Archive for: September 2013

जो जनता के लिए लिखेगा, वही इतिहास में बना रहेगा

कथाकार मधुकर सिंह को सम्मानित करते प्रणय कृष्ण ।

कथाकार मधुकर सिंह को सम्मानित करते प्रणय कृष्ण ।

 

आरा : बिहार के चर्चित कथाकार मधुकर सिंह पिछले करीब पाँच साल से पैरालाइसिस के कारण कहीं भी अपने पैरो के बल पर चलकर जाने में असमर्थ हैं, लेकिन उनके लेखनी पर उनके हाथों और दिमाग की पकड़ कतई कमजोर नहीं पड़ी है। भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा से बिल्कुल सटे हुए अपने गाँव धरहरा में अपने घर में वे अस्वस्थता की स्थिति में भी लिख रहे हैं। ‘सोनभद्र की राधा’, ‘सबसे बड़ा छल’, ‘सीताराम नमस्कार’, ‘जंगली सुअर’, ‘मनबोध बाबू’, ‘उत्तरगाथा’, ‘बदनाम’, ‘बेमतलब जिंदगियां’, ‘अगिन देवी’, ‘धर्मपुर की बहू’, ‘अर्जुन जिंदा है’ आदि मधुकर सिंह के उन्नीस उपन्यास और ‘पूरा सन्नाटा’, ‘भाई का जख्म’, ‘अगनु कापड़’, ‘हरिजन सेवक’, ‘माइकल जैक्सन की टोपी’ आदि दस कहानी संग्रह और प्रतिनिधि कहानियों के कुछ संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। ‘लाखो’, ‘सुबह के लिए’, ‘बाबू जी का पासबुक’, ‘कुतुब बाजार’ आदि उनके चर्चित नाटक हैं। ‘रुक जा बदरा’ नामक उनका एक गीत संग्रह भी प्रकाशित है। उनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन भी हुए हैं। वे जन नाट्य संस्था युवानीति के संस्थापकों में रहे हैं। उन्होंने कुछ कहानी संकलनों का संपादन भी किया है। बच्चों के लिए भी दर्जनों उपन्यास और कहानियां उन्होंने लिखी हैं। उनकी रचनाओं के तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, उडि़या, बांग्ला, चीनी, जापानी, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद हुए हैं। उन्होंने ‘इस बार’ पत्रिका के अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।

मधुकर सिंह उस पीढ़ी के साहित्यकार हैं, जिनका जनांदोलनों से अटूट नाता रहा है। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट आंदोलनों का उनके कथा साहित्य पर गहरा असर रहा है। आज भी उनका यकीन है कि जो लेखक अपनी जनता के लिए लिखेगा, वही इतिहास में बना रहेगा। 22 सितंबर को नागरी प्रचारिणी सभागार में अपने सम्मान में आयोजित समारोह में उन्होंने मजबूती से इस यकीन को जाहिर किया।

राँची, भोपाल, दिल्ली, बर्नपुर, बनारस, गोरखपुर, लखनऊ, गिरिडिह, पूर्णिया, पटना, एटा आदि कई शहरों से साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी कथाकार मधुकर सिंह के सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए अपने खर्चे पर आरा आए थे। सबसे बड़ी बात यह कि समाज के हर तबके के लोग सभागार में मौजूद थे। जिन लोगों के जीवन संघर्ष और आंदोलन की कथा मधुकर सिंह ने कही है, उस दलित-वंचित मेहनतकश जनता की भारी तादाद नागरी प्रचारिणी सभागार में मौजूद थी।

अपने साथियों के कंधों और बाजुओं का सहारा लेकर जैसे ही मधुकर सिंह मंच पर पहुंचे, सभागार में देर तक लोगों की तालियां गूंजती रहीं। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने जसम राष्ट्रीय परिषद की ओर से उन्हें पच्चीस हजार का चेक, शाल और मानपत्र प्रदान कर सम्मानित किया। मधुकर सिंह जसम की स्थापना के समय से ही इसके साथ हैं और इसके राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारिणी के सदस्य के अलावा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। वे जन नाट्य संस्था ‘युवानीति’ के संस्थापकों में से रहे हैं और आरा शहर की एक मुसहरटोली में उन्हीं की बहुचर्चित कहानी ‘दुश्मन’ के मंचन से युवानीति ने अपने सफर की शुरुआत की थी।

प्रणय कृष्ण ने मानपत्र को पढ़कर सुनाया, जिसमें जसम की राष्ट्रीय परिषद ने मधुकर सिंह का महत्व इस रूप में रेखांकित किया है कि वे प्रगतिशील जनवादी कथा साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। वे फणीश्वरनाथ रेणु के बाद हिंदी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने आजीवन न केवल ग्रामीण समाज को केंद्र बनाकर लिखा है, बल्कि वहाँ चल रहे राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के संघर्षों को भी शिद्दत के साथ दर्ज किया है। वे सही मायने में ग्रामीण समाज के जनवादीकरण के संघर्षो के सहचर लेखक हैं। वे साहित्य-संस्कृति की परिवर्तनकारी और प्रतिरोधी भूमिका के आग्रही रहे हैं। उनके साहित्य का बहुलांश मेहनतकश किसानों, खेत मजदूरों, भूमिहीनों, मेहनतकश औरतों और गरीब-दलित-वंचित वर्ग के इसी क्रांतिकारी आंदोलन की आंच से रचा गया है। इस आंदोलन के संस्थापकों में से एक जगदीश मास्टर और उनके साथी उनकी रचनाओं में बार-बार नजर आते हैं। जगदीश मास्टर मधुकर सिंह के साथ ही जैन स्कूल में शिक्षक थे और सामंती जुल्म के खिलाफ दलितों-वंचितों के जनतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष में शहीद हुए थे। सामंती-वर्णवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति के लिहाज से मधुकर सिंह की रचनाएं बेहद महत्व रखती हैं। सामाजिक मुक्ति के प्रश्‍न को उन्होंने जमीन के आंदोलन से और स्त्री मुक्ति के सवाल को दलित मुक्ति से अभिन्न रूप से जोड़कर देखा है। वे एक वामपंथी लेखक हैं और वामपंथ से सामंतवाद के अवशेषों, वर्ण-व्यवस्था और पूंजीवाद के नाश की अपेक्षा करते हैं।

सम्मान सत्र में लोगों ने मधुकर सिंह से जुड़ी हुई अपनी यादों को भी साझा किया। शुरुआत उनके बचपन के मित्र और उनकी कई रचनाओं के पात्र कवि श्रीराम तिवारी ने की और उनके आजाद स्वभाव को खासकर चिह्नित किया। युवानीति के पूर्व सचिव रंगकर्मी सुनील सरीन ने कहा कि मधुकर सिंह का सम्मान उस जन सांस्कृतिक पंरपरा का सम्मान है, जिसने कई नौजवान लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को बदलाव का स्वप्न और वैचारिक ऊर्जा दी है। वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने कहा कि अगर सौ समाज शास्त्रीय अध्ययन एक पलड़े पर रख दिए जाएं और दूसरे पलड़े पर मधुकर सिंह की कुछ चुनिंदा कहानियां, तो उनकी कहानियों का पलड़ा भारी पड़ेगा। वे हमेशा नए विचारों और नौजवानों के साथ रहे हैं। बनाफरचंद्र ने उनसे हुई मुलाकातों का जिक्र करते हुए कहा कि साहित्यिक बिरादरी में अपने दोस्ताना मिजाज के कारण मधुकर सिंह एक अलग ही पहचान रखते हैं।

पटना, दूरदर्शन के निदेशक कवि कृष्ण कल्पित ने कहा कि भोजपुर का हमारे लेखन और राजनीति में बहुत बड़ा महत्व है। भोजपुर ने एक बुजुर्ग संघर्षशील लेखक का इस तरह सम्मान करके अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। रेणु नेहरू युग की स्वप्नशीलता के लेखक थे, लेकिन उन्होंने जिस ग्रामीण सौंदर्य को पेश किया है, मधुकर सिंह के गांव वैसे नहीं हैं। मधुकर सिंह ने हिंदी कहानी को रूमानियत और आभासी यथार्थ से बाहर निकाला। वे एक श्रमजीवी लेखक हैं। प्रेमचंद की परंपरा को लेकर आज खूब विवाद खड़े किए जा रहे हैं, उन पर ऐसे लोग अपनी दावेदारी जता रहे हैं, जो उनकी परंपरा के विरोधी हैं। लेकिन सही मायने में मधुकर सिंह प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं। वे शरीर से भले लाचार हैं, पर उनका दिमाग लाचार नहीं है।

कहानीकार अरविंद कुमार ने कहा कि जब चंद्रभूषण तिवारी द्वारा संपादित पत्रिका ‘वाम’ में मधुकर सिंह की कहानी ‘दुश्मन’ छपी, उस दौर में ही वे समांतर कहानी आंदोलन से बाहर आने लगे थे। वहां से उनकी नई शुरुआत होती है। उस कहानी में नेता की धूल उड़ाती जीप और उसके पीछे भागते बच्चों का जो दृश्य है, वह कैमरे की आंख से देखा प्रतीत होता है। उनकी कहानियों में जो नाटकीय तत्व है, वह भी महत्वपूर्ण है।

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने कहा कि पूंजीवाद ने जिस सामूहिकता को खत्म किया है, मधुकर सिंह उस सामूहिकता के लिए जीवन और रचना दोनों स्तर पर संघर्ष करने वाले लेखक हैं। कथाकार सुरेश कांटक ने कहा कि मधुकर सिंह का साहित्य जन-जन की आकांक्षा से जुड़ा हुआ साहित्य है। चर्चित रंगकर्मी राजेश कुमार ने कहा कि भोजपुर से अभिजात्य और सामंती संस्कृति के खिलाफ जनता के रंगकर्म की जो धारा फूटी, उसका श्रेय मधुकर सिंह को है। कथाकार मदन मोहन ने चिह्नित किया कि समांतर आंदोलन के साथ होने के बावजूद मधुकर सिंह की जो वैचारिक आकांक्षा थी, वह उस दौर की उनकी कहानियों में दिखती है। उस आकांक्षा ने ही उन्हें जनसांस्कृतिक आंदोलन का हमसफर बनाया। वरिष्ठ कवयित्री उर्मिला कौल ने कहा कि आरा के लोगों के लिए इस सम्मान समारोह की लंबे समय तक मधुर स्मृति रहेगी। मधुकर सिंह की रचनाओं में गांवों के अभावग्रस्त परिवारों की पीड़ा और विवशता नजर आती है। युवानीति के पूर्व रंगकर्मी और वामपंथी नेता सुदामा प्रसाद ने कहा कि भोजपुर में जो सामंतवाद विरोधी संघर्ष शुरू हुआ, उसने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया। राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका प्रभाव पड़ा। शासकवर्ग की संस्कृति और मेहनतकशों की संस्कृति के बीच फर्क को समझना आसान हुआ। मधुकर सिंह उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने इस फर्क को स्पष्ट किया। प्रो. पशुपतिनाथ सिंह ने युवा पीढ़ी के बदलते पाठकीय आस्वाद पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश में जिस तरह का संकट है, उसमें उन्हें मधुकर सिंह सरीखे लोगों का साहित्य पढ़ना चाहिए।

वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, रंगकर्मी डा. विंद्येश्वरी, लेखक अरुण नारायण, पत्रकार पुष्पराज ने भी सम्मान सत्र में मधुकर सिंह के महत्व को रेखांकित किया। इस सत्र की अध्‍यक्षता सुरेश कांटक, पशुपतिनाथ सिंह और बनाफरचंद्र ने की।

