Archive for: June 2013

शिवकुमार मि‍श्र की प्रतिबद्धता हमारी धरोहर : रेखा अवस्थी

शिवकुमार मि‍श्र

शिवकुमार मि‍श्र

नयी दिल्ली : जनवादी लेखक संघ की ओर से 28 जून 2013 को नयी दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान के हाल में आयोजित सभा में राजधानी क्षेत्र के सभी जाने-माने लेखकों ने पिछले सप्ताह दिवंगत हुए प्रोफेसर शिवकुमार मिश्र को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने मंच पर नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडेय और असग़र वजाहत को बुलाया और जलेस केंद्र की ओर से दिवंगत जलेस अध्यक्ष शि‍वकुमार मिश्र को श्रद्धासुमन अर्पित की। उन्‍होंने मि‍श्र की बीमारी व इलाज आदि की जानकारी देते हुए उनके साथ अपने संबंधों, उनके लेखन व उनकी प्रतिबद्धता का उल्लेख किया। प्रोजेक्टर के माध्यम से स्क्रीन पर शिवकुमार मि‍श्र को जलेस केंद्र द्वारा आयोजित नागार्जुन जन्मशती के अवसर बोलते हुए दिखाया गया। उसके बाद मंच का संचालन जलेस के महासचिव चंचल चौहान ने किया।

जाने-माने हिंदी कवि दिनेश शुक्ल ने कहा कि‍ मिश्र जी उन्हीं के गाँव के पास के थे। मैंने अपनी ज़मीन को उन्हीं के माध्यम से जाना। विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रलेस की ओर से श्रद्धांजलि दी। रेखा अवस्थी ने उन्हें एक कामरेड, एक बड़े भाई और अपनी ही बोली बानी के एक लेखक के रूप में याद किया। उन्‍होंने कहा कि‍ उनकी प्रतिबद्धता हमारी धरोहर है। उनकी इसी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाना सच्ची श्रद्धांजलि होगी। राजेंद्र यादव अस्वस्थ होते हुए भी सभा में आये और कहा कि मिश्र जी एक चिंतक, विचारक और विद्वान थे। बहस में निस्संकोच हिस्सा लेते थे। जवरीमल्ल पारख ने कहा कि वह अपने विचार सुगठित भाषा में रखते थे। युवा लेखकों को सुनते और उनकी प्रशंसा करते थे। उन्हें प्रेरित करते थे। रमणिका गुप्ता ने 1997 में हजारीबाग में आयोजित जलेस के एक समारोह में हुई मुलाक़ात से लेकर मौजूदा समय तक उनसे मिलने वाली आत्मीयता और साथीपन की भावना का उल्लेख किया।

असग़र वजाहत ने कहा कि वह बराबरी के स्तर पर सबसे मिलते और बातचीत करते थे। उनमें एक जीवंतता थी जिससे वह हमें प्रेरित करते थे। इफको के निवर्तमान राजभाषा निदेशक घनशाम दास ने कहा कि उनके घर पर पत्रिकाओं के पुराने से पुराने अंक हैं। वे हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं। उनकी इस धरोहर को संजोना हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जाने-माने कवि उदभ्रांत ने अपने लंबे साहचर्य का हवाला देते हुए अपने उदगार व्यक्त किये।

केदारनाथ सिंह ने बताया कि उनके निधन के दूसरे दिन इलाहाबाद में आयोजित एक शोक सभा में शामिल होते समय यह अनुभव हुआ कि मिश्र जी किस तरह युवा लेखकों के अपने-अपने शिवकुमार मिश्र थे। उनका स्नेह उन सबको मिला होगा। भूलने के इस दौर में स्मृतिसंपन्न व्यक्ति थे। रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि वह अपनी अडिग प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद किये जायेंगे।

दिल्ली जलेस की तरफ़ से बली सिंह ने श्रद्धासुमन अर्पित किये और सामान्यजन के प्रति उनके प्रेम का उल्लेख किया। सुधा सिंह ने कहा कि वह ऐसे लेखक थे जिनसे बिना संकोच मिला जा सकता था। जनतांत्रिक आचरण करना मुश्किल होता है। वह इस कसौटी पर खरे उतरते थे। कांतिमोहन ने कहा कि वह पहले लेखक थे जो प्रलेस छोड़कर जलेस में आये थे। इस तरह वह प्रलेस और जलेस के बीच की एक कड़ी थे। भगवान सिंह ने कहा कि वह अपने विचारों में जितने स्पष्ट थे, उतने ही धैर्य से दूसरों को भी सुनते थे।

मैनेजर पांडेय ने 1975 में सतना में हुए प्रलेस सम्मेलन में मुक्तिबोध की इतिहास की पुस्तक से प्रतिबंध हटाने के प्रस्ताव के समर्थन में बोलने वाले मिश्र जी को याद किया। वह अपने लेखन और बातचीत में संतुलन बरतते थे, मगर दुविधा की भाषा नहीं बोलते थे। वह किसी अन्य संगठन के बारे में आक्रामक रवैया अख्ति़यार नहीं करते थे। उनका जाना एक आधार का टूटना है।

नामवर सिंह ने कहा कि उनका जाना मेरे लिए एक अप्रत्याशित घड़ी है। वल्लभविद्यानगर में तीन महीने रहने के दौरान उन्हें नजदीक से जानने का अवसर मिला था। वह अपनी मान्यताओं को लेकर स्पष्ट थे। उनमें एक साफगोई थी। गुजरात में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने में उनकी एक भूमिका थी। वहाँ के लोगों के बीच उनका बडा़ आदर था।

अंत में दो प्रस्ताव पेश किये गये। पहला प्रस्ताव जवरीमल्ल पारख ने उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा में मारे गये इंसानों के प्रति लेखकों की श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया। दूसरा प्रस्ताव शिवकुमार मिश्र के देहावसान पर शोक व्यक्त करते हुए और उनके परिवारजनों के प्रति दिल्ली राजधानी क्षेत्र के लेखकों की संवेदनाएं संप्रेषित करते हुए संजीव कुमार ने पेश किया। उपस्थित जनों ने एक मिनट का मौन रख कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

उत्तराखण्ड आपदा के लिये जिम्मेदार कौन: चंद्रशेखर करगेती

uttarakhand

उत्तराखण्ड में पिछले दि‍नों आई आपदा के कारणों और समस्‍या के समाधान को बताता चंद्रशेखर करगेती का आलेख-

उत्तराखण्ड में पिछले दि‍नों आई आपदा के बाद राजनेताओं से लेकर टीवी चैनल तक सभी एक ही चर्चा कर रहे थे कि‍ इस भीषण दैवीय आपदा में तीर्थयात्रियों को कैसे बचाया जाये ? चारों ओर आपदा के खौफनाक मंजर को देखने के बाद हर कोई उनकी मदद को आतुर था और राहत पहुँचाना चाहता था। उस समय हरेक का फर्ज भी था, और समय की मांग भी। लेकिन कुछ ऐसे सवाल हैं जो साल-दर-साल आपदा आने के बावजूद अनुत्तरित रह जाते हैं, जिनका उत्तर और समाधान भी खोजा जाना जरूरी है। उत्तराखण्ड में बनी अब तक की लगभग सभी दलों की सरकारें पिछले सालों में और इस बार की आपदा को दैवीय आपदा का नाम देकर भीख का कटोरा लिए दिल्ली दरबार में हाजिरी बजाने को आतुर रही हैं, लेकिन प्रदेश एवं सामाजिक स्तर पर इन आपदाओं के लिए जिम्मेदार कारकों पर ध्यान देने की जहमत किसी भी सरकार ने नहीं उठाई। आखिर इन आपदाओं के लिये जिम्मेदार कौन है ? क्या सचमुच में ये दैवीय आपदा हैं, जैसा कि अब तक की सरकारें कहती आयी हैं या फिर इनको दैवीय रूप देने में सरकारों की अंध नीतियाँ भी जिम्मेदार हैं ? उत्तराखण्ड में आई वर्तमान आपदा क्या अंतिम है, क्या अगले तीन महीनों के बरसात के दिनों में ऐसी आपदा फिर नहीं आयेगी ? साल दर साल इन क्षेत्रों में ऐसी स्थिति कब तक बनी रहेगी ? यह ठीक है कि जितनी जान-माल की हानि अभी आई आपदा से हुई है उतनी आगे नहीं होगी, क्योंकि तब तक चारधाम और हेमकुंड साहिब के तीर्थाटन एवं पर्यटन के लिए आये लोगों में से लगभग सभी को बाहर निकाला जा चुका होगा। सरकार में बैठे नुमाइंदे और अफसर इन्हीं पर अपना ध्यान केंद्रित किये हुए हैं, लेकिन इस आपाधापी में उन स्थानीय निवासियों की चिंता किसी की नहीं है, जो बरसों से इन दुरूह इलाकों में रह रहे हैं और आगे भी रहेंगे, जहाँ राहत कार्यों में सेना भी बेबस नजर आई ? क्या वे लोग जो इस आपदा में अपना सब कुछ गवाँ चुके हैं, कभी चर्चा में आ पाएंगे ?

