की आवाज बन गया है मीडिया : अनुराग चतुर्वेदी

नई दिल्ली : ‘हमारे यहाँ जिन सामाजिक मूल्यों को लेकर पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी,  वे आज लगभग पूरी तरह मिटने के कगार पर हैं। न केवल प्रिन्ट मीडिया बल्कि इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया का भी सामाजिक सरोकारों से तेजी अलगाव हो रहा है।’ यह बात जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के फैकल्टी सेंटर में जेएनयू एल्युमनाई एसोसिएशन द्वारा आयोजित मुम्बई का ‘मीडिया : फिल्म, अपराध और व्यापार’ नामक गोष्ठी में बोलते हुए प्रसिद्ध पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी ने कही। कार्यक्रम के प्रारंभ में जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय शि‍क्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. संजय पाण्डेय ने उनका स्वागत किया। लेखक और जेएनयू एल्युमनी एसोसिएशन के सचिव देवेंद्र चौबे ने पिछले तीन दशकों की पत्रकारिता में अनुराग चतुर्वेदी के योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि 1990 के बाद राजनीति में आ रहे परिवर्तनों एवं आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रियाओं ने पत्रकारिता के बुनियादी सवालों को बाजार का हिस्सा बना दिया है।

कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में श्रोताओं के साथ बातचीत में उन्होंने जेएनयू में बिताए अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि जेएनयू में आकर मुझे पहली बार दुनिया को जानने और समझने का मौका मिला। यहाँ समाजशास्त्र का अध्ययन करते हुए जिन सामाजिक सिद्धान्तों से मैं रूबरू हुआ, उनकी मेरे पत्रकार जीवन को सही दिशा देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। मेरे पत्रकार जीवन का मुम्बई से गहरा ताल्लुक रहा है। जब मैंने पत्रकारिता में प्रवेश किया था, उस समय मुम्बई के फिल्म और मीडिया जगत का आम आदमी के साथ सीधा सम्बन्ध था। तीस साल पहले मुम्बई में आज की तरह भयावह स्थिति नहीं थी। पत्रकार पूरी तरह कार्य करने के लिये स्वतंत्र थे। राजनीतिक और व्यापारिक समूहों के द्वारा उनके काम में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की जाती थी। इसी प्रकार आपराधिक जगत के लोग भी पत्रकारों का सम्मान करते थे। अपराधियों में भी मानवीयता होती थी। दाउद और हाजी मस्तान के प्रति लोगों के मन में कोई बहुत गलत धारणा नहीं थी। मैंने खुद हाजी मस्तान का एक इंटरव्यू लिया था। लेकिन पिछ्ले कुछ वर्षों में मुम्बई की दुनिया में काफी बदलाव आया है।

भूमंडलीकरण के दौर में चली बाजारवाद की आंधी ने मीडिया को एक मनोरंजन उद्योग में बदल दिया है। आज पूरी तरह आमजन मीडिया से अलग हो गया है। खबरें सामाजिक असफलताओं, राजनीतिक समस्याओं की जगह गिने-चुने राजनेताओं, अभिनेताओं और व्यवसायियों तक ही सीमित हो गयी हैं। सरकारी अव्यवस्थाओं और घोटालों की खबर तो कभी-कभार देखने और सुनने को मिल जाती है, किन्तु निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की कभी कोई चर्चा नहीं होती, यह नियंत्रण की कठोरता को दर्शाता है।

प्रस्‍तुति‍ :  दीप कुमार मित्‍तल

मन्‍ना डे का नि‍धन

मन्ना डे

मन्ना डे

बेंगलुरु। प्यार हुआ इक़रार हुआ, जिंदगी कैसी है पहेली, कसमें वादे प्यार वफा, ये रात भीगी भीगी, लागा चुनरी में दाग, तू प्यार का सागर है, यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जैसे फि‍ल्‍मी और गैर-फि‍ल्‍मी गानों को अपनी आवाज से अमर बना देने वाले सुप्रसि‍द्ध गायक मन्‍ना डे का

गुरुवार तड़के निधन हो गया है। अस्पताल के एक सीनियर डॉक्टर ने बताया कि 94 वर्षीय मन्ना डे को पांच महीने पहले सांस लेने में दिक्‍कत की वजह से नारायण हृदयालय में भर्ती कराया गया था। उन्होंने तड़के तीन बजकर करीब 50 मिनट पर अंतिम सांस ली।

1 मई 1919 को कोलकाता के एक रूढ़िवादी संयुक्त बंगाली परिवार में जन्मे मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे था। उन्होंने अपने करियर में हिन्दी समेत कई भाषाओं में साढ़े तीन हजार से ज्यादा गाने गाए। दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित मन्ना डे को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्म विभूषण पुरस्कार से भी नवाजा था। मन्ना डे भारतीय संगीत की जानी-मानी आवाजों में से एक थे। पचास और साठ के दशक में अगर हिंदी फिल्मों में राग पर आधारित कोई गाना होता, तो उसके लिए संगीतकारों की पहली पसंद वही होते थे।

मन्ना डे के मामा संगीताचार्य कृष्ण चंद्र डे ने उनके मन में संगीत के प्रति दिलचस्पी पैदा की। बतौर गायक उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1943 में आई फिल्म ‘तमन्ना’ से की थी। इसमें उनके मामा कृष्ण चंद्र डे ने संगीत दिया था। सुरैया के साथ गाया गया यह गाना जबर्दस्त हिट रहा। 1950 में आई फिल्म ‘मशाल’ में पहली बार उन्हें अकेले गाने का मौका मिला। गीत के बोल थे ‘ऊपर गगन विशाल’ और इसे संगीत से संवारा था सचिन देव वर्मन ने। साल 1952 में मन्ना डे ने ‘अमर भूपाली’ नाम से मराठी और बांग्ला में आई फिल्म में गाना गाया और खुद को एक बंगाली गायक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने हिन्दी के अलावा बंगाली, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड़ और असमिया भाषा में भी गीत गाए।

मन्‍ना डे ने गंभीर गाने ही नहीं, बल्‍कि‍ ‘दिल का हाल सुने दिल वाला’, ‘ना मांगू सोना चांदी’ और ‘एक चतुर नार’ जैसे हल्के-फुल्के गीतों को भी आवाज दी। उन्‍होंने सभी संगीतकारों के लिए शास्त्रीय, रूमानी, हल्के-फुल्के, भजन आदि‍ सभी तरह के गाने गाए। उन्होंने हरिवंश राय बच्‍चन की मशहूर कृति ‘मधुशाला’ को भी आवाज दी।

