Archive for: March 2013

बाबा में मैं : कृष्णुडु

कृष्णुडु

ए .कृष्णा राव  का पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों का अनुभव है। दिल्ली में लगभग दो दशकों से कार्यरत। पिछले बारह सालों से ‘आन्ध्र ज्योति’ दैनिक में दिल्ली ब्यूरो के चीफ के पद पर काम कर रहे हैं। इससे पहले कुछ और पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। वह केवल पत्रकार ही नहीं, लेखक और कवि  भी है। इनके स्तम्भ ‘इण्डिया गेट ‘शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। कवितायें कृष्णुडु  के नाम से लिखते हैं। इनके दो कविता संग्रह छप चुके  हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य संबंधी आलेख भी प्रकाशित हुए हैं। उनकी एक कवि‍ता। तेलुगु से इसका अनुवाद आर.शान्ता सुन्दरी ने कि‍या है-

रो रोकर माँ की आँखों सा
लाल हुआ आसमान

खाने को कुछ  नहीं है
‘माँ, भूख लगी है…’
शून्य में ताकती माँ
कुछ नहीं बोली

उसकी आँख बचाकर
धीरे से निकला बाहर
उखड़ते प्राणों में
साँस लौट आई फिर

गलियों की नीरवता को
तोड़ती सेना की गाड़ियाँ
दूर कहीं से सवाल करते
आर्तनाद…

कल परसों तक
सबक सिखाती पाठशालाएं
बन गई हैं सैनिक शिविर
हमारे नन्हे पैरों के स्पर्श से
पुलकित हरी दूब  को
कुचलती जूतों की कवायदें

किसके साथ खेलूँ?
घोंसलों से छितराए पंछियों जैसे
परिवार

निश्शब्द है
बौद्ध मन्‍दि‍र
शव सा बैठा है बुद्ध
इर्द-गिर्द रिसते खून पर
भिनभिनाती हैं मक्खियाँ

घर में माँ नहीं दिखती
ध्वस्त हैं आनेवाले कल के सपने
सड़क पर मौत का वीभत्स
हाथ पीछे बंधी लाशें

लगता है बारिश होगी
कहाँ हो माँ?
कब आओगी?
तुमने कहा था स्वर्ग है
पर वह कहाँ है?

रुकी जीप …
उतरा अंकल …
‘बाबा से मिलोगे?’
‘जी अंकल !’
‘देख तेरे सीने में है
जारे अपने बाबा के पास जा… ‘
पाँच गोलियों में छिपे
पंच-प्राण

आसमान ने भिगोया देह को
आँसुओं से
तभी बादलों की ओट  से
निकल आया बालचंद्र
देखते हुए उसे
बाबा में मिल गया मैं

सत्यनारायण व्यास को ‘विशिष्ट साहित्यकार सम्मान’

सत्यनारायण व्यास

सत्यनारायण व्यास

चित्तौड़गढ़ : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के अध्यक्ष वेद व्यास के हवाले से प्राप्त खबर के अनुसार इस वर्ष अकादमी द्वारा राज्य के नौ वरिष्ठ साहित्यकारों को उनके समग्र योगदान के लिए विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से नवाजा जायेगा। चित्तौड़गढ़ के वरिष्ठ कवि, टिप्पणीकार  और समालोचक  डॉक्‍टर सत्यनारायण व्यास भी इनमें शामिल हैं। अकादमी द्वारा चयनित दूसरे रचनाकारों में कुमार शिव (जयपुर), रणवीर सिंह (जयपुर), डॉ. मदन केवलिया (बीकानेर), डॉ. सुदेश बत्रा (जयपुर), डॉ. क्षमा चतुर्वेदी (कोटा), मुरलीधर वैष्णव (जोधपुर), भागीरथ (उदयपुर), सुरेन्द्र चतुर्वेदी (अजमेर) शामिल हैं।

डॉ. व्यास के आचार्य हजारी प्रसाद पर शोध और जनजातीय गीतों पर लघु शोध प्रकाशि‍त हो चुके हैं। इसके अलावा कवि‍ता संग्रह ‘असमाप्त यात्रा’ और ‘देह के उजाले में’ तथा प्रबंध काव्‍य ‘संन्यास’ प्रकाशि‍त हो चुके हैं। उन्‍होंने कवि‍ता संग्रह ‘कलम की दोस्ती’ सम्‍पादि‍त कि‍या है। उनका साहित्यिक निबंधों का संग्रह ‘नहीं अरण्यरोदन’ भी प्रकाशित हुआ है। उनकी कई पुस्तकें प्रकाश्य हैं।

अप्रैल-मई में आयोज्य मीरा सम्मान समारोह में इन्हें इक्यावन हजार रुपये, पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र आदि से नवाज़ा जायेगा।

संसद में भारतीय भाषाओं की एकता : गोविंद सिंह

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दलीय सरहदों को लांघ कर संसद में भारतीय भाषाओं के पक्ष में विभिन्न राजनेताओं को बोलते देखना सचमुच सुखद आश्चर्य की तरह था. दक्षिण भारत के नेता अब तक हिन्दी के विरोध में तो बोलते थे, पर बदले में वे अकसर अंग्रेजी का समर्थन कर बैठते थे. लेकिन इस बार संघ लोक सेवा आयोग और प्रो. अरुण निगवेकर ने उन सब नेताओं को एक पाले में ला खड़ा कर दिया जो अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और अपनी-अपनी भाषाओं की उन्नति चाहते हैं. हिन्दी वालों को अब तक यही लगता था कि जिस दिन हिन्दी राजनीतिक मुद्दा बन जायेगी, उस दिन सत्ता में उसका हक भी सुनिश्चित हो जाएगा. कहा जा सकता है कि इस बार उसकी थोड़ी-सी झलक मिली है. जिस तरह से तमाम भारतीय भाषाओं के पैरोकारों ने समवेत स्वर में अंग्रेजी की अनिवार्यता का विरोध किया, उसे एक शुभ संकेत माना जाना चाहिए कि चलो हमारे राजनेताओं को देर से ही सही, हकीकत का एहसास हुआ और भविष्य में वे बिल्लियों के हिस्से की रोटी हड़पने वाले बन्दर को पहचान सकेंगे. साठ के दशक में शुरू हुए अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन की याद ताज़ा हो गयी. लेकिन यहीं ध्यान देने की बात यह भी है कि सरकार ने अभी इस मसले को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, ठंडे बस्ते में ही डाला है. अंग्रेजी-परस्ती का विषधर कभी भी फन उठा सकता है. यानी लड़ाई अभी शुरू ही हुई है. उसे सिरे तक पहुंचाना आसान नहीं है.

सरकार द्वारा सिविल सेवा परीक्षा में किये जाने वाले तथाकथित सुधारों को ठंडे बस्ते में डाल दिए जाने के बाद जिस तरह से निगवेकर साहब ने अपना विरोध दर्ज किया है, वह और भी चौंकाने वाला है. वे कहते हैं कि हमारा मकसद ऐसे लोगों को सिविल सेवा में लाना था, जिनके पास संवाद कर सकने की बेहतर योग्यता हो, जो अपने अफसरों से अच्छी अंग्रेजी में बात कर सकें. यानी जिस जनता की सेवा के लिए उन्हें नियुक्त किया जा रहा है, वह जाए भाड़ में. अंग्रेज़ी के जरिये यह वर्ग अपने वर्चस्व को बरकरार रखना चाहता है. जनता की भाषा की उसे क्या परवाह! जैसे संवाद केवल अंग्रेज़ी में ही होता हो!
निगवेकर कहते हैं, हम चाहते थे कि सिविल सेवा में ‘वायब्रेंट’ उम्मीदवार आयें. उन्हें कौन समझाए कि ‘वायब्रेंट’ सिर्फ अंग्रेज़ी बोलकर नहीं पैदा होते. एक और चौंकानेवाली बात वे यह कहते हैं कि हमने अंग्रेज़ी की अनिवार्यता की बात नहीं कही थी. तो किसने कही? आपकी सिफारिशों में साफ़-साफ़ कहा गया है कि अंग्रेज़ी का 100 अंकों का एक पर्चा न सिर्फ पास करना अनिवार्य होगा, बल्कि उसके अंक भी अंतिम मेरिट में जुडेंगे. इसी पर तो आपत्ति थी, वरना दसवीं स्तर की अंग्रेज़ी तो पहले भी पास करनी होती थी, बस उसके अंक मेरिट में नहीं जुड़ते थे. निगवेकर साहब कहते हैं कि इधर के वर्षों में ऐसे लोग अधिकारी बन रहे थे, जो एक पेज साफ़ हिन्दी या अंग्रेज़ी नहीं लिख पाते, इसलिए यह करना जरूरी था. लेकिन 1993 में शुरू किया गया 200 अंक का निबंध का पर्चा फिर क्या घास छील रहा था? यदि एक पूरा पर्चा निबंध लिखवाकर भी आप भाषा ज्ञान नहीं जांच सकते तो फिर इसमें उम्मीदवार नहीं, महाशय आप गुनाहगार हैं. एक अजीब तर्क यह दिया जा रहा है कि हाल के वर्षों में लोग तकनीकी विषयों की जगह भाषा को ले रहे थे. सच बात तो यह है कि केवल भाषाओं को ही नहीं, वे हर उस विषय को ले रहे थे, जिसे आसानी से रटा जा सके, और जो अच्छे अंक दिला सके. इतिहास, समाजशास्त्र, दर्शन आदि ऐसे ही विषय हैं, जो विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा के विद्यार्थी ले रहे थे. फिर आपकी आरी सिर्फ भारतीय भाषाओं की गरदन पर ही क्यों चली? शायद ऐसे सवालों के जवाब उनके पास नहीं होंगे क्योंकि उनके मन में पहले ही एक मैकालेभक्त बैठा था.
इसमें कोई दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में अंग्रेज़ी का वर्चस्व बढ़ा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसका या किसी और विदेशी भाषा का ज्ञान आज की जरूरत है. लेकिन सिर्फ इसी कारण से अपनी भाषाओं को डुबो देना कहाँ की समझदारी है?
भारतीय नौकरशाही के सामंती चरित्र के कारण ही 1979 में डीएस कोठारी ने सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं को जगह दिलाई थी और अंग्रेज़ी के वर्चस्व को तोड़ा था. उसी के बाद गाँव-देहात के, निर्धन तबकों के, दबी-कुचली जातियों के लोग भी इस प्रभु वर्ग में शामिल होने लगे थे. धीरे-धीरे वे अपने वर्गीय हितों की बात भी उठाने लगे हैं. हाल के वर्षों में आपने पढ़ा होगा कि किस तरह से किसी रिक्शे वाले का बेटा, किसी जूते गांठने वाले का बेटा, किसी चौकीदार-चपरासी का बेटा या बेटी, किसी छोटे दूकानदार का बेटा आईएएस बन गया है. हर साल 4-5 सौ ऐसे युवा भारतीय भाषाओं के जरिये इस प्रतिष्ठित सिविल सेवा में अपनी पैठ बना रहे थे. ऐसा नहीं कि वे अंग्रेज़ी जानते ही नहीं थे. अपनी भाषा के साथ वे अंग्रेज़ी भी कामकाजी स्तर की जानते थे. प्रभु वर्ग को असली दिक्कत इन्हीं लोगों से थी कि धीरे-धीरे वे उनके बीच जगह बना रहे हैं. अभी तक वे अंग्रेज़ी के आवरण में अपनी कमियों को छिपा लिया करते थे. अब यह काम मुश्किल हो रहा था. इसीलिए उन्होंने एक झटके में भारतीय भाषाओं को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. वे तो कामयाब भी हो गए थे. यह तो तमाम क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें थीं कि सरकार को झुकना पड़ा और मसले को ठंडे बस्ते में डाला गया.
अब असली मसले पर आयें. समस्त भारतीय भाषाओं के बीच अंग्रेजियत के विरुद्ध आज जो राजनीतिक सहमति बनी है, इसे अभूतपूर्व समझना चाहिए. ऐसा आज़ादी के आंदोलन के दौरान भलेही हुआ हो, पर उसके बाद कभी नहीं हुआ. इसलिए यह टेम्पो बना रहना चाहिए. प्रभु वर्ग यही चाहेगा कि भारतीय भाषाओं के बीच फूट पड़ी रहे, और अंग्रेज़ी राज करती रहे. हिन्दी वाले यह न समझें कि यह क्षणिक जीत उनकी वजह से हुई है. वास्तव में सरकार को क्षेत्रीय ताकतों के डर से अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं. इसमें दक्षिण भारतीय नेताओं की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसलिए भविष्य में भी भारतीय भाषाओं की इस लड़ाई में उनकी सक्रियता बनी रहे, इसके लिए हिन्दी वालों को विशेष प्रयास करना चाहिए.
(साभार: अमर उजाला, 20 मार्च)

पाश हमारे राष्ट्रकवि हैं : सुधीर सुमन

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क्रान्‍ति‍कारी कवि‍ पाश के शहादत दि‍वस पर सुधीर सुमन का आलेख-

पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के गाँव तलवंडी सलेम में हुआ था। उनका पारिवारिक नाम अवतार सिंह था। उनके पिता सेना में थे और मेजर पद से रिटायर हुए। लेकिन एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्में अवतार सिंह किशोर उम्र से ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की लड़ाई से जुड़ गये और महज 38 साल की उम्र में भारतीय शासकवर्ग द्वारा पैदा किए गये खालिस्तानी पृथकतावादियों की गोलियों से शहीद हुए।

अवतार सिंह ने पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और उसी समय उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ और दो साल बाद जब उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई, उसी साल ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसने राष्ट्र, लोकतंत्र और देशभक्ति को आम मेहनतकश जनता की नजर से परिभाषित करने पर जोर दिया। पाश एक बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता की तरह उस आंदोलन से जुड़ गये। उन्होंने राजनीति और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन का भी जमकर अध्ययन किया। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का उनके यहाँ जमावड़ा होने लगा। मात्र 19 साल की उम्र में उन्हें एक झूठे केस में फँसाकर जेल में डाला गया और भीषण यंत्रणाएं दी गईं। लेकिन उनके इंकलाबी विचारों को कुचलने में शासकवर्ग विफल रहा। उस लोहे को नष्ट करने में उसे सफलता नहीं मिली, बल्कि लोहा फौलाद में ढलता गया। कवितायें जेल से बाहर आती रहीं और 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 36 कविताएं थीं, जिन्होंने हिन्‍दी की क्रान्‍ति‍कारी कविता को नई चमक और आवेग दे दी। यह जनता का लोहा था, जिस लोहे में उसकी आकांक्षा, प्रतिरोध और उसके नैतिक मानवीय मूल्यों बड़ी मजबूती से मुखरित थे- मैंने लोहा खाया है/आप लोहे की बात करते हो/लोहा जब पिघलता है/तो भाप नहीं निकलती/जब कुठाली उठानेवालों के दिलों से/भाप निकलती है/तो लोहा पिघल जाता है/पिघले हुए लोहे को/किसी भी आकार में/ढाला जा सकता है।

पाश ने ज्यादातर कवितायें पंजाबी में ही लिखीं। जिस कविता को हिन्‍दी में उपलब्ध उनकी एकमात्र कविता बताया जाता है, उसकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं- ‘वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने?/ इस जर्जर शरीर में लिखी/लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने?’ और सचमुच हिन्‍दी ही नहीं,  दूसरी भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी लहू की उस शानदार इबारत को पढ़ा और लहू के रिश्ते सा ही आत्मीय महसूस किया। जिस तरह भगतसिंह हमारे राष्ट्रनायक हैं, उसी तरह पाश मुझे अपने राष्ट्रकवि लगते हैं, जनता के वास्तविक राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने वाले और उसे हकीकत में बदलने के लिये चलने वाले संघर्षों के साथी कवि। अपनी चर्चित कविता ‘भारत’ में उन्होंने लिखा है-

भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए

बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। जाहिर है उनके लिए ‘भारत’ ऐसा शब्द नहीं है, जिसकी रक्षा के नाम पर जनता के जनवादी अधिकारों और उसके लिए चलने वाले आंदोलनों को शासकवर्ग कुचलता है। बकौल पाश-

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं….
उनके लिए जिंदगी एक पंरपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति

अवतार सिंह साहित्य की दुनिया में पाश के नाम से मशहूर हुए। पिछले चार दशक की भारतीय कविता की दुनिया में पाश एक ऐसा नाम है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज करना सम्‍भव नहीं है। उनकी कवितायें क्रान्‍ति‍कारी कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रतिनिधि आवाज तो बनी ही हुई हैं, जिस तरह शहीद-ए-आजम भगतसिंह के नारे और कई कथन भारतीय जनता के रोजमर्रा जीवन का हिस्सा बन गये, हर किस्म के परिवर्तनकामी शक्तियों ने जिस तरह इंकलाब जिंदाबाद को अपना लिया, उसी तरह पाश की कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं। ‘हम लड़ेगे साथी’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी कवितायें। ये दोनों कालजयी कवितायें हैं और हर किस्म की गुलामी के खिलाफ आजाद जिंदगी के लिये हर स्तर से लड़ने के लिये और बदलाव के सपनों को न मरने देने के लिए प्रेरित करती हैं- जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी/और हम लड़ेंगे साथी…..

