Archive for: May 2013

‘दीवार पत्रिका’ को एक अभियान बनाए जाने की आवश्यकता है : महेश पुनेठा

school magazine

स्‍कूलों में नि‍कलने वाली पत्रि‍काओं को वि‍शेष महत्‍व है। ये पत्रि‍काएं बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक होती हैं। पेश से शि‍क्षक और कवि‍-आलोचक महेश पुनेठा अपने ऐसे ही अनुभव को साझा कर रहे हैं-

बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने और उसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हमने पिछले कुछ समय से ‘दीवार पत्रिका’ के प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया है। यह विद्यालय के विद्यार्थियों के द्वारा किया जाने वाला पाक्षिक आयोजन है। इस पत्रिका को जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है विद्यालय की दीवार में लगाया जाता है। इसमें बच्चों द्वारा तैयार की गई कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, चुटकलों, पहेलियों, समाचार, वर्ग पहेली, सामान्य ज्ञान संबंधी तथ्य, चित्र, कार्टून आदि को एक कागज में सुलेख में लिखकर एक लंबे आदमकद चार्ट में चिपकाया जाता है। इस पत्रिका के संपादन को कार्य पूरी तरह बच्चों द्वारा किया जाता है। बच्चों का एक संपादक मंडल बनाया गया है जो विधावार विषय सामग्री का संकलन और चयन करता है। इस काम को सहज-सरल बनाने के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए देश भर से निकलने वाली विभिन्न बाल पत्रिकाएं दी जाती हैं ताकि वे नए अनुभव ग्रहण कर उन्हें अपने तरीके से अपनी दीवार पत्रिका को तैयार करने में उपयोग कर सकें। बच्चे बहुत रुचि से पत्रिका पढ़ते हैं क्योकि उनका पढ़ना सोद्देश्य हो जाता है। उन पत्रिकाओं से भी अपनी दीवार पत्रिका के लिए उपयोगी सामग्री लेते हैं। पत्रिका में एक दूसरे को सहयोग करते हैं। अपने साथियों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। विद्यालय के बच्चों को दीवार पत्रिका की प्रतीक्षा रहती है। धीरे-धीरे यह स्थिति आने लगी है कि इस दीवार पत्रिका में छपने के लिए बच्चों में उत्सुकता बढ़ने लगी है। बच्चे पत्रिका में प्रकाशित सामग्री को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता की बारीकियों को जानने-समझने लगे हैं।

इस दीवार पत्रिका को प्रारम्भ करते हुए कुछ कठिनाइयाँ अवश्य आयीं। बार-बार कहने पर भी बच्चों ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई। बच्चों के लिए यह एकदम नया विचार था। बच्चों को  स्वयं रचना तैयार करना बहुत कठिन काम लगता था। परंतु उन्हें निरंतर प्रोत्साहित किया जाता रहा। उनसे बातचीत जारी रखी गई। उन्हें पढ़ने के लिए बाल साहित्य दिया गया। उसके महत्व से उन्हें अवगत कराया गया। एक-दो अंक तैयार कर उनके सामने प्रस्तुत किए गए। हिंदी शिक्षण के दौरान ही उन्हें अपने विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया गया। छोटी-छोटी कविताएं, कहानियाँ, निबंध, लेख, यात्रा वृतांत, जीवन-प्रसंग आदि तैयार करवाए गए। समय-समय पर विद्यालय में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और आसपास की घटनाओं की रिपोर्टिंग करवाई गई। उनमें से बेहतर रचनाओं को दीवार पत्रिका में लगाया जाने लगा। इसके लिए मासिक परीक्षाओं तक का भी उपयोग किया गया। हिंदी की परीक्षा में बच्चों को ऐसे विषयों पर लिखने के लिए कहा गया जिसमें बच्चे अपने अनुभव से बहुत कुछ लिख सकते हैं। जैसे- एक बार कक्षा नौ के बच्चों से कहा गया कि अपने जीवन के किसी ऐसे प्रसंग को लिखें ‘जब उन्हें बहुत खुशी हुई या रोना आया हो’। बच्चों ने बेहद रोचक प्रसंग लिखे। इन प्रसंगों से न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता का ही पता चला बल्कि बच्चे के भीतर झाँकने का अवसर भी मिला। यह भी जानने को मिला कि बच्चे अपने आसपास को कैसे देखते हैं ? अपने बड़ों के प्रति क्या सोचते हैं? उन्हें जीवन में कौन-सी घटना प्रसन्नता देती है और कौनसी दुःख पहुँचाती है? आदि….आदि। इसमें एक सबसे रोचक तथ्य जो सामने आया कि जो बच्चे आमतौर से कक्षा में दो-चार पंक्तियाँ भी नहीं लिख पाते थे उन्होंने दो-दो, तीन-तीन पृष्ठों में अपने संस्मरण लिख डाले। बच्चों द्वारा लिखे गए इन संस्मरणों को भी दीवार पत्रिका में स्थान दिया गया। इस घटना से हमारा भी विश्वास बढ़ा कि यदि बच्चों को अवसर प्रदान किए जाएं तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। आवश्यकता है उनकी अभिव्यक्ति को सम्मान और अवसर प्रदान करने की।

इसकी शुरुआत में एक बात और हुई। दीवार पत्रिका तो बनने लगी परंतु उसमें गिने-चुने दो-चार बच्चों की ही भागीदारी होती थी। यह सामूहिक प्रयास न होकर व्यक्तिगत जैसा ही अधिक बना रहा। कुछ बच्चे इसको समय की बर्बादी तथा फालतू का काम समझते थे। इस पर विचार कर निर्णय लिया गया कि इसके लिए बच्चों का एक समूह तैयार किया जाए। इस उद्देश्य से 6 से 12 तक की प्रत्येक कक्षा से ऐसे बच्चों का चयन किया गया जो अपनी कक्षा में सबसे बेहतर माने जाते हैं। जो पढ़ने-लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। उसमें कुछ ऐसे बच्चों को भी चुना गया जिनका हस्तलेख बहुत सुंदर है या चित्रकला में अच्छा दखल है। पूरे विद्यालय के लगभग 30-35 बच्चों का ऐसा एक समूह गठित किया गया जिसे ‘बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ’ नाम दिया गया। इनकी बैठकें आयोजित की गईं जिसका संचालन बच्चों द्वारा ही किया गया। इस समूह के बच्चों ने आपस में बातचीत कर आम सहमति और रुचि के अनुकूल दीवार पत्रिका के लिए दस सदस्यीय संपादक मंडल का चयन किया। आपस में भूमिकाओं का वितरण किया गया। अब सामगी संकलन-चयन से लेकर चार्ट में चिपका कर उसे पत्रिका का स्वरूप प्रदान करने की सारी जिम्मेदारी यही संपादक मंडल करता है। बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ की भूमिका केवल दीवार पत्रिका तैयार करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस समूह के बच्चे जब कभी भी उन्हें अवकाश मिलता है आपस में बैठकर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अपनी समस्याओं को एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं । भविष्य के लिए रणनीति बनाते हैं। आपस में पढ़ने-लिखने के कार्यो में एक-दूसरे की मदद करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अध्यापकों से मिलते हैं। इनकी योजना में है कि भविष्य में विद्यालय में साहित्यिक व बौद्धिक क्षमताओं के विकास के लिए समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जैसे- भाषण, निबंध, वाद-विवाद, कविता, कहानी, चित्रकला, सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता, बाल रचनात्मक कार्यशाला, गोष्ठी आदि। इसके प्रकोष्ठ का लक्ष्य है कि विद्यालय तथा अपने गाँव-पड़ोस का वातावरण शैक्षिक तथा रचनात्मक बनाया जाए। इस तरह से यह प्रकोष्ठ विद्यालय में एक संदर्भ समूह के रूप में काम करता है।

जैसा कि बच्चों में रचनात्मक लेखक के विकास के लिए विभिन्न विद्यालयों में विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है जो एक अच्छा प्रयास है पर हमारा मानना है कि उसकी कुछ सीमाएं हैं। अधिक खर्चीली होने के कारण उसका वर्ष में एक से अधिक अंक निकालना संभव नहीं है। जहाँ छात्र संख्या कम है वहाँ एक बार निकाल पाना भी संभव नहीं हो पाता। इसमें संपादन से लेकर प्रकाशन में बच्चों की अपेक्षा अध्यापकों की सक्रियता और भागीदारी ही अधिक रहती है जिससे बच्चों को बहुत अधिक कुछ कर पाने तथा सीखने का अवसर नहीं मिल पाता है। लिखने का अवसर भी वर्ष में एक ही बार मिल पाता है। अतः लेखन कौशल के विकास एवं बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने की दृष्टि से इसे बहुत उपयोगी नहीं कहा जा सकता है। विद्यालय पत्रिका के साथ-साथ निरंतर दीवार पत्रिका भी निकाली जाए तो इससे दोनों का महत्व बढ़ जाएगा। विद्यालय पत्रिका के लिए स्तरीय एवं मौलिक सामग्री भी मिल पाएगी। वास्तव में विद्यालय पत्रिका निकालने का उद्देश्य भी पूरा हो पाएगा।

