Archive for: July 2013

मेरे आदर्श- प्रेमचंद : प्रेमपाल शर्मा

Premchand
मैं प्रेमचंद साहित्य का न तो विशेषज्ञ हूँ और न ही समीक्षक, आलोचक, प्राध्यापक, जो प्रेमचंद की रचनाओं में ऐसा आकाश-कुसुम खोज लाए, जिससे अभी तक आप परिचित न हों, लेकिन एक छोटे-मोटे पाठक, लेखक के रूप में (वैसे, प्रेमचंद की मूर्ति के आगे मुझे अपने लिए लेखक शब्द लिखने में भी संकोच होता है) मेरे लिए वह एक ऐसे प्रेरणा स्रोत हैं, जिनसे मैं न केवल साहित्य में बल्कि जीवन के हर कदम पर प्रेरणा लेता हूँ ।100 वर्ष के बाद भी यदि वह लेखक या उसका साहित्य इस रूप में प्रभावित करता है तो समकालीन कथा साहित्य में प्रेमचंद की प्रासंगिकता के एक नहीं सैंकड़ों बिंदु हैं, जो मुझे झकझोरते हैं ।

मैं बचपन से लेकर कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने तक 22 वर्ष की उम्र तक गाँव में रहा। बी.एस.सी. के दिनों में भी गाँव से ही 11-12 किलोमीटर आना-जाना होता था। कभी साइकिल तो कभी बस। यहाँ मेरा मतलब अपनी आत्मकथा सुनाना नहीं। मैं जो कहना चाहता हूँ, वो यह है कि जब आप गाँव में रहे होते हैं तो एक ऐसा लेखक जिसका एक-एक शब्द गाँव के किसान, मज़दूर, महाजन के ऐसे कुछ आख्यानों से भरा हुआ हो तो आपको बार-बार अपना अक्स उसमें झलकता दिखाई पड़ता है। प्रेमचंद के यहाँ ग्रामीण बोली है, पग-पग पर मुहावरे, लोकोक्तियाँ हैं। कथा बढ़ती ही इन्हीं के सहारे है । इसलिए सबसे ज्या दा पढ़े भी जाते हैं प्रेमचंद। जनता को अपना जीवन उसमें दिखाई देता है । यूँ शहर और महानगर में रहने वाले लोग भी और वे भी जो एकाध-बार नानी, दादी के गाँव पिकनिक पर जाते हैं, प्रेमचंद के उतने ही मुरीद होते हैं, लेकिन ‘पूस की रात’ में हलकू किसान का सर्दी में ठिठुरते हुए जबरा कुत्ते के साथ सोने का एहसास उसी तीव्रता के साथ वही कर सकता है, जिसने खुद पूस की सर्दी में रातें काटी हों।30 साल पहले उस कहानी को पढ़ते हुए और आज भी लगता था कि जबरा कुत्ता हलकू का नहीं मेरा झब्बू कुत्ता है, जो बिल्कुल उसी अंदाज़ में मेरे साथ रात में खेतों पर पानी लगाने में साथ-साथ होता था । ‘पूस की रात’ में नील गाय खेत को तबाह कर जाती है । मुझे याद आता है वो वाकया जब कभी-कभार आने वाले भेडि़ए के डर से झब्बू भौंकता-भौंकता अचानक डर से कूँ-कूँ करता हुआ मेरी चारपाई के नीचे आ छिपता था । ‘दो बैलों की कथा’ मानो मेरे ही बैलों की कथा है । जुलाई, 2005 में दुनिया के परदे पर हैरी पॉटर का छठा संस्करण रिलीज़ हुआ था। भारत में पहले ही दिन एक लाख प्रतियां बिक गई थीं। पश्चि़‍म की यही कार्य-प्रणाली है । आप इसे षड्यंत्र कहें या अंग्रेज़ी संस्कृ।ति का वर्चस्व । अंग्रेज़ी साम्राज्य या संस्कृति हर दो-चार साल में ऐसे तमाशे करती रहती है, जिसमें तीसरी दुनिया विशेषकर पूर्व कॉलोनियल राष्ट्र अपनी पूरी जनता को झोंक देते हैं । विदेशी न्यूज़ चैनलों के बाद तो सारी लगाम उनके पास है। पहले जुरासिक पार्क या एनाकोंडा था तो उसके बाद ग्लैडियेटर जैसी ही कुछ फिल्में। अंग्रेज़ी प्रबंधन गुरुओं की कुछ ‘हल्ला्-बोल’ किताबें भी उसी का हिस्सा हैं । यानी‍ कि बच्‍चों से लेकर बूढ़े तक, संगीत से लेकर फिल्म तक, सभी के लिए मूर्ख बनाने को कुछ न कुछ। इसी के नशे में तो कभी-कभी यह सुनने को मिलता है, हिन्दी में क्या है, न पॉटर, न पिज्जा। प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ में क्या किसी भी हैरी पॉटर से कम आकर्षण है? मुझे लगता है कि मेरी पीढ़ी ने ‘दो बैलों की कथा’ को घर-घर तक न पहुँचा कर प्रेमचंद की विरासत का अपमान किया है। तभी ये पीढ़ी प्रेमचंद की बजाए हैरी पॉटर खरीद रही है । खुद मेरे बच्चों को किसी ने गिफ्ट दी थी, वो आज भी रखी है। खुशी है कि मेरे बच्चों ने उसे सूँघ कर एक तरफ रख दिया है। अंग्रेज़ी भाषा हो या कोई भी दूसरी विदेशी भाषा, बच्चों की अपनी निजी फैंटेसी में मुश्किल से ही प्रवेश कर पाती हैं ।

‘दो बैलों की कथा’ सिर्फ बैलों की कथा नहीं। आप याद कीजिए, उसमें मानवीयता है, करुणा है। उसमें आजादी की प्रतिध्वनियाँ हैं। अपने मालिक के प्रति जो प्रेम है, ऐसा मानवीकरण दुनिया के साहित्य में बिरले ही मिलेगा। मोती बदला लेना चाहता है, उस मालिक से जो उसे झूरी के यहाँ से जबरदस्ती ले आया है, लेकिन उसके मन में तुरंत ख्याल आता है, इससे तो वो बालिका अनाथ हो जाएगी, जो उसे रोटी खिलाती है। अपने समय की सच्चाई को एक बड़ा लेखक कितने प्रतीकों से कहता है । इस कथा के इतने आयाम हैं कि दर्जनों पृष्ठि भरे जा सकते हैं। ‘ईदगाह’ कहानी को याद कीजिए- मैं जब भी दशहरे के मेले में गया, चिमटा तो मैं कभी नहीं खरीद पाया लेकिन हर बार चिमटे वाले की दुकान में ज़रूर गया था। दफ्तर में फाइलों को निपटाते वक्त ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुझे ‘पंच परमेश्वेर’ की याद न आई हो। किसी के लिए कोई अवाँछित सिफ़ारिश या लोभ देता है, पंच परमेश्वर तुरंत आपके अंदर प्रवेश कर जाता है। लोग कहते हैं कि साहित्य से कुछ नहीं होता, लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सिर्फ ऐसा साहित्य ही मनुष्यी को बदलता है और एक मनुष्य को बदलना पूरे समाज को बदलना है क्योंकि यह श्रृंखला पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे साहित्य से ही आगे बढ़ सकती है।

एक और मशहूर कहानी है- ‘मंत्र’, यदि मैं सच्चाई बयान करूँ तो यह कहानी मुझे हर सफ़ेदपोश, अमीर के प्रति इस पूर्वाग्रह से भर देती है कि एक अमीर एक गरीब से बेहतर इंसान कभी भी नहीं हो सकता। ‘मंत्र’ कहानी में उस बूढ़े का बेटा मर जाता है क्योंकि डॉक्टर साहब गोल्फ खेलने जा रहे हैं और देखने से मना कर देते हैं, लेकिन जब उन्हीं डॉक्टर के इकलौते बेटे को साँप डस लेता है और यही बुजुर्ग भगत, जो साँप का जहर उतारना जानते हैं, सुनते हैं तो चुपचाप बिना बुढि़या को बताए कशमकश में वहाँ पहुँचते हैं और जहर को उतार देते हैं और बिना किसी को बताए या पुरस्कार का इंतजार किए चुपचाप खिसक लेते हैं। मेरी ‘वर्ग दृष्टि’ अगर कुछ है तो ‘मंत्र’ जैसी कहानियों की देन है, जिससे मुझे लगता है कि हर अमीर अपनी सर्वश्रेष्ठ मानवीयता में भी उतना मानवीय नहीं हो सकता, जितना कि गरीब, फटेहाल। ज़रा ‘बड़े भाई साहब’ कहानी को याद करें, क्या मौजूदा स्थिति में बड़े भाई साहब का काम माँ-बाप, पड़ोसी, छोटे-बड़े भाई-बहन मिलकर नहीं कर रहे हैं ? क्या हमारे मौजूदा समसामयिक लेखन में उसकी ऐसी तीव्र अभिव्यीक्ति कहीं सुनने को मिलती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सभी ने ऐसी व्यवस्था के साथ समझौता कर लिया है? ‘जुलूस’ कहानी मुझे याद है। कहानी पढ़ते-पढ़ते आँखें डबडबा जाती हैं। कितनों का नाम लिया जाए! पूरी तीन सौ से अधिक कहानियाँ, इतने बड़े-बड़े 5-6 उपन्यास, नाटक, कहानी- परिमाण और गुणवत्ता दोनों में इतनी विराटता।