वर्ष 1953 में उन्होंने केरल की सुलोचना कुमारन से शादी की। 2012 में कैंसर की बीमार से सुलोचना की मौत हो गई। उनकी दो बेटियां सुरोमा और सुमिता हैं। संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था। साल 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के अवॉर्ड प्रदान किया गया।

नेतृत्व का संकट : गोपाल प्रधान

 

गोपाल प्रधान

गोपाल प्रधान

आज़ादी के 66 साल बीतने के बाद समूचे देश में इस बात का गहरा एहसास है कि देश का मौजूदा नेतृत्व कुल मिलाकर मजबूरी का चुनाव है। मजबूरी यह भी कि जनता ने देश का नेता नहीं चुना है। प्रधानमंत्री के पद पर बैठे मनमोहन सिंह खुद ही अपने आपको स्वाभाविक नेता नहीं मानते। तथ्य भी इस बात की गवाही देते हैं कि वि‍श्‍व बैंक से लिए गए कर्ज़ की सौगात के बतौर वे नरसिंहा राव को सौंपे गए थे, ताकि इस कर्ज़ का प्रबंधन बतौर वित्तमंत्री अच्छी तरह से कर सकें। प्रधानमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी कोई संयोग नहीं थी, बल्कि उससे अधिक उनके इसी प्रबंधन की निरंतरता का सबूत थी। बात सिर्फ़ राजनीतिक नेतृत्व की नहीं है, बल्कि कहा जा सकता है कि हमने नेतृत्व का अर्थ राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित कर दिया है, बदले में राजनीतिक नेतृत्व ने इसे और भी घटाकर आर्थिक प्रबंधन की कुशलता तक सीमित कर लिया है और अपनी भूमिका यानी बुनियादी काम कारपोरेट घरानों के लिए निवेश का माकूल माहौल बनाना स्वीकार कर लिया है। यह स्थिति भी हमारे सामूहिक सामाजिक जीवन की दरिद्रता का परिचायक है, जिसमें हमने स्वीकार कर लिया है कि नेतृत्व हमारे भीतर से नहीं पैदा होगा, बल्कि हमारे सिर पर आ गिरेगा।

ऐसा आमतौर पर जीवन के हालात को नियंत्रित करने वाली ताकतों के सामने समर्पण कर देने से होता है । मजेदार बात यह है कि इन ताकतों को जन्म हमने ही दिया है, लेकिन अब उनकी ताकत बेकाबू होने की हद तक बढ़ी हुई महसूस हो रही है। उदाहरण के लिए शासकों द्वारा वस्तुओं की कीमत के सवाल पर कहा जाता है कि ऐसा बाजार के चलते हो रहा है, और हम पूछते भी नहीं कि बाजार को कौन चला रहा है। इस परिस्थिति ने लोगों के मन में एक तरह की असहायता को जन्म दिया है, जिसे शासक वर्ग अपने लिए बहुत ही अच्छा समझते हैं। शासकों के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं होती कि जन समुदाय ने बनी बनाई व्यवस्था को ही अपनी नियति मान लिया है और इसी में थोड़े बहुत सुधार से आगे का सपना देखना बंद हो गया है। सभी शासकों की कोशिश रहती है कि कुछेक चीजों पर सामाजिक सर्वानुमति कायम हो जाए और उन पर सवाल उठाना पाप समझा जाने लगे। जैसे, पूँजीवाद की कोशिश रहती है कि मजदूर उसे शोषक नहीं, बल्कि अपने जीवन की एकमात्र गारंटी मान ले और इस तरह अपनी मेहनत को लूटनेवाली व्यवस्था की रक्षा करने लगे, उसी तरह पूँजीवादी राजनीतिक व्यवस्था में शासन चलानेवालों की कोशिश रहती है कि जनता वर्तमान शासन पद्धति का विकल्प न तलाशे, बल्कि जिस व्यवस्था में उसकी इच्छा का प्रतिनिधित्व शून्य के बराबर होता है, उसे ही खुद के प्रतिनिधित्व का सर्वोत्तम तरीका मान ले।

भारत में इस समय राजनीतिक वर्ग ने संसदीय लोकतंत्र को लेकर ऐसा माहौल बनाने में एक हद तक सफलता पा ली है। हाल में विभिन्न आंदोलनों के विरोध में संसद में मौजूद दक्षिण से लेकर वाम तक जिस तरह संसदीय प्रणाली की श्रेष्ठता साबित करने के लिए लामबंद हो गए, उससे इस प्रणाली के बने रहने में इनके न्यस्त स्वार्थ की झलक ही मिली। संसद की रक्षा के लिए भाजपा के शासन काल में सेना बुलाई गई थी तो इसे भविष्य में आनेवाली स्थितियों का संकेत नहीं समझा गया। अब वह घटना एक प्रतीक जैसी लगती है जिसमें संसद इतनी असुरक्षित हो गई है कि उसकी रक्षा के लिए सेना के हथियारबंद जवानों की जरूरत पड़ा करेगी। कांगेस के दस साला शासन में सेना तो नहीं बुलाई गई, लेकिन ऐसा माहौल जरूर बना दिया गया कि याद भी न आए कि जब इन चुनावों की बस शुरुआत ही हुई थी, तभी प्रेमचंद ने उनकी सड़ांध को सूंघ लिया था। यह भी किसी ने याद नहीं किया कि दुनिया-भर में फ़ांसीवाद संसदीय लोकतंत्र के रास्ते ही आया है । मार्गरेट थैचर द्वारा आविष्कृत नारा ‘देयर इज नो अल्टरनेटिव’ हमारे देश में वर्तमान शासन की रक्षा का सर्वोत्तम नारा बन गया है। सभी शासक विकल्पहीनता की भावना को अपने लिए सबसे अधिक शुभ संकेत मानते हैं। इसी कारण से नेतृत्व का सवाल विकल्प का सवाल भी बन जाता है।

असल में किसी भी नेतृत्व का जन्म दोतरफ़ा प्रक्रिया का नतीजा होता है। समूचे समाज की किसी खास दिशा में जाने की अचेतन इच्छा को जब कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह स्वर देने लगता है, तो नेतृत्व का जन्म होता है। मध्यकाल में यह नेतृत्व बहुत कुछ धार्मिक आंदोलन से सामने आता था और उसे दिशा देता था, लेकिन सारत: यह आंदोलन सामाजिक हुआ करता था। आखिर धर्म की आवश्यकता भी तो एक सामाजिक आवश्यकता ही होती है। आधुनिक काल में धर्म की जगह राजनीति ने ले ली है, लेकिन मूल में यह सामाजिक आवश्यकता ही है जो राजनीतिक हलचलों के पीछे मौजूद रहती है। दिक्‍कत यह है कि सामाजिक हलचल का उत्पाद होने के बावजूद राजनीतिक नेतृत्व एक स्वतंत्र वर्ग की तरह आचरणकर ने लगता है और उसका एक सामूहिक स्वार्थ बन जाता है, जिसकी पूर्ति के लिए वे तमाम मतभेदों के बावजूद एकताबद्ध हो जाते हैं। हमारे देश का राजनीतिक वर्ग इस समय इसी तरह का आचरण कर रहा है। इसलिए नेतृत्व के सवाल पर सोचते हुए सिर्फ़ राजनीतिक नेतृत्व को ही देखने के बंधन से दिमाग को मुक्त करने की जरूरत है।