यहाँ पर मैं यह भी बताना चाहूँगा कि दीवार पत्रिका का यह अभिनव प्रयोग केवल राजकीय इंटर कॉलेज, देवलथल में ही नहीं पिथौरागढ़ जनपद के एक दूरस्थ विद्यालय क.पू.मा.वि., नाचनी में रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य सचिव राजीव जोशी द्वारा भी किया जा रहा है। उन्होंने इस प्रयोग को प्रारंभ करने से पूर्व एक पाँच दिवसीय रचनात्मक बाल कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें बच्चों को दीवार पत्रिका को तैयार करने के बारे में आवश्यक जानकारी देने के साथ ही बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ाने के उद्देश्य से रोचक गतिविधियाँ करवाई गईं। यह प्रसन्नता की बात है कि वहाँ भी यह प्रयोग सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है । बच्चे उत्तरोत्तर बेहतर करते जा रहे हैं।

हमारा मानना है कि इस प्रयोग को हर विद्यालय में शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक है बल्कि विद्यालयों में अनुशासन की समस्या को सुलझाने में भी एक हद तक मददगार है। रचनात्मक शिक्षक मंडल के सदस्यों को इसे एक अभियान की तरह लेना चाहिए। इससे प्राप्त अनुभवों को रचनात्मक शिक्षक मंडल के आगामी सम्मेलनों में आपस में बाँटा जाना चाहिए ताकि इसको अधिक उपयोगी और प्रभावकारी बनाया जा सके।

वैज्ञानिक सोच से ही आगे बढ़ेगा समाज : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी विगत लगभग 45 वर्षों से विभिन्न संचार माध्यमों से विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करके समाज में वैज्ञानिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे देश में विज्ञान लेखन की स्थिति और वैज्ञानिक सोच पर अनुराग की अंतरंग बातचीत-

सदियां बीत गईं लेकिन विज्ञान के इस युग में भारत में अभी भी अंधविश्‍वास चरम पर है। लोग अपने बच्‍चे की बलि तक दे देते हैं। इसका क्‍या कारण मानते हैं आप?

दे.मे. :  मेरे विचार से इसकी वजह यह है कि लोगों को विज्ञान की जानकारी कम है। अगर उन्‍हें विज्ञान की जानकारी मिलती और सच का पता होता तो उन्‍हें विश्‍वास होता कि यह सब फरेब है। इस पर हमें विश्‍वास नहीं करना चाहिए।

हमारे देश में लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी लोगों के पास तक जानकारी क्‍यों नहीं पहुंच रही है, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। लोगों तक विज्ञान पहुँचाने की जो योजनाएं बनाई जाती हैं, वे लक्ष्य-वेध से क्यों चूक रही हैं- यह एक विचारणीय विषय है। ऐसी योजनाओं का ‘पीयर रिव्यू’ यानी मूल्याँकन जरूर होना चाहिए ताकि पता लग सके कि योजनाएं लक्ष्य वेध रही हैं या नहीं। यदि नहीं तो उन्हें अधिक कारगर बनाने का रास्ता खोजा  जाना चाहिए। इस प्रयास में सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहे हैं, और समाज को कम से कम पाँच सौ साल या हजार साल पीछे धकेल रहे हैं,  वे हैं इलेक्‍ट्रानिक चैनल और हिंदी फिल्में। इनके माध्‍यम से भूत-प्रेत, पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्‍वासों पर आधारित कार्यक्रम करोड़ों लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं। यह बहुत गलत है। इन फिल्मों और चैनलों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। कई सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने सराहनीय भूमिका निभाई भी है। उन्हें अंधविश्‍वास को दूर करने का बीड़ा भी उठाना चाहिए।

भारत में विज्ञान लेखन की क्‍या स्थिति है?

दे.मे. :  विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिंदी में विज्ञान लेखन की स्थिति बहुत अच्‍छी है। 1884 के आसपास विज्ञान की बातें भारतीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। और, जो कुछ पश्चिम में विज्ञान का विकास हो रहा था या हमारे यहाँ विज्ञान का जो काम हो रहा था, उस पर तत्‍कालीन सम्‍पादकों व लेखकों की नजर थी। वे लेखक विज्ञान लेखक नहीं कहलाते थे, वे साहित्‍यकार थे। वे साहित्‍य और विज्ञान पर समान रूप से लिखते थे। 1900 में सरस्‍वती शुरू हुई। सरस्‍वती ने साहित्‍य के साथ-साथ विज्ञान को अधिक से अधिक छाप कर बड़ी भूमिका अदा की। उसमें हिंदी के जाने-माने साहित्‍यकारों ने भी विज्ञान की रचनाएं लिखीं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, हरिवंश राय बच्‍चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और बहुत से साहित्‍यकारों ने लिखा। विज्ञान से जो बदलाव आ रहा था, उस पर प्रेमंचद ने भी अपने संपादकि‍यों में लिखा।   

हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्‍दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्‍तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्‍दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्‍दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्‍दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्‍दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्‍द कारखाने में बने शब्‍द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्‍दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्‍द प्रचलित हैं, उन्‍हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर  व्‍यक्ति उन्हें समझ सके।

विज्ञान के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के साथ ही संस्‍थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि विज्ञान परिषद, प्रयाग के मार्च, 2013 में सौ वर्ष पूरे हो गए। देश में ऐसी कोई दूसरी संस्‍था नहीं है जो 100 वर्षों से विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रही हो और जिसने सौ साल पूरे कर लिए हों। इस परिषद की स्थापना पं. गंगानाथ झा, रामदास गौड़, प्रो. सालिग्राम भार्गव और प्रो. हमीदुदीन साहब जैसे विद्वानों ने की थी। इसके सभापति और उपसभापति पं. मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, सर सी.वाई. चिंतामणि जैसे विद्वान रहे हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बसु, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, मेघनाद साहा, डा. के.एस. कृष्णन और डा. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक इसके सदस्य रहे हैं। यह परिषद 1915 से ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रही है जिसके लक्ष्य के बारे में पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने दोहा लिखा था।

इसके अलावा विज्ञान लोक आगरा से और विज्ञान जगत इलाहाबाद से प्रकाशित हुईं जो विशेष रूप से विज्ञान की पत्रिकाएं थीं और काफी लोकप्रिय भी हुईं। इनके माध्यम से आम लोगों के लिए विज्ञान सामने आया। इसी तरह मराठी, बांग्‍ला, तमिल, असमी आदि तमाम भारतीय भाषाओं में विज्ञान खूब लिखा गया है और लिखा जा रहा है। लेकिन, आम लोगों तक पूरी बात क्‍यों नहीं पहुँच पा रही है, यह बहुत जटिल सवाल है। इसका एक कारण तो मुझे यह लगता है कि बचपन से ही विज्ञान को कठिन और जटिल बता दिया जाता है। जबकि, ऐसा है नहीं। अगर विज्ञान को प्रकृति और जीवन से जोड़ कर समझाया जाए तो वह किस्से-कहानियों-सा रोचक लगेगा। कौन नहीं जानना चाहेगा कि सूरज क्या है, तारे क्या हैं, बादल कहाँ से आते हैं, वर्षा क्यों होती है, अन्न कहाँ से आया, फूल क्यों खिलते हैं, बीमारियाँ क्यों होती हैं, धातुएं कहाँ से आईं, कंप्यूटर क्या है, मोबाइल क्या है और यह भी कि हमारा शरीर क्या है? ये बातें रोचक तरीके से बताई जाएं तो सभी समझना चाहेंगे।  विज्ञान को आम आदमी तक पहुँचना ही चाहिए।                                       

आज इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में भी  हम कितना अंधविश्‍वास देख रहे हैं। डायनों की बात सुन रहे हैं, भूत-प्रेतों की बात सुन रहे हैं। एक छोटी-सी खबर जंगल की आग की तरह फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। अफवाह फैलती है कि रात को सोए तो पुतले बन जाएंगे, मूर्तियाँ बन जाएंगे तो लोग सारी रात जागते हैं। दीवारों पर हथेलियों की छाप लगा कर भूत-प्रेतों से बचने का उपाय किया जाता है। इतना भी तर्क नहीं करते कि यह सम्‍भव नहीं है। हम इतनी मामूली सी  विज्ञान की समझ भी लोगों में क्‍यों नहीं डाल पाए। उनमें वैज्ञानिक चेतना और जागरूकता क्‍यों नहीं फैला पाए हैं, इसका पता लगाया जाना चाहिए और इस कमी को दूर होना चाहिए।  

विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए ?

