Archive for: April 2013

लोक जीवन की छवियाँ : अशोक भौमि‍क

Anuradha Thakur

नई दि‍ल्‍ली : इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी की  तलघर गैलरी में 25 अप्रैल की शाम को युवा कलाकारों और चित्रकला प्रेमियों के बीच अहमदनगर (महाराष्ट्र) से आयीं चित्रकार अनुराधा ठाकुर की चित्रप्रदर्शनी SERENE HARMONY का शुभारम्भ प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने कि‍या। यह प्रदर्शनी 4 मई तक चलेगी। इस मौके पर अशोक भौमि‍क ने कहा कि मौजूदा  चित्रकला परिदृश्य  एक सर्वथा विषमतापूर्ण व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। एक ओर जहाँ दो तीन महानगरों की कला का एक चेहरा दिखायी  दे रहा है, वहीं  देश के हजारों अन्य छोटे शहरों की  कला एक नए प्रतिबद्ध चेहरे के साथ, बाजारवाद के दबाव  से मुक्त आगे बढ़ती दिखाई दे रही  है। इसके एक  महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में हम अहमदनगर से आयीं अनुराधा ठाकुर के चित्रों में देख सकते हैं।  उनके चित्रों में विभिन आदिवासी इलाकों के लोगों के सादे और उत्सव मुखर जीवन की छवियाँ दिखाई देती हैं। सबसे बड़ी बात जो हमें प्रभावित करती है कि अनुराधा ने केवल महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों तक सीमित न रहकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, पूर्वात्तर इलाकों के लोक जीवन को समझने के लिए व्यापक यात्राएँ की हैं और उनके चित्र इन सब आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों के सरल चेहरों को अभिव्यक्त कर पाते  हैं, जो महानगर के दर्शकों के लिए एक विरल अनुभव है।

अशोक भौमि‍क ने कहा कि‍ समकालीन महिला चित्रकारों में निसंदेह जिस महानगरीय गोलबंदी के चलते पिछले कई   वर्षों से कुछ विशिष्ट महिला कलाकारों का प्रचार-प्रसार होता रहा है, वहाँ अनुराधा एक महत्वपूर्ण महिला कलाकार के रूप में अपनी दावेदारी पेश करती हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी कला इस दावेदारी के समर्थन में  तौर पर खड़ी दिखाई देती है।

इस मौके पर युवा चित्रकार प्रणवेश, टुम्पा चक्रवर्ती, मनीषा सेठी, राजेश श्रीवास्तव, तेजिंदर कांडा, प्रोफ़ेसर शोविन भट्टाचार्य, अनूप कुमार, नंदिनी आवडे, स्वाति भौमिक, सुधीर सुमन, श्याम सुशील सहित कई कला प्रेमी और छात्र उपस्थित थे।  उद्घाटन सत्र का संचालन संजय जोशी ने किया।

बी.ए. आनर्स इन बाबागिरी /मातागिरी : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

आजकल बाबाओं और गुरुमाताओं का बोल-बाला है। धन-सम्‍पदा के साथ अंधभक्‍त। ऐेसे में बाबाओं और गुरुमाता बनने की शि‍क्षा देने के लि‍ए कोर्स शुरू करने पर बल दे रही हैं बीनू भटनागर-  

शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को किसी रोज़गार के लिए तैयार करना होता है। पहले विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग,  चिकित्सा और वकालत के अलावा स्नातक स्तर पर अधिक विषय नहीं पढ़ाये जाते थे। समय के साथ  पत्रकारिता, फैशन, अभिनय जैसे क्षेत्र में हर स्तर के 4-6 महीने से लेकर तीन साल के डिग्री कोर्स होने लगे। कम्प्यूटर  के आते ही हर गली-नुक्कड़ पर कम्प्यूटर कोर्स की दुकानें खुल गईं।  विश्‍वविद्यालयों में कम्प्यूटर  इंजीनियरिंग, बीसीए और एमसीए काफी लोकप्रिय हुए।

आजकल देश-विदेश में बाबाओं और गुरुमाताओं के लिए रोज़गार के बहुत अवसर हैं। अभी तक ये लोग अपनी योग्यता और बुद्धि के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं क्योकि इस विषय में शिक्षा संस्थान कहीं उपलब्‍ध नहीं हैं। शिक्षा के बिना भी यह व्यवसाय ख़ूब फलफूल रहा है। उचित शिक्षा मिलने से इसमें और निखार आएगा। वैसे तो  चोरी, डकैती, धोख़ाधड़ी, लूटपाट, तस्करी और भ्रष्टाचार भी व्यवसाय हैं, पर इन्हें गैर कानूनी माना जाता है इसलिए  इनसे संबंधित कोर्स नहीं खोले जा सकते,  लेकि‍न बाबागिरी /मातागिरि को तो बड़ा आदर-सत्कार मिलता है। अतः ये कोर्स खोलने में कोई दिक्कत नहीं होगी,  बहुतों को लाभ होगा।

इस पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्रों को बाबा या माता के ‘लुक’ के बारे में,  उसके महत्व के बारे में पढ़ाया जाएगा । इस व्यवसाय में ‘लुक’ का महत्व अभिनेताओं से अधिक है। फिल्मी अभिनेता हर फिल्म के लिए एक नहीं, कभी-कभी दो ‘लुक’ में आते हैं। हीरोइन भी एक फिल्म में कई ‘लुक’ दिखा सकती है। टी.वी. धारावाहिक में ‘लीप’ पर  हल्का सा ‘लुक’ बदलने की गुंजाइश होती है, परन्तु बाबा और गुरुमाताओं को आजीवन एक ही ‘लुक’ में रहना पड़ता है जिससे उनके भक्तों  (clients) का ध्यान न भटके।

‘लुक’ के अंतर्गत कई उप विभाग होंगे जैसे- ‘स्टाइलिंग’, ‘हेयर स्टाइलिंग’,   ‘फैशन डिज़ाइनिंग’,   ‘फुटवेयर  (खड़ाऊँ) डिज़ाइन’,  ‘मेकअप आर्टिस्ट, ‘कम्प्यूटर ग्राफिक विशेषज्ञ’ और ‘फोटोग्राफर’। इन विभागों में छात्रों से ज़्यादा फैकल्टी को काम करना पड़ेगा। छात्रों को सिर्फ  स्टाइलिस्ट द्वारा चलने,   उठने-बैठने के तरीके, उपयुक्त वेशभूषा के साथ सिखाये जाएंगे। फोटोग्राफर विभिन्न ‘लुक्स’ में समय-समय पर इनके चित्र लेते रहेंगे जिन्हें ग्राफिक डिज़ाइनर अपने तरीकों से उलट-पलट कर, सजाकर अच्छे से अच्छा ‘लुक’ देंगे।  सभी छात्रों के लिए कम से कम 100 ‘लुक’ तैयार करने ज़रूरी  होंगे,  जिनका एक पोर्टफोलियो बनेगा।

