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अधूरी आजादी : अनुराग

parliment house

देश की आजादी को 66 साल हो गए हैं, लेकि‍न हर बार की तरह इस बार भी सवाल सामने है कि‍ क्‍या हम सही अर्थों में आजाद हैं? क्‍या एक आजादी मुल्‍क की यह ही दशा और दि‍शा होनी चाहि‍ए जो आज भारत, माफ कीजि‍ए इंडि‍या की है? वि‍संगति‍यां हर व्‍यवस्‍था में होती हैं, लेकि‍न भारत में जैसा हाल लोकतंत्र का है शायद ही कहीं और हो। दुनि‍या भर में छोटे-छोटे मुल्‍क अपने बलबूते आगे बढ़ना का प्रयास कर रहे हैं, लेकि‍न यहां की स्‍थि‍ति‍यों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि‍ पक्ष, वि‍पक्ष, नौकरशाह या आम जनता में ही ऐसी कोई ललक है। वि‍संगति‍यां लगातार बढ़़ती ही जा रही हैं। पक्ष सत्‍ता के नशे में मदमस्‍त है और वि‍पक्ष इस जुगत में लगा रहता है कि‍ कैसे सत्‍ता हथि‍याई जाए। दोनों के लि‍ए सत्‍ता पर काबि‍ज रहना-होना अहम है। जि‍स आम आदमी के नाम पर यह सब हो रहा है, वह केवल चुनाव के दौरान माई-बाप होता है अन्‍यथा उसकी कि‍सी को चिंता नहीं है।

कुपोषण से मरने वाले बच्‍चे, स्‍कूल से वंचि‍त रह जाने वाले बच्‍चे, बच्‍चों की तस्‍करी और उनका यौन शोषण के आंकड़ों से ही कि‍सी का भी सि‍र शर्म से झुका सकते हैं। हम पूरे देश को साक्षर भी नहीं कर पाए हैं। कि‍सान आज भी परेशान होकर आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हैं। हर साल बाढ़ और सूखे से भारी जान-माल का नुकसान हो रहा है। लेकि‍न हम 21वीं सदी और न जाने क्‍या-क्‍या नारे उछालकर भ्रम में जी रहे हैं। हमारे लि‍ए वि‍कास देश की राजधानी और प्रदेश की राजधानि‍यों में और उनके आसपास रह रहे चंद लोगों के लि‍ए सुख-सुवि‍धाएं जुटाना भर है।

इससे शर्मनाक बात क्‍या हो सकती है कि‍ हम भाषा जैसे मसले का समाधान नहीं कर पाए हैं। भारत संभवत: दुनि‍या का एक मात्र देश है जहां अपनी भाषा के वि‍कास के नाम हर वर्ष करोड़ों-अरबों रुपये बहा दि‍ए जाते हैं और भाषा दि‍वस, सप्‍ताह और पखवाड़ा मनाया जाता हो। इन सब कर्मकांडों के बावजूद स्‍कूल-कॉलजों से ही नहीं, प्राथमि‍क शि‍क्षा से भी अपनी भाषा को बेदखल कि‍या जा रहा है। ऐसी उलटबांसी हो रही हो तो लोकतंत्र पर सवाल उठेंगे ही।

देश में भ्रष्‍टाचार, गरीबी, जाति‍वाद, क्षेत्रवाद, कुपोषण जैसी इतनी समस्‍याएं है कि‍ सबको गि‍नना भी एक समस्‍या है। ये ऐसी समस्‍याएं हैं जि‍नका समाधान संभव है। जरूरत है तो राजनीति‍क इच्‍छा शक्‍ति‍ की और सत्‍ता का मोह छोड़कर कठोर कदम उठाने की। लोगों को भी जन हि‍त में नि‍जी स्‍वार्थों को छोड़ना होगा। लेकि‍न कोई उम्‍मीद की कि‍रण फि‍लहाल दि‍खाई नहीं देती।

देश की समस्‍याओं का समाधान करने के लि‍ए कोई राजनेता दृढ़ संकल्‍प नहीं दि‍खता। उल्‍टा राजनेता इतने असहि‍ष्‍णु हो गए हैं कि‍ उनके कार्यकलापों को लेकर जरा सी स्‍वस्‍थ आलोचना भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहे हैं। आए दि‍न आलोचना करने वाले के खि‍लाफ मुकदमा दर्ज करने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इन राजनेताओं को लोकतंत्र में वि‍श्‍वास है, इस पर संशय होने लगा है। यह कैसे लोकतंत्र है जि‍समें अंधे, गुंगे, बहरों को दरकार है, जो कुछ देखें नहीं, बोले नहीं और सुने भी नहीं। क्‍या इसी के लि‍ए शहीदों ने कुर्बानि‍यों दीं कि‍ लोगों को अपनी बात कहने तक का हक न हो? क्‍या केवल सत्‍ता हस्‍तांतरण ही उनका मकसद था?

लोकसभा, राज्‍यसभा और प्रदेशों की वि‍धानसभाओं में पक्ष-वि‍पक्षा का हंगामा कोई नई बात नहीं रह गई है। हालत की गंभीरता इससे पता चलते है कि‍ हाल ही में राज्‍यसभा में लगातार हंगामे से क्षुब्‍ध सभापति‍ हामि‍द अंसारी को कहना पड़ा कि‍ नि‍यम पुस्‍ति‍का में लि‍खे हर नि‍यमों को तोड़ा जा रहा है। क्‍या सदन को फेडरेशन ऑफ एनार्किस्‍ट (अराजक तत्‍वों का महासंघ) बनाना चाहते हैं।

सभापति‍ के कथन में सच्‍चाई है। उच्‍च सदनों में ही नहीं, बाहर भी अराजकता का माहौल है। अपने राजनीति‍क आकाओं को देखकर लोग भी अराजक और दायि‍त्‍वहीन हो गए हैं। क्‍या अपने दायि‍त्‍वों को को न नि‍भाकर इस राजनीति‍क आजादी को भी लंबे समय तक कायम रख पाएंगे।