यह तो रही उनके लेखन में अपनी जिंदगी के अक्‍स देखने की कुछ मोटी-मोटी बातें। उनके जीवन पर गौर करें तो पाते हैं कि यह शख्स शुरू से ही सामाजिक रूप से कितना सचेत और सक्रिय था। विधवाओं के प्रति क्रूरता हिन्दी साहित्य से लेकर बंगला साहित्‍य सभी में चित्रित की गई है। प्रेमचंद ने सचेतन रूप से एक विधवा शिवरानी देवी से शादी की। 1913 में आर्य समाज के सुधार आंदोलन में शिरकत की। स्वतंत्रता आंदोलन पिछली सदी की शुरुआत में ही परवान चढ़ने लगा था। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ देशभक्ति की कहानियों से भरा पड़ा है, जिसे जब्त् कर लिया गया । 1921 में जब गाँधी जी गोरखपुर पहुँचे और असहयोग आंदोलन में सहयोग देने के लिए छात्रों/शिक्षकों और सभी देशवासियों से स्कूल-कॉलेज छोड़ने की अपील की तो 1921 में प्रेमचंद सरकारी नौकरी से बाहर आ गए। बाहर आने के बाद उन्होंने खादी बनाने के करघा का कारखाना लगाया। यानी‍ कि जो उनकी लेखनी में है, वह उनके जीवन में भी है। यदि इसे मेरी गाँधी जी और प्रेमचंद के प्रति अंध-भक्ति न माना जाए तो कथनी और करनी का जितना कम अंतर गाँधी जी में है तो उनके चेले प्रेमचंद में भी उतना ही है । ‘ठाकुर का कुआं’ या ‘मोटे राम शास्त्री का सत्याग्रह’ या दूसरी कहानियों में जिन रूढि़यों, अंधविश्वासों, जातिवाद का वे विरोध करते हैं, उनके जीवन में भी वह उतना ही है । 1928 में बेटी कमला का विवाह किया लेकिन कन्यादान करने को तैयार नहीं हुए। कहना था, ‘जानवरों का दान किया जाता है, बेटी का नहीं’। साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर चतुरसेन शास्त्री की पुस्तक ‘इस्लाम का विष वृक्ष’ प्रकाशित हुई । प्रेमचंद ने तुरंत इसके खिलाफ लिखा कि यह साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाली पुस्तक हो सकती है। आगे चलकर जब मुहम्म्द इक़बाल ने पाकिस्तान का नारा दिया तो उन्होंने उसका भी विरोध किया। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘रंगभूमि’ में ईसाई साम्प्रदायिकता के विरोध का भी वर्णन है।

मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्ति ही इतना खरा स्टैंड ले सकता है । ऐसे कितने ही बिम्ब मेरे दिमाग में घूम रहे हैं । एक शख्सं है, जो आजादी की लड़ाई में भी साथ है, उपन्यास भी लिख रहा है, पत्रिकाएं भी निकाल रहा है जैसे– ‘मर्यादा’, ‘माधुरी’ और 1930 में ‘हंस’। यही कारण था कि‍ 1936 में उनकी पहल पर ही भारतीय साहित्य परिषद के पहले अधिवेशन में गांधी, नेहरू, राजागोपालाचार्य, पुरुषोत्तम दास टंडन, राजेंद्र प्रसाद, बालकृष्ण शर्मा नवीन सभी उपस्थित थे। पहली बार खुलकर हिन्दुस्तांनी भाषा की वकालत की । न उर्दू, फारसी और न संस्कृतनिष्ठ हिन्दी। क्या आप सबको नहीं लगता कि हिन्दुस्तानी ही आज के अंग्रेज़ी माहौल को चुनौती दे सकती है? यह उनकी राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक स्वीकृति और हैसियत का परिणाम था कि जब जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ हिन्दी में निकलवाई तो उसके अनुवादक के रूप में प्रेमचंद को चुना और 1931 में प्रकाशित इस पुस्तिक में नेहरू जी ने प्रेमचंद के प्रति बाक़ायदा आभार व्यक्त किया है।

‘सोज़े वतन’ को अंग्रेज़ी सरकार ने ज़ब्त कर लिया था, इस चेतावनी के साथ कि मुगलों का राज होता तो दोनों हाथ काट लिए जाते । यानी‍ कि भविष्य में भी ऐसा न लिखने के लिए सख्त चेतावनी। लेकिन क्या प्रेमचंद जी रुके ? हमारी पीढ़ी तो जार-जार रो-रोकर कई ऑडिटोरियम और सभागारों को भर देती। लेकिन इस लेखक ने धनपतराय नाम के बजाए प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया, अपने शस्त्र बदले, मैदान नहीं छोड़ा, उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में भी। उनके योगदान का हिन्दी साहित्य खुद गवाह है । यह किसी भी पीढ़ी के लिए कम प्रेरणादायक नहीं कि वो ऐसा लिखे, जिससे सत्ता डरे। कम से कम आज़ाद भारत के लेखन में बहुत कम ऐसे लेखक हैं, जो सत्ता् को सीधे-सीधे चुनौती दे सके । यहाँ मुझे अंग्रेज़ी के जाने-माने पत्रकार, लेखक और राजनीतिज्ञ राजमोहन गांधी के भाषण का वह वाक्य याद आता है, जो उन्होंने साहित्‍य अकादमी के सभागार में कई साल पहले दि‍या था। शीर्षक था ‘शत्रुता में एकता’। राजमोहन गांधी का कहना है, इस देश का इतिहास ही यह है कि जब उसका शत्रु सामने रहता है, तो उसे मारने, हटाने के लिए हम सभी एकजुट हो जाते हैं लेकिन उसको मारने के बाद, शत्रु को खत्म करने के बाद, क्या करेंगे ऐसा खाँचा या साँचा हम लोग बनाकर नहीं रखते। सन सैंतालीस में अंग्रेज़ों को भगाकर आज़ादी तो ले ली, आज़ादी के बाद क्या करेंगे, इसके बारे में वे बहुत साफ़ नहीं थे ।1977 में भी यही हुआ। मैं अपनी बात पर लौट कर आता हूँ । आजादी के बाद असमान भूमि वितरण, जमींदारी प्रथा, अंधविश्वास, जाति प्रथा, शिक्षा, सामाजिक समानता- क्या ये कम बड़ी चुनौतियाँ थीं ? ज्यादातर भारतीय आज भी उतने ही गरीब हैं, उतने ही जातिवाद में उलझे हैं, जितने कि प्रेमचंद के समय में थे। उतनी ही शैक्षिक अव्यवस्थां से गुजर रहे हैं, जितने कि प्रेमचंद का भारत। समसामयिक कथा साहित्य में इन समस्या़ओं को और भी गंभीरता और मिशन के साथ लाने की ज़रूरत है।

लेकिन कभी-कभी तो उलटे प्रेमचंद पर भी जातिवादी आरोप लगाए जाते हैं । इन आरोपों की भी एक सधी हुई राजनीति है। उन राजनेताओं की जिनके हाथ प्रेमचंद जैसे लेखकों की पुस्तीकों को जलाते हुए नहीं काँपते ।शिक्षा शास्त्री कृष्ण कुमार के शब्दों का सहारा लूँ तो आज की ज्यादा पढ़ी हुई पीढ़ी जितनी सांप्रदायिक है, उतनी गरीब, बिना पढ़ी हुई नहीं? इसका कारण है उनको पढ़ाया जाने वाला वो इतिहास जो दोनों देशों में एक पक्षधरता के साथ पढ़ाया जा रहा है। मुझे लगता है कि प्रेमचंद साक्षात कबीर हैं। आजादी के बाद हरिशंकर परसाई के अलावा मुझे तो कोई दूसरा याद नहीं पड़ता। ‘कफ़न’ में चमार शब्द का इस्तेमाल उस गरीब की स्थिति का बखान है। रंगभूमि में प्रेमचंद का एक वाक्य देखिए, ‘शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं, उन्हीं में एक गरीब और अंधा चमार है, जिसे लोग सूरदास कहते हैं।’ पूरी समग्रता में समझने की ज़रूरत है, यहाँ प्रेमचंद को उनकी निष्ठा के प्रति शक कोई मूर्ख ही कर सकता है। समाज के इस वर्ग के प्रति उनकी करुणा और सहानुभूति का नाम ही प्रेमचंद है। मैं किसी के प्रति पूजाभाव में यकीन नहीं रखता। दरअसल पूजाभाव ही हमारे समाज को यथास्थिति में रखने के लिए एक बहुत बड़ा कारण है। यूरोप में रेनेसाँ से पहले पूजाभाव रहा, लेकिन उसके बाद जो धर्म, परंपरा, समाज के प्रति वैज्ञानिक संशय, संदेह बढ़ा, उसी से यूरोप वैज्ञानिक उपलब्धियों की तरफ बढ़ता जाता है और हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अमेरिका, यूरोप भागने के लिए, कभी-कभी पनडुब्बियों के पेंदे में छिपकर भी। हमें असहमति ज़ाहिर करने का पूरा हक है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि के साथ, एक संयम के साथ। इस देश को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र/लोकतंत्र कहा जाता है तो क्या यही लोकतंत्र की निशानी है ? यह नहीं कि असहमति की रस्सी से आप प्रेमचंद को भी फाँसी पर लटका दें।

