Archive for: August 2013

किताबों की दुनिया : अनुराग

book fair

दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे दिल्‍ली पुस्तक मेले में लोगों, विशेषकर बच्चों का बड़ी संख्‍या में आना संतोषजनक है। यह इस बात का प्रमाण है कि सूचना क्रांति और कई तरह की आशंकाएं व्यक्‍त किए जाने के बाद भी किताबों का जादू बरकरार है और लोग किताबें खरीदना चाहते हैं। दिल्ली में हर साल इस तरह के दो आयोजन हो रहे हैं। एक विश्‍व पुस्तक मेला और दूसरा दिल्ली सरकार का पुस्तक मेला। दोनों पुस्तकों मेलों में बड़ी संख्‍या में पुस्तक प्रेमी पहुँचते हैं। ये पुस्तक प्रेमी दिल्ली या आसपास के क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी आते हैं। इस तरह के आयोजनों में पुस्तक प्रेमियों के बड़ी संख्‍या में आने का प्रमुख कारण एक ही जगह पर सभी प्रमुख प्रकाशकों का मिल जाना है। इनमें हिंदी और अंग्रेजी के साथ ही अन्य  भाषाओं के प्रकाशक भी होते हैं। इससे उन्हें अपनी पसंद की पुस्तकों को ढूंढ़ने में सुविधा होती है और नए प्रकाशनों के बारे में भी जानकारी मिल जाती है। फिर क्यों न इस सुविधा को और सुलभ बनाया जाए। यानी की इस तरह के आयोजनों की संख्‍या बढ़ा दी जाए,  भले ही उनका स्वरूप इन बडे़ आयोजनों से बहुत छोटा हो। दिल्ली सरकार ऐसी योजना बना सकती है कि हर सप्ताह किसी एक विधानसभा में इस तरह का आयोजन हो और यह दौर पूरे साल चलता रहे। जो लोग व बच्चे साहित्यिक किताबें नहीं पढ़ते, यदि उनके समाने बार-बार पुस्तक मेले जैसे आयोजन होंगे तो अवश्य ही उनमें रुचि उत्पन्न होगी और निश्चित तौर से इससे एक बेहतर समाज बनाने में मदद मिलेगी।

इस तरह के आयोजन अन्य राज्य सरकारों को भी अपने यहाँ करने चाहिए। जितना बड़ा राज्य, उतने अधिक आयोजन। गांवों और कस्‍बों तक के स्‍तर पर आयोजन हों, इस बार इस गाँव में तो अगली बार उस गाँव में। साल में कम से कम बार उस क्षेत्र में आयोजन हो। यह सही है कि इस तरह के आयोजनों से अधिक राजस्व नहीं कमाया जा सकता, लेकिन क्या शासन का दायित्व केवल उन्हीं योजनाओं को चलाना है, जिनसे अधिक से अधिक राजस्व कमाया जा सकता हो। अनुमान है कि इस तरह का आयोजन बार-बार होने से लोगों में पढऩे की रुचि उत्पन्न हो गई तो ये आयोजन घाटे का सौदा नहीं रहेंगे। और फिर सरकारें जनहित में बहुत-सी योजनाएं चलाती हैं। उनमें पुस्तक मेले जैसे कार्यक्रमों को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। क्या लोगों का मानसिक व बौद्धिक स्तर सुधारना सरकारों का दायित्व नहीं है? क्या इसके लिए लोगों को किताबों से जोडऩे से सस्ता और अच्छा उपाय कोई और हो सकता है?

साहित्यिक पुस्तकों का व्यवसाय, विशेषकर हिंदी व्यवसाय शार्टकट को अपना, सरकारी खरीद पर निर्भर हो गया है। इससे हर साल हजारों पुस्तकों के प्रकाशन से यह व्यवसाय  भले ही करोड़ों में पहुँच गया हो, लेकिन आम लोगों से पुस्तकें दूर हो रही हैं। अन्य क्षेत्रों की तरह यहाँ भी रिश्‍वतखोरी से किताबों की सरकारी खरीद का आदेश ले लिया जाता है। इससे न लेखक का भला है और न पाठक का। फायदा उठाते हैं रिश्वतखोर अधिकारी

और प्रकाशक। पुस्तक मेले जैसे आयोजन अधिक होने से पाठक और पुस्तक के बीच की दूरी कम होगी और छोटे प्रकाशकों को  भी खुद को पाठक के सामने रखने का मौका होगा। पाठकों को  भी अपने पसंद के लेखक और विषय की पुस्तक खरीदने की सुविधा होगी।

लेखक अपनी बात पाठक तक पहुँचाने के लिए लिखता है। लेकिन जब सरकारी खरीद के शार्टकट के कारण किताबें लोगों तक ही नहीं पहुँच पा रही है तो फिर उनके लिखने का औचित्य ही क्या रह जाता है। लेखकों को मिलकर केंद्र व राज्य सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए कि पुस्तक मेले से आयोजन की संख्‍या बढ़ाई जाए और जहाँ इस तरह के आयोजन नहीं होते हैं, वहाँ शुरू किए जाएं। यह लेखक, पाठक, प्रकाशक और जन हित में है।

नरेन्द्र दाभोलकर- जादू-टौने के खिलाफ युद्ध : प्रेमपाल शर्मा

 

नरेन्‍द्र दाभोलकर

नरेन्‍द्र दाभोलकर

डॉक्‍टर नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या पूरे देश के लिए शर्मनाक कही जा सकती है। पेशे से डॉक्‍टर महाराष्‍ट्र निवासी यह शख्‍स पिछले चालीस वर्षों से समाज में व्‍याप्‍त अंधविश्‍वासों और कुरीतियों के खिलाफ लड़ रहा था। समाज को इन बुराइयों से मुक्‍ति‍ के लिए उनकी निष्‍ठा देखिए कि उन्‍होंने अपना डॉक्‍टरी का पेशा भी छोड़ दिया था। पिछले 15 वर्षों से वे महाराष्‍ट्र सरकार से ‘अंधविश्‍वास निर्मूलन कानून’ बनाने के लिए आग्रह कर रहे थे, जिससे कि जादू-टोने और तंत्र-मंत्र के बहाने धर्म की आड़ में धंधा करने वालों पर रोक लगाई जा सके। महाराष्‍ट्र के कई शहरों में फैले उनके छोटे-छोटे संगठन जमीनी स्‍तर पर वैज्ञानिक चेतना फैलाने के अभियान में जुटे थे। अपनी बात को फैलाने के लिए एक मराठी साप्‍ताहिक ‘साधना’ का भी संपादन कर रहे थे, जिसके हर अंक में पूरी प्रमाणिकता के साथ उन अंधविश्‍वासों की पोल खोली जाती थी । जाहिर-सी बात है कि ऐसे कानून आने से जिन पंडे, पुजारी, मुल्‍लाओं या राजनेताओं के धंधे बंद हो जाते उन सबकी आँखों की किरकिरी डॉ. नरेन्‍द्र बन गए थे। पिछले कुछ दिनों से वे जादुई रत्‍नों, पत्‍थरों से जनता को ठगने वालों के खिलाफ मुहिम में जुटे थे । सारी समस्‍याओं के समाधान के लिए रत्‍न, पत्‍थर के ताबीज, अँगूठी बेचने वाला यह कारोबार करोड़ों का है। इसीलिए अंतत: उनकी सरेआम गोली मारकर हत्‍या कर दी गई।

लेकिन डॉ. नरेन्‍द्र की शहादत खाली नहीं गई है । अगले ही दिन जो महाराष्‍ट्र सरकार वर्षों से उस बिल को लटकाए हुए थी, उसके मंत्रिमंडल ने उसे लागू करने की सहमति दे दी है । शहादत के अगले  दिन पूना भी बंद रहा और महाराष्‍ट्र के कई शहरों से डॉ. नरेन्‍द्र के समर्थन में आवाजें उठीं । दिल्‍ली और दूसरे शहरों के बुद्धिजीवी और उनके भी वक्‍तव्‍य डॉ. नरेन्‍द्र के समर्थन में आए हैं और लगातार आ रहे हैं ।

डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर की मौत ने एक साथ ऐसे कई राष्‍ट्रीय प्रश्‍न उठाए हैं जिनसे पूरा भारतीय समाज ग्रसित है। भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा संविधान में वैज्ञानिक सोच के कार्यान्‍वयन के बावजूद मौजूदा समाज और शिक्षा व्‍यवस्‍था का ढॉंचा ऐसा रहा है कि जिसमें ऐसे अंधविश्‍वास और अवैज्ञानिकता लगातार बढ़ती रही है। यदि कहा जाए कि जो समाज जितना इन अंधविश्‍वासों में डूबा हुआ है, वह उतना ही पिछड़ा, धर्मांध, जातिवादी और अविकसित है। बिहार, उत्‍तर प्रदेश व हिंदी प्रांतों की तुलना में तो महाराष्‍ट्र कहीं ज्‍यादा सजग है और आगे है। वह चाहे स्‍त्री की आजादी हो, लिंग अनुपात हो या साक्षरता और दूसरे पक्ष। इसका बहुत बड़ा कारण महाराष्‍ट्र उन राज्‍यों में से है जो एक समय धर्म और ब्राह्मणवाद की ऐसी चपेट में था जिससे पूरा समाज सिसक रहा था। इसीलिए ज्‍योतिबा फुले, राणाडे, साहूजी महाराज, अम्‍बेडकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और नेता यहीं पैदा हुए और इनकी आवाज पूरे देश में भी फैली।

दुखद पक्ष के साथ-साथ फिर महाराष्‍ट्र राज्‍य ने नरेन्‍द्र दाभोलकर की शहादत के बहाने भारतीय समाज में जादू टौने से मुक्ति की एक नई उम्‍मीद जगाई है। विशेषकर हिन्‍दी पट्टी के राज्‍यों को तो युद्धस्‍तर पर इन अंधविश्‍वासों के खिलाफ लड़ने की जरूरत है। मैं रोजाना की जिंदगी से कुछ अनुभवों के सहारे अपनी बात कहना चाहूंगा:-