आजादी के आंदोलन के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए और भविष्य में देशी और विदेशी शासकवर्ग के बीच समझौते की आशंका जताते हुए भगतसिंह ने यही तो कहा था कि शोषण के विरुद्ध जनता की लड़ाई भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहेगी। पाश के आदर्श भगतसिंह थे और उन्होंने लिखा था कि लेनिन की पुस्तक के उस मुड़े हुए पन्ने से पंजाब की नौजवानी को वे आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे छोड़कर भगतसिंह फाँसी पर चढ़े थे। आज पाश पंजाब ही नहीं, भारत के हर उस नौजवान के प्रिय कवि हैं, जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट और आक्रोशित है और इसमें बदलाव चाहता है।

हमारे दौर में जिस तरह जीवन के संकट और असुरक्षा के बहाने हमारे भीतर यथास्थिति के तर्क घर करते जाते हैं, पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक’ उसी से टकराती है- ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती/पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती/गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती/….सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर घर आना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना।’ अकारण नहीं है कि हमें एक यंत्र या गुलाम में तब्दील कर देने वाली राजनीतिक पार्टियों और शासकवर्ग को सपनों को इस तरह जगाए रखने की कोशिश खतरनाक लगती है, पाठ्यक्रम में पाश की कविता होना खतरनाक लगता है। एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है- ‘हम अब खतरा हैं सिर्फ उनके लिये/जिन्हें दुनिया में बस खतरा ही खतरा है’। ‘युद्ध और शांति’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘पुलिस के सिपाही से’, ‘जहाँ कविता खत्म होती है’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’, ‘धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘सलाम’, ‘घास’, ‘वफा’, ‘सच’, ‘जिंदगी/मौत’ जैसी उनकी कई कवितायें हैं, जो बार-बार उद्धृत की जाती हैं। वर्ग-संघर्ष को वह जनता की मुक्ति का रास्ता समझते हैं और यह कभी नहीं भूलते कि ‘यहाँ हर जगह पर एक बार्डर है/जहाँ हमारे हक खत्म होते हैं/और प्रतिष्ठित लोगों के शुरू होते हैं।’ और प्रतिष्ठित लोगों यानी शासकवर्ग हमेशा उनके निशाने पर रहता है। इस लिहाज से अपेक्षाकृत कम उद्धृत की जाने वाली कविता ‘द्रोणाचार्य के नाम’ को भी देखा जा सकता है।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की खासियतों को रेखाँकित करते हुए प्रो. नामवर सिंह ने कहा था कि उसने साहित्य का रुख गाँवों की ओर मोड़ा, पाश की कविता और उनके रचनाकार-व्यक्तित्व दोनों पर यह बात लागू होती है। उन्होंने ‘सिआड़’, ‘हेम ज्योति’ ‘हाँक’ और ‘एंटी-47’ का सम्‍पादन करते हुए कई महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक लेख लिखे। 1971 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने गाँव से ‘सिआड़’ पत्रिका निकाली। 1982-83 में उन्होंने गाँवों में हस्तलिखित पत्रिका ‘हाँक’ को लोगों के बीच वितरित करने काम भी किया। यह लोगों की वैचारिक-राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने की ही कोशिश थी।

पाश वामपंथ के पिछलग्गूपन को कतई पसंद नहीं करते थे। ‘हमारे समयों में’ नामक अपनी बहुचर्चित कविता में उन्होंने लिखा-

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाउँ
मार्क्‍स का सिंह- जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारों, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।

मगर इस कुफ्र के बावजूद न वह निराश हुए न उनकी कविता। वह एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और पृथकतावाद दोनों से लड़ते रहे और खालिस्तानी उग्रवादियों की गोलियों से भगतसिंह की शहादत के दिन ही शहीद हुए।

अगर उन्हीं की कविता पंक्तियों से उन्हें याद किया जाए, तो ‘प्रतिबद्ध’ कविता की ये पंक्तियाँ बिल्कुल वाजिब हैं उनके लिये-

हम झूठमूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और

कविता केन्द्रित संगोष्‍ठी 21 अप्रैल को

चित्तौड़गढ़ : साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका ‘अपनी माटी’ 21अप्रैल 2013 को शाम चार से छह बजे तक चित्तौड़गढ़ में कविता केन्द्रित संगोष्ठी का आयोजन करेगी। ‘माटी के मीत’ शीर्षक से आयोज्‍य कार्यक्रमों की कड़ी में यह पहला आयोजन होगा। मुख्य रूप से कविता विमर्श के इस आयोजन में चित्तौड़गढ़ स्थित महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष और समीक्षक डॉक्‍टर राजेश चौधरी सूत्रधार की भूमिका में रहेंगे।

डॉ. चौधरी के अनुसार चित्तौड़गढ़ स्थित सेन्ट्रल एकेडमी सीनियर सेकंडरी स्कूल में आयोजि‍त होने वाली इस संगोष्‍ठी में राजस्थान के दो प्रतिनिधि कवि अजमेर के अनंत भटनागर और सवाई माधोपुर के विनोद पदरज अपनी कवितायें पढ़ेंगे। अनंत भटनागर समकालीन हिन्दी कविता में राजस्थान से एक प्रतिबद्ध कवि का हस्तक्षेप है। वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर भी अपनी सार्थक पहचान रखते हैं। रचना को परिवर्तन का औज़ार मानने वाले अनंत  भटनागर में एक कमिटमेंट की झलक साफ़ तौर पर दिखती है। बेंकिंग सेक्टर में प्रबंधक की भूमिका निभाने वाले विनोद पदरज भी अपनी सादगी के साथ चकाचौंध की इस दुनिया से बहुत दूर गम्‍भीर कविता लेखन में व्यस्त हैं। पदरज की कविता बहुत से मायनों में जीवन और प्रकृति के बहुत करीब की अनुभव होती है। ज्यादा तामझाम फैलाने और टंटेबाजी जैसी उक्तियों में दोनों का ही दिल नहीं रमता है।

इस मौके पर अस्सी के बाद के कविता परिदृश्य पर समीक्षक डॉक्‍टर कनक जैन अपनी बात रखेंगे। इन दोनों कवियों के प्रकाशित कविता संग्रहों पर युवा विचारक डॉक्‍टर रेणु व्यास और युवा आलोचक डॉक्‍टर राजेन्द्र कुमार सिंघवी समीक्षात्मक आलेख भी पढ़ेंगे। आखिर में हिन्दी समालोचक और कवि डॉक्‍टर सत्यनारायण व्यास गोष्ठी में प्रस्तुत कविताओं के शिल्प और कथ्य पर समग्र वक्तव्य देंगे। कविता पाठ के बाद संगोष्ठी में उपस्थित श्रोताओं और आमंत्रित कविद्वय के बीच आज की कविता और कविता के इस समय पर संवाद भी होगा। कार्यक्रम संयोजक ‘अपनी माटी’ संस्थापक माणिक रहेंगे।

एक वि‍शि‍ष्‍ट रचनाकार : आनन्‍द प्रकाश

मार्कण्डेय

मार्कण्डेय

हाल ही में चर्चित आलोचक आनन्‍द प्रकाश के सम्‍पादन में कथाकार मार्कण्‍डेय के वैचारि‍क लेखन की पुस्‍तक ‘हि‍न्‍दी कहानी : यथार्थवादी नजरि‍या’ प्रकाशि‍त हुई है। 2 मई 1930 को जन्‍मे कथाकार मार्कण्‍डेय की पुण्‍यति‍थि‍ (18 मार्च 2010) पर श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप इस पुस्‍तक की भूमि‍का-

1950 का दशक मार्कण्डेय के साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माणकाल कहा जा सकता है। इस दशक में मार्कण्डेय देशव्यापी परिवर्तनों के साक्षी बने जिनके दायरे में राजनीतिक मतों की टकराहट, सामाजिक उथल-पुथल, जाति-विभाजन की कड़वी सच्चाइयाँ, धर्म और संस्कृति की रूढ़ियों पर होनेवाले प्रहार तथा दूसरी तरफ परम्परा समर्थकों की एकबद्ध हिंसक प्रतिक्रिया आदि आते हैं। उस समय मार्कण्डेय युवा थे और अपने समवयस्कों से सहानुभूति और शक्ति ग्रहण करने के हामी थे, साथ ही, कुछ आदर्श और मूल्य भी अवश्य होंगे जिन्हें अपनाने और पाने का युवा मार्कण्डेय ने प्रयास किया, या कम-अज-कम सपना देखा। अचानक ही देश में ऐसा युवा वर्ग प्रकट हो गया था जो स्वतन्त्र विचार को तरजीह देता था और रूढ़ियों की काट करता था। असल में वैचारिक स्वतन्त्रता और रूढ़ि-विरोध मुख्य रूप से समाज-चिन्तन एवं साहित्य के विषय हैं और जो युवा वर्ग के माध्यम से जीवन में अपने लिये जगह बनाते हैं।

लेकिन युवा होने के साथ-साथ मार्कण्डेय अध्यवसायी थे। यह विचार और कथा की दुनिया में भूमिका-निर्वाह के लिए आवश्यक था। मार्कण्डेय न केवल अलग से विचारक और कथाकार थे, बल्कि विश्‍लेषण में प्रयोगशील भाषा और तर्कशीलता ले आते थे। यह जितना स्वयं मार्कण्डेय के लिए सही जान पड़ता है उतना ही उन पात्रों चरित्रों के बारे में भी कहा जा सकता है जिनका मार्कण्डेय ने अपनी रचनाओं में सृजन और गठन किया। उनके पात्र विचार में दिलचस्पी लेते हैं और अन्य के साथ बहस में उलझते हैं। फिर, जितना वे सहमत होना चाहते हैं, उतना ही असहमत होना भी जानते हैं। मार्कण्डेय का वैचारिक गद्य इस तथ्य का गवाह है। दूसरी ओर उनके यहाँ कहानी का गद्य बेहद तीखा, दिलचस्प, तर्कवान् और व्याख्यापरक है।

लेकिन हम पाते हैं कि मार्कण्डेय पचास के दशक में, जो आजादी के बहुत करीब था, स्वाधीनता आन्दोलन और भारत की वर्तमानता के बीच लकीर खींच रहे थे। इससे यह दिखता है कि चाहने पर अवश्य मार्कण्डेय स्वाधीनता आन्दोलन और सामाजिक संघर्ष का हवाला देते हैं, लेकिन सामान्य प्रवृत्ति के स्तर पर उससे बचते हैं। कहानी का सन्दर्भ लेकर कहें तो वह किस्सागोई, जिसके लिए प्रेमचन्द मशहूर थे, मार्कण्डेय में न के बराबर है। बल्कि मार्कण्डेय किस्सागोई की आलोचना करते हैं। मार्कण्डेय प्रस्तुति की बात करते हैं, क्षण को बाकी से ऊपर रखते हैं, पात्रों की मानसिकता को उकेरते हैं, उनकी भावनाओं और अनुभूतियों का आन्तरिक तर्क  गढ़ते हैं, लेकिन घटनाओं को प्राय: कथा से बाहर एवं असंगत मानते हैं। क्या यह सही है और क्या अकारण ही मार्कण्डेय कथा की मूल गतिकी से अलग नहीं हो जाते? यह गम्भीर सवाल है। प्रस्तुत पुस्तक इस सवाल के बरक्स सक्रिय जिज्ञासा के तौर पर खड़ी नजर आती है।

पचास के दशक की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश साम्राज्यवाद-विरोधी व्यापक आन्दोलन तो था ही जहाँ मनुष्य-मनुष्य के बीच बराबरी का रिश्ता, धर्म निरपेक्ष सोच एवं आधुनिक मानव-मूल्यों का महत्त्व प्रतिष्ठित था, लेकिन साथ ही निकट अतीत की साम्प्रदायिक हिंसा और विभाजन का गहरा अहसास भी था। दोनों चीजें परस्पर विपरीत थीं और इस विपरीत का सम्बन्ध भारतीय जीवन के अनेकानेक गलत-सही पक्षों से था। फिर भी जल्द ही, विशेषकर प्रथम आम चुनावों (1952) के बाद तत्कालीन समाज का ध्यान उन नीतियों की तरफ गया था जिनमें आर्थिक विकास का मुद्दा अहम् था। यह भी कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास मात्र आर्थिक स्थिति को सम्बोधित न होकर अन्य वस्तुओं को जन्म देता है, या प्रभावित करता है। यह पचास के दशक में देखा जा सकता है—उस समय उत्साह का संचार था और विशेषकर देश का शहरी मध्यवर्ग प्रगति के सपने देखता था। लेकिन क्या उस समय प्रस्तावित प्रगति सामाजिक न्याय और बराबरी की अपेक्षा को उपयुक्त आधार देने में समर्थ थीं? मार्कण्डेय के विश्‍लेषण अथवा कथा-चित्रण इस सवाल पर निरन्तर रोशनी डालते हैं।

(1)

व्यक्ति और रचनाकार दोनों ही स्तरों पर मार्कण्डेय स्वतन्त्रता के मूल्यों को लेकर चिन्तित रहे। आजादी के बारे में उनका यह कथन दृष्टव्य है—

परिवेश और सन्दर्भों के बहाने देश की आजादी पर बहस चल रही थी। कुछ लोग इसे आजादी मानने के लिए तैयार थे, कुछ लोग इसे राजनीतिक आजादी तो मानते थे लेकिन साम्राज्यवादी आर्थिक दबाव के रहते इसे जनता के लिए निर्थरक समझते थे। तरह-तरह की शंकाओं, विचारों और परिभाषाओं में तत्कालीन सामाजिक जीवन को उद्वेलित कर रखा था। लेकिन देश के पूँजीवादी नेतृत्व की असफलता पर लोगों के मन में व्यापक सहमति थी। अव्यवस्था और साम्प्रदायिक दंगों ने देश को जड़ से हिला दिया था। महात्मा गाँधी की राम-राज्य की परिकल्पना के चलते कायदे-आजम का मुस्लिम राज बन गया था। ऐसी संक्रान्ति काल में लेखकों को झूठे आदर्शों में उलझाये रखना अथवा देश की वर्तमान स्थितियों से अलग कोई वैचारिक पाठ पढ़ाना सम्भव नहीं रह गया था। इसलिए परिवेश ही सत्य बन गया था, और सब सत्याभास। (बल मेरा, मार्कण्डेय, पृ. 8)

इस वक्तव्य पर किंचित् विचार आवश्यक है। अपने वक्त में मौजूद ‘शंकाओं, विचारों और परिभाषाओं’ का गहरा एहसास मार्कण्डेय को था। कथित शंकाओं का ताल्लुक प्राय: मध्यवर्गीय मानसिकता से होता है जहाँ आत्मविश्‍वास इसलिए कम होता है कि मध्य वर्ग का व्यक्ति परिवेश में अपनी क्रियाविधि का पुख्ता आधार नहीं देखता—उसे लगता है कि समाज में उसके बिना भी काम चल सकता है। यह यद्यपि सही है कि जब शंकाएँ विचार की तरफ गतिशील होती हैं तो मध्यवर्ग को अपनी भूमिका उपलब्ध हो जाती है। फिर भी कठिनाई यह होती है कि विचार प्राय: सामान्य होता है जबकि निरन्तर विचार क्रिया के चलते वह कुछ स्थितियों में विशिष्ट हो जाता है। दिलचस्प है कि मार्कण्डेय का उक्त वक्तव्य नयी कहानी के सन्दर्भ में था और इस साहित्य-प्रवृत्ति से जुड़े अधिकतर लेखक या तो सामान्य विचार से काम चलाते थे, या किसी स्थिति में अनुभव की तीव्रता के कारण ‘स्टैण्ड’ भी लेते थे। नयी कहानी के चर्चित नाम उस समय मोहन राकेश,  रेणु,  राजेन्द्र यादव,  ठाकुरप्रसाद सिंह, कमलेश्वर आदि थे जो या तो शंकाओं, उलझनों, मामूली सवालों से आगे न बढ़ते थे, और यदि बढ़ते थे तो विचार तक पहुँचकर रुक जाते थे। इन लेखकों की पंक्ति में अगल-बगल से कभी धर्मवीर भारती, द्विजेन्द्रनाथ मिश्र निर्गुण और नरेश मेहता भी प्रवेश कर जाते थे, जो मानते थे कि वे भी नयी प्रवृत्ति और समकालीनता के रचनाकार हैं। मैंने सुना कि एक समय नयी कहानी प्रवृत्ति में शामिल होने को वात्स्यायन अज्ञेय भी उतावले हुए थे और चाह रहे थे कि उनकी कोई रचना भैरवप्रसाद गुप्त द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नयी कहानियाँ’ में छपे। यह कितना सही-गलत था इसमें जाना यहाँ आवश्यक नहीं जान पड़ता, लेकिन प्राय: नहीं देखा गया कि लेखकों की इस पाँत ने मार्कण्डेय द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘परिभाषा/परिभाषाओं’ की बात गम्भीरता से की हो। परिभाषा के दौरान विचार पक्ष इतना प्रबल होता है कि वह शब्दों के उस आखिरी आयाम तक पहुँच जाता है जहाँ समाज के द्वन्द्व शुरू होते हैं। परिभाषा करने के दौरान आपको दूसरों के लिए और अपने तर्इं कहना होता है कि आप किस अन्य परिभाषा से स्वयं को अलग कर रहे हैं, बल्कि उसके विपरीत खड़े हैं। सम्भवत: कहानी की बात में मौजूद बहसें और विश्‍लेषण इसलिए लिखे गये थे कि उनके माध्यम से मार्कण्डेय और उनके प्रतिबद्ध साथियों, (मसलन अमरकान्त और शेखर जोशी) की वैचारिक और विचारधारात्मक स्थिति स्पष्ट हो।

असल में यह देखा, समझा और परखा जाना आवश्यक है कि कथा-रचना को किसके साथ खड़ा होना है, किससे स्वयं को अलग रखना है और किसका विरोध करना है। पचास के दशक में ऐसा तभी सम्भव था जब द्रष्टा की अपनी स्थिति यथार्थवादी हो और वह समाज की वर्ग सच्चाई से न केवल भली-भाँति वाकिफ हो, बल्कि शोषित मनुष्यता के साथ, उसके समर्थन में अपनी कार्यविधि को गतिमान करता हो। लेकिन यह स्थिति की बात है। जहाँ तक एक कालखण्ड की तात्कालिक जरूरतों का प्रश्न है, वहाँ व्यक्ति को ऐसी चुनौतियों से जूझना होता है जो उस समय की प्रभावी शक्तियों द्वारा अपने हितसाधन के लिए नीति के स्तर पर तैयार की जाती हैं। मसलन, यदि कोई चीज नये पैंतरे के तहत लायी जाय तो शोषित वर्ग द्वारा उसका तुरत-फुरत जवाब ढूँढ़ना होता है। ‘कहानी की बात’ में इस आकस्मिक सच का कमोबेश तीखा दबाव दिखता है।