‘लुक’ के बाद इनको भाषा विभाग से भी दूसरे सैमेस्टर में गुज़रना होगा। भाषा विभाग से गुज़रने के बाद इनके   ओडियो और विडियो बनेंगे। भाषा विभाग मे इन्हे कहाँ से काम की शुरुआत करनी है, उस भाषा का एक मुख्य पेपर पास करना होगा। हिन्दी -इंगलिश बोलने का तरीका भी सिखाया जाएगा जो भले ही सही न हो पर लोगों को आकर्षित करे, शाँत भाव से बोलते-बोलते कहीं कोई चुटकी ले लेना, कभी कोई शेर जड़ देना आदि। अच्छा वक्ता बनना ज़रूरी है, बात में क्या  कुछ तथ्य है ये भक्त ख़ुद ढूँढ लेंगे। थोड़ी बहुत गीता पढ़ा  दी जाएगी। रामायण की कहानी या कबीर, रहीम, रैदास के दोहे चुनकर, कम से कम पाँच प्रवचन तैयार करने होंगे। इनके अलग-अलग ‘लुक’ में छात्रों के ओडियो-विडियो बनेंगे। ये पहले साल का कोर्स होगा। इसी बीच चुने हुए ओडियो-विडियो धार्मिक चैनलों पर भेजने का भी प्रावधान फैकल्टी करेगा।

पहले वर्ष की परीक्षा को पास करके तीसरे सैमेस्टर में इन्हें मनोवैज्ञानिक तथ्यों को बिना समझाये उनका इस्तेमाल  अपने फ़ायदे के लिए करना सिखाया जाएगा।  सामाजिक मनोविज्ञान से भीड़ का मनोविज्ञान, भीड़ में अफ़वाहें  कैसे फैलती हैं,  इन्हें अपने पक्ष में कैसे कर सकते हैं, सिखाया जाएगा। एक पेपर ‘ब्रेनवाश’ का होगा जिसमें भक्तों (clients) के दिमाग़ की ऐसी धुलाई करना सिखाया जाएगा कि भावी बाबा या गुरु माँ पर भक्तों के मन मे कोई शंका न  हो,  भक्तों का विवेक और तर्क  धीरे-धीरे मर जाए, वे पूरी तरह अंधभक्त बनकर बाबा या माता का अनुसरण करें और अपनी जेबे ख़ाली करें। हिप्नोटिज़म की भी शिक्षा दी जाएगी। जो छात्र हिप्नोटिज़म न पढ़ना चाहें उनको जादू सीखना होगा। वही हवा मे हाथ घुमाकर कुछ निकालना वगैरह।

छात्रों को अपना व्यवसाय पूरी ईमानदारी से करने के लिए कारोबारी सदाचार (business ethics ) चौथे सैमेस्टर में पढ़ाया जाएगा। सबसे पहले उन्हें समझाया जाएगा कि वह चाहे जितना कमायें पर आय कर समय पर दें चाहे थोड़ा कम दें।  हर काम कानून के दायरे में रहकर करें। दूसरों के धर्मों या अपने व्यवसाय के अन्य लोगों से रिश्ते न बिगाडे़ं। आतंकवाद न फैलायें।   महिलाओं पर कुदृष्टि न डालें। अपने व्यवसाय की गरिमा बनाये रखें।

तीसरे साल यानि पाँचवा सैमेस्टर छात्रों को किसी वरिष्ठ बाबा या माता के पास प्रशिक्षण के लिये भेजा जाएगा। इन आश्रमों के प्रतिनिधि आकर छात्रों को चुनकर अपने आश्रम (कम्पनी)  में इंटर्न रखेंगे। वहाँ किए कामकाज की  रिपोर्ट तैयार करके फैक्ल्टी को देनी होगी, इस पर एक समूह वार्ता भी होगी।

अंतिम सैमेस्टर में छात्रों को कुछ भक्त ढूँढने का प्रोजेक्ट दिया जाएगा। भक्तों को पहली बार ढूँढ़ने के लिए संस्थान संभावित भक्तों को आर्थिक प्रलोभन देने की आज़ादी देगा। 50 भक्त पैसे देकर और 50 भक्त वाक्चातुर्य के बल पर इकठ्ठे करने होंगे, उनका ब्रेनवाश करना होगा।  इस प्रोजेक्ट के द्वारा छात्रों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। पूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट अंतिम प्लेसमैंट में बहुत काम आएगी।

बड़े-बड़े आश्रमों के प्रतिनिधि प्लेसमैंट के लिए देश-विदेश से बुलाये जाएंगे, जो बहुत आकर्षक पैकेज योग्य छात्रों  को देंगे। सभी छात्र आर्थिक रूप से इतने सशक्त नहीं हो पाएंगे कि फौरन अपना आश्रम खोल लें। कुछ वर्ष का अनुभव लेने के बाद सभी छात्र अपना आश्रम खोल पायें, इस डिग्री का पाठ्यक्रम इसी बात को ध्यान में रखकर बहुत शोध के बाद तैयार किया गया है।

इस रिपोर्ट की एक एक प्रति भारत सरकार और राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग तथा यूजीसी को भेजी जा रही है। इस रिपोर्ट को शिक्षा विभाग पता नहीं कहाँ-कहाँ घुमाएगा, कितनी कमेटी पास करेंगी, इसलिये इसकी एक प्रति मीडिया को भी भेज रही हूँ। मीडिया को कम से कम 24 घंटे बहस करने का मसाला मिल जाएगा, वो तो कृतज्ञ हो जाएगा। फिर जब प्राइवेट विश्‍वविद्यालय मीडिया पर यह रिपोर्ट देखेंगे तो इसके फायदे गिनते-गिनते इन संस्थानों के खुलने की होड़ लगते देर नहीं लगेगी।

बटरोही के उपन्यास ‘गर्भगृह में नैनीताल’ पर चर्चा

Garbh Griha Mein Nainital.Batrohi

देहरादून : दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से 20 अप्रैल 2013 को हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार बटरोही के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘गर्भगृह में नैनीताल‘ पर चर्चा का आयोजन किया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (विज्ञान शाखा) के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्ठ साहित्‍यकार सुभाष पंत ने की। वरिष्ठ कथाकार व ‘समयान्तर’ के सम्पादक पंकज बि‍ष्‍ट व उत्तराखण्ड शासन के पूर्व मुख्य सचिव डॉक्‍टर रघुनंदन सिंह टोलिया कार्यक्रम में वि‍शि‍ष्ट अतिथि थे। कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के निदेशक प्रोफेसर बी.के. जोशी सहित दिल्ली से कुछ साहित्यकार व देहरादून के तमाम लेखक, साहित्यकार व पत्रकार उपस्थित थे।

इस अवसर पर देवेन्‍द्र मेवाड़ी ने कहा कि‍ मेरे लिए यह उपन्यास एक एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग की तरह है जिसमें विविध रंग हैं जिन्हें कहीं कूँची से, कहीं चाकू से और कहीं रेखाँकनों के रूप में भरा गया हे। मेरे लिए उन रंगों के बीच से घटनाओं का देशकाल और चरित्र जीवंत हो उठते हैं और मैं उनसे बातें कर सका। उन्‍होंने बताया कि‍ वह और बटरोही सहपाठी हैं और उस देशकाल तथा उन चरित्रों के बीच रहे हैं। इसलिए उपन्यास को पढ़ते-पढते उनके लिए यह नैनीताल की एक पुनर्यात्रा थी। अन्य सभी पाठकों की तुलना में मेरे लिए यह एक नितांत अलग अनुभव था।

उपन्यास पर नवीन नैथानी, डॉ हरिसुमन बिष्ट, क्षितिज शर्मा, चंदन डांगी, विजय गौड़, ‘कर्मभूमि सम्‍वाद’ के कार्यकारी सम्पादक चारु तिवारी, भास्कर उप्रेती, गीता गैरोला, त्रेपन चौहान और रश्मि राव आदि‍ ने भी वि‍चार रखे।