दे.मे. :  विज्ञान के सच को फैलाने के लिए हर सम्‍भव माध्‍यम का उपयोग किया जाना चाहिए। इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से जिस तरह अंधविश्‍वासों को फैलाया जा रहा है, इस पर सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए। यह देखना चाहिए कि इससे समाज में अविज्ञान फैल रहा है, अंधविश्‍वास फैल रहा है। जब विज्ञान का सच मालूम होता है तो लोगों में जागरूकता आती है। इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 1980 में मैं पंतनगर में था। जब पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो पूरे पंतनगर विश्‍वविद्यालय क्षेत्र में जहाँ पूरा वैज्ञानिक माहौल था, लोग घरों में बंद रहे। सड़कें खाली थीं। बाहर कोई दिखाई नहीं देता था। ग्रहण का इतना भय था। लेकिन, 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो देश में काफी लोगों ने उसे सुरक्षित तरीके से देखा। तब इतनी जागरूकता आ चुकी थी कि सूर्यग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और इससे कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछला सूर्यग्रहण 22 जुलाई 2011 को लगा। इसमें लाखों लोगों ने सूर्यग्रहण को देखा। ये लाखों लोग इसलिए सूर्यग्रहण को देखने के लिए तैयार हुए क्‍योंकि उन्‍हें ग्रहण का सच मालूम हो गया था

लेकिन, अगर हम मास मीडिया के माध्‍यम से इनके खिलाफ अंधविश्‍वास फैलाते हैं तो मुश्किल होगी। खगोलीय और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या तक के लिए टीवी चैनल ज्‍योतिषियों, टैरो कार्ड और न्‍यूमरोलॉजी वालों को बुला रहे हैं। अखबारों में भविष्‍य फल बाँचा जा रहा है। यह सब निराधार है। इसका कोई परीक्षण और प्रयोग नहीं किया गया है, बस आस्था के नाम पर चल रहा है। इसको महसूस किया जाना चाहिए और इसमें कमी लानी चाहिए। कुँडली मिला कर विवाह करने के बावजूद बहू-बेटियों का जीवन संकट में पड़ रहा है क्योंकि कुँडली सुखद जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए तो आपसी प्रेम और समझ जरूरी है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी। उन्होंने देश में वैज्ञानिक वातावरण के विकास के लिए 1958 में ससंद में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की जिसे संसद ने पारित किया। संसद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति पारित करने वाला भारत विश्व का पहला देश है। नेहरू ने देश में आधुनिक विकास के लिए राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं की नींव रखी। वे मानते थे कि प्राचीन रुढ़िवादी सोच को बदलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।

आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लि‍ष्‍ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे, विज्ञान का संबंध केवल पाठ्यक्रम तक सीमित है। क्‍या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने  का यह बड़ा कारण नहीं है ?

दे.मे. :  यह बहुत बड़ा कारण है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि पाठ्य-पुस्‍तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्‍हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्‍तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्‍तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्‍तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्‍चो ये पुस्‍तकें हैं, इन्‍हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। इससे उन्हें विषय को समझने में आसानी होगी। इसके अलावा रोचक व्‍याख्‍यान, पुस्तक प्रदशर्नियों, विज्ञापनों आदि और ऐसे ही अन्‍य कार्यक्रमों के माध्‍यम से भी विज्ञान की जानकारी उन तक पहुँचाई जानी चाहिए।

रेडियो पर विज्ञान के तमाम सीरियल आ रहे हैं। टेलीविजन पर भी कुछेक कार्यक्रम दिए जा रहे हैं, लेकिन ये नगण्‍य हैं। उनकी तुलना में अवैज्ञानिक कार्यक्रम कहीं ज्‍यादा दिए जा रहे हैं। इस समय देश की बड़ी जरूरत है कि सरकार की ओर से एक विज्ञान का चैनल चलाया जाना चाहिए, जो विज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वह केवल सरकारी चैनल बनकर न रह जाए। वह भी नेशनल ज्‍योग्राफी या डिस्‍कवरी की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री देने वाला चैनल बने। उसमें बच्चों, आम लोगों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी हो। उसका समय-समय पर मूल्‍याँकन किया जाना चाहिए कि किस कार्यक्रम को दर्शकों ने अधिक देखा। किसको कितनी टीआरपी मिल रही है।

वैज्ञानिकों और विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिकों की जीवनियाँ बच्‍चों को बहुत प्रेरित कर सकती हैं। उन्‍हें जिंदगी में अपने सपने पूरा करने की राह दिखा सकती हैं। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा जब इं‍टर की कक्षा में पढ़ते थे, तब भी नंगे पैर स्‍कूल जाते थे। एक बार स्‍कूल में अंग्रेज गवर्नर आया। मेघनाथ को जूता न पहनने के जुर्म में स्कूल से निकाल दिया गया। इसे गर्वनर के प्रति असम्‍मान माना गया। लेकिन, मेघनाथ के पास तो जूता था ही नहीं, वे कहाँ से पहनते। वे तैर कर नदी पार अपने गाँव जाते थे क्‍योंकि नाव के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे हालतों में भी वे हमारे देश की ही नहीं विश्व  की वैज्ञानिक विभूति बने। ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी बच्चों को पढ़ने को मिले जिन्होंने कठिनाइयों में भी कभी हार नहीं मानी।

यह सरकार और हम सबकी जिम्‍मेदारी है कि विज्ञान की जानकारी का प्रसार करें। हम लोगों को समझाएं कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसमें जाति, धर्म का कोई भेद नहीं है। विज्ञान की इतनी सी बात हम अभी तक लोगों को नहीं समझा पाए हैं। बार-बार राजनीतिक कारणों से जाति और धर्म के भेद को फैलाया जा रहा है। हमें मनुष्य के बजाए जातियों में बाँटा जा रहा है ताकि जाति को वोट दें। सच यह है कि मनुष्य की केवल एक जाति है- होमो सेपिएंस।

क्या हिंदी में विज्ञान की शिक्षा देना कठिन है?

दे.मे. :  कतई नहीं। विज्ञान की शिक्षा हिंदी माध्यम से देने के लिए केवल कड़े संकल्‍प की जरूरत है। जैसे, 1968 में पंतनगर विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉक्‍टर ध्यानपाल सिंह ने निश्‍चय किया कि उन्हें अपने विश्‍वविद्यालय में कृषि की शिक्षा हिंदी माध्‍यम से देनी है। इसके लिए उन्‍होंने हिंदी के विज्ञान लेखकों को पत्र लिखे कि हमें पुस्तकें तैयार करने के लिए आप जैसे विज्ञान लेखकों की आवश्‍यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय खोला। पहले अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद कराया गया ताकि निर्धारित तिथि से हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा दी जा सके। विभिन्न  विषयों की पुस्तकें तैयार हुईं। मैंने भी वहाँ पादप प्रजनन की प्रमुख पाठ्य पुस्तक ‘एशियाई फसलों का प्रजनन’ का अनुवाद किया।  

विश्‍वविद्यालय की क्षमता उतनी पुस्तकों के प्रकाशन की नहीं थी। इसके लिए नई मशीनें लगवाई गईं। पुस्‍तकों का प्रकाशन भी विश्‍वविद्यालय ने शुरू किया। हिंदी में किताबें विद्यार्थियों को उपलब्‍ध हो गईं।  इसके साथ ही हमें निर्देश दिया कि हम वैज्ञानिकों से मिलें। उन्‍हें प्रेरित करें कि वे हिंदी में पुस्‍तकें लिखें। हम उन्‍हें विभिन्‍न विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस तरह किसानों तक कृषि विज्ञान की नई जानकारी पहुँचाने के लिए हिंदी में किसान भारती पत्रिका प्रकाशित की गई। उसकी शुरुआत प्रसिद्ध हिंदी विज्ञान लेखक श्री रमेश दत्त शर्मा ने की। बाद में 13 साल तक मैंने उसका सम्‍पादन किया। कृषि, पशुपालन, पशु चिकित्‍सा आदि की हिंदी में अनूदित और मौलिक पुस्‍तकें आ गईं और हिंदी शिक्षा का माध्‍यम लागू कर दिया गया। आज विश्‍वविद्यालय के पास हिंदी में सैकड़ों किताबें हैं। कुलपति डॉ. ध्‍यान पाल सिंह का कहना था कि कौन-सा ऐसा भारतीय किसान है जो अंग्रेजी की पुस्‍तकें पढ़कर खेत में हल चला रहा है। कौन-सा ऐसा ग्रामीण परिवार है, जो अंग्रेजी में जानकारी लेकर खेतों में उसका उपयोग कर रहा है। उनको तो हमारी आबोहवा में, हमारी फसलों, हमारे पशुओं से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।

क्‍या आपको नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए यदि कुछ पुरस्‍कार घोषित किए जाएं तो विज्ञान के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलेगा ?