पिछले वर्ष आपने निर्मल बाबा के कारनामे सुने थे। आपने उनका अंदाज देखा होगा कि कैसे ऐसे बाबा लोगों को मूर्ख बनाते हैं। कोई पुत्र के लिए तो कोई पति के प्रमोशन के लिए तो कोई बेटे को विदेश भेजने के लिए बाबा के सामने हाथ जोड़े खड़ा होता था। बाबा की सलाहों को भी याद कीजिए। किसी को बताते थे कि गोल-गप्‍पे खाओ तो किसी को अमुक मंदिर जाने की सलाह। या शताब्‍दी में यात्रा करो तो आपका बिजनेस भी उसी रफ्तार से दौड़ने लगेगा। ये सभी चेहरे शिक्षित खाए-पीए वर्ग से थे। तो गाँव, देहातों के गरीबों को ऐसे ही बाबाओं, मुल्‍लाओं के दूसरे अवतार मूर्ख बना रहे हैं और पैसा भी ऐठ रहे हैं। कभी-कभी तो ये जान भी ले लेते हैं। एक बच्‍चे को साँप ने काट खाया बजाय डॉक्‍टर के पास ले जाने के पड़ोस के बाबा के मंत्र गूँजने लगे। बच्‍चा खत्‍म हो गया। अगर आप संवेदनशील हैं और समाज को बदलने का जज्‍बा भी रखते हैं तो आप का गुस्‍सा वैसा ही हो सकता है, जैसा नरेन्‍द्र दाभोलकर को था। आँकड़ों पर यकीन करें तो साँप काटने से ही इस देश में हजारों की मौतें हो जाती हैं।

एक घटना दिल्‍ली स्थित सरकारी कायार्लय की । ऐसी घटनाएं सुनकर इक्‍कीसवीं सदी में सिर शर्म से झुक जाता है । सरकार की कुर्सी किसे प्‍यारी नहीं है। लेकिन सरकारी कर्मचारी चाहता है वह और उसकी कुर्सी अमर हो जाए । पहले रिटायरमेंट की उम्र अट्ठावन वर्ष थी । वर्ष 1998 में साठ हो गई । अब भी जब-तब बासठ तक करने की बात खाली-पीली बैठे हुऐ मंत्रालयों के बाबू करते रहते हैं । क्‍या कभी कामवाली, सफाई कर्मचारी, सब्‍जी बेचने वाले या रिक्‍शे वाले से रिटायरमेंट जैसे शब्‍द सुने हैं ? संक्षेप में दास्‍ताँ यह कि नीचे से ऊपर तक वातानुकूलित उस भव्‍य मंत्रालय के एक कमरे में दफ्तर खुलते ही चुपके-चुपके रोज हवन होने लगा । हवन कर्ता मंत्रालय के ही एक एम.बी.बी.एस. डॉक्‍टर थे । उनका मुखिया भी रिटायर हो रहे थे और यह डॉक्‍टर भी। उन्‍हें किसी ने सलाह दी कि हवन करने से केबिनेट से मंजूरी हो सकती है। हाय रे ये देश, इसके एम.बी.बी.एस. डॉक्‍टर और सरकारी मंत्रालय। प्रोफेसर इम्तियाज अहमद ने एक भाषण में ठीक ही कहा था- ‘संविधान तो हमने सैक्‍यूलर, वैज्ञानिक बना दिया, समाज को वैसा दूर-दूर तक नहीं बना पाये।’

एक और अनुभव- उस भव्‍य मंत्रालय में जैसे ही नया अफसर किसी कमरे में आता या जाता है तो कोई मेज को वास्‍तुशास्‍त्र के हिसाब से पश्चिम की तरफ करता तो कोई पूर्व की ओर। कोई फैंगसूई लटकाता है तो कोई अमुक रंग के फूल की मांग करता है। खर्च तो प्रशासन को ही भुगतना पड़ेगा और इसी के चलते न तो छत्‍तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए पैसा बचता, न पहाड़ों पर रेल बिछाने के लिए। क्‍या वक्‍त और संसाधनों की यह बरबादी ऐसे अतार्किक, अवैज्ञानिक सोच का ही परिणाम नहीं है?

अनुभव बताता है कि राजनेताओं के भरोसे इस समस्‍या को नहीं छोड़ा जा सकता। संसद में ऐसी बातों पर चर्चा नहीं होती । संसद निर्मल बाबा पर भी चुप रहती है, भविष्‍य बताने वाली तीन देवियों पर भी और मीडिया के खिलाफ भी। क्‍योंकि उन सबके अपने-अपने बाबा हैं । कोई पेड़ पर रह रहे देवराह बाबा का पंजा चूमता है तो कोई साईं बाबा का। खोज-खोज कर पहाड़ों में छिपे बाबाओं के साथ तस्‍वीर खिंचवाते हैं। इलेक्‍शन से पहले भी और इलेक्‍शन के बाद भी। विज्ञान ने कंप्‍यूटर का आविष्‍कार किया लेकिन हमारे राजनेताओं और पिछले दिनों हार्बर्ड, इंग्‍लैंड और आई.आई.एम. से पढ़े हुए नौजवानों ने साथ मिलकर उन कंप्‍यूटरों का इस्‍तेमाल क्षेत्रवार, जातियों, धर्मों के आंकड़ों के लिए किया है । न्‍यायमूर्ति काटजु यह बात पूरे जोरों से उठा रहे हैं कि ऐसी ‘सोच के चलते हम जाति और धर्म की जकड़न से कभी मुक्‍त नहीं हो सकते। अगर वैज्ञानिक सोच नहीं हुई तो क्‍या पूरा लोकतंत्र ही खतरे में नहीं है ?’

यदि महाराष्‍ट्र के राज्‍य में ‘अंधविश्‍वास निर्मूलन कानून’ बनने वाला है तो यह उत्‍तर भारत के लिए और भी जरूरी है और सोचें तो पूरे देश के लिए क्‍यों नहीं? क्‍यों संसद चुप रही इस मुद्दे पर? एक तीखी टिप्‍पणी यह आई कि उत्‍तर भारत के बुद्धिजीवी और नेता इस हत्‍या के खिलाफ वक्‍तव्‍य तो दे देंगे लेकिन अपने जीवन में उन्‍हें कौन लागू करेगा? नरेन्‍द्र दाभोलकर की शहादत को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सभी ऐसे अंधविश्‍वासों के खिलाफ लड़ें और वैज्ञानिक चेतना को फैलाने में जी-जान से जुट जाएं। खंड-खंड में धर्म और जाति में विभाजित समाज की मुक्ति भी इसी रास्‍ते से ही संभव है।

वेटिंग रूम: हरीशचंद्र पाण्डे

हरीशचंद्र पाण्डे

हरीशचंद्र पाण्डे

यह किसी का घर नहीं था। सबको यहाँ अनचाहा समय काटना था। यह जानते हुए भी कि ट्रेनों के चरित्र को देखते हुए उन्हें लेट होना ही होना है, सभी को निर्धारित समय पर यहाँ पहुँचना था। लेकिन यहाँ इकट्ठा सभी लोग यात्री ही हों, ऐसा नहीं। कुछ बाहर के भी हैं। कुछ को नहाना-धोना-कपडे़ बदलना था। कुछ को हल्का होना था। वेटिंग रूम के गेट से ही सटा-सटा गेटकीपट बैठा था। वह ऐसे जरूरतमंदों से टॉयलेट में जाने के पैसे वसूल रहा था जो टिकट के हिसाब से यहाँ के टॉयलेट में जाने के हकदार नहीं थे। उसकी वसूली में कोई शर्मिंदगी या झिझक नहीं थी, बल्कि वीरोचित उत्साह से पैसे माँग रहा था। उसके पास सर्वेक्षण की गहन दृष्टि थी जिससे वह फोकटियों को घुसते-घुसते पहचान कर टोक देता था। उनके चेहरे से ही नहीं, कभी पैंट के पांयचे देखकर, कभी चप्पल-जूता, कभी बैल्ट या कमीज का कॉलर देखकर। जितने भी तरह के लोग हो सकते हैं, उनकी एक बानगी अभी यहाँ पर देखी जा सकती थी। एक सज्जन दार्शनिक से थे। दाढ़ी पर बात-बात पर हाथ फेर रहे थे। उनकी दाढ़ी में अटकी जैसी कोई चीज दिख नहीं रही थी, फिर भी वे हर बार हाथ फेरने के बाद कुछ मसल-सा रहे थे। उनके अलग-बगल कोई बैठा हुआ नहीं था, फिर भी वे बोल रहे थे।

और ये राजकुमार…। लगता है कल ही बॉलीवुड से लौटे हैं। सीट होते हुए भी टहल रहे हैं। इनके कान और मुँह एक मोबाइल में बुरी तरह बिजी हैं और आँखें एकदम फुरसत में और खाली।… एक अधेड़ झुंड ने कोने की कई कुर्सियां एक साथ हथिया रखी हैं। इनकी बातचीत और खुली हुई किताबों से लग रहा है, ये विभागीय परीक्षा देने वालों का झुंड है। शायद ये लोग रिटायरमेंट के पहले एक प्रमोशन चाह रहे हों।

छोटी-छोटी, मंद स्वर की बातचीतों के कई झुंड हैं, जीवंतता है।

उधर औरतें एक-दूसरे को आपादमस्तक देख रही हैं। उनके परिधानों को पैसे में बदलकर तोल रही हैं। एक औरत की निगाह एक दूसरी औरत के झुमके पर काफी देर से अटकी झूल रही है। उसी झुमके पर एक आदमी की निगाह भी झूल रही है। झुमका है कि दोहरे भार से लदा-फदा झूम रहा है। लोग आ रहे हैं-जा रहे हैं-आ रहे हैं। अपनी-अपनी यात्राएं हैं, अपनी-अपनी देरियां और समय काटने की अपनी युक्तियां। पर चहल-पहल है, उत्सव जैसी। दूसरों के मामलों में लोग बहुत दूर तक नहीं जा रहे हैं। कह सकते हैं, तटस्थों का एक उत्सव है।