हमारे देश के हालिया अतीत में स्वाधीनता आंदोलन ऐसा आंदोलन था जिसने नेतृत्व को जन्म दिया था। वह नेतृत्व पारंपरिक अर्थों में राजनीतिक ही नहीं था। अगर उस नेतृत्व को गांधी तक भी महदूद माना जाय तो उनके व्यक्तित्व में सामाजिक, आध्यात्मिक, नैतिक और राजनीतिक को अलगाना मुश्किल हो जाता है। अन्य नेताओं की बात करें तो अंबेडकर के व्यक्तित्व में पुन: राजनीतिक और सामाजिक का विभाजन खत्म हो जाता है। इतिहास में होने वाले तमाम तरह के नए शोध यह बता रहे हैं कि ऐसा महज राष्ट्रीय पैमाने पर नहीं था, बल्कि छोटी-छोटी जगहों पर भी स्थानीय नेतृत्व का जन्म हुआ था, जिसे पुन: अलग-अलग खांचों में बांटना असंभव है। स्वाधीनता आंदोलन भारतीय समाज को गढ़ने के सपने से जुड़ा हुआ था, जो औपनिवेशिक सत्ता और मानस से मुक्ति के जरिए होना था। दुर्भाग्य से 1947 में सत्ता मिलने के बाद जो वर्ग सत्तासीन हुआ उसने इसी सवाल पर समझौता करना शुरू कर दिया। ऐसा नहीं कि आजादी के आंदोलन के दौरान ही इस वर्ग के निशानात नहीं दिखाई पड़े थे। भगतसिंह, प्रेमचंद और अन्य तमाम ईमानदार लोगों ने आशंका जाहिर की थी कि जिस वर्ग को सत्ता मिलने जा रही है, वह देश को स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों की दिशा में आगे ले जाने की जगह उलटी दिशा में ले जाएगा। तथ्य यह भी बताते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की सबसे प्रभावी आवाज महात्मा गांधी भी एक तरह से सत्ताकांक्षी समूह द्वारा हाशिए पर पहुंचा दिए गए थे। बहरहाल सत्ताधारी समूह ने जैसे-जैसे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन की भावना के साथ गद्दारी की, वैसे-ही-वैसे नेतृत्व का कद घटता गया। निष्कर्ष यह कि आत्मविश्वास से भरपूर भारत देश की संकल्पना का एक बुनियादी तत्व साम्राज्यवाद का विरोध है। इस विरोध को तिलांजलि देने की प्रक्रिया में ही सुनील खिलनानी के शब्दों में ‘आइडिया आफ़ इंडिया’ की क्रमिक और धीमी मौत निहित है, जो हमारे देश के वर्तमान नेतागण करने पर आमादा हैं।

वैकल्पिक नेतृत्व की आशा स्वाभाविक रूप से वामपंथ से होती है लेकिन शुरुआती नेताओं के चिंतन और आचार की व्यापकता के बाद अनेक कारणों के चलते भारतीय वामपंथ संसदीय बौनेपन का शिकार होता गया और जनता की स्वतंत्र दावेदारी का हथियार होने की बजाय उनके लिए राहत का औजार बनने में अपनी सार्थकता समझने लगा। उसने साम्राज्यवाद विरोध का मतलब अमेरिका से नजदीकी के कारण पाकिस्तान का विरोध समझ लिया, जो भारतीय शासकवर्ग को भी रास आने लगा था। इसी तरह क्षेत्रीय आंदोलनों में जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षा की अभिव्यक्ति देखने की जगह उसने इसे भारत की एकता और अखंडता पर हमले की साम्राज्यवादी चाल समझ लिया और इस मामले में भी शासकवर्ग के साथ खड़ा हो गया। भारत के शासकवर्ग ने राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा विकसित कर ली है, जो साम्राज्यवाद विरोध की जगह पाकिस्तान के विरोध पर आधारित है और दुर्भाग्य से उसका एक सांप्रदायिक पहलू भी उभर कर सामने आया है। स्वाभाविक रूप से इसका सबसे अधिक लाभ उन्मादी ताकतें उठाती हैं। इस नाम पर हथियारों की खरीद से लेकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तथा अगर चीन का सवाल जोड़ दें तो कम्युनिस्ट विरोध तक सध जाता है। फिर भी संसदीय वामपंथ राष्ट्रवाद की इस धारणा का विरोधकर के वैकल्पिक जनपक्षीय धारणा प्रतिपादित नहीं करता। विकास के भी शासक धारणा का विकल्प प्रस्तावित न करने के चलते नए सामाजिक आंदोलनों के साथ उसका सार्थक संवाद नहीं बन पाया है।

यही चीज है जो व्यापक जनता के भीतर बड़े पैमाने पर अलगाव को जन्म दे रही है। यह अलगाव एक हद तक चिंताजनक है, क्योंकि ऐसी स्थितियाँ किसी भी फ़ांसीवादी आंदोलन के उभार के लिए मुफ़ीद होती हैं, जो जन-समुदाय के भीतर सक्रियता की झूठी भावना पैदा करता है। कार्पोरेट समर्थक वर्तमान कांग्रेसी निजाम के विरोध के नाम पर राजनीतिक परिदृश्य के दूसरे छोर से ऐसी गोलबंदी उभरती हुई दिखाई दे रही है। दक्षिणपंथी स्तंभ लेखिका तवलीन सिंह काफी दिनों से हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ के रविवारी स्तंभ में यह साबित करने पर तुली रहती हैं कि नरेंद्र मोदी भारत के राजनीतिक वर्ग में बनी आम सहमति के विरोधी हैं। तात्पर्य यह कि वे ऐसे नेता हैं, जिनके पास नए भारत का सपना है। सचाई यह है किसी भी मायनों में तवलीन सिंह की तरह ही वे भी अंबानी-अदानी गिरोह के मुनाफ़े के लिए बड़े कार्पोरेट घरानों की मनपसंद विकास की नीति के उन्मादी प्रतीक योद्धा हैं और सभी उन्मादियों की तरह ही कुछ दिनों बाद अमेरिका की पसंद भी बन जाएंगे।