उत्तराखण्ड में इतनी भारी बरसात कोई पहली बार नहीं हो रही है और न ही उसकी प्रबलता पहली बार इतनी रही है। इस बार आई आपदा से पूर्व भी राज्य के पहाड़ों में इससे अधिक बारिश का होना आम बात रही है। जहाँ बारिश के प्रभाव को दिनों में मापा जाता है। राज्य के पहाड़ी इलाकों में होने वाली बरसात के बारे में स्थानीय बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि आज से दस-पन्द्रह साल पहले तक बर्षा ऋतु में सतझड (सात दिनों तक लगातार होने वाली बारिश) का लगना आम बात हुआ करती थी। उन लगातार सात-सात दिन की बारिश में जीवन भी बरसात की तरह लगातार चला करता था। आज की तरह जीवन थमता नहीं था। बरसात बर्बादी नहीं, सृजन का संकेत होती थी। कुल मिलाकर वह एक आम प्रक्रिया हुआ करती थी। उस बारिश से जान-माल का नुकसान भी इतना नहीं हुआ करता था जितना पिछले पाँच सालों से लगातार होता आया है। उत्तराखण्ड में आज हालात ऐसे बन गए हैं कि छोटे-छोटे बरसाती नदी-नालों के भी उफान पर आने पर भी दो-चार जिन्दगियाँ तो उसमें समा ही जाती हैं l पहले भी बरसात का पानी इन्हीं नदी-नालों में जाता था, तब पहाड़ों में बारिश से इतनी भारी तबाही नहीं होती थी। तब भी बादल फटते थे, पहाड़ दरकते थे, टूटते-फूटते थे लेकिन इतना नुकसान नहीं होता था। फिर क्या कारण है कि इस बार के मानसून की पहली ही बारिश के छत्तीस घंटों ने राज्य के उन स्थानों का नामोंनिशान ही मिटा दिया, जिनको लेकर राज्य सरकार इतराती  फिरती थी ? आज हर जगह चर्चा है तो केवल मात्र चारधाम यात्रा मार्ग में आई आपदा की, जबकि इससे इतर राज्य के कुमाऊँ के सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़ के धारचुला और मुनस्यारी तहसील में भी भयंकर आपदा आई है और वहाँ पर भी कई गाँव तबाह हो गए हैं। वहाँ भी ठीक इसी तरह से बारिश हुई। गाँवों में मलबा आया है। गाँव के गाँव तबाह हुए हैं। जान-माल का भारी नुकसान हुआ है, जैसा कि चारधाम यात्रा मार्ग में हुआ है।

पहली नजर में देखने पर यह आपदा प्राकृतिक (दैवीय) लगती है और सभी देखने वाले भी फौरी तौर पर कह रहे हैं कि यह प्राकृतिक है। सरकार में बैठे हुक्मरान भी पिछले सालों में दिए बयानों सा अपना रटा रटाया बयान दे रहे हैं कि आपादा दैवीय है। लेकिन अगर इस आपदा के कारणों को गहराई से देखा जाये तो इस तथ्य से इनकार करना मुश्किल है कि केदारनाथ, रामबाड़ा, गोविन्दघाट, विष्णु प्रयाग, हर्षिल, घुत्तू, उत्तरकाशी, मनेरी, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, मुनस्यारी, धारचुला, सोबला, तेजम, सुमगढ़ में अगर पहाड़ों के मूलस्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की गयी होती तो आपदा का प्रभाव इतना भयावह और मर्मान्तक नहीं होता जितना आज दिखाई दे रहा है l पिछले सालों में आई आपदाओं का अध्ययन करने से एक ही तथ्य सामने निकल कर आता है कि आखिर उत्तराखण्ड में ऐसा क्या हो गया है कि जब से यह राज्य अतिस्त्व में आया है, तब से हर साल बरसाती मौसम में आपदा की मार झेलता आ रहा है। और ज्यादातर आपदाग्रस्त क्षेत्र वे ही हैं जो किसी-न-किसी जल विद्युत परियोजना के सुरंग क्षेत्र में स्थित हैं या फिर जिन नदियों के ऊपर के भू-भाग पर बाँध बनाए गए हैं या जो मानव बस्तियाँ घने रूप से नदी तट पर बसी हुई हैं। आपदा की मार उन क्षेत्रों ने भी झेली हैं जहाँ पर नयी-नयी सड़कों का निर्माण कराया जा रहा है। बरसात के दौरान होने वाले इस आपदा की मार उन क्षेत्रों में नहीं है जो उपरोक्त तीनों परिस्थिति‍यों से दूरी हैं या जहाँ बाँध, सुरंग तथा सड़क जैसे तथाकथित राजनीतिक विकास कार्य नहीं हुए हैं।

राज्य में आज से लगभग पन्द्रह साल पहले तक भी वर्षा ऋतु में हमेशा से ही असामान्य बरसात होती रही है, वो भी लगातार सात-सात दिन तक, तब भी कभी इतनी तबाही नहीं मची। फिर क्या कारण है कि अब पहाड़ के किसी क्षेत्र में बादल की गर्जना स्थानीय लोगों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती है और मन फिर किसी अनहोनी के प्रति आशंकित हो जाता है। तो फिर क्या ये कहना सही है कि राज्य में बनाए जा रहे बाँध और उनकी सुरंगे तथा नयी-नयी बनायी जाने वाली सड़कों को बिना किसी पारस्थितिकीय, पर्यावरणीय तथा सामाजिक अध्ययन के बनाया गया या बनाया जा रहा है या इन बाँधों-सुरंगों-सड़कों को बनाए जाने में स्थानीय निवासियों के जीवन पर आसन्न खतरों का पूर्व आकलन नहीं किया गया?  इन योजनाओं के योजनाकारों की यह अनदेखी क्यों, आखिरकार ये ही तो इन आपदाओं का मूल कारण है?
हाँ, अगर ये योजनाकारों की अनदेखी से ऐसा हुआ है तो निश्‍चि‍तरूप से इस निष्कर्ष पर जरूर पहुँचा जाना चाहिए कि राज्य में प्रकृति और यहाँ के स्थानीय निवासियों की जान-माल की कीमत पर अंधे विकास की इस रेलम-पेल में असंख्य जानों से खिलवाड़ बंद होना चाहिए। राज्य में सुरंग आधारित अब तक बनी चुकी जल विद्युत परियोजनाओं और भविष्य में बनने वाली परियोजनाओं को भी यदि जोड़ दिया जाए तो यह संख्या लगभग 560 के आसपास पहुँचती है और इन परियोजनाओं के बाँध क्षेत्र से इनके टर्बाइन तक जाने वाली सुरंगों की कुल लम्बाई लगभग 1800 किलोमीटर तक बैठती है जो लगभग 225 किलोमीटर की लम्बाई में खोदी जा चुकी हैं l जब पहाड़ों को इन परियोजानों की सुरंगों से इस तरह से खोखला किया जाएगा तो आने वाले समय में इससे भयानक त्रासदियाँ और देखने को मिलेंगी जिनके लिए हम-आपको तैयार रहना चाहिए। यही हाल ठीक सड़कों के निर्माण का भी है। राज्य निर्माण के बाद बनने वाली सड़कों के निर्माण में भी हजारों टन डायनामाइट तथा डेटोनेटर का प्रयोग किया गया है। इन सड़कों तथा जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में वह सब कुछ देखा जाता है जिससे कि निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदारों तथा कम्पनियों की लागत कम आये और  मुनाफ़ा अधिक से अधिक कमवाया जा सके। लेकिन इन परियोजनाओं के निर्माण के समय उस आदमी को दरकिनार कर दिया जाता है, जिसके खेत, गाँव, जंगल इनकी जद में आते हैं या इनके निर्माण से उनका परिस्थितिकी तंत्र गड़बडा़ता है। समय-समय पर राज्य के उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गयी जनहित याचिकाएं भी इसकी बानगी हैं कि राज्य में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं में पर्यावरणीय तथा परिस्थिति‍कीय मानकों की घोर अनदेखी की जाती है, आज जिनके कुपरिणाम इन आपदाओं के रूप में हमारे सामने उपस्थित हो रहे हैं। वर्तमान आपदा में हुई तबाही के निशान विष्णु प्रयाग, गुप्तकाशी से नीचे रुद्रप्रयाग व श्रीनगर तथा गंगोत्री से मनेरी, हर्षिल, उत्तरकाशी, देवप्रयाग से ऋषीकेश तक देखे जा सकते हैं, जिसके मूल में जलविद्युत परियोजनाओं की कम्‍पनियों को दोषी माना जा सकता हैं।