दे.मे. : विज्ञान लेखन के लिए कई पुरस्‍कार पहले से ही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्‍कार है। चार-पांच वर्गों में पुरस्‍कार दिए जाते हैं लेकिन इनका समुचित प्रचार नहीं होता। इनके बारे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कोई नहीं लिखता। हर साल 28 फरवरी को विज्ञान दिवस पर ये पुरस्‍कार दिए जाते हैं, लेकिन कहीं कोई खबर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान पुरस्कार दिया जाता है। यह एक बड़ा पुरस्कार है। आपने सुना कभी इसके बारे में? वे पुरस्कृत पुस्तकें कहाँ हैं? हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से आत्माराम पुरस्कारदिया जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति के कर-कमलों से दिया जाता है इसलिए समाचारपत्रों में थोड़ी-बहुत चर्चा हो जाती है। इसके अलावा भी विज्ञान लेखन के लिए विभिन्न मंत्रालय पुरस्कार देते हैं।

समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्‍या महत्‍व है।

दे.मे. : वैज्ञानिक सोच सच का पक्षधर है। इसलिए यह समाज को जागरूक बनाता है, उसे आगे बढ़ाता है। जबकि, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास प्रतिगामी सोच को बढ़ाते हैं और समाज को पीछे ढकेलते हैं। अगर हम देश-काल पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि आज हम जहाँ खड़े हैं वहाँ तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर पहुँचे हैं। अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हो या दूध क्रांति, चिकित्सा की नई तकनीकें या अंतरिक्ष में उड़ते हमारे संचार व मौसम उपग्रह अथवा चाँद पर दस्तक देने वाला चंद्रयान-1, ये सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन हैं। तंत्र-मंत्र और ज्योतिष से आज तक न कोई अंतरिक्षयान बना है, न फसलों की पैदावार बढ़ी है और न चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार सामने आए हैं। इसलिए हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अंधविश्वासों को आँख मूंद कर अपनाने के बजाय तर्क करना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है? वैज्ञानिक सोच हमें प्रगति की राह पर आगे बढ़ाता है।

आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?

दे.मे. : मैं और मेरा परिवार तर्क का सहारा लेते हैं और ऐसी धारणाओं को नहीं मानते। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम तुरंत आगे बढ़ते हैं ताकि आसपास के लोग समझ सकें कि इससे कुछ नहीं होता। हम सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सुरक्षित विधि से देखते हैं और उस दौरान खाते-पीते रहते हैं ताकि साबित हो सके कि यह एक शानदार खगोलीय घटना है। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। हम दिन, वार, दिशा के फलाफल नहीं मानते। हमने अपनी मानसिकता ऐसी बना ली है इसलिए इन वहमों और अंधविश्वासों में नहीं फँसते।

आपने लेखने के लिए विज्ञान क्यों चुना?

दे.मे. :  क्योंकि मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और हर बच्चे की तरह अपने चारों ओर की हर चीज के बारे में जानना चाहता था- सूर्य, चंद्रमा और तारों के बारे में, पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों, जीव-जंतुओं, बादल, वर्षा और हर उस चीज के बारे में जो दिखाई देती थी। फिर, विज्ञान की पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे विज्ञान की बातों का पता लगता गया। मुझे पता लगता गया तो मेरा मन दूसरों को बताने के लिए बैचेन हुआ। और,  मैंने वे बातें साथियों को बताईं, बच्चों को बताईं। लोगों को बताने के लिए हिंदी में विज्ञान के लेख लिखने लगा। पहला लेख लिखा ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’, दूसरा ‘शीत निष्क्रियता’, तीसरा ‘कुमायूं और शंकुधारी’। पहले दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ को भेजे। तीसरा ‘विज्ञान’ को। ‘विज्ञान जगत’ के संम्‍पादक प्रोफेसर आर.डी. विद्यार्थी का उत्तर मिला, “लिखते रहना, कौन जाने कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। अप्रैल 1965 में मेरा पहला लेख ‘विज्ञान’ मासिक में छप गया और दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ के मई-जून 1965 संयुक्तांक में। इस तरह मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत हो गई हालाँकि तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ भी लिख रहा था जो ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘नई कहानियां’, ‘उत्कर्ष’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

शुरुआती दौर में आपको विज्ञान लेखन में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा और किन लोगों ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?

दे.मे. :  शुरुआती दौर में कोई विशेष मुश्किलें सामने नहीं आईं क्योंकि विज्ञान की जो बातें में पढ़ता था, जो जानकारी मिलती थी उसे अपनी भाषा में, अपने ढंग से लिख देता था। लेकिन, दीक्षा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ और ‘नवनीत’ जैसी पत्रिकाओं के विद्वान सम्‍पादकों, मतलब मनोहर श्याम जोशी, डा. धर्मवीर भारती और नारायणदत्त जी से ली जिनके द्वारा सम्‍पादित लेख पढ़ कर सरल भाषा-शैली में लिखने का क ख ग सीखा। रमेश दत्त शर्मा, गुणाकर मुले और रमेश वर्मा जैसे अग्रज विज्ञान लेखकों की रचनाएं पढ़ कर निरंतर लिखने की प्रेरणा मिलती रही। निरंतर लिखना ही नई ऊर्जा देता रहा। आपको बताऊँ, मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टिट्यूट), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब नेशनल बैंक में दीर्घकाल तक नौकरी की लेकिन हर व्यस्तता के बावजूद विज्ञान लेखन करता रहा। कई बड़ी स्टोरीज हिंदी में पहली बार मैंने दीं जैसे- कृषि वैज्ञानिक डा. नार्मेन बोरलाग को नोबेल शांति पुरस्कार, दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक और सिरोही बिंदु, विश्व के पहले परखनली शिशु का जन्म आदि।

आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं?

दे.मे. :  जी हाँ, मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ 1979 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद कई विज्ञान कथाएं लिखीं जो मेरे तीन कथा संग्रहों में संकलित हैं। विज्ञान कथा लेखन में मेरी विशेष रुचि रही है और मैं इसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का अध्ययन करता रहता हूँ। हिंदी साहित्य में इस विधा की रचनाओं की भारी कमी है, हालाँकि हिंदी में लगभग 1884 से विज्ञान कथा साहित्य रचा जा रहा है। इस क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुर सेन जैसे साहित्यकारों ने भी अपना योगदान दिया है। नई पीढ़ी के कई विज्ञान कथाकार इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। असल में विज्ञान कथा लेखन एक कठिन कार्य है जिसमें कहानी की समझ और विज्ञान के तंतुओं से कथा बुनने की कला आना जरूरी है। एक बात और, विज्ञान कथाओं से जनमानस तक विज्ञान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

दिल और दिमाग़ की जंग : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

चर्चित लेखि‍का बीनू भटनागर का व्‍यंग्‍य-  

‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे ’ पुराना गाना है, पर शायद सबने सुना हो। दिल टूटने के बाद जी   ही नहीं सकते, जब आपके पास ऐसा कोई विकल्प है ही नहीं, तो ये क्या कहना कि जी कर क्या करेंगे!

शायरों को थोड़ा सा जीव-विज्ञान का ज्ञान होता तो बहुत से बेतुके गीत न बनते जैसे ‘दिल के टुकड़े हज़ार हुए इक यहाँ  गिरा इक वहाँ गिरा ’,   दिल न हुआ काँच का गिलास हो  गया, दिल में तो एक मामूली सा छेद हो जाए तो बड़ा सा  आपरेशन करवाना पड़ता है।

शायर और कवि तो दिल से ऐसे खेलते हैं, मानो दिल ना हो कोई खिलौना हो, ‘खिलौना जानकर तुम दिल ये मेरा तोड़े जाते हो’ जैसा गीत ही लिख डालते हैं।

गीत हों या संवाद, फिल्म हो या टी.वी. धारावाहिक,  उपन्यास हो या कहानी, नया हो या पुराना, दिल से ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते हैं जो हो ही नहीं सकते। गुर्दे की चोरी हो सकती है, क्योंकि वो दो होते हैं, एक चोरी हो जाए दूसरा पूरा काम संभाल लेता है, पर दिल निकालने से तो आदमी तुरन्त मर जायेगा। फिर भी हमारे बुद्धिजीवी  कवि प्यार मे दिल चुराने की बात करते थकते नहीं, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को नज़र नहीं चुराना सनम’ दिल चोरी होने के बाद नज़र यानी आँख चुराने के लिये कोई ज़िन्दा बचेगा क्या ? ये तो सीधे-सीधे क़त्ल का मामला हो जयेगा !