पर सबमें एक सहमापर है…। पता नहीं कब, कौन, क्या उठा ले जाए। सभी असुरक्षित से हैं। यहाँ तक कि राजधानी से लौटा विधायक जी का वह चमचा भी जो सारे दाँव-पेंच के बीच विधायक जी को मंत्री पद दिलवाकर आया है। उसकी अटैची पर जाने कितने लोगों की निगाहें हैं। लोगों के हाथ खुद-ब-खुद बगल में रखे सामान की ओर चले जाते हैं।

बाथरूम में घुसने वालों की एक लाइन है। एक निकला है तो पाँच-छ उसकी जगह भरने को तैयार खड़े हैं। कोई नहाने के बाद चंपी कर रहा है, कोई नहाने से पहले। एक तिरछी निगाह से दूसरे को देख रहा है, एक सीधे निगाहें गड़ाकर। और एक शीशे के परावर्तन में। देखना, हँसना, बोलना, टहलना, ये सब यहाँ के अस्थाई भाव हैं…। स्थाई भाव केवल असुरक्षा भाव है। और ऐसे में अकेला आदमी सबसे अधिक परेशान है। वह इस भीड़ में एक अदद ईमानदार चेहरा ढूँढ़ रहा है। डरते-डरते एक आदमी ने एक ईमानदार चेहरा चिन्हित किया है, वह उसे सहेज कर बाथरूम में चला गया है। वह तन से भीतर है, मन से बाहर।

पर वह आदमी जो अभी-अभी नहाकर निकला है, एकदम बेपरवाह लगता है। उसके द्वारा बाहर अकेले में छोड़ दिए गए कपड़ों को कोई और नहीं, उसका आत्मविश्‍वास और उसकी निर्भयता देख रही थी। वह केवल एक तौलिया लपेटे हुए था, ऊपर नंगे बदन। बदन से वह दारासिंह सा था तो मूंछों से चंद्रशेखर आजाद सा। उसकी बांह की मछलियों को एक गंडे ने कस रखा था। कुर्सी पर बैठते ही उसने अपने बैग से शीशी निकाली और फिर बदन की मालिश करने लगा। जमकर मालिश करने के बाद उसने बनियान पहन ली। उसके बदन के सौष्ठव पर एक झीना सा परदा तो पड़ा ही, पर आसपास बैठे कई लोगों को भी राहत सी मिली। फिर भी लोग इस भय व संदेह भरे वातावरण के बीच उस निश्‍चि‍न्त आदमी को देखने से अपने को रोक नहीं पा रहे थे। फिर उस बेफिक्र आदमी ने बैग से निकालकर कमीज पहनी जो पुलिस की निकली। अचानक वहां बैठे लोगां को उसकी निर्भयता का राज पता चल गया। उस आदमी ने, जो अब साधारण आदमी सा नहीं रह गया था, गले के पास के दो बटन छोड़कर कमीज के शेष बटन लगा लिए थे। फिर उसने पैंट निकालकर पहनी जो पुलिस की ही होनी थी और फिर चौड़ी बैल्ट पहन ली- कसकर। अब वह आदमी पूरा पुलिसमैन था। इस समय वह वहाँ का सबसे सुरक्षित, निर्भय और रौबदार आदमी था। उसी ड्रैस में मुस्तैद वह कुर्सी पर बैठ गया और मूंछों पर हाथ फेरने लगा।

यहाँ से कहाँ जाएगा वह…। लोग अलग-अलग तरह से सोचने को स्वतंत्र थे। कुछ भी सोचा जा सकता था।…. वह किसी कोर्ट-कचहरी में पेश होने आया है बाहर से। कभी यहाँ पोस्टिंग रही हो…कोई मुठभेड़ अब फर्जी मुठभेड़ में बदल गई हो… कि‍सी दंगे के समय हुई लूटपाट में उसका भी शामि‍ल होना पाया गया हो…. कि‍सी कैदी को भाग जाने देने में उसका भी हाथ रहा हो… कि‍सी हत्या को आत्महत्या में बदलने में मदद की हो… या सीधे-सीधे रि‍श्‍वत ली हो। यहाँ से बाहर नि‍कलते ही इसका असली रूप उजागर होने लग जाएगा। इस बीच फि‍र उसका हाथ बैग के भीतर गया और झटके से बाहर आ गया। उसकी मुट्ठी में रुद्राक्ष की माला थी जि‍से उसने बि‍ना समय गंवाए अपने नेत्रों से छुआया और बि‍ना एक पल गंवाए सि‍र में डालते हुए कमीज के दोनों खुले बटनों के भीतर धकेल दि‍या। अचानक ही लोगों की सोच उसके बारे में बदल गई थी। सबसे नि‍श्‍चि‍न्‍त, सबसे सुरक्षि‍त लगने वाला आदमी ही उन्हें अब सबसे असुरक्षि‍त लगने लगा था। अपने से भी ज्यादा असुरक्षि‍त।

चारों ओर नजर डालते हुए वह तुरंत ही खड़ा हो गया था। उसे जाना है। शायद वह सबसे खूँखार शूटर को पकड़ने जा रहा है।… शायद वह कि‍सी बि‍छी हुई सुरंग के ऊपर से गुजरने वाला है।

शायद उसके लौटने की गारंटी देने वाला कोई नहीं है।

बहरहाल अभी वह लोगों को नि‍गाह में वेटिंग रूम का सबसे असुरक्षि‍त आदमी है।

आजाद हिन्दुस्तान के शहीदों में गिने जाएंगे डा. दाभोलकर

नरेन्द्र दाभोलकर

नरेन्द्र दाभोलकर

नई दिल्ली : 20  अगस्त, मंगलवार को पुणे में मार्निंग वाक पर निकले मशहूर अंधविश्‍वास-विरोधी, तर्कनिष्ठ और विवेकवादी आन्दोलनकर्ता डा. नरेन्द्र दाभोलकर की अज्ञात अपराधियों ने हत्‍या कर दी। डा. दाभोलकर लम्बे समय से समाज में अंध-आस्था की तिजारत और राजनीति करनेवालों के निशाने पर रहे। डा. दाभोलकर की जिस दिन हत्‍या हुई, उसी दिन वे पर्यावरण की दृष्टि से हानिरहित गणेश प्रतिमाओं के आगामी त्योहारों के समय प्रयोग के लिए प्रेसवार्ता करनेवाले थे। दाभोलकर लम्बे समय से महाराष्ट्र विधानसभा में अंधवि‍श्‍वास और काला-जादू विरोधी विधेयक को पास करके क़ानून बनवाने के लिए प्रयासरत थे, जिसका भारी विरोध कई तरह के साम्प्रदायिक संगठन कर रहे थे, हालांकि शिवसेना और भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दल इस विधेयक के पक्ष में थे। उनकी हत्‍या के बाद अचानक जागी पुलिस हाल के दिनों में उन्हें ‘सनातन प्रभात’ और ‘हिन्दू जन जागृति समिति’ जैसे संगठनों  से मिल रही धमकियों के आरोपों की जाँच कर रही है। उनकी ह्त्या काफी सुनियोजित थी क्योंकि हत्यारों को पता था कि पुणे में वह प्रायः सप्ताह के दो दिन यानी सोमवार और मंगलवार को ही रहते हैं।

डा. दाभोलकर (65) सतारा जिले में एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा हुआ था। पेशे से वह डाक्टर थे और लगभग 10 साल डाक्टरी पेशे में काम करने के बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक चेतना निर्माण और परिवर्तन के लक्ष्य को समर्पित कर दिया। समाजवादी नेता बाबा अढाव के साथ ‘एक गाँव, एक कुंआ’ आन्दोलन में  उन्होंने 1983 से काम करना शुरू किया और 1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंध-श्रद्धा निर्मूलन समिति का निर्माण किया।  दाभोलकर तांत्रिकों, बाबाओं, चमत्कार से रोग दूर करने का दावा करनेवाले धोखेबाजों और तमाम पिछड़ी हुई धर्मानुमोदित प्रथाओं के खिलाफ आन्दोलन को स्कूलों, कालेजों और गाँव-गाँव तक ले गए। पिछले 30 वर्षों से वह लगातार ऐसे तत्वों से जूझते तथा  तर्क और विवेकशीलता की चेतना निर्मित करते हुए सक्रिय  रहे। इस दरमियान उन्होंने 30 से अधिक किताबें लिखीं, मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ का सम्पादन किया और सतारास नशा-मुक्‍ति‍  केंद्र की स्थापना भी की। सन 2000 में उन्होंने अहमदनगर के शनि शिन्गनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के लिए  ज़बरदस्त आन्दोलन चलाया। उन्होंने निर्मला देवी और नरेन्द्र महाराज जैसे बेहद ताकतवर धर्मगुरुओं को खुली चुनौती दी। इस साल  होली के ठीक पहले भयानक  सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र में आसाराम बापू द्वारा हजारों लीटर पेयजल से होली खेले जाने  को डा. दाभोलकर ने चुनौती दी और अंततः सरकार को इस पर प्रतिबन्ध लगाना पडा।  