वक्‍ताओं ने इससे प्रयोगात्मक उपन्यास करार दिया जिसमें इतिहास, व्यक्तिगत डायरी, लोक किंवदंतियाँ, लोक कथाओं के साथ आत्मकथा और संस्मरण का कोलाज है। मूलरूप में इस उपन्यास में उत्तराखण्ड के एक ऐसे पहाड़ी लड़के की व्यथा उभर कर आयी है जिसकी जड़ें अपने गाँव-इलाके से जुड़ी हैं और उसका मन बार-बार वहाँ की यादों की तलाश में लौटता-फिरता रहता है। इस उपन्यास में एक साधन सम्पन्न पहाड़ी राज्य का सपना पाले एक आम पहाड़ी व्यक्ति के आक्रोश को साफतौर पर देखा जा सकता है जो उसे अभी तक नसीब नहीं हो पाया। कार्यक्रम में नवीन नैथानी, अतुल शर्मा, गुरुदीप खुराना, मुकेश नौटियाल प्रोफसर धीरेन्द्र शर्मा, भानुप्रताप सिंह सहित कई साहित्यकार, लेखक और पत्रकार उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के रिसर्च एसोसियेट चन्द्रशेखर तिवारी ने किया।

Garbh Griha Mein Nainital

 

 

 

 

 

 

 

चि‍त्र : चंदन डांगी

शमशाद बेगम की शख्सियत के साथ कोई मिक्सिंग संभव नहीं

शमशाद बेगम

शमशाद बेगम

नई दिल्ली: मंगलवार 23 अप्रैल को मशहूर पार्श्‍वगायिका शमशाद बेगम हमारे बीच नहीं रहीं। चालीस और पचास के दशक के फिल्मों की लोकप्रिय गायिका शमशाद बेगम की आवाज में गाए गए कई गीत बाद के दौर में भी लोकप्रिय रहे। वह जीवित थीं इसका कोई खास ख्याल बाजार और फिल्म उद्योग को नहीं रहा, पर उनकी खनकदार आवाज में गाए गए कई मशहूर गानों को नब्बे के बाद गीत-संगीत के रिमिक्स के बाजार द्वारा खूब इस्तेमाल किया गया। चुलबुले, तीक्ष्ण और वजनदार आवाज वाले उन गानों के साथ जिस तरह के उत्तेजक दृश्यों को मिक्स किया गया, उससे उन गानों में मौजूद पवित्रता, नैसर्गिकता और अबोध अल्हड़पन का मानो एक तरह से विनाश तो हुआ, लेकिन यह भी साबित हुआ कि चालीस-पचास के दशक में उन्होंने लयकारी और शोखी का जो अंदाज रचा था, उसके सामने नए जमाने का संगीत कितना फीका लगता है। फिर भी बाजार उन गानों को गाने वाली शख्सियत को अपने साथ मिक्स नहीं कर सका। उस व्यक्तित्व के साथ कोई रिमिक्सिंग संभव नहीं था। वह शोहरत की पागल दौड़ और खुद को सुर्खियों में रखने की होड़ से मुक्त थीं। कई दशक पहले उन्होंने फिल्म और संगीत उद्योग से खुद को अलग कर लिया था।

शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था। एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में जन्मी मियां हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों मे से एक शमशाद को बचपन से ही गाने का शौक था। ग्रामोफोन पर बजने वाले गानों की वह नकल करती थीं। मोहर्रम के मर्सिये भी याद करके सुनाती थीं। बचपन से ही वह मशहूर गायक के.एल. सहगल की प्रशंसक थीं और बताती थीं कि उनकी फिल्म ‘देवदास’ उन्होंने 14 बार देखी। उनके गाने के शौक को उनके चाचा ने काफी प्रोत्साहित किया। 13 साल की उम्र में जीनोफोन कंपनी ने उनकी आवाज में एक पंजाबी गाना रिकार्ड किया, जो बेहद मकबूल हुआ। उसी कंपनी से मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर भी जुड़े हुए थे, जो शब्दों के शुद्ध उच्चारण की उनकी क्षमता के प्रशंसक हो गए। 1937 में उन्हें लाहौर रेडियो स्टेशन में गाने का मौका मिला, फिर उन्होंने पेशावर रेडियो और दिल्ली रेडियो स्टेशन के लिए भी गाने गाए। कहते हैं कि रेडियो पर उनकी आवाज को सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गवाने की पेशकश की। 1939 में बैरिस्टर गणपतलाल बट्टो के साथ उनका विवाह हुआ और उसके बाद 1940 में फिल्मों के लिए गाने का सिलसिला शुरू हुआ। 1940 में उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ के लिए पहली बार गाया। इसके बाद पंजाबी फिल्म ‘चौधरी’ में उन्हें गाने का मौका मिला। दोनों फिल्मों के गाने बेहद मकबूल हुए। उनकी आवाज के प्रशंसक संगीतकार गुलाम हैदर ने ‘खजांची’(1941) और ‘खानदान’ (1942) में उनसे गवाया। फिर उन्हीं के साथ 1944 में वह मुंबई चली आईं और अगले दो दशक से अधिक समय तक वह हिन्‍दी सिनेमा की ऐसी गायिका बनी रहीं, जिनकी खनकदार आवाज का जादू सब पर तारी रहा। गुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, खेमचंद्र प्रकाश, राम गांगुली, एस.डी. वर्मन, नौशाद और ओ.पी. नय्यर सरीखे अपने दौर के सारे प्रतिभावान संगीतकारों के लिए उन्होंने गाने गाए। नौशाद और ओ.पी.नय्यर ने उनकी आवाज की खासियत को सर्वाधिक समझा, इसलिए कि शमशाद बेगम की आवाज में जो एक देशज खनक थी, लोकगायिकी और लोकस्वर का जो अंदाज था, मिट्टी का खुरदुरापन और उसकी जो महक थी, वह लोकधुनों के पारखी इन संगीतकारों के संगीत में और भी निखर गई। हालांकि यह शमशाद बेगम की ही आवाज थी, जिसे सी. रामचंद्र ने ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ जैसे पाश्चात्य शैली वाले गानों में जबर्दस्त तरीके से उपयोग किया। यह कम ही लोगों को पता है कि शास्त्रीय संगीत की उन्होंने बाकायदा शिक्षा ली थी। वह सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब की शागिर्द थीं। बचपन के दिन भुला न देना ( दीदार ), दूर कोई गाए (बैजू बावरा), छोड़ बाबुल का घर, होली आई रे कन्हाई, ओ गाडी वाले गाडी धीरे हाँक रे (मदर इंडिया),  मेरे पिया गए रंगून (पतंगा), मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का (बाबुल), सैया दिल में आना रे (बहार), धरती को आकाश पुकारे, मोहन की मुरलिया बाजे (मेला), तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर (मुगल-ए-आजम), लेके पहला पहला प्यार, कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना (सी.आई.डी), कभी आर कभी पार (आर पार), कजरा मुहब्बत वाला(किस्मत) जैसे सदाबहार गाने शमशाद बेगम की याद को हमेशा जिंदा रखेंगे। शमशाद बेगम ने कभी अपना म्यूजिकल ग्रुप ‘द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट’ भी बनाया था जिसके जरिए उन्होंने पूरे देश में प्रस्तुतियां दी थीं।