जब अमेरिका की याद आई है और अमेरिका भागने की, तो इस संबंध में प्रेमचंद की जीवनी भी टटोली जाए। आप सबने प्रेमचंद की जीवनी पढ़ी होगी ‘कलम का सिपाही- प्रेमचंद’। उनके बेटे अमृतराय की लिखी हुई। मुझे इसे पढ़ते हुए अनुभव हुआ कि प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे को ही क्यों लिखनी पड़ी। क्या उनकी जीवनी सात-आठ राज्यों में फैली हिन्दी भाषा का कोई और लेखक नहीं लिख सकता था ? और यदि ऐसा होता तो वाकई यह प्रेमचंद के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धां‍जलि होती। कुछ छोटे-मोटे प्रयास हुए हैं लेकिन इतना अच्छा काम नहीं हुआ, जितना अमृतराय ने किया है। दुनिया भर के साहित्य में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिन पर सौ, दो सौ, चार सौ साल बाद भी जीवनी लिखी गई हैं। यहां तक कि कई बार दूसरी भाषा के लेखकों द्वारा भी लिखी गई हैं। हाल ही में स्टीफन स्वाइग की ‘वो गुज़रा ज़माना’ (हिन्दी अनुवाद: ओमा शर्मा) पढ़ते वक्त लगा कि स्टीफन ने अपनी लेखनी से महत्वपूर्ण काम तो जीवनी लिखने का किया है । टॉलस्टॉ्य, बालज़ाक, दोस्तोवस्की की जीवनियाँ जर्मन लेखक स्टीफन स्वाइग ने लिखी हैं । खुद महात्मा गाँधी पर जितनी अच्छी जीवनियां विदेशियों ने लिखी हैं, उतनी हमने नहीं। गाँधी पर 1905 के आसपास पहली बायोग्राफी एक विदेशी ने लिखी थी।

हाँ तो, मैं ‘कलम के सिपाही’ की बात कर रहा था। यहाँ एक लेखक है, जिसका नाम है प्रेमचंद। रात-दिन अपनी लेखनी को छोड़कर शांति निकेतन तक भी जाने में जिसकी रुचि नहीं है । मन कर रहा है कि ‘कलम का सिपाही’ के कुछ पृष्ठ आपके सामने रखूँ- “बनारसी दास चतुर्वेदी ने प्रेमचंद को उलझाने के ख्याल से तुलसी जयंती के साथ नत्थी करना चाहा, मगर प्रेमचंद उससे भी निकल भागे (पृष्ठ 570 -71)। “जहाँ तक तुलसी जयंती की बात है, मैं इस काम के लिए सबसे कम योग्य हूँ । एक ऐसे समारोह का सभापतित्व करना, जिसमें मुझे कभी कोई रुचि नहीं रही, बिल्कुल मज़ाक की बात होगी। मुझे बड़ा डर लगता है। सच तो यह है कि मैंने रामायण आद्योपांत पढ़ी भी नहीं। यह एक लज्जा की बात है, मगर सच बात है।”

तीन महीने बाद फिर किसी प्रसंग में शांति निकेतन का निमंत्रण मिला। वह भी निष्फल हुआ और 18 मार्च, 1936 को मुंशी जी ने चतुर्वेदी जी को लिखा-

“मैं शांति निकेतन न जा सका। मेरे लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं है। वे लोग मुझसे विद्वतापूर्ण व्याख्यान की आशा करेंगे, और वह मेरे बस का रोग नहीं। मैं कोई विद्वान आदमी नहीं हूँ । तो भी अगर वह लोग मुझे पहले से आमंत्रित करें तो मैं आने का प्रयत्न करूँगा। तार से दी गई एक मिनट की सूचना पर मैं तैयारी नहीं कर सकता।”

एक रोज़ उन्होंने पत्नी से कहा, “इच्छा होती है कि नौकरी छोड़-छाड़कर कहीं एकांत में बैठकर लिखता-पढ़ता। क्या करूँ, मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे पास थोड़ी-सी जमीन भी नहीं। अपने खाने भर का गल्ला पैदा कर लेता और चुपचाप एकांत में बैठकर साहित्य की सेवा करता ।”

कितना साम्या है गाँधी जी और प्रेमचंद के इन विचारों और जीवन में। महात्मा गाँधी को अमेरिका जाने के कितने आमंत्रण मिले लेकिन हर बार वह उसे उतनी ही विनम्रता से मना करते रहे क्योंकि उनका कुरुक्षेत्र, रणक्षेत्र, युद्धक्षेत्र जो भी कहो तो यहीं इस देश में था। यहाँ से भागने का नहीं । इसके विपरीत जब अपने दर्जनों दोस्तों को अमेरिका, फ्राँस की तरफ दौड़ते देखता हूँ तो अफसोस होता है। दिल्ली‍ विश्वविद्यालय के जाने-माने प्रोफेसर जो अमेरिकी विरोध में लिखते-लिखते ही इन पदों पर पहुँचे, अगले दिन पता लगता है कि वो अमेरिका चले गए और ज्यादा अफ़सोस तब होता है, जब उन्होंने न आने का मन बना लिया है। देश-भक्ति का राग अलापना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात है। लेकिन कर्म और जीवन में कुछ तो साम्य रखना चाहिए।

अगर उनकी लेखकीय जिंदगी जाननी हो तो इस पुस्तक के पृष्ठ 345 से 347 ज़रूर पढ़ें । कुछ लाइनें उद्धृत करने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा हूँ- “दूसरी किसी चीज़ में न तो उन्हें मज़ा मिलता था और न उसके लिए उनके पास वक्त ही था। जैनेन्द्र को बड़ी हैरानी हुई थी, जब मुंशी जी ने सन 31 की अपनी दिल्ली-यात्रा के समय उनको बतलाया था कि अपनी जिंदगी में पहली बार वह दिल्‍ली आए हैं। इक्यावन-बावन साल की उम्र में पहली बार उन्होंने दिल्ली का मुँह देखा। और फिर उतनी ही हैरानी जैनेंद्र को यह जानकर हुई थी कि उस प्रवास के वह सात दिन उनकी जिंदगी के पहले सात दिन हैं (बीमारी के दिनों के अलावा) जबकि उन्होंने कुछ नहीं लिखा।”

ऊपर से देखने पर भले लगे लेकिन दोनों दो अलग चीजें नहीं, एक ही चीज़ के दो पहलू हैं। या तो घूम फिर ही लो या काम ही कर लो। कुछ लोग दोनों को एक साथ निभा ले जाते हैं। मुंशी जी उनमें नहीं थे, न स्वभाव से और न अपनी सांसारिक स्थिति से, लिहाज़ा उन्होंने ख़ामोशी से एक कोने में बैठकर बराबर और अनथक काम करने की जिंदगी ही अपने लिए चुन ली थी और जिंदगी शुरू करते समय ही चुन ली थी, जिससे फिर कभी इधर-उधर नहीं हुए। जैसा कि उसी ख़त में उन्होंने इंद्रनाथ मदान को लिखा था-

“मैं रोमॉ रोलां के समान, नियमित रूप से काम करने में विश्वास करता हूँ ।”

तो यह था हमारे हिन्दी साहित्य के अब तक के सबसे बड़े लेखक का जीवन। न केवल अमेरिका बल्कि किसी भी समझौते के लिए हमारी समकालीन पीढ़ी तैयार है। वह पुरस्कार हो या किसी भी तरह अमेरिका, इंग्लैंड जाना। कहीं भी एक दिन के लिए भी जाने के लिए हर समझौता करने के लिए तैयार। कभी-कभी तो लगता है कि ऐसी पीढ़ी को क्या प्रेमचंद को याद करने का अधिकार है? बड़े से बड़े बुजुर्ग सम्मा़नीय लेखक भी पुरस्कारों की लाइन में खड़े होकर बधिया होने को तैयार हैं । एक बार प्रसिद्ध कथाकार संजीव घर आए हुए थे । उन्होंने एक लेखक की पुरस्का़र लिप्सा की दास्ताँ बयान की। लेखक मुख्यमंत्री के घर पहुँचे, एक साहित्यिक दलाल के साथ । मुख्यमंत्री कभी बाथरूम में, कभी टॉयलेट में। घंटे दो-घंटे बाद गमछे में बाहर आते हैं और पूछते हैं क्या चाहिए? लेखक और दलाल मिनमिनाते हैं। पूछते हैं 5 हजार चलेगा ? वे और गिड़गिड़ाते हैं और राशि 11 हजार कर दी जाती है। यह रोज़ हो रहा है।

साहित्य अकादमी के भवन का नाम रवींद्र भवन है। वहीं पास में एक और गली लेखक सफ़दर हाशमी के नाम से भी है। लेकिन पूरी दिल्ली में प्रेमचंद के नाम से शायद ही कोई मार्ग या भवन होगा। होना चाहिए, लेकिन यह कहाँ हो, इस पर सोचने की जरूरत है। मंडी हाउस की एक सड़क का नाम कोपरनिकस मार्ग है ।यदि मैं गलत नहीं हूँ तो यह कोपरनिकस वही हो सकते हैं, जिन्होंने गैलिलियों से पहले खगोल विज्ञान में प्रसिद्धि पाई- लगभग चार सौ साल पहले। अच्छा हो इसी का नाम प्रेमचंद मार्ग कर दिया जाए। साहित्य संस्कृति के सूचक भवन साहित्य अकादमी, श्रीराम सेंटर, नेशनल स्कूंल ऑफ ड्रामा, दूरदर्शन भवन और कई थिएटर सभागार यहाँ हैं। एक सुझाव यह भी हो सकता है कि प्रेमचंद 1931 में दरियागंज में प्रसिद्ध उपन्यासकार जैनेन्द्र के यहां रुके थे। उसके आस-पास भी कोई मार्ग खोजा जा सकता है। स्मारक बनाना कोई प्रेमचंद पर अहसान नहीं है। नई पीढ़ी को हिन्दी और प्रेमचंद की विरासत से जोड़ना है। दरियागंज के पास राजघाट भी है। महात्मा गांधी जी का प्रेमचंद के ऊपर असर सर्वविदित है। क्यों न राजघाट को जोड़ने वाली सड़क का नाम प्रेमचंद मार्ग रख दिया जाए। मेरी जानकारी में प्रेमचंद परिवार की ही और जानी-मानी लेखिका सारा राय जरूर प्रेमचंद मेमोरियल स्कूल चलाती हैं। वरना हर स्कूल ‘हार्वर्ड एकेडमी’ के नाम से ही चलता है।