उक्त उद्धरण में, जो अस्सी के दशक में लिखी टिप्पणी का हिस्सा है, मार्कण्डेय यह भी कहते हैं कि सामान्य जन को देश में पूँजीवादी नेतृत्व की असफलता देखने को मिली थी। इसकी व्याख्या यह हो सकती है कि उस समय देश का नेतृत्व लगभग पूरी तरह नेहरू के हाथों में था जो स्वप्नदर्शी और प्रयोगशील नेता थे। नेहरू का अपना अतीत भी समाजवादी था, तीस के दशक में नेहरू ने महात्मा गाँधी से असहमति जतलाते हुए सामाजिक न्याय का महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया था और रामराज्य की परिकल्पना से अलग (जिसमें वर्गीय सह-अस्तित्व पर बल था) यह कहा था कि वर्गीय जद्दोजहद से ही वास्तविक समाज-संगति सम्भव है। मार्कण्डेय की पीढ़ी द्वारा पचास के दश में यह एहसास कर पाना कि देश के पूँजीवादी नेतृत्व की असफलता के कारण जीवन की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है चिन्तन का ऐसा पक्ष था जिसके कारण तत्कालीन लेखकों की आलोचना-दृष्टि को ‘सुपरिभाषित’ दिशा मिली। कहानी की बात निबन्धों में यह चीज पूरी ताकत से उभरती है। फिर भी सवाल अपनी जगह बना है कि क्या इस विचार-बिन्दु पर ‘लोगों के मन में व्यापक सहमति थी’, जैसा कि मार्कण्डेय कहते हैं? इस सवाल की, और इससे जुड़े ऋणात्मक/धनात्मक भावरूपों की झलक कहानी की बात के समूचे तर्क  में देखी जा सकती है। इस पर किंचित् विस्तार से आगे चर्चा की जायेगी।

यह सही है कि पचास का दशक संक्रान्ति का काल था। चीजें बदल रही थीं ओर उस प्रक्रिया में कई तरह की उलझनों का बोलबाला था। यह पूरी तरह नयी कहानी का, उसकी शंकाओं और अनिश्चितताओं का खाका है। इसके बरक्स लेखकों को, जैसा मार्कण्डेय ने कहा, ‘झूठे आदर्शों में उलझाये रखना’ तत्कालीन शासक वर्ग की ये नीति थी। फिर भी परिभाषा की दृष्टि से ‘झूठे आदर्शों’ पर विचारधारात्मक जिज्ञासा व्यक्त करना आवश्यक जान पड़ता है। स्वयं मार्कण्डेय भी इस दिक्कत से वाकिफ जान पड़ते हैं। इस कारण वह आगे कहते हैं कि ‘परिवेश ही सत्य बन गया था।‘ मुश्किल इसे लेकर है कि पचास के दशक को उसकी वर्तमानता में रखकर देखा जाय या उसके इतिहास की पड़ताल की जाय? मार्कण्डेय ठीक ही सुझाते हैं कि परिवेश के सत्य में ‘सत्याभास’ का खतरा है।

इस प्रकार मार्कण्डेय का उक्त कथन कुछ पक्षों का रूप निर्धारित करता है, लेकिन साथ ही ऐसे नये उभरे तत्त्वों को इंगित करता है जिन्हें समझने में पचास के दशक का रचनाकार पर्याप्त सक्षम न था। स्वयं नयी कहानी और साथ ही नयी कविता से जुड़े अनेक चिन्तकों ने उस समय अपने लिये नयी राहों के अन्वेषी जैसे शब्दों का प्रयोग किया। यह वात्स्यायनी एहसास था और इसकी गिरफ्त पचास के दशक की युवा पीढ़ी पर दिखती थी। क्या मार्कण्डेय का अपना चिन्तन भी इस आग्रह से कमोबेश प्रभावित था? फिर क्या मार्कण्डेय भी अपनी व्याख्याओं में इस सवाल से गम्भीरतापूर्वक उलझते हैं? संक्षेप में कहें कि पचास के दशक का माहौल अनेक नये सवालों से घिरा था और उस समय का रचनाकार पूरी शिद्दत से इन सवालों का बोझ अपने मन-मस्तिष्क पर महसूस करता था।

पचास के दशक की साहित्यिक स्थिति पर चक्रधर ने, जो स्वयं मार्कण्डेय थे, लिखा कि—

‘‘किसी भी वास्तविक पाठक को इस बात से विरोध नहीं होगा कि वास्तविक सृजनशील एवं सजग शक्तियाँ काव्य की रूपात्मक छवि के निखार में ही लगी हुई हैं। यद्यपि दुनिया की कतिपय संस्कृत भाषाओं की कविता, विचारों की इस संक्रान्ति से गुजर चुकी है, और उनके अनुभव हमारे आगे प्रत्यक्ष हैं, लेकिन क्या हिन्दी की नयी कविता भी टी. एस. इलियट की तर्जुमानी है—अथवा लेमार्ले या एजारा पाउण्ड का प्रतीकवादी नमूना? इस प्रश्न का उत्तर कई तरह से दिया जाता है, इसलिए आज के कवि को सामाजिक जीवन से तटस्थ मान लेना दुराग्रह के अतिरिक्त और क्या होगा। लेकिन उसमें व्यक्तिनिष्ठता के भाव स्पष्ट हैं। यह बात अलग है कि व्यक्तियों की समस्याएँ भिन्न हैं, विचार भिन्न हैं, और इसी अनुपात में उनके काव्य पर उसके प्रभाव भी। जहाँ कवि सारे सामाजिक बन्धनों से अलग ‘आत्म’ की कोठरी में आँख मूँदकर देखता है, वहीं वह अँधेरे में भटकनेवाले कीड़े की तरह हो जाता है, और नतीजे में उसके काव्य के कई दोष हमारे सामने प्रत्यक्ष हो उठते हैं। कहीं तो वह रूप के चमत्कार में बह जाता है और भाषा की रंगीनी उसका ध्येय बन जाती है और कहीं वह अ-रूपकता मोह में कुरूप हो जाता है। संगीत, लय, सभी का लोप ऐसी कविताओं में देखा जा सकता है। शायद यही कारण है कि कथित प्रयोगवाद किसी विशेष वाद की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता। आधारभूत विचारों का इतना वैपरीत्य, शायद ही किसी भी अन्य युग में रहा होगा। यहाँ तक कि कुछेक ऐसे भी नमूने मिल जाते हैं कि जीवन दर्शन सम्बन्धी विचारों का समानीकरण भी अभिव्यक्ति के माध्यमों को नितान्त विपरीत बनाये रखने में समर्थ हो जाता है।’’ (बलभद्र और दुर्गाप्रसाद, पृ. 41-42)

यह एक गम्भीर वक्तव्य है। यहाँ पचास के दशक में व्याप्त अनेक विचारों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है और उनके बीच उभरे सवालों पर सोचने की विवशता दिखती है। मार्कण्डेय की नजर में ‘काव्य की रूपात्मक छवि’ को निखारना एक साथ जरूरी और सन्देहास्पद बनता है, और ‘टी. एस. इलियट की तर्जुमानी’ पर सार्थक चिन्ता का आधार खड़ा होता है। फिर, अपनी ओर से जवाब न देकर मार्कण्डेय विषय को फैलाते हैं और उत्तर के बहाने से ‘कई तरह की पूर्वग्रही प्रवृत्तियों’ की तरफ पाठक का ध्यान खींचते हैं। यह भी सोचा जा सकता है कि क्या यह वक्तव्य अन्य साहित्यरूप, मसलन कहानी पर किंचित् बदलाव के साथ लागू हो सकता है या नहीं? प्रश्‍नों के अतिरिक्त यहाँ विशिष्ट साहित्यिक प्रवृत्ति ‘कथित प्रयोगवाद’ के बारे में कहा गया है कि उसे ‘किसी विशेष वाद की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता।’ क्यों? जवाब है कि यह समाज के ‘आधारभूत विचारों का…वैपरीत्य’ प्रकट करता है। अर्थात् प्रयोगवाद का मूल समाज की उन ताकतों में है जो मूल बदलाव के तर्क  को पीछे फेंककर मात्र प्रयोग की चर्चा में रुचि लेते हैं, प्रयोग को ही प्रतिष्ठित करने पर बल देते हैं। इससे आगे जो है वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन लेखकीय मंशा यह है कि विपरीतों के टकराव की सच्चाई को समझा जाना जरूरी है। पता चलता है कि युवा मार्कण्डेय अपने वक्त के दबावों से रूबरू होने का साहस रखते हैं। यह तब है जब मार्कण्डेय के अनेक वरिष्ठ समकालीन इस तरह के सवालों पर निश्चित राय रखते थे और मार्कण्डेय की उनसे व्यापक सहमति थी। लेकिन केवल व्यापक, पूरी नहीं।

(2)

जहाँ तक परिवेश में व्याप्त वर्ग-सम्बन्धों की समझ और साहित्य-चिन्तन का प्रश्न है, मार्कण्डेय सिद्धान्त के भी गहरे जानकार मालूम पड़ते हैं, यद्यपि उन्होंने जीवन के मसलों पर तर्क अथवा विश्लेषण की भाषा में कम लिखा है। ‘कहानी की बात’ के निबन्ध और चक्रधर उपनाम के अन्तर्गत कल्पना में पचास के दशक में छपी सूचीनुमा संक्षिप्त टिप्पणियों के अतिरिक्त मार्कण्डेय ने वैचारिक गद्य लिखने की जहमत नहीं उठायी। अपने ढंग की अनूठी पत्रिका ‘कथा’ में जो सम्पादकीय छपते थे या कभी-कभी कहानी-संग्रहों की लघु भूमिकाएँ देखने को मिलती थीं, वहाँ भी मार्कण्डेय को अपनी राय कम शब्दों में मात्र काम चलाने की शैली में प्रस्तुत करने का शौक था। लेकिन उनके इस वैचारिक गद्य का समूचापन प्रभावित करता है, जहाँ उनकी सक्रिय सोच चुस्ती और तराश के साथ पाठक को उपलब्ध होती है। इससे भी आगे मार्कण्डेय वर्गीय संघर्ष के क्रम में अपना मन्तव्य प्रकट करते हैं। भैरवप्रसाद गुप्त ने एक निजी बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि स्वतन्त्रता पश्चात् की लेखक-पीढ़ी में जो लेखक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि से लैस है, वह अकेला मार्कण्डेय है। फिर उन्होंने अतिरिक्त बल देते हुए कहा—‘‘स्वयं मैं भी नहीं। मुझमें आप जब तब झुकाव की बेतरतीबी देख सकते हैं, लेकिन मार्कण्डेय अपनी विचारधारात्मक स्थिति पर हमेशा अडिग रहता है।’’ अपनी ओर से कहूँ कि जिस समझौताविहीन कड़े दृष्टिकोण की बात भैरव ने कही वह तर्क की उस बारीकी और लचीलेपन के बावजूद नजर आती है जो मार्वâण्डेय के कथनों, उनकी टिप्पणियों और व्याख्याओं में मिलती है। मार्कण्डेय एक साथ राजनीतिक चिन्तक हैं, साहित्य के व्याख्याकार हैं, मनुष्य मनोविज्ञान के विद्यार्थी हैं, नारी व्यवहार के समर्थक हैं और सूक्ष्म मानवीय अनुभूतियों में गहरी पैठ रखनेवाले रचनाकार हैं। यह कथाकार, सम्पादक और लेखक मार्कण्डेय का स्वाभाविक चरित्र है। इसका एक सामान्य उदाहरण देखें—

हमारे देश में वैचारिक विवेचन द्वारा स्थापित यथार्थ के भीतर रचना के लिए अनेक यथार्थ हैं जो भौगोलिक सीमाओं के द्वारा ही, असम जन-जागरण के कारण एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी परस्पर प्रतिरोध का भ्रम पैदा करते हैं। यथार्थवादी समीक्षा सन्दर्भोंे की व्याख्या द्वारा ही कहानियों के सही विश्लेषण का दायित्व पूरा कर सकती है। (मार्कण्डेय, पृ. 9)

‘यथार्थ के भीतर रचना के लिए अनेक यथार्थ’ का तात्पर्य जटिलता को रेखाँकित करना है। यह उस समय नयी कहानी के तर्क से मेल खाता था। नयी कहानी की व्याख्याओं में जटिलता का तर्क  बार-बार इस्तेमाल होता था जिसका एक अर्थ यह था कि वह सामान्य पाठक के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। फिर किसके लिए है? व्याख्याओं में यह भी निहित था कि यथार्थ को उसके सही अर्थात् वास्तविक रूप में ग्रहण करना सामान्य बुद्धिवाले व्यक्ति के बस की बात नहीं। तब क्या विशेषज्ञों को ही यथार्थ अपने रूप में नजर आ सकता है? इनका जवाब न मिलता था, कारण कि नयी कहानी के लेखक या आलोचक के लिए जीवन और विचार की विशेषज्ञता आकर्षक हो उठी थी। मार्कण्डेय इस पूर्वग्रह से इसलिए अंशत: मुक्त थे कि वह मसलन उक्त वक्तव्य में भी ‘असम जनजागरण’ का तर्क स्वीकार करते थे। क्या था यह असम जागरण? स्थापित अर्थ में इसका तात्पर्य था कि जागरण की जो अवस्था और स्तरीयता केरल-जैसे सर्वशिक्षित प्रदेश में मिलती है, वैसे राजस्थान और (अब) हरियाणा में नहीं मिलती—दोनों जगह जातिवादी सोच विश्वासी परम्परा का पिछड़ापन वहाँ के निवासियों को आधुनिकता आदि से दूर रखता है। इस तर्क में सोच का मार्क्‍सवादी पक्ष भी छिपा था कि असमता मात्र वैचारिक या सांस्कृतिक न होकर भौतिकीय और आर्थिक होती है। इस तरह केरल में भूमि सुधार हो चुके थे और अप्रतिम शिक्षा का प्रसार हुआ था, जबकि राजस्थान और बिहार-हरियाणा में ऐसा न हो पाया था। क्या मार्कण्डेय के सामने यह पचास के दशक में स्पष्ट था? मेरी अपनी राय है कि यदि यह होता तो वह नयी कहानी आन्दोलन में शामिल न होते, न नयी कहानी की विशिष्ट व्याख्या ही गढ़ते। फिर यह भी सच है कि कहानी की बात का वैचारिक चरित्र मार्कण्डेय के तर्इं पचास के दशक के दौरान पहलेवाला उत्साह न दिखता था। सत्तर के दशक में मार्कण्डेय ने ‘कथा’ निकाली थी और उनका रवैया पूरी तरह विचारधारात्मक-राजनीतिक हो गया था। (कथा का पहला अंक सत्तर-दशक के अति निकट सितम्बर, 1969 में आया था)।

लेकिन नयी कहानी की प्रवृत्ति और उसके बखान में मध्यवर्गीय सोच का असर देखा जा सकता था, जिसे परखना आवश्यक था। इसे सामान्य मार्क्‍सवादी लेखक-चिन्तक न समझते थे। मसलन आजादी अधूरी अवश्य थी, लेकिन वह झूठी न थी। साम्राज्यवादी ताकत का एकमुश्त पलायन सबको नजर आता था। अंग्रेजों ने भारत के समाज को तहस-नहस किया था, लेकिन वे भारत छोड़ने को विवश हुए थे। बदली स्थिति में नीति-निर्धारण का जिम्मा स्वयं भारत के वर्गों/वर्गसमूहों के कन्धों पर आ गया था। यह भी दिलचस्प है कि भारत के वर्गसमूहों में ऐसे शिक्षित युवजनों का भी समूह था जिन्होंने तीस के दशक की उथल-पुथल और चालीस के दशक की विकट संघर्षशीलता देखी थी। इस तरह मार्कण्डेय जैसे युवा चिन्तकों और रचनाकारों की भूमिका आवश्यक हो उठी थी। स्वयं मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों और टिप्पणियों के माध्यम से वक्ती सच्चाई को पहचानने, उसके चरित्र को उभारने का काम किया था। नयी कहानी के तर्क  को पहचानने और उसे आंशिक मंजूरी देते शिवकुमार मिश्र अपनी टिप्पणी में कहते हैं—

नयी कहानी के दौर में एक समय जब कहानी एक बार फिर से मध्यवर्गीय जीवन और मध्यवर्गीय चरित्रों की या फिर नगर जीवन की सीमित चौहद्दियों में, उनसे जुड़ी समस्याओं में ऊब-डूब करने लगी थी, मार्कण्डेय उन कहानीकारों की संगति में अपनी विशिष्ट पहचान को लेकर सामने आये जिन्होंने ग्राम्यजीवन तथा साधारण वंचित उपेक्षित जनों के जीवन सन्दर्भों को परिप्रेक्ष्य में उभारा और नयी कहानी के रचनावृत्त को विशद बनाया, उसे हिन्दुस्तान की प्रातिनिधिक ग्राम्यजीवन की वास्तविकता से जोड़े रखा, प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, उनकी कथा-परम्परा को न केवल संरक्षित किया, बदले समय सन्दर्भों में अनुभव तथा विचार की नयी जमीन में उसे कुछ और विकसित किया। (बल मेरा, त्रिपाठी, पृ. 311)