हमारे देश में पिछडापन और सामंती अवशेष तो अंधविश्‍वासों के लिए ज़िम्मेदार हैं ही,  भ्रष्टाचार, सट्टे और दलाल पूँजी की मार्फ़त अमीर और ताकतवर बने मुट्ठी भर लोग अपनी चंचला पूँजी की हिफाजत की दुश्‍चि‍न्ता से घिर कर ढोंगियों और आपराधिक धर्मगुरुओं के संरक्षक बने हुए हैं। इनमें राजनेता, नौकरशाह और थैलीशाह बड़े पैमाने पर शामिल हैं जिनकी सहायता के बगैर अंधश्रद्धा का अरबों-खरबों का कारोबार एक दिन नहीं चल सकता। बौद्धिक-वर्ग का भी अच्छा-खासा हिस्सा न केवल संस्कारतः  अंध-श्रद्धा की  चपेट में है, बल्कि कुछ लोगों ने तो इसको पालने-पोसने में निहित स्वार्थ तक विकसि‍त कर लिए हैं । दूसरी ओर, बड़े  पैमाने पर गरीबी और बेरोज़गारी से बदहाल देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा मानसिक राहत के लिए ‘हारे को हरिनाम’ की मनोदशा में ढोंगी धर्मगुरुओं, तांत्रिकों और चमत्कार से इलाज करनेवालों के चंगुल में फँसता रहता है। मीडिया बड़े पैमाने पर अंधविश्‍वास हर दिन परोसता है। जिस देश में आज भी अनेक स्थानों पर निर्दोष स्त्रियाँ डायन कह कर मार दी जाती हों, जहाँ नर-बलि तक के समाचार अखबारों  की सुर्खियाँ बनते हों, जहाँ मनोचिकित्सा अभी भी बड़े पैमाने पर ओझा-सोखा के हवाले हो, वहाँ डा. दाभोलकर का काम कितना सुस्साध्य रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। सबसे बढ़कर अंध-आस्था का उपयोग राजनीति और तिजारत के लिए, जनता की चेतना को दिग्भ्रमित करने के लिए ताकि वह अपनी वंचना के  कारणों को जान न सके, अपने वास्तविक हक़-हुकूक  के लिए लड़ न सके, किया जाता है। ऐसे में डा. दाभोलकर पूँजी की सत्ता की आँखों में भी किरकिरी बने हुए थे। उन पर हमले पहले भी होते रहे, धमकियाँ पहले भी मिलती रहीं, उनकी प्रेस-वार्ताओं में  पहले भी उपद्रव किया जाता रहा, लेकिन विनम्रता के साथ  सादगी भरा  जीवन जीते हुए वह अपने काम में अडिग बने रहे।

सन  2011 में केरल युक्ति संघम के अध्यक्ष यू. कलानाथन पर टीवी शो के दौरान तब हमला किया गया, जब वह तिरुवअनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी मंदिर की अकूत धन संपदा के सार्थक उपयोग पर बहस कर रहे थे। इसी तरह सन 2012 में मुंबई के एक चर्च में जीजस की प्रतिमा की आँखों से आंसू निकलने को चमत्कार कहे जाने के खिलाफ जब विवेकवादी चिन्तक सनल एडामरुकु  ने वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत किए तो उन पर धार्मिक विद्वेष फैलाने का मुकदमा ठोंक दिया गया। और अब तो डा. दाभोलकर की हत्‍या ही कर दी गई है। जिन दक्षिणपंथी ताकतों ने यह घृणित कारनामा अंजाम दिया है, वे यह न भूलें कि भारत में विवेकवाद और तर्क-प्रमाणवाद की भी एक परम्परा है जो हजारों साल पुरानी  है। लोकायत की हजारों साल पुरानी  परम्परा को बदनाम और विरूप करने, उसके ग्रंथों को नष्ट कर  डालने के बाद भी वह लोक- मनीषा में नए-नए ढंग से आकार ग्रहण करती रही। डा. नरेन्द्र दाभोलकर इसी महान परम्परा की अद्यतन कड़ी हैं। वह तर्क-प्रमाणवाद, विवेकवाद के जुझारू योद्धा के बतौर आज़ाद हिन्दुस्तान में मानसिक गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए।

जन संस्कृति मंच उनकी प्रेरणादाई स्मृति को तहे-दिल से सलाम करता है।

( सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)  

बदलती हुई दुनिया में हिंदी कविता के 25 बरस

नई दि‍ल्‍ली : ”भूख बनाती है मूल्य/इस पार या उस पार होने को उकसाती है/नियति भूख के पीछे चलती है/ढा  देती है मीनार/सभी ईश्‍वर देवी देवता स्तब्ध रह जाते हैं/ भूख रचती है इतिहास।” -फ़रीद खां

यह समकाल की नहीं, विषम-काल की कविता है। प्रार्थना के शिल्प में नहीं, प्रतिरोध के शिल्प में लिखी जा रही है। इतिहास का समाधिलेख नहीं, उस का प्रयाणगीत लिख रही है।

सचमुच ऐसा ही है? या यह केवल एक शुभेच्छा मात्र है?

बदलती हुयी दुनिया में हिंदी कविता के बीते पचीस सालों के बारे में उसकी प्रतिनिधि आवाजों के साथ चर्चा में शरीक होइए।

इस बार इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा आयोजित होने वाला कार्यक्रम  ‘कवि के साथ’  का 9वां आयोजन 2 शामों का है-

21 अगस्त 2013, पहली शाम, 7.00- 9.00 बजे : परिचर्चा

गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड 

विषय: बदलती हुई दुनिया में हिंदी कविता के 25 बरस

विषय-प्रस्तावना : 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया का और 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद भारत का परिदृश्य पहले की तुलना में बहुत तेजी से और बहुत दूर तक बदला है। बदलाव की इस तेज गति को व्यापक रूप से महसूस किया गया है, भले ही इन घटनाओं की व्याख्या और आकलन के विषय में तीव्र मतभेद मौजूद हों। इस बदलाव को कुछ लोग ‘भूमंडलीकरण’ या ‘उदारीकरण’ जैसी संज्ञाओं के जरिये समझते-समझाते हैं तो कुछ लोग ‘एकध्रुवी दुनिया’ और ‘निजीकरण’ की चर्चा करते हैं। इस बदलती हुई दुनिया में मनुष्य का रिश्ता न दुनिया से, न प्रकृति से, न मनुष्य से और न ईश्‍वर से ही पहले जैसा रह गया है। अनेक चिरस्थायी मान लिए गए मूल्यों, समझदारियों और संस्थाओं का विघटन हुआ है तो कई नयी कल्पनाओं, रचनात्मक प्रक्रियाओं और नवाचारों का उन्मेष भी हुआ है। ऐसे उथल-पुथल का दौर संस्कृति, कला और साहित्य के लिए नयी चुनौतियों, संकटों, मोड़ों और प्रस्थानों का समय होता है। पिछले पचीस वर्षों की हिंदी कविता भी इस बदली हुई दुनिया का सामना करते हुए खुद बदलाव की गहरी पेंगों से जूझती दिखाई देती है। यह बदलाव न केवल कविता की विषयवस्तु, भाषा और शिल्प से संबंधित है, बल्कि उसके सामाजिक आधार, पाठकवर्ग, भूगोल और इतिहास तक को प्रभावित करता है। इस आयोजन में हिंदी कविता में आ रही इन तब्दीलियों के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत के लिए इस दौर में सक्रिय हिंदी कविता की महत्वपूर्ण धाराओं के प्रतिनिधि कवियों को आमंत्रित किया गया है।

परिसंवादी-
केदारनाथ सिंह
देवीप्रसाद मिश्र
पंकज चतुर्वेदी
मृत्युंजय
राजेश जोशी
सविता सिंह
संचालक: आशुतोष कुमार

(परिसंवादी-श्रोता-संवाद)

22 अगस्त 2013, दूसरी शाम, 7.00- 9.00 बजे : काव्य पाठ

अमलतास सभागार, इंडिया हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड

कवि:
अनामिका
अनीता भारती
केदारनाथ सिंह
देवीप्रसाद मिश्र
पंकज चतुर्वेदी
राजेश जोशी

(कवि-श्रोता-संवाद)

कौन है असली स्टंटमैन ? शैफाली पांडे

bikers

लोग कहते हैं आजकल के लड़के इतनी तेज़ बाइक चलाते हैं कि सड़क पर चलना दूभर हो जाता है । कहने को तो आजकल के लड़के भी कह सकते हैं कि सड़कें पैदल चलने वालों के लिए थोड़े ही बनी है । सड़कें गाड़ियाँ चलाने और बाइकें दौडाने के लिए बनाई जाती हैं । आज पैदल चलना एक विलासिता है जबकि बाइक चलाना अनिवार्यता।

देशवासी अगर गंभीरता से सोचें तो पाएंगे कि ये युवा हैं और युवा का उल्टा वायु होता है। वे युवा हैं सो वायु हैं । वायु अमूर्त होती है। किसी को दिखती नहीं। वायु हल्की-हल्की बहेगी तो किसी को एहसास तक नहीं होगा। युवा दुनिया को अपने होने का एहसास करवाना चाहते हैं । जब वायु तेज़ गति से बहती है, सब सावधान रहते हैं । युवा सबको सावधान रखने का कार्य करते हैं। जब कोई युवा तेजी से बाइक चला कर बगल से गुज़रता है, किसी को नहीं दिखता। उसका एहसास भर होता है। सर्रर्रर की आवाज़ आने पर कई लोग आसमान में देखने लगते हैं कि शायद कोई हेलिकॉप्टर सर के ऊपर तेज़ी से गुज़र गया होगा। आज अगर यक्ष होते और युधिष्ठिर से प्रश्‍न पूछते, ” वायु से तेज़ कौन चलता है ?”  तब युधिष्ठिर का जवाब होता, ” बाइकर, ये वायु से तेज़ चलते हैं।”

युवा आपको एहसास करवाते हैं कि आप सड़क पर चल रही चींटी से ज्यादा कुछ नहीं हैं । इस प्रकार ये आपको महान होने के एहसास से दूर रखने में सहायता प्रदान करते हैं । मनुष्य होने का घमंड आपको छू भी नहीं पाता। भले ही धार्मिक चैनल वाले बाबा कितना चीख-चीख कर आपसे कहें, ”मानव योनि बड़े ही भाग्य से मिलती है।”  या ”मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है।” यकीन मानिए आप इन बाइकर्स के आगे बड़ा ही तुच्छ महसूस करते हैं। बाबा लोगों को सड़क पर नहीं चलना पड़ता इसीलिये वे मानव होने पर गर्व महसूस कर सकते हैं।

बाइकर्स की वजह से हमारे बड़े-बुजुर्गों की सेहत ठीक रहती है । ये घर में चाहे कितना भी बहाने क्यूँ न बनाएं मसलन-  आँख से नहीं दिखता,  कान से नहीं सुनाई देता, बुढापा आ गया है,  चलने में तकलीफ होती है। एक बार सड़क पर आते ही उनके सारे बहाने छूमंतर हो जाते हैं। आँख, कान,  घुटने सब दुरुस्त हो जाते हैं। बाइक और बाइकर्स का डर दिन पर दिन क्षीण होती जा रही इन्द्रियों को दुरुस्त कर बुढा़पे को दूर करने में सहायता प्रदान करता है ।