दूसरा सत्र विचार-विमर्श का था, जिसका विषय था- कथाकार मधुकर सिंह: साहित्य में लोकतंत्र की आवाज। विमर्श की शुरुआत करते हुए कहानीकार सुभाषचंद्र कुशवाहा ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में निम्नवर्ग की क्या स्थिति है, मधुकर सिंह की कहानियों में इसे देखा जा सकता है। जाति की राजनीति से उत्पीडि़त समुदायों की मुक्ति संभव नहीं है, यह मधुकर सिंह ने अपनी कहानियों में आठवें दशक में ही दिखाया है। जाति का विकास जाति का ही नेता कर सकता है, इस तर्क और धारणा को उन्होंने गलत साबित किया है। वे निम्न वर्ग के शोषण में धर्म की भूमिका को चिह्नित करते हैं। वे सवाल उठाते हैं कि जेलों में बंद लोगों का बहुत बड़ा हिस्सा निम्नवर्ग का क्यों है? क्यों हक मांगने वालों को नक्सलवादी करार दिया जाता है? किस तरह गांधीवाद का इस्तेमाल शोषक वर्ग अपने वर्चस्व बनाए रखने के लिए करता है, इसे भी उन्होंने अपनी कहानियों में दिखाया है।

चर्चित युवा कहानीकार रणेंद्र ने कहा कि मधुकर सिंह वर्णवादी कथाकार नहीं है, उनके साहित्य में वर्ण से उत्पन्न जो पीड़ा है वह वर्ग चेतना तक पहुंचती है। अंबेडकर की गांवों के बारे में जो धारणा थी, वह मधुकर सिंह की कहानियों को पढ़ते हुए सही प्रतीत होती है। वे लोक जीवन में रस नहीं लेते, बल्कि उसे जनतांत्रिक बनाने की चिंता और संघर्ष को अभिव्यक्त करते हैं। वे दिखाते हैं कि किस तरह जो वर्ग अंग्रेजों के समय व्यवस्था का लाभ ले रहा था, वही आजादी के बाद के भारतीय लोकतंत्र का लाभ उठाता रहा। मधुकर सिंह को हिंदी के बड़े आलोचकों ने उपेक्षित किया, पर उनकी 10-15 कहानियां ऐसी हैं, जो मानक हैं। उनका जो देय है, उसका श्रेय उन्हें मिलना चाहिए।

आलोचक रवींद्रनाथ राय ने कहा कि मधुकर सिंह के साहित्य में भोजपुर का आंदोलन दर्ज है। सामाजिक मुक्ति और आर्थिक आजादी के लिए गरीब मेहनतकशों का जो संघर्ष है, मधुकर सिंह उसके कथाकार हैं।

वरिष्ठ आलोचक खगेंद्र ठाकुर ने प्रगतिशील लेखक संघ के साथ मधुकर सिंह के जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि एक रचनाकार के रूप में वे जीवन और समाज के यथार्थ के प्रति सचेत लेखक हैं। 60 का दशक, जो कि समझ को गड्डमड्ड करने वाला दौर था, उसमें उन्होंने कहानी के सामाजिक यथार्थवादी धारा की परंपरा को आगे बढ़ाया। दलित चेतना एक आंदोलन के रूप में जरा देर से आई, पर मधुकर सिंह ने इस मेहनतकश समाज के संघर्ष को उसी दौर से चित्रित करना शुरू कर दिया था।

गीतकार नचिकेता ने कहा कि चुनावों के जरिए निम्नवर्ग के जीवन को नहीं बदला जा सकता, मधुकर सिंह ने अपनी कहानियों के जरिए दिखाया है। वे जनता के लेखक हैं और जनता के लेखक ऐसे ही सम्मान के हकदार होते हैं। शिवकुमार यादव ने भोजपुर के संघर्ष के साथ साहित्य के गहरे रिश्ते के संदर्भ में मधुकर सिंह की कहानियों को चिह्नित किया।

कवि चंदे्रश्वर ने कहा कि मधुकर सिंह की कहानियां भारतीय लोकतंत्र के झूठ का पर्दाफाश करती हैं। कवि बलभद्र ने कहा कि सामाजिक आंदोलनों और किसान संघर्षों की जरूरत को महसूस करते हुए मधुकर सिंह ने लोक साहित्य से भी बहुत कुछ लिया। भोजपुर में मधुकर सिंह, विजेंद्र अनिल और सुरेश कांटक की कथात्रयी ने जो काम किया है, उसका हिंदी साहित्य की जनसंघर्षधर्मी परंपरा में अलग से मूल्यांकन होना चाहिए।

जलेस के राज्य सचिव वरिष्ठ कहानीकार नीरज सिंह ने कहा कि मधुकर सिंह का सम्मान केवल भोजपुर ही नहीं, बल्कि पूरे देश के जनधर्मी, संघर्षधर्मी साहित्य के लिए गौरव की बात है। उत्पीडि़त, दलित-शोषित, वंचित वर्गों के प्रति गहरी पक्षधरता के कारण ही वे सत्ताभोगी चरित्रों पर तीखे प्रहार करते हैं। वे एक यारबाश व्यक्ति रहे हैं और अपने से कम उम्र के लोगों के साथ भी उनके बड़े आत्मीय संबंध रहे हैं।

समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि मधुकर सिंह भोजपुर के आंदोलन में देश के स्वाधीनता आंदोलन की निरंतरता देखते हैं। राष्ट्र और लोकतंत्र के संदर्भ में उनकी धारणाएं भगतसिंह और अंबेडकर से मेल खाती हैं। वे भारत की खोज के नहीं, बल्कि भारत के निर्माण के कथाकार हैं। इस देश में राजनीति, समाज, अर्थनीति और संस्कृति सारे स्तरों पर सच्चे जनतंत्र की आकांक्षा और उसके लिए होने वाले संघर्ष के कथाकार हैं। उनकी कहानियों में गरीब दलित मेहनतकश वर्गीय तौर पर सचेत हैं, वर्ग दुश्मन को वे बहुत जल्दी पहचान लेते हैं। मधुकर सिंह परिवर्तनकारी राजनीति और संस्कृतिकर्म के बीच एकता का स्वप्न देखने वाले साहित्यकार हैं। यह अकारण नहीं है कि उन्होंने बिहार के आदिवासी संघर्ष से जुड़े चरित्रों पर न केवल उपन्यास लिखा, बल्कि नवसाक्षरों और बच्चों के लिए भी कई पुस्तिकाएं लिखीं।

वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने कहा कि इस सम्मान समारोह में पांच हिंदी राज्यों और एक अहिंदी प्रांत पश्चिम बंगाल से प्रमुख साहित्यकारों का शामिल होना गहरा अर्थ रखता है। मधुकर सिंह ने एक अस्वस्थ समाज का स्वस्थ साहित्य रचा है। शोषित-दलित समाज के संघर्ष की जो इनकी कहानियां हैं, वे वर्गचेतना संपन्न कहानियां हैं। वे एक मास्टर साहित्यकार की मास्टर कहानियां हैं, जिनमें कुछ तो मास्टर पीस हैं। उनकी कहानियां रात में जलती हुई मोमबत्तियों और कहीं-कहीं मशाल की तरह हैं। वे फैंटेसी नहीं, बल्कि यथार्थ के कथाकार हैं। यह संघर्षधर्मी यथार्थवाद ही भोजपुर के कहानीकारों की खासियत है। कथा साहित्य में एक भोजपुर स्कूल है, जिसका असर पूरे देश के कई कहानीकारों पर देखा जा सकता है। इस भोजपुर स्कूल पर वर्तमान के राजनीतिक-सामाजिक संघर्षों का प्रभाव तो है ही, इसके साथ संघर्षों का एक शानदार इतिहास भी जुड़ा हुआ है, जो 1857 से लेकर भोजपुर आंदोलन तक आता है।

रविभूषण ने कहा कि साहित्य में लोकतंत्र की आवाज तभी आती है, जब राजनीति में लोकतंत्र की आवाज खत्म होने लगती है। जो नई कहानी की त्रयी है, उनकी कहानियों में लोकतंत्र के संकट की शिनाख्त इस तरह से नहीं है, जिसे मधुकर सिंह अपनी कहानियों में शुरू से ही चिह्नित करते हैं। भोजपुर की जो कथात्रयी है, वह सचमुच लोकतंत्र के संकटों के खिलाफ संघर्ष करती नजर आती है। यह अकारण नहीं है कि मधुकर सिंह की कई कहानियों में रात्रि पाठशालाएं हैं। वे जनता की राजनीतिक चेतना को उन्नत करने की कोशिश करते हैं। नुक्कड़ नाटक जो खुद एक लोकतांत्रिक विधा है, उससे जुड़ते हैं। गीत, नाटक, कहानी, उपन्यास आदि कई विधाओं में मधुकर सिंह की जो आवाजाही है, उसके पीछे एक स्पष्ट वैचारिक मकसद है। आज जबकि लोकतंत्र भ्रष्टतंत्र, लूटतंत्र और झूठतंत्र में तब्दील हो चुका है, तब उसके खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें जिन साहित्यकारों में मिलती हैं, मधुकर सिंह उनमें अग्रणी हैं। विचार-विमर्श सत्र की अघ्यक्षता खगेंद्र ठाकुर, नीरज सिंह और रविभूषण ने की। दोनों सत्रों का संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया।

अंतिम सत्र में युवानीति ने मधुकर सिंह की मशहूर कहानी ‘दुश्मन’ की नाट्य प्रस्तुति की। रंगकर्मी रोहित के निर्देशन में तैयार इस नाटक में मधुकर सिंह के भोजपुरी गीत का भी इस्तेमाल किया गया था। शासकवर्ग किस तरह दलित-उत्पीडि़त जनता के नेताओं का वर्गीय रूपांतरण कर उन्हें अपनी ही जनता से काट देता है, इस नाटक में दर्शकों ने इसे बखूबी देखा।

पटना की नाट्य संस्था हिरावल ने मधुकर सिंह की कहानी ‘कीर्तन’ पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया। इसमें देश में बाबाओं के अंधश्रद्धा के कारोबार तथा सामंती पितृसत्ता और मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था के साथ उनके गहरे रिश्ते पर तीखा व्यंग्य था। निर्देशन संतोष झा ने किया था।

तीसरा नाटक जसम बेगूसराय की नाट्य संस्था रंगनायक ने किया। दीपक सिन्हा निर्देशित नाटक ‘माइकल जैक्सन की टोपी’ इसी शीर्षक की कहानी पर आधारित था, जिसमें मधुकर सिंह ने ऐसे छद्म प्रगतिशील जनवादी लेखकों पर व्यंग्य किया है, जो शासकवर्ग पर आश्रित होकर लेखन करते हैं और व्यवहार में ग्रामीण इलाकों और आदिवासी अंचलों में चल रहे जनसंघर्षों का विरोध करते हैं। इन तीनों नाट्य प्रस्तुतियों की खासियत यह थी कि ये पात्र बहुल नाटक थे। इतने सारे कलाकारों को एक साथ इन नाटकों में देखना दरअसल रंगकर्म के भविष्य के प्रति भी उम्मीद जगाने वाला था।

चित्रकारों ने भी अपनी कला के साथ इस सम्मान समारोह में शिरकत की। मंच पर ठीक सामने चित्रकार भुवनेश्वर भास्कर द्वारा बनाए गए छह पोस्टर लगाए गए थे, जो उन्होंने मधुकर सिंह के साथ अपनी स्मृतियों की अभिव्यक्ति के बतौर बनाया था। सभागार के बाहर चित्रकार राकेश दिवाकर ने मधुकर सिंह की रचनाओं पर आधारित चित्र लगाए थे। अभिधा प्रकाशन तथा जनपथ पत्रिका की ओर से बुक स्टाल भी लगाया गया था।

इस समारोह में रामधारी सिंह दिवाकर, रामनिहाल गुंजन, वाचस्पति, कल्याण भारती, संतोष सहर, अशोक कुमार सिन्हा, राकेश कुमार सिंह, उमाकांत, फराज नजर चांद, हीरा ठाकुर, दिव्या गौतम आदि साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी और चित्रकार मौजूद थे।