नेतृत्व अक्सर वहाँ नहीं होता जहाँ हम उसे खोजते हैं। आखिरकार नेतृत्व भविष्य का बीज संजोए रहता है। राहुल सांकृत्यायन की एक किताब का नाम ही ‘नए भारत के नेता’ है, जिसमें गुलाम देश के ऐसे नेताओं का जीवन परिचय है जो तब बहुत मशहूर नहीं थे। लेकिन इन नामालूम नेताओं को आपस में जोड़नेवाली चीज स्वाधीनता आंदोलन था। आज भी अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की दैत्याकार ताकत से लड़ते-जूझते यहाँ वहाँ के छिटपुट लड़ाकुओं के बारे में सोचिए जो विकास के एक प्रभावी मॉडल का विरोध कर रहे हैं, तो लगता है कि इस मॉडल की पराजय का नेतृत्व ये ही तो करेंगे। जैसे-जैसे विकास का यह दमनकारी साँचा थोपा जा रहा है, वैसे-वैसे दिमागी और व्यावहारिक तौर पर उसके विरोधी इकट्ठा भी हो रहे हैं और चूंकि हमला सर्वावेशी है, इसलिए विरोध भी लगभग सभी मोर्चों पर विकल्प प्रस्तावित कर रहा है। अगर नेतृत्व का कोई सकारात्मक संकेत है तो वह इसी दिशा में है।

अंग्रेजी बनाम देशी पुस्तक : शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

आज के युग में इंटरनेट सूचना प्रसार का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सशक्‍त माध्यम है। वर्तमान युग में इंटरनेट पर किसी भी सूचना को आसानी से प्राप्त करने के अवसर सुलभ हैं। नेट पर पुस्तकें, पत्रिकाएँ और समाचार-पत्र भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। माना जाता है कि नेट की वजह से आज पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम हो गयी है, लेकिन यह देखा गया है कि प्रायः प्रिंट माध्यम के पाठक और इंटरनेट के पाठक अलग-अलग होते हैं। जो लोग पुस्तक खरीद कर पढ़ने में रुचि रखते हैं, उन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध मूल्यरहित सामग्री भी अच्छी नहीं लगती और वे पुस्तक खरीदकर ही पढ़ते हैं। साथ ही लोग पुस्तकें इस लिये भी खरीदते हैं, क्योंकि पुस्तकों का घर और पुस्तकालय में संकलन किया जा सकता है और जब चाहे उन्‍हें पढ़ा जा सकता है। पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि घटने का एक बड़ा कारण पुस्तकों का मूल्य है। इस महंगाई के दौर में किताब खरीदना पाठकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। स्तरीय साहित्य अगर कम कीमत पर उपलब्ध हो तो पाठक इसे छोड़ना नहीं चाहते। वे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इसका उदहारण गत वर्ष प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में देखने को मिला। नौ दिवसीय इस मेले के अंतिम दिन शनिवार को कई प्रकाशकों ने किताबों पर भारी छूट दे दी थी, जिसके कारण खूब बिक्री हुई। कुछ स्टालों पर तो पुस्तकों की खरीद पर कपड़ों की सेल की तर्ज पर छूट दी गई। कहीं 20 व 50 रुपये में किताबों का बंडल था तो कहीं 100 रुपये में चार किताबों का ऑफर। ऐसे स्टाल पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी। रीडर्स लाउंज में बैठकर लोग किताबें पढ़ रहे थे। जाहिर है कि पुस्तकों के पाठक आज भी हैं, बशर्ते उचित मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकें।

भारत में प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें  6.25  प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है। प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी  55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है। समाचारपत्रों के पंजीयक की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406  समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और  938  समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल के 272, ओडिया 245, कन्नड़ के 200 और मलयालम के 192  समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94  हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियाँ हैं।

वहीं इंडियन रीडरशिप सर्वे का डाटा रिलीज हुआ है। उसके अनुसार हिन्‍दी अखबार दैनिक जागरण लगातार पहले स्थान पर है। इसकी कुल पाठक संख्या 5.45 करोड़ बतायी गयी है। दैनिक भास्कर 3.19 करोड़ पाठकों के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है। तीसरे नंबर पर हिन्दी का ही एक अखबार है- अमर उजाला। इसके पाठकों की संख्या 2.87 करोड़ बतायी गयी है। चौथे नंबर पर भी हिन्दी का एक और अखबार दैनिक हिन्दुस्तान है। आईआरएस के आँकड़े बताते हैं कि इसकी कुल पाठक संख्या 2.67 करोड़ पहुँच गयी है। पाँचवे स्थान पर मराठी दैनिक लोकमत काबिज है। इसके पाठकों की संख्या 2.06 करोड़ है। छठे नंबर पर तमिल अखबार डेली थंथी के पाठकों की संख्या 2.04 करोड़ पर पहुँच गयी है। सातवें नंबर भी एक तमिल दैनिक दिनकरण है। इसके पाठकों की संख्या ताजा सर्वे के अनुसार 1.68 करोड़ है। आठवें स्थान पर पश्‍चि‍म बंगाल का बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। इसके पाठकों की संख्या 1.55 करोड़ है। नौंवे स्थान पर हिन्दी अखबार राजस्थान पत्रिका है। इसके कुल 1.4 करोड़ पाठक हैं। 1.39 करोड़ पाठकों के साथ तेलुगु दैनिक इनाडु दसवें नंबर पर है।

भारत के शीर्ष दस अखबारों में अंग्रेजी का एक भी अखबार शामिल नहीं है। अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पाठकों की संख्या 1.33 करोड़ है, जबकि दूसरे नंबर के अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के पाठकों की संख्या 63.4 लाख है। हिन्दू तीसरे नंबर पर है और उसके पाठकों की संख्या 53.73 लाख है। 28.18 लाख पाठकों के साथ द टेलीग्राफ चौथे नंबर पर है। 27.68 लाख पाठकों के साथ डेक्कन क्रानिकल पाँचवे नंबर पर है। छठे नंबर पर टाइम्स समूह का व्यावसायिक अखबार द इकोनामिक टाइम्स है। उसके कुल पाठकों की संख्या 19.17 लाख है। मुंबई से निकलनेवाला टैबलाइड मिड-डे सातवें नंबर पर है। इसके पाठकों की संख्या 15.83 लाख है। आठवें नंबर पर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस है जिसके पाठकों की संख्या 15.66 लाख है। मुंबई मिरर के पाठकों की संख्या 15.57 लाख है और वह नौवें नंबर पर है, जबकि दसवें नंबर पर डीएनए है और उसके पाठकों की कुल संख्या 14.89 लाख है।

साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिन्‍दी का स्पेस बढ़ रहा है और लेखन में विविधता भी बढ़ रही है। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का विशेष महत्व है। इसके लेखक भी खासी बड़ी संख्या में हैं। हिन्दी भाषा में प्रकाशन भी बहुत होता है। इसके प्रकाशकों की संख्या भी अच्छी खासी है। हिन्दी में पत्रिकाएँ बड़ी तादाद में निकलती हैं। इस दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी एक बहुप्रचलित भाषा है।

कहते हैं कि कबीर और तुलसी आज भी लोकप्रिय हैं, लेकिन आज कितने लोग तुलसीदास को काव्य-प्रेम के कारण पढ़ते हैं। भक्ति भावना के अन्तर्गत धार्मिक आन्दोलनों के अंग के रूप में इन्हें अधिक प्रसार मिला। बाद में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा दिनकर को लोकप्रियता मिली। प्रगतिशील आन्दोलन ने नागार्जुन, शील आदि को कुछ जनप्रियता दी,  लेकिन कुल मिलाकर कविता-प्रेम के कारण कविता पढ़ने-सुनने वाले हमेशा कम ही रहे। इसलिए आज भी यदि कविता के प्रति प्रेम कम है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है। अक्सर सुनने को आता है कि कविता के पाठक नहीं रहे और कविता का भविष्य खतरे में है। लोग मान कर चलते हैं कि पहले का युग कविता के लायक था, आज का युग विरोधी है। सच तो यह है कि पिछले पाँच सौ वर्षों से स्वयं अंग्रेजी में कविता को लेकर क्षमायाचना का भाव रहा है। दो सौ साल पहले शेली को कहना पड़ा कि कवि दुनिया के मान्यताविहीन विधायक हैं, और वे आज भी हैं। हिन्दी में खड़ी बोली का इतिहास महज सौ साल का है। एक समय था जब निराला, पंत और प्रसाद की पुस्तकें भी बहुत कम छपती और बिकती थीं। कवि सम्मेलनों की परम्परा ने अवश्य कविता को साधारण लोगों से जोड़ा पर वह भी धीरे-धीरे फूहड़ हो गई।  बहरहाल इस विषय में कवियों को गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हैं? आज कविता पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ पाने में अक्षम क्यों हो गई है?  कहीं उनमें ही तो कोई कमी नहीं है?

निश्‍चि‍त रूप से हिन्‍दी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं। यह बात हिन्‍दी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं। आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे। हिन्‍दी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है । साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है। कहीं आज का हिन्‍दी का लेखक-कवि  मध्यवर्ग का वह प्राणीभर तो नहीं, जिसे जनता और जनसामान्य से कोई लेना-देना नहीं इसलिए वह जन सामान्य से कोई तादात्म्य ही नहीं बिठा पा रहा है। वह ग्लोबलाइज हो गया है। व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात भर सोच पा रहा है। उसका सोच द्विस्तरीय है। ऐसे में साहित्य के कम पढ़े जाने का रोना-धोना छोड़ उसे वस्तुगत आत्मविश्‍लेषण अवश्य करना होगा।

भाषा और शोध : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल  शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

भाषा और साहित्य के शोधार्थियों के लिए एक अच्‍छी खबर यह है कि भाषा विज्ञानी गणेश देवी के संस्‍थान ‘भाषा रिसर्च सेंटर’ ने लगभग 68 खण्‍डों में भारतीय भाषाओं के लोक सर्वेक्षण का काम पूरा किया है । बड़ी महत्‍वपूर्ण जानकारियाँ इस सर्वेक्षण से सामने आई हैं । जैसे, भारत में करीब 850 जीवित भाषाएँ हैं और पिछले 50 सालों में 250 भाषाएँ विलुप्‍त हुई हैं । सबसे अधिक भाषाएँ अरुणाचल प्रदेश में हैं, जहाँ 90 भाषाएँ बोली जाती हैं, जबकि गोवा में सिर्फ तीन । तीन सौ से अधिक भाषाएँ दिल्‍ली, कलकत्‍ता, हैदराबाद, मुम्‍बई जैसे महानगरों में बोली जाती हैं ।

भाषा सर्वेक्षण का इतना ही महत्‍वपूर्ण काम सौ वर्ष पहले जॉन अब्राहम ग्रियर्सन ने 1894 से 1928 के बीच किया था । उस समय उनका उद्देश्‍य भारत जैसे विविध-भाषी देश की भाषाओं और संस्‍कृति का अध्‍ययन और उनको बचाना था । मौजूदा काम भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं है, लेकिन इससे बड़ा प्रश्‍न यह उठता है कि जब देश का शासन, प्रशासन, शिक्षा और रोजमर्रा की जिन्‍दगी में हिन्‍दी समेत सभी भारतीय भाषाओं पर संकट मंडरा रहा हो, तो ऐसा काम क्‍या महज अकादमिक शोध तक ही सीमित नहीं रह जाएगा ?

कई बातें इस शोध की चौंकाती हैं । जैसे सिक्किम में ‘माझी’ बोलने वालों की तादाद सिर्फ चार है या दादर में एक समय बोली जाने वाली ‘गोरबी’ भाषा का कोई रिकार्ड नहीं है। दरअसल भाषा और बोली को जान-बूझकर गडडमडड करने की कोशिश इस सर्वेक्षण में की गई है । यह सर्वविदित है कि भारत जैसे प्राचीन सांस्‍कृतिक विरासत वाले देश में हर दस मील पर बोली, भाषा, पानी बदल जाता है । यहाँ बदलने का मतलब एकदम अलग होना नहीं होता । उसकी शैली, उसका शब्‍द कुछ बदलता है । इसलिए यह कहना कि किसी भाषा के बोलने वाले सिर्फ चार बचे हैं, गले नहीं उतरती, क्‍योंकि भाषा बोलने वाले हर मनुष्‍य के शब्‍द भंडार में कई बोली भाषा का संगम होता है।

‘भाषा रिसर्च सेंटर’ संस्‍थान जिस विश्‍वास से बोली और भाषा का अंतर मानने से इनकार करता हैं, उसके अंतर्निहित खतरे हैं। जैसे, मौजूदा हिन्‍दी को कौन-सी भाषा माना जाएगा ? अभी तक तो उसकी समृद्धि और सौंदर्य में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, कोरबी, हरियाणवी सभी का योगदान है । इन भाषाओं में लिखने वाले सभी लेखक भी हिन्‍दी के लेखक माने जाते हैं । यदि व्‍यवस्‍था या शासन इस सर्वेक्षण का सहारा लेकर हिन्‍दी और बाकी भारतीय भाषाओं के खिलाफ जहर उगलने लगे तो यह नया संकट खड़ा हो सकता है। इसकी प्रतिध्‍वनि पिछले दस वर्ष में सुनी जा सकती है, जब आये दिन भोजपुरी, अवधी या राजस्‍थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग होती है । मैथिली, डोगरी तो शामिल हो ही चुकी हैं । इस सर्वेक्षण के बाद यदि और दस-बीस भाषाओं की माँग सामने आ जाए तो क्‍या होगा ?