इन बाइकर्स की वजह से ही छोटे-छोटे बच्चे बचपन से ही सड़क में सावधानी से चलना सीख जाते हैं। दाएं और बाएँ कैसे चलना है, इन्हें सिखाना नहीं पड़ता। बाइकर्स का कोई भरोसा नहीं होता। ये किसी भी दिशा में चलने के लिए स्वतंत्र होते हैं। यही कारण है कि हमारे बच्चे छठे साल से ही अपनी छठी इन्द्री का इस्तेमाल करना सीख जाते हैं। भय के कारण घंटों तक सड़क पार नहीं कर पाने के कारण इंसान को धैर्य का अच्छा अभ्यास हो जाता है। जिस तरह क्रिकेट के मैदान में बेट्समैन पहले से अपनी बल्लेबाजी डिसाइड नहीं कर सकता, बल्कि बौलर के बॉल फेंकने के अंदाज़ से वह बॉल की दिशा का अनुमान लगाकर बल्लेबाजी करता है, उसी प्रकार इन बाइकर्स के एक किलोमीटर दूर से आने के अंदाज़ से यह डिसाइड करना पड़ता है कि किस दिशा की दीवार से जाकर चिपका जाए और अपने प्राणों की रक्षा करी जाए ।

एक हमारा बचपन था, जब वाहनों की रेलम पेल नहीं होती थी। हम सारी सड़क अपनी जागीर समझ कर चलते थे। सारी दिशाएं अपनी मुट्ठी में कैद रहा करती थीं। बाइक बड़े-बड़े शहरों में इक्का-दुक्का लोगों के पास हुआ करती थी। बाइक चलाने वालों को लफंगा,  आवारा और बदमाश समझा जाता था। बाइक वालों को लोग लड़की देने से डरते थे। शरीफ लोग स्कूटर चलाते थे। माँ-बाप खुशी-खुशी अपनी लड़की का हाथ स्कूटर चलने वाले के हाथों में दे देते थे। ट्रैफिक के नियम किताबों में ही धूल फाँकते रहते थे। यही कारण है कि रिक्शे वाले को दायाँ और बायाँ बताने में अभी भी मुझे कन्फ्यूज़न होता है। मेरी बेटी ने दस साल की उम्र से ही दिशाओं का ज्ञान कर लिया है और सड़क में सावधानी से चलना सीख लिया है,  कई बार तो वह मेरा हाथ पकड़ कर किनारे कर देती है कि ”ठीक से चलो मम्मा, अभी कोई बाइक वाला टक्कर मार जाएगा।”  बाइकर निडर होते हैं। उन्हें मौत से डर नहीं लगता। उनकी रफ़्तार देखकर आम आदमी का कलेजा मुँह को आ जाता है। आम आदमी सड़क पर चलते हुए हमेशा सावधान की मुद्रा में रहता है। फर्क बस इतना है कि इस ‘सावधान’ के बाद ‘ विश्राम’  नहीं आता। बाइकर आर्थोपेडिक डॉक्टरों और ट्रामा सेंटरों के लिए वरदान सिद्ध होते हैं। ये इनकी ही कृपा है कि सारे आर्थोपेडिक चाँदी काट रहे हैं। छोटे
से छोटा अस्पताल भी इनके सहारे अपनी रोजी-रोटी खींच ले जाता है।

जिम की संख्या में इन दिनों जो बेतहाशा वृद्धि हुई है उसके पीछे भी इन्हीं बाइकर्स का हाथ है। डॉक्टर और हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं, ” पैदल चलिए, पैदल चलना सेहत के लिए लाभदायक है।” हम पैदल चलने का जोखिम नहीं उठा सकते इसलिए जिम जाते हैं। इस प्रकार नए-नए जिमों के खुलने से कई नौजवानों को रोज़गार के अवसर मिले, जिसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ इन बाइकर्स को जाता है।

जिस तरह हम लोग देश की सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ नेताओं को बताते हैं, उसी तरह अगर आप किसी लड़के से ये पूछेंगे कि वह बाइक ही क्यूँ चलाता है तो वह इसके पीछे लड़कियों की बदलती पसंद का हाथ बताएगा। लड़कों का कहना है कि लडकियां उन्हीं लड़कों की और देखती हैं जिनके पास खूबसूरत और स्टाइलिश बाइक होती है। बाइक जितनी लेटेस्ट होगी उतनी ही स्मार्ट लडकी के पास आने की संभावना बढ़ जाती है ।

लड़कों का कहना है कि लडकियाँ अगर बाइक वालों की और देखना बंद कर देंगी तो खुद-ब-खुद दुर्घटनाएं होना बंद हो जाया करेंगी। कल्पना कीजिये एक लड़का लेटेस्ट मॉडल की बाइक लेकर खड़ा है और दूसरा लड़का पुराना चेतक, बजाज या ऐसा ही कोई स्कूटर लेकर खड़ा है। लडकी मुस्कुराती हुई आती है और बाइक वाले को हिकारत से देखकर झट से स्कूटर की गद्दी पर लपक कर चढ़ जाती है। बाइक वाला खडा़ देखता रह जाता है और स्कूटर वाला बाज़ी मार ले जाता है।

बाइकर को ट्रैफिक व्यवस्था का दुश्मन माना जाता है। मेरा मानना है कि अगर आप गौर से देखें तो पाएंगे कि ये बाइकर ही हैं, जो कितना भी भयानक भी जाम लगा हो, चुटकियों में चीर कर आगे बढ़ जाते हैं। जाम दरअसल धीरे चलने वाले और फूंक-फूंक कर गाडी चलाने वालों की वजह से लगता है। बाइकर कभी जाम में नहीं फँसता। वह बाल बराबर जगह से भी बाइक निकाल ले जाता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म रास्ते का तक उपयोग कर ले जाता है । जाम में फँसे लोग बाइकर को देखकर हसरत से आहें भरते हैं कि काश! कोई बाइक वाला आता और हमें भी इस जाम से बाहर निकाल ले जाता।

बाइकर ईंधन की बचत करते हैं। ये बहुत अच्छे मित्र होते हैं। बाइकर कभी अकेला नहीं चलता। उसके पीछे दो,  तीन,  चार और कभी-कभी पांच मित्र तक सवार हो जाते हैं,  लेकिन उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं जो दस सीट की गाड़ियों में अकेले चलते हैं। इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता और राष्ट्रहित में पेट्रोल बचाने वाले इन बेचारे बाइकर्स को पुलिस शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है।

बाइक और आत्महत्या में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। युवक बाइक न मिली तो आत्महत्या की धमकी देते हैं। इधर भारत वर्ष में माता-पिता भी दो तरह के होते हैं। एक वे जो पहली धमकी से डर जाते हैं,  दूसरे वे जो धमकी से नहीं डरते। ऐसे निष्ठुर माता-पिता को आत्महत्या के प्रयास से डराया जाता है। धमकी वाले प्रयास में सल्फाज़ या नुवान की मात्र कम रखी जाती है। कभी-कभी मात्र का ठीक-ठीक अनुमान न हो पाने के कारण ये धमकी वाले प्रयास सफल हो जाते है और बाइक की राह में एक और शहीद का नाम जुड़ जाता है। इधर मेरे शहर में पिछले साल एक आत्महत्या सिर्फ इस कारण हुई कि लड़का जिस कंपनी की बाइक चाहता था, वह ना लाकर उसका पिता किसी दूसरी कंपनी की बाइक ले आया था। आत्महत्या करने के लिए इतना ही कारण काफी था, सो लड़के ने आत्महत्या कर ली। मेरे पड़ोस का एक और लड़का जो छह बहिनों के बाद पैदा हुआ था, उसके आत्महत्या करने का कारण समझ में आता है क्यूंकि उसके पिता ने किसी भी तरह की बाइक खरीदने में असमर्थता प्रकट कर दी थी। क्या फायदा ऐसी ज़िंदगी का, जिसमे एक अदद बाइक ही न हो। सो लटक गया फंदे से। अब उसकी माँ पागल हो गयी है और बाप सालों से लापता है।

बाइक और काले चश्मे के बीच गहरा सम्बन्ध पाया जाता है। लड़का बाइक खरीदने के तुरंत बाद अगर कोई चीज़ खरीदता है तो वह यही काले रंग का चश्मा। हेलमेट से ज्यादा ज़रूरी अगर कोई वस्तु है तो यही काला चश्मा। इसे लगाकर अष्टावक्र भी खुद को सुपर हीरो समझने लगता है।

लड़के कहते हैं, ” जब बड़े परदे पर अजय देवगन बाइक पर सवार होकर स्टंट दिखाता है तो वह रातों-रात सुपरहिट हो जाता है। आँख बंद करके बाइक चलने वाले का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज हो जाता है। छब्बीस जनवरी की परेड पर एक के ऊपर एक पिरामिड की तरह बने हुए जवानों को देश भर की तालियाँ मिलती हैं,  और हम सामान्य लोगों को सड़कों पर स्टंट दिखाते हैं तो लोगों गालियाँ और पुलिस वालों की गोलियां मिलती हैं ? आँख बंद करके बाइक चलाने वाले को विदेशी यूनिवर्सिटी वाले डॉक्टरेट से नवाजते हैं, इनामों से लाद देते हैं,  और हमें क्या मिलता है ? लोगों का तिरस्कार, अपमान और धिक्कार।

इधर एक स्ट्राइकर कम बाइकर से मेरी मुलाक़ात हुई तो कुछ सवाल पूछे बिना रहा नहीं गया। अध्यापिका होने की ये आदत कहीं पीछा नहीं छोडती।

सवाल- तुम लोग बाइक किसलिए लेते हो?
जवाब- जिस प्रकार नेता गण चुनाव से पहले हाथ जोड़कर वोट मांगते हैं कि जीतने के बाद जनसेवा करेंगे, उसी प्रकार हम लोग बाइक लेने के लिए माता-पिता के आगे हाथ जोड़ते हैं और कसम खाते हैं कि बाइक से सिर्फ कोचिंग और ट्यूशन जाएंगे ।
सवाल-फिर क्या कारण है कि बाइक में बैठकर तुम लोग स्टंट मैन बन जाते हो?
जवाब-गद्दी चीज़ ही ऐसी है कि इसमें बैठते ही हमें स्टंट करना और
नेताओं को भ्रष्टाचार करना अपने आप आ जाता है।
सवाल- बाइकर्स के साथ आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं को देख-सुनकर
इसे बंद करने का ख्याल मन में नहीं आता?
जवाब- आप लोगों के गले से आए दिन सोने की चैन, मंगलसूत्र इत्यादि खींच लिए जाते हैं, आप लोग इन्हें पहनना बंद क्यूँ नहीं कर देती?(निरुत्तर)

रमेश गोस्‍वामी की कवि‍ताएं

बूढ़े ट्रैम्प सि‍पाही के बूत के साथ बैठे रमेश गोस्वामी।

बूढ़े ट्रैम्प सि‍पाही के बूत के साथ बैठे रमेश गोस्वामी।

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ रमेश गोस्‍वामी कवि‍ता लेखन में परम्‍परा का निर्वाह नहीं करते। वह कि‍सी का अनुसरण भी नहीं करते। अपनी बात कहने का उनका अपना ही ढंग है। उनकी कुछ कवि‍ताएं-

1.