कथाकार मधुकर सिंह सम्मान समारोह आज

कथाकार मधुकर सिंह

कथाकार मधुकर सिंह

आरा: अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों के अनुसार कथाकार मधुकर सिंह 2 जनवरी 2014 को अस्सी साल के हो जाएंगे। पिछले लगभग पाँच वर्षों से वे लकवे से ग्रस्त हैं। पहले की तरह सभा-गोष्ठियों में जाना और मित्रों व आत्मीय जन से उनके घर जाकर मिल पाना इनके लिए संभव नहीं रह गया है। बीमारी ने इनकी श्रवण क्षमता पर भी असर डाला है, लेकिन इस हाल में भी इनका लेखन कार्य बाधित नहीं हुआ है। वे लगातार पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिख रहे हैं और इनका प्रण है कि जिंदगी भर लिखते रहेंगे।

एक ऐसे परिवार और समाज में मधुकर सिंह का जन्म हुआ, जिसमें दूर-दूर तक साहित्य लेखन की कोई विरासत नहीं थी। 2 जनवरी 1934 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर में इनका जन्म हुआ और लगभग 10 वर्ष की उम्र में वे भोजपुर जिले में अपने गाँव धरहरा आ गए। इनके बाल मन पर बांग्ला की ‘यात्रा पार्टी’ और बाउल लोकगीतों तथा माँ द्वारा सुनाए गए बांग्ला और भोजपुरी के लोकगीतों व लोककथाओं का बहुत असर रहा। जब वे मैट्रिक में थे, तभी एक नाटक लिखा। इसके बाद गाँव में एक नाटक मंडली बनाई और भोजपुरी गीत लिखने लगे। इनके भोजपुरी गीतों का एक संग्रह ‘रुक जा बदरा’ के नाम से 1963 में आया। उसी वक्त इन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू किया और बाद में फिर कई उपन्यास भी लिखे। ‘सोनभद्र की राधा’, ‘सबसे बड़ा छल’, ‘सीताराम नमस्कार’, ‘सहदेव राम का इस्तीफा’, ‘जंगली सुअर’, ‘मेरे गाँव के लोग’, ‘समकाल’, ‘कथा कहो कुंती माई’, ‘अगिन देवी’, ‘अर्जुन जिंदा है’, ‘बाजत अनहद ढोल’, ‘बेनीमाधो तिवारी की पतोह’, ‘जगदीश कभी नहीं मरते’ समेत मधुकर सिंह के उन्नीस उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा ‘पूरा सन्नाटा’, ‘भाई का जख्म’, ‘अगनु कापड़’, ‘पहला पाठ’, ‘असाढ़ का पहला दिन’, ‘पाठशाला’, ‘माई’, ‘पहली मुक्ति’, ‘माइकल जैक्सन की टोपी’ समेत इनके दस कहानी संग्रह और कहानियों के कुछ प्रतिनिधि संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने कई कहानी संकलनों का संपादन भी किया है। ‘लाखो’, ‘सुबह के लिए’, ‘बाबूजी का पासबुक’ और ‘कुतुब बाजार’ नामक इनके नाटक भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे आरा की चर्चित नाट्य संस्था ‘युवानीति’ के संस्थापकों में से रहे हैं। इन्हीं की कहानी ‘दुश्मन’ के मंचन से युवानीति ने जननाट्य आंदोलन के सफर की शुरुआत की थी। इनकी रचनाओं के अनुवाद तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, उडि़या, बांग्ला, चीनी, जापानी, रूसी और अंग्रेजी भाषा में भी हुए हैं। ‘इस बार’ पत्रिका के अलावा उन्होंने कई दूसरी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया है और पत्रकारिता भी की है। मधुकर जी ने बच्चों के लिए भी लिखा है।

सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों से मधुकर सिंह का प्रत्यक्ष जुड़ाव रहा है। बिहार के सोशलिस्ट आंदोलन और वामपंथी आंदोलन का इनकी रचनाओं पर गहरा असर रहा है। भोजपुर के किसान आंदोलन और जगदीश मास्टर सरीखे उसके नायकों का इनकी रचनाओं पर खासा प्रभाव है। समांतर कथा आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई और हर दौर में दलित-उत्पीडि़त, शोषित-वंचित लोगों के दुख-दर्द, उनकी आकांक्षाओं और संघर्षों की अभिव्यक्ति को अपने लेखन का मकसद बनाए रखा। पहले प्रगतिशील लेखक संघ और बाद में जन संस्कृति मंच के निर्माण के समय से उसके साथ रहे मधुकर सिंह का सभी प्रगतिशील-जनवादी संगठनों और उनसे जुड़े लेखक-संस्कृतिकर्मियों से बेहद आत्मीय जुड़ाव रहा है। फणीश्वरनाथ रेणु के बाद वे बिहार के ऐसे कहानीकार हैं, जिनका कथा साहित्य सामाजिक बदलाव की चेतना के कारण खास महत्व रखता है। उनकी यह भी खासियत है कि उन्होंने गाँवों को सदैव अपने लेखन के केंद्र में रखा और ग्रामीण समाज के जनतांत्रीकरण की जरूरत को शिद्दत से उठाया।

साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी में मधुकर सिंह अपने दोस्ताना स्वभाव के लिए जाने जाते रहे हैं। आज जबकि वे अस्वस्थ हैं, तब हम सबने उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें सम्मानित करने का फैसला किया है, ताकि उनकी जिंदगी और लेखन को इससे नई उर्जा मिले। सम्मान समारोह 22 सितंबर 2013 को 11 बजे दिन से आरा नागरी प्रचारिणी सभागार में शुरू होगा।

आयोजन में जसम के महासचिव युवा आलोचक प्रणय कृष्ण उन्हें सम्मानित करेंगे और उसके बाद मधुकर सिंह अपना वक्तव्य देंगे। उसके बाद लोग उनसे जुड़ी अपनी यादों को साझा करेंगे। दूसरे सत्र में ‘कथाकार मधुकर सिंह: साहित्य में लोकतंत्र की आवाज’ विषय पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए जाने-माने साहित्यकार अपने विचार रखेंगे तथा उनके साहित्यिक योगदान का मूल्याँकन करेंगे। शाम के आखिरी सत्र में मधुकर सिंह की कहानियों- ‘दुश्मन’, ‘कीर्तन’ और ‘माइकल जैक्सन की टोपी’ पर आधारित युवानीति (आरा), हिरावल (पटना) तथा रंगनायक, जसम (बेगसूराय) की नाट्य प्रस्तुति होगी। इस आयोजन में वरिष्ठ आलोचक रविभूषण, दूरदर्शन के निदेशक-कवि कृष्ण कल्पित, कथाकार सुरेश कांटक, सुभाषचंद्र कुशवाहा, रणेंद्र, मदन मोहन, रामधारी सिंह दिवाकर, पंकज मित्र, बनाफरचंद्र, भाषाविद् राजेंद्र प्रसाद सिंह, राजनीतिक विश्लेषक ब्रज कुमार पांडेय, रंगकर्मी राजेश कुमार, सुनील सरीन, कवि चंद्रेश्वर, बलभद्र, सुरेंद्र प्रसाद सुमन समेत भोजपुर जनपद और बिहार राज्य के कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी शिरकत करेंगे।

इस संबंध में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस को सुधाकर उपाध्याय, रामनिहाल गुंजन, अनंत कुमार सिंह और जितेन्द्र कुमार ने संबोधित किया। इस मौके पर रंगकर्मी रोहित भी मौजूद थे।

(मधुकर सिंह सम्मान समारोह समिति की ओर से जारी)

हिंदी पट्टी के लिए विकल्‍प : प्रेमपाल शर्मा

वर्गीज कुरियन

वर्गीज कुरियन

9 सितंबर 2013 को अमूल और दुग्‍ध-क्रांति के मसीहा वर्गीज कुरियन को दुनिया छोड़े एक वर्ष बीत गया है । 50 और 60 के दशक में जब दूध की एक-एक बूँद के लिए देश तरसता था और आस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैण्‍ड से मक्‍खन आयात किया जाता था, तब वर्गीज कुरियन ने देश भर के किसानों, विशेषकर गुजरात को डेरी उद्योग की मार्फत आत्‍मनिर्भर बनाया । विदेशी पूँजी, देश के राजनेताओं की कशमकश के बीच सफलता की इस कहानी को कूरियन ने अपनी आत्‍मकथा में विस्‍तार से लिखा है। अंग्रेजी में इसका नाम ‘I to have a dream’  है और हिन्‍दी में ‘सपना जो पूरा हुआ’। यह एक ऐसी जरूरी किताब है, जिसे पढ़कर खासकर हिन्‍दी पट्टी के बुद्धिजीवी, नौकरशाह प राजनेता आत्‍मनिर्भर होने के सैकड़ों पाठ सीख सकते हैं । सरकार और सरकारी नौकरशाहों के भरोसे हिन्‍दी पट्टी का उद्धार नहीं होने वाला । उनकी बरसी के बहाने प्रेमपाल शर्मा का लेख-  

‘अमूल’ के अमूल्‍य जनक वर्गीज कुरियन को दुनिया छोडे़ एक वर्ष बीत गया है। रेलवे कॉलिज बड़ौदा के दिनों में उनका कई बार अधिकारियों को संबोधित करने और अनुभवों को सुनने, सांझा करने का मौका मिला । कई विम्‍ब एक साथ कौंध रहे हैं, जिनमें सबसे सुखद है खचाखच भरे सभागार में उनका पूरी विनम्रता से भेंट स्‍वरूप दी गयी टाई को वापस करना । ‘मैं किसानों के बीच काम करता हूँ । इसे कब लगाऊँगा।’

अपनी जरूरत और सादगी के बीच अद्भुत संतुलन।

कुछ वर्ष पहले उनकी आत्‍मकथा छपी थी । ‘सपना जो पूरा हुआ’। अंग्रेजी में ‘आई टू हैव ऐ ड्रीम’ । इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से केरल से चलकर गुजरात को कार्यक्षेत्र बनाने और अमूल संस्‍था की पूरी कहानी बयान की है । इसकी प्रासंगिकता ऐसे वक्‍त में सबसे ज्‍यादा है क्‍योंकि यह पुस्‍तक उन सारे विकल्‍पों से रूबरू कराती है, जिनको अपनाकर भारत बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के जाल और मौजूदा संकटों से बच सकता है या उन्‍हें परास्‍त कर सकता है ।

कम नहीं होते साठ साल !  विशेषकर भारत जैसे देश के लिए, जहाँ किसी भी संसाधन की कमी नहीं । जल, जमीन, मानवशक्ति, प्रतिभा, सदियों की विरासत, ज्ञान-विज्ञान, धर्म, परंपरा सभी कुछ, बल्कि कुछ ज्‍यादा ही हैं, लेकिन फिर भी हम कहीं न पहुँचने वाले राष्‍ट्रों की कतार में खड़े हैं या कहें कि‍ विकास की हर कसौटी पर पीछे की तरफ जा रहे हैं। उदारीकरण और ग्‍लोबलाइजेशन के बूते हमें भ्रम तो विकास का दिया जा रहा है, लेकिन हकीकत में हमारी गरीबी, असमानता, कूपमंडूकता, अंधविश्‍वास का विकास ज्‍यादा हुआ है ।

लेकिन इतने अँधेरे के बीच कुछ काम ऐसे भी हुए हैं जिसके बूते हम फख्र से गर्दन उठा सकते हैं। वर्गीज कुरियन द्वारा सहकारिता आंदोलन के तहत किसानों को संगठित करके पहले दूध उत्‍पादन और फिर तेल, फल, सब्‍जी जैसे क्षेत्रों में भी उसी सफलता का दोहराना, स्‍वतंत्र भारत की कुछ उपलब्धियों में से एक है। देश की लगातार बढ़ती आबादी के बावजूद अमूल की सफलता से न केवल भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध-उत्‍पादक देश बन गया है बल्कि प्रति व्‍यक्ति दूध की उपलब्‍धता भी दोगुनी हुई है। इस प्रयोग और सफलता का सेहरा न किसी बहुराष्‍ट्रीय कंपनी की बदौलत मिला है, न विश्‍व बैंक के अनुदान से। यह संभव हुआ वर्गीज कुरियन और गुजरात के किसानों की देशी समझ और सहयोग से।

एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते राजनीति से नहीं बचा जा सकता, लेकिन राजनीति कैसे समाज परिवर्तन का हथियार बन सकती है, इसे अमूल के उदाहरण से समझा जा सकता है । आजादी से ठीक पहले के वर्ष गुजरात में खैरा जिले के किसानों, विशेषकर दूध उत्‍पादन करने वाले किसानों का शोषण हो रहा था । उनसे दूध सस्‍ते दामों में खरीदा जाता और पोलसन, नेस्‍ले जैसी संस्‍थाएं उसे मुंबई में महंगे दामों पर बेच देती। यानी मुनाफा सारा बिचौलियों के नाम। गुजरात के किसानों में सुगबुगाहट हुई । उन्‍होंने अपनी सहकारी समितियाँ बनाईं और इस शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए। वल्‍लभभाई पटेल का यह क्षेत्र था, लेकिन मोर्चा संभाला आजादी के दौर के उतने ही बड़े राजनीति‍ज्ञ त्रिभुवन दास पटेल ने। ठीक इसी समय वर्गीज कुरियन, जो इस्‍पात इंजीनियर के रूप में शिक्षित थे और जिन्‍हें डेयरी इंजीनियरिंग में कुछ विदेशी प्रशिक्षण भारत सरकार ने दिया था, को उनकी अनिच्‍छा के बावजूद गुजरात में पोस्टिंग दी गई। पोस्टिंग के पीछे दबाव यह था कि क्‍योंकि भारत सरकार ने आपके ऊपर डेयरी इंजीनियरिंग में खर्च किया है, अत: आपको जाना ही पड़ेगा। वर्गीज जल्‍दी-से-जल्‍दी गुजरात से निकल भागना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे जनता या वहाँ के किसानों या कहिए त्रिभुवन दास पटेल जैसे राजनीतिज्ञ के प्रोत्‍साहन से वर्गीज सदा के लिए गुजरात या अमूल के होकर रह गए। त्रिभुवन दास पटेल 20-25 वर्षों तक लगातार हर राजनीतिक हस्‍तक्षेप को रोकते रहे और अमूल नाम से स्‍थापित सहकारिता संघ मजबूत होता चला गया। यह कहानी उत्‍तर भारत या देश के दूसरे हिस्‍सों से अलग इसलिए रेखाँकित की जा रही है कि सहकारिता आंदोलन देश के सारे हिस्‍सों में राजनीतिज्ञों, उनकी पार्टी के पदाधिकारियों की घुसपैठ के घमासान में पूरे देश में लगभग असफल हो चुका है, लेकिन गुजरात में इसी ने एक नया रास्‍ता दिखाया।

शायद ही कोई प्रधानमंत्री होगा, जिसने अमूल के इस प्रयोग को खुद जाकर न देखा हो और वर्गीज कुरियन और सहकारिता आंदोलन की तारीफ न की हो। नेहरूजी ने प्‍लांट का उद्घाटन किया, फिर शास्‍त्री जी गए और इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई से लेकर अब तक तमाम प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री वहाँ गए। ऐसा नहीं कि राजनीतिज्ञों ने अपनी नाक घुसेड़ने की कोशिश न की हो, लेकिन वर्गीज की निष्‍ठा, लगन और गुजरात के किसानों की एकजुटता ने किसी भी राजनीतिज्ञ के मंसूबे पूरे होने नहीं दिए। एकाध घटना का जिक्र करना जरूरी है। 1970 के आस-पास के एक केंद्रीय कृषि मंत्री चाहते थे कि ऐसी ही एक डेयरी उनके चुनाव क्षेत्र में खोली जाए, लेकिन वे चाहते थे कि वह सहकारी समिति न होकर उनकी निजी डेयरी की तरह हो और कुरियन उसमें मदद करें। कुरियन का जवाब था कि मैं गुजरात के किसानों की सहकारी समिति का सेवक हूँ। मैं यदि मदद करूँगा तो केवल सरकार या सहकारिता डेयरी की। निजी डेयरी के लिए किसी और की मदद लीजिए। याद रखिए, अमूल और कुरियन का सारा साम्राज्‍य इन्‍हीं कृषि मंत्री के अधीन था। मंत्री नाराज हुए, बदला लेने की कोशिश में भी जुटे, लेकिन विफल रहे, क्‍योंकि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री भी कुरियन की निष्‍ठा को जानते थे और मंत्री जी को चुप बैठना पड़ा। क्‍या कोई नौकरशाह मौजूदा दौर में ऐसी हिम्‍मत दिखा पा रहा है? बल्कि उल्‍टे सरकारी स्‍कूल, सरकारी अस्‍पताल, सरकारी प्रतिष्‍ठानों को बेच-बाचकर निजी उद्योगों की तरफ बढ़ रहे हैं। चापलूसी और पोस्टिंग की जोड़-तोड़ में लगी मौजूदा नौकरशाही कुरियन के अनुभव से अपनी पहचान वापस ला सकती है। जब हर नौकरशाह दिल्‍ली की जुगाड़ में रहता है, कुरियन ने खुद शर्त रखी कि मैं दिल्‍ली किसी भी कीमत पर नहीं आऊँगा। मैं किसानों के संगठन का नौकर हूँ। अत: उनके नजदीक आणद में ही रहूँगा ।

कुरियन की निडरता का एक और उदाहरण- 1990 से कुछ वर्ष पहले एक और मंत्री ने खाद्य तेलों का पहले भंडार दिया  और वे चाहते थे कि उस भंडार को आधे दामों पर एक निजी ठेकेदार को बेच दि‍या जाए। तर्क यह कि कुछ दिनों बाद इस तेल की खाने की मियाद खत्‍म हो जाएगी तो कम-से-कम अभी-अभी आधे पैसे तो मिल जाएंगे। कुरियन को पता चला कि मामला प्राइवेट साठगाँठ से करोड़ों के घोटाले का है, अत: उस सारे भंडार को खुद खरीद लिया। खाद्य तेलों के क्षेत्र में कुरियन ने अमूल के अनुभवों का फायदा उठाते हुए ‘धारा’ आदि की शुरूआत करके एक नया कीर्तिमान स्‍थापित किया। जिस समय देश में हर चीज का आयात हो रहा हो, वहाँ सहकारिता आंदोलन से दूध, खाद्य तेल क्षेत्रों की सफलता एक रास्‍ता दिखाती है कि यह देश के दूसरे हिस्‍सों में भी हो सकता है, बशर्ते कि कोई जनता की ताकत के साथ आगे बढ़े।

जाति व्‍यवस्‍था और छूआछूत से जूझते समाज में अमूल की सफलता एक आर्थिक सफलता ही नहीं, एक सामाजिक क्रांति का भी संकेत देती है। सहकारिता आंदोलन में सभी किसान शामिल थे। ब्राह्मण, बनिया, दलित, मुसलमान सभी। समितियाँ गाँव-गाँव स्‍थापित की गई थीं और मोटा-मोटी नियम कि जो पहले आए, उसका दूध पहले लिया जाएगा। सुबह-सुबह लंबी लाइनों में यदि दलित पहले आया है तो वह ब्राह्मण के आगे खड़ा होता था। यह बात समाज के उन वर्गों ने भी स्‍वीकार कर ली, जो इससे पहले इस बराबरी को नहीं मानते थे। कभी-कभी वे अपने उपयोग के लिए भी दूध इन्‍हीं डेरियों से लेते थे। दूध लेते वक्‍त वह एहसास गायब होता है कि यह दूध किसी ब्राह्मण का है या किसी निम्‍न जाति का। मनुष्‍यों को बराबर समझने के लिए ऐसे आर्थिक संबंध कितनी प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, यह चकित करता है।

सहकारिता के इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी विलक्षण रही। जब उन्‍हें यह अहसास हुआ कि दूध की बिक्री से उनका घर चल सकता है और उसका मुनाफा भी उनके परिवार की बेहतरी के काम आएगा तो स्त्रियों में भी एक अलग किस्‍म का स्‍वावलंबन पैदा हुआ। वे खुद बढ़-चढ़कर आगे आईं। उनको उन आधुनिक डेयरी फार्मों में ले जाया जाता, जहाँ मवेशी रहते थे। उनकी देखभाल करने का प्रशिक्षण दिया जाता तो इससे उनकी समझ में भी स्‍वास्‍थ्‍य, प्रजनन संबंधी जानकारी पैदा हुई। वे स्‍वयं इस बात को समझने लगीं कि भैंस, गायों को क्‍यों गर्भावस्‍था में पौष्टिक भोजन देना चाहिए। यहाँ तक कि कृत्रिम गर्भाधान केन्‍द्रों पर उन्‍हें ले जाने से जनसंख्‍या नियंत्रण की समझ भी उनमें पैदा   हुई। शिक्षा का अर्थ सिर्फ डिग्रियाँ नहीं, ऐसे सामाजिक अनुभव भी आपको समझदार नागरिक बनाते हैं।

अमूल का यह मॉडल विकेन्‍द्रीकरण का सबसे अच्‍छा उदाहरण है। गाँवों की अर्थव्‍यवस्‍था ठीक होगी तो गाँव बेहतर होंगे। तब ये लोग न दिल्‍ली की तरफ भागेंगे, न मुंबई की तरफ जहाँ राजनीतिक पार्टियाँ अपना वोट बैंक ढूंढे़ं । स्‍कूल भी उनके वहीं खोले गए। यहाँ तक कि पशुओं की देखभाल के लिए पशु चिकित्‍सक गाँव-गाँव आ गए। पशु चिकित्‍सक जब आ गए तो किसानों को लगा कि मनुष्‍यों के लिए भी तो डॉक्‍टर चाहिए। इससे सरकारी अस्‍पताल बढ़े, या‍नी कि एक के बाद एक सुविधा, समृद्धि के द्वार खुलते गए। उत्‍तर भारत के अधिकांश हिस्‍सों में विकेन्‍द्रीकृत, पंचायती राज पर सेमीनार तो 60 वर्ष से हो रहे हैं, जमीनी स्‍तर पर एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जो अमूल की छाया के आसपास भी हो।

बिहार, उत्‍तर प्रदेश की जनता, नेता और बुद्धिजीवियों के लिये कई सबक इसमें छिपे हैं।

सफलता के शीर्ष पर पहुँचे कुरियन पाकिस्‍तान के बुलावे पर और विश्‍व बैंक के अनुरोध पर पाकिस्‍तान गए। पाकिस्‍तान भी चाहता था कि कुरियन अमूल जैसे संस्‍था के निर्माण में उन्‍हें भी सहयोग दे। कुरियन ने यथासंभव कोशिश भी की, लेकिन मजेदार प्रसंग दूसरा था। पाकिस्‍तान के एक अधिकारी ने पूछा कि आप एक ईसाई हो और वह भी गुजराती नहीं, हिंदुओं के गुजरात ने कैसे जगह दे दी ? कुरियन का जवाब था- 1965 में जब पाकिस्‍तान ने भारत पर हमला किया था, गुजरात में पुलिस महानिदेशक मुस्लिम थे, गृह सचिव ईसाई और गुजरात के राज्‍यपाल एक मुसलमान। भारत धर्म संप्रदायों से परे एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए ऐसा प्रश्‍न मेरे लिए अप्रासंगिक है।

वर्गीज कुरियन ने अपने अनुभवों को समेटते हुए बड़ौदा के उसी भाषण में यह भी कहा था कि गांधी केवल गुजरात में ही पैदा हो सकता है, जहाँ लोग अच्‍छे काम के पीछे बिना हील’हुज्‍जत के हो जाते हैं।