कुछ और क्यों? वास्तविकता से जोड़े रखना, कथा-परम्परा को संरक्षित करना, विचार की नयी जमीन को पहचानना, आदि में ‘कुछ और’ क्योंकर आया? आरम्भिक उत्साह के बाद मिश्र की जुबान कुछ दबती है, जो सही भी है। यह ऐसा मसला है जिस पर विचार की जरूरत है। मार्कण्डेय पचास, साठ, सत्तर और अस्सी दशकों के रचनाकार हैं, बाद में वह सम्पादक, विचारक, आयोजक और साहित्यिक नीति-निर्धारकों के गम्भीर परामर्शदाता की भूमिका में आते हैं। इस पुस्तक की वैचारिक सामग्री असल में एक बेहद कर्मशील, अन्वेषी तथा व्याख्याधर्मी रचनाकार के निबन्धों का संकलन है और यह रचनाकार यहाँ अपनी समझ के पूरे प्रवाह में मौजूद है।

(3)

यहाँ प्रस्तुत लेखों-टिप्पणियों का मूल तर्क यह है कि पचास के दशक की कहानी पूर्व से अलग और विशिष्ट थी और उसकी इस पहचान को रेखाँकित करना जरूरी है। इसमें निश्‍च्‍य ही कुछ खतरे भी हैं। सबसे बड़ा खतरा तो यह सोचने में है कि कहानी को उसके इतिहास से अलग करके तर्क  प्रस्तुत करना नये भारत के सन्दर्भ में कितना सार्थक था? क्या पाठक से यह बात साझा करना कि अब वह साहित्य को पहले की भाँति अभियान का हिस्सा न समझे और केवल सामयिकता में ही रचना का आकलन करे, स्वयं साहित्य के लिए हानिकारक न होता? नयी कहानी एक उफान की तरह थी, उसमें आवेग की मात्रा अधिक थी और वह नयी घटनाओं को तात्कालिकता से अलग न करना चाहती थी। साठ के दशक में नयी कहानी का जो हश्र हुआ वह उस समय चौंकाता था, जबकि आज स्वाभाविक लगता है। लेकिन पचास के दशक में ही, जैसा कि ऊपर संकेतित है, मार्कण्‍डेय नयी कहानी को इतिहास से जोड़ने के कायल थे और चाहते थे कि वह यथार्थ के निकट आये, उसके विविध पक्षों का वास्तविक रूप उजागर करे। क्या यह सम्भव था, और यदि था तो कितना? अब इतिहास का हिस्सा बनी ‘आज की कहानी’ के बारे में मार्कण्‍डेय ने उस समय लिखा-

आज की कहानी अपने बाह्य और आन्तरिक, दोनों उपकरणों में सचेत रूप से समाज के वस्तुगत सन्दर्भों की प्रतिलिपि है, लेकिन वह प्रकृतिवादी नहीं है। विकासशील विचार-परम्परा ने आज के लेखक को एक ऐसी जगह ला खड़ा किया है जहाँ से विमुख होने का अर्थ है उसकी रचना-शक्ति का ह्रास। बात आग्रह की तरह की है, लेकिन सन्दर्भ इतना भिन्न है कि कोई इसका प्रयोग आरोपित आग्रह के लिए नहीं करेगा। विज्ञान और दर्शन की प्रगति ने हमारी परम्परागत मान्यताओं को एक नये परिवेश में ला खड़ा किया है, जहाँ हर अनुभूति को कार्य-कारण की कसौटी पर खरा ही उतरना पड़ता है। तर्क  और बुद्धि से परे, सिर्फ भावुकता के मानदण्ड पर रची जानेवाली मानव-अनुकृतियाँ आज की कहानी में पात्रता नहीं प्राप्त कर सकती। इसीलिए आज का कहानीकार कथानक को वस्तुपरक जीवन-सन्दर्भों से जोड़ने का मुख्य कार्यभार अपने कन्धों पर उठाये हुए है और रचनाश्रयी आलोचक तथा जागरूक पाठक की माँग करता है। (मार्कण्‍डेय, पृ. 13-14)

जिस टिप्पणी से यह उद्धरण है उस पर जनवरी, 1962 की तारीख छपी है। जाहिर है इसका सन्दर्भ पचास का दशक ही है। रोचक है कि मार्कण्‍डेय एक ही क्षण में कहानी को प्रतिलिपि भी कह रहे हैं और इनकार कर रहे हैं कि वह प्रकृतिवादी है। यहाँ दुहरी नकारात्मकता भी द्रष्टव्य है—उदाहरण के लिए ‘विमुख होने का अर्थ है…रचना-शक्ति का ह्रास।’ इसी तरह ‘तर्क और बुद्धि से परे’ और ‘सिर्फ  भावुकता’ में भी आत्मरक्षात्मक पैंतरा है। पूरे वक्तव्य में अनिश्चितता का असर है, जो इसलिए है कि मार्कण्‍डेय की मार्क्‍सवादी चेतना उस व्याख्या की कमजोरी पहचान रही है जिसका लाभ नयी कहानी अभियान में शामिल बुर्जुआ रचनाकार उठा सकते हैं। असल में साठ का दशक शुरू होते-होते नयी कहानी सम्बन्धी बहस गर्म हो उठी थी। इस पर किंचित् बाद में सोचेंगे। यहाँ सिर्फ  यह कहना है कि सावधानी से इधर-उधर देखकर चलनेवाले मार्कण्‍डेय नये सन्दर्भ पर इसलिए जोर दे रहे हैं ताकि वह ‘अतीत’ का विकल्प ढूँढ़ते हुए ‘आज’ को प्रतिष्ठित कर सकें। लेकिन साथ ही यहाँ ‘वस्तुपरक जीवन-सन्दर्भों से जोड़ने का मुख्य कार्यभार’ आया है। यह अत्यन्त सार्थक उक्ति है, चूँकि मार्कण्‍डेय अपने समय के रचनाकार से कार्यभार की शैली में गम्भीर भूमिका निर्वाह की अपेक्षा कर रहे हैं।

क्या नयी कहानी के अन्य व्याख्याकार भी इसी भाँति लेखक से भूमिका निर्वाह की अपेक्षा कर रहे थे? क्या वे सोचते थे कि रचना को अपने परिवेश के प्रति उस तरह जवाबदेह होना है, जिस तरह पूर्व दशकों की कथा, कविता आदि में देखने को मिला था? नयी कहानी में शामिल रचनाशीलता का रूप मिला-जुला था। उसमें कुछ मार्कण्‍डेय सरीखे निर्भीक और विवेकपूर्ण रचना-स्वर थे तो कुछ ऐसे भी थे जो मात्र उत्साह के बल पर संस्कृति में हस्तक्षेप कर रहे थे। यह सक्रिय हस्तक्षेप पाठकों का ध्यान उनकी ओर अतिरिक्त खींचता था और कई बार उत्साही लेखक बाकी की अपेक्षा पाठकों के बीच अधिक महत्त्वपूर्ण भी हो जाते थे। साहित्य में यह प्राय: होता है, जब शब्दावली का पैनापन और आवेग तर्क  का स्थानापन्न बन जाता है। मसलन, उक्त गम्भीर सवाल पर राजेन्द्र यादव की प्रक्रिया मार्कण्‍डेय के निकट या उनके समर्थन में न होकर बिलकुल दूसरी है। यादव कहते हैं—

कथाकार ने खुद अपने-आपसे और दूसरों ने उससे पूछा है कि क्यों नहीं देश के नव-निर्माण, उत्थान और प्रगति में वह भी अपनी सामाजिक, नागरिक और तात्कालिक जिम्मेदारी निभाता? क्यों नहीं कर्म के इस उल्लास और आह्लाद को अपनी लेखनी सर्मिपत करता जो देश के हर खम और खामी को भर रहा है? स्वतन्त्र राष्ट्र का एक जीवन्त युवक क्यों नहीं उनकी पंक्तियों से झाँकता? क्यों नही कहीं कुछ भी उजला उसे दीखता, महान् और महत् उसकी निगाहों में आता? और अकसर उस पर आरोप लगाया गया है कि वह अपनी जिम्मेदारी से भगाता है। वह किसी मानसिक असन्तुलन और रोग का शिकार है कि हर उत्सव और त्योहार देखकर भीतर से कुढ़ता और गमगीन हो जाता है…वह गला फाड़कर यह भी नहीं चीख पाता कि यह सब झूठ है। नकली है! फरेब है!..असलियत जो है उसे मैं जानता हूँ, उसे मैं भोगता हूँ…(त्रिबिन्दु मूल में, यादव, पृ. 21)

मार्कण्‍डेय के तर्काधारित रवैये के विपरीत यादव का स्वर अतिरेकी है,  कुछ-कुछ अराजक एवं अनर्गला इसके अलावा यादव का तर्क  नयी कहानी के प्रचलित रचना-विचार के अधिक निकट है—इस प्रवृत्ति से जुड़े ज्यादातर लेखक अपनी रचना में मोहभंग लाते थे, जैसा यहाँ यादव ने किया है। इस कारण यादव कुछ भी स्पष्ट कहने से बचते हैं। प्रामाणिक को बार-बार या बलपूर्वक लाते हैं (‘कुढ़ता और गमगीन हो जाता है’, ‘यह सब झूठ है’, ‘उसे मैं जानता हूँ, उसे मैं भोगता हूँ’ आदि) और विचार-बिन्दु को अधूरा छोड़कर किसी अन्य दिशा में बढ़ते हैं। यादव का आग्रह अन्धाधुन्ध सवाल उठाने में प्रकट होता है। बल्कि रोचक है कि यादव स्वयं द्वारा उठाये जा रहे सवालों का उत्तर भी नहीं ढूँढ़ना चाहते, बल्कि सवालों को अन्तिम सत्य की भाँति प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। यह नजरिया वास्तविक समस्याओं को शब्दजाल में फँसा देना चाहता है, ताकि उत्तर ढूँढ़ने या पाने की गुंजाइश ही न रहे। इससे गद्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है—गद्य में बिखराव आने लगता है। इतना तो नहीं, लेकिन ऐसा ही गद्य उस समय कमलेश्वर ने भी लिखा। निराशाजनक, कटुतापूर्ण और बदहवास। नयी कहानी प्रवृत्ति की यह शक्ल अनेक बार बहसों में मुख्य हो जाती थी। इस शक्ल ने कुछ समय बाद ही अकहानी की ओर प्रस्थान किया। दूसरी ओर हम पाते हैं कि मार्कण्‍डेय की उक्त टिप्पणियाँ उद्गार, बलाघात से बचती हैं—उनमें वास्तव में समाज की गतिकी का तीखा एहसास है। रचनाकारों में यह आलोचकीय गम्भीरता मार्कण्‍डेय के अतिरिक्त कहीं नहीं मिलती। लेकिन रचनाकारों से बाहर, मसलन आलोचकों में? देवीशंकर अवस्थी के इस कथन पर गौर करें—

स्वातन्त्र्योत्तर दशक में तमाम राष्ट्रीय सजग बोध के समानान्तर नवलेखन का आन्दोलन जिस सतर्कता तथा साहित्यशास्त्र के बने-बनाये एकेडेमिक तन्त्र के प्रति अवज्ञा और विरोध को जन्म देता है उसी ने कहानी के महत्त्व को भी पहचाना था। …किस प्रकार के लेखक नये यथार्थ को अधिक शक्ति और दृष्टि के साथ ग्रहण कर पा रहे हैं यह समस्या लेखकों के सामने भी थी और आलोचकों के भी…(अवस्थी, पृ. 14-15)

यहाँ अवस्थी ने नवलेखन को अधिक तूल दिया है और कहा कि इसकी उत्पत्ति एकेडेमिक तन्त्र के बढ़ते असर के कारण हुई है। अवस्थी एकेडेमिक तन्त्र को सतर्कता से जोड़कर देखते हैं जो इतना ही सही है कि वहाँ सतर्कता का सरल आयाम मौजूद रहता है। साहित्य अध्ययन-संस्थानों में सतर्कता या फिर तर्कशीलता का सम्बन्ध तकनीक से रहता है, नजरिये के स्तर पर वह प्राय:  गायब रहती है। बाद के दशकों में तो यह भी देखा गया कि अध्ययन-संस्थान ने अनेकानेक रचनाकारों और विचारकों को शासकीय सुविधाभोगी वृत्ति का लगभग गुलाम बना दिया और उनकी वैचारिक ऊर्जा एवं साहसिकता को समाप्तप्राय कर दिया। यदि नवलेखन में इसके लिए किंचित् अस्वीकार नजर आया तो इतना भर कि सम्बन्धित लेखकों ने इसे अपने सम्मान पर प्रहार समझा। इससे अधिक नहीं। लेकिन नवलेखन के माध्यम से पहचान बनानेवाले अधिकतर रचनाकारों ने बाद में संस्थान की सुविधाएँ और वहाँ के संसाधन स्वीकार किये और ऐसा करते हुए शासकीय मूल्यों की वर्चस्व-वृद्धि में सहयोग ही दिया। जैसे-जैसे नवलेखन स्थापित हुआ वह स्वयं प्रतिष्ठा केन्द्रों का हिस्सा बनते हुए उनका क्रीतदास होकर रह गया। फिर भी नये यथार्थ को ग्रहण करने के उक्त विचार की कुछ व्याख्या नामवर सिंह के इस कहानी-सम्बन्धी कथन से हो सकती है कि ‘‘जीवन सत्य… खण्ड के भीतर से, किन्तु उसे खण्डित करता हुआ पूर्ण से मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है, जीवन की हर छोटी घटना के भीतर से सम्पूर्ण जीवन की सार्थकता का अनुभव करता है।’’ (अवस्थी, पृ. 69) यहाँ सिंह कहानी-रूप को देखने की कोशिश में उसे व्यापक यथार्थ का वाहक बताते हैं। नयेपन के सन्दर्भ में सिंह कहानी को लेखक की वर्तमानता से जोड़ते हुए कहते हैं—

कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह अपने युग के मुख्य सामाजिक अन्तर्विरोध के सन्दर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है, ऐतिहासिक विकास के दौरान विरोधी शक्तियों के संघर्ष के फलस्वरूप जीवन के नये-नये क्षेत्र खुलते चलते हैं, पिछले युग की दबी हुई शक्तियाँ उभर आती हैं और उभरी हुई शक्तियाँ दब जाती हैं, गौण प्रधान हो जाता है और प्रधान गौण। इस प्रकार सामाजिक अन्तर्विरोध का रूप ही नहीं बदलता, बल्कि उसमें भाग लेनेवाली अथवा भाग न भी लेनेवाली किन्तु भाग होनेवाली, हर सामाजिक इकाई के भीतर अन्तर्विरोध के रूप में भी बदल जाते हैं। (अवस्थी, पृ. 71-72)

अन्य विशेष सन्दर्भ में सिंह बिम्बों और प्रतीकों की बात करते हैं और ‘‘इस दृष्टि से नयी कहानियों (को) बहुत समृद्ध’’ मानते हुए कहते हैं कि—

नये बिम्ब वस्तुत: नये कहानीकारों के विकसित ऐन्द्रियबोध के सूचक हैं और जो कहानीकार जितना ही संवेदनशील हैं उसकी कहानी का वातावरण उतना ही मार्मिक और सजीव हुआ है।…नयी कहानी में अभीष्ट भाव या विचार की अभिव्यंजना एक साथ ही अनेक स्तरों पर होती है और उसे समग्र रूप में प्राप्त करने के लिए पाठक को उतने स्तरों पर एक साथ संवरण कर सकने की क्षमता प्राप्त करनी होगी। नयी कहानी के प्रसंग में यदि ‘सम्प्रेषणीयता’ का कोई अर्थ हो सकता है, तो (वह) रस-बोध के विविध स्तरों की प्रेषणीयता (हो सकती है)। (सिंह, पृ. 34)

यहाँ सिंह नयी कहानी की प्रशंसा में तर्क गढ़ रहे हैं, इस कारण उसके लिए ‘विकसित ऐन्द्रियबोध’ जैसा शब्द चुनते हैं। जाने-अनजाने वह गैर-नयी कहानी अथवा पारम्परिक और विशेषकर पचास के दशक से पहले की कहानी को ऐन्द्रियबोध के नजरिये से पर्याप्त विकसित नहीं मान रहे हैं, जो आश्चर्य पैदा करता है। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सिंह नयी कहानी के विषय में गम्भीर या सार्थक चिन्तन से बचते हैं। ‘अनेक स्तरों पर’ का जिक्र आता है तो सिंह मार्कण्‍डेय का रवैया अख्तियार करते मालूम होते हैं लेकिन दोनों के मूलभूत नजरिये में गुणात्मक अन्तर है। जहाँ मार्कण्‍डेय राजनीतिक और आर्थिक सच्चाई को दिमाग में रखकर (‘असम विकास’) नयी कहानी को आजादी के बाद का वास्तविक सन्दर्भ दे रहे थे, वहाँ सिंह भाषा, संवेदना, प्रतीक और इन्द्रियबोध का हवाला देकर नयी कहानी को ‘सार्थक’ सिद्ध करने में दिलचस्पी दिखला रहे थे। क्या यह कारण नहीं है कि नयी कहानी से सम्बन्धित मार्कण्‍डेय का तर्क आज के प्रसंग में भी पहले की भाँति उपयोगी है, जबकि बाकी व्याख्याकारों की सोच सीमित और समयबद्ध चिन्तन का बायस बना है।

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मार्कण्‍डेय-नामवर संवाद

यहाँ मार्कण्‍डेय के कहानी चिन्तन की संक्षिप्त व्याख्या जरूरी जान पड़ती  है, कारण कि यह चिन्तन एक साथ बीसवीं सदी में हुए कहानी के विकास को उसकी विभिन्न अवस्थाओं में समझने का इच्छुक है और उसे पचास के दशक से आगे लाकर सत्तर और अस्सी के दशकों की कथा-प्रवृत्तियों से जोड़ने में सक्षम है। छोटी टिप्पणियों, भूमिकाओं और बातचीत या साक्षात्कारों के दौरान उभरे अनेकानेक विचार-बिन्दु मार्कण्‍डेय को आज नये रचनाकार के लिए भी उपयोगी बनाते हैं।