चलो घर से नि‍कलें कहीं घूम आएँ

इस दुनि‍या पे छोटा सा चक्‍कर लगाएँ

सुनी बात ना जब दीवारों ने अपनी

खुली वादि‍यों को जगा कर सुनाएँ

ना खुशि‍यों की सोहबत ना गम का दि‍लासा

कहाँ तक भला दूरि‍यों को बढ़ाएँ

कि‍या रंजि‍शों ने जि‍न्‍हें दूर हम से

चलो उन ठि‍कानों को जा खटखटाएँ

बड़ी बेरुखी है यहाँ गरमि‍यों में

पहाड़ों को जा कर शि‍कायत लगाएँ

तराई में बादल बरसने लगे हैं

उतारें दि‍खावा और नंगे नहाएँ

जखीरों में कटते शजर रो रहे हैं

उन्‍हें दे के कंधा कहीं बो के आएँ

जहाँ पेड़ था पास छाया पड़ी थी

वहाँ चार पल बैठ कर रो के आएँ

जख़ीरे : हरेभरे स्‍थल

शजर : पेड़

 2.

वक्‍त की फ़ि‍तनागरी का हाल देखि‍ए

सरसों के खेत दब गए अब मॉल देखि‍ए

हैं लगे अम्‍बार कपड़ों के छतों तलक

खिंचवा रहे शौक़ीन अपनी खाल देखि‍ए

चीन के जापान के खाने सजे लज़ीज़

चुपचाप सी सहमी पड़ी दाल देखि‍ए

पी रहे शराब लोग बैठ कर अंदर

बाहर खड़े ग़रीब का सवाल देखि‍ए

फ़लकनुमा इमारतों में चढ़ रहा इंसान

इंसान के ज़मीर का ज़वाल देखि‍ए

फ़ि‍तनागरी : शरारत

फलकनुमा : ऊँची

ज़वाल : पतन

 3.

शहर में ऐसी जगह बताओ

जहाँ पड़ा ना डाका है

जि‍स को देखो शोभाराज है

जि‍स को देखो राका है

चेहरों पर मुसकान है चि‍पकी

दि‍ल का और ही खाका है

इक दूजे को लोग खा रहे

फि‍र भी रोते फ़ाक़ा है

 

सुबह मौज आई तो पानी में उछला

सूरज की कि‍रणों से नि‍खरा परिंदा

शि‍कारी की सि‍र्फ एक गोली तो

हजारों परों में था बि‍खरा परिंदा

 4.

दोस्‍तों को अब गि‍नाना कर दि‍या है बंद

यूँ तो सारे हो गए हैं वक्‍त के पाबंद

एक है मैला कुचैला

साफ़ दि‍ल का आदमी

एक मेरी उम्र को करती नहीं पसंद

पढ़ रहा है एक

दस्‍तोयेवस्‍की

सन साठ से

एक ज़हनी तौर पर फुक्‍कड़ा

पर रहता ठाठ से

एक ने की बात ग़ालि‍ब की

कभी जो बात की

सि‍र्फ मैं ही कर रहा हूँ

नौकरी हालात की

 5.

वक्‍त गुजरने में कि‍तना लगता है वक्‍त

रात सोता है दि‍न में जागता है वक्‍त

कि‍सी के वास्‍ते है वक्‍त घोड़ा बेलगाम

करोड़ों लोग हैं जि‍न के काटे ने कटता है वक्‍त

कई मसरूफ़ हैं खुशि‍यों में जिंदगी की हजार

कई हैं जि‍न के लि‍ए गमज़दा ना घटता है वक्‍त

हैं फलक़ से भी गहरे समंदर बीच में अपने

अगर सटता है कुछ हम आप से सटता है वक्‍त

 

(‘लय की लकीरें’ से साभार

प्रकाशक: रोशनाई प्रकाशन

212, सी.एल./ए., अशोक मि‍त्र रोड(सरकस मैदान के पास)

काँचरापाड़ा, उत्‍तर 24 परगना, पश्‍चि‍म बंगाल- 743145

मूल्‍य – 90.00 रुपये

ईमेल- roshnaiprakashan@sify.com)

‘समाचार’ अंग्रेजी में : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

राधा भट्ट प्रसिद्ध, गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं । उम्र के इस पड़ाव पर भी गाँधीवादी मूल्यों उनके प्रचार-प्रसार के लिए उन्हें देश भर में भागते-दौड़ते देखा जा सकता है । अपनी कद-काठी में भी अपने समय की ऐसी ही हस्तियाँ- अरुणा राय, मेधा पाटेकर, इला भट्ट की तर्ज पर । सर्व सेवा संघ द्वारा संचालित किताबों की दुकान के सिलसिले में रेल भवन में मुलाकात हुई। सर्व सेवा संघ को देश के कई शहरों के रेलवे स्टेशनों पर गाँधीवादी साहित्य को बेचने, प्रचार-प्रसार की सुविधा मिली हुई है। उसी की कुछ समस्याओं पर बात हो रही थी। राधा बहन के साथी अशोक भारती एक अधिकारी को बात समझाने की कोशिश कर रहे थे। अधिकारी की समझ में बात आ गई और उन्होंने कहा कि इन बातों को ही लिख कर दे दीजिए। बात हिन्‍दी में समझाई थी और समझने में भी पाँच मिनट नहीं लगे होंगे, जबकि अंग्रेजी में उनके लिखे आवेदन को किसी भी हालत में पढ़ने-समझने में आधा घंटे से कम नहीं लगता। राधा बहन के दोनों साथी भी बनारस, पटना के रहने वाले थे। मैंने पूछा, ‘आपने ये बात हिन्‍दी में क्यों नहीं लिखी ? गाँधी के मूल्यों की सबसे खरी बात तो अपनी भाषा है ।’ उन्होंने ऐसे प्रश्‍न की अपेक्षा नहीं की थी । राधा भट्ट बोलीं, ‘मैं पूरे देश में जाती हूँ और हर जगह अपनी बात हिन्‍दी में ही कहती हूँ । मुझे भी आसानी होती है और उन लोगों को भी समझने में। लेकिन दिल्ली के दफ्तरों में मुझे मजबूरन अंग्रेजी में ही लिखना पड़ता है। दिल्‍ली वाले हिन्‍दी में लिखे हुए को बड़ी लापरवाही से देखते हैं।’ क्या वाकई ?  वे चुप हो गईं । ‘क्या बताएं आप तो जानते ही हैं दिल्ली को।’

जो दिल्ली में रहते हैं वे वाकई दिल्ली और खुद को खूब जानते हैं। मयूर विहार के जिस कोने में मैं रहता हूँ वहाँ एक सोसायटी का नाम समाचार अपार्टमेंट है। हाल ही में मेट्रो से उतरा तो नया-निकोर समाचार सोसायटी का बोर्ड नजर आया। और गौर से देखा तो चारों तरफ चार-पाँच बोर्ड लगे हैं लेकिन सब अंग्रेजी में। यह किस बात का प्रतीक है ? समाचार अपने आप में हिन्‍दी का शब्द है। तो क्या हिन्‍दी में एक बोर्ड भी लगाना, लिखना गुनाह है ? खुद समाचार सोसायटी के अंदर भी यू.पी., बिहार समेत हिन्‍दी राज्यों के दिग्गज पत्रकार, लेखक रहते हैं। वर्षों से उनकी रोजी-रोटी राजसी वैभव के साथ हिन्‍दी में ही लिखने-पढ़ने पर चल रही है । उनके लिखे दर्जनों ग्रंथों में हिन्‍दी को देश और विदेश में फैलाने के दस-पाँच किलो लेख तो होंगे ही। फिर अपने पैरों की जमीन पर हिन्‍दी के निशान क्यों नहीं छोड़ना चाहते ये दिग्‍गज ? राजभाषा नियम, अधिनियम का भी सहारा लिया जाए तब भी यह हिन्‍दी भाषी क्षेत्र है जहाँ हिन्‍दी दिल्ली राज्य की मुख्‍य भाषा भी है । क्या यहाँ भी हिन्‍दी का बोर्ड वही सरकारी हिन्‍दी अधिकारी लिखवाएंगे जिन्हें दफ्तरों में मोहरें और नाम पट्टिकाएं द्विभाषी लिखवाने के लिए बड़ी-बड़ी तनख्वाहें मिलती हैं ? और बुद्धिजीवी बिना तनख्वाह के क्यों सामने आएं ? हालाँकि इन दिग्गज लेखक, बुद्धिजीवियों को बेचारे हिन्‍दी अधिकारी को कोसते हुए आप अक्सर सुन सकते हैं। क्‍या अंग्रेजी न जानने वाले को ऐसे बोर्ड से कम असुविधा होगी ? क्‍या दीवारों पर, बोर्ड पर लिखी अंग्रेजी इबारत हमारे सारे भाषणों का मजाक उड़ाते नहीं लगती ?