मैं फिर से दोहराना चाहूँगा कि न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पन्ने के ऊपर प्रेमचंद मेरे आदर्श हैं।

प्रेमचंद की सामाजिक चिंताएँ : शैलेन्द्र चौहान

प्रेमचंद

प्रेमचंद


कवि‍, आलोचक शैलेन्द्र चौहान का जन्म 21 दि‍संबर, 1954 को खरगोन में हुआ। उनके कविता संग्रह ‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’, ‘श्वेतपत्र’ ‘कितने प्रकाश वर्ष’ और ‘ईश्वर की चौखट पर’, कहानी संग्रह ‘नहीं यह कोई कहानी नहीं’ और संस्मरणात्मक उपन्यास ‘पाँव जमीन पर’ प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका ‘धरती’ का संपादन कर रहे हैं। प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई) के अवसर पर उनका लेख-

प्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखा है कि ‘मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है । बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का था जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं । इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, जरा भी रू -रियायत नहीं। उसका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाए।’ इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद की मूल सामाजिक चिंताएँ क्या थीं ।

वह भली-भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानी बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उन पर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले, कुछ थोड़े से पूँजीपति, जमींदार, व्यवसायी ही नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल (सेवक/ नौकर) उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग /मध्यवर्ग भी उतना ही दोषी था। किसान, मजदूर, दलित वर्ग न केवल शोषित और ख़स्ताहाल था बल्कि नितांत असहाय और नियति का दास बना हुआ जी रहा था। दोनों वर्गों की इतनी साफ-साफ पहचान प्रेमचंद से पहले हिन्दी साहित्य में किसी ने भी नहीं की थी। एक ओर साम्राज्यवादी अंग्रेजी शिकंजा था तो दूसरी ओर सामंतवादी शोषण की पराकाष्ठा थी। एक तरफ अंग्रेजों के आधिपत्य से देश को मुक्तत कराने के लिए आंदोलन था, दूसरी ओर जमींदारों और पूँजीपतियों के विरोध में कोई विरोध मुखर रूप नहीं ले पा रहा था। अधिकांश मध्यवर्ग अंग्रेजी शासन का समर्थक था क्योंकि उसे वहाँ सुख-सुविधाएँ, कुछ अधिकार और मिथ्या अहंकार प्रदर्शन से आत्म गौरव का अनुभव होता था।

प्रेमचंद ने अपने एक लेख में (असहयोग आंदोलन और गाँधीजी के प्रभाव में) सन 1921 में ‘स्वराज की पोषक और विरोधी व्यवस्थाओं’ के तहत लिखा था कि ‘शिक्षित समुदाय सदैव शासन का आश्रित रहता है। उसी के हाथों शासन कार्य का संपादन होता है। अतएव उसका स्वार्थ इसी में है कि शासन सुदृढ़ रहे और वह स्वयं शासन के स्वेच्छाचार (दमन, निरंकुशता और अराजकता) में भाग लेता रहे। इतिहास में ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है जब शिक्षित वर्ग ने राष्ट्र और देश को अपने स्वार्थ पर बलिदान दे दिया है। यह समुदाय विभीषणों और भगवान दासों से भरा हुआ है। प्रत्येक जाति का उद्धार सदैव कृषक या श्रमजीवियों द्वारा हुआ है।’ यह निष्कर्ष आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। प्रेमचन्द ने ‘ज़माना’ में 1919 में एक लेख लिखा था जिसमें कहा था कि इस देश में 90 प्रतिशत किसान हैं, और किसान सभा नहीं है। 1925 मे किसान सभा बनी। सामान्यत: यह माना जाता है कि मध्य वर्ग की किसी भी आंदोलन, क्रांति और विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

मध्यवर्ग का एक हिस्सा शासन का पैरोकार और दूसरा हिस्सा आंदोलनों की आवश्यकता का हिमायती होता है। यह दूसरा हिस्सा वैचारिक परिस्थितियों का निर्माण करने में तो अपनी भूमिका का निर्वाह करता है पर आंदोलन की शुरुआत की जिम्मेदारी से वह सदैव बचता रहता है। वह आंदोलन के उग्र और सर्वव्यापी होने पर ही उसमें सक्रिय हिस्सेदारी करता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस वर्ग की उदासीनता से तो प्रेमचंद क्षुब्ध थे ही, साथ ही समाज में व्याप्त अंधविश्वास, प्रपंच, सामंती शोषण, वर्ग और वर्ण भेद के वीभत्स और कुत्सित रूप के प्रति भी इस वर्ग की उदासीनता एवं तटस्थता से भी वह नाखुश थे। प्रेमचंद का जन्म पराधीन भारत की पृष्ठभूमि में हुआ था जहाँ स्वयं उनको तथा उनके परिवार को अर्थाभाव की विकट स्थितियों से गुजरने के लिए विवश होना पड़ा था। वहीं धार्मिक और सामाजिक रूढ़िग्रस्तता ने जनमानस को विचारशून्य बना रखा था (यहाँ विचारशून्यता से तात्पर्य शोषण और असमानता की परिस्थियों के प्रति विरोध न करने से है)। इसी असहायता, यथास्थिति और असमानता की जनव्याप्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रेमचंद की विचारशील प्रकृति को इस व्यवस्था के विरोध की प्रेरणा प्राप्त हुई।

‘किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी। उनका आकलन है कि अंग्रेजी राज्य में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है, उतना समाज के किसी अंग की नहीं। राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिये भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा।’ उन्हीं के शब्दों में- हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक नहीं होगी। वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा। प्रेमचंद ने अच्छी तरह समझ लिया था भारत में सबसे खराब हालत कृषकों और श्रमिकों की ही है। एक ओर ज़मींदारी शोषण है तो दूसरी ओर पूँजीपति, उद्योगपति हैं, बीच में सूदख़ोर महाजन हैं।

लेकिन यदि यहीं तक उन्होंने अपनी समझदारी का विकास किया होता तो शायद उनकी समझ और दृष्टि भारतीय समाज के चितेरे के रूप में अधूरी ही रहती। उन्होंने भारतीय जन-जीवन में सदियों से व्याप्त अमानवीय जाति प्रथा की ओर भी पूरा ध्यान दिया। इसलिए उनकी अनेक कहानियाँ वर्णव्यवस्था के अमानुषिक कार्यव्यापार का बड़ी स्पष्टता से खुलासा करती हैं। ठाकुर का कुआँ, सद्गपति, सवा सेर गेहूँ, गुल्ली डन्डा, कफन उनकी ऐसी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं, इस सामाजिक विसंगति को पूरी ईमानदारी से उजागर करती हैं। ‘ठाकुर का कुआँ’ में जोखू चमार को ज्वर का ताप अवश कर देता है ।

वहीं चमार टोले में जो कुआँ है उसमें कोई जानवर गिर कर मर गया है। उस कुएँ का पानी पीना किसी तरह निरापद नहीं है। अत: पीने के लिए स्वच्छ पानी की आवश्यकता है। अब साफ पानी सिर्फ ठाकुर के कुएँ से ही मिल सकता है, लेकिन चमार वहाँ नहीं जा सकते। वर्णधर्म के अनुसार वे अश्पृश्य तो थे ही उनकी छाया तक अपवित्र मानी जाती थी। अत: जोखू की पत्नी को रात के अंधेरे में चुपके से पानी ले आने का दुस्साहस सँजोना पड़ता है। पर ठाकुर की आवाज मात्र से ही वह भयभीत हो जाती है और अपना बरतन कुएँ में ही छोड़ कर भाग खड़ी होती है। घर लौटकर देखती है कि जोखू वही गंदा पानी पी रहा है। एक तरफ घोर अमानुषिकता है तो दूसरी तरफ त्रासद निस्सहायता है। ऐसा जोखू के निर्धन होने के कारण नहीं वरना अछूत होने के कारण है क्योंकि एक निर्धन सवर्ण को उस ठाकुर के कुएँ से पानी भरने से वंचित तो नहीं ही किया जा सकता था और चाहे जितना अत्याचार या शोषण उसका किया जाता रहा हो।

‘सद्‍गति’ कहानी में दुखी यों तो चमार जाति का है पर अपनी बेटी के ब्याह का शुभ मुहूर्त वह पंडित से निकलवाने पहुँच जाता है। बावजूद भूखे पेट होने के वह पंडित के आदेशानुसार श्रम करता है और अंतत: लकड़ी चीरता हुआ मर जाता है। उसकी लाश के साथ पंडित परिवार का व्यवहार क्रूरता की चरम स्थिति वाला होता है। वह उसे घिसटवा कर फिंकवा देता है। ‘सवा सेर गेहूँ’ में पंडित सूदखोर है। शंकर आजन्म उस पंडित का सूद नहीं चुका पाता। ‘कफन’ के घीसू और माधव भी दलित हैं और व्यवस्था के दुचक्र ने उन्हें जिस मोड़ पर पहुँचा दिया है वह भी अमानवीय ही है। ‘गुल्ली डन्डा’ का गया भी अपनी स्थिति से बाहर निकल पाने में असमर्थ होता है।