राज्य में आयी इस आपदा की मार जिन नदी तटों के शहरों-कस्बों पर पडी़ वहाँ आपदा के लिए जिम्मेदार जितना वहाँ बसने वाला व्यापारी वर्ग है, उससे अधिक जिम्मेदार वो प्रशासन तंत्र है, जो खतरों से अनजान बन सालों से कुम्भकर्णी नींद सोया हुआ है और उसके सामने इन नदी तटों पर कब्जा होता गया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गंगा किनारे से 200 मीटर की दूरी पर निर्माण कार्य की सीमा प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के संरक्षण में इन नदियों के किनारों पर धडल्ले से दिन दूना रात चौगुना अवैध निर्माण होता रहा। आज गंगादर्शन के नाम पर यह उद्योग का रूप ले चुका है, जिसमें राजनेताओं और नौकरशाहों की भूमिका और भागीदारी जगजाहिर है। देहरादून में स्थित राज्य की अस्थायी विधानसभा भी इसी का ज्वलंत उदाहरण है जो रिस्पना नदी के तट पर बनायी गयी है l गंगा-यमुना जैसी नदियों के किनारे भवन निर्माण के दुष्परिणाम हम रामबाड़ा, गोविन्दघाट, विष्णु प्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषि‍केश तथा उत्तरकाशी, गंगोरी, मनेरी, घुत्तू, घनशाली, बूढा केदार, चामियाला, तिलवाडा में हुई जनहानि में देख चुके हैं। इस आपदा के आने से पूर्व विभिन्न समाजसेवी, पर्यावरणविद, लेखक, पत्रकार, वैज्ञानिक, बूढ़े-पुराने लोग अपने लेखों से, विभिन्न सेमीनारों तथा सामाजि‍क मंचों के माध्यम से लगातार चेताते रहे हैं। यदि राज्य के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों एवं राजनेताओं ने उन चेतावनियों पर ध्यान दिया होता और उन पर मनन कर इन बड़े-बड़े निर्माणों में नियमों-मानकों तथा विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव की अनदेखी किये जाने के तथ्य पर संज्ञान लिया होता तो शायद आज बहुत से बेगुनाह लोग काल के गाल में समाने से बच जातेl

अब भी समय है कि थोड़ी-सी तहकीकात कर उन अधिकारियों का पता लगाया जाये जिन्होंने इन निर्माण कार्यों में नियम-मानकों तथा विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव की अनदेखी किये जाने पर जानबूझ कर संज्ञान नहीं लिया और ठेकेदारों-कंपनियों तथा व्यापारियों सहित प्रभावशाली स्थानीय निवासियों को खुली छूट दे उन्हें अनवरत निर्माण की इजाजत दी। उन्हें चिन्हित कर कटघरे में खडा़ करने की जरूरत है। अपने छोटे से फायदे एवं निजी स्वार्थ के चलते हजारों लोगों की जान-माल से खिलवाड़ करने वाले राजनेताओं और अधिकारियों को किस तरह से दण्डित किया जाएगा, अब इसके निर्धारण की भी जरूरत है ? वह समय आ गया है जब हजारों लोगों की जान से खिलवाड़ करने वाली इस मानसिकता को बढ़ावा देने वाली नीतियों को बनाने तथा इस प्रकार के घोर अपराधिक कार्यों को ए.सी. कमरों में बैठकर अंजाम देने वाले अधिकारियों एवं राजनेताओं को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाया जाये, जिन तक कानून के हाथ कभी पहुँच ही नहीं पाते हैं। विष्य में इस प्रकार की आपदाओं की पुनरावृति को रोकने तथा आने वाली पीढ़ियों को भी यह जवाब दिया जाना है कि आखिर इन आपदाओं को जिम्मेदार कौन?

शि‍क्षा के क्लब: अनुराग

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हमारे पड़ोसी शर्मा जी एक कंपनी में सुपरवाइजर हैं। इस महंगाई में जैसे-तैसे खींचतान के घर का खर्चा चला पाते हैं। वह आजकल बहुत परेशान हैं। अपनी बेटी को अच्‍छी शि‍क्षा दि‍लाने की चाह में पहले तो कई तथाकथि‍त शि‍क्षा के क्‍लबों के चक्‍कर काटे। क्‍लब इसलि‍ए की वहां क्‍लबों जैसी दी जाने वाली सुवि‍धाएं गि‍नवाई जातीं और प्रवेश के लि‍ए मोटी रकम की मांग की जाती है। साथ ही महीने का शुल्‍क भी अच्‍छा खासा। इसके बावजूद बच्‍चा क्‍या बनेगा-क्‍या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं। बच्‍चों के लि‍ए मां-बाप क्‍या नहीं करते। उन्‍होंने भी इधर-उधर से ले-देकर और अपनी खान-पान की जरूरतों को और कम करके बेटी का एक नि‍जी स्‍कूल में एडमीशन करवा दि‍या। अच्‍छी शि‍क्षा के नाम पर स्‍कूल में नई व्‍यवस्‍था लागू हो गई। स्‍कूल डायरी खत्‍म कर दी गई और होमवर्क और छुट्टी आदि‍ सभी जानकारी स्‍कूल की वेबसाइट पर दी जाने लगी । शर्मा जी के घर इंटरनेट नहीं है। उन्‍हें इसकी जरूरत भी नहीं है। बच्‍ची छोटी है। अकेली साइबर कैफे नहीं जा सकती है। पत्‍नी इन चीजों को नहीं समझती। अब वह क्‍या करें? ड्यूटी करें या रोज साइबर कैफे के चक्‍कर लगाएं? एक अनावश्‍यक आर्थिक बोझ और बढ़ गया। और इससे बच्‍ची के सीखने की क्षमता बढ़ी हो या उसे उसके लि‍ए शि‍क्षा सरल हो गई हो ऐसा भी नहीं हुआ।

हमारी कॉलोनी के पास हाल ही में एक नि‍जी स्‍कूल खुला है। भव्‍य इमारत है। कहने की बात नहीं है कि‍ इसमें अभि‍भावकों से की जाने वाली वसूली और बच्‍चों को दी जाने वाली सुवि‍धाओं से यह स्‍कूल कम, फाइव स्‍टार होटल अधि‍क लगता है। वहां इतना तक है कि‍ जि‍स गेट से बच्‍चे आते-जाते हैं, उससे स्‍कूल का चतुर्थश्रेणी कर्मचारी आ-जा नहीं सकता। उनके लि‍ए अलग गेट बनाया हुआ है।

शिक्षा के निजीकरण से प्रारंभि‍क शि‍क्षा से ही वर्ग वि‍भाजन की नींव रख रहे हैं। बच्‍चों को सि‍खाया जा रहा है कि‍ तुम वि‍शि‍ष्‍ट हो। आम लोगों के साथ तुम्‍हें घूलना-मि‍लना नहीं है। श्रेष्‍ठता के भाव का बीज उनके मन में यहीं से अंकुरि‍त कर दि‍या जा रहा है। ऐसे में यदि‍ वे कल देश शासक-प्रशासक बनते हैं तो उनके मन में न आम आदमी के दुख-दर्द के प्रति‍ कोई सहानुभूति‍ होगी और न कोई जन सरोकार। उनके मन में यह भाव जरूर होगा कि आम आदमी हमारी सेवा के लिए ही है। शिक्षा का पहला उद्देश्‍य बच्‍चों में किसी भी भेदभाव को दूर कर उन्‍हें अच्‍छा नागरिक बनाना है। ऐसा नागरिक जो अमीरी-गरीबी, धर्म-जाति से ऊपर उठकर सबसे समानता का व्‍यवहार करे, लेकिन निजी स्‍कूल के माध्‍यमों से एक विशिष्‍ट वर्ग तैयार किया जा रहा है। नि‍जी स्‍कूल इलीट क्‍लब की नर्सरी बन गए हैं।

एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत आम आदमी को शि‍क्षा से दूर कि‍या जा रहा है। जि‍स रफ्तार से शि‍क्षा का नि‍जीकरण और महंगीकरण हो रहा है, आने वाले दस-पंद्रह साल बाद आम आदमी अपने बच्‍चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकेगा क्‍योंकि‍ नि‍जी स्‍कूल हर साल मनमर्जी फीस और एनुअल चार्ज बढ़ा देते हैं। कई स्‍कूलों में यह वृद्धि‍ तीस से चालीस प्रति‍शत तक है।

निजी स्‍कूलों को बढ़ावा मिलने का एक कारण अंग्रेजी के प्रति अति मोह है। अंग्रेजों ने भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी को लादा, समझ में आता है। लेकिन आजादी के 66 साल बाद भी उस बोझे को ढोने में मगन रहना समझ से बाहर है। यह बार-बार सा‍बित हुआ है कि ज्ञान का भाषा से कोई संबंध नहीं है। बच्‍चा अपनी ही भाषा सहजता-सरलता से जल्‍दी सीखता है। अभिभावक इस मृगमरीचिका को समझें कि अंग्रेजी लिखना-बोलना ज्ञानवान होने की गारंटी नहीं है। अंग्रेजों के भारतीय खानसामे और नौकर भी बहुत अच्‍छी अंग्रेजी बोलना सीख जाते थे।

गली-गली में कुकुरमुत्‍ते की तरह उग आए तथाकथि‍त पब्‍लि‍क स्‍कूलों में अधि‍कांश अपने नाम तक अंग्रेजी में ठीक से नहीं लिख पा रहे हैं। वे आपके बच्‍चों को क्‍या अंग्रेजी सिखाएंगे। तथाकथित बडे़ नि‍जी स्‍कूलों में पढ़ाने की आपकी आर्थिक स्थिति भी नहीं है। बच्‍चों को अधकचरा और गलत ज्ञान उन्‍हें किस दिशा में ले जाएगा, इस पर एक पल सोचकर ही कोई निर्णय लें। दूसरी बात यह है कि‍ नि‍जी स्‍कूलों का मुख्‍य मकसद पैसा कमाना है, वह चाहे छोटे स्‍तर का हो या बडे़। तो क्‍या हमारे बच्‍चे दूसरों का व्‍यवसाय बढ़ाने की चीज हैं।