भारत सरकार को बहुत देर से उनकी याद आई। जब पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों की साख खत्म हो चुकी थी और इसके लिए जोड़तोड़ और सत्ता से नजदीकी एक खुला पैमाना बन चुका था, तब 2009 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ दिया गया। शमशाद बेगम जिन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा पंजाबी, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं में 500 से ज्यादा गाने गाए, जो हमेशा अपना फोटो खिंचवाने से बचती रहीं, उनकी आवाज ही उनकी पहचान है, वही विश्वसनीय है और विश्वसनीय है श्रोताओं की पसंद, सरकारी सम्मान और रिमिक्सिंग का उपभोक्ता समाज उसके सामने कोई महत्व नहीं रखता। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक चंद्रकांत मोहन लाल ने उन पर ‘खनकती आवाज शमशाद बेगम‘ नाम की एक किताब लिखी है।

1955 में अपने खाबिंद गनपतलाल बट्टो के निधन के बाद से शमशाद बेगम अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ रहती थीं। दामाद लेफ्टिनेन्ट कर्नल वाई. रात्रा जहां रहे वे वहीं रहीं और रिटायरमेंट के बाद जब वे स्थायी तौर पर मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद जी भी फिर से मुंबई आ गईं। 1998 में एक गलतफहमी से उनके निधन की खबर आ गई थी। लेकिन इस बार उन्होंने हमेशा के लिए अपने चाहने वालों को अलविदा कह दिया। जन संस्कृति मंच की ओर से शमशाद बेगम को हार्दिक श्रद्धांजलि!

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

अनुराधा ठाकुर की चित्र प्रदर्शनी 25 से

Anuradha Thakur

नई दि‍ल्‍ली : अनुराधा ठाकुर की चित्र प्रदर्शनी 25 अप्रैल 2013  को शाम छह बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर,  40 मैक्स मुलर मार्ग,  नई दिल्ली- 110003 में शुरू हो रही है। इसका उद्घाटन मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक करेंगे। यह प्रदर्शनी 4 मई तक चलेगी।

उत्तराखंडीय राष्ट्रीय चेतना का विकास और नरेन्द्र सिंह नेगी : भास्कर उप्रेती

नरेन्द्र सिंह नेगी

लोक गायक नरेन्‍द्र सिंह के गीतों के माध्‍यम से उत्‍तराखंड की सांस्‍कृति‍क और राजनीति‍क स्‍थि‍ति‍ का वि‍श्‍लेषण करता लेखक-पत्रकार भास्‍कर उप्रेती का लेख-

एक सांस्कृतिक और राजनीतिक इकाई के रूप में उत्तराखंड एक बनती हुई राष्ट्रीयता है। उत्तर पूर्व के राज्यों और कश्मीर की तुलना में हमारी पहचान स्पष्ट नहीं बन सकी है। लम्‍बे समय तक पंजाब का हिस्सा रहे हिमाचलियों के भी हम नजदीक नहीं ठहरते। आबादी के हिसाब से विश्‍व की छठी सबसे बड़ी इकाई उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहने से हम अब भी अपनी पहचान की बाराखड़ी नहीं टटोल पाए हैं।

उत्तराखंड आंदोलन को कतिपय विश्‍लेषकों ने अस्मिता और पहचान का संघर्ष बताया भले हो, लेकिन उत्‍तर प्रदेश की भाषाई और राजनीतिक संस्कृति ने हमें ओवरलैप किये रखा। जबकि यथार्थ रूप में आंदोलन का भीतरी ताप आर्थिक पिछड़ेपन से ही पोषण पा रहा था। अस्मिता और पहचान बाहरी आवरण भर था। उत्‍तर प्रदेश के समय हमारी जो थोड़ी अलग पहचान बनी, वह बदरी-केदार धामों को लेकर बनी, जो उप-राष्ट्रीयता की नहीं धार्मिक पहचान थी। जिस तरह ताजमहल उत्‍तर प्रदेश की वास्तविक और पूर्ण संस्कृति नहीं हो सकता, उसी तरह बदरी-केदार भी हमारी नहीं हो सकते।

अगर हमारी सांस्कृतिक अस्मिता मजबूत होती तो कुमाऊँनी-गढ़वाली जैसी हमारी प्रमुख भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव विधानसभा की पहली ही बैठक में प्रस्तावित-पारित हो जाना था। उसी प्रकार, पहाड़ के भीतर राजधानी या राजनीतिक केन्द्र बनवाने की आतुरता अधिक प्रखर होती। राज्य को उसका अपना वास्तविक नाम दिलवाने में भी कम समय नहीं लगा। किसी गढ़वाली-कुमाऊँनी मूल के नेता ने सदन के भीतर हिन्दी की बजाय अपनी दुधबोली में बोलने का प्रयास किया हो, ऐसा भी उदाहरण नहीं है। निश्‍चि‍त रूप से उत्तराखंड की पहाड़ी पहचान की राह में हरिद्वार और उधमसिंहनगर का उसका हिस्सा होना एक बाधा बनकर आए। यह वास्तविक बाधा न होकर राजनीतिक होड़ और अवसरवादिता की मंशा है। हरिद्वार का बड़ा हिस्सा उत्तराखंड का सांस्कृतिक भाग रहा है। जबकि, उधमसिंहनगर की थाड़ू-बोक्सा जातियाँ पर्वतों से नाभिनालबद्ध हैं। गैर मैदानी, जैसे पाकिस्तान, बांगलादेश से उजडक़र आए लोगों और यूपी के समीपवर्ती जिलों सहारनपुर, बिजनौर की मिश्रित आबादी के प्रति पर्वतियों में कभी दुर्भावना रही हो, ऐसा इतिहास हमारा नहीं है। इसके उलट यहाँ तो हर-दूसरे आदमी को यह कहता सुना जा सकता है कि उनके पुरखे पश्‍चि‍मी और दक्षिणी भारत से यहाँ आकर बसे- भले जिस भी तरह की श्रेष्ठता या मानसिक कंगाली के वशीभूत होकर।

व्यापारिक और उद्यमिता के कौशल के कारण पंजाबी समुदाय ने निश्‍चि‍त रूप से उन्नति की और आज पहाड़ के बड़े व्यापारी भी वही हैं। जो मुसलमान बहुत पहले से उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में आकर छिटपुट व्यवसाय करने लगे, वे अपनी धार्मिक स्वायत्तता बनाए रखने के बावजूद सांस्कृतिक रूप से यहाँ का हिस्सा बन गए। यहाँ तक कि कुमाऊँनी-गढ़वाली बोली भी बोलने लगे। रामलीला के मंचन का इतिहास खंगालें तो हम उन्हें कभी अपने से अलग नहीं कर पाएंगे। जो थोड़ा बहुत द्वेष सतह पर कभी-कभार उभरा, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारकुनों की देन है। लेकिन संघ की ये करतूत मुसलमानों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाने के साथ, हम जैसी कमजोर राष्ट्रीयताओं का भी गला घोंटकर हमें एक-भाषा, एक-राष्ट्रीयता के दमघोटू भंवर में धकेल देना चाहती है।

अंधराष्ट्रवाद के इन झंडाबरदारों को यह समझाना कठिन है कि कोई भी देश और जाति अपने सांस्कृतिक वैविध्य और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण से अधिक पुष्ट होती है, न की अंधी गलियों में फँसकर।