हम अपनी बात एक विशेष जद्दोजहद से शुरू करें, जिसमें मार्कण्‍डेय के वैचारिक हस्तक्षेप के चलते रचना, रूप, यथार्थवाद और परिवर्तनधर्मी, दृष्टिकोण आदि के अनेकानेक पक्ष बहस के दायरे में आये। इस दौरान उस समय की कहानी-सम्बन्धी बहसों में नामवर सिंह और मार्कण्‍डेय के बीच तीखी भिड़न्त भी देखने को मिली, जिससे पूरी कथा आलोचना का चरित्र नये रूप में और नयी संभावनाओं के साथ उजागर हुआ। इस भिड़न्त के मध्य थी निर्मल वर्मा की कथा रचना। सिंह वर्मा के प्रशंसक और समर्थक थे और एक तरह वर्मा की प्रयोगशीलता को आलोचकीय आधार प्रदान करना चाहते थे। मसलन देवीशंकर अवस्थी ने एक उद्धरण के हवाले से कहा है कि नयी कहानी को आलोचक चाहिए था। (अवस्थी, पृ. 15) सिंह के रूप में नयी कहानी को आलोचक मिला हो या न मिला हो, लेकिन निर्मल वर्मा को अवश्य मिल गया था। सिंह का आलोचक-मन-निर्मल वर्मा की आशंसा-अनुशंसा से शुरू होता था और प्रशंसा तक पहुँचता था। बल्कि पूछने का मन होता है कि वर्मा न होते तो सिंह क्या करते? सिंह ने एक लेख में उन दिनों ‘सांकेतिकता’ को नयी कहानी के बीज शब्द के मानिन्द प्रस्तुत करते हुए कहा—

क्या प्रेमचन्द की ‘कफन’ और ‘पूस की रात’ कम सांकेतिक है? जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय आदि ने क्या सांकेतिक कहानियाँ नहीं लिखी हैं? फिर सांकेतिकता को आज की कहानी की विशेषता मानने का क्या मतलब है? सवाल जितना सीधा है, जवाब उतना सीधा नहीं है। भेद शायद मात्रा का ही हो। सांकेतिकता का सहारा पिछली पीढ़ी के लेखक कभी-कभी ही करते थे, जबकि आज का लेखक अकसर इसका सहारा लेता है। लेकिन इससे भी आगे बढ़कर कहा जा सकता है कि पहले की तरह आज की कहानी ‘आधारभूत विचार’ का केवल अन्त में संकेत नहीं करती; बल्कि नयी कहानी का समूचा रूप गठन (स्ट्रक्चर) और शब्द-गठन (टेक्सचर) ही सांकेतिक है। कहानी के दौरान लेखक जगह-जगह संकेत देता चलता है और ये सभी संकेत एक-दूसरे से इस तरह जुड़े होते हैं कि एक संकेत प्राय: किसी पूर्ववर्ती तथा परवर्ती संकेत की ओर संकेत करता जाता है, इस प्रकार आधारभूत विचार द्रवीभूत होकर कहानी के शरीर में भर उठता है कहीं एक जगह स्थिर नहीं रहता देह में जैसे रक्त अथवा प्राण…वास्तविकता यह है कि आधुनिक रचनाकारों ने इसे रचनाक्रिया द्वारा सिद्ध किया है और कहानी के क्षेत्र में इस रचनात्मक संगति की प्रतिष्ठा पहली बार इस युग में हुई है। (सिंह, पृ. 32-33)

यहाँ सिंह का ‘संकेत/सांकेतिकता’ से कुछ ज्यादा ही लगाव दिखता है। यह इस उद्धरण में नौ बार हुआ है। एक जगह तो ‘संकेत की ओर संकेत’ भी है। लेकिन असल चीज है नयी कहानी की पारिभाषिक व्याख्या और पहचान। सिंह के अनुसार संकेत पर आधारित ‘‘इस रचनात्मक संगति की प्रतिष्ठा पहली बार इस युग में हुई है।’’ यहाँ कई जटिल मसले एक साथ नजर आते हैं, जिन पर स्थानाभाव के कारण चर्चा सम्भव नहीं है, फिर भी ‘पहली बार’ और ‘इस युग’ पर गौर किया जा सकता है। यह आलोचकीय उत्साह है या रचनात्मक भावोद्रेक? (उद्धरण में दो बार विस्मयादिबोधक चिह्न मिलता है और रसायन-क्रिया तथा जैविक विज्ञान की शब्दावली का भरपूर प्रयोग है)। मूल प्रश्न समझ को लेकर है। क्या नयी कहानी का महत्त्व यही था कि वह ‘रचनात्मक संगति की प्रतिष्ठा’ करे? फिर तो नये युग में लेखक इसे सीखे बिना लिख भी न सकता था, चूँकि निहित है कि रचनात्मक संगति संरचनावादी नयी आलोचना को पढ़-गुनकर ही हासिल की जा सकती है। या फिर निर्मल वर्मा का कथा पाठ जानकर। रोचक है कि सिंह ‘इस युग’ शब्द का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन युग के मूल चरित्र पर अधिक ध्यान देना उचित नहीं मानते। इसके वि‍परीत सिंह वर्मा की कहानियों पर विचार के दौरान कहते हैं—

निर्मल की कहानियों में प्रभाव की गहराई इसीलिए है कि उनके यहाँ चरित्र, वातावरण, कथानक आदि का कलात्मक रचाव है। कलात्मक रचाव स्वयं रूप के विविध तत्त्वों के अन्तर्गत, फिर वस्तु और रूप के बीच तथा स्वयं वस्तु के अन्तर्गत। पात्र अलग इसलिए याद नहीं आते कि वे परिस्थितियों के अंग हैं। निर्मल के मानव चरित्र प्राकृतिक वातावरण में किसी पौधे, फूल या बादल की तरह अंकित होते हैं गोया वे प्रकृति के ही अंग हैं। ‘परिन्दे’ कहानी की छोटी-छोटी स्‍कूली लड़कियाँ तथा मीडोज, झरने, झाड़ियों, फूलों, चिड़ियों और लड़कियों के स्वर घुल-मिल गये हैं। निसर्ग एक है जिसमें सारे भेद सहज ही मिट जाते हैं। एक हृदय है जो तमाम चीजों को रागात्मक सम्बन्ध में जोड़ देता है। कलाकार का एक स्पर्श है जो सारे अनमेल तत्त्वों को एक ‘रूप’ में रच देता है। (सिंह, पृ. 56)

यह तो हुई सिंह द्वारा निर्मल-रचित कहानी/कहानियों की व्याख्या। अब एक अन्य सुचिन्तित टिप्पणी पर गौर करें—

निर्मल की कहानियों के प्रभाव के पीछे जीवन की गहरी समझ और कला का कठोर अनुशासन है। बारीकियाँ दिखायी नहीं पड़ती हैं तो प्रभाव की तीव्रता के कारण अथवा कला के सघन स्राव के कारण। एक बार दिशा-संकेत मिल जाने पर निरर्थक प्रतीत होनेवाली छोटी-छोटी बातें भी सार्थक हो उठती हैं, चाहे कहानी हो चाहे जीवन। कठिनाई यह है कि वह दिशा-संकेत निर्मल की कहानी में बड़ी सहजता से आता है और प्राय: ऐसी अप्रत्याशित जगह, जहाँ देखने के हम अभ्यस्त नहीं हैं। क्या जीवन में भी सत्य इसी प्रकार अप्रत्याशित रूप से यहीं कहीं साधारण से स्थल में निहित नहीं होता? (सिंह, पृ. 63-64)

मार्कण्‍डेय की कहानी समीक्षा में इन तथा सम्बन्धित पक्षों पर लगभग ब्यौरेवार टिप्पणी मिलती है—विशेषकर वहाँ जहाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सन्दर्भ नयी कहानी के सैद्धान्तिक चरित्र का है, या फिर वर्मा की चर्चित कहानी ‘परिन्दे’ का। साथ ही मार्कण्‍डेय का कहानी सम्बन्धी विश्लेषण असल में व्यापक समाज और संस्कृति के सरोकारों को सम्बोधित है, साहित्य से जुड़े हर मसले में उनका प्रस्थान-बिन्दु परिवेश का परिवर्तनधर्मी यथार्थ ही होता है। वर्मा पर मार्कण्‍डेय की सामान्य टिप्पणी यह है—

जहाँ तक मूल्यांकन का प्रश्न है, निर्मल अपने कहानी-लेखन के शुरुआत के दिनों छज्जे पर ही अटके रहते हैं, इसलिए ‘डायरी का खेल’ की ‘बिट्टो’ और ‘तीसरा गवाह’ की ‘नीरजा’ के स्थान-संकेत के लिए मकान की आखिरी मंजिल से अधिक रुचिकर स्थान उन्हें दूसरा नहीं जान पड़ता। शायद पात्रों को नीचे रखने से जनसम्पर्क का खतरा हो, शायद उनकी उदासी और उनके एकाकीपन की शुद्धता खण्डित हो, शायद नीचे के दु:खी जन-समुदाय में ऊपर की उदासी झूठी और बेमानी लगे, शायद ऊपर से दृश्याँकन की जो शैली लेखक ने अपना रखी है, उसे बदलना पड़े, शायद ऊपर उक्तियों के लिए ही जीवन हो, और अकेले में इन चमत्कृत करनेवाले वाक्यों के अर्थ-बोध से किसी का भी कोई मतलब न रहे, आदि कितने ही ऐसे कारण हो सकते हैं। और हो तो क्या हर्ज है, यदि वे कहानी के पाठ को उसके प्रासंगिक अभिप्राय के साथ आगे बढ़ाये, वे अर्थपूर्ण हों और आज की आधुनिकतम विचार-पद्धति में कुछ जोड़ सकें? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। और है तो मात्र इतना कि लेखक जीवन की वास्तविकताओं से दूर किसी ऐसे रचना संसार में उड़ानें भरता है, जहाँ उसके भीतर का किशोर ही सब-कुछ है—जहाँ कल्पना का सिरजा हुआ दु:ख है, दु:ख की पुरानी लीक। (मार्कण्‍डेय, पृ. 17-18)

द्रष्टव्य है कि जिसे नामवर सिंह ‘सघन रचाव’ कहते हैं उसे मार्कण्‍डेय ‘जन सम्पर्क  के खतरे से’ ग्रस्त मानसिकता कहकर पुकारते हैं। इसी तरह जिसे वर्मा ‘कलाकार का एक स्पर्श’ मानते हैं उसे मार्कण्‍डेय लेखक की उदासी और ‘एकाकीपन की शुद्धता’ कहकर पूरी तरह खारिज करना आवश्यक समझते हैं। सिंह की दृष्टि के केन्द्र में लेखक की निजी रचनाशीलता है तो मार्कण्‍डेय में लेखक नाम के उस व्यक्ति की सांस्कृतिक भूमिका है जो परिवेश को अपने ढंग से समझकर अपनी सामान्य प्रतीति को पाठक से साझा करना चाहता है। तभी मार्कण्‍डेय यह देख पाते हैं कि नयी कहानी का वर्मा-जैसा रचनाकार अपनी ‘शुद्धता’ बचाने में पूरी ताकत खर्च करता है, शुद्ध को खण्डित देखना रचनाकार को गवारा नहीं—जबकि सामाजिक सजगता का वाहक अन्य लेखक शुद्धता को ज्ञान के स्तर पर ले जाना चाहता है कि उसे निजता की शिक्षा का, उसके विकास का अवसर मिले। इस दूसरे लेखक की मंशा ‘प्रासंगिक अभिप्राय’ को आगे बढ़ाने की, अपने एहसास को ‘अर्थपूर्ण’ बनाने और इस तरह से ‘आज की आधुनिक विचार-पद्धति में कुछ जोड़ने’ के लिए सक्षम करने की है। ध्यान रहे कि मार्कण्‍डेय में निजता पर उतना बल नहीं है जितना ‘प्रासंगिक अभिप्राय’ पर, इस कारण वह अभिप्राय को वर्तमान की सच्चाई, उसकी सम्भावनाओं तक ले जाना अभीष्ट समझते हैं। यह एक साथ लेखक के विकास की, और उसके साथ-साथ परिवेशगत सच्चाई के विकास की पूर्व शर्त है। यदि यह न हुआ तो, जैसा मार्कण्‍डेय कहते हैं, लेखक जीवन की वास्तविकताओं से दूर रहेगा और ऐसे संसार में उड़ाने भरेगा ‘जहाँ उसके भीतर का किशार ही सब-कुछ है।’

यह अविकसित होने और रह जाने की सच्चाई है, जिसे सिंह सरीखे व्याख्याकार समझने में असफल रहे। दूसरी ओर, इस ठहराव, इस गतिविहीनता को वर्मा लम्बे समय तक, बल्कि आजीवन ढोने को बाध्य हैं—यह सिलसिला काफी बाद लिखी कहानी ‘लन्दन की एक रात’ तक जाता है। यहाँ मार्कण्‍डेय का तर्क एकबारगी वर्मा के,  और साथ ही उनके अनेकानेक सहधर्मी रचनाकारों के कथासृजन से जुड़ जाता है। यह सार्थक अमूर्तन का, कुछ-कुछ सिद्धान्तीकरण का मसला है। वर्मा की कहानियों को उनकी सम्पूर्णता में देखते हुए मार्कण्‍डेय अमूर्तन का इस्तेमाल इस तरह करते हैं—

वस्तुत: नयी कहानी की पृष्ठभूमि ही आदर्श और रोमान की रही है। अधिकांश नये कहानीकार आजादी के बाद की आदर्शवादी उपलब्धि के दौरान किशोरावस्था से गुजर रहे थे, और उनकी चेतना में आजादी के बाद के जीवन की एक आशा भरी तस्वीर थी। लेकिन निरी कल्पना और रोमान के रंगों से बनी इस तस्वीर का रंग थोड़े ही दिनों में उड़ गया और नये लेखक तेजी से अपने परिवेश के प्रति जागरूक हुए। जिन्दगी की वास्तविकताओं ने उन्हें आ घेरा क्योंकि आदर्शों की यात्रा के लिए किसी अगली मंजिल की आकांक्षा पूरे समाज की चेतना में नहीं बन सकी। ऐसी स्थिति में समूची रचनात्मक चेतना का वर्तमान में सिमटकर एक नयी दृष्टि से जीवन के वास्तविक मूल्यों को आँकना अथवा उद्घाटित करना ही नयी वास्तविकता की कसौटी बन सकता था। (मार्कण्‍डेय, पृ. 18)

यहाँ मार्कण्डेय एक विशिष्ट सन्दर्भ की गहरी व्याख्या के सहारे नयी कहानी के सौन्दर्यमूल से, उसके ‘एस्थेटिक’ से लगभग पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं और स्वयं को एवं पाठक को बतलाने लगते हैं कि ‘नयी दृष्टि से वास्तविक मूल्यों को आँकना अथवा उद्घाटित करना ही नयी वास्तविकता की कसौटी बन सकता था।’ तात्पर्य है कि यह नहीं हो पाया। इसका स्पष्ट कारण भी मार्कण्डेय देते हैं, क्योंकि वर्तमान चेतना ‘वर्तमान में सिमटकर’ रह गयी। जाहिर है कि वर्तमान एक लम्बे इतिहास, वास्तविक और सम्भावित का हिस्सा है, वरना वह मार्कण्‍डेय के शब्दों में ‘निरा वर्तमान’ है।

जिस संवाद की बात यहाँ कही गयी है उसकी परिणति मार्कण्‍डेय के इस कथन से होती है—

‘जब निर्मल की इधर की कुछ कहानियों के सिलसिले में लोग राष्ट्रीय-साहित्य की बात उठाते हैं, तो वे मूलत: अपनी अल्पज्ञता का परिचय देते हैं। परिवेश और पात्र की भिन्नता के कारण नहीं, वरन् अपनी मूल सृजनात्मक प्रेरणा के कारण लेखक भारतीय अथवा अभारतीय हो सकता है। दिल्ली और बम्बई के पात्रों को लेकर लिखी गयी कितनी ही रचनाएं भारतीय दृष्टि और चेतना से दूर हो सकती हैं। मूल बात यह है कि लेखक की दृष्टि समसामयिक भारतीय जीवन और इतिहास को मोड़ देनेवाली प्रवृत्तियों से जुड़ी हुई है या नहीं, अपने देश-काल की चेतना से लेखक का पूरा अस्तित्व आवेष्टित है या नहीं, अपने देश के जीवन की औसत वास्तविकताओं की समझ द्वारा लेखक का पूरा अस्तित्व आवेष्टित है या नहीं, अपने देश के जीवन की औसत वास्तविकताओं की समझ द्वारा लेखक अपने समकालीन समाज की आकांक्षाओं का साथ देता है या नहीं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में शायद बहुत आसानी से कहा जा सकता है कि ‘लन्दन की एक रात’ जैसी कहानी एक सजग भारतीय लेखक ही लिख सकता है।’ (बल मेरा, मार्कण्‍डेय, पृ. 21)

‘बहुत आसानी से’ में कहानी आलोचना के एक हिस्से का गम्भीर सरलीकरण इंगित है। लेकिन जरूरी चीज है ‘समाज की आकांक्षाओं का साथ’ देना जो नयी कहानी में जल्द ही कमजोर होना शुरू हुआ और जिसका अंजाम नयी कहानी आन्दोलन का वैचारिक नेतृत्व हथियाने की जद्दोजहद में बदल गया। फिर, यह जद्दोजहद अन्तत: व्यक्तिगत हितों या मत-सम्मत की न होकर उस वर्गीय समाज की थी जहाँ बड़े हित, विमर्श और मूल्य टकरा रहे थे और जिन्हें उनकी सानुपातिकता और गहराई में दिखलानेवाली कथा परिप्रेक्ष्य के जटिल उभार की प्रक्रिया में उलझी थी।