अफसोस की बात है कि‍ सरकारी स्‍कूलों की ओर से सभी ने मुँह मोड़ कर उन्‍हें उनके हाल पर छोड़ दि‍या है। इससे वहां शि‍क्षा के स्‍तर पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा उन्‍हें बदनाम भी बहुत कि‍या गया है। इस नेक काम में सरकार भी पीछे नहीं है। दूसरी ओर सरकारी स्‍कूलों की संख्‍या इतनी कम है कि‍ उसमें अधि‍कांश बच्‍चों के पढ़ने की गुंजाइश ही नहीं बनती। जहां स्‍कूलों हैं भी तो उनमें संसाधनों की कमी है। ऐसे में लोगों के समाने अपने बच्‍चों को नि‍जी स्‍कूलों में पढ़ाने की मजबूरी है।

अच्‍छी और सच्‍ची शिक्षा देने का एक ही उपाय है कि‍ शासन-प्रशासन को अपने क्षेत्र में सरकारी स्‍कूल खोलने के लि‍ए बाध्‍य करें। अपने बच्‍चों को इनमें पढ़ाएं और यदि‍ कुछ खामि‍यां हैं तो उन्‍हें दूर करने के उपाए करें। नि‍जी स्‍कूल आम आदमी के लि‍ए कभी भी अच्‍छी शिक्षा का विकल्‍प नहीं हो सकते।

बिना स्वतंत्रता और समानता के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं: मैनेजर पांडेय

jan sanskriti manch

नई दिल्ली: आपातकाल की 38 वीं बरसी को जन संस्कृति मंच ने 26 जून 2013 को दमन विरोधी दिवस के बतौर मनाया। जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा गया कि आज भले ही घोषित आपातकाल न हो, लेकिन इस देश में अघोषित आपातकाल चल रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध की आवाजों पर हमले इसी अघोषित आपातकाल की अभिव्यक्तियाँ हैं। ‘कबीर कला मंच’ की शीतल साठे और उनके साथियों की गिरफ्तारी, विनायक सेन व सीमा आजाद जैसे कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह के मुकदमे, फर्जी आरोपों पर जीतन मरांडी जैसे संस्कृतिकर्मी को सजा, बंगलुरू की गैलरी में युवा चित्रकार अनिरुद्ध साईनाथ की पेंटिंग प्रदर्शनी पर रोक, कश्मीर पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्मों को कैम्पसों में दिखाने पर हिंदुत्ववादी गुंडों के आदेश से रोक, बाल ठाकरे की मौत पर शिवसैनिकों द्वारा थोप गए बंद की फेसबुक पर आलोचना करने वाली दो लड़कियों  की गिरफ्तारी, नोएडा एवं मानेसर समेत पूरे देश में मजदूरों पर हमले आदि आपातकाल की याद दिलाने वाली ही घटनाएं हैं।

इस मौके पर जसम के अध्यक्ष प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि इमरजेंसी को भारत के लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले दिन के तौर पर याद करना जरूरी है। समानता और स्वतंत्रता के बगैर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं हो सकता। सिर्फ चुनाव होना लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकता।

जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने इमरजेंसी के दौरान अपनी गिरफ्तारी और यातनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि कांग्रेस ने कभी भी आपातकालीन दमन के लिए राष्ट्रीय क्षमा नहीं माँगी है। कांग्रेस और भाजपा शासकवर्ग की ये दोनों पार्टियां इस देश की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रही हैं, इन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। दमन के खिलाफ प्रतिरोध के आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए।

प्रलेस के महासचिव अली जावेद ने कहा कि शासकवर्गीय पार्टियों में तानाशाही आम प्रवृत्ति है, जिसके खिलाफ जनता के प्रतिरोध को संगठित करना जरूरी है।

भाकपा-माले की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन ने कहा कि इमरजेंसी का विरोध करने वाली शासकवर्गीय पार्टियों के नाटक को समझना भी जरूरी है। तानाशाहों का साथ देने वाली पार्टियाँ जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की हिफाजत नहीं कर सकतीं और न ही जनता को दमन से मुक्ति दिला सकती हैं, यह बार-बार साबित हुआ है।

फरवरी के आम हड़ताल के दौरान सैकड़ों मजदूरों के साथ जेल में डाले गए एक्टू नेता श्याम किशोर ने आपबीती बताते हुए सरकार, प्रशासन और पुलिस की श्रमिक विरोधी रवैये का खुलासा किया।

छात्र संगठन आइसा से सनी और युवा संगठन इंकलाबी नौजवान सभा से असलम खान ने सभा को संबोधित किया।

कार्यक्रम की शुरुआत उत्तराखंड की आपदा में राहत की अपील के साथ हुई और मृतकों के साथ संवेदना जाहिर करते हुए तथा जलेस के अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र को याद करते हुए एक मिनट का मौन रखा गया।

कार्यक्रम के दौरान अनुपम और अश्विनी अग्रवाल ने लाइव पेंटिंग बनाई। इसके अलावा प्रतिरोध की कविताओं के पोस्टर लगाए गए थे। लोकेश जैन, पाखी, छवि, कपिल शर्मा, उज्जयनी, विद्रोही, अंजनी ने कविताओं की प्रस्तुति की।

संचालन अवधेश ने किया। पूरे कार्यक्रम का संयोजन अशोक भौमिक ने किया था। इसमें अध्यापक रवींद्र गोयल, लेखिका नूर जहीर, दिनेश मिश्र, संस्कृतिकर्मी रेखा अवस्थी, आलोचक आशुतोष, गोपाल प्रधान, फिल्मकार इमरान, विजय, श्याम सुशील, रीतू सिन्हा, संदीपन, रवि राय, सुधीर सुमन, कनिका, रोहित कौशिक, रामनिवास आदि मौजूद थे।

(अशोक भौमिक, संयोजक, जन संस्कृति मंच, दिल्ली की ओर से जारी) 

दमन विरोध दिवस 26 को

jan sanskriti manch

नई दि‍ल्‍ली : 26 जून 2013 को देश पर कांग्रेस द्वारा आपातकाल थोपने की 38वीं बरसी है। बुद्धि‍जीवियों, विपक्षी नेताओं समेत तमाम आम लोगों को जेल में ठूँसने के जरिये इंदिरा सरकार ने विरोध के हर स्वर को कुचल देने की कोशिश की थी। आपातकाल के बाद के पहले आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा था। और यह भी सच है कि तब से घोषित रूप से आपातकाल नहीं लगाया गया, लेकिन थोड़ा करीब से देखने पर पता चलता है कि भारतीय लोकतंत्र अघोषित तौर पर लगातार आपातकाल की चपेट में है। पूरा देश छोटे-छोटे आपातकालों से भरा पड़ा है।

अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध की आवाजों पर हमले इसी अघोषित आपातकाल की अभिव्यक्तियां हैं। ‘कबीर कला मंच’ की शीतल साठे व उनके साथियों की गिरफ्तारी, बिनायक सेन व सीमा आजाद जैसे कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह के मुकदमे, फर्जी आरोपों में जीतन मरांडी जैसे संस्कृतिकर्मी को सजा,  बंगलुरु की गैलरी में युवा चित्राकार अनिरुद्ध  साईंनाथ की पेंटिंग प्रदर्शनी पर रोक,  कश्मीर पर बनी डॉक्यूमेंटरी फि‍ल्मों; जैसे- संजय काक की ‘जश्ने आजादी को’ कैंपसों में दिखाने पर हिंदुत्ववादी गुंडों के आदेश से रोक,  बाल ठाकरे की मौत पर शिव सैनिकों द्वारा थोपे गए बंद की फेसबुक पर आलोचना करने वाली दो लड़कियों की गिरफ्तारी,  नोएडा और मानेसर समेत पूरे देश में मजदूरों पर हमले आदि क्या आपातकाल की याद दिलाने वाली घटनायें नहीं हैं? संस्कृतिकर्मियों का दमन और उनके एक हिस्से को पालतू बनाने की प्रवृत्‍ति‍याँ आपातकाल में थीं और आज भी देखी जा सकती हैं।

आपातकाल के दौरान हर विरोध की आवाज को देशद्रोही बताने का सरकारी चलन था, आज यह और भी बढ़ गया है। पुलिस नृशंस तरीके से अल्पसंख्यकों की गिरफ्तारी और हत्या करती है और इसका विरोध करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है। परमाणु संयंत्र के जरिये गरीबों की रोजी-रोटी छीनने और उन्हें विकिरण के भयावह खतरे में डालने का विरोध करने वाले कुडनकुलम के आम गरीबों और कार्यकर्ताओं को भी देशद्रोही करार दिया जाता है। मारुति फैक्ट्री के कामगारों का सिर्फ पुलिस दमन ही नहीं होता, उन्हें झूठे मुकदमों में भी फंसाया जाता है। नोएडा में मजदूरों को झूठे मुकदमों में फँसाकर कई महीने जेल में रखा गया। उड़ीसा में पॉस्को विरोध आंदोलन हो या उत्तराखंड का कोकाकोला विरोधी आंदोलन,  कैंपसों में छात्रों के आंदोलन हों या खेत मजदूरों और ग्रामीण गरीबों के आंदोलन, हर जगह राज्य दमन का एक ही ढर्रा कायम है।