‘गोदान’ का होरी, महतो है और राय साहब, पंडित दातादीन और महाजन के शोषण का शिकार होता है। होरी के मर जाने पर गोदान के बहाने पंडित दातादीन होरी की पत्नी धनिया की जमा पूँजी ‘सवा रुपये’ भी हड़प लेता है। यहाँ हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि एक ओर प्रेमचंद की कहानियों में अद्वितीय ‘पूस की रात’, ’पंच परमेश्वर’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘नमक का दरोगा’ जैसी कहानियाँ हैं एवं ‘निर्मला’, प्रेमाश्रम’, ‘कायाकल्प’ और ‘गबन’ जैसे सामाजिक कुरीतियों और नारी शोषण पर आधारित उपन्यास हैं। वहीं ‘गोदान’ में उनकी वर्णचेतना, वर्गचेतना तक विस्तृत होती है। ‘गबन’ उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आनेवाले राज्य के शासक वर्ग और उसके हाकिम-हुक्कामों के बारे में तगड़ा संशय है- ‘अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे । पहले अपना उद्धार कर लो, गरीबों को लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है… सच बताओ, तब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है ? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाठ बनाये घूमोगे । इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा ? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा… तुम दिन में पाँच बेर खाना चाहते हो और वह भी बढ़िया माल । गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता । उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है ? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो गरीबों को पीस कर पी जाओगे ।’

सन 1933 में संयुक्त प्रान्त के गर्वनर मालकम हेली ने कहा था कि- ‘जहाँ तक भारत की मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिये कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिये जवाबदेह हो।’ प्रेमचन्द ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा कि- ‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुज़रा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’ प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्या को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की।

जीवन का रीटेक हैं शेखर जोशी की कविताएं : प्रो. राजेन्द्र कुमार

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।


इलाहाबाद : इलाहाबाद के साहित्यिक बिरादरी के सबसे खास पुरनिये शेखर जोशी पर जन संस्कृति मंच (कविता समूह) और परिवेश द्वारा बहुत दिन बाद इलाहाबाद वापस आने पर 20 जुलाई 2013 को संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पर ‘नई कहानी के चर्चित कहानीकार शेखर जोशी के बजाय चर्चा के केन्द्र में था शेखर जोशी का कवि रूप जो उनके कहानीकार रूप में विकास का एक हद तक साक्षी भी था’। यह बात उनके प्रथम कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ की चर्चा पर प्रायः सभी वक्ताओं द्वारा संज्ञान में ली गई। संग्रह की भूमिका कवि वीरेन डंगवाल द्वारा लिखी गई है और लेखक द्वारा उसका समर्पण कवि हरीशचन्द्र पांडेय के लिए किया गया है। अस्सी पार शेखर जी को अपने बीच पाकर जहाँ शहर का साहित्यिक समाज गदद था वहीं इलाहाबाद के छूटने का दर्द कई बार शेखर जी की आँखों से बाहर आने को आतुर दिखा।

संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में शहर इलाहाबाद के मशहूर कवि हरीशचन्द्र पांडेय को सुनना बेहद महत्त्वपूर्ण रहा। अपने सधे हुए वक्तव्य में उन्होंडने रेखाँकित किया कि शेखर जोशी की कविता में सिर्फ पहाड़ का सौन्दर्य ही नहीं, श्रम का सौन्दर्य भी शामिल है। यथार्थ की जटिलताओं से टकराती उनकी कविताओं में कलात्मक सन्धान के साथ कथ्य भी है। वस्तुतः वह जिस यथार्थ के अनुभव से रूबरू होते हैं, उसकी जटिलताएं कविता में संकेत के रूप में सामने आती हैं और कहानियों में इन्हें विस्तार मिलता है। वह अगर कविता भी लिखते तो उतने ही बड़े कवि होते है जितने बड़े कहानीकार हैं। दिल्ली से आए जन संस्कृति मंच, कविता समूह के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशुतोष कुमार ने शेखर जोशी को श्रम के सौन्दर्य के साथ-साथ श्रम की विडंबना के कवि के रूप में याद किया और कहा कि उनकी कविताओं में कई ऐसे सूत्र मिलाते हैं जिनसे नई कहानी के संघर्ष को भी समझा जा सकता है।

इस अवसर पर बोलते हुए शेखर जोशी ने कविता के सौन्दर्य के बजाए इनकी रचना प्रक्रिया को खोलना महत्त्वपूर्ण समझा। कई कविताओं के पाठ और इनके लिखे जाने की स्थितियों पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि विचलित करने वाली स्थितियों में बनने वाले रचनात्मक दबाव से ही यह कविताएं लिखी जा सकी है। इनका समय करीब 55 से 60 साल के लम्बे अंतराल में फैला हुआ है। मैं नही जानता कि इन कविताओं के पसन्द किए जाने के पीछे इनकी गुणवत्ता है या मेरे प्रति प्यार, लेकिन इनके सृजन के लिए मेरा परिवेश ही मुझे जब-तब प्रेरित करता रहा है। इस अवसर पर उन्होंने सिख विरोधी दंगों के समय लिखी गई लम्बी कविता ‘अखबार की सुर्खियों में चला गया करतार’ के साथ- साथ ‘पाखी के लिए’, ‘अस्पतल डायरी’, आदि कई कविताएं सुनाकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि शेखर जी की कविता में परिवेश और उसकी स्मृति-विस्मृति को फिर से जी लेने की इच्छा व्यक्त हुई है। उनकी कविता जीवन का रीटेक है। गोष्ठी के आखिर में दोनो वक्ताओं ने अपनी पसन्द की दो- दो कविताएं सुनाई। शुरुआत में वरिष्ठ कवि शिवकुटी लाल वर्मा, शायर ख्वाज़ा जावेद अख्तर और महान स्त्रीवादी चिंतक शर्मिला रेगे को श्रद्धांजलि दी गई। संयोजन दुर्गाप्रसाद सिंह ने किया जबकि संचालन रामायण राम ने किया। कार्यक्रम में जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, रामजी राय, जी.पी. मिश्र, कहानीकार अनिता गोपेश, नीलम शंकर, कवि संतोष चतुर्वेदी, विवेक निराला, अरुण आदित्य, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव अविनाश मिश्र सहित बड़ी संख्या में छात्र नौजवान शामिल थे।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सचिव, जन संस्कृति मंच

नित्यानंद गायेन की चार कवि‍ताएं

नित्यानंद गायेन

नित्यानंद गायेन

याद है तुम्हें?

बेहद दुखद
फिर कहा घिनौना कृत
तो कभी सहानुभूति के दो शब्द
ये सब है औपचारिकता
इन शब्दों से नहीं होती हमारी सुरक्षा
क्यों नहीं उठती आवाज़
अन्याय के विरुद्ध?
आधी आबादी जल रही है
हिंसा की आग में।

यौन शक्ति बढ़ाने की दवाइयों से
मर्द नही बना जाता है
नियम, पाबंदी और आदर्श
क्यों छोड़े गये हमारे हिस्से
सभी अधिकारों पर
क्यों है तुम्हारा कब्ज़ा
देह की बनावट से
बदल नहीं जाती इच्छाएं
कुछ सपने हमारे हिस्से के हैं
कभी समझा है आपने
मानव सभ्यता का प्रारंभ
हम दोनों से ही हुआ था
याद है तुम्हें?

हरे घास के मैदान

उस बूढ़े घोड़े को
स्वप्न में दिखा
चारों ओर
हरे घास के मैदान

हाँपते-हाँपते
दौड़ पड़ा वो

अचानक देखा
एक ऊँचा पहाड़
एक दम काला
कहीं भी नही
घास का एक ति‍नका
जाग उठा घोड़ा
खूब शर्माया
बुढ़ापे में देखे
अपने ‘हरे’ सपने पर…

और हम बन जाते हैं इतिहास

उधर दंतेबाड़ा और जंगलमहल से
बंदूकों की आवाज़
इधर विदर्भ और कालाहांडी से
भूखी आँतों की चीखों के बीच
वे दिखाना चाहते हमें
चमकता भारत

छीनकर हमारी जमीन
जंगल से बेदखल कर
बाँट रहे हैं पैकेज
कभी मोबाइल
कभी लैपटाप बाँटने की घोषणा
अधिकारों के नाम पर
कागज़ पर कुछ आरक्षण
फिर काट देते हैं हमें
दिल्ली, गोधरा, मुंबई
और असम में
पढ़ते हुए संविधान

और हम बन जाते हैं
इतिहास…

मैंने पहचान लिया है खुद को

तुम्हारे पक्ष में
मैंने नहीं की बात
यही गुनाह किया है
दरअसल मैंने कुछ देर से
पहचाना तुम्हारा चेहरा
नकाब उतारने में
कुछ वक्त लगा है मुझे

इसलिए नही दोहराया
मैंने अपनी गलती को
तुम्हें अफ़सोस है मेरी बेवफाई पर
पर मुझे संतोष है
तुम्हारे साथ-साथ
मैंने पहचान लिया है खुद को

मिड डे मील : भास्कर चौधुरी

mid day meal
ईंटो के ढेर पर
उकड़ूँ बैठा हुआ बच्चा
कक्षा दूसरी का है
एकटक देख रहा है
चंद ईंटों को जोड़कर बने चूल्हे
पर रखी है हंडिया
आग की लपट पहुँच रही है उस तक
वह इतने पास है शायद
हंडिया में कई आँखों वाले आलू उबल रहे हैं
नहीं मालूम बच्चे को कि आलू के साथ-साथ
पक रहा है हंडिया में कीटनाशक का ज़हर
जिसे पकाने वाली के बच्चे खायेंगे
वह खायगा और उसके जैसे कई बच्चे भी
खाएगा उल्टी करेगा और मारा जाएगा
वह और उसके जैसे कई और बच्चे भी
मारे जाएंगे साथ-साथ
उसकी कक्षा के बाहर ही उसकी कब्र होगी
आस-पास सन्नाटा पसरा होगा दिन के उजाले में
और कक्षा के अंदर चंद किताबें छितरी-बितरी
कब्र पर बिछेगी राजनीति की बिसात
लोग आएंगे सफेद पोश
अपनी-अपनी कारों-जीपों में
पीं-पीं करते
उनके काफिले में शमिल बंदूकधारी
डर उनको शायद
मरने वाले बच्चों की माँएं
उनके सर न फोड़ दे कहीं डंडों से
चल निकलेगा आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला
भोंपुओं से कभी न पहुँचने वाली राहत की
घोषणाओं की बाढ़ आ जाएगी
आस-पास लोग आँखें और सर नीची कर
सुनने को मज़बूर
जाएं तो जाएं कहाँ
काट खाने को दौड़ रहे हैं घर
बगैर बच्चों के सूने
काश ज़हर की पुड़िया ये नेतागण
बांट आये एक-एक घरों में बेनागा
हाथ जोड़े या न जोड़े फिर भी
पाँच साल बाद मरने वालों के भूतों के वोट पक्के….