हिन्‍दी के खिलाफ षड्यंत्र रचने वालों ने पहले से ही अपनी व्‍यूह रचना शुरू कर दी है । उनका कहना है कि मैथिली, अवधी, ब्रज, राजस्‍थानी, हरियाणवी हिन्‍दी से अलग भाषाएँ हैं और इस तर्क पर जहाँ हिन्‍दी कुछ वर्ष पहले दुनिया-भर में बोलने वालों की संख्‍या के आधार पर तीसरे नंबर पर थी, तो हिन्‍दी विरोधी इसे छठे-सातवें पायदान पर रख देते हैं। भविष्‍य में यदि यह चाल सफल रही तो हिन्‍दी के बोलने वाले या प्रयोग करने वालों की संख्‍या कौन जाने भारत में ही अंग्रेजी से भी कम करके दिखाई जाने लगेगी । यदि ऐसा हुआ तो फिर पूरे देश के लिए उसे प्रयोग करने की आकांक्षा पालना खुद-ब-खुद खत्‍म हो जाएगा ।

इसीलिए ऐसे सर्वेक्षणों के निष्‍कर्षों को बहुत ध्‍यान से समझने की जरूरत है । अच्‍छा रहे कि भारत के विश्‍वविद्यालयों में इन खण्‍डों पर और शोध हों और उन संस्‍कृतियों की विरासत को भी चिन्ह्ति किया जाए, जहाँ ये भाषाएँ हैं या विलुप्‍त हो गई हैं । लेकिन यदि हमें अपनी भाषाओं को बचाना है तो इसी सर्वेक्षण के निष्‍कर्षों से सबक लेते हुए भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ाना होगा । यह प्रयोग बढ़ सकता है बशर्ते कि प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से अपनी ही भाषा, बोली में दी जाए। एनसीईआरटी के नए पाठ्यक्रम में भाषा शिक्षण के बारे में जो महत्‍वपूर्ण बात कही गई है, वह यही है कि आंचलिक भाषाओं, बोलियों के शब्‍द भंडार का भरपूर उपयोग किया जाए । इससे उन छूटे हुए समाज के बच्‍चों की चेतना भी स्‍वत: जुड़ती है और साथ ही वे सहजता से शिक्षा से जुड़ते हैं। उनकी रचनात्‍मकता भी सर्वश्रेष्‍ठ रूप में सामने आती है । वैसे यदि बच्‍चों या छात्रों का सर्वश्रेष्‍ठ अपनी भाषा में सामने आता है, तो क्‍या शासन-प्रशासन और शोध के लिए भी यह बात उतनी ही सच नहीं है ? यह जरूर है कि उच्‍च शिक्षा की तरफ बढ़ते वक्‍त यह भाषा कुछ मानक रूप ले लेगी और वही मानक रूप हिन्‍दी, बांग्‍ला, मराठी, गुजराती के रूप में जाना जाता है। काश ! इस सर्वेक्षण के कर्ताधर्ता ने कहीं प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से भी शासन-प्रशासन, शिक्षा, शोध अपनी भाषा में करने की संस्‍तुति की होती ।  इस शोघ की अभी तक जितनी रिपोर्ट सामने आयी हैं, उनमें हजारों गैरजरूरी विवरण हैं, लेकिन शिक्षा, प्रशासन में अपनी भाषाओं को कैसे आगे बढा़यें, उस पर एक गहरी चुप्‍पी है।

यहाँ यह भी याद रखने की जरूरत है कि हाल ही में ऐसे षड्यंत्रकारि‍यों ने भारतीय भाषाओं को संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक परीक्षा से बाहर करने की कोशिश की थी और मातृभाषा में पढ़ाने का एक और मसला सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्‍यीय बैंच में विचाराधीन है। यानी कि भारतीय भाषा, बोलियों, साहित्‍य के खिलाफ अंग्रेजीदाँ बुद्धिजीवियों और नौकरशाहों ने बहुत चालाकी से मुहिम चलाई हुई है।

मंगल पर जीवन की तलाश : अनुराग

mangal bula raha hai.srinivas laxman

इस माह भारत मंगल अभियान के तहत पहली बार अपना अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह की यात्रा पर रवाना कर रहा है। ऐसे में बहुत से सवाल मन में उठते है- भारत यह अभि‍यान क्‍यों शुरू कर रहा है, इस पर कितना खर्च होगा, क्‍या यह धन की बर्बादी है, अभियान के लिए यह समय क्‍यों चुना गया, इसमें कौन-कौन से वैज्ञानिक जुटे हुए हैं, कैसी होगी उन वैज्ञानिकों की जीवन-शैली और कार्य-पद्धति, क्‍या विश्‍व के अन्‍य देश भी इस तरह के अभियान से जुड़े हैं, अब तक के मंगल अभियानों को कितनी सफलता मिली, इनका क्‍या भवि‍ष्‍य है, आदि। इन और ऐसे ही अनेक सवालों के जवाब श्रीनिवास लक्ष्‍मण की पुस्‍तक ‘मंगल बुला रहा है’ में दिए गए हैं। पेशे से पत्रकार श्रीनिवास लक्ष्‍मण ने पत्रकारिता की शुरुआत वैमानिकी केंद्रित विषयों से की और फिर उन्‍होंने अंतरिक्ष अन्‍वेषण का क्षेत्र चुना, जिसमें उनकी सर्वाधिक रुचि है। उन्‍होंने भारत के प्रथम चंद्र अभियान ‘चंद्रयान-1’ के साथ ही श्रीहरिकोटा से अनेक राकेटों के प्रक्षेपण की रिपोर्टिंग की है। उनका एक परिचय यह भी है कि वह सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्‍ट आर.के. लक्ष्‍मण के बेटे हैं। मूलत: अंग्रेजी में लिखी इस पुस्‍तक का हिंदी अनुवाद सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने किया है। श्रीनिवास लक्ष्‍मण ने मंगल अभियान के सभी पहलुओं और महत्‍व को समझने व समझाने के लिए इस महा-परियोजना से जुड़े कुछ महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों से बातचीत की और विभिन्‍न अंतरिक्ष केंद्रों में जाकर वहाँ की कार्यपद्धति व तैयारियों को निकट से देखा।