इन दिनों पूँजी जितने गहरे संकट से गुजर रही है, उससे उबरने के लिए उसे और भी ज्यादा दमनकारी राज्य की जरूरत है। कॉरपोरेट घरानों और कॉरपोरेट मीडिया द्वारा नरेन्द्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करना इसी जरूरत का परिणाम है। अब घोषित आपातकाल की जरूरत शासकों को नहीं रही, उन्होंने हजारों नये रास्ते ईजाद कर लिए हैं। लेकिन इस राज्य दमन और अघोषित आपातकाल के बावजूद प्रतिरोध आंदोलनों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। देश का शायद ही कोई कोना हो जिसने पिछले कुछ वर्षों में जबर्दस्त जन उभार न देखे हों। आइए इस 26 जून को आपातकाल को याद करते हुए इसे दमन विरोधी दिवस के रूप में रेखाँकित करें।

(अशोक भौमिक द्वारा जन संस्कृति मंच, दिल्ली के लिए जारी)

बच्चे और होम वर्क : महेश पुनेठा

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बच्‍चों को दि‍ए जाने वाले होम वर्क पर महेश पुनेठा की कवि‍ताएं-

1

क्या-क्या नहीं बुन रहे होते हैं बच्चे
छुट्टियों को लेकर
पढ़ेंगे ढेर सारी
नई-नई कहानियाँ
चुटकुले/पहेलियाँ
बनाऐंगे बहुत सारे चित्र
इकट्ठा करेंगे
तरह-तरह की चीजें
खेलेंगे खेल ही खेल
अपने साथियों के साथ
जाएँगे दादा-दादी के पास गाँव
सुनेंगे पुराने किस्से-कहानियाँ
घूमेंगे खेतों-खलिहानों में
जंगल और दुकानों में
देखेंगे तरह-तरह के पेड़
तरह-तरह की पत्तियाँ
तरह-तरह के फूल
तरह-तरह की चिड़ियाँ
वाह! कितना आनंद आएगा पर
खेल रहे होते हैं जब वे
अपने दोस्तों के साथ
या घूम रहे होते हैं
दादा जी के साथ
या पढ़ रहे होते हैं
मनपसंद कहानियाँ/कविताएं
पूछ लेती है मम्मी-
बेटा!पूरा हो गया क्या गृह कार्य
या फिर देख रहे होते हैं जब
अपना कोई पसंदीदा सीरियल
घन-घना उठती है फोन की घंटी
पूछते हैं पापा-
बेटा!कैसे हो?
होम वर्क कर रहे हो ना !
सिहर उठते हैं बच्चे
फिर लग जाते हैं
होम वर्क पूरा करने में
हो जाता है जब एक विषय का काम पूरा पूछो मत,
कितना राहत महसूस करते हैं बच्चे
जैसे स्कूल में आए
अधिकारी के लौटने पर गुरुजी
पर जल्दी ही याद आती है उन्हें

अभी तो बचा है ढेर सारा काम
अन्य विषयों का फिर से लग जाते हैं

होम वर्क पूरा करने में अनिच्छा से
बीत जाती हैं उनकी छुट्टियाँ
यूँ ही काम के बोझ से दबे-दबे
स्कूली दिनों की तरह
और फिर एक दिन
बीत जाता है बचपन यूँ ही ।

2

ऐसा नहीं कि‍ बच्चे होते हों कामचोर
या उन्हें न लगता हो काम करना अच्छा
सबसे अधिक क्रियाशील होते हैं बच्चे
पर कुछ काम जैसा काम हो ना

जिसमें कुछ जोड़ने को हो कुछ तोड़ने को
कुछ नया करने को हो
वही अभ्यास कार्य नहीं
जिसे कर चुके हों वे बार-बार स्कूल में
वही रटना ही रटना
ऊब चुके हैं वे जिससे
कुछ ऐसा काम
जिसमें कुछ मस्ती हो कुछ चुनौती हो
कुछ ढूँढ़ना हो, कुछ बूझना हो
कुछ जाना, कुछ अनजाना हो
कुछ अंकों का,  कुछ शब्दों का खेल हो
कुछ रंगों का, कुछ रेखाओं का मेल हो
जिसमें कुछ रचना हो
कुछ कल्पना हो
कुछ अपना हो, कुछ सपना हो
सबसे बढ़कर
बचपन सा चुलबलापन हो।

शिवकुमार मिश्र को जलेस की श्रद्धांजलि

shiv kumar mishra

नई दिल्‍ली: जनवादी लेखक संघ हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और चिंतक डा. शिवकुमार मिश्र के आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त करता है। मिश्र जी का दिनांक 21 जून को अहमदाबाद के एक अस्पताल में देहावसान हो गया जहां उनका पिछले 15 दिनों से इलाज चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार 22 जून को प्रात: 8.00 बजे वल्लभविद्यानगर में होगा।

डॉ. शिवकुमार मिश्र का जन्म कानपुर में 2 फरवरी, 1931 को हुआ था। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से एम.ए.,पी.एच.डी., डी.लिट. की तथा आगरा विश्‍वविद्यालय से लॉ की डिग्री प्राप्त की।

डॉ. मिश्र ने 1959 से 1977 तक सागर विश्‍वविद्यालय में हिंदी के व्याख्याता तथा प्रवाचक के पद पर कार्य किया। 1977 से 1991 तक वह सरदार पटेल विश्‍वविद्यालय, वल्लभविद्यानगर (गुजरात) के हिंदी विभाग में प्रोफेसर तथा अध्यक्ष रहे।

डॉ. मिश्र ने यू.जी.सी. की वितीय सहायता से दो वृहत शोध परियोजनाओं पर सफलतापूर्वक कार्य किया। उनके 30 वर्षों के शोध निर्देशन में लगभग 25 छात्रों ने पी.एच.डी. की उपाधि हासिल की। डॉ. मिश्र को उनकी मशहूर किताब ‘मार्क्सवादी साहित्य चिंतन’ पर 1975 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। भारत सरकार की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना के तहत 1990 में उन्होंने सोवियत यूनियन का दो सप्ताह का भ्रमण किया।

मिश्र जी ने जनवादी लेखक संघ के गठन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी, आपातकाल के अनुभव के बाद अलग संगठन बनाने का एक विचारधारात्मक आग्रह सबसे पहले उन की तरफ़ से आया था। वह उसके संस्थापक सदस्य थे। वह जयपुर सम्मेलन में 1992 में जलेस के महासचिव और पटना सम्मेलन (सितंबर 2003) में जलेस के अध्यक्ष चुने गये और तब से अब तक वह उसी पद पर अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे थे। अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वह अपनी वैचारिक प्रतिद्धता पर अडिग रहे। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के इस समय भी वह सदस्य थे।

मिश्र जी हिंदी के शीर्षस्थ आलोचकों में से एक थे। उनकी पुस्तकों में से प्रमुख हैं- ‘नया हिंदी काव्य’, ‘आधुनिक कविता और युग संदर्भ’, ‘प्रगतिवाद, मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन: इतिहास तथा सिद्धांत’, ‘यथार्थवाद’, ‘प्रेमचंद: विरासत का सवाल’, ‘दर्शन साहित्य और समाज’, ‘भक्तिकाव्य और लोक जीवन’, ‘आलोचना के प्रगतिशील आयाम’, ‘साहित्य और सामाजिक संदर्भ’, ‘मार्क्सवाद देवमूर्तियां नहीं गढ़ता’ आदि। उन्होंने इफको नाम की कोआपरेटिव सेक्टर कंपनी के लिए दो काव्य संकलनों के संपादन का भी शोधपूर्ण कार्य किया। पहला संकलन था- ‘आजादी की अग्निशिखाएं’ और दूसरा ‘संतवाणी’। मिश्र जी के निधन से हिंदी साहित्य व हमारे समाज के लिए अपूरणीय क्षति हुई है। जनवादी लेखक संघ ने अपना एक नेतृत्वकारी वरिष्ठ साथी खो दिया है।

जनवादी लेखक संघ मिश्र जी के प्रति अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा उनके परिवारजनों व मित्रों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता है।

(मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ की ओर से जारी)

होमवर्क का बोझ: अनुराग

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बच्चों की स्कूल की छुट्टियां खत्म होने वाली हैं। मेरी समस्या है कि अभी तक बेटे-बेटी ने होमवर्क नहीं किया है। रोज इसी बात को लेकर बच्चों के साथ झिकझिक होती है। यह केवल हमारे घर की नहीं, बल्कि अधिकांश घरों की कहानी है। गर्मी या सर्दियों में लंबी छुट्टी के पीछे मौसम के अलावा यह भी कारण है कि पूरे साल पढ़ाई के बाद बच्चों को मानसिक तनाव से दूर रहने के लिए कुछ समय दिया जाए। वे खेलें-कूदें-घूमें, जो मन आए करें।लेकिन निजी स्कूल इन छुट्टियों में भी बच्चों को चैन से नहीं रहने देना चाहते हैं और उन पर होमवर्क का बोझ डाल देेते हैं। नासमझ अभिभावकों को भी लगता है कि बच्चों पर हर समय पढ़ाई का दबाव होना चाहिए तभी वे बेहतर कर सकेंगे। यह धारणा पूरी तरह गलत है। इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति अरुचि ही उत्पन्न होती है। छुट्टियों में होमवर्क देने के हिमायतियों को कम से कम एक बार बच्चों से बात करके तो देखना चाहिए। उन्हें पता चलेगा कि वे होलीेडे होमवर्क से किस तरह नफरत करते हैं।