औपनिवेशिक शासन के दौर में उत्तराखंडी समाज से ही पहली-पहली तीन रेजीमेंट्स कुमाऊँ, गढ़वाल और गोरखा का निर्माण भी हमारी पहचान गढऩे वाली साबित हुईं। जिस मशकबीन बाजे को हम अपना वाद्य यंत्र मानते रहे, वह दरअसल स्कॉटिश (ब्रिटिश) सेना से हमें मिला। उसी प्रकार, छलेतियों की ड्रेस पर रॉयल आर्मी की ही छाप है। हालाँकि, उत्तराखंड की चेतना का विकास सेना में भर्ती होने और यूरोप से लेकर वर्मा तक में हुए युद्धों की ही देन है। बौद्धिक चेतना के लिहाज से यहाँ का समाज यूपी-बिहार या एमपी से आगे इसीलिए निकल सका कि हमारे पूर्वजों ने उनसे कुछ पहले दुनिया देख ली थी। अंग्रेजों ने लैंसडौन, रानीखेत, चकराता, देहरादून में छावनियाँ बनाईं, मसूरी-दून को आधुनिकता के टापू में बदला, इन सबका हमारे विकास में निर्णायक योगदान रहा।

कल्पना करें, अंग्रेज बहादुर के हाथों 1815 में गोरखों की हार न होती और बाद में सीमित रूप से ही सही टिहरी रियासत में उनका हस्तक्षेप न होता तो हम आज कहाँ होते।

नरेन्द्र सिंह नेगी को बनाने वाली इस पृष्ठभूमि का जिक्र किए बगैर उनका मूल्याँकन नहीं हो सकता। जिस प्रकार, एक मामूली युवक चंद्र सिंह भंडारी परिस्थितियों के हाथों वीर चंद्र सिंह गढ़वाली बनकर दुनिया के रंगमंच पर उभरा, उसी प्रकार गाने-बजाने का शौकीन नरेन्द्र सिंह नेगी उत्तराखंडी सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधिक स्वर बनकर सामने आता है।

उसमें वो खूबियाँ हैं, जो हमारे समाज की खूबियाँ हैं। और वो कमियाँ भी जो हमारे समाज की कमियाँ हैं। आने वाले दिनों में जब भी हम जन-संस्कृति की बात करेंगे, यह बहस जरूर होगी कि कहाँ गिर्दा, नेगी नहीं बन सके और कहाँ नेगी गिर्दा बनने से रह गए। बावजूद, इस सबके कि दोनों के प्रयासों से आज हम कहीं अपना सिर उठाने लायक बन सके हैं।

नेगीदा भले आज एक ब्रांड हो, उसे मोटी रकम देकर अमेरिका, अरब और जापान में मनोरंजन करने के लिए प्रबुद्ध प्रवासी समाज बुलाता हो, लेकिन उससे अधिक वह उस अलग-थलक पड़े पहाड़ी की ताकत है, जो आज भी दो रोटी की जुगाड़ में दूर चला गया है। लुधियाना के किसी होटल के बर्तन-भांडे धो रहा है या गुडगाँव की किसी फैक्ट्री में रात की चौकीदारी बजा रहा है या सूरत की किसी फैक्ट्री में कपड़ा रंग रहा है। जब भी वह व्याकुल होता है, पहाड़ को खुद लगती है, अभावों में रह रहे ईजा-बौज्यू की सूरत आँखों के सामने आती है, नेगीदा ही उसे संभालता है। उसके गीत उसके संगी बनते हैं और उसका हौंसला बढ़ाते हैं। शायद ये गीत यही कहते हों कि नहीं, पहाड़ अभी हैं। तुम वहाँ कभी लौटोगे तो वे तुम्हें वैसे ही मिलेंगे, जैसा तुमने उन्हें छोड़ा था।

पटना में आठ साल एक अखबारी फैक्ट्री में काम कर लौटे धर्मानंद ध्यानी बताते हैं कि वह नाइट शिफ्ट में जब भी मायूस होने लगते, नेगीदा का गीत गुनगुनाना शुरू कर देते। जिस प्रकार डर में कई लोग हनुमान चालीसा बड़बड़ाने लगते हैं, उसी तरह। ध्यानी बताते हैं कि वर्षों की आदत में उन्हें पता ही नहीं चला कि वह भी गायक हो गए हैं। पटना में पहाड़ के प्रवासी जहाँ कहीं भी जुटते, उन्हें नरेन्द्र सिंह नेगी के विकल्प के तौर पर पेश किया जाता। खुद नरेन्द्र सिंह नेगी को अपने कुछ गीतों को गाने के लिए डायरी पलटनी पड़ती हो, लेकिन ध्यानी को गीत ही नहीं, उनकी प्रॉपर धुनें, लय और विराम सब कंठस्थ हैं।

हमारे कुछ मित्रों ने जब ध्यानी को नेगी से मिलाया तो ध्यानी ने कहा कि वह मेरे भगवान हैं। उनके गीतों ने मुझे आत्मविश्‍वास, सम्मान और पहचान दिलाई। जब ‘मुट्ठ बोटीकि’ रख गाते हैं तो उन्हें जूझने और अन्याय का प्रतिकार करने का बल मिलता है।

सूखी डांड्यू-कांठ्यू में घास के चंद तिनकों के लिए कसरत करती अकेली घसियारिन अगर ‘वो चांठा उच्चा-उच्चा चांठा, ये डांडा बड़ा-बड़ा डांडा, यूं डांडों से भी बड़ा, दुख मेरा बांठा, मेरा बांठा, मेरा चांठा’, गाकर जिजीविषा को ईंधन पाती हैं तो यही बात नेगीदा को ऊँचा करती है।

ये गीत पैसे कमाने, रामा या टी-सीरिज की चिरौरी के लिए नहीं जन्मा होगा। नेगी का ‘ठंडो रे ठंडो म्यारा पहाड़ै कि हव्वा-पाणि ठंडो रे..’, स्कूलों-कॉलेजों का जनगणमन जैसा हो गया है। उत्तराखंड की इतनी संवेगात्मक, छलछताती हुई अभिव्यंजना शायद किसी दूसरे गीत में हुई हो। हिंदी के दुराग्रही अखबार इस गीत को आए दिन सांस्कृतिक खबरों की हेडिंग बनाने के लिए मजबूर हैं। यह गीत कुमाऊँनी-गढ़वाली बिरादरी से बाहर पंजाबी बिरादरी की भी हिट लिस्ट में आया है। ‘आब खा माछा’ जैसा रोमांटिक ह्यूमर शायद ही हमें कहीं और मिल सके।

उत्तराखंड आंदोलन के दौर में जब मैं पिथौरागढ़ कॉलेज का छात्र था तो यह कभी मालूम नहीं पड़ा कि ‘उठा जागा उत्तराखंड्यूं सौ उठाणौ बगत एैगे’, गढ़वाली गीत है। तब हमारे लिए यह लड़ाई का गीत था और इसे हम उसी तरह गा रहे थे जैसे ‘लडऩा है भाई, ये तो लंबी लड़ाई है’ या ‘आज हिमाल तुमन कै धत्यू छौ हो जागा म्यारा लाल’ को। बाद में, नैनीताल के दिनों में जब महिलाओं के जुलूस सड़कों पर होते तो ‘मथि पहाड़ु बटि निस्स गंगाडु बटि, इस्कूल-दफ्तर गौं बजारू बटि..उत्तराखंड आंदोलन मा’ सुना।