वैज्ञानिक संभावनाएँ व्‍यक्‍त कर रहे हैं कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन रहा होगा और आज भी पृथ्‍वी के अनुकूल मानव के रहने की सबसे अधिक संभावनाएँ मंगल पर ही व्‍यक्‍त की जा रही हैं। इसी का परिणाम है कि 1960 से रूस के  पहले मंगल अभियान से लेकर अब तक 40 से भी अधिक अभियानों के तहत मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष यान भेजे जा चुके हैं। दुर्भाग्‍यपूर्ण बात है कि इनमें से 25 अभियान असफल रहे। भारत के मंगल अभियान की तैयारी इसरो के उपग्रह केंद्र, बंगलुरु में चल रही है। अब परियोजना अंतिम चरण में है। वैज्ञानिक दिन-रात काम में जुटे हैं।

यह किताब भारत के अं‍तरिक्ष अभियान के इतिहास पर भी प्रकाश डालती है। यह अभियान भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई और भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम के जनक होमी भाभा के सपनों को साकार करने का ही एक प्रयास है। कोई ढाँचागत व्‍यवस्‍था न होने के कारण अंतरिक्ष विभाग के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने थुंबा गाँव के छोटे से चर्च और उसके बिशप के मकान में अंतरिक्ष अनुसंधान का काम शुरू कि‍या था और वहाँ राकेट के हिस्‍सों का निर्माण किया। साउंडिंग राकेट के कल-पुर्जे साइकिलों और कभी-कभी तो बैलगाड़ी में भी लाए गए थे। इस तरह शुरू हुआ भारत का अंतरिक्ष अभियान आज अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी खास पहचान बना चुका है।

थुंबा से जो प्रथम साउंडिंग राकेट छोड़ा गया था, वह नासा ने दि‍या था और उसका नाम था- नाइकी अपाचे। राकेट छोड़ने की यह घटना 21 नवंबर 1963 को हुई थी। 2013 में जब मंगल अभि‍यान शुरू होगा, तो वह भारतीय अंतरि‍क्ष कार्यक्रम के प्रथम राकेट के प्रक्षेपण की 50वीं वर्षगाँठ का समय होगा।

अभियान से जुड़े कई वैज्ञानिकों के बारे में भी अब तक अनजानी जानकारियाँ किताब में दी गई हैं। इसरो अध्‍यक्ष डॉ. के. राधाकृष्‍णन कर्नाटक शैली के जाने-माने गायक हैं। वह कथकली कलाकार भी हैं और उन्‍होंने इसकी मंच पर प्रस्‍तुतियां भी दी हैं।

इसरो के तिरुअनंतपुरम स्थित भारतीय अंतरिक्ष एवं प्रौद्योगिकी संस्‍थान में डीन अनुसंधान डॉक्‍टर आदिमूर्ति बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उनके बारे में एक रोचक बात यह है कि उन्‍होंने कार्यालय जाने के लिए कभी गाड़ी का इस्‍तेमाल नहीं किया। वह अपने काम पर साइकिल से जाते रहे। उन्हें साइकिल चलाना पसंद है,  इसलिए कार नहीं रखी।

मंगल तक के इस महत्‍वाकांक्षी अभि‍यान का प्राथमि‍क उद्देश्‍य मंगल ग्रह के वातावरण का और उसके भूगर्भीय अध्‍ययन करना है। यह मंगल पर मीथेन की पहेली को भी हल करने की कोशि‍श करेगा। मीथेन की उपस्‍थि‍त की पहेली के हल से ही पता चल पाएगा कि ‍मंगल पर जीवन मौजूद है या नहीं।

यह जानकर कि‍सी भी भारतीय नागरिक को बड़ा गर्व होगा कि अगर हमारे देश ‍का यह मंगल अभि‍यान सफल रहता है, तो भारत वि‍श्‍व में ऐसा पहला देश होगा, जो सरकार से स्‍वीकृति‍ ‍मि‍लने के मात्र एक वर्ष के भीतर मंगल अभि‍यान को अंजाम दे देगा। अन्‍य देशों को इन तैयारि‍यों के लि‍ए तीन या चार वर्ष का समय लगा है।

हमारी पृथ्वी से चंद्रमा केवल चार लाख कि‍लोमीटर दूर है। पृथ्‍वी से कोई भी सि‍गनल चंद्रमा तक मात्र 1.3 सेकेंड में भेजा जा सकता है, जबकि पृथ्‍वी से मंगल तक 40 करोड़ किलोमीटर दूर सि‍गनल के पहुँचने में 20 मि‍नट का समय लगेगा। इसके अलावा चंद्रयान-1 से संबंधि‍त तैयारि‍याँ करने में चार वर्ष का समय लगा था, जबकि मंगल अभि‍यान का काम वैज्ञानिक मात्र एक साल में पूरा कर रहे हैं।

पृथ्‍वी से मंगल तक पहुँचने में करीब 300 दि‍न लगते हैं। मंगल ग्रह की कक्षा में अंतरिक्ष यान को प्रवेश कराना अभि‍यान की एक पेचीदा, खतरनाक और संशय से भरी महत्‍वपूर्ण अवस्‍था होती है। इस स्‍थि‍ति ‍में पहुँच कर अन्‍य देशों के कई अभि‍यान असफल हो चुके हैं। इसलि‍ए इस अभि‍यान की तैयारि‍यों में जुटे वैज्ञानि‍क बारीक-से-बारीक चीज पर गहरी नजर रखे हुए हैं। वैज्ञानि‍कों का समर्पण इस बात से पता चलता है कि ‍वे चौबीस घंटे तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही अपनी साप्‍ताहि‍क छुट्टि‍यों का भी बलि‍दान कर रहे हैं। अभि‍यान संपन्‍न होने पर भारत की प्रौद्योगि‍की व वैज्ञानि‍क दोनों ही क्षेत्रों में साख बढ़ेगी।

जहाँ तक मंगल अभि‍यानों की संभावना का प्रश्‍न है, तो अंतरि‍क्ष अन्‍वेषण क्षमता वाले अनेक राष्‍ट्र 2035 के आसपास मंगल तक समानव उड़ान भेजने का सपना देख रहे हैं। इन प्रयोगों से भवि‍ष्‍य में मंगल ग्रह पर स्‍थायी रूप से मानव बस्‍ति‍याँ बसाई जा सकेंगी।

दस अध्‍यायों में बंटी यह कि‍ताब भारत के साथ ही वि‍श्‍व के अब तक के मंगल अभि‍यानों के बारे में अच्छी जानकारी देती है। साथ ही मंगल के इति‍हास व उससे संबंधि‍त किंवदंति‍यों और मंगल के प्रति दुनि‍या-भर के आकर्षण पर भी प्रकाश डालती है। भरपूर रंगीन चि‍त्रों से सुसज्‍जि‍त और आम बोलचाल की भाषा में लि‍खी यह कि‍ताब वैज्ञानि‍क और रोचक जानकारि‍यों से भरपूर है।