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मार्कण्डेय की प्रासंगिकता का विशेष पहलू यह है कि वहाँ वक्ती सच्चाई के सन्दर्भ में वाम की आत्मालोचना भी शिद्दत से मौजूद है। दरअसल पचास के दशक का यथार्थवाद आकस्मात आग्रही हुआ था। उसके ऐतिहासिक कारण थे। बीस और तीस के दशकों की साहित्य चेतना जिसमें चिन्तन की अपार सम्भावनाएँ नजर आती थीं। आजादी पश्चात का वक्त आते-आते शासकीय सरोकारों और दबावों से घिरकर विचलन की स्थिति में प्रवेश कर गयी थी। स्वयं मनुष्य-समर्थक चिन्ताओं में अनिश्चितता अथवा अतिशय कटुता और तीव्रता का संचार मिलता था। उस समय के युवा मार्कण्‍डेय का चिन्तन इस प्रश्न से दो-चार होने का साहस कर रहा था और देखता था कि नये की दृष्टि से उपलब्ध को परखना आवश्यक है। इस क्रिया में साहस तो था ही, उत्साह भी था। मार्कण्‍डेय द्वारा की गयी यशपाल की व्याख्या पर गौर करें—

यशपाल की नजर में, मनुष्य रूढ़ परम्परा, अन्धविश्वास, अज्ञान और कुण्ठा का पुञ्ज बन गया है। आर्थिक और सामाजिक दबाव से शोषक वर्ग ने उसकी मूल चेतना और उसके जीवन के बीच एक अनुर्वर पठार बना दिया है, जहाँ कोई भी बीज नहीं उगता। लाख जोतिये, बोइये, श्रम कीजिये, कोई लाभ नहीं। इसलिए जिन्हें जीवन प्रिय है, जो उसे बदलना चाहते हैं, उनका एकमात्र कर्तव्य है इस पठार को तोड़ना, रचना-दृष्टि और जीवन के यथार्थ के बीच पड़े धार्मिक अन्धविश्वास, रूढ़ परम्परा और कुण्ठा की परत को जड़ से उखाड़ फेंकना। नतीजा वही जो आदर्शवादियों का हुआ। वहाँ लेखक ने जीवन से ऊपर एक ऐसी आदर्श स्थिति को अपनी मान्यता का आधार बनाया, जो लेखक की दृष्टि में सत्यों की परम स्थिति थी। जीवन कल्पना के साँचों की वस्तु बन गया और सहज सामाजिक तर्क से कोई अर्थ न दे सकने के कारण रचना के सन्दर्भ से ही च्युत नहीं हुआ, रचनाकार की दृष्टि से भी ओझल हो गया। (मार्कण्‍डेय, पृ. 76)

यहाँ यशपाल की सीमा को दो स्तरों पर दिखलाया गया है—सरलीकरण और आदर्शवादी मानसिकता के स्तरों पर मार्कण्‍डेय की राय यह जान पड़ती है कि यशपाल ने परिवर्तनशील दृष्टि को किताबी अर्थ में ग्रहण किया है—इस कारण यशपाल को शोषक वर्ग के व्यवहार में द्वन्द्व नजर नहीं आता। तभी वह सामाजिक आलोचना को ‘एकमात्र कर्त्‍तव्‍य’ के अन्तर्गत इकहरा बनाते हैं। यहाँ मार्कण्डेय द्वारा ‘कल्पना के साँचों’ की बात की गयी है, जो जाहिर है नकलीपन का द्योतक है। तीस के दशक में यथार्थवाद से जुड़नेवाले कई रचनाकारों का यथार्थबोध एकांगी हो चला था—‘धार्मिक अन्धविश्वास, रूढ़ परम्परा और कुण्ठा की परत को जड़ से उखाड़ फेंकना’ उनकी समझ का अटूट हिस्सा बन गया था। फिर यह पैंतरा आजादी के बाद भी अपनी जगह कायम था। पचास-दशक के प्रतिबद्ध युवा रचनाकारों-चिन्तकों को यह अटपटा महसूस होता था। जहाँ तक आदर्शवाद का सम्बन्ध है, वह भी परिवर्तन-विचार से सम्बद्ध लेखकों को अपनी गिरफ्त में लिये था। आदर्श के कोण से, ‘सत्यों की परम स्थिति’ के नजरिये से देखें तो वह तत्त्व बहुत कम बच रहता है जिसे समर्थन दिया जा सके। मार्कण्‍डेय के अनुसार यशपाल की कठिनाई असल में यह थी। दूसरे, पचास के दशक में यशपाल विशेषकर कहानियाँ लिख रहे थे जिनकी धार बोधकथा-सरीखी दो टूक और तीखी थी, और जो किसी-न-किसी समस्या को केन्द्र में रखकर सामाजिक रवैये पर चोट करती थी। मार्कण्‍डेय ने लिखा—

फलत: यशपाल ने जाहिरा तौर पर जीवन की जिन समस्याओं का चुनाव किया वे प्रगतिशील तो थीं, लेकिन उनसे कहानी की मूल प्रकृति पर कोई असर नहीं आया। कल्पना की देह पर जहाँ आदर्शों की सफेद टोपी थी वहीं, अब लाल कर दी गयी। नतीजा यह हुआ कि कहानी न घर की रही, न घाट की। आदर्शवादियों के साथ थोथी कल्पनाओं के नकली कथानकों का एक हद तक मेल इस मानी में था कि कहानी परम्परा से चले आनेवाले पारिवारिक भावुकतापूर्ण सम्बन्धों का पूरी तरह शोषण करके एक भीगा-भीगा-सा वातावरण उपस्थित करने में समर्थ थी, और इस युग के लेखकों ने शायद इसी कारण परिवार की सीमाओं का जमकर उपयोग किया। यशपाल को इन परम्परा-विहीन मान्यताओं से विरोध था, कहानी की मूल धारणा से नहीं, इसलिए जीवन की विषमताओं में उभरनेवाले यथार्थ चरित्रों की सृष्टि उनके लिए सम्भव नहीं हो सकी। (मार्कण्‍डेय, पृ. 77)

यहाँ कहानी रूप का गम्भीर पक्ष बहस तलब है, जिसके अन्तर्गत लेखकीय दृष्टि तो आती ही है, संवेदना के छुपे स्तर भी प्रकट होते हैं। लेखक के हाथों जो पात्र के चुनाव में घटित होता है वह असल में संवेदना का ही कोई कोना दर्शाता है। यहाँ मार्कण्‍डेय द्वारा प्रयुक्त ‘विषमताओं में उभरनेवाले यथार्थ चरित्रों की सृष्टि’ पर नजर डालें तो पायेंगे कि पात्र लेखक की कल्पना में जन्म न लेकर जीवन-स्थितियों में जन्म लेते हैं, वहाँ उनकी वास्तविकता का गहरा आयाम रहता है। तब लेखक का काम है कथित वास्तविकता पर पैनी निगाह डालना और पात्र की मूर्तता को पकड़ना फिर, जन्म लेना एक चीज है और लेखक के हाथों ‘सृष्ट’ होना, रचित होना दूसरी। यहाँ लेखक की कल्पनाशीलता और उसकी रचना-क्षमता पर निर्भर करता है कि कितनी मूर्तता के साथ पात्र को पाठकीय संसार में प्रक्षेपित किया गया है। उक्त कथन में यह भी नजर आता है कि मार्कण्‍डेय जिसे मुक्तिबोध ने ‘सृजन का क्षण’ कहा है कितनी सूक्ष्मता से समझते हैं। क्या यशपाल में पात्रों का निर्माण करने की यह कल्पनाजन्य क्षमता है? मार्कण्‍डेय इसे प्रेमचन्दोत्तर चालीस के दशक की कथित यथार्थवादी कथा से जोड़ते हैं और पाते हैं कि या तो यह कमजोर यथार्थवाद की है, जिसके अधीन वह मानते हैं कि यशपाल आदर्शवाद के चरित्र को समझ लें और सम्बन्धित पक्षों पर आलोचकीय रवैया अपनायें तो एक सीमा तक यथार्थवादी दिशा में बढ़ सकते हैं। तब यशपाल की यान्त्रिकता में कमी आयेगी और वह कथा के चरित्रों को गतिशील द्वन्द्वात्मकता से लैस कर पायेंगे।

अन्त में प्रश्न उठता है कि इस पुस्तक के लेखों का मूल दृष्टिकोण नयी कहानी धारा को कितना स्वीकार करता है कितना वह इस धारा के लेखकों को समर्थन या सहानुभूति प्रदान करता है और कितना उनकी सीमाओं अथवा मुश्किलों को रेखाँकन करता है। यह तो मसलन साफ है कि जिस तरह देवीशंकर अवस्थी, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव आदि नयी कहानी को लकीर के एक तरफ मानकर चलते हैं वैसा मार्कण्‍डेय नहीं करते। इस कारण वह बार-बार अपने विवेचनों में यथार्थवाद, चित्रण, प्रकृतवाद, लेखकीय संवेदना आदि को लाते हैं। अवस्थी, यादव आदि की चिन्ताएँ राजनीतिक-सामाजिक नहीं हैं, न वे साहित्य को संस्कृति के विशेष आयाम की तरह मानते हैं। इसके विपरीत मार्कण्‍डेय साहित्यिक रचनाओं की व्याख्या उन्हें देश-समाज की व्यापक समस्याओं के बीच रखकर ही करते हैं। इस पुस्तक के निबन्ध यह स्थापित करते हैं कि साहित्य की अर्थवत्ता का स्रोत विकासमान और परिवर्तनधर्मी समाज ही है, वहीं से रचना को ऊर्जा मिलती है और वहीं रचना की मनुष्य-समर्थक सक्रियता और भूमिका का वास्तविक निर्माण होता है। मसलन, अमरकान्त के हवाले से मार्कण्डेय कहते हैं कि—

जीवन के बाहर वह परम शक्ति, जो कभी सारे आनन्दों का केन्द्र थी आज प्रेरणाहीन हो उठी है और मनुष्य आकाश के बजाय जमीन को देखने लगा है। इसलिए आनन्द और वास्तविक परिवेश-विहीनता का वह काल प्राय: समाप्त हो चला है। यह संसार ही प्रमुख स्थल है, और इस कारण यह जीवन ही आनन्द का स्रोत हो सकता है। इसलिए आज की कला जीवन के आधुनिकतम साक्ष्य में ही आधुनिक वस्तु की प्राप्ति कर सकती है। ऊपरवाले की तरह जीवन कोई ठहरा हुआ भावबोध नहीं, वरन एक निरन्तर परिवर्तनशील सचेत प्रक्रिया है, जिसमें समय और उसके अन्तराल का बड़ा महत्त्व है। त्रिभुज के तीन कोणों पर लेखक की चेतना, पात्र की चेतना और उसका परिवेश तथा युग-बोध, जिसे तत्कालीन समाज की औसत सच्चाई की चेतना कह सकते हैं, बैठे हुए हैं। इन्हीं के पारस्परिक समवाय से नये जीवन की अधिकतम वास्तविकताओं का चित्रण सम्भव है। (मार्कण्‍डेय, पृ. 32-33)

यहाँ समाज के सार्थक पक्ष को सिद्धान्त के स्तर पर परिभाषित किया गया है। इसे मार्कण्‍डेय की कथा-समीक्षा में अमूर्तन का जरूरी हस्तक्षेप कहा जा सकता है। इस उद्धरण में जो चीज प्रभावित करती है वह है सांस्कृतिक माहौल पर लेखक की बेलाग टिप्पणी। पूरी पुस्तक में व्याप्त तर्कशीलता का यह तेवर सहमति-असहमति से आगे विचारवान पाठक को सोच के अनेक बिन्दु प्रदान करता है। पुस्तक की सार्थकता इसकी समयबद्धता और प्रश्नशीलता में है।

सन्दर्भ-
1.     अवस्थी, देवीशंकर, सं. नयी कहानी : सन्दर्भ और प्रकृति, दिल्ली, राजकमल, 1973
2.    त्रिपाठी, प्रकाश, सं. मार्कण्‍डेय : परम्परा और विकास, इलाहाबाद : वचन पब्लिकेशन्स, 2010
3.    बलभद्र और दुर्गाप्रसाद, सं., चक्रधर की साहित्यधारा : मार्कण्‍डेय का साहित्य संवाद, इलाहाबाद, लोकभारती, 2012
4.    मार्कण्‍डेय, कहानी की बात, इलाहाबाद, लोकभारती, 1989
5.    सिंह, नामवर, कहानी : नयी कहानी, इलाहाबाद, लोकभारती, 1989
6.    यादव, राजेन्द्र, सं. एक दुनिया समानान्तर, नयी दिल्ली, राधाकृष्ण, 1993

गोरखपुर फिल्म महोत्सव यानी जनता का सिनेमा : आनन्द कुमार पाण्डेय

cinema of resistance

‘ जनता का जीवन साहित्य और कला के लिए कच्चे माल की खान है। एक ऐसा कच्चा माल जो अपने स्वभाविक रूप में होता है। एक ऐसा कच्चा माल जो अनगढ़ होते हुए भी अत्यन्त सप्राण, समृद्ध और मौलिक होता है, इसके साथ तुलना करने पर समस्त कला साहित्य बिल्कुल फीका जान पड़ता है , यह साहित्य और कला का अनंत स्रोत है, उसका एकमात्र स्रोत है। 

 -माओ त्से तुड. (येनान की कला साहित्य गोष्ठी में भाषण)

 आज से आठ वर्ष पूर्व जब गोरखपुर फिल्म महोत्सव की शुरूआत हुई तब उसने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में बरसों से चली आ रही बहस को पुन: नई गति दे दी कि ‘कला- कला के लिए या ‘कला- समाज के लिए होनी चाहिए। इस बहस का दायरा  शुरुआत में भले ही सीमित क्षेत्र में रहा किन्‍तु जैसे-जैसे फिल्म महोत्सव तथा उससे जुड़ी कलात्मक व सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की श्रृंखला आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे यह बहस पुन: केन्द्र में आती जा रही है। ऐसे समय में जब शास्त्रों के बड़े-बड़े जानकार एक स्वर में बाजारवादी व्यवस्था के विजयी होने तथा आदमी के उपभोक्ता रुप में बदल जाने की बात दावे से कर रहे हैं और राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में मूल्यविहीनता की बात कर रहे हैं, प्रगतिशील और जनवादी खेमे द्वारा ऐसे फिल्म महोत्सव का आयोजन उनके लिये आश्‍चर्यजनक है जिसे ‘ प्रतिरोध का सिनेमा’ नाम दिया गया हो। मैं आगे बढ़कर इसे ‘जनता का सिनेमा’ कहना पसन्द करता हूँ। यह जनता का सिनेमा इसलिए है क्योंकि इसने मानवीय जीवन के यथार्थ को वैचारिक तथा संवेदनशील दृष्टिकोण से स्वयं जनता को दिखाने का बीड़ा लिया है। आयोजन ने बाजार को पसन्द आने वाली ‘ मात्रा तथा जनता के पक्ष में अच्छी चीज’  गुण  के बीच के  अन्तर्विरोधों को भी जन्म दिया और साल दर साल सुरुचि का परिष्कार किया जो किसी भी अच्छे माध्यम का मानक होता है। आज के समय में जब अधिकतर पढ़े-लिखे लोग कला और साहित्य में बाजार के दबदबे की बात करते हैं और सभी चीजें को बाजार से नियंत्रित होने का वर्णन पूरे मनोयोग से करते हैं तो उनकी बात आधारहीन नहीं लगती, बल्कि वैकल्पिक संस्कृति के निर्माण में लगे लोगों को सजग करती है। यह फिल्म महोत्सव इसकी जन संस्कृति के प्रति सजगता का परिणाम है। यह उस विकल्पहीनता के विरुद्ध एक जोरदार आवाज है जो हमारे और आपके मन में बाजारू संस्कृति के पक्ष में उनके सिनेमा, उसके सांस्कृतिक मूल्य के लिए बैठायी जा रही है।

फिल्म महोत्सव आयोजित करने की वैचारिकी जब यर्थाथ रूप में जनता के सामने आयी तब उसने और जादुई काम किया। गोरखपुर परिक्षेत्र जो मूलत: किसानों और मजदूरों का क्षेत्र है, बाजार के बीच अपनी संस्कृति अपने नजरिए के  फिल्मी चित्रण को काफी समय से विवश पा रहा था। यहाँ यह बात बतानी जरूरी है कि जनता के पक्ष में जनता का सिनेमा न बनना और यदि कहीं बन रहे हों, उसे यहाँ न दिखाना बाजार और पूँजीवादी व्यवस्था के लिए दोहरे फायदे की थी। बाजार ने भोजपुरी क्षेत्र के साथ यानी मजदूरों-किसानों के इस क्षेत्र की संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया है। आज भोजपुरी गानों, फिल्मों, नृत्य की अश्‍लीलता का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। सामाजिक दायित्व और संवेदनशीलता से मुँह मोड़कर ये फिल्में युवाओं एवं बच्चों को भ्रष्ट कर रही हैं। अश्‍लील संस्कृति का निर्माण मजदूर समाज के लिये खास तौर पर किया जाता है। इससे एक तो वह शोषण के विरुद्ध एकजुट नहीं होता। दूसरी ओर वह अच्छे उपभोक्ता साबित होते हैं। गोरखपुर फिल्म महोत्सव इस खतरे को ध्यान में रखता है।