कोई कलाकार तभी पूर्ण होता है जब भाषा और भूगोल की सरहदों का पार करता हुआ उस लोक तक जा पहुँचे जहां की बुनियादी जरूरतें आपके मूल समाज से अलग न हों। और आपकी हँसी, आँसुओं और गुस्से की तरह की उनका भी गुस्सा फूटता हो। नाजिम हिकमत, मंटो, ब्रेख्त, फैज, भूपेन हजारिका से लेकर गोरख पाण्डेय, गिर्दा और हाल में पाकिस्तान से उठी ‘लाल बैंड’ की धुनों को यूँ ही मेहनतकश अवाम का लाड़ नहीं मिल गया।

नेगीदा अभी भले फैज के कद के रंगकर्मी न बन सके हों, और उनका स्थानीय चेतना से सार्वभौमिक चेतना का विकास-क्रम उथल-पुथल से भरा हो, बावजूद इसके संभावनाओं का नया धरातल उनके माध्यम से हमारे सामने जरूर आता है।

‘नौछैमी नरैणा’ और ‘कथगै खैलू’ जैसे गीत देकर उन्होंने भ्रष्ट-तंत्र पर तीखे प्रहार का साहस किया तो उत्तराखंड आंदोलन के लिए ऊर्जस्वी गीत रचकर एक समूह को ऐकमेक चेतना से भर देने का। कलाकार के दिए-रचे-बनाए को खाँचों में नहीं बाँध सकते, न ही सरोकारों की बात को एक सुपरिभाषित ज्ञानकांड से परखा जा सकता है।

टैक्स्ट में पिछड़ा होने के बावजूद, भाव-व्यंजना से कलाकार किसी समाज में नूतन आवेग पैदा करने की क्षमता रख सकता है। हमारे समाज को सांस्कृतिक स्वर देने की जो परंपरा मौलाराम, गुमानी, गौर्दा, शिवदत्त सती, सत्यनारायण रतूड़ी, चंचल, नि‍र्मोही, मोहन सिंह रीठागाड़ी, मोहन उप्रेती, केशव अनुरागी, गोपीदास, झूसिया दमाई, घनश्याम सैलानी, जीत सिंह नेगी और फिर गिर्दा-शेरदा से आगे बढ़ी, नेगी ने उसे कहीं और आगे बढ़ाया। रैखिक रूप से ही नहीं क्षैतिक रूप से भी पर्याप्त विस्तार दिया है।

नेगी को लाखों लोग यू-ट्यूब के माध्यम से सुनते हैं और हजारों लोग उनके फेसबुक पब्लिक फिगर एकाउंट पर लाइक और शेयर करते हैं। उनके नाम से ब्लॉग बने हैं और नेगीदा नाइट में हजारों लोग बिना बुलाए आ पधारते हैं।

पहाड़ की बसों और टैक्सियों में उनके गीत सुनकर सफर करना, भौगोलिक दुरुहताओं को भौगोलिक विशिष्टताओं में ढाल देता है। वह किसी चौराहे पर खड़े हो जाएं तो आम आदमी उनसे बेझिझक बतिया सकता है। वन विनम्र हैं, सरल हैं और बनावटीपन तो उनमें अंशमात्र का भी नहीं। ऐसे में उनका कहा हुआ एक भी शब्द कब किसे कहाँ ले जाएगा, कहा नहीं जा सकता।

उत्तराखंड आंदोलन के विशाल हुजूम को एकसूत्र में पिरो देने वाले उनके प्रचंड गीत अब जनता की धरोहर हो गए हैं। नेगीदा के कॉपीराइट भर नहीं। वह उन्हें अब आने वाले दिनों में और ऊँचे शिखर तक भी ले जाएंगे, ऐसी लोगों की अपेक्षा है।

निश्‍चि‍त रूप से दुनिया गाँव बनी है और अब पहाड़ के दूरस्थ गाँव में मोबाइल की घंटी बजती है। मगर, यह एक अधूरा सच है। आधा सच ये है कि आम पहाड़ी नौजवान अब भी परदेश में दर-दर की ठोकर खा रहा है। मॉलों को देखने से उसकी पेट की आग नहीं बुझ सकती। दूर शहर से अपनी नवविवाहिता को वह यह बताता रहेगा कि दिल्ली की मेट्रो कैसे भागती है। या कभी इस हालत में आ सकेगा कि उसे शहर ले आए, उसे भी दुनिया के रंग दिखाए। ऐसी स्थितियाँ तो फिलहाल नहीं हैं।

बहुत पुराने समय के प्रवासियों को छोड़ दें तो अब के 95 प्रतिशत प्रवासी बड़ी मुश्किल से नगरों-महानगरों में अपना पेट पालने की हालत में हैं। पहाड़ से जो लाल गाल लेकर वे जाते हैं, वो शहर की गर्मी में कुछ ही दिनों में झुलसकर हाड़ दिखाने लगते हैं। पहाड़ के दर्द को बड़ी हद तक नेगीदा ने थाह दी है, लेकिन दर्द अभी गया नहीं है। उसके लिए और आगे की डगर लेनी होगी। जरूरी नहीं नेगीदा अकेले ही यह सब कर लेंगे, लेकिन वह इस राह में किसी मील तक कोई पत्थर तो गाड़ ही चुके हैं।

निर्विवाद रूप से आज के समय में पहाड़वासी की सांस्कृतिक तुष्टि करने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी एकमात्र गायक हैं। वह समाज को करीब से देखते हैं, उसके अंतर्मन तक उतरते हैं, उसकी भाव-भंगिमाओं को आत्मसात करते हैं, उन्हें कागज पर उतारते हैं। उनका पहाड़ी एस्थेटिक्स बहुत स्ट्रांग है। यही सुख, दुख भी है।

अगर जागर गायक प्रीतम भरतवाण को अपवाद मान लें और उनकी सीमाओं का ध्यान रखें तो आने वाली पीढ़ी में ऐसा कोई कलाकार नहीं जो पहाड़ के रंगों, भावों, भंगिमाओं, विवशताओं, उलझनों, उद्वेगों को समझ, लिख, बोल, बता और गा सकता है। कुमाऊँनी में गोपाल बाबू गोस्वामी के साथ एक दशक से भी पहले यह अध्याय खत्म हो चुका है।

गढ़वाली में भी ऐसा भरोसा देने वाला युवा चेहरा फिलहाल तो नहीं दिख रहा है। हालाँकि यह भी एक तथ्य है कि नेगीदा ने जितना भंडार हमें अब तक दे दिया है वह आने वाली कई पीढियों को राह दिखाता रहेगा। ये संपदा गीत, संगीत, धुन और नोटिंग की दृष्टि से बहुआयामी हैं। अब किसी कलाकार पर समाज तभी मुहर लगाएगा, जब वह नेगीदा से आगे का कुछ देगा। नेगीदा ने हमारे लोक की ताकत को सामने न लाया होता तो सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर हमारे बोली-भाषा में नहीं गातीं।

मैं पुन: शुरुआत में उठाए गए मुद्दे पर आना चाहूँगा। हमारी कमजोर उप-राष्ट्रीयता की चिंता की बात। सुखद बात है कि नेगीदा ने इस बिखरी हुई पहचान को गुरुत्व बल से कोई केन्द्र बनाने का काम किया है। अगर उत्तराखंडी होने की पहचान के साथ नेगीदा को जोड़ें तो हम बहुत ताकतवर और संपन्न दिखाई देते हैं। हमारे पास पहाड़ी होने के लिए एक चेहरा होता है, एक गीत होता है, एक लय होती है।