अपने समय का सटीक आकलन करती हैं नित्यानंद की कविताएँ

काव्य पाठ करते नित्यानंद गायेन।

काव्य पाठ करते नित्यानंद गायेन।


नागपुर : नित्यानंद अपने समय का समग्र निरीक्षण करते हैं और उनकी कविताएँ उनकी निरीक्षण दृष्टि का सटीक आकलन करती हैं। यह बात प्रतिष्ठित मराठी कवि प्रसेनजीत गायकवाड़ ने 19 जुलाई 2013 की शाम नागपुर के तुलसीता आर्ट गैलरी में नित्यानंद गायेन के एकल काव्यपाठ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कही। कार्यक्रम में नित्यानंद ने चालीस कविताएँ पढ़ीं जिन्हें श्रोताओं की भरपूर सराहना मिलीं।

नित्यानंद ने अपने काव्य संग्रह ‘अपने हिस्से का प्रेम’ से और ‘संकेत’ पत्रिका से चयनित कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन हेमधर शर्मा ने किया। आयोजन तुलसीता आर्ट गैलरी एवं लीला बहुद्देशीय संस्था ने संयुक्त रूप से किया था। इस अवसर पर प्रख्यात लोकधर्मी शिल्पकार-चित्रकार गोपाल नायडू, मशहूर नाट्यकर्मी विनोद व्यास, प्रतिष्ठित कवि बसंत त्रिपाठी, चित्रकार सुभाष तुलसीता, फोटोग्राफर रविकांत साने, राजेश शर्मा आदि‍ उपस्थित थे।

कि‍ताबों से दोस्ती : अनुराग

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अधि‍कांश अभि‍भावक कहते हैं कि‍ हमारे बच्चे कोर्स की कि‍ताबों के अलावा कुछ नहीं पढते। उनके पास समय ही कहां है? लेकि‍न, यह बात उतनी की भ्रामक है, जि‍तना यह सोचना कि‍ सबसे अधि‍क अंक लाने वाला बच्चा ही सबसे समझदार और ज्ञानवान होगा। खुद को ज्यादा समझदार मानने वाले अभि‍भावक तो चाहते भी नहीं हैं कि‍ उनका बच्चा पाठ्यक्रम से इतर कि‍ताबें पढ़े। आप बच्चे को कि‍ताब देना चाहेंगे तो वे मना कर देंगे। कहीं से बच्चा कि‍ताब ले आए और वे उसे पढ़ता हुए देख लें तो तुरंत कि‍ताब छीन लेंगे, ‘कोर्स की कि‍ताबें पढ़ो। इनमें समय बर्बाद मत करो। परीक्षा में नंबर कम आएंगे।’

यहां दो सवाल उठते हैं। पहला, क्या बच्चे पाठ्यक्रम से अलग कि‍ताबें नहीं पढ़ना चाहते? दूसरा, साहि‍त्य पढ़ने से क्या लाभ है या हमें साहि‍त्य क्यों पढ़ना चाहि‍ए?

मेरा अनुभव है कि‍ बच्चे साहि‍त्यिक कि‍ताबों को पढ़ना पसंद करते हैं। कि‍स्से‍-कहानि‍यां, कवि‍ताएं, नाटक उन्हें लुभाते हैं। बशर्ते कि‍ताबें उनके स्तर और रुचि‍ की हों। बच्चे चार-पांच साल के हैं तो उन्हें चि‍त्रों वाली और बहुत कम लि‍खि‍त सामग्री वाली कि‍ताबें दी जाएं। बच्चे कुछ और बड़े हैं तो उन्हें रोचक और सरल भाषा में लि‍खी कि‍ताबें दी जाएं। बड़े बच्चों को देश-वि‍देश के महत्वपूर्ण लेखकों की कि‍ताबें दी जा सकती हैं। लेकिन, यदि‍ बड़े बच्चे ने कभी साहि‍त्यिं‍क कि‍ताब नहीं पढ़ी तो उसकी शुरुआत भी नि‍चले स्तर से ही करनी होगी। बच्चा क्या पसंद करता है इसका भी ध्यान रखना जरूरी है। मसलन, उसकी रंगमंच में, खेलों में, वि‍ज्ञान में, समाजशास्त्र आदि‍ जि‍समें भी रुचि‍ है, उससे जुड़ी कि‍ताबें दी जाएं।

पि‍छले दि‍नों हमारी कॉलोनी में बच्चों से ‘हमारे जीवन में वि‍ज्ञान’ के संबंध में बातचीत करने के लि‍ए प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी को बुलाया गया था। डेढ़-दो घंटे तक अच्छी‍ बातचीत हुई। वह बच्चों को देने के लि‍ए अपनी पुस्तक ‘सौरमंडल की सैर’ लेकर आए थे। बातचीत के बीच में ही दूसरी कक्षा में पढ़ने वाला यश मि‍त्तल घर चला गया था। अगले दि‍न मैं उसे ‘सौरमंडल की सैर’ देने लगा। उसकी मम्मी‍ ने कहा, ‘कि‍ताब क्यों दे रहे हो? आजकल बच्चे पढ़ते कहां हैं?’ खैर, उसे कि‍ताब दे दी। दो-तीन दि‍न बाद मि‍ला तो यश बड़े उत्साह से चि‍ल्लाकर बोला, ‘अंकल, एक पेज पढ़ लि‍या है।’ फि‍र तीन-चार दि‍न बाद मि‍ला तो वही उत्साह, ‘अंकल, पांच पेज पढ़ लि‍ए हैं।’ सौरमंडल के बारे में लि‍खी कि‍ताब भी बच्चे‍ को पसंद आई क्यों कि‍ वह सरल ढंग से लि‍खी गई है। ‘सौरमंडल की सैर’ में मुख्य चरि‍त्र देवीदा हैं। बच्चे उनसे अपनी जि‍ज्ञासाओं को लेकर मि‍लते हैं। वह बच्चों को लेकर कल्पना के अंतरि‍क्ष यान से सौरमंडल की सैर को नि‍कल जाते हैं और ग्रहों-उपग्रहों के बारे में बताते चलते हैं। बच्चे बीच-बीच में सवाल भी करते हैं। यानी रोचक शैली और सरल शब्दों में लि‍खी कि‍ताबें दी जाएंगी तो बच्चे अवश्य पढ़ेंगे।

पाठ्यक्रम की पुस्तकें ज्ञान के वि‍स्तार में जाने के लि‍ए एक रास्ता भर हैं। उन्हें मंजि‍ल नहीं माना जा सकता। बच्चा जि‍ज्ञासु प्रवृत्ति का होता है। वह जीवन के वि‍भि‍न्न पक्षों और तरह-तरह के ज्ञान को जानना-समझना चाहता है। ऐसे में साहि‍त्य अच्छें मि‍त्र की तरह उसका मार्गदर्शक बनता है। साहि‍त्य संवदेनशील बनाता है और चीजों को व्यापक रूप में समझने की दृष्टि देता है। साहि‍त्य से बच्चे की रचनात्मकता और कल्पलनाशीलता बढ़ती है, जीवन की समझ वि‍कसि‍त होती है और वि‍परीत परि‍स्थि़‍ति‍यों का सामना करने का साहस भी पैदा होता है।

बैंक में वरि‍ष्ठ अधि‍कारी और जागरूक पाठक अमि‍ताभ मैत्रो कहते हैं कि‍ ‘बच्चों को पढ़ने के लि‍ए साहित्यिक कि‍ताबें दी जाएं। जो बच्चा साहि‍त्य पढ़ने लगेगा, वह कभी गुंडा-बदमाश नहीं बनेगा।’ कोई अपवाद हो सकता है, लेकि‍न यह बात बि‍ल्कुल सही है।

समाज की बेहतरी का रास्ता, कि‍ताबों के बीच से होकर ही जाता है। इसके अलावा कोई और उपाय है भी नहीं। यदि‍ आप चाहते हैं कि‍ एक जागरूक और संवेदनशील समाज बने तो बच्चों को कि‍ताबें पढ़ने से न रोकें, बल्कि उन्हें अच्छी-अच्छी कि‍ताबें लाकर दें।

डा. जाकिर हुसैन ने कहीं लिखा है, ‘पुस्तकें हमें जीवन के नए रूप दर्शाती हैं, जीने का सही ढंग सिखाती हैं। दुखियों को ढाढस बंधाती हैं, जिद्दियों को दंड देकर राह पर लाती हैं। मूर्खों की वे लानत-मलामत करती हैं, बुद्धिमानों को बल देती हैं। एकांत में वे हमें सहारा देती हैं, संसार और मनुष्य-जीवन की क्षणभंगुरता को भुला पाने में हमारी मदद करती हैं, हमारी निराशाओं को थपककियाँ देकर सुलाती हैं।’