आज भारत एक सांस्कृतिक संकट का सामना कर रहा है। लोगों की इच्छाओं  तथा आशाओं के विपरीत उन्हें लगातार ऐसे साहित्य का सामना करना पड़ रहा है, उसके बीच रहना पड़ रहा है जो उनके जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। सिनेमा, कहानी, कविता और अन्य विधाओं में आम जनता का दुख केन्‍द्रीय स्थान में नहीं है। क्या हम और आप किसी ऐसी फिल्म के बारे में जानते हैं जो किसानों की आत्महत्या पर बनी है ? बेरोजगार युवा के वास्तविक जीवन को चित्रित करती हो ? मजदूरों के कठिन जीवन को पर्दे पर दर्शाती हो या समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को महिलाओं के नजरिए से दिखाती हो ? एक समझदार और ईमानदार नागरिक का उत्तर होगा- नही । वैकल्पिक संस्कृति के निर्माण में लगे लोग पूँजीवादी संस्कृति के खतरनाक उद्देश्यों को बखूबी जानते हैं। इसलिए उनका लगातार प्रयास इस तरह की संस्कृति जिसे हम बाजारू संस्कृति कह कर बुला सकते हैं, घेर कर समाप्त करना होता है। गोरखपुर सहित अन्य शहरों में होने वाला फिल्म महोत्सव इसी की दिशा में एक प्रयास है।

पिछले आठ वर्षों में हमने बहुतेरी ऐसी फिल्में देखी जिन्होंने मेहनतकश जीवन के यथार्थ को, निम्न मध्यम वर्गीय विडम्बना को, अमानवीय राजसत्ता और सम्पतिशालियों के पक्ष में खड़ी शासन व्यवस्था का समझ में आ सकने वाला फिल्माँकन हमारे सामने प्रस्तुत किया। इसी महोत्सव के माध्यम से  हमने जाना कि ईरान और जापान हमसे दूर नहीं है और लैटिन अमेरिका की जनता के  मुद्दे और संघर्ष तो बिल्कुल हमारी तरह हैं। महान फिल्मकारों की फिल्मों ने हमारे वर्गीय दृष्टिकोण को साफ किया।

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी एक काम जाने-अनजाने करती है। इसने गोरखपुर परिक्षेत्र के लोकतांत्रिक, वामपंथी और जनता के प्रति लगाव रखने वाले लोगों को एक मंच दिया है। इस महोत्सव में कला की विविध विधाएं हैं जो एक ही सरोकार यानी ‘ जनता के पक्ष में’ खड़ी होकर सुसंस्कृति का प्रचार करती हैं। इस महोत्सव में मंचित नाटक, पोस्टर, कवि गोष्ठी सभी जनता के साहित्य हैं और जोर-शोर से यही बात रखती हैं कि जनता के पक्ष में साहित्य और संस्कृति की हरेक विधा को खड़ा होना चाहिए जैसे हारमोनियम कई उंगलियों से बजता है लेकिन धुन एक निकलती है।

कुल मिलाकर इसका असर क्या हुआ है ? इसके आगे चुनौतियाँ क्या है ? इस फिल्म महोत्सव से महानगरों में बैठे बुद्धिजीवियों के पास यह संदेश गया है कि सुदूर शहरों, कस्बों और देहात के लोगों के पास एक अच्छी कलात्मक समझ है जो जीवन मूल्य को कला मूल्यों और उत्कृष्टता के साथ मिलाकर देख-समझ सकते हैं। यानी जनता के लिए यह दोहरे फायदे वाला साबित हुआ है। एक ओर हम अपनी समझ को विकसित कर रहे हैं जिसे देहात में ‘मांझ कर चमका देना’ कहते हैं। दूसरी ओर महानगरीय बुद्धिजीवियों के भ्रम को भी दूर कर रहे हैं कि जनता नासमझ नहीं होती है। बहुत सारी बाजारू और घटिया फिल्में जनता इसलिए देख लेती है क्योंकि उसके पास विकल्प का अभाव होता है। इस आयोजन ने उन्हें फिल्मों के, गीतों के, कविताओं के और अन्य माध्यमों के विकल्प उपलब्ध कराए हैं।

आयोजन में होने वाली बहसें जनकवियों, साहित्य प्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का आम लोगों से परस्पर सम्बन्ध बनाती हैं। यह वार्षिक आयोजन एक प्लेटफार्म की तरह काम करता है जिसमें समकालीन भारतीय राजनीति, जन आंदोलन और जनता के संघर्ष के विषय में बातचीत होती है। समाजवाद के लिए लड़ाई की यह अनिवार्य मांग है। सांस्कृतिक मोर्चे पर लड़ाई और विजय के बिना समाजवाद स्थिर नहीं रह सकता। यह बड़े गर्व की बात है कि गोरखपुर ने इस दिशा में इस तरीके से पहल की। अब लोगों को महोत्सव का इंतजार होता है और यह महोत्सव के आयोजकों के लिए पुरस्कार है।

किन्तु इसकी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। पहली चुनौती आर्थिक है। हम सभी जानते हैं कि तीन से चार दिन चलने वाले इस आयोजन में भारी खर्च होता है और किसी प्रकार का कोई प्रायोजन इसके लिए स्वीकार नहीं किया जाता। इसलिए काम और कठिन हो जाता है किन्तु जनता का सिनेमा, जनता के सहयोग से अन्तत: सम्पन्न हो जाता है। हर वर्ष यह सहयोग बढ़ता ही गया है। एक और चुनौती इस प्रयोग को विस्तारित कर छोटे शहरों से कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाने की है। पिछले वर्ष आजमगढ़ और बलिया में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन ने आश्‍वस्त किया कि प्रतिरोध का सिनेमा इस दिशा में सोच ही नहीं रहा, बल्कि पहल  भी ले रहा है। पहले की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर और ध्यान देने योग्य है। एक भिन्न किस्म की चुनौती उन बौद्धिकों की ओर से आ रही है जो इस आयोजन को लेकर तरह -तरह की शंकाए पैदा कर रहे हैं और कई तरह के आरोप लगाते हैं। गोरखपुर से लेकर दिल्ली तक इस तरह की चर्चा को जन्म दिया जा रहा है। विशेषकर ऐसे बुद्धिजीवियों द्वारा जो जनता से स्वयं कटे हुए हैं और पूँजीवादी प्रचार तंत्र की ताकत में बहुत भरोसा करते हैं। दुर्भाग्‍य से उसमें कुछ ऐसे बुद्धिजीवी भी शामिल हो गए हैं जो स्वयं को वामपंथी कहते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों की स्थिति दोजख और जन्नत के बीच खड़ी दीवार पर बैठने वालों की सी है। ऐसे बुद्धिजीवी हाथ में कम्पास रखते हुए दूसरों से दिशा पूछते हैं यानी स्वविवेक का प्रयोग नहीं करते। किन्तु अन्तिम रूप से मामला उनके पक्ष में जाता है जहाँ जनता खड़ी है। इस फिल्म महोत्सव ने न  केवल अच्छी फिल्में दिखाई हैं बल्कि समकालीन बहसों में योगदान भी दिया है। इसलिए जनता का यह सिनेमा मेरे लिये जनता के लिये समाजवादी मूल्य संजोने वाला प्रयास है। एक प्रयास जो निरन्तर सफल हो रहा है।

(गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के  आठवें आयोजन  के अवसर पर जारी स्मारिका  से साभार)

विज्ञान परिषद, प्रयाग के सौ साल : अनुराग

vijnana parishad prayag

समाज को चेतना संपन्‍न और प्रगतिशील बनाने के लिए जन-जन तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचना जरूरी है। यह महत्‍ती कार्य करते हुए ‘विज्ञान परिषद प्रयाग’ को सौ साल हो गए हैं। हिंदी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित यह देश की ऐसी एकमात्र संस्था है जो विगत सौ वर्षों से निरंतर यह कार्य कर रही है।

‘विज्ञान परिषद प्रयाग’ की नींव 10 मार्च 1931 को म्‍योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद में रखी गई। उद्देश्य था- हिंदी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के प्रचार-प्रसार और लो‍कप्रियकरण को प्रोत्‍साहन देना। इसके संस्‍थापक चार सदस्‍यों में डॉक्‍टर गंगानाथ झा(संस्‍कृत), प्रोफेसर हमीदुद्दीन साहेब(अरबी-फारसी), रामदास गौड़ (रसायन विज्ञान) और पंडित सालिगराम भार्गव(भौतिकी) अपने-अपने विषयों के विद्वान थे।

परिषद के पहले सभापति सर सुंदरलाल थे। बाद में डॉक्‍टर एनी बेसेंट, सी.वाई; चिंतामणि, डॉक्‍टर गंगानाथ झा, डॉक्‍टर रामचरण मेहरोत्रा, डॉक्‍टर यशपाल, डॉक्‍टर डी.डी. पंत, प्रोफेसर एम.जी.के. मेनन जैसे विख्‍यात वैज्ञानिक इस परिषद के सभापति रहे। पंडित मदन मोहन मालवीय 12 वर्षों तक परिषद के उपसभापति रहे।

भारत में पुनर्जागरण के साथ-साथ यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस की जाने लगी थी कि विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर भारतीय भाषाओं में भी पुस्तकें उपलब्ध हों। इसके लिए कुछ संस्‍थाओं द्वारा और व्‍यक्तिगत स्‍तर पर थोड़े-बहुत प्रयास भी किए गए। लेकिन, बड़े स्‍तर पर यह कार्य विज्ञान परिषद की स्‍थापना के बाद हुआ।

उस दौरान विज्ञान पत्रिकाएं प्रकाशित नहीं हुआ करती थीं, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं में विज्ञान से संबंधित विषयों के लेख खूब प्रकाशित होते थे। ‘सरस्‍वती’ के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्‍याम सुंदर दास और गुलाबराय ने साहित्‍य सृजन के साथ-साथ विज्ञान लेखन भी किया। इनके अलावा और उस काल के कई  अन्य लेखकों ने भी वि‍ज्ञान वि‍षयों पर लि‍खा।

विज्ञान परिषद ने विज्ञान साहित्‍य के सृजन को प्रोत्‍साहित करने के लिए अप्रैल 1915 में ‘विज्ञान’ नामक मासिक का पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके पहले संपादक श्रीधर पाठक बने। रामदास गौड़ ने भी कई वर्षों तक इसका संपादन कि‍या। डॉ. गोरखप्रसाद, डॉ. सत्‍यप्रकाश, डॉ. रामचरण मेहरोत्रा, डॉ. हीरालाल नि‍गम, डॉ. देवेंद्र शर्मा जैसे प्रख्‍यात वैज्ञानि‍क इस पत्रि‍का के संपादक रह चुके हैं। यह हिंदी की सबसे पुरानी विज्ञान पत्रिका है और अपने शुरू होने के बाद से निरंतर और बिना किसी रुकावट के प्रकाशित हो रही है। आगामी 14 अप्रैल को इसके प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे।

विज्ञान परिषद ने जब काम शुरू किया था, उस समय शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत कम था। हिंदी में विज्ञान लेखन करने वालों की संख्‍या नगण्‍य थी। इसलिए लोगों को हिंदी में लिखने के लिए बहुत प्रेरित करना पड़ता था। यह बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य था। परिषद ने इस चुनौती को स्‍वीकार किया। ‘विज्ञान’ के तत्‍कालीन संपादक डॉ. सत्‍यप्रकाश ने विभिन्‍न विषयों के लिए संपादक मंडल बनाया। इसमें गोरखप्रसाद (गणित), रामशरण दास (जीवविज्ञान), स्‍वामी हरिशरणानंद (आयुर्विज्ञान) शामिल थे।

हालांकि, उस समय अंग्रेजी और अंग्रेजियत का बोलबाला था। फिर भी, तत्‍कालीन संपादकों और परिषद से जुड़े लोगों ने कई लेखकों को विज्ञान लेखन से जोड़ा और कई पुस्‍तकें हिंदी में लिखवाईं। इनमें सौर परिवार, फोटोग्राफी सिद्धांत और प्रयोग, उपयोगी नुस्‍खे एवं तरकीबें, स्‍वास्‍थ्‍य एवं रोग, हमारी शारीरिक रचना जैसे विषयों को शामिल किया गया। परिषद ने भारतीय वैज्ञानिकों के जीवन एवं कृतित्‍व पर भी कई पुस्‍तकें प्रकाशित कीं जिससे देशवासियों को भारतीय वैज्ञानिकों के कार्यों की जानकारी मिल सके।

विज्ञान के प्रसार में हीरालाल खन्‍ना, रामदास गौड़, गोरखप्रसाद, सत्‍यप्रकाश, फूलदेव सहाय वर्मा, महावीर प्रसाद श्रीवास्‍तव, श्रीरंजन आदि ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्‍होंने अपने व्‍याख्‍यानों के जरिये, आम लोगों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने का प्रयास किया। देश में आजादी से पहले ही 12वीं तक की विज्ञान की पढ़ाई हिंदी में करने की स्‍वीकृति मिल गई थी। इस तरह इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई हिंदी में होने लगी थी। इसलिए पारिभाषिक शब्‍दकोश की जरूरत पड़ी। इस दिशा में परिषद ने अमूल्‍य योगदान दिया।

इसके अलावा परिषद ने विज्ञान संचारकों और लेखकों की एक लंबी जमात तैयार की। 1950-60 के दशक के मध्‍य में परिषद के विद्वान डॉक्‍टर सत्‍यप्रकाश, डॉक्‍टर गोरखप्रसाद व डॉक्‍टर रामदास तिवारी आदि ने विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नए शोधों को हिंदी में प्रकाशित करने का विचार किया। इसके लिए 1958 में परिषद द्वारा प्रथम हिंदी त्रै‍मासिक शोध पत्रिका ‘विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका’ का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इस शोध पत्रिका को देश की प्रमुख सरकारी व अर्धसरकारी वैज्ञानिक संस्‍थाओं के अतिरिक्‍त विश्‍व के 25 से अधिक देशों में भेजा जाता है।

आरंभि‍क वर्षों में परि‍षद का अपना स्‍थायी भवन नहीं था। 1953 में इलाहाबाद वि‍श्‍ववि‍‍द्यालय ने परि‍षद को करीब चार एकड़ भूमि उपलब्‍ध कराई। पंडि‍त जवाहर लाल नेहरू ने 4 अप्रैल 1956 को इसके वर्तमान भवन का शि‍लान्‍यास कि‍या। आगे चलकर चार एकड़ परि‍सर में तीन मंजि‍ला भवन तथा सभागार बना लिया गया। यह इलाहाबाद वि‍श्‍ववि‍द्यालय के वि‍ज्ञान संकाय से लगा हुआ है।

इक्‍कीसवीं सदी के आगमन के कुछ वर्ष पूर्व परि‍षद ने अपनी गति‍वि‍धि‍यों को नए आयाम दिए तथा देश के वि‍भि‍न्‍न नगरों में शाखाएं खोलीं। इनमें जोधपुर, दि‍ल्‍ली, बड़ोदरा, रोहतक, लखनऊ, वाराणसी, चि‍त्रकूट और इलाहाबाद शाखा प्रमुख हैं।

परि‍षद वि‍ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लि‍ए देश की प्रमुख संस्‍थाओं के साथ मि‍लकर जगह-जगह संगोष्‍ठि‍यों और कार्यशालाओं को आयोजन करती है। साथ ही, प्रति वर्ष विज्ञान संबंधी व्याख्यानों का भी आयोजन किया जाता है।

वि‍ज्ञान परि‍षद के पुस्‍तकालय में 1960 से अब तक पि‍छले 50 वर्षों के वि‍भि‍न्‍न अंतरराष्‍ट्रीय शोध जर्नलों का अनूठा संग्रह है। वि‍श्‍वभर के लगभग 25 जर्नल यहां नि‍यि‍मि‍त रूप से आते हैं। हिंदी में लोकप्रि‍य वि‍ज्ञान की अनेक पत्रि‍काएं और हजारों वि‍ज्ञान की पुस्‍तकें भी यहां उपलब्‍ध हैं। परि‍षद ने वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सहयोग से भारत के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर मेघनाद साहा के समग्र साहित्य के हिंदी अनुवाद का महती कार्य किया है। यह कार्य ‘चिंतन के विवि‍ध आयाम’ शीर्षक के अंतर्गत तीन खंडों में प्रकाशित किया है।  इसके अलावा कई महत्‍वपूर्ण कि‍ताबों का परि‍षद ने अनुवाद कर प्रकाशि‍त कि‍या।

बाजार के दबावों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद थे गणेश पाइन

ganesh pyne

पेंटर ऑफ डार्कनेस के नाम से मशहूर चि‍त्रकार गणेश पाइन का 12मार्च 2013 को नि‍धन हो गया। जन संस्‍कृति‍ मंच की ओर से श्रद्धांजलि‍-

नई दिल्ली: बाजार के दबावों और उसकी शर्तों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद की तरह सृजनरत रहने वाले मशहूर चित्रकार गणेश पाइन का मंगलवार 12  मार्च को कोलकाता के एक अस्पताल में दिल के दौरे से निधन हो गया, सीने में दर्द के कारण उन्हें सोमवार को वहाँ भर्ती किया गया था।