दिल्ली या मुंबई के किसी रेस्त्रां में नराई मिटाने के लिए हमारे भुल्ला की जुबान पर अपनी कोई धुन होती है। नेगीदा के बाद हम उतने विवश और लाचार नहीं रहे। भाषा, भाव, गीत, धुन और संगीत कभी राजसत्ता की कृपा के भरोसे नहीं रहे। उत्तराखंड की मौलिक छवि का सैद्धांतिक खंडन करने वाले नेतों-नौकरशाहों के अपने निजी आयोजनों में नेगीदा का गीत बजवाना एक अलग मजबूरी बन ही चुका है।

रामवि‍लास शर्मा ने हि‍न्‍दी को भाषा नहीं जाति‍ माना : काशीनाथ

kashinath singh

पासीघाट : जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, पासीघाट, अरुणाचल प्रदेश  में 25-26 फरवरी 2013 को डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशती मनाई गई। संगोष्‍ठी का शुभारंभ करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य तायेक तालोम  ने देश के कोने-कोने से आए विद्वानों का आभार प्रकट किया। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रोफेसर टी. मिबांग, कुलपति राजीव गाँधी विश्‍व विद्यालय, ईटानगर, अतिथि सम्मान प्रोफेसर राजमणि शर्मा, हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्‍व विद्यालय तथा विशि‍ष्‍ट अतिथि प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्‍वविद्यालय थे। संगोष्‍ठी के बीज वक्ता सुप्रसिद्ध कथाकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह, पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय ने बीज वक्तव्य में डॉ. रामविलास शर्मा के जीवन और साहित्य के महत्वपूर्ण सन्दर्भों पर प्रकाश डाला। पत्रकार, लेखक, कवि के रूप में डॉ. शर्मा एक साधक थे। 1975 के बाद उन्होंने साहित्यिक गोष्‍ठि‍यों में जाना बन्द कर दिया। वह सिर्फ किताबों के बीच रहे, अगर उनकी सारी पुस्तकों को जोड़ दिया जाये तो यह एक आदमी के बस का नहीं। वह एक लड़ाकू, जुझारू और निर्भय व्यक्ति थे। काशीनाथ सिंह ने इस बात पर बल दिया कि डॉ. शर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को भाषा नहीं जाति माना। जो हिन्दी जाति सात राज्यों में बाँट दी गई,  उसे एक राज्य में होना चाहिए। जब तमिल जाति हो सकती है, तो हिन्दी क्यों नहीं?

प्रोफेसर राजमणि शर्मा ने डॉ. रामविलास शर्मा के भाषा चिंतन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दी और ऊर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। भाषा के आधार पर उन्होंने स्पष्‍ट किया कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता आर्यों की सभ्यता थी। प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह ने डॉ. शर्मा के आलोचना पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. शर्मा के सामने आलोचना की लम्बी परम्‍परा थी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी आलोचना को शास्त्रीय परम्‍परा से निकाल कर लोकमंगल की भूमि पर प्रतिष्‍ठि‍त किया, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथों और सिद्धों के दाय को स्वीकार किया। रामविलास शर्मा जनता के आलोचक हैं, उनके यहाँ साहित्यवाद का कोई दबाब नहीं है।

प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र, अध्यक्ष त्रिपुरा विश्‍वविद्यालय ने इस बात पर बल दिया कि डॉ. रामविलास शर्मा के साहित्य और चिंतन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये। डॉ. संजय श्रीवास्तव, महासचिव प्रगतिशील लेखक संघ, उत्‍तर प्रदेश ने कहा कि रामविलास ने विशद अध्ययन किया हैं और उन्होंने भारतीयता की अवधारणा को स्पष्‍ट किया। संगोष्‍ठी की शुरुआत अध्यक्ष प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह की प्रस्तावना के साथ हुई। उन्होंने शोधपत्र बाचकों की प्रस्तुति पर प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाओं के महत्व को रेखाँकित करते हुए जीवंत परिचर्चा का आग्रह किया।

डॉ. अभिषेक यादव ने रामविलास शर्मा की ऐतिहासिक भौतिकवाद और द्वन्द्वात्मक भौतिक वाद के सिद्धान्तों से पूरी परम्‍परा पर प्रकाश डाला। डॉ. ओकेन लेगो ने यह प्रमाणित किया कि निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ के राम की शक्ति जितनी स्वामी विवेकानन्द की काली से भिन्न है, उतनी कृत्तिवास की दुर्गा से। डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय के अनुसार रामविलास जी ने हिन्दी आलोचना को विगत छः दशकों से नई दिशा और दशा दी है।

डॉ. हरीश कुमार शर्मा ने रामविलास जी की हिन्दी जाति सम्बन्धी अवधारणा को स्पष्‍ट किया। डॉ. विधान चन्द्र राय ने कहा कि रामविलास जी ने मार्क्सवाद का दार्शनिक आधार स्वीकार किया है। डॉ. शि‍वानन्द झा ने कहा कि मैथिल कोकिल विद्यापति और मिथिलांचल का विस्तृत विवरण रामविलास जी के साहित्य में मिलता है। डॉ. प्रदीप कुमार भारती ने कहा कि डॉ. रामविलास शर्मा साहित्य में सर्वहारा वर्ग के चित्रण पर बल तो देते हैं लेकिन उनकी दृष्‍टि‍ संकीर्ण मनोवृत्तियों से अलग है। डॉ. विजय शंकर मिश्र ने अपने शोधपत्र ‘रामविलास की दृष्‍टि‍ में भक्ति आन्दोलन और तुलसी की भक्ति भावना’ में उन्होंने तुलसी के सामंत विरोधी मूल्यों की चर्चा करते हुए यह स्पष्‍ट किया कि तुलसी सामंतवाद के पोशक और नारी विरोधी नहीं थे।

संगोष्‍ठी के समापन सत्र के मुख्य अतिथि राजेश कुमार मिश्र, उपायुक्त पूर्वी सियांग, अरुणाचल प्रदेश,  अतिथि प्रोफेसर अजय कुमार पाण्डेय डीन, हार्टिकल्चर कॉलेज पासीघाट, (केन्द्रीय कृषि‍ विश्‍वविद्यालय) थे। संगोष्‍ठी का संचालन डॉ. प्रसिद्ध नारायण चौब, अध्यक्ष हिन्दी विभाग ने गया। संगोष्‍ठी के समन्वयक डॉ. हरिनिवास पाण्डेय ने इसकी उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित विद्वानों एवं प्रतिभागियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. हरिनिवास पाण्डेय, जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, पासीघाट, अरुणाचल प्रदेश

साहि‍त्यि के वि‍द्यार्थी साहित्येतर कारणों को जानने-समझने की कोशिश करें : गोपेश्‍वर सिंह