एक और गाना याद आया ‘दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानू रे’ सही कहा दिल के बारे मे कवि महोदय ने, दिल तो सिर्फ  ख़ून को पूरे शरीर मे पम्प करके भेजता है प्यार व्यार जैसे काम तो दिमाग़ कुछ हारमोन्स के साथ मिलकर  करता है, और  कवि ठीकरा उस बेचारे मुठ्ठी भर नाप के दिल के सर फोड़ते हैं।

‘ ऐ मेरे दिले नादान तू ग़म से न घबराना’,  अजी  साहब!  नादान तो कवि हैं, दिल को तो घबराना आता ही नहीं, ये काम भी दिमाग़ का ही है। घबराने के लिये दिमाग़ को कुछ ज़्यादा ही रक्त की आवश्यकता पड़ती है, इसलिये दिल को तेज़ी से धड़कना पड़ता है। वह तो बस दिमाग़ को घबराहट के लिये तेज़ी से ख़ून भेजता है और कवि समझने लगते हैं कि‍ दिल ही घबरा रहा है।

कभी कोई अंतर्द्वन्द हो तो लेखक दिल और दिमाग़ को आमने-सामने लाकर खड़ा करने से भी नहीं चूकते।  फिल्मों में, टी.वी. धारावाहिकों में एक ही किरदार आमने-सामने खड़ा होकर बहस करता है। एक भावुक सा लगता  है जो दिल से सोचता हुआ बताया जाता है और दूसरा थोड़ा तर्क करता है, व्यावहारिक सा होता है, वह दिमाग़ से सोचता है, जबकि भावनायें और तर्क दोनों ही दिमाग़ से ही उपजती हैं, दिल बेचारे को तो सोचना आता ही नहीं है।

जब कोई दुविधा होती है, किसी पात्र को तो दूसरा कोई पात्र आकर उसे दिल-दिमाग़ पर एक भाषण दे डालता है कि ‘भैया, दिल से सोच दिमाग़ की मत सुन, दिल से लिया गया निर्णय ही हमेशा सही होता है।’ अब लेखक दिल और दिमाग़ में ही जंग शुरू करवा देते हैं कि दिल का ओहदा बड़ा है या दिमाग़ का। यह जंग एकदम बेमानी है । दिल का काम दिमाग़ नहीं कर सकता और दिमाग़ का काम दिल नहीं कर सकता।  इनसान दोनों के बिना जी ही नहीं सकता।  दिमाग़ देखा जाए तो सोच पर ही नहीं शरीर पर भी नियंत्रण रखता है, पर यदि कुछ सैकिंड भी दिल दिमाग को ख़ून न भेजे तो दिमाग़ को निष्क्रिय होते देर नहीं लगेगी। मेरे प्रिय लेखक भाई-बहनो ! दिल और दिमाग़ की  लड़ाई मत करवाइये। दोनों को अपना-अपना काम करने दीजिये। दिल या दिमाग़ की लड़ाई में सिर्फ डाक्टरों का ही फायदा होगा।

दिल और दिमाग़ के बीच सभी भाषाओं मे भ्रांतियाँ हैं। हिन्दी मे  ‘हार्दिक प्रेम’,’ हार्दिक आशीर्वाद’ जैसे वाक्याँश  हमेशा से प्रयोग हुए हैं। उर्दू मे ‘दिली ख्वाहिश’ और ‘दिल से मुबारकबाद’ कहने का रिवाज है। इंगलिश मे भी ‘hearty congratulations’ कहा जाता है। जबकि प्यार, बधाई और  ख़्वाहिश सब दिमाग़ से जुड़ी हैं, दिल से नहीं। मेरे विचार से देश की अन्य भाषाओं और विदशों की भाषाओं मे भी ऐसे वाक्याशों का प्रयोग होता ही रहा होगा। अब इस  विषय में तो भाषा वैज्ञानिकों को शोध करने की ज़रूरत है। जीव विज्ञान मे तो इस विषय मे कोई भ्रांति है ही नहीं।  अतः मेरा मानना है कि अब इन वाक्याशों की जगह दिमाग़ या मस्तिष्क से जुड़े वाक्याँश तलाशने की ज़रूरत है।

‘दिमाग़ी आशीर्वाद’ या ‘मस्तिष्कीय प्यार’ भी जमा नहीं। मानसिक शब्द लोगों को मानसिक बिमारियों या मनोविकार   की याद दिलाता है। अतः वह भी प्रयोग नहीं कर सकते। एक चीज़ होती है ‘मन’ जो मस्तिष्क में ही कहीं छुपा बैठा  होता है। उससे कोई वाक्याँश सोचते हैं – ‘मन से आशीर्वाद’, ‘मन से प्यार’ कैसा रहेगा ? मुझे तो ठीक लग रहा है। बस, थोड़ी आदत डालने की बात है!

मैंने अपने कवि और लेखक भाई-बहनों से दिल और दिमाग़ या हृदय और मस्तिष्क या heart और brain  (मुझे और कोई भाषा नहीं आती है) के बारे मे काफ़ी चर्चा कर ली है। आशा है कि अब कोई भ्रम किसी को नहीं होगा, फिर भी यदि कोई शंका हो तो हमारे टोल-फ्री नम्‍बर पर संपर्क करें। यह हेल्पलाइन 24 घंटे सातों दिन उपलब्ध है। आप चाहें तो हमारी  वेबसाइट दि‍लदि‍माग डॉट कॉम पर लॉगइन कर सकते हैं। हम इस विषय पर देश-विदेश के जीव वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के साथ   एक संगोष्ठी के आयोजन पर भी विचार कर रहे हैं। आप अपने विचार प्रतिक्रिया के बॉक्स मे लिख देंगे तो हमें इस आयोजन को करने मे सुविधा होगी। यह विश्‍वस्तरीय आयोजन करने मे कुछ समय तो लगेगा। इसलि‍ए इसकी संभावित तारीख़ 1 अप्रैल, 2013 सोची हुई है। सभी से सहयोग की अपेक्षा रहेगी।

जाकिर अली रजनीश को बॉब्स पुरस्कार

जाकिर अली रजनीश

जाकिर अली रजनीश

नई दि‍ल्‍ली : ब्लॉग के आस्कर कहे जाने वाले जर्मनी के अन्तर्राष्ट्रीय ‘डॉयचे वेले बॉब्स पुरस्कार 2013‘ की घोषणा हो गयी है। इनमें ‘हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉ्ग’ का पुरस्कार ‘तस्लीम’ (http://www.scientificworld.in) को तथा ‘सबसे रचनात्मक‘ ब्लॉग का पुरस्कार ‘सर्प संसार‘ (http://snakes.scientificworld.in) को प्रदान किया गया है। ये दोनों पुरस्कार यूजर च्वाइस श्रेणी के अन्तर्गत प्रदान किये गये हैं। यह जानकारी डायचे वेले की अधिकारिक वेबसाइट ‘दा बॉब्स डॉट कॉम’ पर दी गयी है। साइट के अनुसार पुरस्कार वितरण जर्मनी के बॉन शहर में होगा। वहाँ पर 18 जून को ग्लोबल मीडिया फोरम द्वारा आयोजित समारोह में विजेताओं को पुरस्कृत किया जाएगा।

बॉब्स के अनुसार 03 अप्रैल से चल रही ऑनलाइन वोटिंग में 94 हजार से अधिक वोट पड़े थे, जिनमें ‘तस्लीम‘ एवं ‘सर्प संसार‘ को अपनी-अपनी श्रेणी में क्रमश: 62 और 45 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए हैं। चर्चित रचनाकार और विज्ञान संचारक डॉ. जाकिर अली रजनीश इन ब्लॉगों के मॉडरेटर हैं और वैज्ञानिक जागरूकता के प्रचार-प्रसार के लिए इन ब्लॉगों का संचालन करते हैं। उन्होंने बताया कि विश्‍व की 14 भाषाओं में दिया जाने वाला बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार कुल 6 श्रेणियों में दिया जाता है और इन पुरस्कारों में हिन्दी भाषा को पहली बार शामिल किया गया है।

डॉ. रजनीश ने बताया कि हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग से नवाजा गया ‘तस्लीम’ ब्लॉग मूलतः एक गैर सरकारी संस्था है, जो वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करती है। यह संस्था अब तक विज्ञान ब्लॉग लेखन कार्यशाला, विज्ञान कथा कार्यशाला, राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी एवं अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन जैसे कार्यक्रम आयोजित करा चुकी है। उन्होंने बताया कि ‘सर्प संसार‘ एक ऐसा ब्लॉग है, जिसमें साँपों से जुड़ी जानकारियों को रोचक ढंग से प्रकाशित किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से साँपों के व्यवहार, उनकी आदतों पर रोशनी डाली जाती है और उनसे जुड़े अंधविश्‍वासों से पर्दा उठाया जाता है।

प्रस्तुतिः अर्शिया अली, कोषाध्यक्ष, तस्लीम

वसुंधरा पाण्डेय की प्रेम कवितायें

वसुंधरा पाण्डेय

2 जून 1972 को जन्‍मी वसुंधरा पाण्डेय की दो प्रेम कवि‍तायें-

1.