कितने कब्रिस्तान : शेफाली पांडे

शेफाली पांडे

शेफाली पांडे


मेरी आँखें बहुत सुखद सपना देख रही हैं | सरकारी स्कूलों में जगह-जगह पड़े गड्ढे वाले फर्श के स्थान पर सुन्दर टाइल वाले फर्श हैं | उन गड्ढों में से साँप, बिच्छू, जोंक इत्यादि निकल कर कक्षाओं में भ्रमण नहीं कर रहे हैं| जर्जर, खस्ताहाल, टपकती दीवारों की जगह मज़बूत और सुन्दर रंग-रोगन करी हुई दीवारों ने ले ली है। दीवारों का चूना बच्चों की पीठ में नहीं चिपक रहा है। दीमक के वजह से भूरी हो गई दीवारें अब अपने असली रंग में लौट आई हैं। अब बरसात के मौसम में कक्षाओं के अन्दर छाता लगाकर नहीं बैठना पड़ता। खिड़की और दरवाज़े तक आश्चर्यजनक रूप से सही सलामत हैं। कुण्डियों में ताले लग पा रहे हैं। बैठने के लिए फटी-चिथड़ी चटाई की जगह सुन्दर और सजावटी फर्नीचर कक्षाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। पीले मरियल बल्ब जो हर हफ्ते तथाकथित अदृश्य ताकतों द्वारा गायब कर दिए जाते हैं, की जगह कभी ना निकलने वाली हेलोज़न लाइटें जगमगाने लगी है। बाबा आदम के ज़माने के पंखे, जिनका होना न होना बराबर है, बरसात में जिनके नीचे बैठने के लिए बच्चों को मना किया जाता है कि ना जाने कब सिर पर गिर पड़े, की जगह आधुनिक तेज़ हवा वाले पंखों ने ले ली है। मेरे सपने भी इतने समझदार हैं कि कूलर और ए.सी. के बारे में भूल कर भी नहीं सोच रहे हैं।

इन भविष्य के निर्माताओं की झुकी हुई गर्दन और रीढ़ की हड्डी कुर्सी-मेज में बैठने के कारण सीधी हो गई है। कुर्सियों से निकलने वाली बड़ी-बड़ी कीलें कपड़ों को फाड़ना भूल चुकी हैं। बैठने पर शर्म से मुँह छिपा रही हैं। ब्लैक बोर्ड मात्र नाम का ब्लैक ना होकर वास्तव में ब्लैक हो गया है। कक्षाओं में रोज़ झाड़ू लगता है।शौचालय साफ़-सुथरे हैं। अब उनमे आँख और नाक बंद करके नहीं जाना पड़ता।

कक्षों में इतनी जगह हो गई है कि इन भविष्य के नागरिकों के सिरों ने एक-दूसरे से टकराने से इनकार कर दिया है। जुओं का पारस्परिक आवागमन बंद हो गया है।

स्कूलों के लिए आया हुआ धन वाकई स्कूल के निर्माण और मरम्मत के कार्य में लग रहा है। उन रुपयों से प्रधानाचार्य के बेटे की मोटर साइकिल, इंजीनियर की नई कार, ठेकेदार की लड़की की शादी, निर्माण समिति के सदस्यों के कैमरे वाले मोबाइल नहीं आ रहे हैं | सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि स्थानीय विधायक, जिनकी कृपा से धन अवमुक्त हुआ, का दस प्रतिशत के लिए आने वाला अनिवार्य फ़ोन नहीं आया।

कीट-पतंगों के छोंके के बिना रोज़ साफ़-सुथरा मिड डे मील बन रहा है| विद्यालय के चौकीदार की पाली गई बकरियां और मुर्गियां, दाल और चावल पर मुँह नहीं मार रही हैं | इन्हें वह उसी दिन खरीद कर लाया था जिस दिन से स्कूल में भोजन बनना शुरू हुआ था | सवर्ण जाति के बच्चे अनुसूचित जाति की भोजनमाता के हाथ से बिना अलग पंक्ति बनाए और बिना नाक-भौं सिकोड़े खुशी-खुशी भोजन कर रहे हैं|

अध्यापकगण जनगणना, बालगणना, पशुगणना, बी.पी.एल. कार्ड, बी.एल.ओ. ड्यूटी, निर्वाचन नामावली, फोटो पहचान पत्र, मिड डे मील का रजिस्टर भरने के बजाय सिर्फ़ अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। कतिपय अध्यापकों ने एल. आई.सी. की पोलिसी, आर.डी., म्युचुअल फंडों के फंदों में साथी अध्यापकों को कसना छोड़ दिया है | ट्यूशन खोरी लुप्तप्राय हो गई है| ब्राह्मण अध्यापकों द्वारा जजमानी और कर्मकांड करना बंद कर दिया गया है। नौनिहालों को ‘कुत्तों, कमीनों, हरामजादों, तुम्हारी बुद्धि में गोबर भरा हुआ है, पता नहीं कैसे-कैसे घरों से आते हो’ कहने के स्थान पर ‘प्यारे बच्चो, डार्लिंग, हनी’ के संबोधन से संबोधित किया जा रहा है | अध्यापकों के चेहरों पर चौबीसों घंटे टपकने वाली मनहूसियत का स्थान आत्मीयता से भरी प्यारी सी मुस्कान ने ले लिया है। डंडों की जगह हाथों में फूल बरसने लगे हैं। कक्षाओं में यदा-कदा ठहाकों की आवाज़ भी सुनाई दे रही है। पढ़ाई के समय मोबाइल पर बातें करने के किये अंतरात्मा स्वयं को धिक्कार रही है। स्टाफ ट्रांसफर, इन्क्रीमेंट, प्रमोशन, हड़ताल, गुटबाजी, वेतनमान, डी.ए. के स्थान पर शिक्षण की नई तकनीकों और पाठ को किस तरह सरल करके पढ़ाया जाए, के विषय में चर्चा और बहस कर रहे हैं| अधिकारी वर्ग मात्र खाना-पूरी करने के लिये आस-पास के स्कूलों का दौरा करने के बजाय दूर-दराज के स्कूलों पर भी दृष्टिपात करने का कष्ट उठा रहे हैं |

सब समय से स्कूल आ रहे हैं | फ्रेंच लीव मुँह छिपा कर वापिस फ्रांस चली गई है | निर्धन छात्रों के लिए आए हुए रुपयों से दावतों का दौर ख़त्म हो चुका है। अत्यधिक निर्धन बच्चों की फीस सब मिलजुल कर भर रहे हैं। पैसों के अभाव में किसी को स्कूल छोड़ने की ज़रूरत नहीं रही | सारे बच्चों के तन पर बिना फटे और उधडे हुए कपड़े हैं। पैरों में बिना छेद वाले जूते-मोज़े विराजमान हैं | सिरों में तेल डाला हुआ है और बाल जटा जैसे ना होकर करीने से बने हुए हैं। कड़कते जाड़े में कोई बच्चा बिना स्वेटर के दाँत किटकिटाता नज़र नहीं आ रहा है। फीस लाने में देरी हो जाने पर बालों को काटे जाने की प्रथा समाप्त हो चुकी है|

माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए चिंतित हो गए हैं। हर महीने स्कूल आकर उनकी प्रगति एवं गतिविधियों की जानकारी ले रहे हैं। बच्चों के बस्ते रोजाना चेक हो रहे हैं। एक हफ्ते में धुलने वाली यूनिफ़ॉर्म रोज़ धुल रही है। उन पर प्रेस भी हो रही है | भविष्य के नागरिक ‘भविष्य में क्या बनना चाहते हो?’ पूछने पर मरियल स्वर में ‘पोलीटेक्निक, आई.टी.आई., फार्मेसी या बी.टी.सी. करेंगे’ कहने के स्थान पर जोशो-खरोश के साथ ‘बी.टेक., एम्.बी.ए., पी.एम.टी. करेंगे’ कह रहे हैं |

भारत के भाग्यविधाताओं को अब खाली पेट स्कूल नहीं आना पड़ता। प्रार्थना स्थल पर छात्राएं धड़ाधड करके बेहोश नहीं हो रही हैं। उनके शरीर पर देवी माताओं ने आकर कब्जा करना बंद कर दिया है, ना ही कोई विज्ञान का अध्यापक उनकी झाड़-फूँक, पूजा-अर्चना करके उन्हें भभूत लगा कर शांत कर रहा है।
विद्यालय कब्रिस्तान के बजाय फिर से विद्या के स्थान बन गए हैं, जहाँ से वास्तव में विद्यार्थी निकल रहे हैं, विद्यार्थियों की अर्थियाँ नहीं।

‘न रोको उन्हें शुभा’ पर परिचर्चा 20 को

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इलाहाबाद : प्रख्यात कहानीकार शेखर जोशी के कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ पर परिचर्चा हेतु जनसंस्कृति मंच के कविता समूह और इलाहाबाद विश्वेविद्यालय के छात्रों की संस्था ‘परिवेश’ की ओर से संगोष्ठी का आयोजन 20 जुलाई की शाम 5 बजे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में कि‍या जा रहा है।