दरअसल ये दोनों स्थितियाँ हमारे पूरे लोकतंत्र की शैली, ढोंग का आईना हैं । जहाँ कहा कुछ जाता है और किया कुछ। ऐसा लगता है कि हिन्‍दी का बुद्धिजीवी इसी बात से गद-गद है कि वह अंग्रेजी में लिखी ‘समाचार सोसायटी’ में रहता है। एक और सोसायटी कला विहार की कहानी भी बहुत अलग नहीं है । जब नाम कला विहार है तो कई दिग्गज कलाकार भी वहाँ रहते हैं लेकिन वहाँ भी हर ‎चीज नोटिस बोर्ड पर अंग्रेजी में ही लिखी-पढ़ी जाती है । आसपास की कई सोसायटी के नाम ऐसे हैं लेकिन उनसे शिकायत नहीं। शिकायत अपने बुद्धिजीवियों से ज्यादा है जो हिन्‍दी के लिए ही रोते-चीखते पाए जाते हैं । क्या बुद्धिजीवी इतने दुचित्तेपन का जीवन जी सकता है ? कुछ-कुछ नेहरू के अंदाज में । सिद्धांत के तौर पर शत-प्रतिशत सेक्यूलर और अंग्रेजी के कपड़े पहने।

कुछ वक्‍त पहले दक्षिणपंथी हिन्‍दी की गुहार लगाते थे । अब अपनी इमेज को उदार और राष्ट्रीय दिखाने के चक्कर में उन्होंने भी हिन्‍दी की बात करना छोड़ दिया है । कुछ वामपंथियों के लिए हिन्‍दी  ‘प्रोगेसिव शब्द’ का विपरीतार्थ है यानि पिछड़ापन । ये सब बातें उस क्षरण की परतें हैं जिसने अपनी भाषा और उसके जरिए पूरे समाज का सबसे ज्यादा नुकसान किया है । राजनेताओं को दोष देने से ही काम नहीं चलने वाला । पहली बात राजनेता आपके ही समाज से आए हैं और दूसरी- भाषा और साहित्य के मुखिया तो आप हैं । आपके जीवन से क्यों गायब है अपनी भाषा कामरेड ? क्‍या अवधी, भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से अपना राज आ जाएगा ? यदि नहीं तो क्‍यों दिल्‍ली में संख्‍याबल पर सत्‍ता को गुमराह कर रहे हो ? हाँ, हिन्‍दी, भोजपुरी भले न आए उसके नाम पर भवन, अकादमियां, अध्‍यक्ष, सचिव और सेमीनार जरूर दिखेंगे । सत्‍ता द्वारा पोषित, पल्‍लवित ।

भारत सरकार और उसके अधीनस्थ कार्यालयों में भाषा को बढ़ाने के नाम पर कम-से-कम सौ पत्रिकाएं तो निकलती ही होंगी । जिस भी पत्रिका को खोलिए उसके चमकीले, चिकने पृष्ठों पर फोटो के साथ ऐसे विवरण पाएंगे ‘सर्वोत्‍कृष्‍ट राजभाषा कार्यान्वयन के लिए पुरस्कृत’ आ‎दि-आदि । इन पुरस्कृतों में से भी कुछ समाचार में जरूर रहते होंगे और उनमें से भी कुछ तो मैथिली, भोजपुरी की अकादमी दिल्ली में खुलवा ही चुके हैं और अब उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में डलवाने के लिए भी प्रयासरत हैं ।

आप दिल्‍ली में दस-बारह वर्ष से कम के किसी भी बच्चे से बात कर ‎लीजिए विशेषकर जो थोड़ा खाते-पीते घर का हो, शत-प्रतिशत उसका स्कूल प्राइवेट होगा। हिन्‍दी की किताब पढ़ने-पढ़ाने के नाम से ही या तो वह चौकन्ना हो उठेगा या उदासीन नजरों से देखने लगता है । ऐसा रातों-रात नहीं हुआ । यह क्षरण भी पिछले बीस-तीस वर्षों में और ज्यादा हुआ है । यही दौर है कि जब दिल्ली के किसी भी अखबार बेचने वाले कोने पर हिन्‍दी से दस गुनी पत्रिकाएं अंग्रेजी की मिलेंगी। यहाँ हिन्‍दी की किताब तो शायद ही कोई मिले। क्नॉट प्लेस समेत साउथ दिल्ली, हर जगह अंग्रेजी की सैंकड़ों किताबें एक साथ इनके यहाँ देखी जा सकती हैं ।

स्कूलों की हालत यह है कि छुट्टियों में एक बच्चे ने बताया कि उसे कहा गया है कि गर्मियों में चेतन भगत की अंग्रेजी की किताब पढ़ें। जब कोई प्रेमचंद, प्रसाद या अज्ञेय का नाम भी नहीं लेगा न स्कूलों में, न घर पर तो बच्चे हिन्‍दी पढ़ेंगे कहां से ? और यदि पढ़ना भी चाहें तो क्या उन्हें हमारे चालीस साल पहले बचपन के दिनों में हर जगह सस्ती और सुन्दर किताबें, पत्रिकाएं पर्याप्त रूप से पढ़ने को मिलेंगी ? याद आ रही है हिंद पॉकेट बुक्स से निकली मनमथनाथ गुप्‍त की  ‘भारत के क्रांतिकारी’ । वर्ष 1965 से 1970 स्‍कूल के उन दिनों में न जाने कितनी बार पढ़ी होगी जतिन दास, अशफाकउल्ला की जीवनियाँ । हिंद पॉकेट बुक्स ने ऐसी सैकड़ों किताबों को जन-जन तक पहुँचाया और सही मायनों में हिन्‍दी का अकेला प्रकाशन जिसने मिशनरी ढंग से यह काम किया । मेरे जैसे जाने कितने पाठकों ने पुस्तकों से लगाव का पहला पाठ सीखा । ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्‍दुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। आजादी के बाद हिन्‍दी का इसे स्वर्णकाल कहा जा सकता है । जब ये पत्रिकाएं भी लाखों में छपती थीं और हिंद पॉकेट बुक्स की किताबें भी । गुलशन नंदा का जिक्र यहाँ जरूरी लगता है । कम-से-कम किताबों को पढ़ने के लिए लाखों पाठक तो सामने आए और इन्हीं पाठकों ने हिन्‍दी को आगे बढ़ाया।

इतिहास में दर्ज रहेगा कि क्यों हिन्‍दी सत्तर-अस्सी के दशक में हिंद पॉकट जैसे सर्व सुलभ सस्‍ती पुस्‍तकों के बूते इतनी ऊंचाइयों पर पहुंची और क्यों पिछले तीस सालों में ऐसे प्रकाशकों की बाढ़ आई जो केवल सरकारी खरीद के भरोसे ही जिंदा हैं । पाठक तक किताब पहुँचाना उनकी अंतिम प्राथमिकता है । बढ़ती कीमतें, धंधेबाज प्रकाशकों, लेखकों के अपने-अपने गिरोह और पुस्तक खरीद में बेईमानी के इस दुश्चक्र ने इतनी समृद्ध भाषा और उसके साहित्य को जनता से इतना दूर कर दिया । क्या इसमें सारा दोष अंग्रेजी और अंग्रेजी जानने वालों का ही है ? अपनी भाषा पर जिंदा हिन्‍दी के हर शख्‍स को इस लड़ाई में अपनी भूमिका निभानी होगी।

अधूरी आजादी : अनुराग

parliment house

देश की आजादी को 66 साल हो गए हैं, लेकि‍न हर बार की तरह इस बार भी सवाल सामने है कि‍ क्‍या हम सही अर्थों में आजाद हैं? क्‍या एक आजादी मुल्‍क की यह ही दशा और दि‍शा होनी चाहि‍ए जो आज भारत, माफ कीजि‍ए इंडि‍या की है? वि‍संगति‍यां हर व्‍यवस्‍था में होती हैं, लेकि‍न भारत में जैसा हाल लोकतंत्र का है शायद ही कहीं और हो। दुनि‍या भर में छोटे-छोटे मुल्‍क अपने बलबूते आगे बढ़ना का प्रयास कर रहे हैं, लेकि‍न यहां की स्‍थि‍ति‍यों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि‍ पक्ष, वि‍पक्ष, नौकरशाह या आम जनता में ही ऐसी कोई ललक है। वि‍संगति‍यां लगातार बढ़़ती ही जा रही हैं। पक्ष सत्‍ता के नशे में मदमस्‍त है और वि‍पक्ष इस जुगत में लगा रहता है कि‍ कैसे सत्‍ता हथि‍याई जाए। दोनों के लि‍ए सत्‍ता पर काबि‍ज रहना-होना अहम है। जि‍स आम आदमी के नाम पर यह सब हो रहा है, वह केवल चुनाव के दौरान माई-बाप होता है अन्‍यथा उसकी कि‍सी को चिंता नहीं है।

कुपोषण से मरने वाले बच्‍चे, स्‍कूल से वंचि‍त रह जाने वाले बच्‍चे, बच्‍चों की तस्‍करी और उनका यौन शोषण के आंकड़ों से ही कि‍सी का भी सि‍र शर्म से झुका सकते हैं। हम पूरे देश को साक्षर भी नहीं कर पाए हैं। कि‍सान आज भी परेशान होकर आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हैं। हर साल बाढ़ और सूखे से भारी जान-माल का नुकसान हो रहा है। लेकि‍न हम 21वीं सदी और न जाने क्‍या-क्‍या नारे उछालकर भ्रम में जी रहे हैं। हमारे लि‍ए वि‍कास देश की राजधानी और प्रदेश की राजधानि‍यों में और उनके आसपास रह रहे चंद लोगों के लि‍ए सुख-सुवि‍धाएं जुटाना भर है।