“हे मेरे स्त्रीत्व

मेरे सृष्टि-कर्म

नवसृजन के मेरे अभिमान

आनंद की सार्थकता

सार्थकता के आनंद

मेरी मुक्ति मेरे ज्ञान

तुझे लिखते समय

जितनी भी

अनिर्वचनीय पुलक है

सब संजो लेना चाहती हूँ…!”

2.

प्यार

कोई बच्चों का खेल नहीं

एक सफेद सी हिनहिनाहट है

जिस क्षण

तुम्हारी पात्रता सिद्ध होती है

ब्रह्मांडों के अंतराल नापती हुई

यह ठीक उसी क्षण

तुम्हारे पीछे खड़ी

अपने स्यामल होंठो

और फडफडाते नथुनों

और घने अयाल के साथ

तुम्हारी गर्दन को छू रही होती है

सकपकाते हो

आगे पीछे गति

बनाते घटाते

बचने का प्रयास करते हो

पर अब

कुछ नहीं हो सकता

तुम्हारी बगल खड़ी खनखनाहट

तुम्हें जीत का एहसास देती है

और तुम

एक झटके में

सवार हो जाते हो

तुम

सब हार चुके हो

असल में

तुम अब हो ही नहीं

वही है…!

नौकरशाही- चमकते सितारे : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

हर साल सि‍वि‍ल सेवा दि‍वस पर महत्‍वपूर्ण काम करने वाले नौकरशाहों को पुरस्‍कार दि‍या जाता है। इनके कामों को अन्‍य अधिकारि‍यों और कर्मचारि‍यों के लि‍ए प्रेरणादायक बता रहे है प्रेमपाल शर्मा-

21 अप्रैल, 1947 को देश के गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि देश का भविष्‍य इस बात पर निर्भर करेगा कि आप अपनी जिम्‍मेदारियों को कितनी क्षमता और लगन से निभाते हैं । पुरानी आई.सी.एस. के दिन गये । अब भविष्‍य आपके हाथों में है । देश के इन्‍हीं चमकते तारों की संख्‍या बढ़ाने, उन्‍हें प्रोत्‍साहित करने के लिए वर्ष 2006 से हर वर्ष केन्‍द्र सरकार के स्‍तर पर 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है।

कुछ चीजें परम्‍परा में निश्चित भी हो गई हैं । स्‍थान हर बार विज्ञान भवन रहता है। हर वर्ष प्रधानमंत्री संबोधित करते हैं और साथ होते हैं उनके कार्मिक मंत्री, केबिनेट सचिव, कार्मिक सचिव और विशेष रूप से इस अवसर पर प्रमुख व्‍याख्‍यान के लिए बुलाया गया अतिथि । विज्ञान भवन के मुख्‍य सभागार में नयी और पुरानी पीढ़ी के लगभग एक हजार लोक सेवकों की उपस्थिति एक प्रेरणास्‍पद अनुभव बन जाती है । शुरू के वर्षों में संयुक्‍त सचिव या उसके समकक्ष भारत सरकार के अधिकारी ही इसमें शामिल होते थे । लेकिन पिछले कई वर्षों से भारतीय प्रशासनिक सेवा में ताजा-ताजा शामिल हुए नौजवान अधिकारियों से लेकर पुलिस सेवा, केन्‍द्रीय सेवाओं के अधिकारी भी बुलाये जाते हैं । इससे सिविल सेवा दिवस को मनाने का उद्देश्‍य और अच्‍छा बन गया है जिससे कि नई से नई पीढ़ी उन कामों से प्रेरणा ले सके जो देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में, विभिन्‍न विभागों में उनके साथी, वरिष्‍ठ सहयोगी कर रहे हैं ।

21 अप्रैल 2013 को इस बार प्रधानमंत्री ने देश में महिलाओं के प्रति हो रहे अत्‍याचार पर विशेष रूप से चिंता जताई और शिक्षकों, नौकरशाहों समेत पूरे समाज को इस समस्‍या से लड़ने के लिए आगे आने का आह्वान किया । पिछले कुछ वर्षों में अकसर इस अवसर पर प्रधानमंत्री ऐसी समस्‍या को सामने रखते हैं जो तात्‍कालिक रूप से देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है । पिछले वर्ष 2012 में टू-जी घोटाले की बातें हवा में थीं और वक्‍त के अनुकूल प्रधानमंत्री ने तंत्र को पारदर्शी और जिम्‍मेदार बनाने का आह्वान किया था। उनकी इस टिप्‍पणी पर महीनों तक बहस चलती रही थी जो उन्‍होंने नौकरशाहों को कहा था कि ‘उन्‍हें और हिम्‍मत से आगे आना चाहिए।’ अखबारों में कई लेख इस संदर्भ में छपे थे कि क्‍या नौकरशाहों में अपने राजनेताओं के सामने हिम्‍मत बची भी है और यदि वे हिम्‍मत दिखाते हैं तो क्‍या राजनेता उनके बचाव में सामने आते हैं ? और तो और एक वरिष्‍ठ आई.एस.अधिकारी ने लिखा था कि ऐसे हिम्‍मती, ईमानदार अधिकारी को उनकी नौकरशाह बिरादरी भी कैसे अकेला छोड़ देती है । यदि सिविल सेवा दिवस उस बहाने भी देश की किसी ज्‍वलंत समस्‍या निशाने पर लाता है तो यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं कही जाएगी ।

हर वर्ष लगभग सात-आठ पुरस्‍कार दिये जाते हैं । इस वर्ष समेत कुछ पुरस्‍कारों को याद करना पूरी पीढ़ी को ताकत देता है । इस बार जिला मजिस्‍ट्रेट बदायूँ अमित गुप्‍ता को पुरस्‍कार दिया गया- मैला ढोने से आजादी और स्‍वच्‍छता के कदमों को उठाने के लिए । इस कार्यक्रम का भी नाम बहुत अच्‍छा रखा- ‘डलिया जलाओ’। डलिया यानी जिसमें हमारे मेहतर गंदगी को इकट्ठा करते हैं । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में सिर पर मैला ढोने पर प्रबंध तो लगाया था लेकिन बदायूँ समेत अभी कई जिलों में ऐसे दृश्‍य मिल जाते हैं जब डलिया या टोकरी लेकर सफाईकर्मी दिखाई देते हैं । सबसे पहला कदम सार्वजनिक रूप से इन डलिया/टोकरियों को जलाया गया । इसके बदले उन्‍हें नौकरियां दीं, बच्‍चों के लिए पढ़ने के विशेष इंतजाम किये, उनके लिए घर बनवाए और इस तरह पूरे जिले को मैला ढोने वाले सफाई कर्मचारी से मुक्त किया गया। इन्‍हीं कर्मचारियों को राज मिस्‍त्री के काम सिखाए गए और उन्हीं से शौचालय बनवाए गये । क्‍या इससे देश के दूसरे नौकरशाहों को प्रेरणा नहीं मिलेगी ?

इतने ही महत्‍वपूर्ण पुरस्‍कार में शामिल हैं ओमप्रकाश चौधरी जिला अधिकारी दंतेवाड़ा । आप सबको पता है दक्षिण, बस्‍तर और दंतेवाड़ा नक्‍सलवादी हिंसा से जूझ रहा है । साक्षरता दर सिर्फ 33 प्रतिशत । बच्‍चे या तो स्‍कूल जाते ही नहीं या छोड़ देते हैं । जिला अधिकारी ने एक मिशन की तरह कुछ काम शुरू किए । जैसे- पाँच सौ सीटों वाले आवासीय विद्यालय बनवाए । जो स्‍कूल हिंसा की घटनाओं के कारण बंद हो गये थे या तोड़ दिये गये थे उनका पुनर्निर्माण कराया । जो स्‍कूल छोड़ चुके थे उन्‍हें विशेष रूप से स्‍कूल वापस लाया गया । उससे भी महत्‍वपूर्ण काम यह है कि शिक्षा को और रुचिकर बनाया और ग्रीष्‍मकालीन कैम्‍प, विज्ञान संग्रहालय, जिला पुस्‍तकालय खोल कर शिक्षा के प्रति जागरुकता पैदा की । जिला अधिकारी के ये प्रयास नक्‍सलवाद से जूझते सभी राज्‍यों के लिए एक मिसाल बन सकते हैं ।

इसी वर्ष एक और पुरस्‍कार मिला ‘कौशल्‍य वर्धन केन्‍द्र’ योजना को । इस योजना के तहत गुजरात के लाखों बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित किया गया और लगभग एक हजार से ज्‍यादा कौशलों की पहचान की गई है । इन्‍हें 72 प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में ट्रेनिंग दी जा रही है । अब तक साढ़े चार लाख नौजवानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है । कई बात बहुत अच्‍छी लगी इस पुरस्‍कार की । इसका नाम कौशल्‍य वर्धन केन्‍द्र । विशेषकर तब जब अंग्रेजी नामों की बाढ़ आई हुई हो । परम्‍परागत रूप से अपने बूते रोजगार पैदा करने में गुजरात का कोई सानी नहीं है । साठ के दशक में वर्गीज कुरियन ने अमूल और डेरी उद्योग में किसानों को शामिल कर लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार दिया है । उतना ही महत्‍वपूर्ण काम समाज सेवी ईला भट्ट ने किया है । जिसके चलते आज गुजरात की लाखों महिलाएं अपने बूते जीवन चला रही हैं । और अब कौशल्‍य वर्धन केन्‍द्र । क्‍या हिंदी राज्‍य के नौकरशाह, राजनेता इससे कुछ सीख सकते हैं ?