नई कहानी की मुख्य धारा के समानांतर इलाहाबाद में अमरकांत, मार्कंडेय और शेखर जोशी मिलकर एक ऐसी त्रयी का निर्माण करते हैं जो नई कहानी को निम्न मध्यवर्गीय यथार्थ के करीब ले जाती है। लेकिन शेखर जोशी के कविता संग्रह ‘न रोको उन्हें शुभा’ का प्रकाशन तथा पिछले दिनों प्रकाशित हुए मार्कंडेय के कविता संग्रह ‘यह पृथ्वी तुम्हे सौपता हूं’ से एक बात और साफ होती है कि कहानी विधा के ये उस्ताद अपने समय और समाज के अनुभवों तथा उसकी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को कविता जैसी विधा में भी अभिव्यक्त करते रहे हैं। संग्रह में छपी कवितायें कई चर्चित पत्र–पत्रिकाओं में उस दौर में ही छप चुकी हैं जब इनकी ख्याति बतौर एक कहानीकार हो चुकी थी। जाहिर है इनका संग्रह के रूप में प्रकाशन एक सुखद संयोग है। इस संयोग को कविता केन्द्रित एक सार्थक बहस के रूप में दर्ज़ करने हेतु यह आयोजन किया जा रहा है।

परिचर्चा में जसम कविता समूह के संयोजक युवा आलोचक आशुतोष कुमार, कवि हरीशचन्द्र पांडेय शिरकत करेंगे और प्रख्यात आलोचक-कवि राजेन्द्र कुमार कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।
इस अवसर पर शेखर जोशी जी की गरिमामय उपस्थिति से श्रोताओं को उनसे रूबरू होने का मौका मिलेगा।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सह सचिव, जन संस्कृति मंच

महत्वपूर्ण फैसले का इंतजार : प्रेमपाल शर्मा

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प्रेमपाल शर्मा

पि‍छले दि‍नों सुप्रीम कोर्ट ने भाषा के मसले पर एक महत्‍वपूर्ण निर्णय का संकेत दिया है । संकेत यह है कि पहली से पाँचवीं कक्षा तक बच्‍चों की पढ़ाई का माध्‍यम मातृभाषा हो या दूसरी भाषाएं । इस मुद्दे को न्‍यायमूर्ति सदाशिवम और रंजन गोगोई ने पाँच सदस्‍यीय बड़ी बेंच को सौंपने का फैसला किया है। बड़ी बेंच से जिन बातों पर विचार करने का आग्रह किया है वे हैं:- पहली- मातृभाषा किसे माना जाए? जहाँ, जिस परिवेश में बच्‍चा रहता है उसे या उनके माँ-बाप की भाषा को? दूसरी- और इसका निर्णय आखिर कौन करेगा ? और यह भी कि क्‍या विद्यार्थी या उनके माँ-बाप को भाषा चुनने का अधिकार है? तीसरी बात कि क्‍या मातृभाषा में जबरन पढ़ाने से किसी भी व्‍यक्ति के मूल अधिकारों का हनन होता है? चौथी- क्‍या ये आदेश सरकारी मान्‍यता प्राप्‍त सरकारी और निजी दोनों स्‍कूलों पर लागू होंगे? और अंतिम बात क्‍या संविधान की धारा 350ए के अनुसार अल्‍पसंख्‍यक समुदाय अपनी मातृभाषा का चुनाव कर सकते हैं?

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में चलने वाली बहस और अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा पूरे देश को रहेगी क्‍योंकि भाषा और शिक्षा के मसले ने पूरी शिक्षा को बदहाल कर रखा है। अभी कुछ महीने पहले ही संसद के हस्‍तक्षेप के बाद संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में मातृभाषा की वापसी हुई है । भारतीय भाषाओं के पक्ष में यह कोई नई बात नहीं है लेकिन पिछले बीस सालों में अंतर्राष्‍ट्रीयता की दुहाई देते हुए भारतीय भाषाओं की कीमत पर जिस ढंग से अंग्रेजी को पढ़ाने और लादने की वकालत की जा रही है उससे बच्‍चों की पूरी शिक्षा और समझ भी नकारात्‍मक रूप से प्रभावित हुई है। अंग्रेजी रटने के चक्‍कर में बच्‍चों की रचनात्‍मकता तो गायब हो ही रही है, वह किताबों से भी दूर हो रहे हैं । यही कारण है कि बार-बार विभिन्‍न न्‍यायालयों को हस्‍तक्षेप करना पड़ रहा है । मई 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्‍वपूर्ण फैसले में यह निर्णय दिया था कि कर्मचारी की भाषा में विभागीय जाँच होनी चाहिए। नौसेना का एक कर्मचारी मिथिलेश कुमार अपना बचाव अपनी भाषा में करना चाहता था लेकिन जबरन विभागीय जाँच अंग्रेजी में की गई। सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी के खिलाफ की गई सारी कार्रवाई को इस आधार पर निरस्‍त कर दिया कि इससे नैसर्गिक अधिकार का हनन हुआ है। जून 2013 में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के पहले चरण में ही अंग्रेजी लादने के निर्णय पर प्रश्‍न चिह्न लगाया है और अपने आदेश में कहा है कि सभी भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों के हित में अंग्रेजी के स्‍तर पर निगरानी रखने के लिए एक नियमित पैनल बनाया जाए। शायद फिजा में इन सब बहसों की रोशनी में भारत के राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में प्रतिभा राय को ज्ञानपीठ पुरस्‍कार देते वक्‍त कहा कि ‘स्‍कूलों और कालेजों को मातृभाषा में शिक्षा’ देने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए। इस सबके बावजूद शिक्षा में अपनी भाषाएं क्‍यों नहीं हैं ?

संक्षेप में पहले मौजूदा मुद्दे का इतिहास। वर्ष 1989 में कर्नाटक सरकार ने सभी प्राइमरी स्‍कूलों में कन्‍नड़ भाषा को अनिवार्य बनाने का एक आदेश दिया था जिसे 1993 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्‍यीय पीठ ने भी बरकरार रखा। 1994 में थोड़ा संशोधित करते हुए कर्नाटक सरकार ने फैसला किया कि पहली से कक्षा चार तक पढ़ाई का माध्‍यम कन्‍नड़ या उनकी मातृभाषा हो सकती है। यह कनार्टक सरकार का संविधान की धारा 350ए की रोशनी में लिया गया फैसला था जिससे कि‍ भाषायी अल्‍पसंख्‍यक अपनी भाषाओं में बच्‍चों को पढ़ा सकें । कर्नाटक सरकार के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने निर्णय किया कि यह आदेश निजी स्‍कूलों पर लागू नहीं होगा। आपको याद होगा न्‍यायालय की यह टिप्‍पणी जिससे पूरे देश में खलबली मची थी कि ‘बिना अंग्रेजी पढ़े तो चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल सकती’। हाईकोर्ट के 2008 के फैसले के खिलाफ कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक सरकार का तर्क था कि बचपन में शिक्षा की भाषा बच्‍चे के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण होती है। क्‍योंकि यही वे वर्ष हैं जब बच्‍चा सोचना, समझना सीखता है । भविष्‍य की बुनियाद उसकी इसी समझ पर है । इसलिए बिना अपनी भाषा के शिक्षा का कोई अर्थ नहीं है।

देखा जाए तो कर्नाटक सरकार की चिंताएं गलत भी नहीं है। भारत जैसे एक भूतपूर्व गुलाम देश के नागरिक अंग्रेजी की कितनी भी वकालत करें दुनिया भर  में मातृभाषाओं  का महत्‍व सर्वविदित है । यही कारण है कि यूनेस्‍को ने भी वर्ष 1999 से हर साल 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाने का फैसला किया है। यहाँ तक वर्ष 2013 में तो मातृभाषा को बढ़ाने के लिए एक और कदम आगे रखते हुए यह थीम रखी गई है कि सारी किताबों और इलेक्‍ट्रॉनिक सामग्री भी मातृभाषा में उपलब्‍ध कराई जाए। दुनिया भर की भाषाओं को बचाने के लिए युनेस्‍को के डायरेक्‍टर जनरल इरिना बोकोवा का संदेश भी बहुत महत्‍वपूर्ण है- मानवता को बचाने के लिए बहुभाषिकता एक बहुत बड़ी ताकत है। यह हमारी सांस्‍कृतिक विविधताओं को बचाने के लिए तो जरूरी है ही हमारे विचारों के बेझिझक विनिमय के लिए भी अनिवार्य है। अपनी भाषा में नये से नये विचार और कल्‍पना की उड़ान की क्षमता सर्वाधिक होती है ।

यूनेस्‍को समेत दुनिया भर के शिक्षाविद, महात्‍मा गांधी, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर, टॉलस्‍टाय जैसे महापुरुषों की कही हुई बातों के बावजूद इस देश में पता नहीं कौन सी ताकतें अपनी भाषाओं के विरोध में खड़ी हैं । हिन्‍दी पट्टी के विपरीत दक्षिण भारत के राजनेता, लेखक, नागरिक अपनी भाषाओं के पक्ष में ज्‍यादा बेहतर ढंग से खड़े नजर आते हैं । आपको याद होगा डी.एम.के. सरकार ने कुछ वर्ष पहले तमिलनाडु के स्‍कूलों में तमिल माध्‍यम से पढ़ाना शुरू कर दिया था । नई सरकार द्वारा अंग्रेजी में शुरुआत करने का विरोध तमिलनाडु में पुरजोर से हो रहा है । तमिलभाषी टी.एस.आर. सुब्रमणियम केबिनेट सचिव रहे हैं । संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के पक्ष के समर्थन में उन्‍होंने कहा था कि बिना भारतीय भाषाओं को समझे इस देश का प्रशासन नही चलाया जा सकता। यह बात उन्होंने एक आई.ए.एस. अधिकारी के नाते उत्‍तर प्रदेश के अनुभवों के आधार पर कही थी ।

बड़ी पीठ को सौंपने का यह अकेला मामला नहीं है। केशवानन्‍द भारती, गोलक नाथ के मामले से लेकर मंडल आयोग तक के फैसले ऐसी ही बड़ी पीठों ने देश हित में सुलझाए हैं। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि भारतीय भाषाओं को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट एक सार्थक निर्णय देगा ।