इससे शर्मनाक बात क्‍या हो सकती है कि‍ हम भाषा जैसे मसले का समाधान नहीं कर पाए हैं। भारत संभवत: दुनि‍या का एक मात्र देश है जहां अपनी भाषा के वि‍कास के नाम हर वर्ष करोड़ों-अरबों रुपये बहा दि‍ए जाते हैं और भाषा दि‍वस, सप्‍ताह और पखवाड़ा मनाया जाता हो। इन सब कर्मकांडों के बावजूद स्‍कूल-कॉलजों से ही नहीं, प्राथमि‍क शि‍क्षा से भी अपनी भाषा को बेदखल कि‍या जा रहा है। ऐसी उलटबांसी हो रही हो तो लोकतंत्र पर सवाल उठेंगे ही।

देश में भ्रष्‍टाचार, गरीबी, जाति‍वाद, क्षेत्रवाद, कुपोषण जैसी इतनी समस्‍याएं है कि‍ सबको गि‍नना भी एक समस्‍या है। ये ऐसी समस्‍याएं हैं जि‍नका समाधान संभव है। जरूरत है तो राजनीति‍क इच्‍छा शक्‍ति‍ की और सत्‍ता का मोह छोड़कर कठोर कदम उठाने की। लोगों को भी जन हि‍त में नि‍जी स्‍वार्थों को छोड़ना होगा। लेकि‍न कोई उम्‍मीद की कि‍रण फि‍लहाल दि‍खाई नहीं देती।

देश की समस्‍याओं का समाधान करने के लि‍ए कोई राजनेता दृढ़ संकल्‍प नहीं दि‍खता। उल्‍टा राजनेता इतने असहि‍ष्‍णु हो गए हैं कि‍ उनके कार्यकलापों को लेकर जरा सी स्‍वस्‍थ आलोचना भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहे हैं। आए दि‍न आलोचना करने वाले के खि‍लाफ मुकदमा दर्ज करने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इन राजनेताओं को लोकतंत्र में वि‍श्‍वास है, इस पर संशय होने लगा है। यह कैसे लोकतंत्र है जि‍समें अंधे, गुंगे, बहरों को दरकार है, जो कुछ देखें नहीं, बोले नहीं और सुने भी नहीं। क्‍या इसी के लि‍ए शहीदों ने कुर्बानि‍यों दीं कि‍ लोगों को अपनी बात कहने तक का हक न हो? क्‍या केवल सत्‍ता हस्‍तांतरण ही उनका मकसद था?

लोकसभा, राज्‍यसभा और प्रदेशों की वि‍धानसभाओं में पक्ष-वि‍पक्षा का हंगामा कोई नई बात नहीं रह गई है। हालत की गंभीरता इससे पता चलते है कि‍ हाल ही में राज्‍यसभा में लगातार हंगामे से क्षुब्‍ध सभापति‍ हामि‍द अंसारी को कहना पड़ा कि‍ नि‍यम पुस्‍ति‍का में लि‍खे हर नि‍यमों को तोड़ा जा रहा है। क्‍या सदन को फेडरेशन ऑफ एनार्किस्‍ट (अराजक तत्‍वों का महासंघ) बनाना चाहते हैं।

सभापति‍ के कथन में सच्‍चाई है। उच्‍च सदनों में ही नहीं, बाहर भी अराजकता का माहौल है। अपने राजनीति‍क आकाओं को देखकर लोग भी अराजक और दायि‍त्‍वहीन हो गए हैं। क्‍या अपने दायि‍त्‍वों को को न नि‍भाकर इस राजनीति‍क आजादी को भी लंबे समय तक कायम रख पाएंगे।

कँवल भारती पर से मुकदमा वापस लेने के लिए धरना

धरने के दौरान लेखक और संस्कृतिकर्मी।

धरने के दौरान लेखक और संस्कृतिकर्मी।

नई दिल्ली : 11 अगस्‍त को कँवल भारती की प्रेस कांफ्रेंस में एकजुटता जाहिर करने के बाद 12 अगस्‍त 2013 को दिल्ली के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने उनकी अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में जंतर मंतर पर धरना दिया। इस बीच दलित लेखक संघ, दलित साहित्य और कला मंच तथा संवादिता नामक संस्था ने भी प्रलेस, जलेस और जसम के संयुक्त बयान का समर्थन किया है और इन तमाम संगठनों के नाम से संयुक्त बयान की कॉपी आम लोगों के बीच बाँटी गई। धरने में यह तय किया गया कि अगर यूपी की अखिलेश सरकार कँवल भारती पर से फर्जी मुकदमा वापस नहीं लेती, तो आने वाले दिनों में साहित्यकार संस्कृतिकर्मी यूपी भवन का घेराव करेंगे और किसी एक तारीख को देश के कई हिस्सों में साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी एक साथ यूपी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने हाथ में प्ले कार्ड्स ले रखे थे, जिन पर लिखा था- जातिवादी-सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति बंद करो, कँवल भारती पर से मुकदमा वापस लो, आजम खान के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करो, अभिव्यक्ति की आजादी का दमन बंद करो।

धरने को संबोधित करते हुए जलेस के महासचिव चंचल चौहान ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बिजली की जो स्थिति रहती है और जिस तरह के बुनियादी संकट हैं, उसमें बहुत बड़ी तादाद के लिए फेसबुक ही नहीं, बल्कि ढंग से बुक भी देख पाना मुश्किल है। इसके बावजूद अगर फेसबुक पर किसी टिप्पणी से सरकार का कोई मंत्री घबराता है, तो इससे साबित होता है कि वह कितना असहिष्णु है। उन्होंने कहा कि आज साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों को संगठित न होने देने की कोशिशें बहुत हो रही हैं, इसलिए भारती के मुकदमे की वापसी के लिए संगठनों की जो एकजुटता बनी है, उसे और भी मजबूत बनाने की जरूरत है।

युवा आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि राष्ट्रवाद के नाम पर एक से एक सांप्रदायिक अभिव्यक्तियां की जा रही हैं, पर इसके लिए किसी पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो रही है, लेकिन एक लेखक सिर्फ एक मंत्री और सरकार के कामकाज पर सवाल उठाता है, तो उसे आनन फानन में जेल में डाल दिया जाता है।

दिल्ली जसम के संयोजक चित्रकार अशोक भौमिक ने कहा कि हम आपातकाल दिवस पर भी जंतर मंतर पर दमन की संस्कृति के खिलाफ आए थे, कँवल भारती समेत अभिव्यक्ति की आबादी पर पाबंदी लगाने वाले जितने मामले हैं, हम उन पर संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह लड़ाई जारी रहेगी।

जेएनयू टीचर संघ और प्रलेस से जुड़े सुबोध मालाकार ने कहा कि भविष्य में इस तरह के खतरे बढ़ने वाले हैं, इसलिए संगठित प्रतिरोध बहुत जरूरी है। पत्रकार अंजनी ने कहा कि पूरे देश में दमनकारी स्थिति बनी हुई है, मारुति‍ के मजदूरों को जेल में बंद हुए एक साल से अधिक हो गए हैं, पर उनकी रिहाई नहीं हो रही है। आंध्र प्रदेश में क्रांतिकारी लेखक की हत्या कर दी जा रही है। कँवल भारती को एक छोटे से कमेंट के कारण जेल में डाल दिया जाता है। ये सारे कृत्य कमजोर सरकारों की निशानी हैं। ‘बनास’ के संपादक पल्लव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी कतई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसका एकताबद्ध होकर विरोध करना होगा। दलित मुक्ति के संघर्षों और विमर्शों से जुड़ी लेखिका अनिता भारती ने कहा कि कँवल भारती को जिस तरह से गिरफ्तार किया गया, वह अपमानजनक है। यूपी पुलिस और उनके मंत्री ने एक लेखक के सम्मान का भी हनन किया है। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार मुकदमे को वापस ले और लेखक से माफी माँगे।

जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि अभिव्यक्ति का गला घोंटने वाली व्यवस्था अंदर से बहुत डरी हुई व्यवस्था होती है। जितना ही व्यवस्था के संकट बढ़ते हैं, उतना ही दमन बढ़ता है। लेकिन दमन के खिलाफ प्रतिरोध भी होता है और आज भी हो रहा है। कबीर कला मंच के कलाकारों और सुधीर ढवले की गिरफ्तारी का सवाल हो या सीमा आजाद का बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों ने एकजुट होकर इसका प्रतिरोध किया है। जमानत मिल जाने के बाद कँवल भारती को जिस तरह दूसरे फर्जी मामले में फँसाने की साजिश रची जा रही है, उसका भी प्रतिवाद किया जाएगा। उन पर लादे गए फर्जी मुकदमे की वापसी के लिए चल रहे इस आंदोलन को और भी तेज किया जाएगा।

इंकलाबी नौजवान सभा के असलम ने कहा कि सरकारें मजदूरों, आदिवासियों, अल्पसंख्यक नौजवानों, महिलाओं पर लगतार दमन ढा रही हैं। इंतहा ये है कि फेसबुक पर की जा रही टिप्पणी भी उनसे बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। सरकारों का इस तरह के दमनकारी रुख के खिलाफ एक बड़ी संघर्षशील एकजुटता बनाने की जरूरत है।

कँवल भारती के साथ काम कर चुके रामरतन बौद्ध ने उनके विद्रोही तेवर वाले लेखन की चर्चा की और कहा कि वे सच को लिखते हैं, फेसबुक पर भी उन्होंने सच ही लिखा था, जो सरकार को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। सरकार ने जिस तरह का कँवल भारती के साथ व्यवहार किया है, उसने बहुत लोगों को उनके साथ खड़ा कर दिया है।

प्रलेस के महासचिव अली जावेद, कवि अनुपम, श्याम सुशील, रविप्रकाश, चित्रकार सवि सावरकर, रंगकर्मी अरविंद गौड़, तिरछी स्पेलिंग ब्लॉग के संपादक उदय शंकर, युवा आलोचक गोपाल प्रधान, आशुतोष, मार्तंड प्रगल्भ, चारु, नीरज, ब्रजेश, गौतम, नीलमणि, शौर्यजीत, पत्रकार रविकांत, अभिषेक श्रीवास्तव आदि भी धरने में मौजूद थे। संचालन सुधीर सुमन और अवधेश ने किया।

(सुधीर सुमन द्वारा जारी)