सन् सत्‍तर के बाद पैदा हुई पीढ़ी मुश्किल से ही यह समझ पायेगी कि सन सत्‍तर में विशेषकर गर्मियों में मावा या खोये की मिठाइयों पर शादियों तक में प्रतिबंध लग जाता था। उन दिनों दूध की बेहद कमी रहती थी और यदि दूध की मिठाइयों की छूट दी जाती तो बच्‍चों को दूध नहीं मिल पाता था। कुरियन के प्रयासों का ही प्रताप है कि देश के किसी भी हिस्‍से से आज दूध की कमी की शिकायत नहीं मिलती। शुद्ध पानी जरूर मुश्किल से मिलता है।

पिछले एक वर्ष से मेरा दिमाग कुरियन पर लिखने को कसमसा रहा था । हुआ यह है कि कुरियन की किताब पढ़ने के कुछ दिनों बाद ही मुझे अनसूया ट्रस्‍ट से जुड़ी ज्‍योत्‍सना मिलन ने सेवा की संस्‍थापक इलाबेन की वाग्‍देवी प्रकाशन से छपी किताब ‘लड़ेंगे भी रचेंगी भी’ भिजवायी। बेहद प्रेरणादायक। अमूल ने गुजरात समेत देश के लाखों किसानों का जीवन बदल दिया तो इलाबेन ने सेवा संस्‍था के जरिये समाज में और भी दबायी आधी आबादी यानी कि स्त्रियों की जिंदगी को। सेवा की सहायक संस्‍थाओं में आज दस लाख से ज्‍यादा कामगार मजदूर महिलाएं पापड़, बैंकिंग, सिलाई, हस्‍तशिल्‍प, स्‍वास्‍थ्‍य सभी क्षेत्रों में सक्रिय है।

क्‍या गुजरात के सामाजिक समृ‍द्धि में वर्गीज कुरियन और इला भट्ट के योगदान को नकारा जा सकता है ?

दिल्‍ली में मेरे घर के आसपास अमूल की न चॉकलेट मिलती, न आइसक्रीम। मयूर विहार के दर्जनों दुकानदारों से आग्रह किया कि अमूल की चॉकलेट रखो तो खूब बिकेगी । उनकी चुप्‍पी का अर्थ था- केडबरी और दूसरी ब्रांडों में मुनाफा ज्‍यादा है । कहाँ गयी तुम्‍हारी देशभक्ति, देशी योग, स्‍वदेश, स्‍वराज। ललकारने पर भी कुछ असर नहीं हुआ है।

जैसे-जैसे अमूल की सफलता बढ़ती गई, तत्‍कालीन ब‍हुराष्‍ट्रीय कंपनियों, नीदरलैंड, आस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड जैसे देशों के विरोध भी प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से उभरने लगे। इन देशों से दूध सामग्री का आयात बंद हो गया था, अत: कभी क्‍वालिटी को लेकर प्रश्‍न उठाया जाता, तो कभी दूसरे तर्क । एक तर्क यह भी था कि जिस देश के पास खाने को अन्‍न नहीं है, क्‍या उसे दूध के क्षेत्र में आगे आना चाहिए ? क्‍योंकि दूध के लिए पशु चाहिए और पशुओं के लिए चारा । वर्षों तक बहुराष्‍ट्रीय कंपनियाँ अपने मिल्‍क पाउडर को भारतीय बाजारों में बेचने के लिए यह तर्क देती रहीं कि भैंस के दूध से मिल्‍क पाउडर नहीं बनाया जा सकता । कुरियन ने इस चुनौती को स्‍वीकार किया और चंद वर्षों के अंदर ही भैंस के दूध से मिल्‍क पाउडर बनाने में दुनिया के देशों में सबसे पहले सफलता हासिल की । अपने देश की जरूरतों के हिसाब से यह जरूरी था क्‍योंकि हमारे यहाँ भैंस, दूध-उत्‍पादन में ज्‍यादा बड़ी भूमिका निभाती हैं । इस पूरे प्रयोग पर सैकड़ों किताबें आई हैं। श्‍याम बैनेगल के निर्देशन में ‘मंथन’ जैसी फिल्‍म भी, लेकिन देश के अधिकांश हिस्‍सों में अभी भी इस प्रयोग, इसकी आत्‍मा, इसकी दृष्टि को समझकर सहकारिता आंदोलन को फैलाने की जरूरत है । बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के खिलाफ हम 20 साल से तो हवाई नारे, सेमीनार सुन ही रहे हैं, यदि एक भी काम हम ऐसा कर पाएं तो देश की तस्‍वीर बदल सकती है।

आज के मीडिया का सच : नित्‍यानंद गायेन

Dharati Patrika

वरिष्ठ कवि-आलोचक शैलेन्‍द्र चौहान के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘धरती’ का अंक-16 ‘मीडिया की भूमिका’ पर केंद्रित है। सम्पादकीय में उन्‍होंने लिखा है– ‘भारतीय नागरिक कदम–कदम पर अपमानित होता है। क्या इसी लोकतंत्र के लिए हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, इतने बलिदान दिए थे? मीडिया को इन बातों से कोई अंतर नही पड़ता, क्योंकि वह जनहित का पक्षधर माध्यम नहीं है |’ आगे आपने लिखा है- ‘विकासशील देशों में मीडिया की भूमिका विकास और सामाजिक मुद्दों से अलग हट कर हो ही नही सकती, लेकिन भारत में मीडिया इसके इसके विपरीत भूमिका में आ चुका है |” इस प्रकार आज की मीडिया से जुड़े बहुत गंभीर एवं तथ्यात्मक बिंदुओं को उजागर किया है यहाँ | किस प्रकार मीडिया ने जनसरोकार से जुड़े मुद्दों तथा साहित्य कला व संस्‍कृति को नकारा और क्रिकेट और ग्लैमर का प्रचार शुरू कर दिया | पूंजीपतियों और सत्ता के इशारों पर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को दबाया है, इसका पर्दाफाश संपादक के किया है |

भारत जैसे देश में जहाँ आज भी गरीबी, भुखमरी, जातिवाद, शोषण जैसे मुद्दे चरम पर हैं, ऐसे में लोकतंत्र का चौथा खंभा कहलाने वाला हमारा मीडिया किस तरह से अपने सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी से विमुख हो चूका है, उसे समझने के लिए यह अंक एक विशेष दस्तावेज है| पिछले कुछ समय से जिस प्रकार कुछ पत्रिकाएं बड़े लेखकों की जन्म शताब्दी और युवा कविता अंक निकालने में व्यस्त हैं, ऐसे समय में ‘धरती’ का यह अंक एकदम हटकर एक प्रासंगिक विषय पर केंद्रित है|

इस अंक में मीडिया से जुड़े कई लेखकों के आलेख हैं| विमर्श में अनिल चमड़िया का आलेख है– ‘लोगों की गरीबी और मीडिया की अमीरी का रिश्ता|’ यहाँ लेखक ने भारत में कितनी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं और उनके पाठक से सरोकार, बाज़ार और विषयवस्‍तु पर विस्तार से लिखा है। डा. राम आह्लाद चौधरी ने  ‘न्यूज डेस्क, न्यूज रूम और महिला पत्रकार’ शीर्षक के अपने आलेख में भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में महिलाओं की भूमिका और उनकी आवश्यकता को प्रस्तुत किया है| एक और वरिष्ठ पत्रकार हैं विमल कुमार| मीडिया में लंबा अनुभव और उसके उतार–चढ़ाव का लेखा–जोखा प्रस्तुत किया है| कल्लोल चक्रवर्ती का आलेख ‘सरोकार बदले तो कुछ बात बने |’ डा. विमलेश शर्मा, जयनंदन, चंद्रभूषण, राजेंद्र राठौर, संजय द्विवेदी, राकेश पुंज और रमेश शर्मा के लेख भी महत्वपूर्ण हैं|

साक्षात्कार स्तंभ में वरिष्‍ठ लेखक असगर वजाहत से पल्लव ने ‘मीडिया और साहित्य’ विषय पर और प्रेमपाल शर्मा से अनुराग ने ‘चौथा स्तंभ जर्जर हो चुका है’ शीर्षक से महत्वपूर्ण बातचीत की है| इसके अलावा ‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव के नाम शैलेन्द्र चौहान का एक विशेष पत्र भी प्रकाशित है| यह पत्र उन्‍होंने ‘हंस’ जून 2013 का अंक पढ़कर राजेन्द्र जी को लिखा था जिसे हंस के सम्पादक ने प्रकाशित करने का साहस नही दिखाया| कविता स्तंभ में वरिष्ठ कवि और ‘अलाव’ के सम्पादक रामकुमार कृषक, संजय कुंदन और नित्यानंद गायेन की कविताओं के साथ ही ‘लू शून’ की दो गद्य कवितायेँ शामिल हैं| कुल मिला कर यह अंक मीडिया का सच जानने के लिए एक मील का पत्थर है। यह अंक भी महत्वपूर्ण एवं संग्रहणीय बन पड़ा है |

पत्रिका- धरती, अंक-16 ‘मीडिया की भूमिका’ पर केंद्रित, सम्‍पादक-  शैलेन्द्र चौहान

पता- पी 1703 , जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्‍लाट नंबर- 12ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाजियाबाद- 201014

पत्रिका साधारण डाक से मंगाने हेतु कृपया पचास रुपये एवं रजिस्टर्ड डाक से मांगने के लिये अस्सी का धनादेश भिजवाएं।

शिक्षा का माध्यम परिवेश की भाषा हो : महेश चंद्र पुनेठा

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बाजारवाद के दबाब में आज अंग्रेजी को शिक्षण का माध्यम बनाने की एक हवा सी चल पड़ी है। कभी हिंदी का झंडा मजबूती से थामे रखने वाली शैक्षणिक संस्थाएं भी एक-एक कर इस हवा में बहती जा रही हैं। निजी विद्यालय तो बाजार की दौड़ में अपने आप को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी माध्यम को अपनाने को मजबूर हैं ही, लेकिन अब सरकारी स्कूल भी प्रयोग के नाम पर इस दिशा में आगे बढ़ चले हैं। अखबारों में आए दिन इस आशय की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और शिक्षकों को लगता है कि सरकारी विद्यालयों की घटती छात्र संख्या का एक बड़ा कारण इनका अंग्रेजी माध्यम का न होना है। यदि यहाँ अंग्रेजी माध्यम शुरू किया जाये तो घटती छात्र संख्या को रोका जा सकता है। हो सकता है कि एक हद तक उनका यह अनुमान सही सिद्ध हो। अंग्रेजी के प्रति अतिशय मोहग्रस्त मध्यवर्ग इस कदम से कुछ आकर्षित होकर इन विद्यालयों की ओर लौट आए, पर बड़ा सवाल यह नहीं है कि विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हो बल्कि  उससे बड़ा सवाल है कि इससे बच्चों की सीखने की गति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, बच्चे विषयवस्तु को कितना समझ पाएँगे, अपने स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से कितना जोड़ पाएँगे\ यदि ऐसा नहीं कर पाएँगे तो क्या वह ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ पाएँगे, या फिर उनका मस्तिष्‍क सूचनाओं और जानकारियों का बैंक मात्र बनकर रह जाएगा, इन गम्भीर और जरूरी सवालों पर कहीं कोर्इ विचार-विमर्श नहीं दिखार्इ देता है। सभी बाजार द्वारा प्रायोजित अंधी दौड़ में दौड़ते जा रहे हैं। अंग्रेजी का भूत इस कदर हावी हो गया है कि सीखने-सीखाने के बुनियादी सिद्धांतों को ही भूल गए हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में सरकारी स्कूलों में जाने वाले अधिकांश बच्चे ऐसे परिवेश से आते हैं, जहाँ अंग्रेजी उनके लिए पूरी तरह एक विदेशी भाषा है। जिनकी अभिव्यक्‍त‍ि का माध्यम स्थानीय बोली-भाषा है। संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाएँ भी उनके लिए दूसरी भाषा है। जब बोली से दूसरी भाषा तक आना भी उनके लिए बहुत कठिन होता है, दूसरी भाषा में पढ़ा-लिखा भी वे बहुत कठिनार्इ से समझ पाते हैं (जबकि वह भाषा कहीं-न-कहीं उनके परिवेश में मौजूद होती है), ऐेसे बच्चे जब अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाए जाएँगे, तब वह विद्यालय में अपने आपको कितना सहज महसूस करेंगे, उनका कक्षा में कितना मन लगेगा और विषयवस्तु को कितना समझ पाएँगे, ये विचारणीय प्रश्‍न हैं। कहीं भाषा का यह वैरियर उन्हें स्कूल से ही दूर न कर दे। जिन बच्चों के लिए अपनी ही परिवेश की भाषा में विषयवस्तु को समझना कठिन होता है, यदि एक विदेशी भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाया जाएगा तो उनकी समझ में कितना आएगा\ कैसे वह प्राप्त जानकारी के आधार पर ज्ञान का निर्माण कर पाएँगे तथा नया रच पाएंगे\ परिवेश से दूर की भाषा में बच्चा जानकारियों, तथ्यों, सूचनाओं को केवल रट सकता है और रटने से ज्ञान निर्माण संभव नहीं है और न ही रचनात्मकता। आज अंग्रेजी माध्यम से पढ़े बहुत सारे बच्चों को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।

अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण करने पर यह हो सकता है कि तोते की तरह बच्चे अंग्रेजी में कुछ अवश्य बोलने लग जाएँगे, पर वह उसे अपनी अभिव्यक्‍त‍ि का सहज माध्यम नहीं बना पाएँगे। ऐसा होने पर उनकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होगी। यह प्रमाणित तथ्य है कि मनुष्य हमेशा उसी भाषा में चिंतन करता है, जो शिशु विकास की प्रारम्भिक अवस्था में सार्वधिक सुनता है, जिसको उसके परिवार और पास-पड़ोस में बोला जाता है, जिसे उसने अपने बड़ों से अनौपचारिक तौर से सीखा है। अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम होने पर ऐसे बच्चे जो फर्स्‍ट जनरेशन लर्नर हैं, सीधे शिक्षा की धारा से बाहर हो जाएँगे। वे साक्षर हो सकते हैं, शिक्षित नहीं। उन्हें वस्तुओं के अंग्रेजी में लिखे विज्ञापन पढ़ने भले आ जाएँ, लेकिन उनकी सही पहचान नहीं होगी। कुछ बच्चों को अवश्य इसका लाभ हो सकता है, लेकिन बड़ी संख्या इसका खामियाजा भुगतेगी। उनके लिए पढ़ार्इ पहाड़ बन जाएगी, उन्हें कुछ भी समझ नहीं आएगा और पढ़ार्इ-लिखार्इ ऊब पैदा करेगी। ऐसे में सोचा जा सकता है कि सीखने की प्रक्रिया और गति कितनी आगे बढ़ पाएगी। यह हो सकता है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाया जाये तो बच्चा एक लंबे अंतराल बाद अंग्रेजी भाषा तो सीख जाएगा, परंतु विषयवस्तु पर उसकी पकड़ उतनी गहरी नहीं हो पाएगी जितनी अपने परिवेश की भाषा के माध्यम से पढ़ने में। जो समय तथा श्रम बच्चे को विषयवस्तु की गहरार्इ में उतरने में लगना चाहिए, वह भाषा सीखने में लग जाएगा।

आपने अनुभव किया होगा कि जब आप कभी-कभार पढ़ाते हुए बच्चों की बोली में उनसे बतियाने लगते हो या उनके घर-गाँव में बोले जाने वाले शब्दों का उच्चारण करते हो तो उनके चेहरे एक अजीब सी आभा से चमक उठते हैं। उनके होंठों में मुस्कान बिखर जाती है। ऐसा लगता है, जैसे वे हमारे एकदम करीब आ गए हैं। कक्षा में चुप्पा-चुप्पा रहने वाले बच्चे भी अपनी चुप्पी तोड़ बतियाने लगते हैं। उन्हें शिक्षक अपने ही बीच का लगने लगता है। विषयवस्तु को वे बहुत जल्दी भी समझ जाते हैं। इससे पता चलता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा की क्या भूमिका है\ पर आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का आलम यह है कि वहाँ बच्चों के लिए अपनी परिवेश या मातृभाषा में बात करना तक प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर उन्हें दंडित किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि जब बच्चे के पास अपनी आवश्यकताओं या भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए अंग्रेजी शब्द नहीं होते हैं तो वह चुप-चुप रहने लगता है या बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहता है। उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता बाधित होने लगती है। किसी भी भाषा का समुचित विकास नहीं हो पाता है।

भाषा के विकास के लिए यह जरूरी माना जाता है कि बच्चे को सुनने-बोलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जायें। जैसा कि हम मातृभाषा सीखने के संदर्भ में भी देखते हैं कि परिवार में बच्चे को भाषा सुनने और बोलने के पर्याप्त अवसर दिये जाते हैं। उससे अधिक-से-अधिक बात की जाती है। उसे कुछ-न-कुछ (टूटा-फूटा या आधा-अधूरा ही सही) बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस तरह वह धीरे-धीरे भाषा सहजता से सीख लेता है। जब बच्चे को उसकी परिवेश की भाषा में बोलने से रोका जाता है तो इससे कहीं-न-कहीं उसकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होती है, जिसके बिना भाषा का विकास संभव नहीं है। ऐसे बच्चे अपने भावी जीवन में दब्बू और संकोची होते हैं। इसलिए जरूरी है कि शिक्षण का माध्‍यम बच्चे की परिवेश की ही भाषा होनी चाहिए। कम से कम प्रारम्भिक शिक्षा तो उसके परिवेश की भाषा में ही होनी चाहिए। ऐसा कहने के पीछे यहाँ कोर्इ राजनीतिक या सांस्कृतिक कारण नहीं है बल्कि विशुद्ध शैक्षिक कारण है। यह आजमाया हुआ सत्य है कि बच्चे की सीखने की गति अपने परिवेश की भाषा में ही सबसे अधिक होती है क्योंकि ऐसे में बच्चे का पूरा ध्यान विषयवस्तु पर होता है। उसे भाषा से नहीं जूझना पड़ता है। बच्चा सुनने और बोलने की भाषायी दक्षता अपने परिवेश से ग्रहण कर चुका होता है। यह भाषा किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ने में भी मददगार होती है। यदि किताबों की भाषा वह नहीं है, जो बच्चे के घर व पास-पड़ोस में बोली जाती है, तो बच्चे के स्कूली जीवन और बाहरी जीवन के बीच एक रिक्तता बनी रहेगी।

बच्चा अपने आसपास के अनुभवों को अपनी कक्षा-कक्ष तक नहीं ले जा पाएगा। न किताबी ज्ञान से उसका संबंध जोड़ पाएगा। उसे हमेशा यह लगता रहेगा कि स्कूली जीवन और घरेलू जीवन एक-दूसरे से अलग हैं। शिक्षा को जीवन से जोड़ने और रुचिकर बनाने के लिए जरूरी है कि इस अंतराल को समाप्त किया जाये। परिवेश से दूर की भाषा शिक्षण का माध्यम होने पर उसका प्रभाव बच्चे के बौद्धिक व संज्ञानात्मक विकास पर पड़ता है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह माना जाता है कि बच्चों के व्यक्तित्‍व निर्माण में सबसे अधिक सहायता परिवेशीय भाषा से ही मिलती है। उसमें सोचने और महसूस करने की क्षमता का विकास जल्दी होता है। चिंतनात्मक व सृजनात्मक योग्यता अधिक विकसित होती है। बच्चे का भाषा पर अधिक अधिकार होता है। भाषा पर अधिकार होने का सीधा मतलब ज्ञान के अन्य अनुशासनों में आसानी से प्रवेश कर पाना है और पढ़ने में अधिक आनंद आना है। सामान्यत: यह देखने में आता है, जिस बच्चे का भाषा पर अधिकार होता है, वह अन्य विषयों को भी जल्दी सीख-समझ जाता है। उसके लिए अवधारणाओं को समझना सरल होता है। फलस्वरूप उसके सीखने की गति अच्छी होती है। इतना ही नहीं ऐसा बच्चा अन्य भाषाओं को भी सरलता से सीख पाता है। गैर-परिवेशीय भाषाओं में इसके विपरीत होता है। परिवेश की भाषा के पक्ष में एक सकारात्मक पहलू यह है कि जब बच्चा स्कूल जाना प्रारम्भ करता है, उस समय उसके पास अपने आसपास के वातावरण तथा प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन से अपने लिए जरूरी शब्दों का एक छोटा-मोटा भंडार होता है, जिनका वह आवश्यकतानुसार प्रयोग करता है। स्कूल उसके इन शब्दों को आधार बनाकर उसके शब्द भंडार में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है। बच्चों में संवेगों, मानवीय मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण व चारित्रिक गुणों का विकास भी परिवेशीय भाषा में बातचीत से अधिक संभव है।

अंग्रेजी को शिक्षण का माध्यम बनाने से अधिक आवश्यक यह है कि अंग्रेजी भाषा के शिक्षण को बेहतर और वैज्ञानिक बनाया जाये। समय चक्र में उसे अधिक समय दिया जाये। अंग्रेजी को परिवेशीय भाषा में न पढ़ाकर अंग्रेजी कक्षा का वातावरण ऐसा बनाया जाये, जिससे बच्चा आसानी से उस भाषा को सीख सके। दूसरी या तीसरी भाषा सीखने का जो खौफ बच्चे के भीतर होता है, वह समाप्त हो सके। इसके लिए हमारे पास अंग्रेजी सीखने का एक मॉडल होना चाहिए। उसे यांत्रिक तरीके से नहीं सिखाया जाना चाहिए। यह कैसी बिडंबना है कि तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में अंग्रेजी भी हिंदी माध्यम से पढ़ायी जाती है! हिंदी माध्यम के स्कूलों की बात ही क्या कहें! अंग्रेजी में प्रवीणता हासिल करने के लिए शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी करना कतर्इ जरूरी नहीं है।

अंत में एक बात और, आज अंग्रेजी को सफलता की भाषा माना जाता है और समाज के हर तबके के मन में यह बात गहरे तक पैठी है। बाजार द्वारा इस भ्रम को हवा देने का काम किया जा रहा है। अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का व्यापार करने का बहाना बन गर्इ है। ऐसा नहीं है, सफलता के सूत्र भाषा में नहीं, बौद्धिक क्षमता में छुपे होते हैं और यह किसी भाषा की मुहताज नहीं होती है।

हिंदी पर पाखंड : अनुराग

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हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा के ढोंग का सिलसिला साल-दर-साल जारी है। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा देश होगा, जहां अपनी भाषा को लेकर इस तरह का पाखंड होता हो। इस पर बात क्यों नहीं होती कि तमाम सरकारी राष्‍ट्रीय-अतंरराष्‍ट्रीय आयोजनों, हिंदी समितियों, हिंदी अधिकारियों के बावजूद हिंदी और लोगों के बीच खाई बढ़ती जा रही है? क्यों आने वाली पीढ़ी अपना नाम तक हिंदी में नहीं लिख रही? क्यों विभागों में तैनात हिंदी अधिकारी, समितियों के सदस्य, हिंदी में पढऩे-लिखने वाले व हिंदी से खाने-कमाने वाले और उनके बच्चे भी हिंदी को दूर से प्रणाम कर रहे हैं? यह जाने बिना कि इसका कारण मानसिक गुलामी है या व्यवस्थागत दोष है,  भाषा जैसे मुद्दे का कैसे समाधान किया जा सकता है? कई बार लगता है कि हिंदी के नाम पर उठा-पटक कर सरकार जनता के खून-पसीने की कमाई को बर्बाद कर रही है।