पिछले वर्षों के ऐसे कई पुरस्‍कार याद आ रहे हैं । वर्ष 2010 में चित्‍तौड़गढ़ के जिलाधिकारी डॉ. समित को यह पुरस्‍कार दिया गया था औषधियों को किफायती दर पर उपलब्‍ध कराने के लिए । उन्‍होंने बाकायदा विज्ञान भवन में प्रस्‍तुति दी कि कैसे दवाओं के जैनरिक नाम से दवाएं सस्‍ती उपलब्‍ध हो सकती हैं । उन्‍होंने जिले के करोड़ों रुपये तो बचाए ही सरकारी अस्‍पतालों में दवाओं की उपलब्‍धि भी सुनिश्चित कराई । बात रेंगते-रेंगते केन्‍द्र सरकार की समझ में भी आ गई है और इस बार के बजट में सरकार ने भी कुछ दिशा-निर्देश जारी किये हैं । हालॉंकि निराशा इस बात से भी होती है कि जो सरकार ऐसे प्रोग्राम को पूरे देश के सामने पुरस्‍कृत कर रही है उसे हर जिले में, हर स्‍तर पर लागू करने में देरी क्‍यों ? दवाएं जिस रफ्तार से आसमान छू रही हैं उसमें गरीब के लिए मरना आसान होता है बजाए दवाएं खरीदने के ।

वर्ष 2010 में दिया गया एक और पुरस्‍कार याद रखने लायक है । यह पुरस्‍कार मिला जबलपुर के जिलाधीश संजय को । खचाखच भरे विज्ञान भवन में पूरी प्रस्‍तुति देखने लायक थी । संजय दूबे ने सड़कों के बीचों-बीच रास्‍ता रोकने वाले धार्मिक मंदिरों, मस्जिदों के अतिक्रमण की समस्‍या सुलझाई । पूरे जबलपुर शहर में सौ से ज्‍यादा ऐसे निर्माण थे जिनसे ट्रैफिक जाम हो जाता था या लोगों को आने-जाने में असुविधा होती थी । इस देश को कुछ समझने वाले जानते हैं कि मंदिर, मस्जिद को छूना साँप और बिच्‍छूओं को छूना है । मिनट के अंदर साम्‍प्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है । जिलाधीश ने हर मंदिर, मस्जिद या ऐसे निर्माण के संतों, महंतों, मौलानाओं के साथ बैठकें कीं । उनकी बाकायदा विडियो रिकार्डिंग कराई । लिखित में हस्‍ताक्षर लिए और फिर उतनी ही पारदर्शिता से उन्‍हीं की उपस्थिति में अतिक्रमण को हटाकर दूसरी जगह ले जाया गया । यदि जरूरी हुआ तो नयी मूर्तियाँ लगवाईं और दूसरे खर्चे  भी दिये । पूरे शहर का हर समुदाय उनके इस काम की तारीफ से गद-गद था और विज्ञान भवन का सभागार भी । हालाँकि हर वर्ष की तरह इन विषयों पर जो पैनल विमर्श होता है उनमें एक नौजवान नौकरशाह की आवाज भी अभी तक गूँज रही है कि जब देश के एक शहर में ऐसा हो सकता है तो सैकड़ों नगरों और महानगरों में जो ये धार्मिक स्‍थल रास्‍ता रोक कर बने हुए हैं उनको हटाने में इस प्रोग्राम से प्रेरणा क्‍यों नहीं ली जाती ? जाहिर है मंच पर बैठे मंत्री या वरिष्‍ठों के पास इसका कोई जवाब नहीं था ।

और भी प्रमुख पुरस्‍कारों को याद करें तो वर्ष 2011 में हिमाचल प्रदेश में प्‍लास्टिक कचरे से मुक्ति शामिल है । वर्ष 2012 में जम्‍मू एंड कश्‍मीर में पंचायती चुनावों की व्‍यवस्‍था और गुजरात राज्य में जल समस्‍या के लिए भागीदारी, वैज्ञानिक प्रबंध । 2006 में एक और महत्‍वपूर्ण पुरस्‍कार कर्नाटक को दिया गया था जिससे आप अपनी जमीन के रिकार्ड ऑनलाइन प्राप्‍त कर सकते हैं । हिंदी प्रदेशों से संबंध रखने वाले लोगों को पता है कि पटवारी, अमीन से लेकर तहसीलदार द्वारा जमीन के रिकार्डों में कैसी मनमर्जी हेराफेरी की जाती है और दस्‍तावेज पाने में तो श्रीलाल शुक्‍ल के राग दरबादी के मुख्‍य पात्र लंगड़ की तरह पूरी उम्र ही निकल जाती है । रेलवे के वर्ष 2008 में कंप्‍यूटर प्रणाली से टिकट आरक्षित करने की योजना को भी शाबाशी मिली । बहुत प्रशंसनीय काम यह रहा है लेकिन इसे अभी और बेहतर करने की जरूरत है । जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य में भूकंप से निबटने की योजना को भी 2008 में पुरस्‍कार दिया गया था । शिक्षा में सुधार के लिए तमिलनाडु सरकार के विजय कुमार और दिल्‍ली सरकार के अधिकारियों को भी पुरस्‍कृत किया गया है ।

वर्ष 2013 में मुख्‍य वक्‍ता थे पूर्व केबिनेट सचिव और राज्‍यपाल रहे नरेशचंद्र। पिछले वर्ष मुख्‍य भाषण पूर्व राष्‍ट्रपति अब्दुल कलाम का था । वर्ष 2011 में दिल्‍ली मैट्रो के माध्‍यम से दिल्‍ली की यातायात व्‍यवस्‍था को बदलने वाले इंजीनियर ई. श्रीधरण बुलाये गये थे । उन्‍होंने दिल्‍ली मैट्रो के निर्माण के दौरान आने वाली कठिनाइयों और उन्‍हें कैसे हल किया गया इस पर चर्चा की । वाकई एक सामाजिक क्रांति और परिवर्तन का औजार है ऐसे काम ।

दर्जनों ऐसे उदाहरण और सैकड़ों नौकरशाह हैं जिनसे पब्लिक सेवा में जुड़े हजारों, लाखों सरकारी कर्मचारी प्रेरणा ले सकते हैं । सिविल सेवा दिवस मनाने का उद्देश्‍य भी यही है । देखते हैं नौकरशाही सरदार पटेल के शब्‍दों से प्रेरणा लेकर कैसे देश की तस्‍वीर बदलती है ।

मुक्तिबोध लोकतंत्र के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले कवि

muktibodh.jan sanskriti manch

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध की मशहूर कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष के मौके पर जन संस्कृति मंच के कविता समूह की ओर से 13 मई 2013 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी विषयक विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। जसम के पिछले सम्मेलन में कविता, कहानी, जनभाषा, लोककला आदि के क्षेत्र में सृजनात्मकता को आवेग देने के लिए विशेष समूह बनाए गए थे। इस आयोजन से कविता समूह की गतिविधि का सिलसिला शुरू हुआ।
आयोजन की शुरुआत रंगकर्मी राजेश चंद्र द्वारा ‘अंधेरे में’ के पाठ से हुई।

इस मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा ‘अंधेरे में’ के अंशों पर बनाए गए पोस्टरों को आलोचक अर्चना वर्मा ने तथा मंटो पर केंद्रित ‘समकालीन चुनौती’ के विशेषांक को लेखक प्रेमपाल शर्मा ने लोकार्पित किया।

विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि 57 से 63 तक मुक्तिबोध की यह कविता संभावना की कविता थी, पर 2013 में वास्तविकता की कविता है। यह एक ‘समग्र’ कविता है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस ‘वह’ की तलाश है, दरअसल वह जिंदगी के संघर्षों से अर्जित क्राँति-चेतना है। लेनिन के मुताबिक़ कई बार ‘फैंटेसी’ असहनीय यथार्थ के खिलाफ एक बगावत भी होती है। इस कविता में फैंटेसी पूँजीवादी सभ्यता की समीक्षा करती है। यह  मध्यवर्ग के आत्मालोचन की कविता भी है। अंधेरे से लड़ने के लिए अंधेरे को समझना जरूरी होता है। यह कविता अंधेरे को समझने और समझाने वाली कविता है।