अधिकांश घरांे की स्थिति यह है कि बच्चों का होमवर्क उनके माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य कर रहे हैं। बच्चों को होमवर्क में ऐसे विषय दिए जाते हैं कि जिन्हें इंटरनेट के बिना किया ही नहीं जा सकता। जो बच्चे थोड़ा-बहुत काम करते भी हैं तो इंटरनेट पर सर्च कर उसकी नकल उतार देते हैं। उससे न तो उनका कोई बौद्धिक विकास होता है और न ही कुछ सीखते हैं, बल्कि इससे उनमें नकल करने की प्रवृत्ति होती है और वे जीवन में हर क्षेत्र मेहनत ने कर शार्टकट ढूंढ़ने लगते हैं। इससे उसके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में छुट्टियों में काम देेने का क्या औचित्य रहा।

बच्चों को किस तरह होमवर्क दिए जाते हैं और वे किस तरह करते हैं इसके एक-दो उदाहरण। मेरी बेटी कक्षा सात में पढ़ती है। उसे सामान्य ज्ञान में होमवर्क मिला है कि आईपीएल-6 के बारे के आकर्षक फोटो ढूंढ़ने और उसके बारे में लिखने का। इससे पता चलता है कि यदि काम ही दिया जाना है तो स्कूल वाले यह भी नहीं जानते कि क्या काम दिया जाए। आईपीएल टूर्नामेंट अपने जन्म से ही विवादस्पद रहा है। ऐसे टूर्नामेंट के बारे में स्कूल बच्चों को क्या सीखना चाहता है। विभिन्न खेलों में कई राष्टीय-अंतरराष्टीय प्रतियोगिता आयोजित की जाती हैं। बेहतर होता है कि उनमें से किसी के बारे में बच्चों से लिखने के लिए कहा जाता। मेरे दोस्त की चार वर्षीय बेटी का इसी साल नर्सरी में एडमीशन हुआ है। उसे काम मिला है- ‘पीपुल हू हेल्प अस‘ का माडल बनाना है। बच्ची क्या बनाएगी, उसके पापा उसका काम कर रहे हैं। हमारे पड़ोस में रहने वाला यश दूसरी क्लास में पढ़ता है। मैंने उससे पूछा कि होलीडे होमवर्क कर लिया। उसने तपाक से कहा कि सम तो कर कर लिए हैं। बाकी काम दीदी और पापा करेंगे। लगता है कि होमवर्क बच्चों को नहीं, अभिभावकों को दिया जाता है।

होलीडे होमवर्क की इस अंधी दौड़ ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। अपने स्कूली दिन आते हैं। गर्मियों की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार रहता था। परीक्षा समाप्त होते ही काॅपी-किताब एक तरफ और बच्चे आजाद पंछी। सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। कोई होलीडे होमवर्क नहीं मिलता था। परिजनों का भी कोई दबाव नहीं रहता था-पढ़ो-पढ़ो! हम छुट्टी-छुट्टी खूब खेलते-कूदते थे। बहुत से बच्चे दादी-नानी या अन्य रिश्तेदार के घर भी जाते थे। अब बच्चा कहे कि उसे नानी के यहां जाना है तो माता-पिता छूटते ही कहेंगे कि जब तक होमवर्क पूरा नहीं हो जाता कहीं नहीं जाना। बच्चा लाख सिर पटक ले लेकिन माता-पिता तैयार नहीं होंगे। ऐसे में बच्चा जिद्दी और चिड़चिड़ा हो होगा।

हवा में दौड़ती हैं मैगलेव रेलगाडियां : देवेंद्र मेवाड़ी

maglev train

हाल ही में जापान ने 500 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली रेलगाड़ी का सफल परीक्षण किया है। इसकी तकनीक के बारे में बता रहे हैं देवेंद्र मेवाड़ी-

जापान ने हाल ही में अपनी एक ऐसी नई रेलगाड़ी का सफल परीक्षण किया है जिसकी रफ्तार 500 किलोमीटर प्रति घंटे होगी। इतना ही नहीं, यह रेलगाड़ी लोहे की परंपरागत रेल पटरियों पर नहीं, बल्कि पटरी से ऊपर हवा में अदृश्य चुंबकीय ट्रैक पर दौड़ेगी। फिलहाल वहां पलक झपकते नजरों से ओझल हो जाने वाली ऐसी पांच रेलगाड़ियां बनाई गई हैं जो वर्ष 2027 से लोगों को रिकार्ड रफ्तार के साथ सुहावने सफर का आनंद देंगी।

आम रेलगाड़ियों से अलग ये हवा से बातें करने वाली नई रेलगाड़ियां ‘मैगलेव’ रेलगाड़ियां कहलाती हैं। मैगलेव यानी मैगनेटिक लेविटेशन, जो चुंबकीय बल से हवा में ऊपर उठ कर चुंबकीय ट्रैक पर देखते ही देखते उड़नछू हो जाती हैं। इन तेज रफ्तार रेलगाड़ियों में पटरी पर दौड़ने के लिए न पहिए चाहिए, न एक्सिल, न बियरिंग।

सुनने पर विश्वास नहीं होता लेकिन डाल्फिन जैसी चपटी एयरोडाइनेमिक्स ‘नाक’ वाली ये रेलगाड़ियां हाल के परीक्षण में खरी उतर चुकी हैं। इन तेज रफ्तार गाड़ियों को आम बोलचाल में ‘बुलेट ट्रेन’ भी कहा जाता है। जापान ने वर्ष 1964 में अपनी पहली तेज रफ्तार ‘बुलेट ट्रेन’ चलाई थी जो आज वहां लगभग 318 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से करीब 2240 किलोमीटर लंबी पटरियों पर दौड़ रही हैं।

पांच नवीनतम रेलगाड़ियों से अब रफ्तार की इस सीमा को 500 किलोमीटर तक बढ़ाने में सफलता हासिल कर ली गई है। भविष्य में 16 डिब्बों वाली ऐसी एक-एक मैगलेव रेलगाड़ी 1,000 यात्रियों को सफर पर ले जाएगी। जापान ने इन तेज रफ्तार गाड़ियों के लिए देश भर में मैगलेव रेल नेटवर्क बिछाने की योजना बनाई है। आशा तो यह भी है कि इनकी रफ्तार भारत को भी छुएगी क्योंकि जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ा आबे ने विश्व की इस नवीनतम प्रौद्योगिकी को विकासशील देशों के साथ साझा करने की इच्छा जाहिर की है जिनमें हमारा देश भी शामिल है। हमारे देश में मुंबई-अहमदाबाद के बीच जापान की बुलेट ट्रेन प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की संभावना है।

हैरतअंगेज बात यह है कि अगर पटरियों पर पहियों से यह रेलगाड़ी नहीं चलती तो बिना उन्हें छुए हवा में आखिर कैसे चलती है यह भारी-भरकम उड़न-रेलगाड़ी? और, वह भी सवारियों और साजो-सामान के साथ? न पहियों की खड़खड़ाहट, न पटरी पर चलने की खट्-खटाक-खट् की आवाज। असल में यह विद्युत-चुंबकीय चमत्कार की देन है। यह रेल परिवहन की नवीनतम प्रौद्योगिकी है और ‘मैगलेव परिवहन प्रणाली’ कहलाती है। इसके लिए लोहे की परंपरागत पटरियों के बजाय नई तरह की चुंबकजड़ित पटरियां बिछाई जाती हैं।

इस बात को समझने के लिए पहले चुंबक और चुंबकीय क्षेत्र का रहस्य समझ लीजिए। चुंबक का पता करीब 2500 वर्ष पहले लग चुका था। इसके गुण सबसे पहले लोडेस्टोन नामक पत्थर में पाए गए। शुरु में इसी पत्थर से कुतुबनुमा बनाई गई। फिर पता लगा, चुंबक के गुण उन्हीं धातुओं में आ पाते हैं जिनमें लोहा या लोहे का अंश होता है। स्टील में लोहा और थोड़ा कार्बन होता है इसलिए यह शक्तिशाली चुंबक बन सकता है। चुंबकत्व एक अदृश्य प्राकृतिक बल है।

धातु का कोई टुकड़ा चुंबक क्यों बन जाता है? इसलिए कि उस धातु में मौजूद अणुओं के समूह यानी उनके ‘डोमेन’ यहां-वहां किसी भी दिशा का रूख कर सकते हैं। लेकिन, चुंबक बन जाने पर धातु के उस टुकड़े में अणुओं के वे समूह एक ही दिशा में व्यवस्थित हो जाते हैं।

चुंबक के चारों और अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र होता है। हर चुंबक की शक्ति उसके सिरों पर सबसे अधिक होती है। ये सिरे ध्रुव कहलाते हैं- उत्तरी ध्रुव (N) और दक्षिणी ध्रुव (S)। चुंबक के सिरों के ये नाम पृथ्वी के ध्रुवों के अनुसार रखे गए हैं। चुंबक के विपरीत ध्रुव यानी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं जबकि समान ध्रुव यानी उत्तरी-उत्तरी या दक्षिणी-दक्षिणी ध्रुव एक-दूसरे से दूर भागते हैं।