पुस्तकः मंगल बुला रहा है
लेखकः श्रीनिवास लक्ष्मण
अनुवाद : देवेंद्र मेवाड़ी
मूल्यः 175 रुपये

प्रकाशक : वि‍ज्ञान प्रसार
ए-50, इंस्टी्ट्यूशनल एरि‍या, सेक्टर-62 नोएडा-201309, उत्तर प्रदेश

पल्लव को डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार

समारोह को संबोधि‍त करते वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह।

समारोह को संबोधि‍त करते वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह।

चूरू : हिंदी के बहुचर्चित वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है और आज आलोचना में रचना की बजाय रचनाकार को ध्यान में रखा जाता है, पल्लव इस मायने में सबसे भिन्न हैं कि उनकी नजर हमेशा रचना पर ही रहती है। काशीनाथ सिंह 6 अक्‍टूबर 2013 को प्रयास संस्थान की ओर से शहर के सूचना केंद्र में आयोजित डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार समारोह में पल्लव को सम्मानित करने के बाद बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पल्लव आलोचना के लिए अधिकांशतः अच्छी, लेकिन उपेक्षित रचना को चुनते हैं और व्यक्तिगत संबंध के निर्वाह के नाम पर किसी को भी अनावश्यक रियायत नहीं देते हुए पक्षपातरहित दृष्टि से रचनाओं को देखते हैं, वास्तव में आलोचना यही है। उन्होंने कहा कि वह जमाना गया, जब किसी एक दिग्गज आलोचक के कहने मात्रा से साहित्य की प्रमाणिकता तय हो जाती थी, आज प्रत्येक व्यक्ति व आलोचक अपने नजरिए से सोचता है और चीजों का मूल्य तय करता है, पल्लव उसी लोकतांत्रिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने प्रयास संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि इस पुरस्कार के कारण देशभर के लोग चूरू को जानने लगे हैं, लेकिन पुरस्कार देते समय यह प्रयास रहना चाहिए कि इसमें युवाओं को तरजीह दी जाए, क्योंकि साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है। उन्होंने डॉ. घासीराम वर्मा की सराहना करते हुए कहा कि मूलतः गणित के व्यक्ति हैं, लेकिन हर तरह के गणित से दूर रहकर अपने समाज और जनता को प्रेम करते हैं।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नई दिल्ली के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. आशुतोष मोहन ने कहा कि साहित्य जगत में आज आलोचना की त्रासदी यह है कि पाठक आलोचना से कृति की ओर से बढ़ना चाहता है, जबकि उसे कृति से आलोचना की ओर जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि आलोचना रचनाओं की कमी बताए तो लेखक को अखरता है और आलोचक के साथ बड़ी मुश्किलें पेश आती है। इसके बावजूद पल्लव ने अपनी आलोचना में सैद्धांतिक साहस को बनाए रखा है और इसी में उनकी आलोचना की प्रासंगिकता है। उन्होंने पल्लव में निहित संभावनाओं को जाहिर करते हुए कहा कि वे सटीक आलोचना की कोशिश करते रहें और महान आलोचक बनने की बजाय अच्छा आलोचक बनने की दिशा में काम करें।

विशिष्ट अतिथि युवा साहित्यकार पुखराज जांगिड़ ने कहा कि साहित्य में आलोचना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रचनाओं को देखने की एक दृष्टि मिलती है। एक आलोचक के रूप में पल्लव हमें बताते हैं कि कहानी एक रचना के रूप में किस प्रकार चीजों को देख रही है और पहचान भी रही है। उन्होंने कहा कि आज चीजों को देखने का नजरिया बदल रहा है और पल्लव इस बदलाव की मुखर अभिव्यक्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि शरतचंद्र के ‘देवदास’ में अब देवदास की बजाय पारो को कथा का नायक समझा जाने लगा है और स्त्री को बर्बाद करके उससे प्रेम का दंभ भरने वाले पुरुष को चुनौती दी जाने लगी है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण में गुम होते जीवन की कथाओं को पल्लव ने अपनी आलोचना का विषय बनाया है, यह उनकी आलोचना का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है।

सम्मानित साहित्यकार पल्लव ने विनम्रता से पुरस्कार को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें सुखद आश्चर्य हो रहा है कि रचनाकारों के इस संसार में आलोचना पुरस्कृत हो रही है। उन्होंने कहा कि देश में सहिष्णुता के लिए खतरा बनने वाले तत्वों के खिलाफ हमें एकजुट होकर लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का निर्वाह करना चाहिए। युवा लेखन और आलोचना की परम्परा को अधिक सशक्त किए जाने की जरूरत है। अपनी जड़ों के लिए चिंतित शिक्षक डॉ. घासीराम वर्मा और अपने प्रिय साहित्यकार काशीनाथ सिंह के हाथों सम्मानित होकर उन्हें बेहद प्रसन्नता हो रही है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम गणितज्ञ डॉ. घासीराम वर्मा ने कहा कि समाज में सदियों से स्त्री को उपेक्षित रखा गया है, अब वह आगे आ रही है, तो पुरुष को यह बात अखर रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य में भी स्त्री के बारे में गलत बातें लिखी गई हैं, जिससे समाज में गलत संदेश गया है, लेकिन आज स्थितियों में बदलाव आने लगा है। कार्यक्रम के आरंभ में चित्तौड़गढ के युवा आलोचक पल्लव को उनकी ‘पुस्तक कहानी का लोकतंत्र’ के लिए छठे डॉ. घासीराम वर्मा पुरस्कार के रूप में पांच हजार रुपए, शॉल, श्रीफल व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। प्रयास के संरक्षक भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। युवा साहित्यकार कुमार अजय ने सम्मानित साहित्यकार का परिचय प्रस्तुत किया। वयोवृद्ध साहित्यकार बैजनाथ पंवार ने आभार जताया। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण व उम्मेद गोठवाल ने अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंट किए। संचालन कमल शर्मा ने किया।

पूर्व सभापति रामगोपाल बहड़, जयसिंह पूनिया, हनुमान कोठारी, रियाजत अली खान, माधव शर्मा, महावीर सिंह नेहरा, खेमाराम सुंडा, सोहन सिंह दुलार, वासुदेव महर्षि, अर्चना शर्मा, नीति शर्मा, इंदिरा सिंह, जमील चौहान, देवेंद्र जोशी, राधेश्याम कटारिया, देवेंद्र जोशी, संजय कुमार आदि‍ समारोह में मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : दुलाराम सहारन, अध्यक्ष, प्रयास सेवा संस्थान, चूरू