एक बातचीत के दौरान प्रसिद्ध लेखक बालगौरि रेड्डी ने कहा था- ‘स्वतंत्र राष्ट्र के लिए चार उपकरणों की आवश्यकता होती है। उसका अपना एक संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। कोई भी गणतंत्र राष्ट्र विदेशी भाषा को अपनी राजभाषा के रूप में स्वीकार नहीं करता।’ राष्ट्रभाषा जैसे अहम मुद्दे कैसे हल किए जाते हैं, इसका उन्होंने उदाहरण दिया- ‘जब टर्की आजाद हुआ तो कमालपाशा ने देश के सभी अधिकारियों को बुलाकर कहा- देखो भई, हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ, क्या करें? लोगों ने अपने-अपने सुझाव दिए। अंत में उन्होंने कहा- आप लोग अपनी-अपनी घड़ी देखो। इस मिनट और इसी सेकेंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ, काम करो।’

यह सही है कि भारत और टर्की की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक स्थितियाँ भिन्न हैं, लेकिन बिना दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति के भाषा या किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ वोट की राजनीति जनहित के सभी मुद्दों पर हावी है, वहाँ राजनेताओं का हित समस्याओं के समाधान करने में नहीं, बल्कि उन्हें चिरकाल तक बनाए रखने में है। ऐसे में राजनेताओं से कुछ उम्मीद करना व्यर्थ है। वे हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजन कर सकते हैं, समितियाँ-कमेटियाँ गठित कर सकते हैं, महाविद्यालय व महाविद्यालय भी खोल सकते हैं, लेकिन समस्या का स्थाई समाधान नहीं करेंगे।

प्राथमिक स्तर से जब अपनी भाषाओं को हटाकर अंग्रेजी लादी जा रही है, सरकारी कामकाज अंग्रेजी में किया जा रहा है, न्याय की भाषा अंग्रेजी है तो फिर हिंदी के नाम पर ये तमाम पाखंड क्यों किए जा रहे हैं? शायद इसके पीछे भी वोट की राजनीति है कि हिंदीभाषियों को लुभाकर उनका वोट हासिल किया जा सके।

अंग्रेजी के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि लोग उसी भाषा को सिखेंगे, जिसमें काम-धंधा मिलेगा। यह तर्क देकर भी अपनी भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी लादी जा रही है, लेकिन बहुत से ऐसे उद्योग-धंधे हैं, जहां अपनी भाषा से बखूबी काम चल रहा है। जैसे- कृषि, बागवानी, खेल, गीत-संगीत, प्रकाशन, लेखन, फिल्म उद्योग, विज्ञापन की दुनिया, अपनी भाषाओं में प्रकाशित-प्रसारित होने वाली पत्र-पत्रिकाएं-चैनल, विभिन्न उद्योग-दुकानें आदि में अंग्रेजी की क्या आवश्यकता है? इन उद्योगों और क्षेत्रों में काम करने वालों की संख्या करोड़ों में है। उनसे भी कहा जाएगा कि अपनी भाषा छोड़ो और अंग्रेजी सीखो अन्‍यथा पिछड़ जाओगे। कोई यह बताए कि अच्‍छी फसल अंग्रेजी सीखने से होगी या उन्‍नत किस्‍म के बीज और आधुनिक तकनीक इस्‍तेमाल करने से, और यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। ऐसे में लगता है कि भाषा की समस्या मानसिकता से अधिक जुड़ी है।

अंग्रेजी ने जहाँ-जहाँ राज किया, वहाम्‍े सबसे पहले लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाया। वे जानते थे कि मानसिक गुलामी के बिना किसी कौम पर लंबे समय तक राज नहीं किया जा सकता और कभी राजनीतिक आजादी मिल भी गई तो मानसिक गुलामी से आजाद होना आसान नहीं है। इसलिए आज भी हमें भाषा, वेशभूषा सभी अंग्रेजों की अच्छी लगती है। यहाँ तक की उनकी महारानी-प्रिंस आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इस मानसिक गुलामी से मुक्ति के बिना भाषा की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

क़मर मेवाड़ी को देवेन्द्र स्मृति पुरस्कार

क़मर मेवाड़ी को सम्मान प्रदान करते मुख्य अतिथि वेद व्यास।

क़मर मेवाड़ी को सम्मान प्रदान करते मुख्य अतिथि वेद व्यास।

राजसमन्द: गाँधी सेवा सदन राजसमन्द के संस्थापक, साहित्यकार, पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी एवं चिन्तक देवेन्द्र कर्णावट की पुण्यतिथि पर छठा देवेन्द्र स्मृति पुरस्कार वरिष्ठ साहित्यकार एवं ‘संबोधन’ त्रैमासिक के सम्पादक क़मर मेवाड़ी को प्रदान किया गया। उन्हें शाल, प्रशस्ति पत्र एवं 21000/- रुपये की राशि भेंट कर सम्‍मानित किया गया।

कार्यक्रम का संचालन डॉक्‍टर महेंद्र कर्णावट ने किया। मुख्य अतिथि  राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास थे। क़मर मेवाड़ी ने कई संस्मरण सुनाकर देवेन्द्र कर्णावट की यादों को ताज़ा किया।

इस अवसर पर मधुसूदन पंड्या, कर्नल देशबंधु आचार्य, माधव नागदा, गुणसागर कर्नावट, प्रफुल्ल बड़ोला, शेख अब्दुल हमीद, डूंगरसिंह कर्णावट, मधुसूदन व्यास, अफ़जल खाँ अफ़जल, किशन कबीरा और एम.डी. कनेरिया आदि उपस्थित रहे।

प्रस्‍तुति : ए. हुसैन 

अनवर सुहैल की कविताएं

anwar suhail

एक बार फिर

एक बार फिर
इकट्ठा हो रहीं वही ताकतें

एक बार फिर
सज रहे वैसे ही मंच

एक बार फिर
जुट रही भीड़
कुछ पा जाने की आस में
भूखे-नंगों की

एक बार फिर
सुनाई दे रहीं,
वही ध्वंसात्मक धुनें

एक बार फिर
गूँज रही फ़ौजी जूतों की थाप

एक बार फिर
थिरक रहे दंगाइयों, आतंकियों के पाँव

एक बार फिर
उठ रही लपटें
धुए से काला हो गया आकाश

एक बार फिर
गुम हुए जा रहे
शब्दकोष से अच्छे प्यारे शब्द

एक बार फिर
कवि निराश है, उदास है, हताश है…

तालिबान

जिसने जाना नही इस्लाम
वो है दरिंदा
वो है तालिबान…

सदियों से खड़े थे चुपचाप
बामियान में बुद्ध
उसे क्यों ध्वंस किया तालिबान

इस्लाम भी नहीं बदल पाया तुम्हें
ओ तालिबान
ले ली तुम्हारे विचारों ने
सुष्मिता बैनर्जी की जान….

कैसा है तुम्हारी व्यवस्था
ओ तालिबान!
जिसमे तनिक भी गुंजाइश नहीं
आलोचना की
तर्क की
असहमति की
विरोध की…

कैसी चाहते हो तुम दुनिया
कि जिसमें बम और बंदूकें हों
कि जिसमें गुस्सा और नफ़रत हो
कि जिसमें जहालत और गुलामी हो
कि जिसमें तुम रहो
और रह पायें तुम्हे मानने वाले…

मुझे बताओ
क्या यही सबक है इस्लाम का…?

भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी की हत्‍या की निंदा

सुष्मिता बनर्जी

सुष्मिता बनर्जी

नई दिल्‍ली : हम अफगानिस्तान में हुई भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी की हत्या की सख्त शब्दों में निंदा करते हैं। यह पूरे एशिया में मानवाधिकार, लोकतंत्र और आजादी पर बढ़ रहे हमले का ही एक उदाहरण है। इस हत्या ने सांप्रदायिक ताकतों और उनको शह देने वाले अमरीकन साम्राज्यवाद तथा नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकार के लिहाज से विफल सरकारों के खिलाफ एशिया के देशों में व्यापक जनउभार की जरूरत को फिर से एक बार सामने ला दिया है। हालांकि तालिबान ने इस हत्या में अपना हाथ होने से इनकार किया है, पर इस धार्मिककठमुल्लावादी संगठन, जिसे अमरीकन साम्राज्यवाद ने ही पाला-पोसा, का महिलाओं की आजादी और उनके मानवाधिकार को लेकर बहुत खराब रिकार्ड रहा है। इसने अतीत में भी अपने फरमान न मानने वाली महिलाओं की हत्या की है। यह हत्या अफगानिस्तान में काम कर रही भारतीय कंपनियों और भारतीय दूतावास पर होनेवाले तालिबानी हमलों से इसी मामले में भिन्न है।

सुष्मिता बनर्जी एक साहसी महिला थीं। उन्होंने अफगानिस्तान के व्‍यवसायी जाबांज खान से शादी की थी और 1989 में उनके साथ अफगानिस्तान गई थीं। उन्होंने खुद ही लिखा था कि तालिबान के अफगानिस्तान में प्रभावी होने से पहले तक उनकी जिंदगी ठीकठाक चल रही थी, लेकिन उसके बाद जिंदगी मुश्किल हो गई। वे जो दवाखाना चलाती थीं, तालिबान ने उसे बंद कर देने का फरमान सुनाया था और उन पर ‘कमजोर नैतिकता’ की महिला होने की तोहमत लगाई थी। सुष्मिता ने अफगानिस्तान में क्या महसूस किया और किस तरह वहां से भारत पहुंची, इसकी दास्तान उन्होंने 1995 में प्रकाशित अपनी किताब ‘ काबुलीवालार बंगाली बोऊ ‘ यानी ‘काबुलीवाला की बंगाली पत्नी’ में लिखा। इस किताब पर एक फिल्म भी बनी। हालांकि हाल ही में वे फिर अफगानिस्तान लौटीं और स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में अपना काम जारी रखा। अफगानिस्तान में सैयदा कमाला के नाम से जानी जाने वालीं सुष्मिता बनर्जी स्थानीय महिलाओं की जिंदगी की हकीकतों का अपने कैमरे के जरिए दस्तावेजीकरण का काम भी कर रही थीं। अफगानिस्तानी पुलिस के अनुसार पिछले बुधवार की रात उनके परिजनों को बंधक बनाकर कुछ नकाबपोश बंदूकधारियों ने उन्हें घर से बाहर निकाला और गोलियों से छलनी कर दिया।

हम इसे अफगानिस्तान की परिघटना मानकर चुप नहीं रह सकते, मध्यपूर्व के कई देशों में जहां सरकारों के खिलाफ बड़े-बड़े जनांदोलन उभर रहे हैं, वहां भी कट्टर सांप्रदायिक-धार्मिक शक्तियां और उनके साम्राज्यवादी आका अपनी सत्ता कायम रखने की कोशिशें कर रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप या दक्षिण एशिया में भी इस तरह की ताकतों ने सर उठा रखा है। तस्लीमा नसरीन को लगातार मौत की धमकियों के बीच जीना पड़ रहा है। आस्‍ट्रेलियन ईसाई मिशनरी के फादर स्‍टेंस की निर्मम हत्‍या भी भारत में ही हुई है।  विगत 20 अगस्‍त को अंधविश्‍वास विरोधी आंदोलन के जाने-माने नेतृत्‍वकर्ता डॉ.  नरेंद्र दाभोलकर की हत्‍या कर दी गई और दो हफ्ते से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभी तक उनके हत्‍यारे गिरफ्त में नहीं आए हैं। बांग्ला देश में 71 के युद्ध के दौरान कत्लेआम करने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ उभरे जनांदोलन में साथ देने वाले नौजवान ब्‍लागर्स की हत्या हो चुकी है। बाल ठाकरे की मौत के बाद बंद को लेकर फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली लड़की और उसे लाइक करने वाली उसकी दोस्त की गिरफ्तारी भी कोई अलग किस्म की परिघटना नहीं है। महज अफगानिस्तान में ही सरकार नागरिकों के जानमाल की सुरक्षा देने में विफल नहीं है, बल्कि भारत में भी यही हाल है। संप्रदाय विशेष से नफरत के आधार पर भारत में भी राजनीति और धर्म की सत्ताएं सामूहिक अंतरात्मा के तुष्टिकरण के खेल में रमी हुई हैं। इसका विरोध करने के बजाय तमाम शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की हरसंभव कोशिशों में लगी हैं। दलित मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध लेखक कंवल भारती पर समाजवादी पार्टी के एक मंत्री के इशारे पर सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का आरोप भी इसी तरह का एक उदाहरण है।