और हां, चुंबकत्व और विद्युत या बिजली का नजदीकी रिश्ता है। ये दोनों एक ही बल (फोर्स) के दो रूप हैं। यह बल विद्युत-चुंबकत्व और विज्ञान की भाषा में इलैक्ट्रोमैगेनेटिज्म कहलाता है। जब किसी सुचालक चीज जैसे- तांबे के तार में बिजली का करंट दौड़ता है तो उस तार के चारों ओर अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है। इस तरह जो चुंबक बनाए जाते हैं, वे इलैक्टोमैगनेट यानी विद्युत-चुंबक कहलाते हैं। किसी लंबे सीधे तार के बजाय कुंडली के रूप में मुड़ा तार अधिक शक्तिशाली चुंबकत्व पैदा करता है। जब लोहे की छड़ के चारों ओर प्लास्टिक चढ़े तार की कुंडली लपेट कर उसके दोनों सिरों को बैटरी से जोड़ दिया जाता है तो स्विच आन करते ही तार की कुंडली में बिजली दौड़ने लगती है और कुंडली के भीतर की लोहे की छड़ शक्तिशाली चुंबक बन जाती है। स्विच आफ करते ही छड़ का चुंबकत्व समाप्त हो जाता है।

बस, चुंबकीय शक्ति से चलने वाली ‘मैगलेव’ रेलगाड़ियों का यही रहस्य है। मैगलेव रेलगाड़ी पटरी पर लगे इलैक्ट्रोमैगनेटों के तीव्र चुंबकीय बल के कारण हवा में कुछ सेंटीमीटर ऊपर उठ जाती हैं और चुंबकों के कारण ही हवा में सरपट भागती हैं। होता यह है कि पटरी और रेलगाड़ी पर लगे इलैक्ट्रोमैगनेटों के कारण ‘आकर्षण’ और ‘विकर्षण’ बल पैदा होते हैं जिसके कारण रेलगाड़ी हवा में तेजी से सरकती जाती है। इलैक्ट्रोमैगनेट क्षण भर के लिए चुंबकीय क्षेत्र को पलट देते हैं तो तेज विकर्षण बल पैदा होता है जिससे रेलगाड़ी हवा में टिकी रहती है। इलैक्ट्रोमैगनेट एक बार फिर चुंबकीय क्षेत्र को बदल देते हैं और रेलगाड़ी आगे सरक जाती है। हर पल कई बार यही क्रिया लगातार दुहराए जाने पर रेलगाड़ी तेज गति से भागती जाती है।

मैगलेव परिवहन प्रणाली दो प्रकार की होती है- इलैक्ट्रो मैगनेटिक सस्पेंशन यानी ई.एम.एस. और इलैक्ट्रो डाइनेमिक सस्पेंशन यानी ई.डी.एस.।

ई.एम.एस. प्रणाली में रेलगाड़ी पटरी से ऊपर हवा में रहती है और उसके नीचे लगे विद्युतचुंबक यानी इलैक्ट्रो मैगनेट नीचे पटरी की ओर झांकते हैं। इस प्रणाली में फीडबैक लूप का उपयोग करके विद्युत-चुंबकों से बने चुंबकीय क्षेत्र को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इसलिए इसमें स्थायी रूप से काफी चुंबक लगे रहते हैं। इस प्रणाली की रेलगाड़ियां 500 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से तो दौड़ ही सकती हैं, अगर निर्वात यानी हवा रहित सुरंग हो तो 6400 किलोमीटर प्रति घंटा तक की गति से भी भाग सकती हैं। हवा से बातें करती इन रेलगाड़ियों को केवल हवा की ही रुकावट का सामना करना पड़ता है। इस प्रणाली में अंग्रेजी के ‘सी’ (c) आकार की आर्म पर नीचे की ओर चुंबक लगा रहता है। आर्म का ऊपरी सिरा रेलगाड़ी से जुड़ा रहता है। रेल पटरी इन दोनों सिरों के बीच में होती है। पटरी व चुंबकों की दूरी घटाने-बढ़ाने से चुंबकीय बल पैदा होता है। यही बल रेलगाड़ी को हवा में उठाए रखता है और उसे धकेल कर आगे बढ़ाता है।

ई.डी.एस. प्रणाली में रेल की पटरी और रेलगाड़ी दोनों ही सुपरकंडक्टिंग चुंबकों से चुंबकीय क्षेत्र बनाते हैं। इन दोनों चुंबकीय क्षेत्रों के रिपल्सिव यानी प्रतिकर्षी बल के कारण रेलगाड़ी हवा में उठ जाती है। चुंबकीय बल से ही रेलगाड़ी भी चलती है। परीक्षण में इस प्रणाली से मैगलेव रेलगाड़ी 581 किलोमीटर प्रति घंटा की रिकार्ड गति से दौड़ चुकी है। यह गाड़ी भार भी अधिक ढो सकती है।

रही बात इस नई प्रौद्योगिकी के फायदे की, तो बिना पहियों की तेज रफ्तार मैगलेव रेलगाड़ी से यात्रा के समय में काफी बचत होती है। रेलगाड़ी पटरी से ऊपर हवा में सरपट भागती है इसलिए न पटरियों की टूट-फूट की आशंका रहती है और न आए दिन की मेंटिनेंस का झंझट। न ब्रेक फेल होने का खतरा, न पटरियों के ऊपर तार खींचने की जरूरत। मौसम भी मैगलेव रेलगाड़ी की राह में रूकावट नहीं बनता क्योंकि यह रेलगाड़ी आंधी, तूफान, वर्षा, हिमपात और कड़ाके की सर्दी में भी उसी तेजी से दौड़ सकती है। रेलगाड़ी और पटरी एक-दूसरे को छूती ही नहीं है, इसलिए पटरियों के रगड़ खाने की भी कोई आशंका नहीं। मैगलेव रेलगाड़ियों के लिए एक बार विशेष पटरी बिछा देने पर उसकी मेंटिनेंस कम होने के कारण वे लंबे अरसे तक ठीक-ठाक चलती रहती हैं। इन गाड़ियों का कुल संचालन व्यय भी परंपरागत रेलगाड़ियों की तुलना में कम होता है।

मैगलेव रेलगाड़ियां माइक्रोवेव टावरों से जुड़ी रहती हैं जिसके कारण उनका केन्द्रीय नियंत्रण केन्द्र के साथ हर समय दुतरफा संपर्क बना रहता है। मैगलेव गाड़ियों के लिए न सिगनल की जरूरत होती है, न सीटी और झंडी की क्योंकि बिजली की गति से भागने वाली इन रेलगाड़ियों को सिगनल देना किसी भी मनुष्य के लिए संभव नहीं है। ये उड़नपरियां तो बस कम्प्यूटर के इशारों पर चलती हैं। बहरहाल, हम तो यही मनाएंगे कि हवा से बातें करने वाली मैगलेव रेलगाड़ियों की यह नई प्रौद्योगिकी हमारे देश में भी आए और देखरेख की कम लागत पर हमें भी बेहतर सफर की सुविधा प्रदान करे।