काव्य पाठ करते मंगलेश डबराल।

काव्य पाठ करते मंगलेश डबराल।

नई दिल्ली : हिन्दू कॉलेज की हिन्दी साहित्य सभा द्वारा आयोजित वार्षिक संगोष्ठी अभिधा का विषय ‘विधाओं का अर्थ’ था। उद्घाटन भाषण में दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह ने विस्तार से विधाओं के अंत:संबंधों और वैशिष्ट्य पर चर्चा की। कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक जैसी विधाओं के साथ-साथ उन्होंने अन्य विधाओं के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि साहित्य के विद्यार्थियों को साहित्येतर कारणों को जानने-समझने की कोशिश करनी चाहिए जिनके कारण बड़े परिवर्तन होते हैं। प्रोफेसर सिंह एवं अतिथियों ने विभाग की हस्तलिखित पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ के नए अंक का लोकार्पण भी किया। पहले सत्र में कवि और ‘पब्लिक अजेंडा’ के साहित्य सम्पादक मदन कश्यप ने बताया कि हिन्‍दी में किस तरह ‘विधा’ का इस्तेमाल  ‘फॉर्म’ और ‘जेनर’ दोनों अर्थों के लिए होता है। उन्होंने इस विषय पर लिखी गई कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का उल्लेख करते हुए विधाओं के रूप बंध और सामाजिक परिस्थितियों के आपसी संबंधों की चर्चा की। इसी सत्र में विख्यात कवि असद जैदी ने अपनी कुछ चर्चित कविताओं यथा ‘1857 : सामान की तलाश’, ‘खाना पकाना’, ‘अप्रकाशित कविता’, ‘संस्कार’ और ‘हलफनामा’ का पाठ  किया। मदन कश्यप ने भी अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया।

दूसरे सत्र में इन्द्रप्रस्थ विश्‍वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने कथा विधा पर अपने व्याख्यान  में कहा कि उपन्यास ही वह विधा है जो आम आदमी को साहित्य के केन्‍द्र में ले आती है। प्रोफेसर मोहन ने पश्‍चि‍म में उपन्यास के उदय तथा वर्तमान परिदृश्य का सिंहावलोकन करते हुए गद्य विधाओं की प्रासंगिकता पर विचार रखे। इस सत्र में चर्चित उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने अपनी रचना प्रक्रिया का हवाला देते हुए नए लिखे जा रहे  उपन्यास के एक अंश का पाठ किया।

दूसर दिन के पहले सत्र में तीन साहित्यकारों ने रचना पाठ किया। ‘रचना उत्सव’ के नाम से यह सत्र साहित्य अकादेमी के सौजन्य से आयोजित किया गया जिसमें मंगलेश डबराल, विष्णु नागर तथा प्रभात थे। नागर ने अपनी बहु प्रशंसित कथा श्रृंखला ‘ईश्वर की कहानियाँ’ की कुछ प्रतिनिधि कहानियों का पाठ किया। डबराल ने ‘टार्च’, ‘निराला और ब्रेख्त’, ‘नया बैंक’  जैसी अपनी प्रतिनधि कविताओं का पाठ किया। प्रभात ने अपने चर्चित गीतों ‘बंजारा नमक लाया’, ‘मुनिया का नाटक देखे दुनिया’, ‘सईदन अम्मा’, ‘जमीन की बटायी’ तथा ‘सुआ’ के साथ प्रेम कविताओं का पाठ भी किया। इस सत्र से पहले विष्णु नागर और प्रभात ने विभाग की भित्ति पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ के नए अंक का विमोचन भी किया। अंतिम सत्र में भावना तलवार की प्रशंसित फिल्म ‘धर्म’ का प्रदर्शन किया गया। इस पर हुई परिचर्चा में मीडिया विशेषज्ञ विनीत कुमार और आशु मिश्रा ने भाग लिया। संयोजन प्राध्यापक रविरंजन ने किया।

सभी सत्रों के अंत में रचनाकारों से सीधे सम्‍वाद करते  हुए विद्यार्थियों ने अपनी विभिन्न जिज्ञासाएं भी रखीं जिनका समाधान रचनाकारों ने किया। इस दो दिवसीय आयोजन के अंत में सभा के परामर्शदाता पल्लव ने सभी का आभार माना। आयोजन स्थल पर साहित्य अकादेमी द्वारा लगाईं गयी पुस्तक प्रदर्शनी का युवा विद्यार्थियों ने भरपूर लाभ लिया। आयोजन में विभाग के प्राध्यापकों डॉ रामेश्‍वर राय, अभय रंजन, डॉ हरीन्द्र कुमार, डॉ रचना सिंह, डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर, डॉ अरविन्द संबल सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी व शोध छात्र भी उपस्थित रहे।

प्रस्‍तुति‍ : नितिन मिश्रा, मीडिया प्रभारी (हिन्दी साहित्य सभा), हिन्दू कॉलेज

कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को रिहा करने की मांग

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लम्‍बे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और विगत 2 अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलंब रिहाई की मांग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतांत्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिए मजबूर किए गए और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरंतर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतांत्रिक प्रतिवाद है। जन संस्कृति मंच के हम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी।

शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिए लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है।

शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे डॉ.  बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुँचाना गुनाह है? क्या भगतसिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिए ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतंत्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जाएगा या नहीं?

इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिए कुछ किताबें पेश की गईं और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिए उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छुपने के लिए विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है कि‍ उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।

हम सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि मांग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे अविलंब खत्म किए जाएं और उन्हें तुरंत रिहा किया जाए, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाए तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाए।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

तेलुगु लेखक रावूरि भरद्वाज को ज्ञानपीठ पुरस्कार

रावूरि भरद्वाज

रावूरि भरद्वाज

नई दि‍ल्‍ली : तेलुगु लेखक रावूरि भरद्वाज को वर्ष 2012 के ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया। ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने बताया कि तेलुगु के वरिष्ठ लेखक डॉ. रावूरि भरद्वाज को नई दि‍ल्‍ली में हुई प्रवर परिषद की बैठक में 2012 के ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया। उनके अभी तक तेलुगु में 24 लघुकथा संग्रह, नौ उपन्यास और चार नाटक प्रकाशित हो चुके हैं।

रावूरि भरद्वाज का जन्म 1927 में तत्कालीन हैदराबाद स्टेट के मोगुलूरू गाँव में हुआ था, जहां से वह बाद में आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में ताडीकोंडा गांव चले गए। उन्‍होंने बाल साहित्य लेखन भी किया।

गरीबी के कारण उन्‍हें शि‍क्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी। सातवीं तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले रावूरि भरद्वाज को तीन विश्वविद्यालयों ने डाक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की। उन्‍होंने मुट्ठी भर भोजन के लिए कृषि मजदूर, पशु चरवाहा, तंबाकू फैक्ट्री में कोयला पहुंचाने आदि‍ कई काम कि‍ए। लोहे की भट्टी में आग जलाने तथा गर्म लोहा पीटने का भी काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक साल उन्‍होंने सेना में भी काम कि‍या।

रावूरि भरद्वाज को साहि‍त्‍य अकादमी, सोवि‍यत लैंड नेहरू पुरस्‍कार, तेलुगु अकादमी पुरस्‍कार, बाल साहि‍त्‍य परि‍षद पुरस्‍कार आदि पुरस्‍कारों से सम्‍मानि‍त कि‍या जा चुका है।

प्रवर परिषद के संयोजक ने बताया कि भारद्वाज का शुमार उन लेखकों में होता है, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को कलम और शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरा। उन्होंने बताया कि उड़िया लेखक सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता वाली प्रवर परिषद में प्रो दिनेश सिंह, नित्यानंद तिवारी, अमिया देब, शंकर शारदा, आलोक राय, आर शौरी और सुरजीत पातर शामिल थे।