इसलिए सुष्मिता बनर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सांप्रदायिकता, पितृसत्‍ता और धार्मिक कठमुल्लापन की प्रवृत्ति को संरक्षण देने वाली राजनीति और उसकी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ साठगांठ के खिलाफ व्यापक जनचेतना संगठित की जाए। यह कठिन काम है, पर यह आज के वक्त में किसी भी समय से ज्यादा जरूरी काम है।

(सुधीर सुमन, राष्‍ट्रीय सह‍सचिव, जन संस्‍कृति मंच द्वारा जारी)

पूरे देश के लिए ‘अंधविश्‍वास निर्मूलन कानून’ बनाने की मांग

कार्यक्रम को संबोधित करते प्रेमपाल शर्मा। साथ में (बाएं से) प्रेम सिंह, सुबोध महंती और देवेंद्र मेवाड़ी।

कार्यक्रम को संबोधित करते प्रेमपाल शर्मा। साथ में (बाएं से) प्रेम सिंह, सुबोध महंती और देवेंद्र मेवाड़ी।

नई दिल्‍ली : ‘डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने पहली लड़ाई जाति के खिलाफ शुरू की थी। अंधविश्‍वास निर्मूलन के उनके अभियान में अमोल पालेकर और श्रीराम लागू जैसे लोग भी शामिल थे। वे पिछले कई वर्षों से महाराष्ट्र में अंधविश्‍वास विरोधी कानून बनवाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस कानून के मसौदे में 29 बार संशोधन किया गया, पर उनके जीते जी वह कानून पास नहीं हो पाया। जब उनकी हत्या हुई, तब संसद चल रही थी, पर किसी ने सांसद ने इसके खिलाफ कुछ नहीं कहा। तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना के मामले में हमारा समाज पीछे गया है। कर्मकांड, अंधविश्‍वास, अंधश्रद्धा, पाखंड हावी है। जनता को जिस तरह गुमराह किया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है। इस खतरे के खिलाफ संघर्ष करना उन सबका बड़ा दायित्व है, जो वैज्ञानिक चेतना संपन्न समाज चाहते हैं। बकौल पाश बीच का रास्ता नहीं होता। आज अंधविश्‍वास के कारोबार के खिलाफ कानून महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए जरूरी है।’ लेखक प्रेमपाल शर्मा ने गांधी शांति प्रतिष्ठान और मैत्री स्टडी सर्किल की ओर से 30 अगस्त को डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की स्मृति में आयोजित संगोष्ठी में ये विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी की शुरुआत में डॉ. दाभोलकर की स्मृति में एक मिनट का मौन रखा गया।

चर्चित विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने कहा कि विज्ञान के नाम पर जो पैसे खर्च हो रहे हैं,  उसका कितना सार्थक इस्तेमाल हो रहा है, इसके बारे में भी विचार करना चाहिए। इतने खर्च के बाद भी हम एक भी गांव या कस्बा ऐसा नहीं बना पाए हैं, जो ग्रहण, पशुबली और डायन जैसे अंधविश्‍वास से मुक्‍त हो। लोग लगभग ऐसी दशा में धकेल दिए गए हैं, जहां वे अपनी जिंदगी की हर उपलब्धि का श्रेय बाबाओं को दे रहे हैं।

वरिष्ठ वैज्ञानिक सुबोध मोहंती ने कहा कि वे डॉ. दाभोलकर के वैचारिक सहयात्री भी रहे। समझ में नहीं आता कि उनकी हत्या की निंदा किस भाषा में की जाए। जब गैलिलियो ने कहा था कि सूर्य घूम रहा है, तब भी उनका जबर्दस्त विरोध हुआ था। लेकिन आज वही सही हैं। अंधविश्‍वास और अवैज्ञानिकता फैलाने वाले आज तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन अंधविश्‍वास निर्मूलन के लिए इसका इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है। जबकि यह जरूरी है कि चमत्कार और अंधविश्‍वास के खिलाफ शुरू से ही स्कूलों में पढ़ाई हो। विज्ञान की पढ़ाई के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं पैदा हो जाता। हमें समाज में प्रश्‍न और तर्क करने के सिलसिले को बढ़ाना हो। वैज्ञानिक चेतना के निर्माण के संघर्ष में सभी वर्गों की भागीदार बनाना होगा। जनस्वास्थ्य के मोर्चे पर काम करना होगा, क्योंकि स्वास्थ्य के चक्कर में भी बहुत सारे लोग ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फंस जाते हैं।

गांधी एवं स्मृति दर्शन समिति की निदेशक मणिमाला ने कहा कि शोषण पर टिकी हर व्यवस्था अंधविश्‍वास पर टिकी होती है, सांप्रदायिक लोग अक्सर धार्मिक नहीं होते। बेरोजगारी और अस्वस्थता भी लोगों को अंधश्रद्धा के चंगुल में फंसाती है, उनसे अलगाव में रहकर हम लड़ाई को नहीं जीत सकते। गांधी जी खुद को सनातनी हिंदू कहते थे, पर कभी मंदिर नहीं गए, गए भी तो एक बार वाल्मीकि मंदिर गए।

सेवानिवृत प्रोफेसर जे.सी. खुराना ने कहा कि हमें धार्मिक सुधार चाहिए, धार्मिक नेता नहीं चाहिए। हमारे राजनीतिक नेतृत्व में बहुत गड़बडि़यां हैं, वे खुद ही अंधविश्‍वास से ग्रस्त होते हैं। आज अगर राजनीतिक नेतृत्व में गड़बड़ न होता, तो आसाराम जैसे किसी बाबा की हिम्मत नहीं होती कि वह पांच घंटे तक पुलिस का इंतजार करवाए। हमें आज अल्ट्रा रेशनल, अल्ट्रा मॉडर्न, अल्ट्रा सांइटिफिक समझ के लिए संघर्ष करना होगा।

समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि आजादी के दौरान भारतीय समाज के जो नेता थे, वे रेशनल नहीं थे, पर वक्‍त की जरूरत ने उन्हें सोशलिस्ट और समानतावादी बना रखा था। आजादी के बाद जिस तरह से अंधविश्‍वास के खिलाफ संघर्ष होना चाहिए था, नहीं हुआ। इसकी बुनियादी वजह धर्म है, जिसके साथ एक वर्ग के हित जुड़े होते हैं, जिसके लिए वह रूढि़वाद, असमानता को बढ़ावा देता है। सांप्रदायिकता और धर्म को अलगा कर नहीं देखा जाना चाहिए। सांप्रदायिकता के मूल में धर्म है। आज सत्ता की लड़ाई में धर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है। नवउदारवाद के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सारे क्षेत्रों में जो असुरक्षा बढ़ी है, उसने में अंधविश्‍वास के कारोबार के बढ़ने में अपनी भूमिका अदा की है।

कार्यक्रम में विचार व्यक्‍त करते सुधीर सुमन।

कार्यक्रम में विचार व्यक्‍त करते सुधीर सुमन।

सुधीर सुमन ने कहा कि इस देश में व्यक्तिगत तौर पर नास्तिक होकर जीना कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन जब हम शोषण, उत्पीड़न और भेदभाव पर आधारित सामाजिक या आर्थिक संबंधों को बदलने की कोशिश करते हैं, तब अंधविश्‍वास की संरक्षक सत्ताएं हमसे सीधे टकराती हैं। कोई भी अभियान जनता से दूर रहकर संचालित नहीं किया जा सकता। जनता अगर अपनी असुरक्षाओं और कठिनाइयों के कारण किसी ईश्वर या बाबा के शरण में जाती है, तो हमें उन वजहों पर भी विचार करना होगा, जो उसे उस ओर धकेलते हैं। हमें उन कारणों और स्थितियों को भी बदलने के लिए कठिन संघर्ष का हिस्सा बनना होगा, बल्कि जनता में जो धार्मिक सहिष्णुता और एक भिन्न किस्म की जो तर्कशीलता और आधुनिकता है, उसकी भी पहचान करनी होगी। मीडिया जिस तरह अवैज्ञानिक चीजों को प्रचारित प्रसारित करती है, उस पर भी सख्ती से अंकुश लगना चाहिए। ज्यादा खतरा उनसे है जो अंधविश्‍वास और अंधश्रद्धा के कारोबार के जरिए भक्तों के एक संगठित सांप्रदायिक गिरोह का निर्माण कर रहे हैं और खतरा उस राजनीति से है जो इसे संरक्षण देती है और प्रोत्साहित करती है। हमारे समय की समस्या यह है कि इस तरह के गिरोह ज्यादा संगठित हैं, पर जो खुद को वैज्ञानिक चेतना संपन्न समझते हैं, वे बिखरे हुए हैं, डॉ. दाभोलकर की हत्या ने इस जरूरत को सामने ला दिया है कि वे संगठित हों।

कवि राजेंद्र नटखट ने कहा कि हम पलायन करके नहीं बच सकते। धर्म और ईश्वर के नाम पर जनता को ठगने का जो कारोबार चल रहा है उसका जवाब देना होगा।

कवि श्याम सुशील ने कहा कि साहित्यकारों को अपनी भूमिका बढ़ानी होगी। खासकर बच्चों के लिए ऐसी पत्रिकाएं निकालनी होंगी, जिनमें अंधविश्‍वास विरोधी सामग्री हो।

अनुराग ने भी कहा कि किताबें लड़ाई का साधन हैं, लेखकों को अंधविश्‍वासविरोधी विचारों के साथ जनता के बीच जाना होगा। उपेंद्र सत्यार्थी ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त करना बेहद जरूरी है, क्योंकि उस दौर में हमारा जो सामाजीकरण होता है, वह पूरे जीवन को प्रभावित करता है।

पत्रकार तेजपाल सिंह ने बताया कि किस तरह ज्योतिष के नाम पर फर्जी धंधा होता है, कि किस तरह भविष्यफल बताने वाली किताब लिखने के लिए एक प्रकाशक ने उन्हें पचास हजार रुपये दिए, और उस वक्त पैसे की बेहद जरूरत के कारण उन्होंने वह काम किया।

संगोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ. प्रेम सिंह ने कहा कि हमें तमाम राज्य सरकारों और संसद से यह मांग करनी चाहिए कि वह पूरे देश के लिए अंधविश्‍वासविरोधी कानून बनाएं। निःस्वार्थ भाव से अंधविश्‍वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले डॉ. दाभोलकर जैसे योद्धा की मौत बेकार न हो और आगे से ऐसा न हो, हमें यह तय करना होगा।

हमें एक रेशनल सोसाइटी बनाना होगा। मीडिया में अंधविश्‍वास का जो कारोबार चल रहा है, उस पर अंकुश लगाने के लिए भी संघर्ष करना होगा। वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्ष मानसिकता वाले तमाम लोगों के बीच संवाद को तेज करना होगा।

पूरे देश के लिए ‘अंधविश्वास निर्मूलन कानून’ बनाया जाए, इसके लिए संघर्ष चलाने का प्रस्ताव भी इस संगोष्ठी में लिया गया।