आलोचक अर्चना वर्मा ने कहा कि मौजूदा प्रचलित विमर्शों के आधार पर इस कविता को पढ़ा जाए  तो हादसों की बड़ी आशंकाएं हैं। जब यह कविता लिखी गई थी, उससे भी ज्यादा यह आज के समय की जटिलताओं और तकलीफों को प्रतिबिंबित करने वाली कविता है। ऊपर से दिखने वाली फार्मूलाबद्ध सच्चाइयों के सामने सर  झुकाने वाली ‘आधुनिक’ चेतना के बरक्स मुक्तिबोध तिलस्म और रहस्य के जरिये सतह के नीचे गाड़ दी गयी सच्चाइयों का उत्खनन करते हैं। यह यह एक आधुनिक कवि की अद्वितीय उपलब्धि है।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सामाजिक बेचैनी की लहरों ने हमें दिल्ली में ला पटका था, हम कैरियर बनाने नहीं आए थे। उस दौर में हमारे लिए ‘अंधेरे में’ कविता बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। इस कविता ने हमारी पीढ़ी की संवेदना को बदला और अकविता की खोह में जाने से रोका। हमारे लोकतंत्र का अंधेरा एक जगह कहीं घनीभूत दिखाई पड़ता है तो इस कविता में दिखाई पड़ता है। पिछले पाँच दशक की कविता का भी जैसे केंद्रीय रूपक है ‘अंधेरे में’। यह निजी संताप की नहीं, बल्कि सामूहिक यातना और कष्टों की कविता है।

चित्रकार अशोक भौमिक ने मुक्तिबोध की कविता के चित्रात्मक और बिंबात्मक पहलू पर बोलते हुए कहा कि जिस तरह गुएर्निका को समझने के लिए चित्रकला की परंपरागत कसौटियाँ अक्षम थीं, उसी तरह का मामला ‘अंधेरे में’ कविता के साथ है। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह और उसके दमन तथा साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ वियतनाम के संघर्ष ने बाद की पीढि़यों को ‘अंधेरे में’ कविता को समझने के सूत्र दिए। ‘अंधेरे में’ ऐसी कविता है, जिसे सामने रखकर राजनीति और कला तथा विभिन्न कलाओं के बीच के अंतर्संबंधों को समझा जा सकता है।

‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक और आलोचक रामजी राय ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हम अंधेरे की नींव को समझ सकते हैं। पहले दिए गए शीर्षक  ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ में से अपने जीवन के अंतिम समय में आशंका के द्वीप को हटाकर मुक्तिबोध ने 1964 में ही स्पष्ट संकेत दिया था कि लोकतंत्र का अंधेरा गहरा गया है। ‘अँधेरे में’ अस्मिता या म‍हज क्रांतिचेतना की जगह नए भारत की खोज और उसके लिए संघर्ष की कविता है। मुक्तिबोध क्रांति के नियतिवाद के कवि नहीं हैं, वह वर्तमान में उसकी स्थिति के आकलन के कवि हैं। वह अपनी कविता में विद्रोह की धधकती हुई ज्वालामुखियों की गड़गडाहट दर्ज करते हैं। इस देश की पुरानी हाय में से कौन आग भड़केगी, जो शोषण और दमन के ढाँचे को बदल देगी, वह इस सोच और स्वप्न के कवि हैं। सही मायने में वह कविता के होलटाइमर थे।

विचार गोष्ठी का संचालन जसम, कविता समूह के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि मदन कश्यप, कथाकार महेश दर्पण, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, वरिष्ठ कवयित्री प्रेमलता वर्मा, शीबा असलम फहमी, दिगंबर आशु, यादव शंभु, अंजू शर्मा, सुदीप्ति, स्वाति भौमिक, वंदना शर्मा, विपिन चौधरी, भाषा सिंह, मुकुल सरल, प्रभात रंजन, गिरिराज किराडू, विभास वर्मा, संजय कुंदन, चंद्रभूषण, इरफान, हिम्मत सिंह, प्रेमशंकर, अवधेश, संजय जोशी, रमेश प्रजापति, विनोद वर्णवाल, कपिल शर्मा, सत्यानंद निरुपम, श्याम सुशील, कृष्ण सिंह, बृजेश, रविप्रकाश, उदयशंकर, संदीप सिंह, रोहित कौशिक, अवधेश कुमार सिंह, ललित शर्मा, आलोक शर्मा, मनीष समेत कई जाने-माने साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और प्रकाशक मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। इस मौके पर फोनिम, लोकमित्र और द ग्रुप की ओर से किताबों, फिल्मों के सीडी और कविता पोस्टर के स्‍टॉल भी लगाए गए थे।

सुधीर सुमन राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

लोकतंत्र के ‘अँधेरे में’ आधी सदी

andhere men

नई दि‍ल्ली : अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक

अगले बरस मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ के प्रथम प्रकाशन के पचास बरस पूरे हो रहे हैं। कविता क्या है, दमनकारी सैनिक सत्ता के वर्चस्व, उसके साथ आर्थिक बौद्धिक और सांस्कृतिक एजेंसियों के गठजोड़ और इस घुटन भरे माहौल में बाहर-भीतर लगातार जूझते और टूटते हुए आदमी का दुस्स्वप्न है। पिछली आधी सदी में हम ने इस दुस्स्वप्न को हकीकत में बदलते देखा है।

समय जैसे कविता को रचता है, क्या कविता भी समय को रचती है ? ‘अँधेरे में’ ने भारतीय कविता को- खासतौर पर हिंदी कविता को किस तरह बदला है ? क्या ‘अँधेरे में’ ही वह मशाल भी है, जो हमें अँधेरे के पार ले जायेगी?

इन सभी सवालों पर मिलजुल कर बात करने के लिए 13 मई 2013 को शाम साढ़े़ पांच बजे गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीनदयाल उपाध्याय रोड, (आईटीओ), नई दिल्ली- 110002 में वि‍चार गोष्ठीन का आयोजन कि‍या जा रहा है। मैनेजर पाण्डे, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, रामजी राय, अर्चना वर्मा और अशोक भौमिक मुख्यश वक्ताल होंगे। अशोक भौमि‍क पोस्टर प्रस्तुति भी देंगे। दिनेश कुमार शुक्ल और राजेश चन्द्र काव्यं पाठ करेंगे।

संपर्क-
आशुतोष कुमार, संयोजक, कविता समूह (जनसंस्कृति मंच)
ईमेल :ashuvandana@gmail.com फोन: 9953056075

लि‍खो बेटी : कमल जोशी

चर्चित फोटोग्राफर और कवि‍ कमल जोशी ने एक खास कवि‍ता लि‍खी है- ‘लि‍खो बेटी’। उस पर बेहद खूबसूरत कवि‍ता पोस्‍टर बनाया है चि‍त्रकार के. रवीन्‍द्र ने-

kamal joshi.K. Ravindra Singh

‘रेड ऐन्‍ट ड्रीम’ की प्रि‍व्‍यू स्‍क्रीनिंग 7 को

नई दि‍ल्‍ली : 7 मई 2013 को जश्‍ने-आज़ादी के फिल्मकार  संजय काक की नयी फिल्म Red Ant Dream की पहली प्रिव्यू स्क्रीनिंग नयी दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के स्टेन सभागार में शाम 7 बजे दिखायी जायेगी। इस मौके पर फ़िल्म के लेखक/निर्देशक संजय काक और फिल्म के लेखक/संपादक तरुण भारतीय की स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों के साथ सीधी बातचीत भी होगी।

फ़िल्म का कथानक :  अगर देश की सुरक्षा यही  होती है कि बेजमीरी ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए…

पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की कविता की  यह पंक्तियाँ Red Ant Dream को जमीर के दौर में लौटाती हैं। ऐसी दुनिया  जहां लोग अभी भी गैर बराबरी और अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े हैं और एक नयी समानता भरी दुनिया के खतरनाक स्वप्न रचते हैं। फ़िल्म ‘असुरक्षाओं’ के घोषित खतरनाक और स्वप्निल इलाकों में विचरती है- मध्य भारत में बस्तर, जहाँ माओवादी हथियारबंद दस्तों ने सरकार के लिए सबसे गंभीर चुनौती खड़ी की है, पूर्वी भारत के ओडीसा, जहां समाजवाद का एक पुराना धड़ा आज भी प्रतिरोध के अपने उग्र- अलबत्ता गैरहथियारबंद- विश्वास के साथ खड़ा है। और फिर पंजाब, नई अर्थव्यवस्था के साथ हुए सफल साक्षात्कार का जश्न मनाता पंजाब, जहां आशा के नए आदर्श, इंकलाबी देशभक्त भगत सिंह की करिश्माई छवि के इर्द-गिर्द बुने जा रहे हैं। Red Ant Dream एक तहकीकात है इंकलाबी सपनों और संभावनाओं की, एक ऐसे तथाकथित समय में जब वर्तमान यह दंभ भरता है कि भविष्य को उसने लील लिया है और इतिहास बस एक किताबी बात है।