1937 में जन्मे गणेश पाइन आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी के कलाकार थे और कई मामले में अपने समकालीनों में सर्वथा अलग थे। अपनी कला के प्रचार के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाले गणेश पाइन लोकस्मृतियों, परम्‍परा और जनजीवन को एक कलाकार की कल्पना से जोड़कर पेश करने के लिए चर्चित रहे। उन्होंने इसका जिक्र कई बार किया कि कैसे उन्होंने एक बूढ़े मोची का चित्र बनाया, तो पूरा होने पर ध्यान में डूबे किसी दार्शनिक की तरह लगने लगा, कि कैसे किसी सफाई मजदूर का चित्र उन्होंने बनाया, तो उसका चेहरा कवि की तरह नजर आने लगा। अपने चित्रों में वस्तु या यथार्थ को हुबहू पेश करने की बजाय उसे अपनी मनःस्थितियों के अनुरूप पेश करना उन्हें ज्यादा भाता था। और यह मन  मानो दादी माँ की कथाओं में मग्न बच्चे का मन था, जहाँ ‘हत्यारा’ अचानक कहीं से नहीं टपक पड़ता था, बल्कि अतीत से निकलकर आता था, लोककथाओं से निकले किसी पुराने योद्धा की वेशभूषा में पुराने किस्म की ही तलवार लेकर। वे बताते थे कि बचपन में दादी माँ के मुँह से सुनी कहानियों का भी असर उनके चित्रों पर था। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र मानो आज के हत्यारों की वंश परम्‍परा का दस्तावेज है। राजा, रानी, सौदागर, रथ आदि उनके चित्रों में नजर आते हैं- एक पूरा अतीत है, जिसे आजादी के बाद की पीढ़ी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जो विभिन्न रूपों में उसके अवचेतन का हिस्सा बने हुए हैं। यहाँ यह गौर करने लायक है कि अन्य भारतीय कलाकारों की तरह मिथकीय देवी-देवता, महापुरुष या ऐतिहासिक राजा-रानी को उन्होंने अपने चित्रों का विषय नहीं बनाया, बल्कि वे नामहीन हैं, किसी ऐतिहासिक या मिथकीय संदर्भ से उनका नाता नहीं है। गणेश पाइन के एक चित्र का शीर्षक ही है- ‘एक प्राचीन पुरुष की मृत्यु’। वे प्राचीन दुनिया की कल्पनाओं में हमेशा खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे, भविष्य की कल्पनाएं उन्हें भाती थी, उन्हें टीवी पर साइंस फिक्शन वाले सीरियल देखना पसंद था। कविताओं में उनकी दिलचस्पी थी और जीवनानंद दास उनके प्रिय कवि थे।

उन्हें पेंटर ऑफ डार्कनेस यानी अंधेरे का चित्रकार भी कहा गया, क्योंकि मौत की छाया उनके कई चित्रों में दिखती है। इसका कारण वे बताते थे कि नौ साल की उम्र में ही 1946 में उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों को करीब से देखा था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा तथा इसके अलावा कई प्रियजनों के बिछड़ने का भी असर पड़ा। कोलकाता गवर्नमेंट कॉलेज के स्नातक  गणेश पाइन ने लम्‍बे समय तक एनिमेटर का काम किया। वे अपने चित्रों पर वाल्ट डिजनी के कार्टूनों का प्रभाव भी मानते थे। अपने बेहतरीन रेखाँकन के लिए भी उन्हें जाना गया। लेकिन इससे भी ज्यादा वे अपने चित्रों की खास शैली के लिए मशहूर रहे। टेंपरा माध्यम में काम करना उन्हें पसंद था।

गणेश पाइन की जिंदगी भी अपने समकालीन आधुनिक चित्रकारों से सर्वथा अलग थी। करीब पाँच दशक के अपने कैरियर में उनका ज्यादा समय कोलकाता में ही गुजरा, वे आयोजनों और समारोहों से प्रायः बचते रहे। यद्यपि पश्चिम की तमाम आधुनिक कला शैलियों से वे परिचित थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन पर अवनींद्रनाथ टैगोर के अतिरिक्त हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज्यादा असर है। पाइन भारत के उन गिने-चुने कलाकारों में थे, जो पश्चिम की आधुनिक कला और उसके बाजार से कभी आतंकित नहीं हुए। भारत के अतिरिक्त पेरिस, लंदन, वाशिंगटन और जर्मनी सहित दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई गईं। एमएफ हुसैन गणेश पाइन के प्रशंसकों में थे। कुछ लोगों की राय है कि इसने भी उनके चित्रों की कीमत बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की, लेकिन खुद वे बाजार के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि उनके चित्रों का दुर्लभ होना ही उनको मूल्यवान बनाता था।

गणेश पाइन ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में कला पर बाजारवाद के बढ़ते दबाव के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ‘पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मकसद थी। अब कला की बिक्री बढ़ने से जहाँ चित्रकारों को लाभ हुआ है, वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है।’ हालाँकि कला को अपने जीवन का मकसद बताते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि ‘रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोजी-रोटी भी चलती है। जहाँ तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूँ।’ उनका मानना था कि ‘कला समाज का सौंदर्य है। अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा।’

अपनी ही शर्तों पर खामोशी से अपना काम करने वाले, बाजार की शर्तों को नामंजूर करते हुए कला और स्मृति की अपनी परम्‍परा के साथ अविचल सृजनरत रहने वाले इस विलक्षण भारतीय चित्रकार को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

अपनी भाषाओं का विस्थापन : मृणालिनी शर्मा

union public service commission

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा से भारतीय भाषाओं का परचा खत्‍म करने और अंग्रेजी का वर्चस्‍व बढ़ाने के दूरगामी दुष्‍परि‍णामों पर मृणालि‍नी शर्मा का आलेख-

आखिर संघ लोक सेवा आयोग पर अंग्रेजी का झंडा फहर ही गया। 2013 में संघ की भारतीय प्रशासनिक और अन्य केंद्रीय सेवाओं में भर्ती के लिए सिविल सेवा परीक्षा के रूप में होने वाली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा से भारतीय भाषाओं का परचा आखिर गायब हो गया। यों इसकी शुरुआत 2011 में ही प्रारंभिक परीक्षा (नया नाम: अभिक्षमता परीक्षण उर्फ एप्टिट्यूट टेस्ट) में कर दी गई थी, जिसमें कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1979 से चली आ रही प्रारंभिक परीक्षा में संशोधन करने के बहाने अंग्रेजी का ज्ञान पहले चरण पर ही अनिवार्य कर दिया गया था।

कुछ छिटपुट विरोध की आवाजें उठीं, मामला जनहित याचिका के जरिए अदालत में भी चल रहा है। लेकिन समूचे हिन्‍दी क्षेत्र में- दिल्ली से लेकर इलाहाबाद, पटना, जयपुर, भोपाल तक- कहीं कोई ऐसा सार्वजनिक विरोध नहीं हुआ जो सरकार को दो वर्ष बाद (2013 की) मुख्य परीक्षा में भारतीय भाषाओं को पूरी तरह से बाहर करने के बारे में चेताता। नतीजा सामने है। दो साल के अंदर-अंदर अंग्रेजी का रथ विजयी भाव से मुख्य परीक्षा तक पहुँच गया। चंद शब्दों में कहा जाए तो नई प्रणाली में कोई भारतीय भाषा न जानने के बावजूद अभ्यर्थी आइएएस या किसी भी केंद्रीय सेवा में जाने का हकदार है। बस अंग्रेजी जरूर आनी चाहिए।

पहले कुछ तथ्य। कुछ दिन पहले घोषित नई परीक्षा प्रणाली के तहत सामान्य ज्ञान के तीन-तीन सौ के दो परचों के स्थान पर ढाई सौ-ढाई सौ अंकों के चार परचे होंगे। छह-छह सौ अंकों के दो वैकल्पिक परचों के बजाय ढाई-ढाई सौ अंकों के एक ही वैकल्पिक विषय के दो परचे होंगे। यहाँ तक तो चलो ठीक है। तीन सौ नंबरों का जो एक और परचा होगा उसके दो खंड होंगे। दो सौ नंबर का निबंध और सौ नंबर का अंग्रेजी ज्ञान आदि। पुरानी प्रणाली में अपनी किसी भी भारतीय भाषा का दसवीं तक का ज्ञान अनिवार्य था, जो अब समाप्त हो गया है।

आइए, इस नई प्रणाली को कोठारी आयोग की मूल अनुशंसाओं के आईने में परखते हैं। कोठारी आयोग (1974-76) ने अपनी सिफारिश (अनुशंसा 3.22; शीर्षक- भारतीय भाषा और अंग्रेजी) में स्पष्ट रूप से लिखा- ‘अखिल भारतीय सेवाओं की नौकरी में जाने के इच्छुक हर भारतीय को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कम से कम एक भाषा का ज्ञान जरूरी होना चाहिए। अगर किसी को इस देश की एक भी भारतीय भाषा नहीं आती तो वह सरकारी सेवा के योग्य नहीं माना जा सकता। एक अच्छी समझ के लिए उचित तो यह होगा कि सिर्फ भाषा नहीं, उसे भारतीय साहित्य से भी परिचित होना चाहिए। इसलिए हम एक भारतीय भाषा की अनिवार्यता की अनुशंसा करते हैं।’ आयोग ने (अनुशंसा 3.23 में) अंग्रेजी के पक्ष पर भी विचार किया है। दुनिया के ज्ञान से जुड़ने और कई राज्यों में परस्पर संवाद की अनिवार्यता को देखते हुए अंग्रेजी के ज्ञान को भी उसने जरूरी समझा।

कोठारी आयोग की इन सिफारिशों पर गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार ने यह फैसला किया कि अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। इसीलिए 1979 से शुरू हुई मुख्य परीक्षा में सभी अभ्यर्थियों के लिए भारतीय भाषा के ज्ञान के लिए दो सौ नंबरों का एक परचा रखा गया और दो सौ अंग्रेजी का। दोनों का स्तर दसवीं तक का। और भी महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इन दोनों ही भाषाई ज्ञान के नंबर चयन की वरीयता के अंतिम नंबरों में नहीं जुड़ेंगे।

प्रशासनिक सेवा में या देश के ऊपर फिर अचानक कौन सा संकट आ गया कि अपनी भाषा का परचा तो गायब हो गया लेकिन अंग्रेजी के सौ नंबर पिछले दरवाजे से निबंध के परचे में जोड़ दिए गए और वे नंबर अंतिम मूल्याँकन में जोड़े भी जाएंगे। क्या चार-पाँच लाख मेधावी छात्रों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता में सौ नंबर कम होते हैं? और क्या भारतीय संविधान अपनी भाषाओं को खारिज करके अंग्रेजी को उसके ऊपर रखने की इजाजत देता है? क्या इतने महत्त्वपूर्ण फैसले पर संसद या विश्‍वविद्यालयों में बहस नहीं होनी चाहिए?

यूपीएससी परीक्षा के एक पक्ष की तारीफ की जानी चाहिए कि यह अकेली ऐसी संवैधानिक संस्था है जो कोठारी आयोग की सिफारिशों का पालन करते हुए लगभग हर दस साल में इस प्रणाली की विधिवत समीक्षा करती रही है। उदाहरण के लिए, ध्यान दिला दें कि आरक्षण नीति की, संविधान निर्माताओं की सिफारिशों के बावजूद, साठ बरस में समीक्षा नहीं की गई।
उसे ‘धर्म’ की श्रेणी में रख दिया गया है और आपको पता ही होगा कि धर्म के संरक्षक क्या-क्या अधर्म करते हैं। क्रीमीलेयर के चलते आरक्षण के फायदों को गरीबों तक पहुँचने की कितनी कम गुंजाइश बचती है।
वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कोठारी आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद से समय-समय पर दूसरी समितियों ने भी परीक्षा पद्धति, भर्ती प्रणाली आदि का मूल्याँकन किया है।

वर्ष 1990 के आसपास बनी सतीश चंद्र समिति ने इस पर विचार किया था कि कौन-से विषय मुख्य परीक्षा में रखे जाएं या बाहर किए जाएं और यह भी कि किन केंद्रीय सेवाओं को इस परीक्षा से बाहर रखा जाए। लगभग दस साल पहले जाने-माने अर्थशास्त्री और शिक्षाविद् प्रोफेसर वाइके अलघ की अध्यक्षता में बनी समिति को भी ऐसी समीक्षा की जिम्मेदारी दी गई, जिससे अपेक्षित अभिक्षमता के नौजवान इन सेवाओं में आएं। उनके सामने यह चुनौती भी थी कि भर्ती के बाद प्रशिक्षण कैसे दिया जाए, विभाग किस आधार पर आबंटित हों आदि।

अलघ समिति की संस्तुतियों में अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा गया था कि   अभ्यर्थियों की उम्र अगर कम की जाए तो अच्छा रहेगा। शायद इसके पीछे यह सोच था कि एक पक्की उम्र में आने वाले नौकरशाहों और उनकी आदतों को बदलना आसान नहीं होता। हालाँकि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे अपने एक लेख में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उम्र की वजह से गरीब और अनुसूचित जाति-जनजाति के अभ्यर्थियों की संख्या पर उलटा असर नहीं पड़ना चाहिए। इसके अलावा ‘होता समिति’ ने भी कुछ मुद्दों पर सुझाव दिए।

लेकिन 2011 में गठित अरुण निगवेकर समिति की सिफारिशों से यह नहीं लगता कि भारतीय भाषाओं के इतने संवेदनशील मुद्दे पर बहुत गहराई से विचार हुआ है। अब भी इसमें सुधार की तुरंत गुंजाइश है। वह यह कि कोठारी आयोग द्वारा लागू मातृभाषा और अंग्रेजी की अनिवार्य अर्हता वाले परचों को पुरानी प्रणाली की तरह ही रहने दिया जाए।  इससे एक तो हर नौकरशाह को एक भारतीय भाषा को जानने-समझने, पढ़ने की अनिवार्यता बनी रहेगी, और दूसरे, अंग्रेजी वालों को अतिरिक्त लाभ भी नहीं मिलेगा।

पहले ही, 2011 से, पहले चरण से (प्रीलीमिनरी में) अंग्रेजी आ गई है। ये सामान्य ज्ञान की परीक्षा अंग्रेजी में देंगे। निबंध अंग्रेजी में, इंटरव्यू अंग्रेजी में। यानी कोई सारी उम्र इंग्लैंड, अमेरिका में रहा या वहीं पढ़ाई हुई है, तब भी भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में जाने से उसे कोई नहीं रोक सकता। तंत्र में आने के बाद वह इस दंभ में भी इतरा सकता है कि दिल्ली के रामजस कॉलेज की तो छोड़ो, सिवान या इलाहाबाद वालों को वह अंग्रेजी नहीं आती जो सेंट स्टीफन या इंग्लैंड में पढ़े हुए की बराबरी कर सके।
भारतीय भाषाओं का माध्यम जरूर अभी बचा हुआ है। लेकिन यही दौर रहा तो आने वाले वर्षों में वह भी समाप्त हो जाएगा। पर वे अंग्रेजी की बाधाओं के बाद अंतिम चुनाव तक पहुँचेंगे कैसे?

इसीलिए भारतीय नौकरशाही के संदर्भ में कोठारी आयोग की रिपोर्ट प्रशासनिक सुधारों में सबसे क्रांतिकारी मानी जाती है और यह हकीकत भी है। पिछले तीस सालों के विश्लेरषण बताते हैं कि कैसे कभी पूना के मोची का लड़का तो कभी पटना के रिक्शे वाले ने अपनी भाषा में परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया है। हर वर्ष सैकड़ों ऐसे विद्यार्थी इन नौकरियों में आते रहे हैं। किसी सर्वेक्षण से यह सामने नहीं आया कि अपनी भाषा से आए हुए ये नौजवान कर्तव्य-निष्ठा, कार्य-क्षमता में किसी से कम साबित हुए हैं। कहाँ तो यूपीएससी की भारतीय इंजीनियरिंग, मेडिकल, वन, सांख्यिकी, सभी परीक्षाओं में कोई भारतीय भाषा आनी थी, कहाँ उसका एक मात्र द्वीप भी डूब रहा है।
यूपीएससी की होड़ाहोड़ी, कर्मचारी चयन आयोग की भी सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी और दो कदम आगे है। यहाँ तो भारतीय भाषाएं हैं ही नहीं। वर्ष 2011 में लागू परीक्षा प्रणाली के दुष्परिणाम आने शुरू हो गए हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में पिछले साल इकतीस जुलाई को छपी रिपोर्ट बताती है कि 2002 से 2011 के बीच प्रशासनिक सेवा में ग्रामीण युवा 36 प्रतिशत से घट कर 29 प्रतिशत रह गए हैं। जबकि 2009 में उनकी हिस्सेदारी 48 फीसद थी। कोठारी आयोग की सिफारिशों के चलते आजाद भारत में पहली बार ग्रामीण क्षेत्र के युवा नौकरियों में आ रहे थे। वह रथ अब उलटा चल पड़ा है। क्योंकि उसके सारथी अब वे हैं जो पढ़े तो अमेरिका, इंग्लैंड में हैं लेकिन शासन यहाँ करना चाहते हैं। सवाल यह है कि जिन पर शासन करना चाहते हैं उनकी भाषा, साहित्य से परहेज क्यों?

खबर है कि महाराष्ट्र से मराठी के पक्ष में आवाज उठी है और उन्होंने धमकी दी है कि अगर मराठी बाहर रही तो यूपीएससी की परीक्षा नहीं होने देंगे। कोठारी आयोग की सिफारिशों का सबसे अधिक फायदा हिंदीभाषी राज्यों के विद्यार्थियों को मिला। हर वर्ष हिंदी माध्यम से औसतन पंद्रह प्रतिशत विद्यार्थी चुने गए, विशेषकर गरीब, दलित, आदिवासी तबके के। लेकिन कहाँ गए वे लोग, जो रोज दिल्ली में भोजपुरी और अवधी अकादमी की माँग रखते हैं?

उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका कुर्रतुल हैदर ने दशकों पहले कहा था कि जो भाषा रोटी नहीं दे सकती उस भाषा का कोई भविष्य नहीं है। अगर भारतीय भाषाओं की जरूरत नौकरी के लिए नहीं रही तो लेखकों के पोथन्नों को भी कोई नहीं पढ़ेगा। हिंदी के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को यह याद रखना चाहिए।

(जनसत्ता 12 मार्च, 2013 में प्रकाशि‍त। आभार सहि‍त)