तुम याद आए और तुम्हारे साथ जमाने याद आए :सुधीर सुमन

मेहदी हसन

मेहदी हसन

13 जून 2012 को उस्ताद मेहदी हसन का निधन हुआ था, पर पिछले एक साल में कभी नहीं लगा कि वे हमारे बीच नहीं हैं। वैसे भी पिछले कई वर्षों से वे गा नहीं रहे थे, इसके बावजूद वे हमारे स्मृतियों के किसी तलघर में नहीं चले गए थे, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में वे गहरे रचे-बसे हुए थे और आगे भी रहेंगे। आज बाजार आए दिन नई नई आवाजें उछालता रहता है, नए नए आकर्षणों को बड़ी धूम से प्रचारित करता है, लेकिन वे आवाजें बहुत देर तक हमारे दिलो दिमाग या जीवन में टिक नहीं पातीं, मेहदी हसन की आवाज मानो इस प्रवृत्ति को चुनौती देती है, वह मानो कहती है कि मैं कोई उपभोक्तावादी लहर से पैदा उत्पाद नहीं हूं, मैं तो मनुष्य के जीवन और संस्कृति के गहरे अनुभवों और उसकी सृजनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति हूं। कुछ जो शाश्वत भावनाएं हैं, जिनसे तमाम कलाएं जन्मी और विकसित हुई, उसकी अभिव्यक्ति की जो परंपरा है उसी की बेमिसाल देन हूं। मुझमें अपनी मिट्टी, अपने जल, अपनी जबान और अपने जैसे हजारो-लाखों लोगों का हाल-ए-दिल दर्ज है। इसीलिए तो बहुत सीधे और सहज तरीके की गजल ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भूला न सकोगे’ को जब हम मेहदी हसन की आवाज में सुनते हैं, तो वह सिर्फ किसी प्रेमी की उपेक्षा की पीड़ा और इस दावेदारी की गजल नहीं रह जाती कि उपेक्षा के बावजूद प्रेमी की वफा में इतनी ताकत है कि उसे भुलाया नहीं जा सकता, बल्कि उसमें वफा के बावजूद उपेक्षित और वंचित किए जाने की जाने कितनी दास्तानें जुड़ जाती हैं।
भारत-पाकिस्तान के रिश्ते के संदर्भ में अहमद फराज की गजल ‘रंजिश ही सही’ जरूर ज्यादा लोकप्रिय रही, शायर अहमद फराज से भी इसे सुनाने की अक्सर फरमाइशें की जाती थीं और वह भी कबूल करते थे कि यह तो मेहदी हसन की गजल हो गई है। लेकिन ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो’ को सुनते हुए अक्सर मुझे लगता है, मानो इसमें उन करोड़ों लोगों के विषाद का इजहार हो रहा है, जिन्होंने इस देश और इसकी संस्कृति को रचने में साझी भूमिका निभाई, मगर इतिहास के एक खास मोड़ पर अपने मादर-ए-वतन के प्रति ही गैर वफादार करार दिए गए। खुद मेहदी हसन की जिंदगी को विभाजन की इस त्रासदी के बगैर समझा नहीं जा सकता। राजस्थान के अपने गांव और पूूरे भारत के प्रति उनके जबर्दस्त लगाव की कुछ घटनाओं की चर्चा लोग करते रहे हैं। कई बार लगता ही नहीं कि उनके द्वारा गायी गई गजल में (भले वह किसी फिल्म के लिए क्यों न गाई गई हो) महज कोई नायक किसी नायिका के प्रति संबोधित है। इसी गजल की अगली पंक्तियां हैं- न जाने मुझे क्यों यकीन हो चला है, मेरे प्यार को तुम मिटा न पाओगे/ मेरी याद होगी, जिधर जाओगे तुम, कभी नग्मा बनके कभी बनके आंसू। मेहदी हसन को सुनते हुए कभी नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान दो भिन्न मुल्क हैं, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि हम बिल्कुल अभिन्न हैं।
अकारण नहीं है कि भारत में मुस्लिम विरोध और पाकिस्तान विरोध के जरिए अंधराष्ट्रवादी व सांप्रदायिक उन्माद भड़काए जाने की जो राजनीति रही है, उसका प्रतिकार करने वालों को जाने-अनजाने मेहदी हसन की आवाज बेहद सुकून प्रदान करती रही है। वे हमारे लिए हमारी साझी संस्कृति के बहुत बड़े प्रतिनिधि थे। मैंने खुद नब्बे के दशक की शुरुआत में जो पहला कैसेट खरीदा था, वह मेहदी हसन का था, जिसमें शोला था जल बुझा हूं, रंजिश ही सही, जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं आदि मशहूर गजलें थीं। बीस साल की उम्र मंे पहली बार देश की राजधानी दिल्ली एक रेडियो प्रोग्राम के सिलसिले में आया था और यहां से लौटते वक्त वह कैसेट और चांदनी चैक से एक सस्ता सा वाकमैन खरीद कर ले गया। वाकमैन तो जल्द ही खराब हो गया, पर वह कैसेट आज भी मेरे एक जिगरी दोस्त के पास सुरक्षित है।
हमारी पीढ़ी को फैज, फराज, मीर और दाग जैसे शायरों से जोड़ने वाले मेहदी हसन ही थे। उन्होंने इन शायरों की जिन गजलों का चुनाव किया, उसे सुनते हुए हम न केवल साहित्य की बेमिसाल परंपरा से जुड़े, बल्कि आधुनिक और प्रगतिशील भावबोध भी हमारे भीतर घुलता गया। अक्सर यह बात जो मन में चलती रहती है कि हिदी उर्दू की पढ़ाई अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ होनी चाहिए, तो इसके पीछे भी मेहदी हसन जैसे गायकों की भी बड़ी भूमिका है, जिन्होंने अपनी गायकी के सहारे हमें इन महान शायरों की रचनाओं की खासियत से रूबरू कराया।
मेहदी हसन के गुजर जाने के बाद उनके द्वारा गायी गई अपने पसंद की गजलों को याद करने लगा, तो तुरत दो दर्जन से अधिक गजलें जुबान पर आ गईं। मुझे महसूस हुआ कि दूसरे किसी गायक द्वारा गाई गईं पसंदीदा गजलों से यह संख्या अधिक है। बल्कि मीर, फैज, गालिब और अहमद फराज को छोड़ दें तो कई गजलों के शायरों का नाम भी जेहन में कम ही रहता है। यकीन से भरी और हौले से अपने भरोसेे में लेने वाली मेहदी हसन की आवाज का जादू ही सर्वोपरि होता है, जो उन शायरों की रचनाओं में मौजूद भावनाओं और अर्थों की बारीकियों को अत्यंत कुशलता से खोलते हुए, हमारे भाव-जगत से बेहद आत्मीय संवाद करता है। कई बार तो उनके द्वारा गायी गई किसी पसंदीदा गजल के शायर का नाम जब पता चलता है, तो हम एक अजीब सी खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही मेरे साथ ‘रोशन जमाले यार से है अंजुमन तमाम’ गजल सुनते हुए हुआ। मैं उन्हीं के अंदाज में इसे दोस्तों के बीच गाता भी रहा हू, लेकिन शायर का नाम ही पता नहीं था। अभी कुछ महीने पहले खुद मेहदी हसन के एक प्रोग्राम की रिकार्डिंग सुनते हुए मुझे पता चला कि इसके रचनाकार हसरत मोहानी हैं, वही चुपके चुपके रात दिन वाले हसरत मोहानी, आजादी के  आंदोलन की इंकलाबी शख्सियत हसरत मोहानी। इसी तरह इंकलाबी शायर हबीब जालिब की मशहूर गजल ‘दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं’ को अपनी आवाज के जरिए मकबूल बनाने और बहुतों के दिल की आवाज का बयान बना देने का श्रेय भी मेहदी हसन को ही जाता है। मीर की गजल ‘पत्ता पत्ता बुटा बुटा हाल हमारा जाने है’ को जब मेहदी हसन की आवाज में पहली बार सुना, तो लगा कि इससे बेहतर कोई और नहीं गा सकता। और अपने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की गजल- ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ हो या फिर मीर की ‘देख तो दिल कि जां से उठता है/ये धुंआ सा कहां से उठता है’ और दाग की ‘गजब किया तेरे वादे पे एतबार किया’, ऐसा लगता है कि ये गजलें मेहदी हसन की आवाज के लिए ही बनी थीं। जहां तक गुलों में रंग भरे और शोला था जल बुझा हूं सरीखी फैज और फराज की कई गजलों की मकबूलियत की बात है, तो इसमें मेहदी हसन की आवाज की भी बहुत बड़ी भूमिका है। यद्यपि गालिब की गजल दिले नांदा तुझे हुआ क्या है मेहदी हसन की आवाज में मुझे व्यक्गित तौर पर उतनी प्रभावशाली नहीं लगती, लेकिन यह एक अपवाद है। परवीन शाकिर की गजल कूबकू फैल गई मेहदी हसन की आवाज में गाई गई ऐसी गजल है, जिसे अब भी खूब पसंद किया जाता है। मिलन की खुशी- (यूं जिंदगी की राह में टकरा गया कोई, दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं) और बिछड़ने का गहरा दर्द- (अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, हमें कोई गम नहीं था गमे आशिकी से पहले) जिस गहराई से इस आवाज में अभिव्यक्त होता है, वह इसे श्रोताओं का बेहद आत्मीय बनाता है। एक गजल है- इलाही आंसू भरी जिंदगी किसी को न दे/ खुशी के बाद गमे-बेकसी किसी को न दे। अपने एक प्रिय कामरेड के संग्रह में से मैंने इसे पहली बार सुना था और लंबे समय तक समझता रहा कि यह गालिब की गजल होगी। लेकिन हाल में पता चला कि इसे मशरूर अनवर ने लिखा था और पाकिस्तानी फिल्म ‘हमे जीने दो’ के लिए मेहदी हसन ने इसे गाया था। मैं अक्सर यह भी सोचता रहा हूं कि मेरे साथी जो अपने साथियों के निजी दुखो को जाहिर करने को बहुत अहमियत नहीं देते थे और खुद भी अपने दुखों की झलक आज भी किसी को नहीं लगने देते, उनके संग्रह में यह गजल क्यों है? क्या यह इसे सुनते हुए कोई कथार्सिस होता है,  जैसे जो हमारे दुख अभिव्यक्त नहीं हो पाते, जो हमारे अंदर घर किए रहते हैं, इस गजल को सुनते हुए मानो हम उनसे मुक्त होते हैं। जिस अंदाज मे मेहदी हसन गाते हैं- उजाड़ के मेरी दुनिया को रख दिया तूने, मेेरे जहान के मालिक ये क्या किया तूने, वह दुख और शिकायत की इंतहा लगती है। अब इलाही या जहान के किसी मालिक की अवधारणा में भले ही किसी का यकीन न हो, पर दुनिया उजड़ने के दुख का श्रोताओं के अपने दुख से बिल्कुल तादात्म्य हो जाता है। उजड़ने और बिछड़ने का गम मेहदी हसन की आवाज में बड़ी असरदार तरीके से सामने आता है। और यह गम मानो वफा पैमाना भी है। फराज की गजल में जब वे गाते हैं- ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफा के मोती/ ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिले, तो इसे साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।
वह आवाज आज भी गूंज रही है- जिदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मरकर भी मेरी जान तूझे चाहूंगा। यह कोई भाववाद नहीं या किसी अपार्थिव सत्ता में कोई यकीन नहीं, बल्कि तमाम दुश्वारियों के बीच अपने होने का यकीन है। एक जिंदगी जिस जमीन और मिट्टी से विस्थापित हुई, जिसके बीच सरहदों की दीवारें खींच गईं, उसकी बाड़ाबंदियों को तोड़ती हुई, मरके भी उसी की खुश्बू में शामिल होने की यकीन है मेहदी साहब की आवाज।